भाष्य : मंगलेश डबराल का घर और ‘न्यू ऑर्लींस में जैज़' : शिव किशोर तिवारी

Posted by arun dev on अगस्त 20, 2018















देखते-देखते हम सबके प्रिय मंगलेश डबराल ७० साल के हो गए. अगर कवि अपनी लिखी जा रही कविताओं में ज़िन्दा है तो उसकी उम्र का एहसास नहीं होता. मंगलेश सक्रिय हैं और कविताएँ भी लिख रहे हैं. इस यात्रा में उनकी कविताओं के शिल्प, कथ्य और सरोकार में बदलाव लक्षित किये जा सकते हैं.  

मंगलेश के पहले कविता संग्रह 'पहाड़ पर लालटेन’ (१९८१) की कविता ‘घर’ और २०१३ में प्रकाशित उनके नवीनतम कविता संग्रह ‘नये युग में शत्रु’ (२०१३) की कविता न्यू ऑर्लींस में जैज़ को आमने सामने रखकर यही देखने की कोशिश कर रहे हैं शिव किशोर तिवारी.

इन दोनों कविताओं को आप पढ़ेंगे ही, इस विवेचना में गर आप भी कुछ जोड़ सकें तो यह संवाद सार्थक होगा.  




मंगलेश डबराल का  घर  और  न्यू ऑर्लींस में जैज़                        
शिव किशोर तिवारी




घर
मंगलेश डबराल




यह जो हाथ बांधे सामने खड़ा है घर है

काली काठ की दीवालों पर सांप बने हैं
जिन पर पीठ टेकने के निशान हैं
इनमें दीमकें लगी हैं
जो जब चलती हैं पूरा घर कांपता है

इसमें काठ का एक संदूक है
जिसके भीतर चीथड़ों और स्वप्नों का
एक मिला-जुला अंधकार है
इसे पिता ने दादा से प्राप्त किया था
और दादा ने ख़ुद कमाकर

घर जब टूटेगा बक्स तभी उठेगा

कई बच्चे बड़े हुए इस घर में
गिरते पड़ते आख़िरकार
खाने-कमाने की खोज में तितर-बितर होते हुए
यहां कुछ मौतें हुईं
कुछ स्त्रियां रोईं इस तरह
कि बस उनका सुबकना सुनाई दे
कुछ बहुत पुरानी चीज़ें अब भी बजती हैं घर में

दिन-भर लकड़ी ढोकर मां आग जलाती है
पिता डाकख़ाने में चिट्ठी का इंतज़ार करके
लौटते हैं हाथ-पांव में
दर्द की शिकायत के साथ
रात में जब घर कांपता है
पिता सोचते हैं जब मैं नहीं हूँगा
क्या होगा इस घर का.

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ह कविता 1975 में लिखी गई और डबराल के पहले संग्रह 'पहाड़ पर लालटेन' (1981) में संकलित है.


पहली पंक्ति में "हाथ बांधे खड़ा है" मानवीकरण का बिम्ब है. घर सेवा को तत्पर, अति विनयी, संभवतः कुछ निरीह व्यक्ति की तरह है. घर कभी मज़बूत था और एक भरे-पूरे परिवार का आश्रय था, अब वह इतना जर्जर हो गया है कि काठ में लगी दीमकें चलती हैं तो वह कांपता है. उसमें केवल एक वृद्ध दंपति रहते हैं, मन में यह आशा लिए कि बाहर कमाने- खाने का हीला खोजने गये बच्चे लौटकर आयेंगे. घर और वृद्ध दंपति एक दूसरे का आईना हैं.


'हाथ बांधे' का अर्थ यदि with arms folded लें तो उसमें प्रतीक्षा की व्यंजना हो सकती है. पहाड़ की ठंड में सीने पर हाथ बांधकर शरीर की गरमी को सुरक्षित रखते हुए व्यक्ति का चित्र भी उभरता है.


पहले वाक्य की संरचना भी देखनी होगी - वह जो सामने खड़ा है घर है.' एक घर नहीं , सिर्फ़ घर. पहाड़ का लकड़ी से बना पुरानी चाल का एक घर जो प्रतिनिधि घर भी है. ख़ाली होते पहाड़ों का घर. पलायन-प्रब्रजन का प्रतीक घर.


काठ के संदूक का बिम्ब कमज़ोर है. साधारण, बहुप्रयुक्त बिंब है. चीथडों और सपनों का मिश्रित अंधकार भी काफ़ी निर्जीव है और विशेष प्रभावोत्पादक नहीं है. पर इस खंड की आख़िरी पंक्ति 'जब घर टूटेगा बक्स तभी उठेगा जानदार है. पुराने घरों का सुपरिचित अनुभव है. संदूक तत्स्थान में बनाये जाते थे. फिर उनके बाहर निकलने जितना चौडा कोई दरवाज़ा नहीं होता था. संदूक घर की आत्मा की तरह है, पीढ़ियों का इतिहास छिपाये. वह घर के ढहने तक बाहर नहीं निकलने वाला.


घर के इतिहास में कुछ बातें साधारण है. दुनिया के सभी घरों की तरह उसमें जन्म हुए, मरण हुए. मृत्यु पर स्त्रियां ऊंची आवाज़ में नहीं रोतीं. संभवतः कुलीन ढंग का शोक है या मृत्यु का स्वीकार इस समाज में अधिक सहज है. फिर एक अप्रसंग पंक्ति- " बहुत कुछ पुरानी चीजें अब भी बजती हैं घर में." कौन सी पुरानी चीजें यह स्पष्ट नहीं हैं, पर हम कल्पना कर सकते हैं कि किसी घर से आने वाली आवाज़ें - लोगों की बातें, बच्चों का शोर, पूजा की घंटी, दीवाल घड़ी की टिक टिक,लकड़ी की संधियों में हवा की सीटी, फूल का बरतन गिरने की आवाज़, गाना- बजाना . बहुत कुछ खो गई हैं पर पर कुछ अब तक जीवित हैं. कुछ की स्मृति जीवित है.


दिन भर लकड़ी जमा करती मां, बच्चों की चिट्ठियों की निष्फल प्रतीक्षा करते पिता इन बिंबों में भी नयापन नहीं है.


लेकिन अंतिम बिम्ब इतना प्रभावोत्पादक है कि सारी कविता में वही याद रह जाता है -

रात में जब घर कांपता है
पिता सोचते हैं जब मैं नहीं हूँगा
तो क्या होगा इस घर का.

सबसे पहले ऑयरनी चोट करती है. एक जर्जर घर, संपत्ति के हिसाब से जिसका कोई मूल्य नहीं, उसके भविष्य की चिंता में ही विद्रूप की छाया है. फिर ख़याल आता हि कि यह घर जो एक जीवनशैली, एक सभ्यता, एक संस्कृति का प्रतीक है उसकी चिंता इतनी हल्की चीज़ तो नहीं है. शिल्प की दृष्टि से उल्लेखनीय न होने के बावजूद यह अत्यंत आकर्षक कविता है.











न्यू ऑर्लींस में जैज़
मंगलेश डबराल



शराब की जो बोतलें अमेरिका में भरी हुई दिखी थीं
वे यहां ख़ाली और टूटी हुई हैं
सड़कों के किनारे बिखरे हुए नुकीले कांच और पत्थर
जैज़ जैज़ जैज़ एक लंबी अछोर गली
दोनों तरफ़ गिलासों के जमघट उनमें शराब कांपती है
लोग उसमें अपनी तकलीफ़ को रोटी की तरह डुबोकर खाते हैं
गोरा होटल का मैनेजर कहता है उधर मत जाइए
वहां बहुत ज़्यादा अपराध है
यहां के टूरिस्ट निर्देशों को ग़ौर से पढ़िए
अमेरिका के पांच सबसे हिंसक शहरों में है न्यू ऑर्लींस

चंद्रमा अपने सारे काले बेटे यहां भेज देता है
रात अपनी तमाम काली बेटियां यहां भेज देती है
यहां तारे टूटकर गिरते हैं और मनुष्य बन जाते हैं
जैज़ जैज़ जैज़ नशे की एक नदी है मिसीसिपी
फ़्रेंच क्वार्टर में तीन सौ साल पहले आये थे ग़ुलाम
अफ़्रीका से भैंसों की फ़ौज१ की तरह लाए हुए
जैसे ही कोड़ों की मार कुछ कम होती
वे फिर से करने लगते गाने और नाचने का अपना प्रिय काम
उन्हें हुक्म दिया जाता मेज़ पर नहीं रसोईघरों में खाओ२
वे हंसते हुए जाते खाते और नाचते
एक चतुर क्रूर सभ्यता के लिए उन पर शासन करना कितना कठिन
उनके लिए बने सारे नियम और वे तोड़ते रहे सारे नियम
आते और जाते हैं कितने ही अत्याचारी
फ़्रांसीसी स्पेनी अमरीकी इंसानों के ख़रीदार
समुद्र से उठते हुए कितने ही तूफ़ान
हरिकेन बेट्सी रीटा कैटरीना
तब भी प्रेम की तलाश ख़त्म नहीं होती इस दुनिया में
जहां हर चीज़ पर डॉलर मे लिखी हुई है उसकी क़ीमत


अब क्लैरिनेट के रंध्रों से अंधेरा बह रहा था
ट्रम्पेट के गले से रुंधी हुई कोई याद बाहर आ रही थी
जब सैक्सोफ़ोन के स्वर नदी के ऊपर घुमड़ रहे थे
एक ट्रोंबोन इस शहर के दिल की तरह चमक रहा था
मुझे दिखा एक मनुष्य काला वह ब्रेड खा रहा था
वह हंस रहा था बढ़ रहा था मेरी तरफ़ हाथ मिलाने के लिए
उसके मुंह में हंसी तारों जैसी चमकती थी
उसे बुलाती हुई दूर से आई एक स्ट्रीटकार
उसका नाम था डिज़ायर३
दूर एक होटल में टूरिस्टों का इंतज़ार कर रहा था
डरा हुआ गोरा मैनेजर.
(2005)
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१. अश्वेत ब्लू गीत ‘बफ़ेलो सोल्जर कॉट इन अफ्रीक़’
२. प्रसिद्ध अमेरिकी अश्वेत कवि लैंग्स्टन ह्यूज़ की एक कविता पंक्ति
३. टेनेसी विलियम्स का प्रसिद्ध नाटक अ स्ट्रीटकार नेम्ड डिज़ायर. यह ट्राम अब भी न्यू ऑर्लींस में चलती है.











विता न्यू ऑर्लेंस के बारे में है तो जैज़, अश्वेत अमेरिकी और हरिकेन कैटरीना तो होना ही चाहिए.  तीनों हैं. एक अश्वेत कवि की एकाध पंक्ति  भी होनी चाहिए. है जी. न्यू ऑर्लेंस की पृष्ठभूमि पर लिखी किसी जानी-मानी साहित्यिक कृति का उल्लेख होना चाहिए. है न!

आप न्यू ऑर्लेंस में बैठकर रिपोर्टिंग कर रहे हों, बेसबॉल की कमेंट्री कर रहे हों या देश में  पीछे छूट गये प्रियजन को पत्र लिख रहे हों, इतना ज़रूर  लिखेंगे.

लेकिन कविता में आप शहर का कोई अनुद्घाटित पक्ष उभारेंगे. कुछ ऐसा लिखेंगे जो कविता के मुहावरे में कवि की पंचेन्द्रिय और मन पर पड़े विलक्षण चित्रात्मक प्रभावों को अभिव्यक्ति देता हो. चलिए डबराल की कविता में कविता की खोज करते हैं.




पहला चित्र

सड़कों पर तोडी हुई शराब की बोतलों के टुकड़े हैं. एक लंबी और चक्करदार गली जिसमें  2005 में भी जैज़ संस्कृति का प्रसार दिखाई देता है. सड़क की दोनों तरफ़ शराब के गिलासों की क़तार जिनमें रोटियों की तरह डुबोकर लोग अपने दुःख खाते हैं. बड़ा अटपटा सा बिंब है. पर स्पष्ट है कि वाचक इस वक़्त शहर के अश्वेत इलाक़े में है जिसमें जाने को होटल के गोरे मैनेजर ने मना किया था. शराब गिलासों में है तो पीने वाले लोग भी होंगे. कहीं बेकारी और ख़ालीपने की व्यंजना है इन पंक्तियों में. तोड़ी गई बोतलों का कांच और नुकीले पत्थर दिखाते हैं कि साधारण मिडिल क्लास के आदमी को होटल के मैनेजर की बात सही लगती. परंतु वाचक को मैनेजर का नज़रिया पूर्वाग्रह-ग्रस्त लगता है. वह मैनेजर की सलाह को ख़ारिज करके इस इलाक़े में आया है. जैज़ जैज़ जैज़ एक लंबी कठिन अछोर गलीसे यह भी प्रतीत होता है कि वाचक को इस परिवेश में एक सांस्कृतिक जीवंतता दिख रही है, परंतु इसका कोई चाक्षुष बिंब नहीं प्रस्तुत किया गया है. पाठक को यह स्पष्ट अनुभूति नहीं होती कि वाचक का नज़रिया किस प्रकार अलग है. पाठक के मन में यह सवाल भी जागता है - गोरों के इलाक़े में ठहरे ही क्यों?






आगे चलते हैं 


चंद्रमा के काले बेटे और रात की काली बेटियाँ  यहीं भेज दी जाती हैं. बहुत ढूंढ़कर भी चंद्रमा के बेटों और रात की बेटियों का कोई मिथकीय उत्स नहीं मिला. कवि की कल्पना है तो कहना होगा कि ये खिझाऊ रूपक इस इलाक़े में बसे काले लोगों के लिए कोई समानुभूति नहीं जगाते, बल्कि कवि की संवेदनशून्यता ही दिखाते हैं. चंद्रमा और रात के बेटे-बेटियों के रूपक से क्या अभिप्रेत है? किनसे कंट्रास्ट व्यंजित है सूरज के बेटों और दिन की बेटियों से? इन रूपकों में क्या है जो मालिकों और दासों को अलग करता था और गोरों और कालों को वर्तमान में अलग करता हैक्या कवि प्रकृति या भाग्य की बात कर रहा है ? संभव तो नहीं लगता. फिर क्या कवि ने वैसे ही जो मन में आया लीप दिया?


यहां तारे टूटकर गिरते हैं तो मनुष्य बन जाते हैं. हालांकि तारे टूटकर धरती तक पहुँचे तो बड़े- बड़े गड्ढे बनेंगे पर हम मान लेते हैं कि यह बिम्ब सूचित करता है कि शहर  विस्थापित या अपने मूल से उखडे लोगों का आश्रय है. ये सभी मिसिसिपी के प्रवाह में व्याप्त अफ़्रीकी मूल से उपजी जैज़ संस्कृति के वाहक हैं.  दो पंक्तियों में 300 वर्ष पूर्व काले ग़ुलामों का आगमन और अगली दो पंक्तियों में अत्यंत कठिन परिस्थितियों में उनका अपने गीत-नृत्य को जीवित रखना वर्णित है. यह हिस्सा अभिधात्मक है, कविता के काम का ख़ास कुछ नहीं है.

लगी-लगी एक पंक्ति आती है जिसे कवि ने अलग से नोट लिखकर लैंग्स्टन ह्यूज़ की कविता की पंक्ति बताया है -

"उन्हें हुक्म दिया जाता मेज़ पर नहीं  रसोई घरों में खाओ".

इस पंक्ति में कौन-सा भयानक अन्याय व्यक्त हुआ है समझ में नहीं आया. उस समय यूरोप के या अमेरिका के ही श्वेत नौकर क्या मालिक की डाइनिंग टेबल पर खाते थे और केवल अमेरिकी काले ग़ुलाम किचेन में खाते थे? हमारे देश में नौकर कहाँ खाते हैं? डबराल के घर में क्या व्यवस्था है? इस बात से उद्वेलित क्यों हुआ हमारा कवि?
मैं ह्यूज़ की पंक्तियां आपके सोचने के लिए छोड़ जाता हूं  -



" I too sing America.

I am the darker brother.
They send me to eat in the kitchen
When company comes,
But I laugh,
And eat well
And I grow strong." (1926)


अमेरिका के हाथ में आने के पहले न्यू ऑर्लेंस फ्रांस और स्पेन के अधिकार में रहा था. वाचक कहता है कि इन सभी आततायियों के क़ानूनों को व्यर्थ करके काले लोगों ने अपनी संस्कृति को जिलाए रखा क्योंकि "प्रेम की तलाश ख़तम नहीं होती इस दुनिया में."


इसके बाद जैज़ के वाद्यों के उल्लेख के साथ कुल चार पंक्तियों में संभावित कथ्य को प्रतिबिंबित किया गया है कि अकल्पनीय अत्याचारों के शिकार दासों ने नगर की संस्कृति को बदल दिया.

फिर काव्यसंग्रह के शीर्षक वाली दो पंक्तियां-

"मुझे दिखा एक मनुष्य काला वह ब्रेड खा रहा था
हंस रहा था बढ़ रहा था मेरी तरफ़ हाथ मिलाने के लिए"


आप कृपा करके कह रहे हैं  काला भी मनुष्य है या काले लोग पान की तरह ब्रेड चबाते रहते हैं  या क्या कहना चाहते हैं? या कहना है कि गोरे मैनेजर ने आपको गुमराह किया, दरसल यहाँ के काले लोग विदेशियों को देखते ही हाथ मिलाने दौड़ते हैं?

हाथ मिलाना हुआ कि नहीं  हुआ स्पष्ट नहीं है पर इसी बहाने "ए स्ट्रीटकार नेम्ड डिज़ायर" का उल्लेख करने का अवसर मिल गया. और आख़िरी पंक्तियां-

"दूर एक होटल में टूरिस्टों का इंतज़ार  कर रहा था
डरा हुआ गोरा मैनेजर."

जब कालों में ही रुचि थी तो इतनी दूर सुरक्षित गोरों के इलाक़े में रुके क्यों मियां?

कविता के बिंब आदि अनाकर्षक और बलात् नियोजित हैं इसका संकेत ऊपर दिया जा चुका है. चांद और रात के काले बेटे-बेटियों के रूपक के अलावा दासों के लिए एक उपमा भी है भैंसों की फ़ौज. कवि ने नोट लिखकर बताया है कि यह उपमा न होकर एल्यूज़न है –“अश्वेत ब्लू गीत बफ़ेलो सोल्जर कॉट इन अफ्रीका’”. संभवत: बॉब मार्ली के गीत बफ़ेलो सोल्जरसे अभिप्राय है. परंतु गीत का संदर्भ ज़रूरी नहीं है. जब 1866 में क़ानून बनाकर काले सिपाहियों की भर्ती अमेरिकी सेना में की गई तब उन्हें नेटिव इंडियन लोगों का ख़ात्मा करने के लिए नियुक्त किया गया. 


इन सैनिकों के घुंघराले (शायद चोटियों वाले) बालों की वजह से इंडियन इन्हें बफ़ेलो सोल्जरबुलाने लगे. यह बफ़ेलो दरअसल भैंसा नहीं था, बल्कि अमेरिकन बाइसन था जिसे हिंदी में गौर कह सकते हैं. बॉब मार्ली का गीत अमेरिकन अश्वेतों के इस कुकृत्य का अपोलोजियाहै. इस एल्यूज़न से कविता की विषयवस्तु का क्या संबंध है? वैसे भी कविता में भैंसों की फ़ौज की तरहलिखा है जिसे एक घटिया कोटि की उपमा ही मानना पड़ेगा.


बिंब भी अद्भुत हैं तकलीफ़ को रोटी की तरह शराब में डुबोकर खाना, तारे टूटकर गिरते हैं और मनुष्य बन जाते हैं, ब्रेड खाता हुआ काला आदमी सब एक से एक ! अब एल्यूज़न(allusion) पर नज़र डालिए. एक ह्यूज़ की कविता  I Too Sing America का है. अलग से टिप्पणी डालकर कवि ने समझाया है कि उसने ह्यूज़ की कविता से एक पंक्ति ली है. यह सही नहीं है. पंक्ति नहीं ली बल्कि दो पंक्तियों का भाव लिया है. फिर 1926 में रंगभेद के बारे में लिखी कविता को दासों से कैसे जोड़ दिया? दास लोग सारे के सारे मालिक के किचन में खाते थे (डाइनिंग टेबुल को तो अलग ही रखो) ? दूसरा एल्यूज़न टेनेसी विलियम्स के नाटक A Streetcar Named Desire का है. इसका तो इस कविता के कथ्य (वह जहां भी छिपा हो) से दूर-दूर तक का संबंध नहीं है, न कविता के किसी हिस्से से यह एल्यूज़न जुड़ता है.




निष्कर्ष 



कहने को कुछ था. जैज़ एक बड़ी सांस्कृतिक घटना थी. दासों ने मालिकों की संस्कृति को पलट दिया. यही कथ्य कविता को प्राणवान बना सकता था लेकिन कवि ने इसे साधारण ढंग से चार पंक्तियों में चलता किया है. बाक़ी की 34 पंक्तियों में इधर-उधर की बातें, इतिहास, जिजीविषा का महत्त्व, बाज़ारवादहिंदी के भुच्च पाठकों का ज्ञानवर्धन आदि पर ज़ोर है. इतिहास लिखना था तो 500 पंक्तियों की कविता लिखते. 38 पंक्तियों में इतना ज्ञान

इस कविता से 30 साल पहले लिखी कविता “घर” में शिल्प इतना शक्तिशाली नहीं है पर एक प्रामाणिक आंतरिकता है जो उसे मोहक बनाती है। “न्यू ऑर्लींस में जैज़” में शिल्प केवल कमज़ोर नहीं है, हास्यास्पद है और प्रामाणिकता की जगह हवा भरी है; परिणाम – फुस्स्स!

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शिव किशोर तिवारी
२००७ में भारतीय प्रशासनिक सेवा से निवृत्त.
हिंदीअसमियाबंगलासंस्कृतअंग्रेजीसिलहटी और भोजपुरी आदि भाषाओँ से अनुवाद और लेखन.
tewarisk@yahoocom