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सबद - भेद : मित्रो मरजानी का मर्म: नंद भारद्वाज

Posted by arun dev on फ़रवरी 21, 2018












कृष्‍णा सोबती के  लेखन पर समालोचन पर आपने रवीन्द्र त्रिपाठी  का आलेख पढ़ा - 'पहले दिल-ए-गुदाख़्ता पैदा करे  कोई. इसी क्रम में आज प्रस्तुत है नंद भारद्वाज का आलेख – ‘मरजानी मित्रो की मर्म-कथा’.

नंद भारद्वाज ने इस चर्चित उपन्यास पर लेखकों-आलोचकों के मतान्तर को दृष्टि में रखते हुए इस कृति के मन्तव्य को सलीके से उद्घाटित किया है.  

फरवरी  कृष्णा सोबती के जन्मोत्सव का महीना है.



मरजानी मित्रो की मर्म-कथा                  
नंद भारद्वाज





कृष्‍णा सोबती के अधिकांश समानधर्मा रचनाकारों, समालोचकों और हिन्‍दी के बड़े पाठकवर्ग ने जहां अपने समय-समाज में उनकी रचनात्‍मक भूमिका को मुक्‍त मन से सराहा है, वहीं उनके कुछ समकालीन रचनाकारों और भिन्‍न सोच रखनेवाले आलोचकों ने उनके स्‍त्री चरित्रों की वैयक्तिक छवि, उन्‍मुक्‍त आचरण और उनकी बेबाक बयानी पर सनातनी शंकाएं उठाते हुए उन पर मनमाने आरोप भी लगाए हैं. 

मसलन, लेखक-संपादक राजेन्‍द्र यादव को जहां
‘सूरजमुखी अंधेरे के’ में कृष्‍णा सोबती की नारी एक खतरनाक दिशा की ओर मुड़ती दिखाई दी और उन्‍हें यह लिखना जरूरी लगा कि ‘डार से बिछुड़ी’ में आदमी ने औरत को ‘चीज’ की तरह इस्‍तेमाल किया था, यहां औरत आदमी को एक दूसरी दृष्टि से इस्‍तेमाल करती है. (औरों के बहाने, पृष्‍ठ  43) 
वहीं कृष्‍णा सोबती के इन्‍हीं उपन्‍यासों को हवाले में लेते हुए उन पर अपनी तंजभरी टिप्‍पणी ‘कौन-सी जिन्‍दगी कौन-सा साहित्‍य’ में अमृता प्रीतम यह कहती दिखीं कि “आधुनिक हिन्‍दी साहित्‍य के यौन आचरण का एक बड़ा खूबसूरत हवाला कृष्‍णा सोबती के उपन्‍यास ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ में मिलता है." इसी क्रम में हिन्‍दी कथाकार और लेखक कमलाकान्‍त त्रिपाठी ने ‘दस्‍तावेज’ पत्रिका के अंक 138 में प्रकाशित अपने एक लेख में हिन्‍दी की स्‍त्री कथाकारों में मुक्‍त-यौनवाद का मसला उठाते हुए कृष्‍णा सोबती, मृदुला गर्ग, और मैत्रेयी पुष्‍पा के कुछ उपन्‍यासों की कथावस्‍तु और उनके नजरिये को निशाने पर लेते हुए काफी तीखी टिप्‍पणियां की हैं. 


कृष्‍णा सोबती के दो लघु उपन्‍यासों ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ और ‘मित्रो मरजानी’ के प्रमुख स्‍त्री-चरित्रों की चीर-फाड़ के बहाने उन्‍होंने लेखिका के मंतव्‍य (नीयत) पर ही सवाल उठा दिये हैं.

‘मित्रो मरजानी’ की पूरी कथा की अपनी मनमानी व्‍याख्‍या करते हुए कमलाकान्‍त त्रिपाठी लिखते हैं-  “ऐसे घोर व्‍यक्तिवादी, बल्कि  देहवादी, दांपत्‍य-विरोधी और समाज-विरोधी पात्र को उपन्‍यास का केन्‍द्रीय चरित्र बनाने के पीछे लेखिका का क्‍या मंतव्‍य हो सकता है. अंत के बेहद नाटकीय दृश्‍य का निहितार्थ बहुत गोलमोल है. कोई संकेत नहीं है कि पति को लेकर मां से भय और असुरक्षा का क्षणिक बोध रातों-रात उसमें कोई दिव्‍यांतर ला देता है और वह अपने स्‍वभाव से ऊपर उठकर घर-परिवार के प्रति अनुरक्‍त हो जाती है. इस दृश्‍य को छोड़ दें तो मित्रो में कहीं कोई मानवीय स्‍पंदन नहीं है." (दस्‍तावेज 138, पृष्‍ठ 9) और इसी रौ में उनके दूसरे उपन्‍यास ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ पर ‘सॉफ्‍ट पॉर्न’ की चत्‍ती लगाते हुए अपनी मनोगत व्‍याख्‍या में वे लिखते हैं – “पूरी कथा घोर दैहिकता पर टिकी होने के बावजूद एक अयथार्थ, स्‍वप्निल दुनिया में विचरती है, जहां आर्थिक-सामाजिक विसंगतियां, जीवन की आपा-धापी, ऊहापोह सिरे से गायब है." (वही, पृ 10) और अंत में वही खीझ-भरा निष्‍कर्ष कि “उपन्‍यास स्‍त्री–चेतना और स्‍त्री-विमर्श को एक सूत भी आगे बढ़ाता नहीं लगता." (वही, पृ 11)

जहां तक राजेन्‍द्र यादव और अमृता प्रीतम की टिप्‍पणियों का सवाल है, उन पर महिला एवं बाल कानून के विशेषज्ञ और नारी-लेखन के समाजशास्‍त्रीय अध्‍येता अरविन्‍द जैन ने कृष्‍णा जी के लेखन पर इस तरह की आपत्ति उठाने वालों को अपनी पुस्‍तक ‘औरत : अस्तित्‍व और अस्मिता’ में विस्‍तार से सटीक जवाब दिया है. ऐसे सभी आक्षेपों का तार्किक और शालीन उत्‍तर देते हुए वे लिखते है - “मैं इसे दुर्भाग्‍य ही कहूंगा कि उपन्‍यास को सिर्फ ‘मांसल धरातल’ पर ही पढ़ा और ‘पूजा’ गया. ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ मुख्‍य पात्र रत्‍ती के बचपन में बलात्‍कार से जुड़ी कहानी है, जिसमें रत्‍ती एक लंबी लड़ाई लड़ती है. हारती है, पर हार मानती नहीं. हर बार सिर उठा आगे बढ़ती है. रत्‍ती के लिए भविष्‍य वह अंधी आंखोंवाला वक्‍त बना रहा, जिससे रत्‍ती ने कभी साक्षात्‍कार नहीं किया, मगर रत्‍ती का बार-बार सिर उठा आगे बढ़ना देखना ही रत्‍ती की ताकत हैहिम्‍मत है." (औरत : अस्तित्‍व और अस्मिता, पृ 29)

बहरहाल, राजेन्‍द्र यादव और अमृता प्रीतम की टिप्‍पणियों पर अपनी बात फिर कभी. यहां जरूरत फिलहाल इस बात की है कि ‘मित्रो मरजानी’ के संबंध में कमलाकान्‍त त्रिपाठी की इन आपत्तियों को इस कथा-कृति की अंतर्वस्‍तु, मूल संरचना और कृष्‍णा सोबती की कथा-संवेदना के साथ मिलान कर जांचा-परखा जाना चाहिए, ताकि ऐसी भ्रान्त धारणाओं का निराकरण किया जा सके. बेहतर है कि पहले हम इस कथा-कृति की कथावस्‍तु को उसके मूल स्‍वरूप और निहितार्थ में ठीक से जान-समझ लें.  

‘मित्रो मरजानी’ शहरी निम्‍न-मध्‍यवर्ग के काम-काजी परिवार की ऐसी कथा है, जिसमें एक भिन्‍न वातावरण (रमणी की हवेली) में जन्‍मी-पली उन्‍मुक्‍त मिजाज वाली युवती मित्रो के बहू रूप में आ जाने से पारिवारिक वातावरण और घरेलू रिश्‍तों में जो नई स्थितियां और टकराव पैदा होते हैं और घर के बड़े किस तरह संतुलन बनाये रखने की कोशिश करते हैं, यह इसी जद्दोजहद की कहानी है. दिलचस्‍प बात यह है कि यहां खुद मित्रो भी अपने खुले मिजाज के बावजूद उसी बदले हुए वातावरण में ढलने का प्रयास करती है. जिन बातों का उसे अभ्‍यास नहीं है, उन्‍हें  अंगीकार करने का प्रयत्‍न करती है, परिवार और रिश्‍तों की मर्यादा समझने लगती है और इस तरह हिन्‍दी का पाठक पहली बार रूप में एक ऐसे स्‍त्री-चरित्र से रूबरू होता है, जो सामाजिक दायरे में वर्जित समझी जाने वाली दैहिक आकांक्षाओं और बुनियादी मानवीय भाव-वृत्तियों को बहुत सहज ढंग से अभिव्‍यक्‍त करती है. यह उपन्‍यास ऐसे ही घर में रहने-जीने वाले चरित्रों की मार्मिक कहानी के रूप में आगे बढ़ता है. इस घर के सदस्‍य हैं - मुखिया गुरूदास, उनकी पत्‍नी धनवंती, बड़ा बेटा बनवारीलाल, मंझला सरदारीलाल और एक छोटा गुलजारी. तीनों शादीशुदा हैं, जिनकी पत्नियां हैं – सुहागवंती (सुहाग), समित्रावंती (मित्रो) और फूलावंती (फूलां). मित्रो की मां बालो अपनी हवेली और रसूख के भुलावे में इस मध्‍यवर्गीय परिवार में अपनी बेटी मित्रो की शादी करवा तो देती है, लेकिन  जब उसका पति सरदारीलाल इस असलियत को जान लेता है तो पति-पत्‍नी के बीच का रिश्‍ता सहज नहीं रह पाता. उन दोनों के बीच तकरार बढ़ने लगती है और घर का वातावरण अशान्‍त होने लगता है, जिसे घर के बड़े (सास-ससुर, जेठ-जेठानी) किसी तरह संतुलित बनाए रखने का प्रयास करते हैं. 

पति-पत्‍नी के बीच की इसी आपसी तकरार के बाद रात में धीमे स्‍वभाव वाली जिठानी सुहाग देवरानी मित्रो को समझाने का प्रयास करती है तो वह कह उठती है - “जिठानी, तुम्‍हारे देवर सा बगलोल कोई और दूजा न होगा. न दुख-सुख, न प्रीत प्‍यार, न जलन-प्‍यास – बस आए दिन धौल-ध्‍प्‍पा --- लानत मलामत."  फिर एकाएक अपनी ओढ़नी, कुरता और सलवार उतार हंसते हुए सुहाग से बोलती है – “बनवारी कहता है, मित्रो तेरी देह क्‍या, निरा शीरा है शी-रा." इस बात पर सुहाग का चेहरा स्‍याह पड़ जाता है. वह कानों पर हाथ रख कहती है – “हाथ जोड़ती हूं देवरानी, मेरे सिर पाप न चढ़ा." मित्रो को उसी तरह अनावृत्‍त लेटी देख उसके बदन में सुइयां-सी चुभने लगती हैं और सोचती है - ‘इस कुलबोरन की तरह जनानी को हया न हो तो नित-नित जूठी होती औरत की देह निरे पाप का घट है.' कपड़े उतारकर पास बैठी मित्रो अपने हाथों से छातियां ढक मगन हो कहती है – “सच कहना जिठानी, क्‍या ऐसी छातियां किसी और की भी हैं?"  

अपना सिर पीटते हुए सुहाग उसे फटकारती है – “दिन-रात घुलती इस औरत की देह पर तुझे इतना गुमान? अरी, लानत तुझ पर! घर-घर तेरे जैसी काली-मकाली औरतें हैं, उनके तुझ जैसे ही हाथ-पांव हैं, आंखें हैं और यही तुझ जैसी दो छातियां! क्‍या तू ही अनोखी इस जून पड़ी है?” जिठानी का गुस्‍सा देख मित्रो ने हंसते-हंसते लीड़े पहन लिये, जिसे देख सुहाग अपने से ही कहती चली – ‘ऐसा पाप वरत गया है कि डोले में लाई, परणायी बहू के ये हाल-हीले! हे जोतोंवाली देवी, इस घर की इज्‍जत-पत रखना.' फिर मित्रो से कहती है – “देवरानी, तेरी किस्‍मत बुरी थी जो तू आज इन भाइयों के हाथों से बच निकली. मर-खप जाती तो इस जंजाल से छूटती और वे भी सुर्खरू हो जाते ! फिर अचरज से पूछती है – “सच सच कह देवरानी, तू इस राह-कुराह कैसे पड़ी?” 
इस पर मित्रो बेझिझक बोल उठती है – “सात नदियों की तारू, तवे-सी काली मेरी मां, और मैं गोरी-चिटृी उसकी कोख पड़ी. कहती है, इलाके बड़भागी तहसीलदार की मुंहादरा है मित्रो. अब तुम्‍ही बताओ, जिठानी, तुम जैसा सत-बल कहां से पाऊं–लाऊं ? देवर तुम्‍हारा मेरा रोग नहीं पहचानता. --- बहुत हुआ हफ्‍ते पखवारे --- और मेरी इस देह में इतनी प्‍यास है, इतनी प्‍यास है कि मछली सी तड़पती हूं." सुहागवंती फटी आंखों से देवरानी को तकती रहती है, जैसे पहली बार देखा हो, फिर सिर हिला फीके गले से कहती है – “देवरानी, इन भले लोगों को भुलावा दे, तुम्‍हारी मां ने अच्‍छा नहीं किया !” 

इस पूरी कथा में स्‍त्री देह और यौनिकता को लेकर कुल जमा इन्‍हीं संवादों को लेकर सनातनी लोगों में जो कुहराम मचा है, वह वाकई आश्‍चर्यजनक है. वे यह तक मानने को तैयार  नहीं कि दो हमउम्र पारिवारिक स्त्रियों (देवरानी-जिठानी) के बीच अकेले में इस तरह के हंस-बोलों अनैतिक या अस्‍वाभाविक कहना, एक तरह से अपनी कुंद-जेहनी और तंगदिली का ही इज़हार करना है. क्‍या इतने मात्र से मित्रो जैसी नवयौवना ‘निर्लज्‍ज’, ‘कामुक’, ‘कामोद्मादिनी’ या ‘स्‍वैरिणी’ स्‍त्री हो गई? और वह भी उस हमउम्र जिठानी के सामने जो बराबर उसके बेलिहाज बोलों और उन्‍मुक्‍त दैहिक हास-परिहास पर आत्‍मीय लगाव और चिन्‍ता के साथ उसे डांट-फटकार तक लगाने में कोई संकोच नहीं करती.

देवरानी-जिठानी के बीच हुए इस हास-परिहास भरे संवाद के बाद अगली सुबह जब सास धनवंती उन्‍हें यह बताने के लिए जगाती है कि छोटी बहू फूलावंती की तबियत ठीक नहीं, उसके लिए कुछ दवा-पानी का इंतजाम करना है, तो वही पारिवारिक वातावरण फिर से सजीव हो उठता है. यही मुंहफट मित्रो एक संजीदा गृहस्थिन की तरह अपनी सास से कहती है कि उसकी देवरानी बहाने कर रही है, उसे कुछ भी नहीं हुआ, बस घर के बाकी लोगों से उसका तालमेल नहीं बैठ रहा, इसलिए ऐसे हालात पैदा कर रही है. इतना ही नहीं, फूलावंती ने जब सीधे-सरल स्‍वभाव वाली जिठानी सुहाग पर यह आरोप लगाया कि वह उसके गहने दबाए बैठी है तो इस झूठे आरोप के कारण सुहाग के मन को भारी ठेस लगती है. मित्रो सुहागवंती का पक्ष लेते हुए फूलावंती को समझाने का पूरा प्रयत्‍न करती है कि उसकी ऐसी धारणा न परिवार के हित में है और न खुद उसके. जबकि देवर गुलजारी इस विवाद में अपनी बीबी फूलां को कुछ भी समझाने में असमर्थ रहता है. विवाद के दौरान जब परिवार के और लोग बीच में आ गए तो वह सुलझने की बजाय और उलझ गया. परिवार के प्रति ऐसी दूरन्‍देशी और व्‍यापक सोच रखने वाली मित्रो पर अगर कोई ‘घोर व्‍यक्तिवादी और ‘समाज विरोधी’ होने का आक्षेप लगाए तो ऐसी मनोगत धारणा रखने वालों की मानसिकता पर तरस ही खाया जा सकता है.   

उधर मित्रो और पति सरदारी के बीच की तकरार को सुलझाने के लिए घर के मुखिया गुरूदास अपने दोनों बेटों और बहुओं को बुलाते हैं. तकरार की मूल वजह यही थी कि जब मित्रो की पारिवारिक पृष्‍ठभूमि और उसके चाल-चलन को लेकर कुछ अवांछित बातें सरदारी के कानों तक पहुंची तो उसने परिवार में इसकी चर्चा कर दी. बड़े भाई और पिता सचाई जानने के लिए मित्रो से ही इसका खुलासा करना उचित समझते थे, इसी मकसद से जेठ बनवारी ने अपने मां-बाप और छोटे भाई की मौजूदगी में उसी से पूछ लिया – “बहू, मालिक को हाजर-नाजर जान के कह दो कि जो तुम्‍हारे घरवाले ने देखा सुना है वह झूठ है." लेकिन मि‍त्रो ने इसका तुरंत कोई सीधा उत्‍तर नहीं दिया तो थोड़ी तीखी जुबान में वही सवाल फिर दोहरा दिया गया.

आखिर मित्रो ने इस का जवाब कुछ यों दिया – “सज्‍जनो यह सच भी है और झूठ भी. जब और पूछा तो खुलासा करते हुए कहा – “सच तो यूं जेठ जी कि दीन-दुनिया बिसरा मैं मनुक्‍ख की जात से हंस-बोल लेती हूं. (इसमें काहे की लाज-शरम और किस बात की नाराजगी?)  झूठ यूं कि खसम का दिया राजपाट छोड़ मैं कोठे पर तो नहीं जा बैठी?” मित्रो के इस बेबाक उत्‍तर पर गुरूदास की प्रतिक्रिया काबिले गौर थी, जिन्‍होंने बहू की जगह लड़कों को डांटकर कहा – “बोधे जवानो, बेमतलब तिल का ताड़ बना रखा है." जबकि इस पर सरदारी की प्रतिक्रिया कुछ इस तरह की रही. वह चीखकर बोला – “तू छिनालों की भी छिनाल ! आज न माने बापू, पर एक दिन इसके यार और याराने……

इस बात पर मित्रो ने ससुर की ओर उलाहने से ताका और मनुहार से कहा – “सुन लिया न बापू? कोई मां-जाई ऐसी गालियां सुन चुप रहेगी?”

जवाब में गुरुदास ने ही अपने बेटे को फटकारते हुए कहा – “लानत है, सरदारीलाल ! तेरी मत को सधाने का ढंग-अकल नहीं और ऊपर से यह गुनहगारी !

ससुर से ऐसी तरफदारी पाकर मित्रो ने उनके पांव छू लिये और कहा – “पांव पड़ती हूं बापू जी ! आज जो ओट आपसे पाई है, वह मित्रो के लिए सुरगों से बढ़कर है ! कहना न होगा कि इस नये पारिवारिक माहौल में मित्रो के लिए बड़ों की ओट और उनका स्‍नेह कितनी अहमियत रखता है, इसे वही समझ सकता है जो मित्रो जैसी परिवार-सुख से वंचित युवती के प्रति सच्‍ची सहानुभूति रखता हो. 

गुरूदास के बेटे मंडी में व्‍यापार का काम देखते थे. वे बाजार के कर्जे के कारण परेशान थे. उधर छोटा गुलजारी दुकान की जो भी उधारी उगाह कर लाता, वह दुकान के खाते में जमा करने की बजाय खुद ही हजम कर जाता. बनवारी और सरदारी इस बात से परेशान थे. घर में फूलावंती ने अलग तनाव का वातावरण बना रखा था, मित्रो ने बीच-बचाव कर उसे हर तरह से  समझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी. मित्रो ने जब बाजार के कर्जे के कारण पति के चिंतित होने की बात जानी तो उसने मदद के लिए पेशकश की, अपनी बचत में से पति को कुछ देना चाहा, इस सरदारी ने सवाल किया कि वह कहां से मदद कर देगी? यही सोच कर वह बोला, क्‍यों सिर खपाने बैठी हो, मर्दों के फिकर मर्दों के लिए. तेरे बस का नहीं है." 

मित्रो को बुरा तो लगा, लेकिन अपने पर काबू रख इतना ही बोली – “महाराज जी, न थाली बांटते हो, न नींद बांटते हो, दिल के दुखड़े ही बांट लो."

और जब यह जाना कि उन्‍हें तीन हजार की तुरंत जरूरत है तो अपनी पेटी से निकाल कर पति के सामने कर दिये. सरदारी हक्‍का-बक्‍का देखता रह गया. फिर जब मित्रो से पूछा कि ये धन कहां से आया, तो मित्रो ने सहजता से उत्‍तर दिया – “अम्‍मा के भोले भुलक्‍कड़, आपकी धन्‍नो सास की मैं इकलौती बिटिया हूं." जब सरदारी कुछ और कहने को हुआ तो उसने अपने शरबती होठों से मुंह पर सांकल लगा दी. यह प्रसंग और संवाद अपने आप में मित्रो के चरित्र में आए सकारात्‍मक बदलाव और परिवार के प्रति उसकी जिम्‍मेदारी की भावना को बेहतर ढंग से व्‍यक्‍त करता है. आश्‍चर्य है त्रिपाठी जी के लिए मित्रो के इस पारिवारिक अनुराग और मानवीय गुण की कोई कीमत नहीं !   
कथा में गुरूदास की शादीशुदा बेटी जनको के पहली जचकी के बाद पीहर आने का रोचक प्रसंग है, जो प्रकारान्‍तर से मित्रो के उस चारित्रिक पक्ष को ही उभारता है, जहां एक अलग तरह के माहौल से बहू के रूप में आई मित्रो कितनी सहजता से अपनी ननद के प्रति गहरा लगाव व्‍यक्‍त करती है, जिसे पारिवारिक रिश्‍तों को जीने-बरतने का कोई अनुभव नहीं है. इसी तरह गुरूदास के छोटे बेटे गुलजारी और उसकी तुनक-मिजाज स्‍वार्थी पत्‍नी फूलावंती की अलगाववादी प्रवृत्ति को ही उजागर करती है, जबकि मित्रो फूलावंती को भी समझा-बुझाकर परिवार के साथ बनी रहने की ही सलाह देती है.

मित्रो के समझाने-बुझाने के बावजूद फूलावंती आखिर ससुराल में तनाव के हालात पैदा कर पति के साथ अपने पीहर पहुंच ही गई, जहां उसकी मां ने अपनी बहुओं के सामने पहले ही बेटी के पक्ष में माहौल बना रखा था. लेकिन भाभियां उसकी हकीकत पहले से जानती थीं, पर खुलकर किसी ने कुछ भी नहीं कहा. खुद गुलजारी को भी ससुराल में कुछ दिन गुजारने के बाद अपनी भूल का अहसास हो जाता है, लेकिन उसे तुरंत सुधार लेने का कोई संभव रास्‍ता उसे नहीं नजर आता. यही वह निम्‍नमध्‍यवर्गीय पारिवारिक माहौल है, जिसमें स्त्रियां अपने छोटे-छोटे स्‍वार्थों के लिए आपसी मन-मुटाव, जोड़-तोड़ और खींच-तान में पूरी उम्र गुजार देती हैं.

सास धनवंती को एक सुबह जब रसोई में मित्रो को चूल्‍हा सुलगाते देखती है तो सुखद आश्‍चर्य होता है, क्‍योंकि मित्रो इस तरह के पारिवारिक काम की आदत नहीं थी, लेकिन उसी के मुंह से जब यह जानकारी मिलती है कि उसकी जिठानी सुहागवंती गर्भवती है, ऐसे में चूल्‍हे–चौके के काम में उसका हाथ बंटाना अब जरूरी हो गया है. सास धनवंती मित्रो के मुंह से यह खबर सुनकर फूली नहीं समाती, जा इन शब्‍दों में व्‍यक्‍त होता है - “तेरा ही मुंह मुबारक हो समित्रावंती, तेरे मुंह में घी-शक्‍कर.” और फिर दोनों बहुओं को आशीष देने लगती है.

सुहाग के गर्भवती होने की जितनी खुशी थी धनवंती को, मित्रो और सरदारी की अनबन से उतनी ही चिंतित. वह अपने बड़े बेटे बनवारी को मित्रो की खुशी के लिए उसे उपहार स्‍वरूप झुमके बनवाने का सुझाव देती है, ताकि परिवार में सौहार्द्र का माहौल बना रहे. जब मित्रो को अपने लिए झुमके बनवाने की बात पता लगी तो वह अचरज से भर गई. उसने यही कहा कि यह सब करने की क्‍या जरूरत है, यह तो जेठानी सुहाग के लिए करना चाहिये, जिसकी कोख खुलनेवाली है.

धनवंती ने अपनी मंझली बहू का मन रखने के लिए यह भी सुझाव देती है कि वह दो-महीने अपनी मां के पास रहकर व्रत-उपवास करे, जिससे विधाता खुश होंगे और उसके मन की मुराद पूरी करेंगे. मित्रो को सास का यह सुझाव पसंद आया. वह खुशी से सास के आगे माथा टेक इठलाकर कहती है – ‘बड़ी सरकार, तुम्‍हारा कहा सिर माथे. जो कहोगी, वैसा ही करूंगी. अपने कान्‍त से आनंद पाने महीना-दो क्‍या, मैं पूरे चौबीस पख व्रती रह लूंगी.' 

मित्रो की पीहर रवानगी के बाद सास धनवंती और सुहागवंती के बीच जो दिलचस्‍प संवाद हुआ, उसमें मित्रो के प्रति उनका गहरा लगाव ही प्रकट हुआ है. धनवंती को मित्रो अच्‍छी तो लगती है, लेकिन उसके बेबाक बरताव और इधर-उधर की चर्चाओं के कारण वह तय नहीं कर पाती कि दुनिया जिस तरह उसके बारे में अलाय-बलाय बात करती है, क्‍या उसमें कुछ सचाई भी है? यही बात जब वह अपनी बड़ी बहू से पूछती है तो सुहाग का ईमानदार जवाब होता है – “हम बिचके जन अपनी छोटी बुद्धि से दूसरों के छल-छिद्र, दोष-विचार क्‍या पड़तालें अम्‍मा? खुली-डुली देवरानी एक घड़ी स्‍याह, दूसरी घड़ी सफेद. उसके मन में क्‍या है, वही जाने, पर तन उसके तो ऐसी प्‍यास व्‍यापती है कि सौ घट भी थोड़े."  

सुहाग सास के पूछने पर कहने को तो यह बात कह बैठी, लेकिन उसके मन को तसल्‍ली  नहीं हुई. इसलिए रवाना होती सास को रोककर उसने अपनी बात और साफ करके कहा – “कहने को तो कह बैठी हूं पर एक बात मेरे चित्‍त में आती है अम्‍मा, कि मंझली को तौलने-परखने वाली मैं कौन?” सुहाग की इस निर्मल बात पर धनवंती भी रीझ गई, उस पर ऐसा प्‍यार उमड़ा कि आंखें छलछला आई. उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली – “तेरे मन में कोई द्वैत मैल नहीं सुहागवंती, मालिक तुझे बड़े भाग लगाए !” 

घर में मित्रो के व्‍यवहार और घर के प्रति उसके दायित्‍वबोध को लेकर धनवंती और सुहाग ही नहीं, ससुर गुरूदास के मन में भी मित्रो के प्रति गहरा लगाव है. धनवंती से बात करते हुए आखिर उन्‍हें कहना पड़ा – “सच पूछो तो इस घर की रौनक है मंझली बहू! भले बोली-ठोली में तेज-तर्रार, पर उठते-बैठते चहकती-कहकती तो है ! 

मित्रो अपने पति सरदारीलाल के साथ जब अपने पीहर नूर महल पहुंची तो चारों तरफ हलचल-सी मच गई. मित्रो की मां ने बेटी और दामाद का जी खोलकर स्‍वागत किया. दामाद ने भी सास के पांव छुए तो बालो ने आशीष बरसाए. मित्रो और उसकी मां के संवाद इतने बेतकल्‍लुफ और बेबाक कि जैसे दोनों मां-बेटी नहीं कोई सहेलियां हों. तभी तो मित्रो ने मां की ओर हंसकर कहा था – ‘अपने कबूतर से दिल को किस कैद में रखोगी बीबो, यह तो नित नया चुग्‍गा मांगेगा.' और इस पर मां का यह जवाब – ‘तेरी यही शीरीं बातें सुनने को मैं तरस गई मित्रो !' रात को जब वही सास सज-धज कर जमाई को भोजन परोसने बैठी तो ‘सरदारी को मित्रो की मां अपनी सास-सी नहीं कोई धंधेवाली व्‍यापारिन-सी लगी.

मां-बेटी के बेतकल्‍लुफ संवादों को सुनकर सरदारीलाल शर्म से पानी-पानी हुआ जा रहा था – एक दूसरे को उखाड़ती-पछाड़ती ये कैसी मां-बेटियां ! बाहर जाते सरदारी का बांका लाचा देख बालो के मन में जो मरोर उठी तो मित्रो ने आंखों से ही समेट ली और गेंदे के फूल-सी घुटी-घुटी आवाज में बोली – “बीबो, मुझ गरीबनी से क्‍या होड़? तुम्‍हें तो नित नए रास-रंग और मित्रो बेचारी हर दिन अपने इसी एक निठल्‍ले के संग !” 

खसम पर घमंड करनेवाली की बात से बालो के पपोटे जल उठे, पर ऊपर से लाड का फन फैलाकर बोली – “मेरी भोली मित्रो, मुझे तो अंग-अंग प्‍यासी तिरसाई जापती है! अरी, लहर हो तो बुलाऊं तेरी बगीची के लिए कोई माली?”

मित्रो के मुंह पानी भर आया. घरवाले के मान-गुमान सब उड़न-छू हो गए. सजरी आंखें चमकने लगी और ओढ़नी तले दो पंछी मचलने लगे. मां पर आंख गड़ा हौले से कहा – “अह-हय बीबो, तुम्‍हारे मुंह गुलाब. पर घोड़े-से लद्धड़ तुम्‍हारे इस जमाई का क्‍या करूं?” 

बालो ने हमजोलियों की नाईं लड़की को चिकोटी काटी – “ये झमेला तू छोड़ मुझ पर. अरी, तेरी मां खिलाड़िन ने बड़े बड़े बाघ छका डाले ! दरअसल यही वह पारिवारिक माहौल था, जिसमें पलकर मित्रो बड़ी हुई थी और उसकी मां की यही इच्‍छा थी कि उसकी बेटी किसी इज्‍जतदार घर में ब्‍याही तो जाए, लेकिन वहां से इज्‍जत और कुछ सुख-सुविधाएं बटोर कर वापस उसी माहौल में लौट आए.

और फिर इस खिलाड़िन मां ने अपने बुढ़ापे और अकेलेपन से उबरने के लिए बेटी मित्रो को फिर से अपने धंधे में खींच लाने के लिए आखिरी दांव खेला – उसने मित्रो को बना-संवारकर सरदारी लाल के पास इस हिदायत के साथ भेजा कि वह उसे रिझाकर इतनी शराब पिला दे, जिससे वह बेसुध हो जाए. फिर वह उसे अपने जाने-परखे डिप्‍टी बग्‍घा के पास रंगरेलियां मनाने भेज देगी और इस तरह मित्रो वापस उसी के धंधे में लौट आएगी.

मित्रो मां के इस जाल में फंसकर उस ग्राहक के पास जाने ही वाली थी कि अचानक मां बालो का मन पलट गया, उसे यह अच्‍छा नहीं लगा कि ‘जो डिप्‍टी सौ-सौ चाव कर उसकी शरणी आता था, आज वही इस लौंडिया से रंगरेलियां मनाएगा. थू री बालो, तेरी जिन्‍दगी पर !’ और उसने रोने का स्‍वांग कर मित्रो को वापस बुला लिया.

जब मित्रो ने मां से पूछा कि ‘बीबो, खैर तो है? धुर दहलीज से बुला लिया?’ लेकिन बार-बार पूछने पर भी जब बालो कुछ न बोली और रोती रही तो उसी ने फिर दिलजोई की – ‘बीबो, डिप्‍टी अगर तेरा इतना ही प्‍यारा है तो इस घुग्‍घुचिया को क्‍यों उससे मेल-ठेल करने भेजा?’ 

वह बड़ी मुश्किल से इतना ही कह पाई – तेरी मां के जमाने लद गये री मित्ती ! अब कौन उसका मित्र-प्‍यारा और कौन संगी-साथी !

भौंचक्‍की मित्रो ने रुककर कहा – ‘तेरे दिलगारों की गिनती तो सैकड़ों में थी, बीबो!’ इस पर बालो ने रोते हुए कहा – “न न री, अब इस ठठरी ठंडी भट्टी का कोई वाली-वारस नहीं!" वह आख्रिर अपनी मूल बात पर आते हुए लड़की को अपनी ओर खींचकर बोली – ‘बेटी ! अब अकेले छोड़कर मत जाना ! मैं सरदारीलाल को मना लूंगी.‘

अंधेरे में दमदमाते नीले पपोटोंवाले मां के काले चेहरे पर दो चील की-सी आंखें देखीं तो चीख मार मित्रो परे जा छिटकी. - “क्‍यों री, क्‍यों?” गहरा फुंकार भर मां को अपनी ओर बढ़ते देख पहले तो मित्रो की घिग्‍घी बंध गई. फिर जाने किस जोर-जाम से संभली और तड़पकर चीखी – “तू सिद्ध भैरों की चेली, अब अपनी खाली कड़ाही में मेरी और मेरे खसम की मछली तलेगी? सो न होगा बीबो, कहे देती हूं!’ फिर तीर-सी छलांग मार ओसारे से देहरी कुलाची और मां के ठेलते-ठेलते सरदारीलाल वाली बैठक की कुंडी चढ़ा ली.

दिन चढ़े सरदारी ने जब आंख खोली तो पास में लेटी मित्रो ने अपने सैंया के मुंह पर चुम्‍मे जड़ दिये. फिर पूछा – “गिरदौर जी, पिछली रात कहां कहां हुए दौरे, पड़ाव?” सरदारी ने घरवाली को घूरा और सिर पर छोटी-सी चपत दे कहा – “रात तो न कहीं ढुकाव हुआ न पड़ा पड़ाव. बस, बैठ हवा के घोड़े बांटे, कहां की कहां निकल गई !” 

मित्रो ने इतना ही कहा – “मेरे हरमन मौला! यही बीता तुम्‍हारी मित्रो के साथ ! फिर बाहों में अंगड़ाई ली, हाथों को चटखा-मुरका उठ बैठी. सैयां के हाथ दाबे, पांव दाबे, सिर-हथेली होठों से लगा झूठ-मूठ की थू कर बोली – “कहीं मेरे साहिब जी को नजर न लग जाए इस मित्रो मरजानी की !और इसी निर्णायक मोड़ पर पहुंचकर कृष्‍णा सोबती ने अपनी इस कथा को विराम दिया, जहां से उनके जीवंत चरित्र मित्रो की मुख्‍य धारा के सामाजिक जीवन में लौटने की साध पूरी होती है और यहीं से एक स्‍त्री की सहज जीवन-यात्रा आरंभ होती है.

कितनी विचित्र बात है कि कृष्‍णा सोबती ने जिस गहरी मानवीय दृष्टि से यौन-व्‍यवसाय से जुड़ी एक स्‍त्री की कोख से पैदा हुई और उसी माहौल में पली-बढ़ी उन्‍मुक्‍त स्‍वभाववाली युवती की वैयक्तिक उूर्जा और उसके मानवीय गुणों को उभारते हुए उसे एक मध्‍यवर्गीय परिवार की जिम्‍मेदार बहू के रूप में चित्रित किया है, और जो विषम परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए हर कदम पर अपने सास-ससुर, जेठ-जिठानी और परिवार के सदस्‍यों से गहरा लगाव अनुभव करती है, कमलाकान्‍त त्रिपाठी को उसमें कोई ‘मानवीय संवेदन’ ही नहीं दिखाई देता. कहीं ऐसा तो नहीं कि मानवीय संवेदन देखने की यह दृष्टि ही किन्‍हीं और कारणों से बाधित हो गई हो. 


कृष्‍णा जी की व्‍यापक मानवीय दृष्टि की खूबी यह है कि वे सामाजिक दृष्टि से बुरा या वर्जित समझे जाने वाले किसी कर्म में परिस्थितवश घिरे इन्‍सान से घृणा नहीं करतीं, बल्कि उसे उस परिस्थित से उबारने में सभी से सहयोग की अपेक्षा करती हैं, जो स्‍वयं उबरने के लिए संघर्ष करता है, उसका हौसला बढ़ाती हैं और अपनी सर्जना में ऐसे संघर्षशील चरित्रों को बल प्रदान करती हैं, जिन पर कलम चलाने से सनातनी लेखक संकोच करते हैं. मित्रो ऐसा ही जीवंत चरित्र है, जिसकी मां देह-व्‍यापार में मुब्तिला थी. जो मां अपनी बेटी को एक सोची-बूझी चाल के तहत ऐसे मध्‍य-वर्गीय परिवार में ब्‍याह कर उसे वापस अपने धंधे में खींच लाने की कामना रखती है, यह मरजानी मित्रो की अपनी हूंस, विवेक और सूझ-बूझ का ही परिणाम रहा कि वह उस दुष्‍चक्र से उबरकर एक जीवंत चरित्र के रूप में विकसित हो सकी. निश्‍चय ही इस अर्थ में मित्रो की मर्म-कथा को कृष्‍णा सोबती ने जिस मनोयोग से रचा है, वह अपने आप में अनूठी उपलब्धि है.  
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नंद भारद्वाज
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मानसरोवर, जयपुर – 302020
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सबद - भेद : साहित्य और पदमावत : रवि रंजन

Posted by arun dev on फ़रवरी 15, 2018







महाकवि मलिक मुहम्मद जायसी का महाकाव्य ‘पदमावत’ इधर चर्चा में रहा है. इस (कु)चर्चा में ‘पदमावती’ रही है, जायसी की कृति के मन्तव्य, प्रासंगिकता और सौष्ठव की चर्चा नदारत थी.

किसी भी महान रचना को यह आधा-सामन्ती और आधा-पूंजीवादी समाज किस तरह विकृत कर सकता है यह भी प्रत्यक्ष है.

‘पदमावत’ कवि के साहस, राजनीतिक सत्ता और धार्मिक कट्टरता के गठजोड़ की हृदयहीनता तथा प्रेम के पथ पर सबकुछ तज कर चलने वालों की मार्मिक कथा है.

सत्ता की धार्मिकता से उपजी  कट्टरता से भारत ही नहीं उसके आस-पास की दुनिया भी हलकान है और प्रेमियों की हत्याओं का सिलसिला आज भी जारी है.

आज पदमावत को पढने, समझने और समझाने की जरूरत है. प्रो. रवि रंजन ने मध्यकाल के भक्ति साहित्य को ध्यान में रखते हुए सच्चे बुद्धिजीवि की ज़िम्मेदारी का परिचय देते हुए ‘पदमावत’ की विगत सार्थकता और समकालीन अर्थ पर प्रकाश डाला है.  
  

साहित्य  और पदमावत                                  
रवि रंजन



क्कीसवीं शताब्दी के लगभग डेढ़-दो दशक बाद इस अकाल वेला में भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में धर्मोन्माद और आतंक का जो माहौल दिखाई दे रहा है, उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है. कहने की ज़रूरत नहीं कि इस मानव-विरोधी लहर की बुनियाद विश्व बाजारवाद एवं भूमंडलीकरण की प्रक्रिया है. कई विचारकों ने हमारे समय की धार्मिक मूलगामिता को औद्योगिक पूंजी के बजाय वित्तीय पूंजी के विश्वव्यापी सर्वग्रासी प्रसार से उत्पन्न बाजारवादी मूलगामिता (मार्केट फंडामेंटलिज्म) का पुनरुत्पाद बताया है.

डॉ. राममनोहर लोहिया ने लिखा है कि राजनीति अल्पकालिक धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति.आज की राजनीति भविष्य का धर्म है और आज का धर्म अतीत की राजनीति. सच तो यह है कि संसार का कोई भी धर्म तात्विक दृष्टि से किसी दैवी सिद्धांत के बजाय एक ऐसी आध्यात्मिक चेतना है, जो लगातार परिवर्तित होते रहने वाले अनुभव से निष्पन्न होती है. इसलिए यह कहना अयुक्तियुक्त न होगा कि धार्मिक प्रश्न मूलतः सामाजिक प्रश्न के अलावा कुछ नहीं होते और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव से कालान्तर में धर्म का स्वरुप भी स्वभावतः बदलता है. जिस प्रकार इतिहास के प्रत्येक कालखंड में उदीयमान एवं पतनशील सामाजिक शक्तियों के बीच प्रायः रस्साकशी की स्थिति हुआ करती है, जिसके फलाफल पर ही सामाजिक विकास की प्रक्रिया का भविष्य टिका होता है, उसी प्रकार संसार के विभिन्न धर्मों के भीतर भी उदारवाद एवं कट्टरवाद के बीच तनाव देखा जा सकता है. गौरतलब है कि इस पंथगत रस्साकशी के कुरुक्षेत्र में दोनों ही पंथों के अगुआ अपने-अपने पक्ष को धर्मयुद्ध घोषित करने से कदापि नहीं चूकते और ऐसे तथाकथित धर्मयुद्ध में कट्टरपंथी पतनशील ताकतों के मुकाबले उदीयमान शक्तियों की विजय के लिए यह बहुत जरूरी होता है कि उसे समर्थन देने वाली सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक ताकतें उस युग-विशेष में विकास के एक निश्चित सोपान पर पहुँच चुकी हों.

भक्ति आंदोलन के आविर्भाव को एक ऐतिहासिक-सामाजिक शक्ति के रूप में रेखांकित करते हुए मुक्तिबोध ने ठीक ही इसे मूलतः तद्युगीन आम जनता के दु:खों और कष्टों से निष्पन्न माना है. उन्होंने लिखा है कि 

भक्ति-काल की मूल भावना साधारण जनता के कष्ट और पीड़ा से उत्पन्न है.असल बात यह है कि मुसलमान संत-मत भी उसी तरह कट्टरपंथियों के विरुद्ध था, जितना कि भक्ति- मार्ग.दोनों एक-दूसरे से प्रभावित भी थे, किंतु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भक्ति-भावना की तीव्र आर्द्रता और सारे दु:खों और कष्टों के परिहार के लिए ईश्वर की पुकार के पीछे जनता की भयानक दु:स्थिति छिपी हुई थी.

मुक्तिबोध ने भक्ति आंदोलन की निर्गुण एवं सगुण धारा के बीच अधिरचना के स्तर पर दिखाई देने वाले अंतर्विरोधों की पृष्ठभूमि में मौजूद तद्युगीन आधारगत अंतर्विरोधों की गहरी छानबीन के बाद जो निष्कर्ष प्रस्तुत किया है, उसे नजरअंदाज कर पाना असंभव है : जो भक्ति आंदोलन जनसाधारण से शुरू हुआ और जिसमें सामाजिक कट्टरपन के विरुद्ध जनसाधारण की सांस्कृतिक आशा-आकांक्षाएँ बोलती थीं,....उसी भक्ति आंदोलन को उच्चवर्गियों ने आगे चलकर अपनी तरह बना लिया.उनके अनुसार इसका मूल कारण यह है कि भारत में पुरानी समाज-रचना को समाप्त करने वाली पूंजीवादी क्रांतिकारी शक्तियाँ उन दिनों विकसित नहीं हुई थीं. निर्गुण-शाखा एवं कृष्णभक्ति-शाखा के बरअक्स रामभक्ति-शाखा को रखकर उन्होंने सवाल खड़ा किया है कि क्या यह एक महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है कि कृष्णभक्ति-शाखा के अंतर्गत रसखान और रहीम - जैसे ह्रदयवान मुसलमान कवि बराबर रहे आये, किंतु रामभक्ति-शाखा के अंतर्गत एक भी मुसलमान और शूद्र कवि प्रभावशाली और महत्वपूर्ण रुप से अपनी काव्यात्मक प्रतिभा विशद नहीं कर सका? जबकि यह एक स्वतःसिद्ध बात है कि निर्गुण शाखा के अंतर्गत ऐसे लोगों को अच्छा स्थान प्राप्त था.

कहना न होगा कि भक्तिकाव्य के किसी अध्येता के लिए उपरोक्त सवाल से मुँह चुराना संभव नहीं है, पर इस संदर्भ में मुक्तिबोध की तर्क-पद्धति से शत-प्रतिशत सहमति से एक महत्वपूर्ण सवाल का जवाब पाने की बजाय समस्या के सरलीकरण के खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता. वस्तुतः मुक्तिबोध द्वारा खड़ा किया गया प्रश्न एक अत्यंत महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय प्रश्न है, जिसका संतोषजनक उत्तर प्राप्त करने हेतु साहित्य की दुनिया से थोड़ा बाहर जाकर मध्ययुगीन भारतीय समाज की संरचना का समाजशास्त्रीय विवेचन-विश्लेषण अपरिहार्य है. दीगर बात यह है कि निर्गुण और सगुण के बीच जैसी द्विभाजकता हिंदी के भक्तिकाव्य में हैवह अन्य भारतीय भाषाओं में रचित भक्तिकाव्य के प्रसंग में बहुत हद तक लागू नहीं होती.

यह ठीक है कि समाजशास्त्रीय दृष्टि से मध्ययुगीन भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक शक्तियों के विश्लेषण के बगैर भक्तिकाव्य पर कोई सार्थक बातचीत आज असंभव है, किंतु, इस महान काव्य की केवल ऐतिहासिक अथवा स्थूल समाजशास्त्रीय व्याख्या के अपने ख़तरे हैं. जिस प्रकार मनुष्य की समाजशास्त्रीय व्याख्या एवं मनोवैज्ञानिक व्याख्या नाभिनालबद्ध होनी चाहिए, उसी प्रकार भक्तिकाव्य का विवेचन-विश्लेषण भी दोनों पद्धतियों की परस्पर संबद्धता के अभाव में यदि एक ओर यांत्रिक समाजशास्त्रीयता का शिकार हो सकता है, तो दूसरी ओर आत्ममुग्धता की हद तक अध्यात्मवाद के रंग में रँग जाने को अभिशप्त. इन अतिवादी, अतिरेकी एवं एकांगी पद्धतियों की अपेक्षा भक्तिकाव्य के संतुलित मूल्यांकन के लिए एक ऐसी समावेशी पद्धति काम्य है, जिसे मोटे तौर पर समाजशास्त्रीय सौन्दर्यशास्त्रया सौन्दर्यशास्त्रीय समाजशास्त्रकहा जा सकता है.

याद रहे कि जेने उल्फ नामक विदुषी की पुस्तक सौंदर्यशास्त्र और कला का समाजशास्त्र(1983) में इसी अभिगम को अपनाने पर बल दिया गया है. इसके बगैर यह समझ पाना असंभव है कि भक्तिकाव्य ने सौन्दर्यशास्त्र को किस प्रकार नया आयाम दिया. इसमें कलात्मकता और ऐतिहासिकता का जैसा रोचक और रसात्मक संवाद है, साहित्य, संगीत और कला की जो त्रिवेणी है, वर्ग-संघर्ष और वर्ग-सहयोग के जो द्वन्द्वात्मक दृश्य दिखाई पड़ते हैं तथा सर्वप्रमुख लोकप्रिय जातीय संस्कृति की जो छवियाँ दृष्टिगोचर होती हैं, उनकी मानवीय अर्थवत्ता एवं सार्थकता क्या है. भक्तिकाव्य के समाजशास्त्रीय विश्लेषण के क्रम में यह बात ध्यान देने योग्य  है कि भक्त कवि वर्णव्यवस्था के विरुद्ध केवल वहीं खड़े नहीं होते, जहाँ वे उसकी खुलकर निंदा करते हैं. गहराई से विचार करने पर भक्तिकाव्य में जगह-जगह व्यक्त भगवान के स्पर्श की कामना के भी सामाजिक निहितार्थ ढूंढे जा सकते हैं :

पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं l
मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं ll
वरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं l
तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं ll

कृष्णभक्ति-काव्य में रासलीलाके प्रसंग में ऐसे अनेकानेक चित्र मिलते हैं, जिनमें नृत्य के दौरान गोपियाँ कृष्ण के और कृष्ण गोपियों के आलिंगन में बद्ध दिखाये गये हैं :

अरुझी कुंडल लट, बेसरि सौं पीत पट, बनमाल
बीच आनि उरझे हैं दोउ जन l
प्रननि सौं प्रान, नैन नननि अंटकि रहे, चटकीली
छबि देखि लपटात स्याम घन
होड़ा-होड़ी नृत्य करें, रीझि-रीझि अंक भरैं,
ता-तार थेई-थेईउछटत हैं हरखि मन l
सूरदास प्रभु प्यारी, मण्डली जुवति भारी, नारि कौ
आँचल लै-लै पोंछत हैं श्रमकन l

सूरदास की कविता में आये उल्लास के इस अपूर्व चित्र पर रीझकर डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है :  कृष्ण के कुंडलों में राधिका की लट, राधा की बेसर में कृष्ण का पीत पट उलझे (उलझा) हैं (हैं). नृत्य  घनीभूत है न! बनमाल में दोनों ही उलझ गये हैं.होड़ करके नाचते हैं. सामंती निषेधों की बेड़ियां पैरों में नहीं हैं, इसलिए प्राक् सामंती समाज की स्वछंदता के ताल पर नाच रहे हैं. प्राणों से प्राण, नैनों से नैनों का मिलना...रीझ-रीझ कर अंक भरना; ता ता थई-थई उछटत पर जब मृदंग पर थाप पड़े, तब नाद की नसेनी पर मन सुन्न महल पर पहुँच जाए.मंडली-जुवती है; अनेक नाचने वाले हैं.सामूहिक उल्लास है.फिर समग्र क्रिया की पूर्ति के फलस्वरूप आँचल के श्रमकन पोंछना रस निष्पत्ति की पराकाष्ठा है.

जिस समाज में आबादी का एक बड़ा हिस्सा छुआछूत जैसी अमानवीय प्रथा का शिकार हो, उसमें संत-भक्त कवियों की रचनाओं में भगवान को स्पर्श करने की कामना की अभिव्यक्ति वाले चित्रों को केवल सौंदर्यशास्त्र की आँख से देखना काफ़ी नहीं है.

उल्लेखनीय है कि जिस वेदांत दर्शन को विवेकानंद ने मानव जाति द्वारा अब तक हासिल उच्चतम ज्ञान का संग्रहतथा शास्त्रों का शास्त्रघोषित किया है, वह बहुत हद तक भक्तिकाव्य की सर्वप्रमुख विचारधारा (नोर्मेटिव आइडियोलोजी) है. विवेकानंद के अनुसार एक आदमी दूसरे आदमी से ऊंचा पैदा हुआ है, इस विचार का वेदांत में कोई स्थान नहीं है. इसलिए भक्त कवियों द्वारा मनुष्य-मनुष्य के बीच बराबरी की भावना की कलात्मक अभिव्यक्ति स्वाभाविक है.

निर्मला जैन ने भक्तिकाव्य की सौन्दर्य-दृष्टि के निर्माण में दार्शनिक विचारधारा की केंद्रीय भूमिका को स्वीकार करते हुए लिखा है कि  


इस काव्य की मूलवर्ती दृष्टि ठेठ भौतिकवादी भले ही न हो, वस्तुवादी अवश्य है. वस्तु और आत्म, पदार्थ और चेतना के आपसी संबंध के बुनियादी सवाल को सुलझाने की यह केंद्रीय दृष्टि ही जीवन-मूल्यों और तदनुसार सौंदर्य-मूल्यों के विकास की दिशा और प्रकृति का निर्धारण करती है.जो दृष्टि वस्तुजगत को मिथ्या,गौण या नगण्य घोषित करती है, वह कहीं न कहीं समाज में व्याप्त अन्याय और शोषण की मददगार होती है. वह समाज के सुविधा-संपन्न वर्ग की मानसिकता और हितों का प्रतिनिधित्व करती है. इसके विपरीत वस्तुजगत में आस्था रखने के कारण भौतिकवादी दृष्टि का ध्यान मनुष्य और समाज पर केंद्रित रहता है. परिणामतः उसमें सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने की गुंजाइश बराबर बनी रहती है. भक्तिकाव्य का आराध्य तत्वतः अवतार होते हुए भी जीवन की भौतिक आवश्यकताओं से जुड़ा था. जगत को यथार्थ और नित्य मानने वाले ये कवि इंसान के पक्षधर थे.

भक्तिकाव्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन की समस्याओं पर विचार करते हुए यह बात भी काबिलेगौर है कि भक्त कवियों ने उपनिषद-काल से चली आ रही ब्रह्म की अवधारणा (कंसेप्शन) को संवेदना के स्तर पर तत्वान्तरित करके उसे (परसेप्शन) में तब्दील किया.इस क्रम में उन्होंने ब्रह्मकी अमूर्त अवधारणा को पहले एंद्रियगोचर रूप प्रदान किया और तब उसे राग का विषय बनाया. गौरतलब है कि भक्त कवियों के ऐन्द्रियबोध की अनेकस्तरीयता के चलते उनकी अभिव्यक्ति-पद्धति में भी स्पष्ट अंतर दिखाई देता है. दूसरे शब्दों में प्रत्येक महत्वपूर्ण भक्त कवि की एक निजी व विशिष्ट अभिव्यक्ति की संरचना हैजिसके मूल में उसकी एक विशिष्ट एवं वैयक्तिक अनुभूति की संरचना निहित है. स्पष्ट ही मनुष्य की निजी एवं वैयक्तिक ऐन्द्रियबोधीय विशिष्टता के चलते बाह्यबोध को लेकर उसकी प्रतिक्रिया को जो एक भिन्न व विशिष्ट आयाम प्राप्त होता है, वह मोटे तौर पर दो प्रकार का हो सकता हैआवेगात्मक और संवेदनात्मक.इनमें आवेगात्मकता का जहाँ तात्कालिक महत्त्व होता है, वहीं संवेदनशीलता का दीर्घकालिक और इसका संबंध संयमसुरुचि एवं संस्कृति से होता है. सच तो यह है कि जो कवि जितना ज्यादा संवेदनशील होगा, वह उतना ही बड़ा सौंदर्य-पारखी भी.भक्तकवियों की संवेदनशीलता की व्यापकता और गहराई की द्वंद्वात्मकता को रेखांकित करते हुए निर्मला जैन ने सही लिखा है कि जो संवेदनशीलता समाज में व्याप्त अन्याय से चोट खाकर व्यंग और फटकार की तीव्रता में, अन्याय का विरोध करने में प्रकट होती है, वही प्रेम की पीरसे उत्पन्न व्याकुलता में.

पदमावतके रचयिता मलिक मुहम्मद जायसी का वैशिष्ट्य कवि की आवेगशीलता के बजाए संवेदनशीलता में निहित है, जिसके परिणामस्वरुप उसकी अभिव्यक्ति पाठक के भीतर अपेक्षाकृत स्थिर, व्यापक एवं गहरी संवेदनात्मक अनुगूंज उत्पन्न कर सकने में सक्षम है.यह अनुगूंज पदमावतमें जगह-जगह पर जायसी द्वारा प्रयुक्त अनूठी शब्दावली व मुहावरों में सुनी जा सकती है, जिसके माध्यम से वहाँ पूरी कायनात को शब्दमें उतार दिया गया है. प्रसंगवश पदमावतमें सिंहलगढ़-वर्णन के प्रसंग में आया एक दोहा द्रष्टव्य है, जो अभिव्यक्ति की सादगी के बावजूद एक अर्थवान बिम्ब-सृष्टि का अन्यतम उदाहरण है :

मुहमद जीवन जल भरन रहेंट घरी की रीति l
घरी सो आई ज्यों भरी ढरी जनम गा बीति ll

गौरतलब है कि यहाँ रहँटके चलने की वजह से पानी भरने और खाली होने का जो बिम्ब बनता है, वह प्रकारांतर से जिंदगी और मौत की निरंतर चलने वाली चाक्रिक प्रक्रिया को भी व्यंजित करता है. इस अतिरिक्त व्यंजना की कुंजी छोटे-से क्रिया-प्रयोग गामें निहित है, जो ठेठ अवधी का क्रिया-पद है और ऊपर कथित चाक्रिक प्रक्रिया में हर्ष या विषाद जैसे भाव के बजाय चलने की प्रक्रिया पर बल देता है. इसी प्रकार सिंहलद्वीप के पक्षियों का वर्णन करने के दरम्यान जायसी ने लिखा है :

जाँवत पंखि कहे सब बैठे भरि अँबराउँ l
आपनि आपनि भाषा लेहिं दइअ कर नाउँ॥

ऊपर उद्धृत पंक्तियों में निहित रचनात्मक तनाव पर प्रकाश डालते हुए रामस्वरुप चतुर्वेदी लिखते हैं कि इस दोहे के अभाव में वृक्षों पर बैठे दर्जनों पक्षियों की एक सूची बन जाती, पर उस अमराई का कोई काव्यात्मक बिंब न बन पाता. अपनी-अपनी शाखा पर बैठकर अपनी-अपनी भाषा में प्रभु का नाम-स्मरण करते हुए पक्षियों का यह रूप-वर्णन एक सीमा तक प्रस्तुतपरक होते हुए भी बिम्ब की छवि प्राप्तकर लेता है. इस बिम्ब-प्रक्रिया में अवधि के एक बहुप्रचलित शब्द – 

दइअके प्रयोग से उत्पन्न वैशिष्ट्य की ओर इंगित करते हुए डॉ. चतुर्वेदी कहते हैं कि यदि दइअका स्मरण करते मनुष्य चित्रित होते तो इस शब्द में अर्थ के इतने विस्तार की संभावना न होती. परंतु छोटे, विनम्र पर आकर्षक पक्षियों के संदर्भ में दइअ कर नाउँप्रभु की भाँति ही विराट हो जाता है. पंखिकी निरीहता और दइअकी विराटता के रचनात्मक तनाव से यहाँ अर्थ का संश्लिष्ट विकास संभव होता है. दीगर बात यह है कि ईश्वरऔर अल्लाहसे अलग अवधी का बहुप्रचलित दइअप्रयोग इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि वह हिंदू, मुसलमान या किसी भी धार्मिक परंपरा से अलग प्रभु की उपस्थिति का सीधा साक्षात्कार करा पाता है. ईश्वरया अल्लाहजैसे शब्दों के साथ अनेक धार्मिक-सांप्रदायिक संस्कार जुड़े हुए हैं. 

दइअग्रामीण जन-जीवन में धर्म से उतना नहीं, जितना विनम्र आस्था से जुड़ा हुए है. इस तरह जायसी का यह शब्द-प्रयोग एक पंक्ति या एक दोहे को नहीं, वरन् एक पूरे अंश को वर्णन के धरातल से उठाकर काव्य-अनुभव बना देता है.

पदमावतऐसे ही अनेकानेक अनोखे काव्य-अनुभवों का जीवंत समुच्चय होने के कारण अन्य भक्त कवियों की कृतियों से न केवल भिन्न है, बल्कि विशिष्ट भी. ऐसे भी किसी रचना की श्रेष्ठता का निर्धारण केवल इस आधार पर करना औचित्यपूर्ण नहीं माना जा सकता कि वह पूर्ववर्ती या परवर्ती रचनाओं की तरह है या नहीं, जो श्रेष्ठ मानी जाती है. बर्तोल्त ब्रेष्ट के शब्दों में कहें तो हर दिशा में किसी कलाकृति में व्यक्त की गयी ज़िंदगी का व्यक्त की जा रही ज़िंदगी से मिलान करना चाहिए, बजाय इसके कि उसकी दूसरी वर्णित ज़िंदगी से तुलना की जाए. इस तरह देखें तो जायसी मध्ययुगीन सामंती समाज में व्याप्त केवल संकीर्णता ही नहीं, बल्कि उसके विरुद्ध उत्पन्न अत्यधिक उदारता के खतरे को लेकर भी सचेत दिखाई पड़ते हैं. इसीलिए पदमावतमें इतिहास-चेतना के साथ-साथ अंतस और बाह्य की द्वंद्वात्मकता के अलावा जन-जीवन की मार्मिकता के ऐसे अनेकानेक अछूते पहलू उजागर हुए हैं, जिनके अभाव में बड़े से बड़े कलाकार की रचना अपने दायित्व व लक्ष्य से च्युत हो जाती है.

आहत भावनाओं, पूर्वाग्रहों एवं अस्मितावाद की राजनीति की साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में कैसी परिणतियाँ हो सकती हैं, इसका उदाहरण यदि एक ओर दलित विमर्श के नाम डॉ. धर्मवीर की कबीर संबंधी पुस्तकें हैं, तो दूसरी ओर डॉ. रामविलास शर्मा सरीखे प्रगतिशील आलोचक का तुलसीदास विषयक मंतव्य. सच तो यह है कि

साहित्य-क्षेत्र में युधिष्ठिरों की फुसफुसाहटों और शिखंडियों की ललकारों के बीच जन-जीवन के द्वंद्व को समझ-बूझकर द्वंद्वमुक्त सोच-विचार रखने वाले लोग हर ज़माने में अल्पसंख्यक रहे हैं और पदमावतका रचयिता भी उन्हीं में से एक है.

इसमें जायसी अपने पात्रों को कुछ इस तरह छूते हैं कि मनुष्य को अतिमानव बनाने वाली इतिहास की प्रवृत्ति तथा कई बार सामंती रसोपलब्धि के सूफीकरण के प्रयास के बावजूद वहाँ इतिहास की विडंबना के चित्रण के दौरान कवि और पाठक के बीच काल का व्यवधान नहीं रह जाता. पदमावतमें ऐसे कई सामान्य चरित्र भी हैं, जिनकी आम भारतीय तटस्थता और दार्शनिकता के बरअक्स ही तद्युगीन इतिहास की विडम्बना को उसके व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है. वस्तुतः जायसी का लक्ष्य मध्ययुगीन सामंती समाज के उन तमाम अंतर्विरोधों का संवेदनात्मक रेखांकन है, जिसकी क्रूरता का ज्वालामुखी फूटकर अंततः सबको तहस-नहस कर देता है :

जौंहर भई इस्तिरी पुरुख भए संग्राम l
पातसाहि गढ़ चूरा चितउर भा इसलाम॥

कहना न होगा कि साहित्य का समाजशास्त्रके क्षेत्र में अपने अप्रतिम योगदान के लिए विश्वप्रसिद्ध विचारक लूसिएँ गोल्डमान की शब्दावली का इस्तेमाल करते हुए विजयदेव नारायण साही ने जायसीपुस्तक में पदमावतमें निहित विषाद-दृष्टि’(ट्रैजिक विज़न) की सामाजिकता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भलीभांति उजागर किया है. अपने विवेचन-विश्लेषण के क्रम में साही ने इसी प्रसंग पर रचित अमीर खुसरो का एक फारसी छंद भी उद्धृत किया है जिसमें अलाउद्दीन खिलजी पर व्यंग्य करते हुए खुसरो कहते हैं कि 


तुमने अपने घमंड की तलवार से ह्रदय के देश को वीराना बना दिया और अब तू इस पर सुलतान बनकर बैठा है.

पदमावतमें जगहजगह सूफीमत की शब्दावली, मुहावरे एवं प्रतीक-विधान के इस्तेमाल तथा सामंती रसोपलब्धि के सूफीकरण के बावजूद जायसी की काव्यानुभूति की संस्कृति एकायामी नहीं है. वस्तुतः यह कृति उस ज़माने में प्रचलित तमाम तरह की धार्मिक प्रणालियों व अधिरचनाओं का छोटा-मोटा विश्वकोश प्रतीत होती है, जिसकी रचना के मूल में कवि की सर्वसमावेशी प्रकृति है. चूँकि जायसी के यहाँ अपवर्जन के लिए कोई जगह नहीं है, इसलिए उनसे वैसी धर्मनिरेपक्षता की माँग करना एक प्रकार से ज्यादती होगी, जो राष्ट्रीयता एवं संस्कृति में धर्म के एक संघटक अवयव के रुप में समावेश किये जाने का विरोध करती है.

यह सही है कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सर्वधर्म समभाव’  कदापि नहीं होता और इसकी अवधारणा शुरु से यह रही है कि प्रत्येक नागरिक के धार्मिक विश्वास (या नास्तिकता) की स्वाधीनता बरकरार रखने के बावजूद राजकीय एवं प्रशासनिक क्रियाकलापों में धार्मिक मान्यताओं के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. किंतु, स्मरणीय है कि धर्मनिरेपक्षता विषयक इस मंतव्य का स्वरुप सिद्धांततः आधुनिकता व आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के साथ निर्मित हुआ है और ऐसी धारणाओं को सर्वधर्म समभावरूपी बीज से अंकुरित परवर्ती तर्कसम्मत चिंतन कहा जा सकता है.

जाहिर है कि मध्यकाल में ऐसे वैज्ञानिक एवं तार्किक भावबोध और चिंतन सरणि के अभ्युदय, विकास तथा प्रसार के लिए कोई अवकाश नहीं था. इसलिए आज चेतना व चिंतन के विकसित धरातल पर खड़े होकर भक्तिकालीन कलाकृतियों में निहित उदार मानववाद को कमतर समझना एक श्रेष्ठ रचना के साथ ग़ैर-रचनात्मक तरीके से पेश आना ही कहा जायेगा और यह नज़रिया न केवल कला-विरोधी होगा, बल्कि अनैतिहासिक भी. वस्तुतः पदमावतके पाठ को भक्तिकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में रखकर ही जायसी के रचनात्मक अभिप्राय एवं प्रभाव की पड़ताल करना तथा उनकी रचनात्मक उपलब्धियों एवं संभावनाओं का जायज़ा लेना संभव है. कहने की ज़रुरत नहीं कि 
पदमावतधार्मिक संवेदना एवं धर्मनिरेपक्ष संवेदना के घनिष्ठ और जटिल संबंध की समझ पैदा करने वाली महान कालजयी कृति है.

अतीत एवं परम्परा के प्रति अपने नज़रिये का खुलासा करते हुए राल्फ फाक्स ने लिखा है कि अतीत हमारे लिए कोई शौकिया वस्तु नहीं है, हम उसका उपयोग वर्तमान में बेहतर तरीके से ज़िंदा रहने के लिए करना चाहते हैं. यह बात जिस हद तक अतीत पर लागू होती है, उसी हद तक अतीत की रचनाओं पर भी, किंतु इसके लिए अतीत में रचित कृतियों को उनकी गतिशीलता और परिवर्तनों के रुप में, उनके पारस्परिक संबंधों और घात-प्रतिघातों के रुप में देखकर गहरी छानबीन अपरिहार्य है. यह देखे बगैर कि साहित्यिक कृतियाँ किन ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संकटों से पैदा हुए संवेदनात्मक आलोड़न के तहत रची जाती हैं और दूसरी कृतियों के साथ उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया कैसी होती है, यदि कोई अध्ययन किया जायेगा तो स्वभावतः उससे अनेकानेक भ्रमोत्पादक निष्कर्ष निकेलेंगे और समझ पाना असंभव होगा कि कैसे भक्त कवि तद्युगीन दुनियावी सच्चाइयों से जुझती अपनी लहूलुहान आत्मा की पीड़ा को धार्मिक चेतना जैसा एब्सोल्यूटरुप प्रदान करते हैं.

रघुवीर सहाय का कहना है कि
कविता जिन चीज़ों को बचा सकती है, उनको पहचानने के लिए आप मुक्त हैं, पर अंततः वे वहीं होंगीजो कि आदमी को कहीं न कहीं आज़ाद करती हैं.

इस दृष्टि से विचारने पर स्पष्ट होता है कि जायसी की कविता भले ही तद्युगीन समाज को बनाने या बिगाड़ने वाले सत्ता-संघर्ष में कोई सार्थक हस्तक्षेप न कर पायी हो, पर वह अपने समय का एक ऐसा संवेदनात्मक साक्ष्य ज़रुर है, जिससे गुज़रना आज भी हमें किसी सीमा तक अवश्य मुक्त करता है. याद रहे कि आज के पाठक की यह मुक्ति किसी भी अर्थ में अपने समय की वास्तविकता की विस्मृति का ज़रिया नहीं हो सकती. हिंसा की सभ्यताएवं क्रूरता की संस्कृतिके इस उपभोक्तावादी युग में पदमावतसे गुज़रना खुद को लगभग याद दिलाने जैसा है कि हमारे अपने समय-समाज की वास्तविकता क्या है.

वस्तुतः जायसी अपने कविता में जगह-जगह पर शब्दों के चारों ओर वह स्पेसरचते दिखाई पड़ते हैं, जिनमें तथाकथित आधुनिक जीवन की विसंगतियों व विड़ंबनाओं के चलते अवसन्न पाठक शिरकत करके एक हद तक संतृप्त महसूस कर सकता है. यह इसलिए संभव है, क्योंकि सूफ़ी मतवाद से संबंधित दार्शनिक वागाडम्बर व दिखावे के बजाय कवि का मकसद तद्युगीन औसत भारतीय जीवन में मौजूद बुनियादी रागात्मकता का उद्घाटन रहा है. स्पष्ट ही जायसी के प्रेम की पीरका स्वरुप नारद-भक्ति-सूत्र के अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरुपम. मूकास्वादनवत्.से न केवल गुणात्मक रुप में भिन्न है, बल्कि कहीं ज्यादा मानवीय भी. ठेठ अवधी का ठाठको मध्यकाल में काव्य-सृजन के शिखर पर पहुँचाने में सफल महाकवि जायसी को विजयदेव नारायण साही ने ठीक ही हिन्दी का पहला विधिवत कवि और उनके पदमावतको सुविख्यात पश्चिमी भारतविद थॉमस डी.ब्रुइज्न ने रूबी इन द डस्टकहा है


स्पष्ट ही पदमावतजैसी किसी कलाकृति को आधार बनाकर निर्मित फिल्म अपने तमाम तामझाम के बावजूद उसकी कला-चेतना की ऊँचाई का स्पर्श नहीं कर सकती, क्योंकि कवि अपने पाठकों की कल्पनाशीलता को जहाँ उद्वेलित करता है, वहीं फिल्म उसे मूर्त रूप प्रदान करके सीमित कर देती है. नतीजतन, कालजयी रचनाएँ इतिहास की प्रक्रिया से गुजरने के बावजूद इतिहास का अतिक्रमण करती हुईं अक्सर फिल्म के मुकाबले में बाजी मार ले जाती हैं.
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प्रोफ़ेसर एवं पूर्व अध्यक्ष,हिन्दी विभाग,हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय,हैदराबाद -500046
विजिटिंग प्रोफ़ेसर,वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड
इ.मेल : raviranjan@uohyd.ac.in 

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