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सबद भेद : कुमार अम्बुज : मानवीय सरोकारों की प्रतिबद्धता : मीना बुद्धिराजा

Posted by arun dev on दिसंबर 10, 2018















यह समझना चाहिए कि कविता कौतुक नहीं है. जहाँ बहुत कला होती है वहाँ अर्थ महीन होकर लगभग अदृश्य हो जाता है, अंतत: कवि-कर्म एक मानवीय गतिविधि है जिसमें मनुष्यता निवास करती है. उदात्तता का उसका एकपक्ष हमेशा से रहा है. बेहतर और विकल्प ये दोनों उसके काम्य हैं. वह कला भी है तो इसीलिए है कि सुगमता से सहज हो सके.
बड़े अर्थों में वह मनुष्यता की राजनीति है.   

विष्णु खरे ने ठीक ही लिखा है कि कुमार अम्बुज की कविताएँ भारतीय राजनीति, भारतीय समाज और उसमें भारतीय व्यक्ति के साँसत-भरे वजूद की अभियक्ति है.

कुमार अम्बुज (१३ अप्रैल, १९५७, गुना, मध्य-प्रदेश) समकालीन महत्वपूर्ण कवि हैं. उनके पांच कविता संग्रह प्रकाशित हैं - किवाड़, क्रूरता, अनंतिम, अतिक्रमण और अमीरी–रेखा. उनके कवि कर्म पर यह आलेख मीना बुद्धिराजा का है. आपके लिए.


कुमार अम्बुज
मानवीय सरोकारों की प्रतिबद्धता         

मीना बुद्धिराजा







विता के लिए निरंतर कठिन होते समय और मानवीय संवेदना के अनुर्वर होते परिदृश्य में भी आज अगर कविता लिखी जा रही है तो यह हमारे लिए बहुत बड़ी आश्वस्ति है. कविता अंतत: स्मृतियों, उम्मीदों और संवेदनाओं की मृत्यु से मुठभेड़ करती है. अपने समय के सच की सबसे विश्वसनीय अभिव्यक्ति कविता में ही संभव है जो तमाम विषमताओं, अन्याय और क्रूरता के बीच संघर्ष और प्रतिरोध की पक्षधर होकर भी मानवता के स्वप्न को बचा लेती है. समकालीन कविता का सृजन आज तीन-चार पीढ़ियां एक साथ मिलकर कर रही हैं जिसमें सब का सह-अस्तित्व है. इसका कारण है आज के परिवेश और जीवन का जटिल और बहुआयामी यथार्थ जो जो हमारे आस-पास जीवित और स्पंदित है. हमारे दौर का सबसे बड़ा संकट यह है कि अभूतपूर्व पैमाने पर निर्ममता और नृंशसताएँ हमारे चारों और हैं लेकिन हम उन्हें एक सामान्य सच मानकर संवेदनशून्यता में जी रहे हैं. बाहरी व्यवस्था कैसे हमारी अंतश्चेतना पर अपना शिकंजा कसती जाती है इसमें मनुष्य के अस्तित्व की बुनियादी अंसगतियोंविरोधाभासों, आत्मवंचना और अनसुनी आवाज़ों को सुनना और रचना हमारे समय की कविता का केंन्द्रीय मुद्दा है. 


कविता का सारा मोर्चा मानवता के पक्ष में विस्मृति, शोषण और अन्याय के खिलाफ है और वह वर्तमान के आधारभूत सच को उजागर करने का नैतिक साहस करती है. जीवन की निकटता ही कवि और पाठक को एक दूसरे के पास लाती है. यहाँ कवि भाषा में दुनिया के बारे में नहीं बल्किदुनिया में अपने होने को रखता है. एक कविता को अपने समय में किसी गवाही के रूप में पढ़ना एक बुनियादी तथा जरूरी सामाजिक जवाबदेही की ओर भी जाना है –
 

मुझे अपने सवाल किताबों में नहीं मिले
मुझे अपने हल किताबों में नहीं चाहिए
मुझे जीवित लोग मिले थे
मुझे जीवित लोगों से मिलना है
मुझे सिर्फ नक्शे में नहीं
पृथ्वी के एक सचमुच हिस्से में रहना है.
यही मेरा युद्ध है
यही मेरा द्वंद्व
यहीं
इसी बिंदु पर होना है निर्णय
मेरे जीवन का.
(कुमार अम्बुज)


इस जनतांत्रिक स्वर के साथ हिंदी कविता में बीसंवी सदी के के नवें दशक से लेकर समकालीन परिदृश्य में कुमार अम्बुज पर्याप्त चर्चित, सर्वस्वीकृत और हमारे समय के सार्थक हस्तक्षेप और कवि हैं. अपने पांचों महत्वपूर्ण कविता-संग्रह किवाड़, क्रूरता, अनंतिम, अतिक्रमण और अमीरी -रेखा के साथ ही इच्छाएं शीर्षक प्रसिद्ध कहानी संग्रह के साथ ही  थलचर जैसे वैचारिक गद्य के इलाके में भी उनकी उपस्थिति निर्विवाद एक सशक्त रचनाकार के रूप में बहुत आशवस्त करती है. कविता के लिए बहुत से सम्मानों के साथ उनकी प्रसिद्ध कविताओं के भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं जो उनकी प्रखर वैचारिक दृष्टि के साथ ही सृजनशीलता में संवेदनात्मक रूप से भी व्यापकता का प्रमाण हैं. मानवीय सरोकारों से जुड़ा प्रत्येक विषय उनकी कविताओं में जीवंत हो उठता है. वास्तव में उनकी कविता अंतर्वस्तु और यथार्थ के आपसी संबंधों को एक आत्मीय भाषा में स्वरूप देती है. उनकी सजग संवेदना साधारण वस्तुओं और विषयों में भी समय की विराटता को दर्ज़ करती है जो उनकी विशिष्टता है-

ये सिर्फ किवाड़ नहीं हैं
जब ये हिलते हैं
माँ हिल जाती है
और चौकस आँखों से
देखती है- क्या हुआ ?
मोटी साँकल की
चार कड़ियों में
एक पूरी उमर और स्मृतियाँ
बंधी हुई हैं
ये जब खुलते हैं
एक पूरी दुनिया
हमारी तरफ खुलती है.
जब ये नहीं होंगे घर
घर नही रहेगा.

कुमार अम्बुज की कविताओं में एक ऐसी ताज़गी, सहजता और कृत्रिम वैचारिकता की अनुपस्थिति है जो उन्हें समकालीन कवियों में अलग पहचान देती है. उनमें साधारण वस्तुएँ और स्थितियाँ इतने गहरे लगाव और अभिव्यक्ति के संयम के साथ प्रस्तुत होती हैं कि उनमें मानवीय सबंधों और सच्चाईयों की सूक्ष्म अनुगूंज सुनाई देती है. अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में उन्होनें कहा है- “एक सवाल की तरह और फिर एक विवाद की तरह, कुछ चीज़ें हमेशा संवाद में बनी रहती हैं. रचनाशीलता में मौलिकता एक तरह का मिथ है. मौलिकता एक अवस्थिति भर है जिसमें आपको एक दी हुई दुनिया का अतिक्रमण करना है. मै और मेरी रचना उतनी ही मौलिक है जितना इस संसार में मेरा अस्तित्व मौलिक है. मेरी मौलिकता पूरे जड़-चेतन से सापेक्ष है निरपेक्ष नहीं. ... जैसे मेरी हँसी में मेरे पिता की हँसी शामिल है. ‘’

कुमार अम्बुज की कविता में हमारे समय का छिपा हुआ हिस्सा और अंधकार ही सतह पर आता है. ताकत के प्रति एक आसक्ति भाव और अन्याय को विस्मृत करने कीस्थिति जिसमें स्मृतिहीनता के  सामने हथियार डालना ही अब व्यक्ति की और सामूहिक अभिशप्त नियति है. ये कविताएँ जिन जटिल मानवीय संदर्भों में इन प्रश्नों को उठाती हैं वो पाठक की चेतना को झकझोरते हैं. इन कविताओं को पढ़ते वक्त कई बार हम स्तब्ध हो सकते हैं जो व्यवस्था के हिंसक परिवेश और अन्याय के प्रति आक्रोश तथा क्षुब्ध करती हैं लेकिन ज्यों ही क्रूरता के किनारे पहुंचकर मनुष्य पशु में परिवर्तित होने लगता है तो ये कविताएँ जैसे चीख चीख कर याद दिलाने लगती है कि हिंसा प्रतिहिंसा का उत्तर नहीं है. इसलिये उनके कवि-व्यक्तित्व में एक जागरूक सयंम भी है-

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे
तब आएगी क्रूरता
पहले ह्र्दय में आएगी और चेहरे पर न दिखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का  आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा श्रृंगार.
यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना.



एक गहरी मानवीय उष्मा से भरी उनकी कविता में सहज करुणा एक दीर्घ आलाप की तरह उनके सरोकारों को विस्तृत कैनवास देती है. यह उन्हें कविता में साधारण जन के साथ अदृश्य रूप से जोड़ती है. प्रतिरोध के नए औजार गढ़्ते हुए उन्हें एक विलक्षण लेकिन प्रतिबद्ध कवि की पहचान देती है. उनकी कविता सक्रिय और सकर्मक प्रतिरोध की रचनात्मक कार्यवाही है. इनमे मनुष्यताराजनीति, व्यवस्था , समाजवैश्विकताबाज़ारप्रेमअपमान और जीवन का अंधेरा पक्ष भी है जो  भाषा और शिल्प की सादगी में होकर भी कठिन है और विस्मित करने वाला है. इन कविताओं में हमारे समय की पुनर्परिभाषाएँ हैसाहसिक आत्मालोचन भी और प्रवंचनाओं के प्रति प्रखर विरोध भी है. अमीरी रेखा संग्रह की कविताएँ इस जटिल यथार्थ और समय की गवाही को कलात्मकता में रूपातंरित कर कविता के बुनियादी सच को सामने ला देती हैं. इस निर्मम परिवेश में अपने दुख, क्रोधनिराशा, पश्चाताप, अपराधबोध तथा आत्मसंलाप में कवि उस अंतरंग सच को ही पाना चाहता है जो आज की साधारण और सामूहिक त्रासद नियति है –

मनुष्य होने की परपंरा है कि वह किसी कंधे पर सिर रख देता है
और अपनी पीठ पर टिकने देता है कोई दूसरी पीठ
ऐसा होता आया है बावज़ूद इसके
कि कई चीज़ें इस बात को हमेशा कठिन बनाती रही हैं
या जब सब रफ्तार में हों तब पीछे छूट जाना भी एक शुरूआत है
बशर्ते तुम्हारा मनुष्यता में विश्वास बाकी रह गया हो
एक दिन तुम्हारी मुश्किल यह हो सकती है
कि तुम नश्वर नहीं रहे.

जब  बाज़ारवाद की आंधी में शब्दों के मायने खत्म किये जा रहे हों तब बुनियादी मानवता और अपनी भाषा को बचाने के लिए कवि की चिंता वाज़िब है. अपने एक वक्तव्य में कुमार अम्बुज ने कहा भी है- 


“मैं आधा अधूरा जैसा भी हूँ एक कवि हूँ और बीत रही एक सदी का गवाह हूँ. मेरे सामने हत्याएँ की गई हैं. मेरे सामने ही एक आदमी भूख से मरा है. एक स्त्री मेरी आँखों के सामने बेइज़्ज़त की गई. फुटपाथ पर कितने लोगों ने शीत भरे जीवन की रातें बिताई हैं. मै चश्मदीद गवाह हूँ. मुझे गवाही देनी होगी. इससे बचा नहीं जा सकता. कविता में लिखे शब्द एक साक्षी कवि के बयान हैं. समाज के पाप और अपराध, एक कवि के लिए पश्चाताप, क्रोध, संताप और वेदना के कारण हैं. वह एक यूटोपिया का निर्माण भी है , जिसकी संभावना को असंभव नहीं कहा जा सकता.”

एक ऐसे समय में जब सच, स्मृति और संवेदनाओं को जबरन नष्ट किया जा रहा है. एक यूटोपिया विहीन समय में जब अतिशय सूचनाएँ, उपभोग, सनसनी और विस्मृति की दुनिया में ये तमाम सवाल नए संदर्भों और असुविधाजनक तरीके के कवि के सामने आते हैं तो भयावह टूटन, यंत्रणा और  अकेलेपन में जो कविताएँ लिखीं वे बेहद सजीव होकर पूरे वेग के साथ पाठक के पास भी लौटती हैं और कवि की निजी पीड़ा का अतिक्रमण कर जाती हैं. जीवन का वह पक्ष जिसे जानने का अधिकार नहीं है उसमें अवसादऔर आत्मनिरीक्षण के मिले- जुले स्वर कुमार अम्बुज की विशिष्टता है-

इधर का जीवन कुछ ऐसा हो गया है जैसे जीवन नहीं
यदि कोई धोखा न दे
कर ले थोड़ा सा भी विश्वास
तो चकित रहता हूँ बहुत दिनों तक
इधर का जीवन हो गया है कुछ ऐसा
कि हर पंद्रह मिनट बाद
टटोलकर ढूंढ़नी होती है जीवन की धड़कन .

कुमार अम्बुज की कविता की जड़ें उनके समय- संदर्भों से गहरे जुड़ी हुईं हैं जो उनकी अलग पहचान है. एक ऐसे वक्त में जब  वर्चस्व, मुनाफे और बाज़ार की संस्कृति ने  पूरी दुनिया में सत्ताओं का चरित्र एक जैसा ही बना दिया है. तब शोषित- पीडित की संवेदना और स्वप्न प्रतिरोध की शक्ति बनकर उनकी कविता के रूप में शब्दों की सत्ता में दिखाई देते हैं जो इस नई अमानवीय सभ्यता के सामने एक प्रतिसंसार की रचना करते हैं-

नयी सभ्यता ज्यादा गोपनीयता नहीं बरत रही है
वह आसानी से दिखा देती है अपनी जंघाएँ और जबड़े
वह रोंदकर आई है कई सभ्यताओं को
लेकिन उसका मुकाबला बहुत पुरानी चीज़ों से है
उसकी थकान उसकी आक्रामकता समझी जा सकती है.
हम चाहते हैं कि तुम हमारे साथ कुछ बेहतर सलूक करो
लेकिन जानते हैं तुम्हारी भी मुसीबत
कि इस सदी तक आते-आते तुमने
मनुष्यों की बजाय
वस्तुओं में अधिक निवेश कर दिया है.

आज के निर्मम और क्रूर समय में जब प्रेम की संवेदना ही संकट ग्रस्त है तब कुमार अम्बुज लिखते हैं-

इन दिनों प्रेम करना
शताब्दी का सबसे कठिन काम है.


लेकिन प्रकृति नें जिस कोमल संवेदनाओं से स्त्री का निर्माण किया है वह पुरुष के भीतर खंडित और टूटे- फूटे मनुष्य की मरम्मत कर उनके खुरदरेपन को अपने प्रेम से संवार सकती हैं. स्त्री की आत्मगरिमा और उसके अदम्य धैर्य के प्रति भी कवि की दृष्टि स्पंदनशील है. खाना बनाती स्त्रियां और एक स्त्री पर कीजिए विश्वास ऐसी ही विशिष्ट कविताएँ हैं जिनके केंद्र में स्त्री की व्यथाएँ कई तरीके से दिखाई देती हैं. समस्याओं के फेर में पड‌ना स्त्री की सामूहिक नियति है लेकिन संताप की दारुण स्थितियों में एक स्त्री का स्वर समूची स्त्री जाति का स्वर बन जाता है और कविता आगे बढ़ती हुई स्त्री की पीड़ा को रचते हुए भी उसका अतिक्रमण कर जाती है-

जब ढह रही हों आस्थाएँ
जब भटक रहे हों रास्ता
तो इस संसार में एक स्त्री पर कीजिए विश्वास
वह बताएगी सबसे छिपाकर रखा गया अनुभव
अपने अँधेरों में से निकालकर देगी वही एक कंदील.

एक बड़े कवि और रचनाकार के भीतर के रहस्य कभी समाप्त नहीं होते और वह हर बार अपनी रचना-प्रक्रिया में नये रूप में बार-बार लौटता है और अलग तथा आगे की यात्रा करता है. विस्मृति के विरूद्ध कविता उसकी रचनाओंमें हमेशा स्पंदित रहती है. यहीं से गुजरते हुए उसे पता लगता है कि मनुष्य की यातना का अंत कहीं नहीं है लेकिन उस अन्याय को जानना और प्रतिरोध के लिए तैयार करने का काम भी कविता ही करती है. इस दृष्टि से कुमार अम्बुज की बहुत सी कविताएँ जैसे एक राजनीतिक प्रलाप, नागरिक पराभव, चँदेरीकोई है माँजता हुआ मुझे, बहुरूपियापिता का चेहराबाज़ार, अवसाद में एक दिन मैं, माईग्रेन , संभावना, आदर्शविहीन समय में , चुप्पी में आवाज़ज़ंजीरेंडरचोट, बहस की ढ़लान पर , अनंतिम और आत्मकथ्य की सुरंग में सेजैसी रचनाएँ गहन अनुभुति और संवेदनात्मक यथार्थ के स्तर पर नये अर्थों में कविता का पाठ तैयार करती हैं.जब निरर्थक शोर इतना है कि जैसे समय घूर रहा हो तब अपने समय के संत्रास और ना-उम्मीदी से संघर्ष करते हुए भी सृजन के स्वप्न में कवि की आस्था बहुत गहरी है-

यह थकान ,यह हताशा, यह मलबा, यह पराजय
कुछ भी अंतिम नहीं है
देखते- देखते अभी उठूंगा पस्ती को रौंदता हुआ
आएगा मेरे भीतर से मेरा अपराजित मनुष्य
फिर से शुरु होगा जीवन
इतने खतरे हैं इतना है उन्माद
कि कुछ भी अंतिम नहीं अपनी स्थिति में
कोई नहीं कह सकता
कि फिर से नहीं उठ पड़ूँगा मैं.

हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि विष्णु खरे जी ने  कुमार अम्बुज के राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित  नवीनतम प्रतिनिधि कविता-संकलन की भूमिका मे जो वक्तव्य लिखा है वह उनकी काव्य-यात्रा का गहन गंभीर परिचय और जरुरी विश्लेषण भी है—

“1990 के बाद कुमार अम्बुज की कविता भाषा,  शैली और विषय- वस्तु के स्तर पर इतना लंबा डग भरती है कि उसे क्वाटंम जम्प ही कहा जा सकता है. उनकी कविताओं में इस देश की राजनीति, समाज और उसके करोड़ों मजलूम नागरिकों के संकट्ग्रस्त अस्तित्व की अभिव्यक्ति है. वे सच्चे अर्थों में जनपक्ष, जनवाद और जन-प्रतिबद्धता की रचनाएँ हैं. जनधर्मिता की वेदी पर वे ब्रह्मांड और मानव अस्तित्व के कई अप्रमेय आयामों और शंकाओं की संकीर्ण बलि भी नहीं देती. यह वह कविता है जिसका दृष्टि संपन्न कला-शिल्प हर स्थावर-जंगम को कविता में बदल देने का सामर्थय रखता है. कुमार अम्बुज हिंदी के उन विरले कवियों में से हैं जो स्वंय पर एक वस्तुनिष्ठ संयम और अपनी निर्मिति और अंतिम परिणाम पर एक जिम्मेदार गुणवत्ता दृष्टि रखते हैं. उनकी रचनाओं में एक नैनो-सघनताएक ठोसपन है. अभिव्यक्ति और भाषा को लेकर ऐसा आत्मानुशासन जो दरअसल एक बहुआयामी नैतिकता और प्रतिबद्धता से उपजता है और आज सर्वव्याप्त हर तरह की नैतिक, बौद्धिक तथा सृजनपरक काहिलीकुपात्रता और दारिद्रय के विरुद्ध है. हिंदी कविता में ही नहीं अन्य सारी विधाओं में दुष्प्राप्य होता जा रहा है. अम्बुज की उपस्थिति मात्र एक उत्कृष्ट सृजनशीलता की ही नहीं सख्त पारसाई की भी है.”
______



मीना बुद्धिराजा
सह-प्रोफेसर, अदिति कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

सम्पर्क- 9873806557

पटना की हिंदी पत्रकारिता : राजू रंजन प्रसाद

Posted by arun dev on दिसंबर 08, 2018










जिसे हम आज़ादी का संघर्ष कहते हैं और जो १९४७ में प्रतिफलित हुआ उसके पीछे लम्बा प्रेरणादायी नवजागरण काल है. हर बड़े राजनीतिक संघर्ष से पहले ज्ञानात्मक उभार और प्रसार का काल होता है. भारत में हिंदी  पत्रकारिता की शुरुआत इसी प्रेरणा से हुई. औपनिवेशिक काल में पटना राजनीतिक और बौद्धिक सक्रियता का महत्वपूर्ण केंद्र था. वहां से तमाम पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती थीं, वहां की कुछ प्रारंभिक हिंदी-पत्रकारिता की चर्चा कर रहे हैं राजू रंजन प्रसाद. राजू रंजन प्रसाद के ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित उनके लेखन ने पाठकों का ध्यान खींचा है.



पटना  की  हिंदी  पत्रकारिता                      
राजू रंजन प्रसाद






II पाटलिपुत्र II

बांकीपुर में संपन्न भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 27 वें अधिवेशन ने बिहार के राजनैतिक जीवन में उथल-पुथल मचा दी और बिहार का बंगाल से पृथक्करण (1912 ई.) राष्ट्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति में सहायक बना. इस समय तक बिहार एक नया मोड़ ले चुका था और लोग निःस्वार्थ देश-प्रेम, निर्भीक विचार तथा अटल संकल्पों के दीवाने बनकर जोशपरक पठनीय सामग्रियों की तलाश करने लगे थे. 'पाटलिपुत्र' इन्हीं दीवानों की राष्ट्रीय आकांक्षाओं की चिर प्रतीक्षित उपलब्धि बनकर आया जिसने अपने कर्तव्यों के पालन में अपना अस्तित्व तक मिटा दिया पर देशी और अंगरेजी रियासत के सामने झुकना पसंद नहीं किया. इसलिए इसे बिहार का प्रथम राष्ट्रवादी साप्ताहिक की संज्ञा दी गई है.
(बैरिस्टर  काशी प्रसाद जायसवाल)

'पाटलिपुत्र' (साप्ताहिक) का प्रकाशन हथुआ नरेश महाराज महादेवाश्रम शाही के एक्सप्रेस प्रेस से 1914 ई. में हुआ. आरंभ में इसके संपादक नामी बैरिस्टर एवं ख्यात पुरातत्ववेत्ता काशी प्रसाद जायसवाल थे. वे अंगरेजी राज की नजरों में एक खतरनाक क्रांतिकारीथे. राष्ट्रवादी गतिविधियों में सम्मिलित होने एवं अंगरेजी सरकार के विरुद्ध आंदोलनकारियों से मिलकर कुचक्र करने का आरोप लगाकर उन्हें कलकत्ता हाईकोर्ट का जज बनने के अयोग्य घोषित कर दिया गया था. जब वे पटना आये तब भी अंगरेजी सरकार का संदेह दूर नहीं हुआ. इसीलिए यहां के जिला मजिस्ट्रेट और आरक्षी अधीक्षक को उनके क्रियाकलापों एवं संपर्कों की सूचना लेते रहने तथा उन पर नजर रखने का आदेश दिया गया था. शायद इसी कारण वे 'पाटलिपुत्र' के आरंभिक अंकों में विद्वता एवं गंभीरता का पोषण करते रहे. किंतु स्थानीय राष्ट्रवादी लोगों के आग्रह पर उन्होंने अपने ओजपूर्ण अग्रलेखों से पाठकों में क्रांति की नई लहर पैदा करनी शुरू कर दी. 10 अगस्त 1914 के अंक में उन्होंने लिखा -

विश्व परिवेश में अंगरेजी सरकार युद्धों में फंस चुकी है और उसे अपनी कमजोर स्थिति का आभास होने लगा है. इसीलिए भारतवर्ष के स्वातंत्र्य आंदोलन को भी वह सख्ती से कुचल देना चाहती है ताकि यह उपनिवेश भी कहीं उसके हाथों से न निकल जाय. परंतु सरकार को यह सोच लेना चाहिए कि वह देशप्रेम की व्यापक उत्तेजना को रोक सकने में अंततोगत्वा असफल रहेगी.

जनता को अंगरेजी सरकार के विरोध में भड़काने वाली ऐसी बातें पढ़कर बिहार के तत्कालीन छोटे लाट का असंतुष्ट हो जाना अस्वाभाविक नहीं था, अतः उन्होंने हथुआ महाराज से अपनी नाराजगी प्रकट की. फलस्वरूप डा. जायसवाल को पदमुक्त कर दिया गया.

उसके बाद सोना सिंह चौधरी संपादक नियुक्त हुए. पारसनाथ त्रिपाठी, रामानंद द्विवेदी और ईश्वरी प्रसाद शर्मा उनके सुयोग्य सहकारी थे. उनके संपादन में पत्र बहुत सुंदर निकलता था. एक विशेषांक तो ऐसा निकला कि आजतक वैसा सर्वांग सुंदर विशेषांक किसी साप्ताहिक का न देखा गया. (जयन्ती स्मारक ग्रन्थ, पुस्तक भंडार, पृष्ठ 577) श्री चौधरी के विषय में कहा जाता है कि अपने निर्भीक राष्ट्रवादी विचारों के प्रकाशन में किसी की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करते थे और उसी के अनुरूप अपने सहकारियों का भरपूर सहयोग भी उन्हें मिलता था.

जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद भारतीय मस्तिष्क को व्यापक पैमाने पर झकझोरनेवाली सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना चंपारण के नीलहों पर अत्याचार और उनकी बर्बरता थी. सीधे-सादे किसानों से जबर्दस्ती नील की खेती करवाना और उनके हितों की कुछ भी परवाह न करना शोषणकारी अर्थव्यवस्था की भयंकरता थी जिसके प्रतिरोध में असंतुष्ट प्रजा का विरोध अस्वाभाविक नहीं था. उस समय नील भारत से गैर सरकारी व्यापार का एक फायदेमंद माल था जिससे अंगरेजों को अच्छी आमदनी होती थी. लेकिन उस आय का लघुत्तम अंश भी वे अपने रैयतों पर खर्च करने के लिए तैयार नहीं थे. उन्हें वास्तविक मजदूरी भी नहीं दी जाती थी. मैकाले ने लिखा है, स्थानीय लोगों के द्वारा अक्सर घोर अन्याय होता है और अनेक रैयतों को किन्हीं कानून के द्वारा अथवा किन्हीं कानून का उल्लंघन करके ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया जाता है जो अर्धदासों की अवस्था से अधिक भिन्न नहीं है.

नील की खेती कराने के लिए नीलहों ने दो प्रकार की प्रथाएं चलाई थीं-जिराती प्रथा तथा असामी प्रथा. जिराती प्रथा के अंतर्गत वे सामान्य किसानों के हल-बैल निम्नतम मजदूरी पर गिरवी रख लेते थे और असामी प्रथा के अंतर्गत प्रत्येक किसान प्रतिबीघा जोत के लिए तीन कट्ठा के हिसाब से नील पैदा करने के लिए बाध्य होता था. यह तिनकठियाप्रथा कहलाती थी. इससे नीलहों को ज्यादा लाभ होता था और किसान शोषित हो रहे थे. यदि किसी किसान के द्वारा नील की खेती से इनकार किया जाता तो वे उसपर तरह तरह के जुल्म करते थे. जब कोई रैयत अथवा किसान इसके विरोध में आवाज उठाता या सुरक्षा की मांग करता था तो उसकी आवाज बड़ी कठोरतापूर्वक दबा दी जाती थी.

नीलहों के द्वारा प्रचलित एक अन्य प्रथा खुश्की या कुरतौली भी थी. इसके अंतर्गत किसानों को मामूली रकम पर अपनी जायदाद बंधक रख देना पड़ता था. बंधक छूटने की अवधि सारी जिंदगी या उससे भी अधिक होती थी. इससे मुक्ति तभी मिलती थी जब किसान सूद समेत पूरी रकम अदा कर देता था. इस प्रकार वस्तुतः यह प्रथा किसानों को गुलामी में जकड़ देनेवाली थी, जिससे आजन्म मुक्ति नहीं मिल पाती थी. सीधे-सादे किसानों पर गोरे नीलहों का अत्याचार इतना ज्यादा था जिसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं. वास्तव में इंगलैंड पहुंचनेवाला नील का हर बक्सा रैयतों के खून से सना होता था. ...नील उपजाने की ऐसी व्यवस्था खून बहाने की व्यवस्था से कतई कम नहीं थी.बकरी चरानेवाले बच्चे तक उनके अत्याचारों की दहशत से गाफिल नहीं थे. अपनी बकरियों को संबोधित करते हुए वे कहते थे- ई त अलई लिलहवा के राज,/अब कहां चरबू बकरियो.

इन कारणों से आम जनता में असंतोष व्याप्त हो जाना और आक्रोश उबलना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता. तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं ने नीलहों के अत्याचार से त्रस्त प्रजावर्ग के असंतोष और आक्रोश को जन सामान्य तक पहुंचाने का काम किया. स्टेट्समैन’, ‘प्रताप’, ‘बिहारीऔर पाटलिपुत्रने अपने अग्रलेखों तथा निबंधों में रैयतों की दिनानुदिन बिगड़ती दशा पर गहरी चिंता व्यक्त की, यद्यपि इस जुर्म में कई पत्र बंद कर दिये गये और कई पर राजद्रोह का मुकदमा भी चलाया गया. प्रताप’ (13 मार्च 1917 ई.) ने लिखा था,

किसानों से बेगार कराया जाता है और कई तरह की नाजायज रकम वसूली जाती है. यथा आम और कटहल पर अमहीऔर कट्ठी’, हाथी या घोड़ा खरीदने पर हथियाहीया घोड़ाहीआदि. 

इस असंतोष एवं त्राषजनक स्थिति से बिहार उबल पड़ा. तत्कालीन उदार एवं अनुभवी शासक सर एडवर्ड ने जनता की शिकायतों को दूर करने का आश्वासन दिया पर वह पर्याप्त नहीं था.

1917 ई. में रैयतों की असह्य व्यथा तथा नीलहों के विरुद्ध शिकायत सुनने के लिए महात्मा गांधी चंपारन प्रस्थान करने हेतु पटना आये. प्रो. कृपलानी, ब्रजकिशोर नारायण और राजकुमार शुक्ल आदि उनके साथ थे. जैसे ही वे चंपारण पहुंचे, उनके विरुद्ध वारंट जारी कर दिया गया और सीधी-सादी शांत जनता को आंदोलन के लिए भड़काने के जुर्म में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. 5 मई 1917 को जब महात्मा गांधी नीलहों के अत्याचार से ऊबे रैयतों का बयान ले रहे थे तो नील प्लांटरों ने रैयतों के द्वारा किये गये उपद्रवों की झूठी अफवाहें प्रचारित कीं. विशेष-विशेष अखबारों में उसे प्रचारित भी करवाया. यद्यपि गांधीजी ने उन सबों से विचार-विमर्श करके अपने आगमन का उद्देश्य उन्हें बताया पर प्लांटरों ने उनके काम में बाधा डालने तथा उन पर और उनके सहकर्मियों पर कीचड़ उछालने में कुछ भी उठा नहीं रखा. (डा. राजेन्द्र प्रसाद, महात्मा गांधी एंड बिहार, पृष्ठ 12)

जेल से छूटने के बाद दूने उत्साह से गांधीजी ने चंपारन के अलावा मोतिहारी और बेतिया के ग्रामीण इलाकों में घूम-घूम कर रैयतों के बयान लेने शुरू कर दिये. राजेन्द्र बाबू ने लिखा, शायद ही कोई प्लांटर बचा हो जिसके रैयत सैंकड़ों की संख्या में हमारे पास नहीं आये हों तथा अपनी शिकायत पूरे विस्तार से नहीं लिखाये हों. (राजेन्द्र प्रसाद, आत्मकथा, पृष्ठ 498) 

शीर्षस्थ नेता के नेतृत्व में जनमत संग्रह के इस अभियान से अंगरेज प्लांटर थर्रा उठे. अतः उन सबों ने संगठित होकर उच्चाधिकारियों से गांधीजी की शिकायत की, उनके विरुद्ध झूठी अफवाहें फैलाईं और उन्हें नीचा दिखाने के लिए अखबारों में मनगढ़ंत खबरें छपवाईं लेकिन पत्र-पत्रिकाओं ने उनके समस्त आरोपों को बेबुनियाद और मिथ्या बताकर निरस्त कर दिया. पाटलिपु़त्रने जांच-कार्य में अड़ंगा लगाने की आलोचना की. 12 मई 1917 के अंक में पाटलिपुत्र ने अपने संपादकीय में स्पष्ट लिखा- 


गांधीजी की प्रवृत्ति, स्वभाव और काम करने के वैधानिक तरीकों से पूरा राष्ट्र अवगत है. जनता ऐसी अफवाहों में कभी भी विश्वास नहीं करेगी. ऐसा अवैधानिक काम एक वैसे व्यक्ति के द्वारा संभव हो ही नहीं सकता जो सविनय अवज्ञा का निष्ठावान प्रवर्तक है... उनके काम में जितना भी अड़ंगा लगाया जाय, जनता उतनी ही उत्तेजित और दृढ़संकल्प युक्त होती जाएगी. इसलिए इस अवसर पर एकमात्र बात जो कही जा सकती है वह यह कि उनके काम को शांतिपूर्ण ढंग से चलने दिया जाय.

इसी अंक में बलदेव अग्रहरी की एक भावपूर्ण कविता भी छपी थी जिसमें नीलहों के जुर्म से त्राण के लिए चंपारण के रैयतों की गांधीजी से प्रार्थना की गई थी. (डा. कृष्णानंद द्विवेदी, बिहार की हिंदी पत्रकारिता, प्रवाल प्रकाशन, पटना, प्रथम संस्करण : 1996, पृष्ठ 69.) बिहारीने इस झूठी अफवाह पर रोष व्यक्त किया और मिथिला मिहिरने मानवता के निष्ठावान सेवक पर झूठे आरोप लगाने की निंदा की. सारांश यह कि महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय जागरण की जिस चेतना को किसानों के मन में भरने का संकल्प चंपारन यात्रा में लिया था, पत्रों ने उसे जनता तक पहुंचाने की जवाबदेही बखूबी पूरा की. असंतुष्ट जनता में राष्ट्रीय जागरण का उत्साह भरने हेतु उन सबों ने अप्रतिम कुशलता का परिचय दिया.

जब 'पाटलिपुत्र' पूरे जोश और राष्ट्रवादी आवेश में सरकार की जड़ें खोदने के लिए कलम चला रहा था, उसके साथ एक दुर्घटना हो गई. छपरा की एक आमसभा का प्रतिनिधित्व इसके संचालक हथुआ महाराज ने किया था. उसी सभा में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित हुआ कि वर्तमान घोर विपत्ति में अंगरेजी सरकार की मदद की जाय. वहां से लौटने के बाद उन्होंने उक्त पारित प्रस्ताव की सूचना 'एक्सप्रेस' एवं 'पाटलिपुत्र' को प्रकाशनार्थ भेजी और यह खबर भी भिजवायी कि यह संवाद छापना बेहद जरूरी है. (राजेन्द्र प्रसाद, आत्मकथा, पृष्ठ 136) 'पाटलिपुत्र' क्रांतिकारी विचारों का पोषक था अतः उक्त समाचार को नहीं छापना उसकी बाध्यता थी क्योंकि वह उसके सिद्धांतों के प्रतिकूल था. लेकिन प्रेस संचालक के आदेश को नहीं मानना भी व्यावहारिक दृष्टि से उचित नहीं था. अतः सिर्फ बारह प्रतियों में, जो नरेश और लार्ड के यहां भेजे जानवाले थे, में उक्त संवाद छपा और शेष में नहीं. बाद में जब भेद खुला और संचालक ने संपादक-पत्रकारों के विचारों में परिवर्तन के कोई आसार नहीं देखे तो 3 मई 1921 को अंगरेजी सरकार के निर्देश पर तार भेजकर प्रकाशन रोकने का आदेश दे दिया था.’ (राजेन्द्र अभिनंदन ग्रंथ, पृष्ठ 361-62) 




II सर्चलाइट/ देश II

1918 में पटने के सभी नेताओं ने, विशेष करके श्री सच्चिदानन्द सिंह और श्री हसन इमाम ने, एक अखबार की बहुत जरूरत महसूस करके निश्चय किया कि एक पत्र निकाला जाय. (डा. राजेन्द्र प्रसाद, आत्मकथा, सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, पांचवा संस्करण : 2002, पृष्ठ 201) उसका नाम श्री सिंह के कहने के अनुसार सर्चलाइटरख दिया गया. वह सप्ताह में दो बार निकला करता था. उसके डाइरेक्टरों में श्री सिंह, श्री हसन इमाम प्रभृति थे. लोगों में श्री ब्रजकिशोरप्रसाद एवं डा. राजेन्द्र प्रसाद थे. आंदोलन आरंभ होने पर सर्चलाइटके सामने यह प्रश्न आया कि वह असहयोग का समर्थन करे या नहीं. पैसा खर्च करनेवालों में मुख्य श्री हसन इमाम और श्री सिंह थे. वे असहयोग के पक्षपाती नहीं थे. इधर सारे सूबे में असहयोग की लहर इस तरह उमड़ रही थी कि उसके खिलाफ जाने का अर्थ था सर्चलाइटका हमेशा के लिए लोकप्रियता खो देना. इसके अलावा डाइरेक्टरों में भी वे लोग थे जो आंदोलन में शरीक थे. उसके संपादक श्री मुरलीमनोहर प्रसाद भी असहयोग के पूरे पक्षपाती थे. ऐसी अवस्था में, आपस के इस मतभेद के कारण, नीति निर्धारित कर देना आवश्यक हो गया.

1920 से, सर्चलाइट प्रेस से ही, हिंदी साप्ताहिक देश भी निकला करता था, जिसके नाम-निहादी संपादक डा. राजेन्द्र प्रसाद समझे जाते थे. असहयोग ने राजनीति को, अंगरेजी पढ़े कुछ वकील-बैरिस्टरों और बड़े-बड़े व्यापारियों के अंगरेजी तरीके से सजे कमरों से बाहर निकालकर, गांवों के बरगदों के साये के नीचे और गांवों के खेत-खलिहानों तक पहुंचा दिया था. वहां अंगरेजी का गुजर नहीं था. जो जनता तक पहुंचना चाहता था, उसे देशी भाषा की शरण लेनी पड़ती थी. इसलिए डा. राजेन्द्र प्रसाद आदि ने तय किया कि सर्चलाइटसे ज्यादा उपयोगी देशहोगा. डा. राजेन्द्र प्रसाद ने श्री हसन इमाम और श्री सिंह से सर्चलाइटऔर देशके संबंध में यह समझौता कर लिया कि सर्चलाइटअपने संपादकीय लेखों में असहयोग का न तो विरोध करेगा और न समर्थन. पर दूसरों के लेख, लेखक के नाम के साथ, चाहे वे पक्ष में हों या विपक्ष में, छाप सकेगा. देशअसहयोग समर्थकों का पत्र हो जायगा. अब से उसका घाटा और नफा इन्हीं का होगा. उसकी नीति भी समर्थक जैसी चाहेंगे वैसी ही होगी; पर वह सर्चलाइट प्रेस में छपाई देकर छपा करेगा.

इस तरह एक हिन्दी साप्ताहिक आंदोलनकारियों के हाथ में आ गया. अंगरेजी सर्चलाइटभी अगर सहायक नहीं तो विरोधी भी न रहा. (डा. राजेन्द्र प्रसाद, आत्मकथा, पृष्ठ 202) देशने प्रचार कार्य में बड़ी सहायता पहुंचाई. ग्राहकों की संख्या भी बहुत बढ़ गई. विज्ञापन भी बहुत मिलने लगे. जैसे-जैसे ग्राहकों की संख्या बढ़ती गई, प्रबंधक की गलती से घाटे की मात्रा भी वैसे ही बढ़ती गई. कुछ दिनों के बाद जब हिसाब हुआ तो पता चला कि विज्ञापन की दर इतनी कम कर दी गई थी कि उसमें जितना खर्च पड़ता था उतना भी विज्ञापनों से नहीं मिलता था. इसलिए जैसे-जैसे बिकनेवाली प्रतियों की संख्या बढ़ी, घाटा भी बढ़ता गया. पाया गया कि बहुतेरों के माल का प्रचार अखबार अपने खर्च से सारे प्रांत में जोरों से कर रहे थे; पर यह ज्ञान नुकसान उठा लेने के बाद हुआ. इस प्रकार उस समय देशपर जो बोझ पड़ा, वह उसके गले में हमेशा के लिए एक भारी पत्थर सा बंध गया.
(डॉ.राजेन्द्र प्रसाद')

जन आंदोलन कुछ ही दिनों बाद ढीला पड़ा. देशकी बिक्री भी कुछ कम हो गई. अंत में आर्थिक कठिनाइयों के कारण उसे बंद करना पड़ा. जितने दिनों तक आंदोलन का जोर रहा, वह खूब काम करता रहा और बहुत लोकप्रिय भी हो गया था. कहना न होगा कि बिहार के स्वतंत्रता संग्राम और हिंदी पत्रकारिता के विकास में देशका महत्वपूर्ण योगदान था. वह पूरे एक युग तक बिहार के सर्वश्रेष्ठ पत्र के रूप में निकलता रहा और उसने ‘‘पाटलिपुत्र’’ के अभाव की अच्छी तरह पूर्ति भी कर दी थी.’ (नई धारा, अगस्त, 1956, पृष्ठ 83) इसी परिप्रेक्ष्य में देशपर चलाया गया मुकदमा भी उल्लेखनीय है जिसने पूरे प्रदेश के जनमानस को झकझोर दिया. सर्चलाइट प्रेस से प्रकाशित होनेवाले साप्ताहिक देशपर यह आरोप लगाया गया कि उसने माता की पुकारऔर विजय का साधननामक लेख प्रकाशित कर जनता को अंगरेजी सरकार का विरोध करने के लिए उकसाया है. तत्कालीन सरकार की नजर में उक्त दोनों लेख उत्तेजित करनेवाले थे जिससे जन असंतोष को बढ़ावा मिलता अथवा सामूहिक क्रांति का विस्फोट हो सकता था. अतः उन पर राजद्रोह का अभियोग लगाकर मुकदमा चलाया गया. मुकदमे की सुनवाई में प्रेस के संचालक श्री महावीर राम ने प्रकाशन के मामले में अपने को निरपेक्ष बतलाते हुए निर्दोष साबित कर दिया. लेकिन पारसनाथ त्रिपाठी ने भरी अदालत में कहा-


मैं देश का संपादक हूं और उसमें जो कुछ भी प्रकाशित हुआ है, उसके लिए मैं जिम्मेवार हूं. विजय की साधना और माता की पुकार शीर्षक लेख मेरे द्वारा लिखे गये हैं. मैं अपने को देश का विनम्र सेवक तथा असहयोग के मार्ग का अनुसरण करनेवाला मानता हूं. उसके सिद्धांतों के अनुसार मैं किसी भी जाति या संप्रदाय के लोगों के प्रति किसी घृणा या दुर्भावना को फैलाना पाप समझता हूं. इन निबंधों में ऐसा कुछ नहीं है जो उन सिद्धांतों के प्रतिकूल हो. अतः मुझ पर यह आरोप लगाया गया कि मैंने देश के पाठकों के मन में दुर्भावना पैदा की है तो मैं अपने को उससे मुक्त समझता हूं. लेकिन यदि अभियोग यह है कि मैंने इस देश की वर्तमान सरकार की व्यवस्था के विरुद्ध घृणा की भावना पैदा की है तो मुझे यह कहना है कि स्वराज्य में विश्वास करनेवाला प्रत्येक भारतवासी यथाशीघ्र वर्तमान शासन व्यवस्था को समाप्त करना अपना परम कर्तव्य मानता है और प्रत्येक असहयोगी का यह कर्तव्य है कि उस भावना का प्रचार करने, उसका समर्थन करने एवं सुदृढ़ करने हेतु क्रियाशील हो. मैं यह जानता हूं कि वर्तमान सरकार एक ऐसे देश, जो स्वराज्य के लिए बेचैन है, तथा उसके लोगों में ऐसी भावनाएं फैलाने के मार्ग में बाधा डालेगी. अतः उसके लिए मुझे कोई शिकायत नहीं. जो कुछ मैंने लिखा है वह जान-बूझकर और पूरे विश्वास के साथ लिखा है. मुझे आश्चर्य है तो इसपर कि सरकार को देश की तरह असहयोगी पत्र का पता मिलने में इतनी देर हुई. अदालत जो भी उचित समझे, मुझे सजा दे सकती है. मैं उसे सहर्ष स्वीकार करता हूं.


II जनता II

एक विद्वान के साथ ऐसा दुर्व्यवहार जनता की नजर में अपमानजनक था. अतः उसका आक्रोश में उबल पड़ना अस्वाभाविक नहीं था. इसलिए उसने हथकड़ियों और रस्से में जकड़े महापंडित राहुल का चित्र 11 मई, 1930 के मुखपृष्ठ पर छापा और लिखा, ‘राहुल जी चोर या कैदी? हाथ में हथकड़ी, कमर में रस्सा. जगतप्रसिद्ध विद्वान का यह श्रृंगार और किसके राज्य में?’ इसी अंक में उसने कुछ प्रबुद्ध नागरिकों की एतद्संबंधी सम्मतियां भी छापीं. जयप्रकाश नारायण ने लिखा था, ‘ऐसी कार्रवाइयों पर मिनिस्ट्री की चाहे जितनी आलोचना की जाय, थोड़ी है.पटवर्धन का विचार था- इस बात से अच्छा है कि मिनिस्ट्री इस्तीफा दे दे.डा. काशीप्रसाद जायसवाल का क्षोभ इस रूप में प्रकट हुआ था, ‘वह इसा-गौतम कोटि के हैं जिन्हें साहित्य में लाकर मैंने देश को एक दूसरे गांधी और जवाहर से वंचित रखा.ऐसे प्रबल विरोधों को सरकार झेल न सकी और विवश होकर उन्हें जेल से छोड़ना पड़ा. मुक्त होकर उन्होंने दूने जोश से अपनी दृढ़ता प्रकट की....मैं फिर अमवारी गांव जाऊंगा और भूखों की लड़ाई को अपने हाथों में लूंगा क्योंकि साहित्य अगर दिमागी ऐय्याशी का ही नाम नहीं है तो साहित्यकारों को मानव जीवन और संघर्षों में दिलचस्पी लेना ही होगा.
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राजू रंजन प्रसाद

पच्चीस जनवरी उन्नीस सौ अड़सठ को पटना जिले के तिनेरी गांव में जन्म. उन्नीस सौ चौरासी में गांव ही के श्री जगमोहन उच्च विद्यालय, तिनेरीसे मैट्रिक की परीक्षा (बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, पटना) उत्तीर्ण. बी. ए. (इतिहास ऑनर्स) तक की शिक्षा बी. एन. कॉलेज, पटना (पटना विश्वविद्यालय, पटना) से. एम. ए. इतिहास विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना से (सत्र 89-91) उन्नीस सौ तिरानबे में.
प्राचीन भारत में प्रभुत्त्व की खोज: ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष के विशेष संदर्भ में (1000 ई. पू. से 200 ई. तक) विषय पर शोधकार्य हेतु सन् 2002-04 के लिए आइ. सी. एच. आर का जूनियर रिसर्च फेलोशिप. मई, 2006 में शोधोपाधि. पांच अंकों तक प्रति औपनिवेशिक लेखन की अनियतकालीन पत्रिका लोक दायराका संपादन.
सोसायटी फॉर पीजेण्ट स्टडीज, पटना एवं सोसायटी फॉर रीजनल स्टडीज, पटना का कार्यकारिणी सदस्य. 
  • C-19,SRINAGAR,ASHIYANA NAGAR ,PATNA 800025
    • Patna, India 800025

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