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ओल्गा टोकार्चूक (Olga Tokarczuk) : साहित्य का नोबेल

Posted by arun dev on अक्तूबर 15, 2019























२०१९ के नोबेल के लिए जब ओल्गा टोकार्चूक (Olga Tokarczuk) की घोषणा हुई तो पहली प्रतिक्रिया यही हुई कि अरे इन्हें तो २०१८ का बुकर पुरस्कार मिला था. जिस तरह से ‘सलमान रुश्दी’ से भारतीय परिचित हैं ओल्गा से नहीं. हिंदी में उनके अनुवाद भी न्यूनतम हुए हैं. वे पन्द्रहवीं लेखिका (स्त्री) हैं जिन्हें यह पुरस्कार मिला है.

उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, बुकर और नोबेल पुरस्कारों  पर  विस्तार से चर्चा कर रहीं हैं विजय शर्मा



ओल्गा टोकार्चूक (Olga Tokarczuk) : साहित्य का नोबेल      
विजय शर्मा



2018 का बुकर जिसे मिला उसे इस साल (2019 में) का नोबेल भी मिल गया इसे कहते हैं छप्पर फ़ाड़ कर मिलना. जी हाँ, मैं साहित्य के नोबेल पुरस्कार की 15वीं स्त्री विजेता और पोलिश की पाँचवीं नोबेल विजेता की बात कर रही हूँ. समय के साथ नोबेल समिति के दृष्टिकोण में बदलाव हुआ है अब उन्हें स्त्री रचनाकार भी नजर आने लगी हैं.

जब मैंने फ़्लाइट्सपर काम करना शुरु किया, मैं उपन्यास की एक नई शैली खोज रही थी.’’ कहना है 2018 की बुकर पुरस्कृत साहित्यकार का. वे अपने कार्य को खगोलीय रूपक देना पसंद करती हैं और इसकी व्याख्या करती हुई कहती हैं कि जैसे प्राचीन लोग आकाश में तारे देखते थे और उन्हें विभिन्न समूहों में बाँटते का तरीका खोजते थे, उन्हें जीवों या अंकों के आकार से संबंधित करते थे,उनका भिन्न-भिन्न अर्थ निकालते थे, उसी तरह वे अपने उपन्यासों को तारामंडल उपन्यासकहना पसंद करती हैं. इन तारामंडल उपन्यासोंमें वे कहानियों, लेखों और रेखाचित्रों को परिक्रमा कक्ष में डाल देती हैं, और पाठक को अपनी कल्पनानुसार उन्हें अर्थपूर्ण आकार में ढ़ालने के लिए छोड़ देती हैं. और इस तरह वे बहुत सारे भिन्न विचारों, कहानियों, स्वरों को परस्पर संबंध स्थापित करने के लिए पाठकों पर छोड़ देती हैं. उनके उपन्यास पढ़ने के लिए पाठक का संस्कारित होना आवश्यक है.



2018 की बुकर व नोबेल पुरस्कार विजेता हैं, ओल्गा टोकार्चूक और उनकी जिस किताब को बुकर पुरस्कार के लिए चुना गया, उसका नाम है, फ़्लाइट्स. मूल पोलिश भाषा में १००८ में प्रकाशित उपन्यास का नाम है, ‘बेगुनी’ (Bieguni) और जिसका अर्थ होता है, घुमक्कड़, बंजारा, यायावर, जिप्सी. मगर उसकी इंग्लिश अनुवादक ने इसे नाम दिया है, ‘फ़्लाइट्स. आइए पहले कुछ शब्द अनुवाद और बुकर पर भी हो जाएँ.

पहले बुकर पुरस्कार की शर्त थी कि यह इंग्लिश में मौलिक उपन्यास लेखन हो, साथ ही इंग्लैंड में प्रकाशित हो. जिसे यह पुरस्कार प्राप्त होता है,स्वत:उसकी प्रसिद्धि बढ़ जाती है.यहाँ तक कि जिनका नाम बुकर की लॉन्गलिस्ट-शॉर्टलिस्ट में आ जाता है, उनकी भी वाह-वाह हो जाती है. पहले बुकर समिति लॉन्गलिस्ट प्रकाशित नहीं करती थी, केवल शॉर्टलिस्ट ही प्रकाशित करती थी. समिति २००१ से अपने द्वारा चुने हुए लेखकों की लॉन्गलिस्ट भी प्रकाशित करने लगी है. स्थापना के दूसरे ही वर्ष १९७० में इसने एक स्त्री लेखक बरनाइस रुबेन्स को दि इलैक्टेड मेम्बरके लिए पुरस्कृत किया. प्रारंभ में पुरस्कार राशिमात्र २१,००० पाउंड थी जो आज बढ़ कर ५०,००० पाउंड हो गई है. राशि के हिसाब से आज यह एक काफ़ी समृद्ध पुरस्कार है.

अपनी अर्मधसदी मना रहे बुकर पुरस्कार में आज कई परिवर्तन हो चुके हैं. पहले बुकर केवल कॉमनबेल्थ के नागरिकों के लिए ही उपलब्ध था,परन्तु २०१३ में इसे सब देशों के लिए उपलब्ध करा दिया गया है. लेकिन प्रकाशन संबंधी अन्य शर्तें अभी भी लागू हैं. पुस्तक का प्रकाशन इंग्लैंड में होना आवश्यक है. २०१६ से पहले मैन बुकर प्राइज़ केवल इंग्लिश में लिखने वाले साहित्यकारों को मिला करता था. मगर इस वर्ष से इसमें एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया. अब यह किसी भी देश के, किसी भी भाषा के इंग्लिश में अनुवादित, इंग्लैंड में प्रकाशित काम पर दिया जाएगा. एक और महत्वपूर्ण बात इस नए पुरस्कार में यह जुड़ी है, पुरस्कार राशि ५०,००० पाउंड रचनाकार और अनुवादक में बराबर-बराबर बाँटी जाएगी. अनुवादकों के लिए यह एक गौरवपूर्ण बात है. साथ ही शॉर्टलिस्टेड लेखकों और उनके अनुवादकों को १००० डॉलर की राशि भी प्राप्त होगी.

आइए, थोड़ी-सी बात इस साल के पुरस्कार के अनुवाद पर कर लें. फ़िट्ज़कैराल्डो एडीशन्स द्वारा प्रकाशित ओल्गा टोकार्चूक के उपन्यास फ़्लाइट्सको जेनीफ़र क्रोफ़्ट ने इंग्लिश में अनुवाद किया है. वे पोलिश, स्पैनिश और उक्रेनियन भाषा से इंग्लिश में अनुवाद करती हैं. उनके अनुसार जब स्लाविक भाषा से इंग्लिश में अनुवाद किया जाता है तो व्याकरण की बनावट के कारण अनुवाद मूल भाषा से लंबा हो जाता है. लेकिन जब स्पैनिश भाषा से अनुवाद होता है तो यह मूल से छोटा होता है. पोलिश और अर्जेंटीना की साहित्यिक संस्कृति भी बहुत भिन्न है. अर्जेंटीना के लेखक बहुत स्वतंत्र होते हैं, जबकि पोलिश भाषा के लेखक कई सदियों की परम्परा से बँधे हुए, करीब-करीब दास जैसे हैं. ऐसा है क्योंकि उनके इतिहास भिन्न-भिन्न हैं. 


प्रथम विश्व युद्ध के बाद से पोलिश भाषा-साहित्य का मुख्य प्रोजेक्ट राष्ट्र का पुनर्निर्माण रहा है. सोवियत शासन के दौरान बहुत सारे उत्तम लेखकों ने देश बाहर रह कर लेखन किया. दोनों ही देश कैथोलिक देश हैं लेकिन दोनों की संस्कृति बहुत अलग-अलग है. लेकिन कुछ दिनों पूर्व यह विडम्बना है कि पोलैंड में पोलिश साहित्यिक लेखकों को प्रमोट करने का अनुदान का बजट काम कर दिया गया था इसीलिए ओल्गा की अनुवादक जेनीफ़र क्रोफ़्ट को अमेरिका पीईएन ने ओल्गा के द बूक्स ऑफ़ जेकबके लिए ट्रांसलेशन फ़ंड ग्रांट मुहैय्या कराया ताकि किताब इंग्लिश भाषी पाठकों के साम्क्ष आ सके. इंग्लिश पीईएन के रॉबर्ट शार्प का कहना है कि फ़्री स्पीच को बढ़ावा देना, किसी को स्वर देना दुनिया का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य है. खासकार जब दुनिया में समझ और तदानुभूति की इतनी अधिक आवश्यकता है.

जेनीफ़र क्रोफ़्ट को ओल्गा टोकार्चूक के काम का अनुवाद करना बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि ओल्गा टोकार्चूक अपने चरित्रों से मनोवैज्ञानिक तरीके से व्यवहार करती हैं, उनका काम बहुत सटीक और प्रभावकारी है. इसे अनुवादित करते हुए उन्होंने अपने कम्प्यूटर के सामने बैठ कर खूब यात्रा की तथा इससे उन्हें अपनी यात्रा के बारे में पुनर्विचार करने का अवसर भी मिला. हमारे यहाँ अनुवाद को महत्व नहीं दिया जाता है. पैसों की तो कुछ पूछिए ही मत, यहाँ तक कि बहुत सारे प्रकाशक अनुवादक का नाम भी प्रकाशित करना गँवारा नहीं करते हैं. काश हमारे यहाँ भी बुकर की भाँति अनुवाद के महत्व को समझा-स्वीकारा जाता. फ़्लाइट्सकी अनुवादक जेनीफ़र क्रोफ़्ट अमेरिका में जन्मी (१९८१), उनके अनुवाद न्यू यॉर्क टाइम्स, एलैक्ट्रिक लिटरेचर, द न्यू रिपब्लिक आदि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं. वे द ब्यूनस एरिस रिव्यूपत्रिका की संस्थापक एडीटर हैं.

ओल्गा टोकार्चूक पोलैंड के सुलेशो नामक स्थान में २९ जनवरी, १९६२ को जन्मी. अब तक उनके दो कहानी संग्रह और आठ उपन्यास प्रकाशित हैं. उनके साहित्य का विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है. फ़्लाइट्सउन्होंने २००८ में लिखा था और उसके बाद उन्होंने तीन और उपन्यासों के अलावा काफ़ी और कुछ लिखा. उन्हें लगा कि इस उपन्यास का समय बीत चुका है क्योंकि आज किसी भी उपन्यास का जीवन मात्र कुछ महीने का होता है और फ़िर नई किताबें आ जाती हैं. अब तक यह उनके दिमाग से निकल चुका था मगर पुरस्कार की घोषणा से उन्हें इसकी फ़िर से याद दिला दी. उनका कहना है कि यह बहुत सटीक लिखा गया है. यदि उन्हें यह फ़िर से लिखना पड़े तो भी वे उसको तनिक भी नहीं बदलेंगी. उन्हें पोलैंड के सर्वोच्च सम्मान नाइके अवार्ड से दो बार (२००८ तथा २०१५ में) नवाजा जा चुका है. इसके साथ उन्हें बहुत सारे अन्य पुरस्कार-सम्मान प्राप्त हुए हैं. अब बुकर प्राप्त होने से पूरी दुनिया से उन्हें बधाइयाँ मिल रही हैं जाहिर-सी बात है, उनके पाठकों की संख्या में अभूतपूर्व इजाफ़ा होगा.

पाँच निर्णायकों की समिति ने बुकर का फ़ैसला किया जिसमें हमारे एक लेखक हरि कुंज़रू भी शामिल थे. निर्णायकों के अनुसार, ‘फ़्लाइट्सलगातार चलती रहने वाली समकालीन जीवन शैली है जिसका सार है, निरंतर चलते रहना, यह कभी अपने शरीर के बाहर नहीं जाने के बारे में भी है शरीर जो स्वयं गतिशील है और अंतत: मरणशील है. यह किताब बंजारापन के बारे में है, यह पलायन के बारे में है, जगह-जगह लगातार यात्रा में होने के बारे में है और एयरपोर्ट्स पर जीने के बारे में है. इसके साथ ही हम एक शरीर में रहते हैं और शरीर का अंत मृत्यु में है, जिससे बच नहीं सकते हैं. साथ ही यह आश्चर्यजनक रूप से खिलंदड़ी है, विट तथा विडम्बना से परिपूर्ण.’ ओल्गा टोकार्चूक बुकर से नवाजी जाने वाली पहली पोलिश लेखक हैं.

टोकार्चूक विभिन्न अल्पसंख्यकों को स्वर देती हैं और खुद को सेंट्रल यूरोपियन लेखक मानती हैं जो पोलिश भाषा में लिखती है. इंग्लैंड और वेल्स में पोलिश दूसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है. अत: २०१७ के लंदन बुक फ़ेयर के बाजार का फ़ोकसपोलिश भाषा थी. पुस्तक मेले में पोलैंड के पाँच नोबेल पुरस्कृत साहित्यकार मौजूद थे. छठवीं भी वहाँ थी हालाँकि उनका नोबेल तब गर्भ में था. उस मेले में उन्होंने जो बात कही उससे हलचल मच गई. ओल्गा टोकार्चूक ने कहा कि वे भाषा को एक उपकरण की भाँति व्यवहृत करती हैं, काँटा-छुरी की तरह जब आपको यथार्थ खाना हो. यूरोज़ीनमें उन्होंने पोलिश भाषा के इतिहास, व्याकरण और उसकी यात्रा पर विस्तार से लिखा है, जिसका इंग्लिश अनुवाद १६ जनवरी २०१४ को प्रकाशित है.

आजकल ओल्गा टोकार्चूकके उपन्यास द बुक्स ऑफ़ जैकबका अनुवाद कर रही जेनीफ़र क्रोफ़्ट १५ साल से ओल्गा के काम की अनुवादक होने के साथ-साथ उनकी मित्र भी हैं. उनके अनुसार इंग्लिश कार्य को अमेरिका तथा इंग्लैंड में प्रकाशित कराना टेढ़ी खीर रहा है. प्रकाशक फ़्लाइट्सको प्रकाशित करने में हिचकिचा रहे थे. दस साल लग गए इसे इंग्लिश में आने में. अब चूँकि यह बुकर द्वारा पुरस्कृत हो चुका है इसकी पहुँच दुनिया भर के पाठकों तक आसानी से होगी. आशा है जल्द ही यह हिन्दी में भी उपलब्ध होगा. वैसे उनकी कहानियों का एक संग्रह हिन्दी में कमरे तथा अन्य कहानियाँ नाम से प्रकाशित हो चुका है.

और 2019 में ज्योंहि उन्हें 2018 का नोबेल दिए जाने की घोषणा हुई व्रोकोला शहर के अधिकारियों ने घोषणा की, इस वीकेंड में जो भी ओल्गा की किताब ले कर चलेगा वह पब्लिक ट्रांसपोर्ट में मुफ़्त यात्रा कर सकेगा. कुछ दिन पूर्व इस शहर ने उन्हें ऑनरेरी नागरिक बनाया है. वे अपना समय इस शहर और क्रैजानाव में बिताती हैं.

नोबेल समिति ने उन्हें नोबेल दिए जाने की अनुशंसा में कहा,‘ 


ऐसी कथनात्मक कल्पनाओं के लिए जो विशाल भावातिरेक के साथ सीमाओं को लाँघते हुए जीवन की विधि को प्रस्तुत करता है.

फ़्लाइट्सइक्कीसवीं सदी में यात्रा का और मानव शरीर-रचना का उपन्यास है. शरीर के अंगों को सुरक्षित रखने के विज्ञान से संबंधित इस उपन्यास में अलग-अलग कहानियाँ हैं जो आपस में संबंधित भी हैं. ओल्गा कहती हैं कि हम अपने शरीर के विषय में कितना कम जानते हैं. एक कहानी सत्रहवीं सदी के वास्तविक डच शरीर-विच्छेदन वैज्ञानिक फ़िलिप वेर्हेयिन की है जो अपनी विच्छेदित टांग के चित्र बनाता है और इस प्रक्रिया में एचिलस टेन्डन को खोज निकालता है. अट्ठारहवीं सदी से एक कहानी है जिसमें उत्तरी अफ़्रीका में जन्में दास और ऑस्ट्रेलिया के कोर्ट में रहने वाले को मरने के बाद उसकी बेटी इस बात का जबरदस्त विरोध के बावजूद भूसा भर कर प्रदर्शन के लिए रख दिया गया है. यहाँ शॉपिन का दिल है जिसे उसकी बहन एक मर्तबान (जार) में कस कर बंद कर अपने स्कर्ट में छिपा कर पेरिस से वार्सा ले जा रही है ताकि उसे वहाँ, उसके प्रिय स्थान में दफ़नाया जा सके. 

आज के उथल-पुथल वाले समय में एक पत्नी अपने एक बहुत उम्र दराज प्रोफ़ेसर पति के साथ यात्रा कर रही है जो यूनानी टापुओं पर क्रूज शिप पर एक कोर्स पढ़ा रहा है.एक पोलिश स्त्री जो किशोरावस्था में न्यूज़ीलैंड प्रवास पर चली आई है, उसे पोलैंड लौटना है ताकि वह हाईस्कूल के अपने प्रेमी को जहर दे कर समाप्त कर सके क्योंकि वह अब लाइलाज बीमारी से ग्रसित है. एक युवा पति अपनी पत्नी और बच्चे के रहस्यमय ढ़ंग से गायब होने के कारण धीरे-धीरे पागलपन की ओर सरक रहा है और जिसकी पत्नी और बच्चा जैसे रहस्यमय तरीके से गयब हुए थे वैसे ही लौट आते हैं बिना कोई कारण बताए. उपन्यास आधुनिकता की सतह के पार जा कर मानव के स्वभाव की गहराइयों की सैर कराता है. हम धरती पर दूर-दूर तक घूम आते हैं यहाँ तक की चाँद पर भी चले जाते हैं मगर अपने ही जिगर के आकार को नहीं जानते हैं.

मोबी डिकको अपना पसंददीदा उपन्यास मानने वाली उपन्यासकार को इस बात से आश्चर्य होता है कि कैसे लोग शरीर से प्रारंभ कर शरीर विज्ञान तक पहुँचे. सत्रहवीं सदी में यह होलैंड में खूब विकसित हुआ. जब वे यह उपन्यास लिख रही थीं उन्हें कुछ समय होलैंड में गुजारने का अवसर मिला. इस समय का उपयोग उन्होंने वहाँ के अजायबघर और पुस्तकालयों में गुजार कर किया. वहाँ उन्होंने मानव टिश्यू के संरक्षण को देखा जिसे वे अमर्त्व की ललक का रूपक मानती हैं. 

फ़्लाइट्सछोटी-छोटी कहानियों का संग्रह है जो अंतर्गुंफ़ित हैं. द वर्ल्ड इन योर हैड’, ‘योर हैड इन द वर्ल्ड’, ‘कैबिनेट ऑफ़ क्यूरिओसिटीज’, ‘एवरीव्हेयर एंड नोव्हेयर’, ‘द साइकॉलॉजी ऑफ़ एन आइइलैंड’, ‘बेली डान्स’, ‘प्लेन ऑफ़ प्रोफ़्लीगेट्स’, ‘एयर सिकनेस बैग्स’, तथा एम्पीथियेटर इन स्लीपइसके विभिन्न भागों के उपशीर्षक हैं. उनकी रचनाओं में मिथकीय लहजा अनायास ही आ जाता है. ओल्गा के अनुसार हम एक ऐसी सनकी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ उपन्यास की पुनर्परिभाषा आवश्यक है, आज शुरु से आखीर तक एकरैखीय शैली में कहानी कहना असंभव है. उपन्यास ऐसा ही है जैसे हम टेलीविजन के चेनल्स बदलते रहते हैं. वे मानती हैं कि यह शैली कुछ पाठकों को चौंकाने वाली थी. 


ओल्गा के अनुसार मनुष्य यात्रा करते हैं बर्बर लोग नहीं, वे तो केवल जाते हैं और आक्रमण करते हैं.

नोवा रुडा के नजदीक एक छोटे से गाँव में रहने वाली ओल्गा टोकार्चूक के माता-पिता दोनों ही साहित्य के शिक्षक रहे हैं. उनके पिता पोलैंड के उस भाग से आए शरणार्थी थे जो आज युक्रेन का हिस्सा है. वे जिस टापू में रहते थे वहाँ वामपंथ के बौद्धिक रहते थे मगर वे लोग कम्युनिस्ट नहीं थे. ओल्गा साहित्य रचने के अलावा दूसरों के साथ मिल कर अपने घर के नजदीक साहित्यिक समारोह भी मनाती हैं, एक निजी प्रकाशन गृह रुटाचलाती हैं. वे द ग्रीनपोलिटिकल पार्टी की सदस्य हैं तथा वामपंथी विचारों का पोषण करती हैं. तारामंडल उपन्यास’ (कॉस्टेलेशन नॉवेल) का प्रारंभ उनके २००३ में लिखे उपन्यास हाउस ऑफ़ डे, हाउस ऑफ़ नाइटसे हुई जिसका इंग्लिश अनुवाद २००८ में आया. १९९६ में उनका उपन्यास प्राइमेवल एंड अदर टाइम्सप्रकाशित हुआ जिसका इंग्लिश अनुवाद २००९ में प्रकाशित हुआ. इंग्लिश में भले ही ओल्गा टोकार्चूक की ख्याति अब हो रही हो लेकिन अपने देश में एक्टिविस्ट ओल्गा बहुत पहले से सेलेब्रेटी और कॉन्ट्रोवर्सियल रही हैं. उनके मुँह से निकले शब्द अखबारों की हेडलाइन्स बनते हैं. घोषित नारीवादी एवं शाकाहारी ओल्गा स्वयं को वे देशभक्त मानती हैं, उनका कहना है कि आज समय आ गया है जब हमें यहूदियों का पोलैंड के साथ संबंध देखना है.


मनोविज्ञान को अपने लेखकीय कार्य की प्रेरणा मानने वाली ओल्गा ने लिखना प्रारंभ करने के पूर्व वार्सा यूनिवर्सिटी से मनोविज्ञान में शिक्षा प्राप्त की. वे स्वयं को जुंग का शिष्य मानती हैं. शिक्षा के बाद उन्होंने एक संस्थान में युवाओं की व्यावहारिक समस्याओं के लिए थेरिपिस्ट का काम प्रारंभ किया लेकिन शीघ्र ही उन्होंने यह काम छोड़ दिया, उन्हें लगा कि वे खुद अपने मरीजों से अधिक न्यूरोटिक हैं. असल में वे अपने एक मरीज के साथ काम कर रही थीं और तब उन्हें लगा कि वे मरीज से ज्यादा परेशान हैं, और पाँच साल के बाद वे यह काम छोड़ कर लिखने की ओर मुड़ गई. उन्होंने अपने साथी मनोवैज्ञनिक से शादी की और उनका एक बेटा है.

इसके बाद वे पूरे समय भाषा को एक मिशन की तरह प्रयोग करने के लिए लिखने में जुट गईं. उनका काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ और जल्द ही द जर्नी ऑफ़ द पीपुल ऑफ़ द बुक नाम से एक उपन्यास भी. यह उपन्यास १७ वीं सदी के फ़्रांस में स्थापित है और इसके लिए उन्हें डेब्यू बेस्ट लेखक का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. अपनी उम्र के तीसरे दशक के मध्य में उन्हें लगा कि एक ब्रेक की जरूरत है, उन्हें घूमना चाहिए. कम्युनिस्ट शासन के दमन से छुटकारा पाने का यह एक अच्छा उपाय था. वे निकल पड़ीं. तायवान से ले कर न्यूज़ीलैंड तक की उन्होंने यात्राएँ कीं. इन्हीं यात्राओं का प्रतिफ़ल है फ़्लाइट्स. उनके लेखन पर कई अन्य लेखकों के अलावा मिलान कुंडेरा का प्रभाव माना जाता है.

बचपन में टेबल के नीचे छुप कर दूसरों की बात सुनने वाली ओल्गा टोकार्चूक को जब नोवा रुडा की सम्मानित नागरिकता प्रदान की गई तो नोवा रुडा पेट्रिओट्स एसोशिएशनने उन पर आक्रमण किया और चाहा कि उनसे यह सम्मान वापस ले लिया जाए. इन लोगों का मानना है कि ओल्गा ने पोलिश राष्ट्र का नाम कालंकित किया है. उन्हें देशद्रोही माना. ९०० पन्नों के उपन्यास द बुक्स ऑफ़ जेकब के बाद उन्हें मारने की धमकियाँ मिलने लगीं. स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उनके प्रकाशक को उनकी सुरक्षा के लिए बॉडीगार्ड रखने पड़े. इस काल के लिए उनका कहना है कि वे बहुत अनुभवहीन थीं और सोचती थीं कि अपने इतिहास के अंधकाल पर विचार-विमर्श कर सकती हैं. इस उपन्यास के बारे में उनका कहना है, उन्होंने इतिहास के उस अध्याय को खोला जो कई दृष्टियों से निषिद्ध था. जिसे कैथोलिक, यहूदियों तथा कम्युनिस्टों ने छिपा रखा था. इस उपन्यास को लिखने के लिए उन्होंने आठ लंबे साल शोध किया, विषय ही इतना नाजुक और विवादास्पद था. क्योंकि आज पोलिश अस्मिता, पोलिश पहचान मुख्य रूप से रोमन कैथोलिक है.

कुछ दिनों के बाद वे एक अन्य विवाद में फ़ँस गई. उनके २००९ के उपन्यास ड्राइव योर प्लॉ ओवर द बोन्स ऑफ़ द डेड पर पोकोट (इंग्लिश में स्पूर) नाम से एक फ़िल्म बनी. इसे बर्लिन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखाया गया और इसे 'सिल्वर बेयर' सम्मान मिला. इसकी पटकथा स्वयं उन्होंने फ़िल्म निर्देशक एज्निस्ज़्का हॉलैंड के साथ मिल कर लिखी है. इस फ़िल्म को पोलिश न्यूज एजेंसी ने ईसाइयत के खिलाफ़ और पर्यावरण आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली कहा. ड्राइव योर प्लॉ ओवर द बोन्स ऑफ़ द डेडथ्रिलर इंग्लिश में शीघ्र पाठकों के हाथ में आने वाली है. इसमें सुदूर गाँव में रहने वाली एक सनकी वृद्धा की जिंदगी को उथल-पुथल होते दिखाया गया है. असल में जब यह स्त्री पहले एक पड़ौसी, फ़िर पुलिस चीफ़ और इसके बाद एक बड़े स्थानीय व्यक्ति को वह बुरी तरह चीथ कर मरा हुआ पाती है तो उसकी जिंदगी में भूचाल आ जाता है.


लेखन को हथियार मानने वाली ओल्गा का पुरस्कृत उपन्यास फ़्लाइट्सबताता है, कैसे यायावरी और उसके विपरीत स्थिरता से संबंध बनाया जाता है. इसी को ले कर कहानियाँ रची गई हैं. रूसी अनुष्का समर्पित गृहिणी है, अपने बीमार बेटे की सेवा में लगी हुई, प्रेम विहीन दाम्पत्य में फ़ँसी हुई. वह एक अंधेरे-हताशा भरे सोवियत अपार्टमेंट में रहती है. सप्ताह में एक दिन उसकी सास बच्चे की देखभाल के लिए आती है तो वह घर के कई काम निपटाने शहर जाती है. एक बार वह अपनी अपंग जिंदगी से भाग निकलती है लेकिन उड़ान भरने के बाद उसे मालूम नहीं है कहाँ जाए. गृहविहीन वह कई दिन मेट्रो में चक्कर लगाती रहती है. उपन्यास ऐसी ही अलग-अलग तरह की यात्राओं से परिपूर्ण है. ऐसी ही एक पर्दानशीन स्त्री एकालाप करती रहती है. उसका स्वर बहुत शक्तिशाली है. शायद इसीलिए इस लेखिका को थिंकिंगउपन्यासकार की श्रेणी में रखा जाता है. 

उपन्यास में मेन्गेले जैसा डॉक्टर ब्लाऊ है जिसे शरीर के अंगों को काटना भाता है. अगर उसका बस चलता तो वह भिन्न दुनिया बनाता जहाँ आत्मा मर्त्य होती, क्या काम है आत्मा का? क्यों चाहिए होती है यह हमें? और शरीर अमर्त्य होता. लिखने के बिना मैं जिंदा नहीं रह सकती हूँ, क्योंकि और कुछ  नहीं कर सकती हूँ’, ‘लिखने के साथ जिम्मेदारी आती है. कभी-कभी जिसे वे अपनी पीठ पर अनुभव करती हैं.

कहना है ओल्गा का. जानकारों के अनुसार फ़्लाइट्सगहन है, और धीमी गति से पढ़ा जाने वाला उपन्यास है. ओल्गा टोकार्चूक हमारे संशयग्रस्त भविष्य में नजरे गड़ाए हुए हैं जहाँ हम तेजी से भाग रहे हैं. उनके अनुसार पोलिश सभ्यता में सदा से यहूदी विरोधी प्रच्छन्न स्वर रहा है. भयंकर दमन होता रहा है. इसीलिए वे यहूदियों के साथ पोलैंड के रिश्ते को नई रोशनी में देखना चाहती हैं. वे चाहती हैं, लोग स्वीकारें कि उनके भीतर यहूदी रक्त है, पोलिश संस्कृति मिश्रण है. इसी कारण से कुछ लोग उनसे बहुत ज्यादा क्रोधित हैं. उन्हें लगता है कि समाज दो भाग में विभक्त है, लोग जो पढ़ सकते हैं, लोग जो नहीं पढ़ सकते हैं. ये विचार हमारे अपने देश, हमारे समाज पर भी सटीक बैठते हैं. 


उनके अनुसार राष्ट्रवाद कहीं नहीं बढ़ रहा है, आज लोग यात्राएँ कर रहे हैं, विदेशों में बस रहे हैं. आर्थिक कारणों तथा इंटरनेट देश की सीमाओं को नहीं स्वीकारता है. हम घर बैठे ही विभिन्न नेटवर्क प्रोवाइडरों के बीच घूमते रहते हैं. 


उनके अनुसार आप फ़्लाइट्सको पुराने यूरोप के एक गीत की भाँति भी पढ़ सकते हैं. एक अनाम स्त्री के साथ बेचैनी के साथ दुनिया की यात्रा कर सकते हैं. स्त्री जिसकी निजी जिंदगी के बारे में वह खुद कुछ खास नहीं पाती है. उसका स्व तेज रफ़्तार में घुल गया है. यहाँ तक कि उसकी यात्रा का उद्देश्य भी पाठक को ज्ञात नहीं होता है. जिसे अपना भावनात्मक तथ्य बसों के हिलने-डुलने, हवाई जहाज की गड़गड़ाहट, ट्रेन और नाव के डोलने में मिलता है. उपन्यास में कुछ और अनसुलझी कहानियाँ हैं, कुछ काल्पनिक, कुछ ऐतिहासिक जिनका इस अनाम यात्री से कुछ लेना-देना नहीं है. उपन्यासकार ने मानव शरीर संरक्षण के बारे खूब ज्ञान इकट्ठा किया है. उनकी यह यात्री जिस स्थान पर जाती है वहाँ के म्युजियम में संरक्षित मानव शरीर, भ्रूण को देखना नहीं भूलती है. वे शरीर संरक्षण के बारे में भी काफ़ी कुछ बताती हैं. ओल्गा की किताबें मिश्रित संस्कृति, पोलैंड का सर्वोत्तम इश्तेहार हैं.

अब नोबेल की ख्याति विवादास्पद रचनाकारों को पुरस्कृत करने के लिए भी होने लगी है. 2019 के लिए पीटर हैंडके को साहित्य का पुरस्कार दिया है, वे भी बहुत विवादित रहे हैं. उन्होंने पहले खुद भी नोबेल पुरस्कार की आलोचना करते हुए 2014 में कहा था कि साहित्य का नोबेल पुरस्कार बंद हो जाना चाहिए क्योंकि जिसको भी ये मिलता हैलगता है मानो, उसको संत की झूठी उपाधि मिल जाती है. और अब यह संत की झूठी उपाधि पा कर वे कैसा अनुभव कर रहे हैं जानना रोचक होगा. खैर, समालोचन के माध्यम से दोनों विजेताओं- ओल्गा टोकार्चूक तथा पीटर हैंडके को बधाई!
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डॉ. विजय शर्मा
326, न्यू सीताराम डेरा, एग्रीको
जमशेदपुर–831009
Mo. 8789001919, 9430381718
Email :vijshain@gmail.com

संजय कुंदन की कविताएं

Posted by arun dev on अक्तूबर 14, 2019


कविता कवि और उसके परिवेश के बीच आकार लेती है. समर्थ कविताएँ अपने समय से टकराती हैं, बहुस्तरीय, दृश्य-अदृश्य, और जटिल सत्ताओं को समझने का प्रयास करती हैं. सत्ता ही राजनीति है. सभी कविताएँ इस अर्थ में राजनितिक कविताएँ ही हैं. प्रेम कविताएँ भी. आज प्रेम से बड़ी राजनीति क्या है ? और मृत्यु अगर स्वाभाविक नहीं है तो वह भी किसी न किसी प्रकार की राजनीति की ही देन है.

संजय कुंदन हमारे समय के ऐसे ही कवि हैं जिनकी कविताएँ अलंकारविहीन गद्य में भाषा की सच्चाई के सहारे सर्वव्यापी सत्तामूलक समय को प्रत्यक्ष करती चलती हैं. उनकी कुछ नई कविताएँ आपके लिए.





संजय कुंदन की कविताएं               



मॉब लिंचिंग के मृतक का बयान 
(मंगलेश डबराल से क्षमायाचना सहित) 

उस दिन जिसने मेरी कुंडी खटखटाई थी
वह मेरा पड़ोसी था जो मेरे लिए
हर समय थोड़ी सुरती बचाकर रखता था
और जिसने मां की गाली देते हुए मुझे बाहर घसीटा था
वह मेरे दोस्त का भतीजा था
जिसकी बहती नाक मेरी मां कई बार पोंछा करती थी
उसके छुटपन में

मुझे लगा सब मिलकर मजाक कर रहे हैं
पर मैंने जब बाहर और लोगों को खड़े देखा
तब मुझे थोड़ा ताज्जुब हुआ

उस शख्स के हाथ में सरिया था
जो कभी मुझे अपना दाहिना हाथ बताता था
जिसके कंधे पर लाठी थी
वह मेरे कंधे पर कई बार सिर रखकर रोया था

जो साइकिल की चेन लिए था
वह कई बार मुझे साइकिल पर बिठा
मेला घुमाने ले गया था
जिसके हाथ में चप्पल थी
वह आए दिन मेरी चप्पल मांगकर ले जाता था

वह भी खड़ा था    
जो कबूतरों को बिला नागा दाना-पानी दिया करता था
वह भी था
जो अकसर भिखारियों के लिए भंडारा करता था

जब मेरे ऊपर पहली लाठी पड़ी
तो मेरी आंखें अपने आप बंद हो गईं
आंख मुंदने से पहले मैंने उनकी आंखों में झांका था   
उन आंखों में उस दिन जो दिखा उसे बता सकना मुश्किल है
वे किसी आदमजात की नजरें नहीं हो सकती थीं

मैं चिल्लाकर भी क्या करता
अब तक हर मुश्किल में इन्हीं को आवाज दिया करता था
अब जबकि यही लोग मेरी जान लेने पर उतारू थे
मै किसको बुलाता
सो मैं आखिरी इबादत में लग गया

मुझे सड़क पर पड़ा छोड़
वे इस तरह लौटे 
जैसे उन्होंने मुझे अपने भूगोल और इतिहास
से बाहर फेंक दिया हो
मैं उनकी संस्कृति में एक गांठ की तरह था 
जिसे काटकर निकाल दिया गया
मैं अंतरिक्ष से टपका एक
खतरनाक उल्कापिंड था
जिसे चूर-चूर कर दिया गया 

इधर वे लौट रहे थे
उधर मैं मशहूर हो रहा था
कई अजनबी जुबानों पर मेरा नाम था
लोग वाट्सऐप पर मेरी हत्या का विडियो देख रहे थे
मेरी मौत एक तमाशा बन गई थी
एक हॉरर फिल्म की तरह उसे देखा जा रहा था

कुछ लोग मुग्ध थे हत्यारों के हुनर पर
कुछ ऐसे भी थे जिनका
गला रुंध गया था मुझे तड़पता देखकर
वे बेहद डर गए थे
उन्होंने बाहर खेल रहे अपने बच्चों को अंदर बुलाया
और जल्दी से दरवाजे और खिड़कियां बंद कर लीं
कि कहीं मेरे जैसा कोई और
भीड़ से बचकर भागता हुआ
पहुंच न जाए उनके पास
और हाथ जोड़कर कहे
मुझे छुपा लो अपने घर में.




कवि और कारिंदा

कवि ही कविता नहीं गढ़ता
कविता भी गढ़ती है कवि को 

कवि जब शब्दों को काट-छांट रहा होता है 
शब्द भी तराश रहे होते हैं उसकी आत्मा
हर कविता के बाद 
थोड़ा बदल जाता है कवि
   
वह दुनियादारी की एक सीढ़ी और
फिसल जाता है
बाजार से गुजरता हुआ
थोड़ा और कम खरीदार नजर आता है 

इतना मीठा बोलने लगता है 
कि पक्षी उसके कंधे पर चले आते हैं

इतना तीखा बोलने लगता है  
कि व्यवस्था के कान छिल जाते हैं 

जो गढ़े जाने से इनकार करता है 
वह कवि नहीं कारिंदा होता है.



मेरा शरीर

काश! इसे पटरी पर रख निकल लेता
या किसी बस की सीट पर छोड़ आता

मेरा शरीर मुझे डराने लगा है 
जब मैं किसी स्वप्न की सीढ़ियां 
चढ़ रहा होता 
मेरे कान में फुसफुसाता
मुझे अभी इसी वक्त 
थोड़ा लोहा चाहिए और चूना भी

कभी कहता
मेरा नमक कम हो रहा है 
मैं भहराकर गिर जाऊंगा

यकीन नहीं होता यह वही है
जिसे जूते की तरह पहन 
मैं भटकता रहा हूं 
पथरीली राहों पर

जिसने मेरे साथ खाक छानी 
वही अब मेरी सारी उड़ानें 
छीन लेना चाहता है.



  

सड़क 

एक बीमार या नजरबंद आदमी ही जानता है 
सड़क पर न निकल पाने का दर्द 

सड़कों से दूर रहना हवा, पानी, धूप 
और चिड़ियों से अलग 
रहना नहीं है,
यह मनुष्यता से भी कट जाना है

सड़कें कोलतार की चादरें नहीं हैं
वे सभ्यता का बायस्कोप भी हैं 

कोई इंसान आखिर एक मशीन से 
कब तक दिल बहलाए 
कब तक तस्वीरों में खुद को फंसाए

जिंदगी की हरकतें देखे बगैर 
हमारी रगों में लहू थकने लगता है
सूखने लगता है आंखों का पानी

मनुष्य को मनुष्य की तरह जीते 
देखने के लिए 
ललकता है मन 
इसलिए हम उतरते हैं सड़क पर
सिर्फ परिचितों के लिेए नहीं 
अपरिचितों के लिए भी 

अच्छा लगता है 
सड़क पर लोगों को देखना 
किसी को कहीं से आते हुए
किसी को दूर जाते हुए
कोई थका-हारा. 
कोई हरा-हरा
कोई प्रतीक्षा की आंच में पकता 
कोई किसी से मिल चहकता
 कोई खरीदारी करते हुए
कोई बाजार को चिढ़ाते हुए  

घर से सड़क और सड़क से घर आना 
पृथ्वी के घूर्णन की तरह 
हमारी गति है   



अल्पमत 

मैं अल्पमत में उसी दिन आ गया था
जिस दिन सुलग उठा था 
प्रेम की आंच में 

बहुमत को पसंद नहीं था 
कि मेरे हाथ डैनों की तरह लहराएं 
और मेरे होंठों से शब्द 
सीटियां बजाते हुए आएं 

मैंने उनके लिए भी सपने देखे 
जिन्होंने मेरे लिए फंदे बुने

जो मेरे देश निकाले पर था अड़ा हुआ
मैं उसके भी अधिकारों के पक्ष में खड़ा हुआ

मैं थोड़ा और ज्यादा अल्पमत में आ गया
जिस दिन कविता की पहली सीढ़ी चढ़ गया

जब मैंने सच-सच लिखा
तो झूठ के नशे में डूबे बहुमत ने कहा
कवियों को कुछ नहीं पता

मुझे षडयंत्रकारी, तरक्की के रास्ते का रोड़ा 
और व्यवस्था का फोड़ा बताया गया

बहुमत ने कहा
इस देश में रहना है 
तो हमारे नायक के गुण गाओ
तुम भी हमारे साथ आ जाओ 

पर मैंने सच का साथ नहीं छोड़ा 
जिन घरों से दुत्कारा गया
वहां भी मातमपुर्सी में जरूर गया

चुनाव नतीजों के बाद
मैं भारी अल्पमत में हूं 

मैं आज भी कविताएं लिखता हूं
मैं आज भी प्रेम करता हूं. 




शरणार्थी 

ऐसा नहीं कि
मेरे इलाके की जमीन बंजर हो गई
ऐसा भी नहीं कि
नदियां बंधक बना ली गईं
फिर भी मैं हो रहा विस्थापित

विस्थापन एक जगह से उजड़ना भर नहीं है
किसी के मन से निकाल दिया जाना भी है विस्थापन

जो कभी रोये मेरे कंधे पर सिर रख
जिनके कंधे पर मैं सिर रख रोया
वही मुझे फिर से पहचानने में लगे हैं 
मुझे दोबारा-तिबारा पहचाना जा रहा है 

कितना अजीब है 
जो मेरे रोयें की गंध भी पहचानते हैं 
वे बार-बार मेरा परिचय पूछ रहे हैं 

वे हमें रोज अपने मन से 
थोड़ा-थोड़ा बाहर कर रहे

धीरे-धीरे धकियाया जाता हुआ मैं गिर जाऊंगा
संबधों के सीमान के बाहर
तब यहां मेरा कोई परिचित नहीं रह जाएगा
सिवाय कुछ आवारा कुत्तों के

मैं भी खतरनाक माना जाऊंगा
जैसे खतरनाक माने जा रहे हैं
दुनिया भर के शरणार्थी 

ऐसे समय जब शरणार्थियों के लिए 
दुनिया भर में ऊंची की जा रही दीवारें 
मैं कहां लूंगा शरण  
मुझे कौन गाड़ने देगा तंबू 
अपनी आत्मा के प्रदेश में?

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