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हस्तक्षेप : वैज्ञानिक शोध पत्रिकाएँ हिंदी में क्यों नहीं छपती हैं ? आशीष बिहानी

Posted by arun dev on जुलाई 24, 2017














आशीष बिहानी हिंदी के कवि हैं और ‘कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र’ (CCMB), हैदराबाद में जीव विज्ञान में शोधार्थी हैं.

ज़ाहिर है उन्हें हिंदी में वैज्ञानिक शोध पत्रिकाएँ की अनुपलब्धता का अहसास और दर्द दोनों है. हिंदी की दुनिया को जो लोग सिर्फ साहित्य तक सीमित समझते हैं उन्हें इस बात की क्यों कर चिंता होगी ?  कम से कम ‘नेचर’ के अनुवाद की ही व्यवस्था कर दी जाती, जबकि विज्ञान को बढ़ावा देने और लोकप्रिय बनाने के बड़े दावे किए जाते हैं.

वैज्ञानिक चेतना और विज्ञान दोनों को फलने, फूलने. पसरने के लिए निज भाषा के खाद पानी की जरूरत होती है. रोपेंगे नहीं तो फल कहाँ से मिलेगा श्रीमान. महोदय. 


वैज्ञानिक शोध पत्रिकाएँ हिंदी में क्यों नहीं छपती हैं ?
आशीष बिहानी





क्या कारण है कि दुनिया के दूसरे सबसे विशाल भाषी समूह होने के बावज़ूद कोई भी वैज्ञानिक शोध पत्रिका भारतीय भाषाओँ में अपने शोध-पत्रों का अनुवाद करके प्रसारित नहीं करतीं है? नेचर और स्प्रिन्गर के विलय से बने प्रकाशन दानव की पत्रिका नेचर का प्रमुख हिस्सा विज्ञान की विविध शाखाओं में अत्याधुनिक शोध को प्रकाशित करता है. यह पत्रिका कोरिया, चीन और जापान जैसे देशों में, उनकी राष्ट्र भाषाओँ में अनूदित-प्रकाशित की जाती है. इसी प्रकाशन की पत्रिका साइंटिफिक अमेरिकन”, जो कि विज्ञान में अभिरुचि रखने वाले सामान्य पाठक वर्ग के समक्ष नवीन वैज्ञानिक खोजों, अविष्कारों और उनसे उत्पन्न होने वाली विचारधारा को आकर्षक तरीक़े से पेश करती है. यह पत्रिका स्थानीय अनुवादकों और प्रकाशकों के सहयोग से तकरीबन बीस भाषाओँ में प्रकाशित की जाती है, जिनमे रूसी, ताईवानी और ब्राज़ीलियाई भाषाएँ शामिल हैं.

नेचर की सालाना वेटेड फ्रेक्शनल काउंट इंडेक्स के हिसाब से भारत में शोध का आयतन ताइवान, ब्राज़ील और रूस जैसे देशों को कड़ी टक्कर दे रहा है. यद्यपि इस मामले में हम चीन और अमेरिका जैसे देशों के आस-पास भी नहीं फटकते, हमारे यहाँ शोध बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है, ख़ास कर जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान में. हिंदी, मेंडेरिन के बाद दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है और बोलने वालों की संख्या रूसी, जापानी, कोरियाई इत्यादि से बहुत ज़्यादा है. तत्पश्चात, तमिल/ तेलुगु/ पंजाबी/ बंगाली आदि भाषाएँ भी बहुत पीछे नहीं हैं.

इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत में शोध की स्थिति संतुष्टिपूर्ण है. बस यह कि अपने सामर्थ्य का एक नगण्य अंश देता हुआ भारत भी बहुत महत्वपूर्ण है. शोध की बढ़ोतरी से भी खुश मत होइएगा, सरकार ने जो अभी आधारभूत शोध की फंडिंग पर कुल्हाड़ी चला दी है उसका असर कुछ समय में नज़र आयेगा. डेढ़ अरब की आबादी वाले हमारे देश से जितने वैज्ञानिक शोध पत्र निकलते हैं उससे दो गुना ज़्यादा स्पेन से निकलते हैं और तकरीबन छः गुना चीन से. हर नेता के भाषण में हम यूएसए बनने के सपने देखते हैं. हमें याद रखना चाहिए कि मौजूदा तंग हालात के बावज़ूद यूएसए से निकलने वाला शोध आयतन में भारतीय विज्ञान का बीस गुना है!

भारत एक तेज़ी से बढती अर्थव्यवस्था है जहाँ आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा विज्ञान और प्रोद्योगिकी से वंचित है क्योंकि वो शेष छोटे हिस्से की भांति अंग्रेज़ी सीख नहीं सकता, आर्थिक और भाषिक मजबूरियों के कारण. ऐसे में सिर्फ़ अंग्रेज़ी का ज्ञान अभ्यर्थियों को कौशल और योग्यता की तुलना में कहीं आगे ले जाता है -- ऐसे स्थानों पर भी जहाँ अंग्रेज़ी की कोई आवश्यकता नहीं है. 

अंग्रेज़ी से इस विकारग्रस्त मोहब्बत का नतीज़ा है कि हमारे युवा दूसरे देशों की बनाई आधारभूत संरचनाओं में सस्ते बैल बनने को तैयार हैं बजाय अपने ही देश की आधारभूत संरचना को मज़बूत करने की कोशिश करने के. सच्चे अर्थों में उद्यमशील बनने के. उनको उदासीन महसूस कराने में हमारे संस्थानों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. UGC द्वारा अनुमोदित शोध पत्रिकाओं की सूची देख लीजिये. विज्ञान और प्रोद्योगिकी वर्ग में एक भी भारतीय भाषा का जर्नल नहीं है. बंगाली/ तमिल/ तेलुगु तो दूर की चिड़ियाएँ है, हिंदी तक में विज्ञान का दस्तावेज़ीकरण शून्य के बराबर है. क्यों कोई सीखना चाहेगा हिंदी, अगर तकनीकी रूप से मज़बूत होना चाहता हो तो? यदि कोई सीखेगा, तो उसे मिलेगा क्या पढ़ने को? UGC की सूची से बाहर भारतीय भाषाओं में विज्ञान की दुर्दशा देखकर ही दिल दुहरा होने लगता है, जहाँ विज्ञान बस जादुई दवाइयों, बॉडी-बिल्डिंग और तथ्यों का अश्लील ढेर रह जाता है.

इसकी तुलना में जापान में जीव विज्ञान के 400 शोध जर्नल्स में से 300 जापानी भाषा में प्रकाशित होते हैं. आलम यह है कि वहाँ किये जाने वाले शोध को अंग्रेज़ी में अनुवाद करने की आवश्यकता पड़ती है. इन दोनों बातों में सम्बन्ध सिद्ध नहीं हुआ है पर यह एक सम्भावना है जो हमें भारतीय भाषाओँ के लिए खोजनी होगी. अन्यथा भारतीय विज्ञान इसी लूली रफ़्तार से चलता रहेगा और देश के भावी बेहतरीन वैज्ञानिक या तो वेंकी रामकृष्णन की तरह लन्दन में पनाह पाने को भागेंगे या फिर द्विभाषी न होने के ज़ुर्म में किसी ऐसे काम को करते हुए सज़ा काटेंगे जो करना उन्हें पसंद नहीं.

संभव है कि वित्त की कमी विज्ञान के प्रसार और शोध को धीमा कर दे. पर भारत में वैज्ञानिक गतिविधियों का अभाव मूलभूत रूप से स्थानीय भाषाओँ में उसकी अनुपलब्धता के कारण है. पर हिंदी तो काफी लचीली भाषा है जो किसी भी ढाँचे में ठीक-ठीक फिट हो सकती है. तो फिर हिंदी में विज्ञान का अभाव क्यों?

कारण अनावश्यक रूप से उलझी हुई अधिकतर समस्याओं की तरह स्पष्ट है. हिंदी विश्वार्द्ध में अपनी भाषा में विज्ञान में भाग लेने के प्रयास हो ही नहीं रहें है. सभी अंग्रेज़ी के माध्यम से उत्पन्न हुए हमारे योगदान से खुश हैं जो कि भारत की विशालता और संभावनाओं के आगे नगण्य है. हमारे निकट भविष्य के लक्ष्य, सुदूर भविष्य के लक्ष्यों पर हावी हो गए हैं. यदि अंग्रेज़ी सीखने से किसी को गोल्डमेन साक्स में नौकरी मिल जाती है, वो क्यों कोशिश करेगा भारत में वैसी कंपनी बनाने की! 2003 में फ़िनलैंड के वैज्ञानिकों ने अकादमिया में बढ़ते अंग्रेज़ी के प्रयोग के प्रति चेताया था कि यदि विज्ञान से फिन भाषा को हटाया गया तो प्रकृति की बारीकियों को पहचानने के मामले में धीरे-धीरे उनकी भाषा पंगु हो जाएगी. स्पष्ट है कि हिंदी में वो असर अभी से नज़र आने लगे हैं. किसी भाषा का हाल संस्कृत और लैटिन जैसा होने में समय नहीं लगता. लगभग सामान परेशानियाँ जापान और स्पेन के वैज्ञानिकों ने भी जताईं हैं.

हिंदी के तथाकथित कर्णधार हिंदी का प्रचार-प्रसार करने और अहिंदी प्रदेशों में उसे थोपने में जुटे हैं. हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश हो रही है. और हिंदी के बचे खुचे वक्ता और लेखक हिंदी की जड़ों को, उसके कारकों को भूलकर, राष्ट्रभाषा होने के दंभ में भरे अन्य भारतीय भाषाओँ को सीखने से इनकार कर चुके. हिंदी का क्रमिक विकास रुक चुका. दक्षिण भारतीय सरकारी विभागों में CCTV स्क्रीन्स पर हिंदी शब्द और उनके अंग्रेज़ी अर्थ दिखाए जाते हैं और कई कर्मचारी उन्हें सीखने का प्रयास करते नज़र आते हैं. हिंदी प्रदेशों में अन्य भाषाओँ के शब्द नहीं दिखाए जाते. ये कहना भर भी हिंदी भाषियों को अटपटा सा लगेगा. जब परा-सिन्धु प्रान्तों को एकीकृत करने निकली भाषा की दूसरी संस्कृतियों को आत्मसात करने की क्षमता विन्ध्याचल पार करते करते दम तोड़ दे तो उसका राष्ट्र-भाषा बनना तो लाज़मी नहीं. बजाय दक्खिन को शामिल करने के, हमारा झुकाव रोमन और लैटिन से उद्भूत भाषाओँ की ओर है जो फाइलो-लिंग्विस्टिकली हमसे कोसों दूर है. उन तत्वों को शामिल करना प्रगतिशीलता के खिलाफ़ नहीं है पर गड्ड-मड्ड प्राथमिकताओं का नतीज़ा अवश्य है.

ट्रांस-इंडियन भाषा के नारे लगाने की बजाय बेहतर होगा कि हम लोग विज्ञान और अर्थशास्त्र जैसे विषय, जो वैश्विक प्रगति में एक देश की भूमिका और महत्ता को निर्धारित करते हैं, अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं. अंग्रेज़ी को देश के विद्यालयों में पढाए जाते हुए 180 साल हो गए हैं. हमें यह भूलना होगा कि भारत के हर कोने में लोगों को अंग्रेज़ी या हिंदी सिखाई जा सकती है. हिंदी, बंगाली, पंजाबी, मराठी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, उड़िया, गुजराती इत्यादि भाषाएँ उनके विशाल भाषिक आधार से ऊपर किसी वैश्विक मंच की मोहताज़ नहीं है. इतने सारे पाठकों की जरूरतों को दुस्साध्यकहकर दुत्कार देने की बजाय हमें उन जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए. प्रयोग के तौर पर विश्व के प्रमुख वैज्ञानिक शोध पत्रों (जिनमें से अधिकतर ओपन सोर्स हैं) का अनुवाद करके ग्रामीण स्तर तक मुहैया कराना होगा. भारतीय भाषाओँ में इस प्रयोग की पहली हकदार हिंदी होगी (2001 की जनगणना के मुताबिक 41 प्रतिशत भारतीय हिंदी समूह को मातृभाषा मानते हैं और कुल 53 प्रतिशत हिंदी को जानते समझते हैं). तत्पश्चात, अन्य भाषाएँ सीधे अंग्रेज़ी से हिंदी वाले प्रयोग की समझ काम में लेते हुए या हिंदी अनुवाद से पुनः अनुवाद कर लाभान्वित हो सकतीं हैं.

तो हिंदी को दो लम्बी दूरी की दौड़ें तुरंत शुरू करने की आवश्यकता है: विश्व भर के वैज्ञानिक शोध को यथावत हिंदी में अनूदित करना और अन्य भारतीय भाषाओँ से ऐसी शब्दावली और संरचनाएं सोखना जो हिंदी में काम लीं जा सकतीं हैं.

इस प्रकार का प्रयोग सिर्फ़ प्रयोग के लिए नहीं होगा. यदि हम इतनी जानकारी लोगों को उपलब्ध करवाते हैं,

१. भारतीय पुरातन विज्ञान के बारे में फैले झूठ को सत्यों से अलग करने में जनता की भागीदारी होगी, बशर्ते अनुवाद पूर्णतया खुले मंच पर उपलब्ध हो
२. हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ के लिए तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली तैयार होगी, बशर्ते उस शब्दावली को हम संस्कृत-करण से बचा पाएं
३. हिंदी और अन्य भाषाओँ के बीच खड़ी दीवारें कमज़ोर होंगी क्योंकि इस समय इनमें से कोई भी विज्ञान के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है.
४. लोगों को उनकी अपनी भाषा में कुछ नया करने का मौक़ा मिलेगा और घरेलू इनोवेशन होने की संभावना बढ़ेगी.
५. भारत की मुख्यधारा के डिस्कोर्स में अंग्रेज़ी न जानने वाले लोगों की आवाज़ मज़बूत होगी. वर्तमान में देशज भाषाओँ को निम्न मानकर दरकिनार किया जाता है, यह सभी को विदित है.

समस्या यह है कि ये सब हवाई किले हैं. बड़ी संख्या में अलग-अलग विषयों से नौज़वान विद्वानों को व्यक्तिगत स्तर पर अनुवाद करना शुरू करना होगा. हिंदी में वैज्ञानिक डिस्कोर्स को जगह देनी होगी. हम यह मानकर विज्ञान को दरकिनार नहीं कर सकते हैं कि हम एक ग़रीब देश हैं. हमारी समस्याओं को सुलझाने के लिए बाहर से कोई नहीं आने वाला है. हो सकता है कि ये बीड़ा उठाने को पर्याप्त लोग न हों पर उस अक्रियता का अंजाम हमें ही भुगतना होगा.
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आशीष बिहानी 
जन्म: ११ सितम्बर १९९२बीकानेर (राजस्थान)
पद: जीव विज्ञान शोधार्थीकोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र (CCMB), हैदराबाद
कविता संग्रह: "अन्धकार के धागे" 2015 में हिन्दयुग्म प्रकाशन द्वारा प्रकाशित

ईमेल: ashishbihani1992@gmailcom

मोनिका कुमार की कविताएँ

Posted by arun dev on जुलाई 22, 2017









“खुद को ज़िंदा रखने के लिए
इतने रतजगों के बाद
उसे प्रेम से अधिक नींद की ज़रूरत है.”

२१ वीं सदी की हिंदी कविता का युवा चेहरा जिन कवियों से मिलकर बनता है इसमें मोनिका कुमार शामिल हैं. उन्होंने अपना एक मुहावरा विकसित किया है और संवेदना के स्तर पर उनमें एक नयापन है.


मोनिका कुमार की कुछ नयी कविताएँ   




मोनिका कुमार की कविताएँ              
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आगंतुक

आगंतुक के लिए कोई पूरे पट नहीं खोलता
वह अधखुले दरवाज़े से झांकता 
मुस्कुराता है

आगंतुक एक शहर से दूसरे शहर
जान पहचान का सुख तज कर आया है
इस शहर में भी
अमलतास के पेड़, गलियाँ, छज्जे और शिवाले हैं
आगंतुक लेकिन इन्हें ढूँढने यहाँ नहीं आया है

क्या चाहिए ?
अधखुले दरवाज़े के भीतर से कोई संकोच से पूछता है
निर्वाक आगंतुक एक गिलास ठंडा पानी मांग लेता है

पानी पीकर
आगंतुक लौट जाता है
जबकि किसी ने नहीं कहा 
भीतर आयो
कब से प्रतीक्षा थी तुम्हारी
और तुम आज आये हो
अब मिले हो
बिछुड़ मत जाना.



चंपा का पेड़

चंपा के पेड़ से बात करना धैर्य का अभ्यास है
ख़ुद आगे बढ़ कर यह पेड़ बात नहीं करता
पत्तियां खर खर नहीं करेंगी कि शरद द्वार खड़ा है
सीत हवाओं के निहोरे से अलबत्ता चुपचाप झरता है
इतना दूर नहीं उगा 
कि संकल्प करके इसे कोई ढूँढने निकले
इसके नाम से नहीं होता एक प्रांत अलग दूसरे प्रांत से
मिल जाता है धूर भरी सड़कों के किनारे शहर दरबदर 
कतार में एकांत में 
स्वांत सुखाय
गलियों बागों बगीचों में
रास्तों को रौशन करता
प्रतीक्षा मुक्त
न मधु न भ्रमर

चंपा के पेड़ पर कुछ भी उलझा हुआ नहीं है
पत्तियां मुश्किल से एक दूसरे को स्पर्श करतीं  
फूल खिले हुए टहनियों पर विरक्त
ऐसी निस्पृहता !
जीवन है तो ऐसी निस्पृहता क्यूँ मेरे पेड़ !
कौन है तुम्हारे प्रेम का अधिकारी
सर्वत्र तो दिखते हो
मन में किसके बसते हो ?

उत्तर मिला धीरे से
निस्पृहता मेरा ढब है
प्रतीक्षा में रत हूँ उस पथिक की
जो जानता है
सत्य पृथ्वी परायण होते हुए भी उभयचर है
निर्द्वंद है पर करुणा से रिक्त नहीं
मैं उस पथिक के प्रण पर नहीं उसकी उहापोह पर जान देता हूँ
जो सत्य की प्रतिष्ठा ऐसे करता है
जैसे आटे को सिद्ध करती स्त्री
परात में
कभी पानी और डालती
कभी आटा और मिलाती है.

 
 
एकांत के अरण्य में

अंततः यह संभव हुआ
दो जीवों की असमानता के बीच
संबंध का संयोग जगा

इस घर में मैं सामान से अधिक बोझ लेकर आई थी
फिर यहाँ खिलने लगा एकांत का अरण्य
इस घर में रहती थीं छिपकलियाँ
जिन्हें मैनें असल में पहली बार देखा
न्यूनतम सटीक देह
चुस्त लेकिन शांत मुख
छिपकलियाँ एकांत के पार्षद की तरह घर में रहतीं
और मैं व्याकुलता की बंदी की तरह   
निश्चित ही आसान नहीं था
छिपकलियों से प्रार्थना करना
इनके वरदान पर भरोसा करना
पर इससे कहीं मुश्किल काम मैं कर चुकी थी
जैसे मनुष्य से करुणा की उम्मीद करना

दूरियां बनी हुई हैं जस की तस
अतिक्रमण नहीं है अधिकारों का
छिपकलियाँ दीवारों पर हैं
और मैं अपने बिस्तर में
फिर भी एक दीवार अब टूट चुकी है 
एकांत के अरण्य में
आत्मीय एक फूल खिल गया है.



सर्दियों की बारिश

भले ही बाहर ठंड है
सर्दियों की बारिश फिर भी जल रहे माथे पर रखी ठंडे पानी की पट्टी है
इस बारिश में भीगने पर जुकाम लगने का डर आधा सच्चा और आधा झूठा है

उस भीगे हुए को मैनें सड़क पार करते हुए देखा
बारिश की गोद से उचक उचक जाते देखा
जब उसे कोई नहीं देख रहा था
उसे अपने आप को गुदगुदाते हुए देखा

बारिश की आवाज़ में वह ख़लल नहीं डालता
बाहर बारिश हो तो
पायदान से पैर रगड़ता
पाँव में लगी बारिश और मिट्टी को झाड़ कर
दबे पाँव कोमल कदमों से अपने घर में घुसता है
भीगा हुआ
पर अंदर से खुश
जैसे कोई धन लेकर घर लौटता है

मैनें देखा उसे
लौट कर घर वालों से बात करते हुए
अभी जो बारिश में सड़क पार की
इस बात को रोजनामचे से काटते हुए
निजी और सार्वजानिक राए को अलग करते हुए
बारिश के सुख को राज़ की तरह छुपाते हुए
तौलिए से बालों को पोंछता
वह सभी से बताता है
आज बहुत बारिश थी
सड़कें कितनी गीली
रास्ते फिसलन भरे
पर वह सही सलामत घर पहुँच कर बहुत खुश है. 




शहरज़ादी उनींदी पड़ी है

शहरज़ादी उनींदी पड़ी है
मृत्यु से बचने के लिए
क्या कोई अनवरत कहानी कह सकता है ?

कथा पर सवार काफ़िले
अक्सर गंतव्य से आगे निकल जाते हैं 
उन्हें कहानियों का अंत ज़िंदा नहीं रखता
धीरे धीरे वे कथानक से जुतने लगते हैं
हमारे मरने की मामूली कहानी
हमें मरने तक ज़िंदा रखती है
कहानियाँ दोहरा रही हैं खुद को
हर कहानी किसी और कहानी में है
घटनाएं इसलिए भी बेतहाशा घट रही हैं
क्यूंकि हम मानने लगे हैं
गति के दौर में विश्राम अपराध है

एक हज़ार एक रातें बीतने वाली हैं
शहरज़ादी को आभास हो गया है
कि अनवरत कहानी के अंत से पहले
सुलतान को उससे प्रेम हो जाएगा
पर शहरज़ादी का दिल जानता है
खुद को ज़िंदा रखने के लिए
इतने रतजगों के बाद
उसे प्रेम से अधिक नींद की ज़रूरत है.




धोखा होना चाहता है

पीठ पर बस्ते लादे
भेड़ों जैसा झुण्ड बनाकर
हम सुबह स्कूल में दाखिल होते थे
नीम आँखों से क़दम नापकर प्रार्थना सभा में पहुँच जाते

प्रार्थना सभा में हमने कनखियों से संसार को देखा 
हमारे भीतर एक मशीन तैयार हो चुकी थी
जो हमारी जगह पर रोज़ नेकी पर चलने और बदी से टलने की प्रार्थना कर देती थी
मज़ा तो बिल्कुल नहीं आ रहा था
पर ऐसा भी नहीं कि कोई धोखा हुआ हो

फिर एक दिन
मैं अकेले और खुली आँख से स्कूल पहुँची
रिश्तेदार के घर से हम सुबह देरी से घर लौटे थे
देरी से स्कूल आने की अग्रिम आज्ञा लेकर
माँ ने वर्दी पहना कर तुरंत स्कूल रवाना कर दिया

स्कूल में मध्यांतर का उत्सव था
पर मैं आज उत्सव का हिस्सा नहीं थी
स्कूल इतना अजनबी लग रहा था
कि मैं रोते रोते घर लौटना चाहती थी
जिन सीढ़ियों को रेल समझकर हम इससे उतरा करते थे  
वह जादुई गुफ़ा लगने लगी
जैसे कि हम जब सौर मंडल के दूसरे ग्रह के बारे में पढ़ रहे होंगे
पृथ्वी पर हमारी पकड़ कम हो जाएगी  
और कोई पत्थर से सीढ़ियों को बंद कर देगा   

क्लास में जाने से पहले मुंडेर पर खड़े नीम का पेड़ देखा
इसकी चिंदी चिंदी पत्तियां 
मुझे डराने लगी
बेमौसमी ठंड से पैर ठंडे हो गए

घंटी बजते ही
मध्यांतर में उगने वाली सैंकड़ों आवाज़ें
मंद पड़ने लगीं

मेरी क्लास के लड़के
पसीने से भरी हुई कमीज़ों में
अभी अभी पाताल से आए बौने लग रहे थे
गलबहियां डाले डोलती हुई लड़कियाँ
जो आज मेरी सहेलियाँ नहीं थी  
हल्के चुटकुलों पर लहालोट हो रही थीं

उस दिन से मेरे दो हिस्से हुए
एक जो स्कूल जाता रहा
और दूसरा जो सदा सदा के लिए अकेला हो गया.



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मोनिका कुमार
अंग्रेज़ी विभाग
रीजनल इंस्टीच्यूट ऑफ इंग्लिश
चंडीगढ़.
09417532822 /turtle.walks@gmail.com

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