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जन्म से ही जीवित है पृथ्वी (प्रेमशंकर शुक्ल) : राहुल राजेश

Posted by arun dev on अप्रैल 21, 2019


























'तितली फूल को उसकी टहनी में न पाकर
बिरह में है
जूड़े में वह फूल भी है अनमना बहुत
रह-रह कर आ रही है उसे अपनी प्रिया की गहरी याद


प्रेमशंकर शुक्ल मुख्यत: प्रेम के शुक्ल पक्ष के कवि हैं. उनकी कविता की जमीन प्रेम की संवेदना से गीली है, इस मिट्टी को वह मनचाहा आकार देते चलते हैं कुछ इस तरह कि उसमें प्रेम की तरलता बची रहती है. वह करुणा से होते हुए प्रेम तक पहुंचते हैं. वह अपनी भाषा को प्रेम  के रसायन और करुणा के जल से माँजते रहते हैं. भाषा से भाव तक की उनकी यह जीवन- दृष्टि कला को वृहत्तर आयाम  देती है. नृत्य, चित्र, मूर्ति, संगीत, नाटक आदि सब उनकी कविता के सह-यात्री हैं.  

कला अनुशासनों पर आधारित कविताओं का संग्रह जन्म से ही जीवित है पृथ्वीप्रेमशंकर शुक्ल का पांचवाँ कविता संग्रह है. इस संग्रह की कविताओं पर कवि राहुल राजेश का यह समीक्षात्मक आलेख.




हरहमेश पूरम्पूर बना रहता है मन-बल जहाँ !              
(प्रेमशंकर शुक्ल के कविता-संग्रह 'जन्म से ही जीवित है पृथ्वी' से गुजरते हुए)
राहुल राजेश





न्म से ही जीवित है पृथ्वी. हाँ, सचमुच जन्म से ही जीवित है पृथ्वी. जन्म से अर्थात् जन्मने से. जन्मने से पल्लवों के, शिशुओं के, कलाओं के, सुंदरताओं के. जन्म रही हैं सुंदरताएँ फूहड़ता और फरेब के बरक्स. जन्म रही हैं नित नई कलाएँ- नई ऊर्जा और नई आभा के साथ, मनुष्य का मन-बल बढ़ातीं. पृथ्वी का मन-बल बढ़ातीं कि-कलाओं की कोख कभी अपनी पृथ्वी को मरने नहीं देती!

हाँ, यह जन्म सनातन सत्य है.शाश्वत सत्य है. और यह सत्य, निरंतर जन्म का यह सबसे सुंदर सत्य मृत्यु के विरुद्ध सबसे मुकम्मल, सबसे मजबूत बयान है ! इसलिए तो पृथ्वी कभी मृत्यु के चिर तिमिर में एक क्षण के लिए भी विलीन नहीं हो पाती. क्षणांश के लिए भी दृष्टि से, सृष्टि से ओझल नहीं हो पाती. कि नित, हर क्षण जन्म घटित होता रहता है, जो मृत्यु को पराजित करता रहता है! जिसकी नव-प्रस्फुटित रोशनी मृत्यु के अंधकार को हरहमेश हरती रहती है. इसलिए जन्म से ही यानी जन्म के कारण ही नित्य निरंतर जीवित रहती है पृथ्वी. और इसी जन्म के बूते हरहमेश पूरम्पूर बना रहता है मनुष्य का मन-बल! पृथ्वी का मन-बल भी बना रहता है इसी जन्म से ही!

हाँ, प्रेमशंकर शुक्ल के सद्य-प्रकाशित पाँचवें कविता-संग्रह 'जन्म से ही जीवित है पृथ्वी' को पढ़ते-महसूसते, ठहर-ठहरकर इनकी कविताओं को अपने अंतरतम में जज्ब करते कुछ ऐसा ही अंतर्बोध हुआ मुझे! और यह अंतर्बोध ही इन कविताओं का असली सामर्थ्य है, जो बिल्कुल सूक्ष्म तरीके से और सलीके से मनुष्य को यह विश्वास दिलाता है कि यह पृथ्वी, यह जीवन तब तक दुखों, विपदाओं, आपदाओं या कि मृत्यु से पराजित नहीं होगा, जब तक इस पृथ्वी पर कलियाँ फूट रही हैं, कलाएँ सिरज रही हैं जीवन की बगिया में, जीवन के आंगन में, जीवन के रंगमंच पर!

प्रेमशंकर शुक्ल के इस कविता-संग्रह 'जन्म से ही जीवित है पृथ्वी' की कविताएँ वैसे तो प्रकट रूप में कला अनुशासनों पर केंद्रित कविताएँ हैं. पर थोड़े और व्यापक फलक पर, थोड़ी और सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो ये कविताएँ वस्तुत: महाजीवन की कविताएँ हैं! महाजीवन के महाराग की कविताएँ हैं. महाजीवन के महारास की कविताएँ हैं. और मनुष्य के इस महाजीवन में, पृथ्वी के इस महाजीवन में, धरती के रोम-रोम के महाजीवन में या फिर बारिश की बूंदों के महाजीवन में या फिर कोयल की कूक के महाजीवन में यह महाराग और महारास कलाएँ ही तो रचती हैं! हाँ, वही कलाएँ जो पृथ्वी के जन्म से ही, मनुष्य के जन्म से ही, शिशु की प्रथम किलकारी से हीइस महाजीवन का साथ निभाती आ रही हैं! हाँ, वही कलाएँ जो आदिकाल से ही, अनंत काल से ही पृथ्वी को, मनुष्य को, जीवन को लय-ताल, सुर और स्वर देती आ रही हैं! हाँ, वही कलाएँ जो जीवन के आरंभ से ही जीवन को संगत देती आ रही हैं!!

यह अनायास नहीं है कि बारिश की बूंदों के जन्म से जन्म लेता है टप-टप का मधुर संगीत. दरअसल यह बारिश की बूंदों के जन्म पर धरती के कंठ से स्वत: फूट पड़ने वाला मीठा आदिम लोकगीत है!यह अनायास नहीं है कि कोयल की कूक सुनकर पृथ्वी पर बरबस उतर आता है बसंत. दरअसल कोयल की कूक विरह का विदारक गीत है, जिसे सुनकर पृथ्वी के पोर-पोर से करुणा फूट पड़ती है. इसी करुणा के जल से पूरी पृथ्वी एक बार फिर हरी हो जाती है. सच कहें तो बसंत पृथ्वी पर विरह और प्रेम की अद्भुत चित्रकारी है! और यह चित्रकारी केवल प्रकृति तक ही सीमित नहीं रहती. हाँ, बसंत केवल पेड़ पर ही नहीं उतरता. वह महावर की शक्ल में स्त्री के पाँव तक उतर आता है! तभी तो कवि 'पाँव-महावर' शीर्षक कविता में कहता है कि "महावर पाँव पर बसंत है!" और यह भी कि-

"स्त्री और धरती जुड़वाँ हैं
फूल-पत्तियाँ, बेलें धरती के महावर-मन से ही फूटती हैं!"

मैं इसी कविता से अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहना चाहता हूँ कि कलाएँ भी जीवन की, दुख की सहोदर हैं. जीवन के दुखों से जूझने की शक्ति कलाओं की कोख से ही सिरजती हैं. सच तो यह है कि जीवन में दुखों और कलाओं का जन्म एक साथ हुआ है! जितना पुरातन है दुख, उतनी ही पुरातन हैं कलाएँ! कलाएँ जीवन में दुखों से अवकाश उपलब्ध कराती हैं पल दो पल के लिए. कलाएँ दुखों से विवर्ण हो गए जीवन के चेहरे में रंग भरती हैं. कलाएँ मनुष्य को नवजीवन देती हैं हर दिन.





(दो)
दरअसल, कलाएँ मनुष्य के दुखों की सबसे आदिम अभिव्यक्ति हैं! कलाओं में ही मनुष्य अपना सुख सृजित करता है. इसलिए कलाएँ मनुष्य का सबसे आदिम सुख भी हैं! वरना खेतों से लौटकर लोग गीत गा-गाकर अपनी थकान नहीं मिटाते! श्रम करते वक्त लोग गीत गा-गाकर अपनी मेहनत को इस तरह माँजते नहीं! यही नहीं, साँझ पहर आसमान में अपने-अपने नीड़ों की ओर लौटते पंछी सामूहिक कलरव-गान के साथ लौटते नहीं! वे चुपचाप न लौट जाते? गोधूलि बेला में घंटियों के समवेत नाद के साथ गायें क्योंकर लौटतीं? वे सिर झुकाए चुपचाप न लौट आतीं?

तो यह साफ है कि कलाएँ हमारे जीवन का श्रृंगार हैं. आभूषण हैं. जो इस जीवन को सुंदर बनाती हैं और जीने लायक भी. इसलिए कवि इस कविता में आगे कितनी सच्ची बात कहता है-

"भाव से भरा हुआ महावर
अभाव का आभूषण है
नहीं होता जेवर-गहना
तो हमारे छोटे-छोटे घरों की औरतें
महावर से ही कर लेती हैं
अपना साज-सिंगार."

और यह भी कि-

"लोक के उत्सव
मुश्किलों से जूझने के सच्चे औजार हैं."

और यह लोक के उत्सव क्या हैं? पाँवों की थिरकन नृत्य बनकर उत्सव रचती हैं तो दीवारों पर, कागज पर, कपड़ों पर, काठ पर, कन्था पर उकेरे गए चित्र वस्तुत: रंगो के, रेखाओं के, धागों के ही तो उत्सव हैं! मूर्तिकार या शिल्पकार जो मूर्ति या शिल्प गढ़ता है, वह दरअसल उसकी उंगलियों की लोच का ही तो उत्सव है! सच कहें तो यह कलाएँ मनुष्य के सुख-दुख की अभिव्यक्तियों के आदिम उत्सव ही तो हैं! ये कलाएँ इन्हीं अभिव्यक्तियों के नयनाभिराम क्रिया-रूप ही तो हैं! जहाँ मनुष्य का दुख भी रंगमंच पर अभिनय करता नजर आता है!

दरअसल, दुख ही सारी कलाओं में असली किरदार निभाता है. न हो यकीन तो इस 'किरदार' शीर्षक कविता को पढ़िए, जो संग्रह की पहली ही कविता है-

"एक नाटक का किरदार
नाटक से भाग कर चित्र बन गया
कुछ दिन चित्र में रहकर
फिर खंडकाव्य में पढ़ा जाता रहा."

महज पंद्रह छोटी-छोटी पंक्तियों की यह कविता बहुत बारीकी से यह बयान कर देती है कि दुख ही दुनिया की सारी कलाओं-विधाओं का केंद्रीय स्वर है और यह दुख ही हर जगह अभिव्यक्त होता है, चाहे वह रंगमंच हो, चित्रकला हो, संगीत हो या फिर शोकगीत! भले यह दुख हर बार अपना चोला बदल ले, लेकिन यह अंतत: पहचान ही लिया जाता है-

"विधाओं की दौड़-भाग और छुपाछुपी में
वह तो पकड़ा ही न जाता अनगिनत युग

लेकिन मंच पर गाते हुए
गायक के कंठ में फंस गया उसका दुख
जिससे कांप कांप गया किरदार
और शोकगीत भी थरथरा गया हर पंक्ति

शोकगीत में ही सबके सामने
बरामद कर लिया गया किरदार

तभी से
हर किरदार शोकगीत में जाने से
थरथराता है!"


(द्वारा- Tajnoor Khan)





(तीन)
कलाएँ जहाँ एक ओर दुख को सुख में बदलने की एक आदिम प्रविधि है, वहीं प्रेम की पुकार प्रेयसी तक पहुँचाने में भी कलाएँ ही काम आती रही हैं. जैसे श्रम के संगीत को जीवन-दर्शन में बदलने में आदिकाल से काम आते रहे हैं गीत! प्रेम, पसीना, दुख-सुख, हँसी-खुशी, आँसू-मुस्कान- यह सब जीवन के अलग-अलग सुर-ताल हैं, अलग-अलग रंग-राग हैं, जो कभी सुबह-सवेरे, कभी दिन-दोपहर, कभी सरे सांझ और कभी आधी रात को- कभी बांसुरी में, कभी इकतारे में, कभी तानपुरे में, कभी पखावज में, कभी होंठ-बाजा में बज उठते हैं! इस संग्रह से गुजरते हुए बरबस महसूस होता है कि कलाओं के बिना जीवन कितना अधूरा होता? कलाएँ न होतीं तो हमारे दुखों को, हमारे प्रेम को, हमारे संघर्ष को कौन सहेजता?

संग्रह की दूसरी कविता 'इकतारा' को ही लीजिए-

"इकतारा फक्कड़ वाद्य है
अपने एक तार पर गाता है
आख्यान, कविता, पद और लोकगीत

सन्यासियों, फकीरों को बेहद प्रिय है इकतारा

इकतारा से अधिक आंसुओं से भीगा
नहीं है अभी तक कोई वाद्य
इकतारा सुनना करुणा सुनना है
और बुनना है पूरे मन में उजाले का थान."

हाँ, कलाएँ हमारे मन में उजाला भरती हैं. कलाएँ हमारे मन का कलुष हरती हैं. लेकिन कलाएँ इतना भर ही नहीं करतीं. वस्तुत कलाएँ जीवन, युग और सभ्यता की आलोचना भी हैं. कलाएँ हिंसा और अन्याय का प्रतिरोध भी हैं. इसी कविता में आगे यह बहुत सधे हुए ढंग से व्यक्त हुआ है-

"कथा में जहाँ श्रवण कुमार को लगता है
राजा दशरथ का तीर
मूर्छित हो गया है वहीं इकतारा
और फूट नहीं रहे हैं तार-बोल

गा नहीं पा रहा है गायक
और इकतारे के तार में भी
उठ रही है लगातार हिचकी
यह रोना चुपचाप रोना नहीं है
हत्या का पुरजोर विरोध है."

कलाएँ मनुष्य के मन की थाती भी हैं. मनुष्य अपना मन कलाओं को सौंप कर बिसर जाता है दिनों, महीनों, वर्षों के लिए भी! 'अपना मन' शीर्षक कविता देखिए-

"गाते-गाते उसने अपना मन
एक गीत में रख दिया
और भूली ही रही वह बहुत दिन
अचानक उसे अपने मन की जरूरत पड़ी

झूमती बारिश में अचानक उसके कंठ से
उठा वही गीत
तब जाकर पाया उसने गीत में अपना मन!
अपना मन पाने की खुशी में
गाया उस स्त्री ने कई कई बार
वही वही गीत

तभी से स्त्रियों के बीच
दर्द जीते गीतों मेंअपना मन रखने का
चलन फैल गया है!"

यहाँ और एक उल्लेखनीय और महती बात यह है कि कलाओं के बिना केवल मनुष्य का ही नहीं, स्वयं प्रकृति का भी काम नहीं चलता! प्रकृति भी कलाओं की कलाई थामे बिना अपनी दिनचर्या भी आरंभ नहीं कर पाती! इस संग्रह की तमाम कविताएँ इस बात की गवाह हैं. पर यह बात जिस कविता में सबसे सघन लालित्य और कलात्मक रूपात्मकता के साथ दृश्यांकित हुई है, वह है 'जीवन-संगीत' शीर्षक कविता. यह कविता संग्रह की सर्वाधिक सुंदर और मेरी सर्वाधिक प्रिय कविताओं में से एक है. इसकी पंक्तियाँ, देखिए, किस तरह प्रकृति की पाँखें खोलती हैं-

"पत्तियाँ धूप का कोई कुनकुना गीत गाती हैं
हवा ताल देती है
घास अपने तानपुरे पर बनाए रखती है स्वर-विन्यास
खेत की तरफ जाती हँसिया
जीवन-संगीत का अद्भुत वाद्य लगती है
खुरपी-कुदाल का भी अपना ही संगीत है
पसीने के सारे गीत आत्मा के होंठ से फूटते हैं

बैलगाड़ी को देखिए नआप-
धड़धड़ाती पूरब से लादे चली आ रही है
खेतों की खिलखिलाहट, सूर्योदय की लाली
और चिड़ियों के गीत के साथ
भरी-पूरी धड़कती हुई एक सुबह!"

इस कविता की भाषा तो मोहक है ही, इस कविता के बिंब अनूठे और अवाक् कर देने वाले तो हैं ही; पर इस कविता में हँसियाको जीवन-संगीत के एक अद्भुत वाद्य के रूप में पहली बार प्रतिष्ठित करना एक उच्च कोटि की काव्य-दृष्टि और बहुत ही सूक्ष्म सौंदर्यबोध का परिचायक भी है. यही नहीं, यहाँ हँसिया को उसके प्रचलित प्रतीकार्थ से मुक्तकर उसे एक उच्चतर अर्थ और मान देने का प्रशंसनीय काव्य-विवेक भी दिखता है. हँसिया को एक औजार के रूप में न देखकर, एक वाद्य के रूप में देखना श्रम को महज उत्पादन के उपादान के रूप में न देखकर, जीवन के सबसे आदिम उत्सव के रूप में देखना है! इस अर्थ में यह कविता श्रम से संबंधित प्रचलित विमर्श का अतिक्रमण करते हुए, उसे एक आदिम प्रकल्प और कला के रूप में चिन्हित करती है.

इसी तरह 'बांसुरी' शीर्षक कविता में कवि कहता है- "बांसुरी चरवाहों का सिरजा वाद्य है/ मुग्ध रहते हैं जिस पर झरने-जंगल-नदियाँ." यहाँ भी चरवाहे को सबसे आदिम बांसुरी वादक के रूप में देखने की उदारता तो है ही;श्रम और उत्पादन, मजदूर और मालिक, शोषक और शोषित के आधुनिक औद्योगिक विमर्श से परे जाकर, चरवाहे को प्रकृति के साथ सहजीवन में अपना जीवन-यापन करने वाले एक विनम्र उद्यमी के रूप में प्रतिष्ठित करने की उदात्तता भी दिखती है,जो आधुनिक हिंदी कविता में अन्यत्र दुर्लभ है. (यहाँ मैं परोक्ष रूप से यह भी इंगित करना चाहता हूँ कि कोई माने या न माने, पर मॉडलिंग और मॉडलिंग फोटोग्राफी जैसी आधुनिकतम कलाओं की आरंभिक संकल्पना में भी गाय-बैलों, भेड़-बकरियों को हांकने वाले डंडे पर अपनी कमर टिकाकर खड़े हो जाने वाले चरवाहे-चरवाहिनेंऔर मटकी लेकर मटक-मटक कर चलने वाली पनहारिनें ही थीं, जो इनकी सबसे आदिम मॉडल बनीं!)





(चार)
इस संग्रह से गुजरते हुए हर कविता अपनी भाषा, अपने कथ्य, अपने कहन से अचंभित करती है. हर कविता की पहली पंक्ति ही एक नवीन कल्पनाशीलता और नवीन काव्य-दृष्टि की झांकी लगती है, जो हमें बड़ी उत्सुकता के साथ आगे की पंक्तियों में उतरने को आतुर कर देती है! और हर कविता की आखिरी पंक्ति हमें उड़ान के एक नए आकाश में छोड़ देती है! इस अर्थ में प्रेमशंकर शुक्ल वाकई अनूठे कवि हैं, जो एक शब्द, एक पंक्ति भी बिना गहरे पैठे, कविता में नहीं पिरोते. 'सुंदर कवि' शीर्षक कविता उनकी इस काव्य-उद्यमशीलता को बहुत ही सुंदर ढंग से उद्घाटित करती है-

"सुंदर कवि
पंक्तियों के पंख खोल-खोल कर
उन्हें उड़ने का आकाश देता रहता है
शब्दों को मांज-मांजकर
चमकाता रहता है उनकी धातु."

इसलिए इन कविताओं को हाजिर-नाजिर मानकर मैं बगैर किसी लाग-लपेट के यह कह सकता हूँ कि प्रेमशंकर शुक्ल इस दौर के सर्वाधिक कल्पनाशील, कल्पना-प्रवण और अप्रतिम कवि हैं, जिनके पास मौलिक भाषा, अनछुआ बिंब-विधान, नैसर्गिक दृष्टि-सामर्थ्य और काव्य अनुभूतियों का विपुल संसार तो है हीउनके पास भाषा को बेहद बारीकी से बरतने का देशज शऊर भी है. 'तत्सम तद्भव' शीर्षक कविता में वह स्वयं स्वीकारते हैं-

"खेती किसानी का आदमी
तत्सम को तद्भव में रूपांतरित कर लेना
आया है पीढ़ियों से मेरे भीतर."

इसलिए तो 'अभिप्राय' शीर्षक कविता में भी वह कहते हैं-

"बहुत भाषा लगाना
उचित नहीं है कविता में
अर्थ से अधिक अभिप्राय में खुलता है
कविता का मन."

इन सबसे भी अधिक महत्वपूर्ण और बलाघात के साथ रेखांकित करने वाली बात यह है कि इनकी कविताओं में आयतित अथवा आयोजित-प्रायोजित कुछ भी नहीं है. जो कुछ भी है, सब स्व से जन्मा है. कह सकता हूँ, उनकी कविताओं के आंगन में सचमुच जन्म से ही जीवित है पृथ्वी!

हाँ, प्रेमशंकर शुक्ल की कविताओं से गुजरते हुए एक पल के लिए भी यह आभास नहीं होता कि ये कविताएँ इस जैसी या उस जैसी हैं या इनकी जैसी या उनकी जैसी हैं. यानी उनके यहाँ उधारी का कोई कारोबार नहीं है! जो है, सब अपनी ही मिट्टी की उपज है. इसलिए'विश्व कविता' शीर्षक कविता में वह स्पष्ट कहते हैं-

"मैं अपनी मातृभाषा में विश्व कविता रचता हूँ
अपनी सांसो से खींचता हूँ
भाषा के जल में तैरते शब्द."

हाँ, सचमुच वह विश्व कविता रचने वाले विश्वकवि ही हैं और कविता के महादेश के विश्व नागरिक भी;दुख जिनकी सृजनात्मकता का केंद्रीय स्वर है, जो बहुत कलात्मकता के साथ किंतु सहज भाव से अभिव्यक्त होता है. बकौल उनके ही-

"जीवन में सारा रकबा दुख का है
केवल दुख जहाँ अवकाश पर है
उतना ही है सुख!"

यह प्रेमशंकर शुक्ल जैसा ईमानदार कवि ही कबूल कर सकता है कि-

"कविता लिखना बदला लेना है
अपने ही दुख से
सुख बुनना है विनम्र."

यह तो सोलह आने सच है कि बिना ईमानदारी और मेहनत के, भाषा में न तो बनक आती है और ना ही कविता में चमक. सच्चा कवि इस बात के लिए सदैव सजग रहता है कि कभी भी प्रश्नांकित ना हो पाए उसका कवि-न्याय. इसलिए 'मेहनत मन' शीर्षक कविता में वह कहते हैं-

"फसलों के हरे होने में किसान के साथ
चिड़ियों के भी गीत हैं, धूप के भी
गीत में मिट्टी, पानी, हवा का जरूरी है जिक्र
नहीं तो प्रश्नांकित होगा कवि-न्याय."

मेहनत करता कवि ही 'पसीने के पराक्रम' को इस तरह पहचान सकता है- "पसीने का पराक्रम कि हरियाली/ उसके होने का दस्तूर है" और यह भी कि- "खेत-खलिहान हमारे सबसे पहले तीरथ हैं!"



(पाँच)
संग्रह की कुछेक कविताओं को छोड़ दें तो इस संग्रह की अधिकांश कविताएं छोटी कद-काठी की हैं और अपनी छोटी काया में ही ये कविताएँ पूरी तरह खिलती हैं और उनकी भाषा की बनक और कहन की चमक देखते बनती है. इसलिए कविताएँ अपनी काया में ऋजु होकर भी अपने अर्थ और आभा में कतई ऋजु नहीं हैं. 'ऋजु नहीं' शीर्षक कविता जीवन की विराट पटकथा को एकदम कम शब्दों में बाँच देती है:

"दुखती देह में भी
खुश रहना है तुम्हें
निचुड़ते मन में भी तुम्हें मुस्कुराना है

मंच पर ऐसी ही है
तुम्हारी पटकथा

नेपथ्य में भी
तुम्हारे दुख की दिनचर्या
ऋजु नहीं है."

'चित्र में' शीर्षक कविता भी एकदम छोटी होकर भी कितनी बड़ी है!-

"चित्र में दुख है
रंगों ने चित्र को हिला कर रख दिया है!"

भाषा, कहन और कल्पनाशीलता के सुगढ़ सौंदर्य और काव्यानुशासन के उदात्त उदाहरण के रूप में 'आलथी पालथी' शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत करने से स्वयं को रोक नहीं पा रहा हूँ-

"आधे होंठ से पार्वती
आधे होंठ से शिव
पूरी करते हैं मुस्कान
नाभि में भी अंधेरे की
आधी गहराई शिव की है
आधी पार्वती की."

इसी क्रम में 'काजल' शीर्षक कविता भी उल्लेखनीय है. कुछ पंक्तियाँ देखिए-

"काजल आँख का गहना है
 सुंदरता सोई रहती है काजल में
 नर्तकी जिसे अपनी आँख की सज्जा में
 लगाकर या कहें जगाकर
 कर देती है हमें चमत्कृत.

 मेरी जिन करवट पर काजल लगा मिलता है
 लजाते हुए तुम अपने पल्लू से पोंछती हो
 फिर भी रह जाता है कुछ
 मेरी त्वचा रंध्रों में शेष.

 स्याह का सबसे श्रेष्ठ उच्चारण है काजल
 काजल रात का रंग है
 दिन की आँखों में लगा हुआ."

यद्यपि संग्रह में कुछेक कविताएँ ऐसी अवश्य हैं, जिन्हें और कसा जाता तो वे और अधिक पकतीं और पुष्ठ होतीं, तथापि पूरे संग्रह में बेहद विनम्रता से विस्मित कर देने वाली पंक्तियाँ विपुल मात्रा में हैं, जो कवि की कल्पनाशीलता और परिपक्व काव्य-दृष्टि के परिचायक हैं. उदाहरण के लिए 'बोल-बनाव' कविता की यह पहली ही पंक्ति- "चुप्पी प्रेम की सबसे प्रिय शरण स्थली है" या फिर 'आवाज' शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ- "आवाज की धूप/ इबारत में एक सूरज की जगह बनाती है/ अंधेरे के विरुद्ध." या कि 'जूड़े में फूल' कविता की ये पंक्तियाँ-  "नायिका ने अपने जूड़े में/ केवल फूल ही नहीं/ सारा बसंत बांध रखा है!" या फिर 'नृत्यलिपि' कविता की ये पंक्तियाँ- "नर्तकी की हर मुद्रा लिपि है/ जिसमें दर्शक का मन भी नाचता हुआ छपा मिलता है" या कि 'नर्तकी' शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ ही देख लीजिए- "कविता-कथा नृत्य सखी हैं/ एक ही गुरुकुल में सीखा है नृत्य!"

इसी क्रम में कहें तो 'संभव समभाव' शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ विस्मित ही नहीं, विकल भी कर देती हैं-

"लोकगीत समानता के कंठ है
जिसके घर चार दिन का अनाज नहीं है
बियाह प्रयोजन के समय लोकगीत उसे भी
सोने की थाल में जेमन खिला देता है
और चाँदी के लोटे से पिला देता है जल!"

वहीं 'खेत कटाई' शीर्षक कविता में वहअपने अंतस से अनुभव करते हैं कि"धूप में गेहूँ-जौ काटती औरतें/ बातों की फसलें भी काटती रहती हैं/ समय के माथे के सारे घाव/औरतों की निगाह से बाँचने से/ दुख का उच्चारण कभी गलत नहीं होता है!"




 (द्वारा -Tajnoor Khan)




(छह)
पर ऐसा नहीं है कि प्रेमशंकर शुक्ल अपनी कविताओं में केवल कलाओं से ही संगत निभाते हैं. वह अपनी कविताओं में अपने समय से भी मुठभेड़ करते हैं और समय की शिनाख्त भी करते हैं.प्रूफ शीर्षक कविता इसका सबसे मुखर उदाहरण है और मेरी प्रिय कविताओं में से एक भी. इस महत्वपूर्ण कविता में बेहद बेबाकी से वह कहते हैं-कितने लोग प्रूफ देख रहे हैं/ पर दुनिया की इबारत है कि सही नहीं छप रही है!”तना ही नहीं, वह कवियों-कथाकारों को भी कटघरे में खड़ा करते हैं- "कथाकार कहानी के नाम पर लिख दे रहा है रपट/ झूठ दिन-दोपहर साँच को रहा डपट/ अर्धविरामअल्पविराम, पूर्णविराम को अवकाश पर भेज/ खु‌श हैं युवा कवि कि-/ वे कविता में नए प्रयोग कर रहे हैं!"वह कवियों-कथाकारों को ही नहीं, हमारे समय के स्वनाम-धन्य आलोचकों को भी आड़े हाथों लेते हैं और आगाह करते हैं थोड़ी-सी बातशीर्षक कविता में-

"गुजारिश है आपसे
थोड़ी नजर साफ कर देखिए-
यह समय भी निराला-मुक्तिबोध का है
यदि नजर है कहीं
देखने की." 

वह साहित्य और समाज के उथलेपन और उतावलेपन को भी आवाज शीर्षककविता में बड़ी बारीकी से चिन्हित करते हैं-

"एक समय कुछ आवाजों में इतना अधिक लोहा था
कि अगली बारिश में ही खा गई उन्हें जंग
कुछ आवाजें ऐसी थीं कि लालच की बाढ़ में
मारी गई उनकी बाढ़!"

प्रेमशंकर शुक्ल भाषा के प्रति बहुत सजग और जिम्मेदार कवि हैं और इसलिए वह भाषा और कविता के बीच के सूक्ष्म रिश्ते को बखूबी समझते हैं. तभी तो वह जुगलबंदी शीर्षक कविता में यह रेखांकित करते हैं- "भाषा के साथ/ कविता की लंबी जुगलबंदी है/ इसलिए भाषा को ठस होंठ छूने से/ कविता को लगती है ठेस."

लेकिन यह देखना कितना दुखद है कि आजकल लोग भाषा को झूठ के भूसे से लगातार ठस बनाए जा रहे हैं.भाषा-दुख शीर्षक कविता में भाषा के इस दुख को वह बहुत बेधक ढंग से व्यक्त करते हैं- “झूठ-कोशने संक्रमित कर रखा है/ भाषा की श्वासनली/ दुर्बल हो रही है भाषा/ दिन-रात भाषा को काम करना पड़ रहा है/ सच के बरक्स और/ विरुद्ध अपनी ही आत्मा के.”भाषा को दिए दुख के लिए वह दूसरों को ही नहीं, स्वयं कवियों को भी जिम्मेदार मानते हैं और यह बात वह स्वयं स्वीकारते भी हैं 'हम कवि' शीर्षक कविता में कि "हम कवि/ अपनी भाषा के गुनाहगार हैं." इसलिए वह अपने इस गुनाह को भरसक कम करने की कोशिश भी करते हैं-

"जितना ही हम
प्रेम के रसायन से
करुणा के जल से मांजते हैं
हमारी भाषा की धातु
चमक उठती है वह सहसा
और जी उठता है उसका रेशा-रेशा
होता है उतना ही
हमारा गुनाह भी मुआफ."

प्रेमशंकर शुक्ल भाषा की रवानियत और रवायत- दोनों को शिद्दत से महसूसने वाले कवि हैं. इसलिए हमारी भाषा की वर्णमाला में श, ष और स का एक साथ होना उन्हें सिर्फ सुंदर ही नहीं, मानीखेज भी दिखता है. ', , ' शीर्षक कविता के अंत में इसलिए वह कहते हैं- "तीनों की अपनी-अपनी धूप है/ अपनी-अपनी ऊष्मा/ लेकिन साथ का उजाला/ भाषा का चरित्र चमकाता रहता है." इसी क्रम में 'तथा' और 'बिंदी-बिंदी' (....) शीर्षक कविताओं का उल्लेख यहाँ करना चाहता हूँ, जो इस बात के प्रमाण हैं कि प्रेमशंकर शुक्ल भाषा में कौतुक ही नहीं रचते, वरन् वह भाषा में गहरे पैठते हुए, भाषा को एक नई चमक और नया ध्वन्यार्थ भी देते हैं. 'तथा' शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ देखिए- 

"हमारे दोनों होठों के बीच
आवाज के लिए जगह देती हुई
जो जगह है वह 'तथा' है
वाक्य में जहाँ फांक दिखने लगे
सोचना चाहिए 'तथा' अवकाश पर है!" 

'बिंदी-बिंदी' कविता में कवि की उर्वर कल्पनाशीलता जिस ऊंचाई पर खड़ी है, वहाँ से जमीनी हकीकत साफ-साफ दिख जाती है, चाहे वह समाज की हो या फिर कविता या आलोचना की-

"पंक्ति में बिंदी-बिंदी किसी की अनुपस्थिति है
आदि-इत्यादि बिंदी के गोत्र के ही हैं
अमूमन मौजूद नहीं करना है जिसे
बिंदियाँ उसी संज्ञासर्वनाम या क्रिया की प्रतिनिधि हैं!
जमाने से है 
बिंदी-बिंदी में चालाकी रखने का चलन
कविता की बात होगी और ऐसी ही किसी बिंदी में
उपस्थित रहूँगा मैं
आलोचक भले मेरा नाम काट दे लेकिन कोई ना कोई बिंदी
करेगी मेरे नाम का प्रतिनिधित्व
दाखिल-खारिज के बीच कविता में मेरी बिंदी भर जगह
जरूर किसी ध्वनि के अनुस्वार की समस्या-पूर्ति होगी!"



(सात)
लेकिन कविता और आलोचना के आकाश में प्रेमशंकर शुक्ल की कविताएँ उन्हें बस बिंदी-बिंदी भर जगह पाने की नहीं, बल्कि पंक्ति-दर-पंक्ति जगह पाने की हकदार बनाती हैं! जमीन से जुड़ा कवि ही भाषा को मांज पाता है और कविता में सत्य का सामर्थ्य भर पाता है. सच कहें तो सच्चा आदमी ही सच्चा कवि हो पाता है और सच्चे कवि की कविता में ही 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' का एक साथ समावेश हो पाता है!

प्रेमशंकर शुक्ल अपनी कविताओं में केवल सुंदर पंक्तियाँ और सुंदर सत्य ही नहीं रचते, वह सुंदर शब्द और पद भी रचते हैं. और उनसे यह इसलिए संभव हो पाता है क्योंकि उनकी कल्पनाशीलता और रचनाशीलता में उनकी मिट्टी की नमी भरपूर बनी हुई है. इसलिए तो उनकी भाषा इतनी उर्वर है और उनकी कविता की फसल में पंक्तियाँ इतनी पुष्ठ! और पंक्तियों की बालियों में सिर्फ अर्थ और अभिप्राय का मीठा दूध ही नहीं भरा हुआ है, भाषा की खनक भी भरी हुई है! तभी तो वे वह मीरा-मनखुशमन,मेहनत-मन, पंक्ति-मन, पूरम्पूर, मन-बल, पुरखुश, राधा-पाँव, नृत्यलिपि, राग-मुख, हरहमेश, बात-नदी आदि जैसे ढेरों शब्द नए ध्वन्यार्थ के साथ गढ़ देते हैं!

और जब कभी उनकी अभिव्यक्ति एकदम घनीभूत हो जाती है तो वह सिर्फ सहायक क्रियाओं से ही नहीं, पंक्तियों से भी मुक्त हो जाते हैं! खजुराहो पर रची गई उनकी इक्कीस कविताएँ इसका अप्रतिम उदाहरण हैं. ये कविताएँ अपनी लघु काया में इतनी सुगठित, सौंदर्यवती और विराट हैं कि इनके शब्द-संयोजन में भी एक लय और वलय दिखता है! मानो इन कविताओं में भी पत्थरों को तराशकर खजुराहो की मूर्तियाँ ही उकेरी गई हैं! मेरी दृष्टि में खजुराहो पर रची गई ये इक्कीस कविताएँ इस संग्रह की सबसे सुंदर कविताएँ हैं और मेरी सबसे पसंदीदा कविताएँ भी. पहली ही कविता 'रतिप्रिया' का शिल्प देखिए-

"मूर्तियों में 
खजुराहो की
रचा 
मनुष्य का मन
गहन

रतिस्पर्श से मिला
बहुत मान 
मंदिर को."

तीसरी कविता'आलोकित'का यह आलोक भी गहिए-

"रति शिल्प निहारतीं
लजातीं
दसों दिशाएँ

लाज से खुलता 
रतिसुख अधिक

अमर
रतिताप से 
पत्थर!"

इन कविताओं को आत्मस्थ होकर पढ़े बिना उनकी आत्मा तक नहीं पहुँचा जा सकता. कुछ कविताओं को मौन होकर, ध्यानस्थ होकर ही पढ़ना होता है. अन्यथा उनका आस्वाद नष्ट हो जाता है. मैं भी इन कविताओं की यहाँ व्याख्या कर उनका आस्वाद नष्ट नहीं करना चाहता. बस इस श्रृंखला की अंतिम कविता 'विवस्त्र वासना' की पंक्तियों के साथ आपसे विदा लेना चाहता हूँ- 

"बाहर काम
भीतर जीतकाम

रचते इस तरह 
अर्थार्थ बहुतेरे
खजुराहो के मंदिर

जीवन में सुख की प्राणप्रतिष्ठा 
शिल्पियों का रहा महास्वप्न

देह का गीत 
संगीत आत्मा का 

प्रकल्प कला का यह सुंदरतम्
नित् नूतन!"
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राहुल राजेश
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