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परख : मल्लिका (मनीषा कुलश्रेष्ठ) : अरुण माहेश्वरी

Posted by arun dev on जून 18, 2019









भारतेंदु हरिश्चन्द्र के जीवन पर आधारित दो प्रारम्भिक महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं- ‘भारतेंदु हरिश्चन्द्र’, (मूल संस्करण-१९३५ के आस-पास प्रकाशित') लेखक हैं श्री ब्रजरत्नदास और ‘हरिश्चन्द्र’ (मूल संस्करण १९०५ के आस-पास प्रकाशित ) जिसके लेखक हैं बाबू शिवनन्दन सहाय. पहली पुस्तक में भारतेंदु की प्रणय कथा जिसमें बंगभाषी मल्लिका भी शामिल हैं, का ज़िक्र ‘चन्द्र में कलंक’ शीर्षक से किया गया है. दूसरी किताब में यह ‘गुलाब में काँटा’ शीर्षक से है.

ये शीर्षक ही बहुत कुछ कहते हैं. अगर यही कलंक है तो यह शुभ है इससे चन्द्र की चमक बढ़ती ही है.
उस समय महाराष्ट्र और बंगाल ये दोनों नवजागरण के पुरोधा थे. जिसे आज हम हिंदी पट्टी कहते हैं और जिसमें जैसा भी नवजागरण है वह यहीं से आया है, इससे सुंदर और क्या बात होगी कि वह खड़ी बोली हिंदी के पितामह कहे जाने वाले भारतेंदु के जीवन में प्रेयसी बन कर आई.

कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ ने मल्लिका को केंद्र में रखकर यह जो उपन्यास लिखा है वह इस बीच प्रेम को देखने की बदली हुई दृष्टि का परिचायक तो ही है, एक स्त्री प्रेम को किस तरह देखती इसका भी पता इससे चलता है.
इस कृति पर आलोचक अरुण माहेश्वरी की यह टिप्पणी आपके लिए.






मल्लिका
भारतेन्दु बाबू की प्रणय कथा                         
अरुण माहेश्वरी




ज मनीषा कुलश्रेष्ठ का हाल में प्रकाशित उपन्यास 'मल्लिका' पढ़ गया. मल्लिका, बंकिम चंद्र चटोपाध्याय की ममेरी बहन, बंगाल के एक शिक्षित संभ्रांत घराने की बाल विधवा. तत्कालीन बंगाली मध्यवर्ग के संस्कारों के अनुरूप जीवन बिताने के लिये काशी को चुनती है. संयोग से काशी में वह भारतेन्दु हरिश्चंद्र के मकान के पिछवाड़े की गली के सामने के मकान में ठहरती है. मल्लिका के यौवन की झलक और साहित्यानुराग ने भारतेन्दु बाबू को सहज ही अपनी ओर खींच लिया. दोनों के प्रणय-प्रेम का यह आख्यान भारतेन्दु बाबू की असमय मृत्यु तक चलता है. काशीवासी मल्लिका अंत में वृंदावनवासी बनने के लिये रवाना हो जाती है !

यह है भारतेन्दु बाबू की बंगाली प्रेमिका मल्लिका पर केन्द्रित इस उपन्यास के कथानक का मूल ढांचा. इस ढांचे को देखने से ही साफ हो जाता है कि बांग्ला नवजागरण की पीठिका से आई मल्लिका का हिन्दी नवजागरण के अग्रदूत भारतेन्दु से संपर्क के बावजूद इस प्रणय कथा में उनके स्वतंत्र चरित्र के विकास की कोई कहानी नहीं बनती दिखाई देती है. यह किसी खास परिपार्श्व के संसर्ग से बनने-बिगड़ने वाले चरित्र की कथा नहीं है जो अपने जीवन संघर्षों और अन्तरद्वंद्वों की दरारों से अपने समय और समाज को भी प्रकाशित करता है. यह शुद्ध रूप से एक विधवा की प्रेम कथा है, प्रणय-प्रेम गाथा है, जिसका रूपांतरण उसके काशीवास से वृंदावनवास में स्थानांतरण तक ही होता है. एक स्वाधीन प्रेमी पुरुष की जीवन-लीला का पार्श्व चरित्र.

प्रणय— सचमुच इसकी कथाओं का भी कोई अंत नहीं हुआ करता है. इसकी सघनता एक स्वायत्त, समयोपरि सर्वकालिक सत्य का संसार रचती है, ऐसे एकांतिक सत्य का जो दो प्रेमियों का पूरी तरह से अपना जगत होता है. समाज जो कुल, क्रम की श्रृंखलाओं को मानता है, प्रेम की ऐसी एकांतिक सर्वकालिकता पर सवाल करता है; स्त्री-पुरुष के बीच के दैहिक संबंधों को अलग सांस्कृतिक स्वीकृति देने से परहेज करता है. आज वैसे ही विरह प्रेम को मध्ययुगीन खोज बताने वाले कम नहीं है. इसे स्त्रियों का विषय भी कहा जाता है. लेकिन पुरुष प्रणय के प्रति उदासीन नहीं बल्कि उत्साहित ही रहता है— इसी सत्य के आधार पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि स्त्री-पुरुष संबंधों की वासना और सुख सर्वकालिक सत्य है. प्रणय-निवेदन के असंख्य और पूरी तरह से अलग-अलग रूप हो सकते हैं, लेकिन यह स्वयं में एक सत्य की अनुभूति का भाव है. प्रणय कथाओं के स्वरूप मूलत: इसके सामाजिक परिप्रेक्ष्य के भेदों पर टिके होने पर भी इसके अपने जगत का आधारभूत अभेद एक एकांतिक, स्वायत्त भाव होता है. मनुष्य के सामान्य क्रिया-कलापों के बीच दो व्यक्तियों का, एक युगल का अलग टापू— 'नदी के द्वीप'.


यही वजह है कि लेखकों का एक वर्ग आपको ऐसा मिलेगा जो अक्सर सिर्फ प्रणय-प्रेम कथाएं ही लिखता है. वे जीवन भर प्रणय की अनुभूतियों को व्यक्त करने के नानाविध अलंकारों, भाव-भंगिमाओं से लेकर काम क्रिया तक के प्रकरणों की अभिव्यक्ति को साध कर उसे अलग-अलग स्थानिकताओं की लाक्षणिकताओं के साथ उतारते रहते हैं. सारी फार्मूलाबद्ध हिंदी फिल्मों की शक्ति भी इसी प्रणय के जगत की एकांतिकता के सत्य से तैयार होती है. इन प्रणय कथाओं में आम तौर पर स्थानिक विशिष्टता को उकेरने के लिये इकट्ठा किये गये सारे अनुषंगी उपादान लगभग महत्वहीन होते हैं, मूल होता है प्रणय के अपने जगत के उद्वेलनों में पाठक-दर्शक को डुबाना-तिराना.


लेखक प्रणय के इस उद्वेलन के अनुरूप ही भौतिक परिवेश को भास्वरित करता है, मसलन् इसी उपन्यास में —

“'धिक्क...' कहकर उनके हाथ से पन्ना छीनने लगी. उन्होंने उसे बाह से थाम लिया मानो वहीं पर सारा मनोभाव संप्रेषित हो चुका था. आगे बात करना असंभव हो रहा था. बातें बस आँखों ही आँखों में थीं कभी अपेक्षा से देखती आँखें तो कभी शर्म से झुकती आंखें. दोनों के बीच जो लहर प्रवाहित हो रही थी उसे दोनों महसूस कर रहे थे और एक उत्कट आकांक्षा उफान मारने लगी थी. लैंप की बत्तियां नीची हो गईं...छाया और प्रकाश परछाइयों का मद्धिम जादू नींद से जाग गया. वह नैसर्गिक निकटता और विश्वास ही था कि वह उस दिन दैहिक रूप से उनके करीब आ गई. पहला दैहिक संसर्ग...। पहली-पहली तुष्टि....तेज हवा वाली रात थी, मल्लिका के मन का संशय मीठे अनुनाद में बदल गया. चंद्रमा क्षितिज से ऊपर उठ गया था. संकोच के बंध टूट रहे थे.”
(पृष्ठ – 85)

इतनी ही सुनिश्चित होती है इस एकांतिक जगत के युगल की शंकाएँ, अंतरबाधाएं —

“मैं आरंभ से जानती हूँ कि आप आधिपत्य की वस्तु नहीं हो. आपसे आकृष्ट हो मैंने सामाजिक रीतियों को तोड़ा है. संसार के प्रति नहीं अपने हेतु अपराध किया है.” (पृष्ठ – 102)

“मैंने क्या बुरा किया उस आलीजान को दूसरे के कोठे से उठा कर घर खरीद दिया. उसे शुद्ध कर माधवी बना दिया. अब वह मेरे संरक्षण में है, अब वह केवल मुजरों में जाती है. महफिलों में गाती है.'
“मल्लिका बुझ गई. संरक्षण, संरक्षिता, रक्षिता !!” (पृष्ठ – 104)

इसी प्रकार तयशुदा होता है ऐसे लेखन में भाषाई अतिरेक. देखिए मल्लिका के घर की चारदीवारी में प्रणय के दृश्य का ब्रह्मांड-व्यापी स्वरूप —  

“ज्यू के मांसल अधर पहली बार मल्लिका के अधरों के अधीन थे. सूर्यास्त हो ही रहा था, वातावरण में दूर-दूर तक रंगराग छा गया था. गवाक्ष से भीतर आते समीर में चंपई गंध थी. धरती और ब्रह्मांड एक-दूसरे के विपरीत गति में संचालित थे. इस विचित्र घूर्णन में प्रकृति भ्रमित-सी थी. पक्षी नीड़ों की ओर लौटते हुए चुप-से थे.” (पृष्ठ – 133)

और माणिकमोहन कुंज के प्राचीन मंदिर के अलौकिक वातावरण में हरिश्चन्द्र और मल्लिका के आपस में मालाओं के आदान-प्रदान के बाद के भावोद्वेलन का बयान —

“क्या हुआ जो मैं आज तुम पर भर-भर अंजुरियाँ मंदार पुष्प न बरसा सकी, तुम्हें तो इन सूखे बेलपत्रों से रीझ जाना चाहिए था. तुममें और मुझमें घना अंतर है ! तुममें तो भर प्याला देने की क्षमता है, वो तो मैं हूँ, बूँद-बूँद के लिए तृषित चातक.'
“मल्लिका मैं तुम्हें प्रकृति और परमेश्वर द्वारा प्रदत्त भीतरी और बाहरी सौंदर्य की विपुल राशि मानता हूँ,' ज्यू उसे अंक में भरते हुए बोले.” (पृष्ठ – 143)

और इन सबमें जो अंतरनिहित हैं, वह है प्रणय प्रेम के दैहिक और भावनात्मक सत्य की शाश्वतता.
“'उई, केश मत खींचिए ना, जो भी हो, हम ऐसी ही मल्लिका है, ज्यू आपको हमें प्रेम करना होगा.' निराले स्त्रैण ढंग से दीवार की ओर करवट ले कर, मान करते हुए मल्लिका बने हरिश्चन्द्र बोले....हरिश्चन्द्र उधर मुख किए-किए मुस्कुराए. मल्लिका ने उनकी कमर पर हाथ रखा और उन्हें पलटा कर अपने दुर्बल बाहुबंद में भर लिया और ज्यू से बोली —'कुछ बोलोगी नहीं ?'
'प्रेम में निरत युगल के बीच मौन ही तो बोलता है....
'हम तो आज वाचाल है, हमारे अधर बढ़ कर बंद कर दो न ज्यू,' कह कर ज्यू ने मल्लिका को स्वयं पर गिरा लिया.” (पृष्ठ -132-133) 

“क्या हुआ खल लोग तुझे मेरी आश्रिता कहते रहे...तुझे इससे क्या, तेरा प्रेमी और तू जिसकी सरबस है...उसने तो तुझे धर्म-गृहीता माना है. देखना...आगे ऐसे लोग भी उत्पन्न होंगे जो तेरा नाम आदर से लेंगे. मेरी और तेरी जीवन पद्धति समझेंगे. इस प्रेम के दर्शन को मान देंगे.”

दरअसल, सच्चा और अकूत प्रेम ही ऐसे प्रणय आख्यानों के सत्य की अनंतता का स्रोत होता है. उसमें कथा को मिथकीय और साथ ही नाटकीय रूप देने की क्षमता होती है. प्रणय का हर दृश्य उसके यथार्थ स्वरूप से काफी विशाल होता है, श्री कृष्ण के विराट रूप की तरह. इसीलिये मिथकीय होता है, ईश्वरीय कृपा और दिव्य नियति स्वरूप. इसमें स्थानिकता अथवा परिवेश के अन्य पहलू नितांत निर्रथक और अनुर्वर होते हैं. प्रणय से हट कर प्रेम के विछोह की दरारों से जो प्रकट होते हैं, जो पूरे कथानक को दूसरे फलक पर ले जाते हैं, उनका शुद्ध प्रणय कथाओं में कोई मूल्य नहीं होता. यहां भी नहीं है.

बहरहाल, देह और भाषाओं की आदमी की दुनिया में प्रेम के भुवन का सत्य भी कोई अलग या भिन्न नहीं है. प्रणय उसी के देह पक्ष की सच्चाई को विराट, मिथकीय, नाटकीय रूप देता है. 'मल्लिका' में लेखिका ने इसे ही साधने की एक और कोशिश की है.

भारतेन्दु बाबू के जीवन के अन्य सारे प्रसंग अथवा मल्लिका के पिता के संसार के बंगाल के तथ्य, नवजागरण की आधुनिक और क्रांतिकारी बातें सिर्फ उनके लिये ही मायने रखते हैं, जो उनसे पहले से ही परिचित है. ये सब उपन्यास के सजावटी अनुषंगी मात्र है. भारतेन्दु युग के बौद्धिक विमर्श यहां इसलिये भी निरर्थक हो जाते हैं क्योंकि मल्लिका-भारतेन्दु के संबंधों में उनका कोई स्थान नहीं होता और मल्लिका की बंगाल की बलिष्ठ पृष्ठभूमि के बावजूद उसके लिये उन बातों का कोई बहुत ज्यादा अर्थ नहीं होता.

कहना न होगा, बंकिम युग की अनुभूतियों और भाषा का यह विन्यास उस युग के अपने सामाजिक अंतरविरोधों के व्यापक वितान से बाहर की एक स्वायत्त प्रणय की एकांतिक अनुभूति का जगत है. मल्लिका और हरिश्चन्द्र महज सुविधाजनक अवलम्ब हैं.  
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arunmaheshwari1951@gmail.com

निज घर : और वह सुघरका : सत्यदेव त्रिपाठी

Posted by arun dev on जून 17, 2019








‘करियवा’, ‘उजरका’ के बाद अब ‘सुघरका’. ये तीनों बैलों के नाम हैं. एक समय कृषि-संस्कृति के केंद्र में रहे बैल अब सभ्यता की परिधि से भी दूर जा चुके हैं. जिनके कंधों ने सदियों से मनुष्यों का बोझ उठाया आज उनका पैदा हो जाना खुद में एक बोझ है.

मनुष्य प्रकृति का ही एक हिस्सा है पर समझता वह खुद को मालिक है. इस (अन)अधिकार ने उसे विनाश के कगार पर पहुंचा दिया है. अब समय है कि साहित्य, कला और राजनीति के केंद्र में प्रकृति को लाया जाए.

हिंदी में कभी प्रकृति चेतना का साहित्य विकसित हुआ तो उसकी सबसे बड़ी लेखिका महादेवी होंगी. जिस लगाव और बराबरी पर वह मनुष्यइतर प्राणियों से व्यवहार करती हैं वह दुर्लभ है. अब यह जांचने का भी समय है कि जो हमारे बड़े लेखक हैं उन्होंने पशुओं के नामों का किन अर्थो में उपयोग/ दुरूपयोग किया है. अगर आप किसी मनुष्य को कुत्ता, गधा या सूअर कहते हैं तो आप प्रकृति विरोधी चेतना के लेखक हैं. खैर चेतना का विस्तार समय के साथ होता है.


बैलों को केंद्र में रखकर सत्यदेव त्रिपाठी के संस्मरण का पहला भाग पसंद किया गया है, यहाँ तक कि रंगमंच और फिल्मों से जुड़े कलाकारों को भी यह पसंद आया है. रोजमर्रा की बेजान भाषा के बरक्स जानदार भाषा में लिखा गया यह संस्मरण अपूर्व है. इसका दूसरा हिस्सा प्रस्तुत है. पहले का लिंक भी दिया जा रहा है.  




और  वो  सुघरका                                   
सत्यदेव त्रिपाठी




करियवा-उजरका के जाने के सात साल बाद आया सुघरका ....
इस बीच बडा पानी गुजरा सर से...

खेत वग़ैरह रेहन रखके पहले एक, फिर काम न चलने पर दूसरा बैल भी खरीदा, पर कम पैसे लगाये, तो कम औकात के बरध मिले.... ऊपर से मेरे बढते अभावों में पुन: उनकी अच्छी जतन न होती और काम तो ज्यादे होते ही.... सो, वे भी कमज़ोर रहते और खेती भी ठीक से न हो पाती.... फिर भी लटते-बूडते एक साल निकला.

लेकिन तभी आ गया डाक-तार विभाग में क्लर्क की नौकरी का पत्र – ‘जिमि करुणा महँ अद्भुत रस’.... संयोग से वे 1971 की गर्मियों के दिन थे, जिसे ‘जेठी का माथा’ कहते हैं - जब साल भर की खेती-बारी का विधान तय होता है. और मैंने आव देखा, न ताव; सारी खेती अधिया पर देकर, बैलों को बेचकर चले जाने का फैसला कर लिया.... माई-बडके बाबू अवाक्.... जिसने भी सुना – अपने गाँव से लेकर आस-पास के गाँव एवं नात-हित... सबलोग समझाने आये.... एक बीघा खेत बेचकर कर्ज़ चुकता करके ठाट से खेती करने की नेक सलाहें दीं...सब सचमुच मेरा हित चाहते थे, पर मैंने एक न सुनी – पुश्तैनी सम्पत्ति को बेचने से साफ इनकार कर दिया. और सबकी अनसुनी करके निकल ही गया....

पत्र था चयन की सूचना का, बुलावा का न था. एक साल लग गया प्रशिक्षण की बारी आने में. इस दौरान छोटे-मोटे काम करके रिश्तेदारों के यहाँ रहा – कार से दुर्घटना का शिकार होकर तीन महीने अस्पताल में बीते....

ट्रेनिंग के बाद फरवरी 1973 में नौकरी पे लगा, तो पढने की अतृप्त इच्छा का भूत सर पे चढ बोलने लगा - जून में बी.ए. में दाख़िला कराके माना. एमए. तक चार साल लगने ही थे. गुरुवर चन्द्रकांत बान्दिवडेकर की संस्तुति पर परीक्षाफल आने के तीन महीने पहले ही 6 जुलाई 1977 से चेतना कॉलेज में प्राध्यापकी मिल गयी....

पुराने पाठ्यक्रम की अतिरिक्त कक्षाएं अलग से मिल गयीं. खूब काम किया, अच्छे पैसे आये और जून, 1978 में घर जाके सारा क़र्ज़ अदा किया और ठीक 7 सालों बाद नये सिरे से खेती शुरू करायी.... नक़द वेतन व कुछ खेत देकर पूरे समय का आदमी रखा और दो बैल खरीदे, जिनमें आया वह सुघरका....

उसका नाम सुघरका न था, बल्कि उसका कोई नाम ही न था. ये तो करियवा-उजरका के वजन पर मैं लिख रहा हूँ – सुघरका, क्योंकि वह सचमुच बहुत ‘सुग्घर’ – सुगढ (वेल शेप्ड) था – भरत व्यास के शब्दों में कहूँ, तो ‘बडे मन से विधाता ने ‘उसको’ गढा...(घडा नहीं, जैसाकि उस गीत में गाया गया है). उसकी सुघरई ही थी कि पहले ही दिन जो बैल खरीदने निकले और घर से तीन ही किमी. पश्चिम के गाँव बक्कसपुर (बक्सपुर-बख़्शपुर) में वह दिखा, तो सप्ताह भर चहुँ ओर दसों कोस के मान में सायकल से ढूंढते रहे, कोई बैल मन को भाया ही नहीं, क्योंकि आँख में यह जो गड गया था– बल्कि गोपियों के कृष्ण की तरह ‘तिरिछे ह्वै जु अड्यो’ हो गया था.... 

वह जमाना था कि एक बैल खरीदने के लिए हम सात लोग जाते – जंगी काका, प्रभाकर चाचा, रामाश्रय भाई साहेब, रामप्यारे-रामपलट व रामपति भइया और मैं- ऐसी सामाजिकता व सामूहिकता तब थी.... सबके पास समय था, क्योंकि दिली इच्छा थी. शायद इसी को पाने-जीने मैं मुम्बई छोडकर गाँव आया, पर अब तो समूची जिन्दगी ही ‘समय और इच्छा के द्व्न्द्व’ में नष्टप्राय हो चुकी है– समाज-समूह की बात ही क्या...!! 

ख़ैर, गँवईं सम्बन्ध में सबसे परिचित होने के बावजूद इस बैल के मालिक सज्जाद भाई सात-सात लोगों के इसरार-हुज्जत के बावजूद 1200 रुपये से एक पैसा कम करने को तैयार न थे. तर्क देते – ‘1300 कहके 1200 करता, तो कया करते आप? छह महीने बाद दीजिए, बैल आपका है, ले जाइये, पर दीजियेगा 1200 ही...’. बात की ऐसी सलाहियत भी थी हमारे ‘लोक’ में तब...!! आखिर हारकर उसी कीमत पर लाये – हारे सज्जाद भाई से नहीं, सुघरके की सुघरई से....

लेकिन कहना होगा कि वह आया, तो देखकर पूरे गाँव का जी जुडा गया. गाँव ही क्या, आते-जाते राही भी खडे हो जाते. देर तक निहारते.... कभी-कभी तो वह बैठा होता, तो आने-जाने वाले लोग पूरा देखने के लिए उठा देते.... हालत ऐसी हो गयी कि खेत से चलके आया होता, उसे आराम की ज़रूरत होती – बैठा होता और कोई उठा देता.... इस हरकत से माँ एकदम झल्ला जाती.... परिणाम यह हुआ कि चलके आने के बाद उसे अन्दर बाँधा जाने लगा, ताकि बैठ के निश्चिंतता से आराम कर सके.... उस बार मेरे मुम्बई आने के पहले माँ ने बरदौर (बैलों वाले घर) में दरवाजा लगवाया – दीन्हेंउ पलक कपाट सयानी की तरह.... ऐसा पहली बार हुआ, वरना बैलों के घर बिना दरवाजे के ही होते रहे. बस, दरवाजे की दोनो दीवालों में आमने-सामने गड्ढे जैसा बडा छेद होता, जिसमें रातों को बाँस का एक टुकडा लगा दिया जाता, ताकि जानवर छूट जाये, तो बाहर न जा पाये.... उस बाँस के टुकडे को ब्योंडा कहते – ब्योंडा लगाना – वही भारतेन्दु बाबू वाला – ‘लै ब्योंडा ठाढे भये श्री अनिरुद्ध सुजान’. अब माँ बाहर से ताला लगा देती. उसे डर था कि रात को कोई ‘छोर’ ले जायेगा.... ताले के बावजूद रातों को उठ-उठके देखती.... इस पर शुरू-शुरू में गाँव में कुछ बोली (तंज) भी बोली गयी..., पर माँ पर फर्क़ न पडा....

लेकिन सूरत ही नहीं, उसकी सीरत भी शानदार थी. सज्जाद ने कहा था – भाई, चाल इसकी मीठी है - दौड के नहीं चलता, चलेगा अपनी चाल से, पर आपके मन और जरूरत भर. यह सच था. दिन भर भी हल चलाओ, या जो भी काम लो, एकरस चलता रहता – न चेहरे पर सिकन, न हाँफा (तज साँस), न झाग़, न तनिक भी कसरियाना.... सारा पैसा इसमें लग गया था, इसलिए दूसरा बैल सस्ता लिया था, तो औकात में हल्का था. इसलिए बडे और कठिन काम के लिए पियारे भइया (रामप्यारे भाई) के ऐसे ही कद्दावर बैल के साथ जोडी बन गयी थी. पूरे गाँव के कठिन काम यही जोडी करने लगी. 

उस साल सारे गाँव का गन्ना इन दोनो की जोडी ने ही बोया. गन्ने के हल को ‘पहिया धरना’ कहते, जो बहुत मेहनत का काम होता. इसमें नौहरे (भारी हल) में अतिरिक्त सँगहा (पुआल-पत्ते) बाँधके चौडा-मोटा कर दिया जाता, ताकि चौडी-गहरी नाली बने. इसमें ‘हराई फानना’ (पहली लाइन चलाना) बडे कौशल का काम होता. इसके लिए बैल व हल चलाने वाला बहुत कुशल होने चाहिए. और यह जोडी तथा पियारे भइया की ऐसी ही कुशल संगति थी – हराई तो सबकी उस साल पियारे भइया ने ही फानी थी.... और ऐसी संगतियां हर गाँव में हर समय कोई न कोई होती ही थी.... इस तरह सारे गाँव का जी ही नहीं जुडाया, सुबिस्ते से हुए बहुत चौचक काम से गाँव लाभान्वित भी हुआ....             
सूरत-सीरत के साथ ही सुघरका की आदतें भी निराली थीं. खेत से काम करके आते ही सारे बैल नाँद पे भागते और हाबुर-हाबुर (हाली-हाली - जल्दी-जल्दी) खाने लगते..., लेकिन सुघरका हल से आकर बैठ जाता – दो-चार घण्टे. पूरी थकान उतारके तब खाता. इतने में शाम के 4 बज जाते – खाते-खाते छह बजते. तो, शाम का खाना भी देर रात को खाता. उसकी नाँद को चारे से भरकर, खरी-दाना चलाके माँ सो जाती. सुबह नाँद में एक तिनका तक न मिलता – खाके सब चाट जाता. इसी तरह सारे पशु अमूमन पानी-चारा साथ में खाते हैं, जिसमें यथाशक्ति खरी-दाना डाला जाता है. इस समूचे कार्य-व्यापार को ‘सानी-पानी करना’ कहते हैं– पानी में सना चारा-दाना. लेकिन अपना यह बच्चा सूखा चारा खाता. उसी में खरी-दाना मिला देते. और खाने के बाद अलग से पानी पीता – दो बाल्टी पूरा. या तो बाल्टी में ही रख दो या फिर उसकी नाँद में डाल दो. 

सुद्धा (सीधा) इतना था कि कोई भी बाँधे-छोडे-सहलाये..., उसके ऊपर लोटे-पोटे, कुछ न बोलता. उसके लिए वह मुहावरा सबकी ज़ुबान पर चस्पा हो गया था – ‘एकदम गऊ है’. बस, एक ही संवेदनशील बिन्दु (सेंसेटिव प्वाइण्ट) था उसका – नाक के ऊपर दोनो आँख के बीच तक के हिस्से पर वह ‘पर तक न रखने’ देता. उसे छूने, साफ करने की बहुतेरी कोशिश मैंने चुनौती की तरह की; लेकिन नहीं, तो नहीं छूने दिया.... बस, साल में दो-एक बार जब मैं घर रहता, तो तालाब में नहलाकर पौंडाते हुए पानी में दबाके उस भाग को धो देता और चुनौती पूरा करने का मनोवैज्ञानिक संतोष पा लेता.... वरना तो ऐसे मे नाथ (नाक को छेदके गरदन में बँधी रस्सी) को खींचते हुए पकड कर बैलों को काबू (कंट्रोल) में लाने का अचूक चलन है. (क्या यही तो नहीं है आरतों को भी सुहाग के प्रतीक रूप में नथ पहनाने का मतलब? कुछ औकात न हो, तो भी नथुनी-पियरी से ब्याहने का मतलब? ‘नथ उतारने’ का मतलब और नथुनियां ने हाय राम बडा दुख दीना’ गाने का मतलब...?) किंतु इसे आज़माने पर भी अपनी नाक की सारी पीडा की परवाह न करते हुए हमारा सुघरका अपने दोनो अगले पाँव उठाकर खडा हो जाता..., लेकिन तब भी हमें हानि पहुँचाने तो क्या, फुंकारने तक की प्रतिक्रिया नहीं देता.....   

ऐसे प्राणी को पाकर माँ को तो समझो कोई निधि ही मिल गयी हो. जैसे काका उजरका-करियवा की नींद सोते-जागते, इसके साथ माँ का जुडाव उससे भी कहीं अधिक हो गया.... जाहिर है कि उसमें स्त्रीत्त्व की ममता के गाढे रंग ने ऐसी मिठास व प्रियता भर दी, जो अकथनीय व अविस्मरणीय है. हालांकि उसी ममत्त्व की अतिशयता ने सुघरका के खाने-पीने, रहने-सहने में कुछ अतिवादी आस्वाद व अरुचियां भी पैदा कीं, तो माँ में आसक्ति की कातरता-भीरुता, लेकिन  अनुरक्ति (ऑब्सेशन) की ये अनिवार्य, पर अपरिहार्य हानियां (निसेसरी इविल्स) हैं.... उन्हीं दिनों घर के पीछे का हिस्सा मैंने पक्का कराया, जिसमें बायीं तरफ का कमरा माँ के सोने का था.  उसी के बायें बाहरी तरफ बैलों का घर था. मैंने वहीं बडा जंगला लगवा दिया, जिसे खोलकर जब चाहो, उन्हें देख लो. फिर तो सोने में भी सुघरका पैर पटके, तो जंगला खोल कर माँ देखने लगे.... इस तरह ‘उसकी नींद सोने-जागने’ का मुहावरा व्यवहार में भी सार्थक हो गया.....

लेकिन दुर्भागय वश यह स्नेह-सम्बन्ध व कर्मयोग ढाई साल ही चला. तीसरे कार्त्तिक में ठीक बुवाई के वक्त वह काम करने वाला अचानक एक सुबह बिना बताये नहीं आया. पूछने पर वेतन बढाने की बात माँ के साथ दबंगई से की, जो मुझे असह्य रूप से नाग़वार लगा. खेती के अलावा पशुओं के काम करने वाले किसी के न होने की हमारी मजबूरी को भुनाना चाह रहा था. छोटे-मोटे पचडे भी बहुत थे, जिससे माँ को अवांच्छित कष्ट होता. लिहाजा पहली बार की ही तरह मैंने तुरत-फुरत में सब कुछ बन्द कर दिया. सारी खेती ठीक पर दे दी, जिसमें करने वाले का नुक्सान हो या फायदा, हमें उतना अनाज मिल जाता है, जितना बीघे के हिसाब से तय हुआ है. यही आज भी चल रहा है. अनाज की मात्रा समय के अनुसार बढती है. उस वक्त भारी समस्या दोनो बैलों की थी. बेचने की घोषणा कराके मैंने सुघरके को पियारे भइया और दूसरे को रामपलट भइया के खूँटे बँधवा दिया. उनसे कहा – जब तक नहीं बिकते, खिलाइये और जोतिये. जब दाम खुल जाये, तो उतने में चाहे, तो आपलोग ही ले लीजिए या फिर बेच दीजिए....

आपात्कालीन ही सही, यह व्यवस्था इसलिए भी अच्छी सिद्ध हुई कि सुघरका और माँ एक दूसरे से छूटकर भी जुडे रहे.... बार-बार माँ जाके दोनो का खाना-पीना देख आती, उनके मन का कुछ खिला आती . सुघरका को जब खाने-हटाने के लिए छोडा जाता, खिंचाके अपने घर चला आता. चलके खेत से आता, तो जोडी वाले बैल को लिये-दिये वहीं चला जाता.... बडी मुश्किल से वापस जाता - कुछ-खिला-पिला के, सहला-चुमकाकर के माँ विदा करती – रो भी लेती.... इस तरह दोनो के मन को धीरे-धीरे मोहँठने का मौका मिल गया....

करियवा-उजरका का जाना तो दैविक दुख था, जिसमें अपने अभाव भी मिल गये थे. इसीलिए दोनो को पूरने की चाहत दबकर भी बनी रह गयी थी, जिसने यह संसार फिर रचवाया. लेकिन समर्थ होकर भी इस भौतिक विडम्बना का क्या करें...? मनुष्य की इस फितरत को बदला नहीं जा सकता, के अहसास ने फिर तीसरी बार किसी ‘सँवरइया’ या ‘समया’ (रंग के अनुसार बैलों के सामान्य नाम) को रखने के सपने को तोड दिया.... फलत: ‘अब अपने तईं खेती शुरू नहीं करूँगा’ की कसम बिना खाये ही यह हीरामन की ‘तीसरी कसम’ सिद्ध हो रहा है.... और कैसे कहूँ कि इन तीनो पशुओं की टीस कितनी-कितनी बार पशु बनने से बरबस बरजती रहती है....


अथ क्षेपक – पशु-कथा का वर्तमान -  
अब बैलों के उस घर में हमारी गाय अकेले रहती है और पंखा भी लग गया है. अभी पिछले 6 जून तक अपने बछडे के साथ रहती थी. 7 जून को उसे छोड दिया गया. साल-सवा साल पहले जिस शुक्र के दिन वह बच्चा पैदा हुआ था, मेरी बडी बहन यहीं थी – नामकरण की मास्टरनी है वह. धरती गिरते ही कहा था – शुकदेवजी आये हैं.... पर बाछों की आगामी त्रासदी में उनके साथ होने की खुशियां भी नहीं मना पाते – नाम लेकर कभी खेलाया नहीं उसे, खेला नहीं उसके साथ...हमेशा एक डर की तलवार टँगी रही.... आखिरी बार इन माँ-बेटे से मिला था अभी अप्रैल के अंत में. तब गाय दूध बन्द करने की प्रक्रिया में थी. जिस बेला दूध नहीं देना होता, गायें पिलाती नहीं बच्चों को. ऐसे में मैं उसे कुछ खिलाने-सहलाने जाता, तो मेरी उंगलियां यूँ चूसने लगता – गोया उसकी माँ की छिम्मियां (स्तन) हों. माथा लडाकर लाड कराता था. उसका गोरा-गदबदा स्पर्श भुलाये नहीं भूलता.... ऐसे प्यारे-दुलारे बच्चे को छोड दिये जाने की आसन्न पीडा से ‘वाष्पस्तम्भितकण्ठत्वाद्’ उसी पर लिखने बैठ गया था...और दो-चार पंक्तियां लिखते ही अचानक करियवा-उजरका और उस सुघरका की स्मृतियों का सोता फूट पडा.... सो, इस पूरी पशु-कथा लेखन का श्रेय उसी बच्चे को है, जो आज जाने कहाँ होगा....

अस्तु, इसे उस बच्चे की याद को समर्पित करते हुए बेबस दिल की आहों से प्रार्थना करता हूँ कि वह जहाँ हो, कुशल से हो...!! व्यवस्था से मजबूर किसान और कर भी क्या सकता है? 
(पहला हिस्सा)
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सम्पर्क:
सत्यदेव त्रिपाठी
मातरम्, 26-गोकुल नगर, कंचनपुर, डीएलडब्ल्यू, वाराणसी – 221004

मो.- 9422077006   

मैं कहता आँखिन देखी : विष्णु खरे से व्योमेश शुक्ल की बातचीत

Posted by arun dev on जून 15, 2019























 (फोटो सौजन्य : सुघोष मिश्र)


विष्णु खरे से व्योमेश शुक्ल की यह बातचीत मुक्तिबोध पश्चात हिंदी के दो महत्वपूर्ण कवियों रघुवीर सहाय और श्रीकांत वर्मा पर  केन्द्रित है. कविता की जैसी प्रकृति है वह कुछ भी केन्द्रित नहीं रहने देती. आप बात शुरू करते हैं चिड़िया पर, पर वह तो आकाश से होते हुए आखेटक तक पहुंच जाती है और संस्कृति की किवाड़ पर अपनी चोंच से चोट करने लगती है.

साहित्य, समाज, राजनीति, कुंठा, अहंकार सब शामिल हैं इसमें. दो कवियों का कवियों पर यह संवाद कविता की पगडंडी पर दूर तक जाता है.  



धर्मनिरपेक्षता भारतीय कविता का सबसे बड़ा हासिल है      
विष्णु खरे से व्योमेश शुक्ल की बातचीत






कवि, आलोचक, अनुवादक, पत्रकार और फ़िल्म-अध्येता विष्णु खरे शुरू से अंत तक हिंदी को असहज करते रहे. उनकी निर्भीक, तीखी, जटिल और अपने वक़्त से आगे की बातें लगातार लोगों को उलझन और तक़लीफ़ में डालती रहीं. फिर भी, इस दुनिया ने उन्हें बहुत प्यार किया. उन्होंने भी इस दुनिया को बहुत प्यार किया. उनका गुस्सा रमते जोगी की फटकार जैसा था, जो हिंदी की कृतज्ञ-कृतघ्न बिरादरी पर आशीर्वाद और शाप की तरह गुज़रा. साहित्य संसार ने अनोखे ढंग से उन्हें बर्दाश्त किया और वह भी इसे सह गये. इस अनमोल पारस्परिकता का बीते उन्नीस सितंबर को पटाक्षेप हो गया जब उनके शरीर ने नई दिल्ली के जी. बी. पंत अस्पताल के सघन चिकित्सा कक्ष में अंतिम साँसें लीं. इस मृत्यु पर सोशल नेटवर्क पर मची गहमागहमी के बाद यह भी तय है कि उनकी कविता और आलोचना का खाता जल्दी बंद होने वाला नहीं है. जब तक बुरी और नक़ली कविता को सज़ा मिलती रहेगी, उनकी शख्सियत की स्पिरिट ज़िन्दा और आबाद रहेगी.
उनके साथ यह बातचीत दिसंबर 2014 में बनारस में हुई थी. इस बातचीत के साथ हमने उनकी सौ कविताएँ भी रिकॉर्ड की थीं.  

मैं आपसे आज की हिंदी कविता के बारे में बात करना चाहता हूँ और यह भी कि आप बहुत पीछे न जायें, निराला तक भी नहीं. बल्कि हम मुक्तिबोध से भी आगे निकल आयें. आपकी पसंद-नापसंद, आपकी जाँच, आपकी निराशा और आपकी उम्मीद इस कविता से गहराई से जुड़ी हुई है. एक सिलसिले में हमलोग उन्हें जानना चाहते हैं.



मुक्तिबोध के बाद रघुवीर सहाय निस्संदेह हिंदी के सबसे बड़े कवि हैं. रघुवीर सहाय ने जिस शिद्दत और जिस गहराई से अपने बाद की युवा पीढ़ी को प्रभावित किया है, उतना मुक्तिबोध नहीं कर पाये. उसका कारण है. मुक्तिबोध की कविता में एक क्लैसिकियत है और रियाल पॉलिटिक की कमी है– उनके यहाँ प्रतीक हैं– डोमाजी उस्ताद हैं, ओरांग उटांग हैं, मुग़लिया कोर्ट से भागता हुआ क़ैदी है. रघुवीर सहाय ने इन सबको छोड़ दिया. वह इस तरफ़ गये ही नहीं. उन्होंने बिलकुल उनलोगों को चुना– उन घटनाओं को, उन वारदातों को, उन व्यक्तियों को– जो या तो कल के अख़बार में थे, या आज के अख़बार में हैं या कल के अख़बार में होंगे. इससे उनकी कविता अख़बारी नहीं बनती. आज सारे संसार में क्या हुआ और कल क्या हो सकता है, इसकी जगह सिर्फ़ एक ही है– इनफार्मेशन- यानी समाचार-पत्र, क्योंकि आप कोई नज़ूमी या भविष्यद्रष्टा तो हैं नहीं, कि आगे होने वाले की कल्पना कर लें. आज की ठोस घटनाओं से– जो कल हुई ठोस घटनाओं का ही प्रसार हैं– आप कल होने वाली घटनाओं तक जा सकते हैं. इसके पीछे एक तर्क, एक प्रोग्रेसन, एक इतिहास है. 

ख़ला में इतिहास पैदा नहीं होता. पहले और बाद– ये हर इतिहास के लिये ज़रूरी हैं. रघुवीर सहाय के यहाँ सबसे बड़ी सिफ़त यह है कि वह हमारे वर्ग के आदमी थे. हमारे वर्ग के आदमी तो मुक्तिबोध भी थे, लेकिन मुक्तिबोध एक बहुत ही हाइटेंड सेंसिबिलिटी पर काम करते थे. ऐसा नहीं कि उनके यहाँ सड़क का यथार्थवाद सिरे से ग़ायब था. वह कभी-कभी आता था.


रोज़ाना यथार्थ मुक्तिबोध के यहाँ कम या ग़ायब क्यों है ?
रअसल मुक्तिबोध के साथ एक समस्या और थी. वह 1950 के ज़माने के सरकारी नौकर थे और उस ज़माने के सरकारी नौकर को पॉलिटिक्स डिस्कस करने की अनुमति नहीं थी. इसलिए मुक्तिबोध डे-टू-डे पॉलिटिक्स डिस्कस करने से बचते थे. वह सिद्धांतों में गये. मुक्तिबोध के सारे राजनीतिक लेख उपनाम से लिखे गये हैं. उन्होंने भारत की रोज़ाना राजनीति के बारे में बहुत कम लिखा. उनका सारा लेखन आदर्शवादी और वैश्विकतावादी रहा. सोवियत रूस में जो हो रहा है, अमेरिका में जो हो रहा है, अल्जीयर्स में जो हो रहा है, वह उनके लेखन में है. यहाँ तक कि पाकिस्तान पर भी उनके बहुत सारे कमेंट्स हैं. ये सबकुछ उन्होंने उपनाम से किया है, क्योंकि पहचान लिया जाना तब बहुत बड़ा और वास्तविक डर था. उस ज़माने में सीआईडी वाक़ई बहुत सक्रिय था और वाक़ई वामपंथियों के पीछे पुलिस रहती थी और अगर आप सरकारी नौकर हैं और उपनाम से लिख भी रहे हैं तो यह भी एक ख़तरनाक़ गतिविधि थी. इससे आपकी नौकरी जा सकती थी. आप जेल जा सकते थे.
(मुक्तिबोध)

तो मुक्तिबोध गहराई वाली दैनंदिन भारतीय राजनीति से दूर रहे. एक बात और थी. मुक्तिबोध इस मामले में बहुत आत्मचेतस थे कि उन्हें बड़े सिद्धांतों पर बात करनी है. उनका गद्य कभी भी बहुत ज़्यादा वास्तविक ज़मीन पर नहीं आता, यानी बहुत चालू नहीं बनता. अपना पहिया वह ज़मीन के ऊपर रखते हैं. इसलिए उनकी कविता भी कभी रघुवीर सहाय जैसी कविता हो नहीं पाई. यह एक बड़ी पैराडॉक्सिकल बात है कि बात वह साम्यवाद की करते हैं, लेकिन उनकी भाषा एकदम संभ्रांत रहती है. इसका एक कारण शायद यह भी हो सकता है कि वह अहिंदीभाषी थे और मराठी की परंपरा उनके यहाँ मज़बूत थी. 

वह मराठी ब्राह्मण थे. वह उस तरह बोलचाल की उर्दू-मिश्रित दैनंदिन भाषा का इस्तेमाल कर ही नहीं सकते थे. रघुवीरजी उत्तर प्रदेश के थे– लखनऊ के. रघुवीर सहाय ने शायद एक दिन भी सरकारी नौकरी न तो की और न ही उसकी परवाह की.


नहीं. वह आकाशवाणी, दिल्ली में लंबे और यादगार सिलसिले में रहे थे.

हाँ. मैं ग़लत कह गया. आकाशवाणी की नौकरी उन्होंने की. लेकिन आप उनकी शुरूआती कविता का टेम्परामेंट देखें और मुक्तिबोध का देखें. मुक्तिबोध पर असर रहा छायावाद का– छायावाद के डिक्शन का. उनका भाषा वाला रजिस्टर कभी नीचे आया ही नहीं. मुक्तिबोध पर उर्दू का कोई असर आपको कभी नज़र नहीं आयेगा. ऐसा भी कहीं नहीं लगता कि उन्होंने शायरी पढ़ी है, जबकि रघुवीर सहाय के यहाँ आप क़दम-क़दम पर पायेंगे कि भले यह आदमी शायरी का दिखावटी ज्ञान न बतला रहा हो, लेकिन यह उर्दू में पगा हुआ है. और फिर, आल इंडिया रेडियो के किस सेक्शन में काम किया उन्होंने- ख़बरों के. वह संगीत में नहीं गये, टॉक्स में नहीं गये. वह ख़बरों की दुनिया में गये. वहाँ इस देश का राजनीतिक यथार्थ उन्हें बार-बार प्रेरित करता रहा कि वह जनता की भाषा में बात करें, जनता के लिए परिचित और उपयोगी बिंब लायें. 


वह वात्स्यायनजी के साथ थे और एक साहित्यिक पत्र के संपादक हो गये थे, तब भी, उनकी भाषा में वह निम्नमध्यवर्गीय बनक हमेशा रही, जो हमें यह बताकर आकृष्ट करती है कि यह आदमी हमारे तबके का है, हमारी भाषा में बोलता है. आल इंडिया रेडियो छोड़कर नवभारत टाइम्स में आने के बाद, यानी ठेठ पत्रकार हो चुकने के ठीक बाद वह संसद के संवाददाता बनते हैं. संसद लोकतंत्र का अखाड़ा है. अखाड़े की रिपोर्टिंग तो अखाड़ेबाज़ी की भाषा में ही करनी होगी. जब आप अखाड़े के पहलवानों से रोज़ मिलेंगे, उनके साथ उठेंगे-बैठेंगे तो आपमें भी वह लहज़ा आ जायेगा, जो नियमित अखाड़े जाने वाले व्यक्ति में आ जाया करता है, भले वह स्वयं अखाड़ेबाज़ न हो. एक अच्छे बॉक्सिंग मैच की रिपोर्टिंग करने वाला भले बॉक्सर न हो, बॉक्सिंग की सारी टेक्निकल शब्दावली वह जानता है. सारे दाँवपेंच वह जानता है. तो जानते हुए भी न जानना या न जानते हुए भी सबकुछ जानना. न करते हुए भी सबकुछ करना, ये बात रघुवीर सहाय में थी.


हम मुक्तिबोध बनाम रघुवीर सहाय के दिलचस्प और असंभव मुक़दमे की ओर जा रहे हैं.
मुक्तिबोध के लिए हमारे मन में बहुत आदर है. बहुत आदरणीय आदमी के लिए होने वाला प्रेम भी है. रघुवीर सहाय के लिए हमारे मन में प्रेम बहुत है और आदर भी उतना ही है. मुक्तिबोध हमें दूर ही रखते हैं. उनका प्रभामंडल– विराट स्वरुप– हमें उनके बहुत पास जाने नहीं देता. हमें लगता है कि यह आदमी बहुत महान, बहुत गंभीर है. हमारी मानवता इसकी महानता में ख़लल डालेगी. हम वैसे नहीं हो सकते और हम इसके साथ बहुत देर तक रह भी नहीं सकते. जबकि रघुवीर सहाय आपको शामिल करते हैं. रघुवीर सहाय आपको आश्वस्त करते हैं. रघुवीर सहाय यह बतलाते हैं कि जो तुम इस राजनीति के बारे में समझ रहे हो, वह कोई बहुत ग़लत नहीं है, सोच मेरा भी यही है. वह आपको पुष्ट करते हुए चलते हैं. क्या तुम यह नहीं मानते हो कि संसद फेल हो चुकी है ? मैं भी मानता हूँ कि संसद फेल हो गयी है. 

तुम यह मानते हो कि नब्बे प्रतिशत नेता भ्रष्ट हैं, तो मैं भी मानता हूँ कि शायद पंचानबे प्रतिशत भ्रष्ट हैं. यदि तुम्हारी नाक तक इनकी बदबू आती है तो मेरी नाक तक भी आती है. यदि तुम इन्हें पाखंडी और धूर्त समझते हो तो बिल्कुल सही है, मैं भी समझता हूँ. पहली बार कोई हिंदी कवि जनता के ओपिनियंस के इतने नज़दीक़ आया. जनता भी पहली बार किसी कवि के ओपिनियंस के इतने नज़दीक़ आई. वह हिंदी के इतिहास में बेशक़ अपने ढंग के एकमात्र कवि-पत्रकार हैं.


श्रीकांत वर्मा ?
श्रीकांत वर्मा आते हैं उनके बाद. सर्वेश्वर भी उनके बाद आते हैं. लेकिन, जिस तरह रघुवीर सहाय ने दैनंदिन हिंदीभाषी उत्तरभारतीय राजनीति को पकड़ा है, वह अद्भुत तो है ही, साथ में, हमें यह भी देखना है कि वह उत्तर प्रदेश के आदमी हैं. अगर आप उस समय के हिंदी प्रदेश की राजनीतियों को देखें, तो मध्यप्रदेश में कोई ख़ास अपनी राजनीति थी नहीं. वह राजनीति राजस्थान में भी नहीं थी. हम हरियाणा की बात ही नहीं करते. दो ख़ास क़िस्म की राजनीतियाँ थीं, जिनके शायद दो ख़ास अपने रुझान रहे हों. उनकी अपनी भाषाएँ थीं. उनकी संस्कृतियाँ थीं. वे बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीतियाँ हैं. 


(श्रीकांत वर्मा)

बिहार की राजनीति पर तब भी उत्तर प्रदेश की राजनीति का साया है. मध्यप्रदेश एकदम मार्जिनल था उस समय. आज भी, एक तरह से मध्यप्रदेश मुख्यधारा की राजनीति में है नहीं. राजस्थान मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स में नहीं है. हिंदीभाषी राजनीति की मेनस्ट्रीम बनती है उत्तर प्रदेश और बिहार को मिलाकर ही. यह विचित्र बात है. रघुवीर सहाय इसी राजनीति को बहुत इंटीमेटली पकड़ते हैं. मुक्तिबोध का परिचय उस ज़माने के मध्यप्रदेश की राजनीति से नहीं था उतना. लोग एक और बात भूल जाते हैं कि मुक्तिबोध एक रियासत में पैदा हुए थेमालवा कभी भी मध्यप्रदेश की मेनस्ट्रीम राजनीति में नहीं रहा. मध्यप्रदेश की मुख्यधारा में तो महाकोसल और छत्तीसगढ़ रहे. मालवा के साथ एक तरह की अजनबियत अभी तक बनी हुई है. यानी मुक्तिबोध हिंदीभाषी नहीं, मुक्तिबोध ठेठ मध्यप्रदेश के राजनीतिक क्षेत्र के आदमी नहीं. 

वह नागपुर जाते हैं, लेकिन नागपुर पूरा का पूरा महाराष्ट्र में चला जाता है. 1956 में नये राज्य बन गये. विदर्भ और बरार का वह इलाक़ा- जिसमें मुक्तिबोध रहते थे– जो तब कांग्रेस का गढ़ था– वह मध्यप्रदेश के अस्तित्व में आने से पहले ही कटकर अलग हो जाता है. मुक्तिबोध को कभी मध्यप्रदेश की राजनीति समझ में नहीं आई. उन्होंने उसे समझने की कोशिश भी नहीं की. शुरू से ही, उनका आधार मार्क्सवादी था.


लेकिन रघुवीर सहाय मार्क्सवादी नहीं थे.
घुवीर सहाय भी ज़रूर मार्क्सवादी थे, लेकिन उस तरह के, सिद्धांतों में घुसे हुए खाँटी मार्क्सवादी नहीं थे, जो मुक्तिबोध थे. सैद्धांतिक पक्ष में मुक्तिबोध का बौद्धिक रिगर रघुवीर सहाय से कहीं ज़्यादा था. रियाल पॉलिटिक्स से मुक्तिबोध उतने ही अछूते थे. उनसे स्कैंडलबाज़ी नहीं होती थी. वह मध्यप्रदेश के किसी नेता पर व्यंग्य लिख नहीं सकते थे. वह रिपोर्टर नहीं थे. वह भी आल इंडिया रेडियो में थे, लेकिन उस तरह के नहीं, जैसे रघुवीर सहाय थे. उनकी सर्विस कंडीशन भी देखनी पड़ेगी, जो बड़ी दिलचस्प चीज़ हो सकती है, कि मुक्तिबोध का कैडर अंततः था क्या. 

मुक्तिबोध बहुत डरते थे. वह सरकार से बहुत ज़्यादा डरने वाले आदमी थे, क्योंकि वह एक तरह का एडवेंचरिज्म अफोर्ड कर नहीं सकते थे. रघवीर सहाय बहुत कम उम्र में ही आज़ाद हो गये थे और उन्हें इस बात की चिंता नहीं थी कि किसी सरकारी नौकरी में वह हैं, या नहीं हैं. वात्स्यायन तो उन्हें बतौर फ्री पर्सन ही दिल्ली लाये थे. उसके पहले भी वह वात्स्यायन का ही काम करते थे– प्रतीक में. 

रघुवीर सहाय ने सरकारी नौकर के बतौर शुरू ही नहीं किया. रघुवीर सहाय का यह बहुत बड़ा एडवांटेज है. उन्होंने शुरू से ही मन बना लिया है कि वह पत्रकार बनेंगे. सरकारी नौकरी नहीं करेंगे. करेंगे तो मजबूरी में. छोड़ देंगे. सारे जीवन-भर, मुक्तिबोध का लक्ष्य और नियति सरकारी नौकरी रही. आख़िर में, लेक्चररशिप प्राप्त करने के लिए उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी. एयरफोर्स में थे, फिर आल इंडिया रेडियो में चले गये.

रोज़मर्रा राजनीति पर सहायजी की पकड़ बहुत पैनी थी, जबकि मुक्तिबोध की निगाह उसके वैश्विक स्वरूप पर है. रघुवीर सहाय इतने ज़्यादा कमिटेड नहीं थे मार्क्सवाद को लेकर. रघुवीर सहाय ने एक भी मार्क्सवादी पुस्तक ध्यान से न पढ़ी होगी. वह एक इंट्युटिव मार्क्सवादी रहे. मुक्तिबोध ऐसा कर ही नहीं सकते थे. मुक्तिबोध क्लैसिकल ग्रंथों में घुस गये होंगे– दास कैपिटल वगैरह में. मुक्तिबोध को उसके बग़ैर चैन मिलता ही नहीं. रघुवीर सहाय इन सबसे मुक्त थे. निस्संदेह इस मुक्ति के पीछे वात्स्यायनजी भी रहे होंगे. एक और बात है कि श्रीपत राय और अमृत राय का जो मार्क्सवादी स्वरुप था, उससे रघुवीर सहाय को नफ़रत ही हुई होगी. जिस तरह की बहसबाज़ी ये लोग करते थे, उससे नफ़रत मुक्तिबोध को भी थी. अजीब बात है कि पार्टी की सारी कसरतों-कवायदों से मुक्तिबोध को बहुत नफ़रत थी. वह नफ़रत रघुवीर सहाय को भी थी. 

रघुवीर सहाय मार्क्सवाद से दूरी बनाये हुए थे. मुक्तिबोध मार्क्सवादी सिद्धांत से तो बहुत इंटिमेट हैं, हिन्दुस्तान की मार्क्सवादी पॉलिटिक्स में बिल्कुल नहीं हैं. रघुवीर सहाय ने इन सारी चीज़ों का अपने कलात्मक लाभ के लिए इस्तेमाल कर लिया. उन्होंने तय किया था कि मुझे इस तरह का प्रतिबद्ध व्यक्ति नहीं होना है. जनता को जिस तरह की प्रतिबद्धता की समझ है, वैसा प्रतिबद्ध होना है. इस मामले में उनके आइकन थे लोहिया.

लोहिया जनता के आदमी थे. लोहिया संसद में बोलने वाले आदमी हैं, बहस करने वाले आदमी हैं, मज़ाक़ उड़ाने वाले आदमी हैं, पोलेमिकल आदमी हैं. लोहिया हिंदी वालों के बीच उठने-बैठने वाले आदमी हैं. महाभारत पढ़े हुए आदमी हैं. उन्हें औरतों से भी प्यार हैं. वह द्रौपदी के बारे में एक अलग दृष्टि रखते हैं. वह जर्मनी से आये हैं. उनका बौद्धिक संसार यूरोप का है. यूरोप का पोस्ट वॉर एटीट्यूड है उनका. मुक्तिबोध ने वह दुनिया देखी ही नहीं थी. उनके पास पर्चे आते थे सोवियत रूस के. लोहिया को उसकी कोई ज़रूरत नहीं थी. रघुवीर सहाय को कोई आवश्यकता नहीं थी उसकी. रघुवीर सहाय का लिबरेशन इसलिए मैं बड़ा मानता हूँ कि वह कभी भी वात्स्यायन जैसे स्नॉब नहीं बने. वात्स्यायन में ग्रासरूट पॉलिटिक्स से एक अलग नफ़रत है. प्रतीक में भारतीय राजनीतिक यथार्थ पर एक भी लेख नहीं है. वात्स्यायनजी ने ख़ुद रियाल पॉलिटिक पर एक भी लेख नहीं लिखा, क्योंकि वह भी परहेज़ करते थे. उनको लगता था कि राजनीति पर बात करने वाले वल्गर लोग हैं. 


(रघुवीर सहाय)

मुक्तिबोध को वैसे लोग बेकार लगते थे, उन्हें पढ़ना बेकार लगता था. यदि मेरे पास मार्क्सवाद का सबकुछ समझने-समझाने वाला वेपन है तो मैं क्यों जाऊं ? 

वात्स्यायन कह रहे हैं कि मैं इस सब से इतना ऊपर उठा हुआ हूँ कि मैं क्यों जाऊं ? 

उन्हें एक डर्टी वर्क करने वाला मिल भी गया – रघुवीर सहाय– यह जायेगा जनता के बीच. यह बड़ा अजीब है कि मुक्तिबोध कमिटेड होकर रह गये, जनता में नहीं पहुँचे, वात्स्यायन न इधर कमिटेड हुए, न उधर कमिटेड हुए – जनता के बीच वह भी नहीं गये. श्रीकांत वर्मा की स्नॉबरी वात्स्यायन वाली है और ग्रासरूट पॉलिटिक्स से बचने के लिए वह सुपरस्ट्रक्चर का फ़ॉर्मूला अपनाते हैं, कि मैं मिनी माता आगमदास के फ़्लैट में रहकर ऊँचा पॉलिटिक्स करूंगा. वहीं उन्होंने लोहिया से भी राब्ता क़ायम किया. लेकिन जब उन्होंने देखा कि लोहिया का रास्ता सिवा संघर्ष के रास्ते के कुछ नहीं है, उससे मुझे कुछ नहीं मिलेगा, तो धीरे-धीरे उन्होंने मुक्तिबोध को छोड़ दिया, लोहिया को छोड़ दिया और इंदिरा गाँधी को अपना लिया. जो स्नॉबरी वात्स्यायन राजनीति में भाग न लेकर दिखा रहे थे, श्रीकांत ने वही स्नॉबरी कांग्रेस की पॉलिटिक्स में भाग लेकर दिखा दी. उन्होंने स्नॉबरी दिखाई आम कार्यकर्ता के प्रति. वह ख़ुद कार्यकर्ता बने ही नहीं. उन्होंने तय किया कि मैं ख़ास वर्कर बनूंगा. 

मुझे अगर जाना है तो मैं सीधा इंदिरा गाँधी के पास जाऊंगा. ऐसा करने के लिए एक बौद्धिक बेस उन्होंने बनाया. वह दिनमान में पॉलिटिकल रिपोर्टिंग करते थे, लेकिन उनकी पॉलिटिकल रिपोर्टिंग कुल मिलाकर प्रो कांग्रेस थी. जब रघुवीर सहाय खाँटी पॉलिटिकल संवाददाता थे, तब श्रीकांत वर्मा सड़क पर थे. तब तक श्रीकांत वर्मा ने पत्रकारिता में कोई बहुत बड़ा काम नहीं किया था. उस ज़माने में नवभारत टाइम्स में सीधे विशेष संवाददाता होकर जाना और जाते ही सीधा संसद की कार्रवाई देखने पहुँच जाना– जहाँ आपको महान नेता रोज़ दिख रहे हैं. वहाँ बैठे आप रोज़ नेहरू को देख रहे हैं, पूरी कैबिनेट को देख रहे हैं. आप लोहिया की सारी हरकतें देख रहे हैं. 

आप कर्पूरी ठाकुर और संपूर्णानंद को देख रहे हैं. पंत को देख रहे हैं. रघुवीर सहाय का यह प्रशिक्षण अनमोल है, लेकिन इसके पीछे रघुवीर सहाय की चॉइस है कि मैं इस देश की राजनीति के बहुत गहरे अन्दर जाऊंगा और मैं इसकी गलाज़त और गन्दगी से डरूंगा नहीं, बल्कि उसी को उजागर करूंगा. यह बहुत बड़ा फ़ैसला था, वर्ना वह भी श्रीकांत वर्मा बन जाते. 

रघुवीर जी थोडा डरते भी थे कि अगर यह आदमी इतने क़रीब पहुँच गया है कांग्रेस की इतनी बड़ी नेता के, तो कल को पता नहीं क्या हो सकता है. और दरअसल वही हुआ. रघुवीर सहाय के सबसे ख़राब डर भी तो चरितार्थ हुए न. लेकिन उसके बाद पत्रकारिता पर पड़ने वाले राजनीति के असर की कल्पना रघुवीर सहाय ने नहीं की थी, कि कभी मेरे अमुक तरह के इंटेलेक्चुअल होने की गाज़ मेरे संपादक होने पर गिर सकती है और मेरा प्रो लोहिया होना मेरे ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन मैं इंदिरा गाँधी के पास नहीं जाऊंगा, उनकी चापलूसी नहीं करूंगा, क्योंकि वहाँ एक व्यक्ति पहले से मौजूद है– श्रीकांत वर्मा.


श्रीकांतजी और सहायजी के बीच कैसे रिश्ते थे ?
श्रीकांत वर्मा ने निस्संदेह रघुवीर सहाय को तक़लीफ़ दी. तब क्या हुआ था, इसका ठीक-ठीक ब्यौरा बहुत कम मालूम है, लेकिन कुल मिलाकर रघुवीर सहाय को अपने बेस्ट पीरियड में दिनमान छोड़ना पड़ा. दिनमान सबसे अच्छा और सबसे लंबा रघुवीर सहाय के वक़्त ही निकला. वात्स्यायनजी ने स्थापित किया, लेकिन कितना चलाया? चार-पाँच साल. रघुवीर सहाय टेकओवर करते हैं 68-69 में और वह इमरजेंसी के बाद तक चलता है. इन दस सालों में उन्होंने भारतीय राजनीति की सारी उठापटक को बाहर के साथ-साथ ख़ुद अपने जीवन पर भी घटते देख लिया. उन्होंने देख लिया कि इस देश की सारी ट्रेजेडी और कुछ नहीं, यहाँ की राजनीति है. यह एहसास उन्हें मार्क्सवाद की तरफ़ नहीं ले गया, यह अनुभव उन्हें लोहियावाद की ओर ले गया. लोहियावाद को सबसे बड़ा ब्लो इमरजेंसी ने दिया. उसके बाद लोहियावाद लौटा भी, लेकिन तब तक वह ख़ुद करप्ट हो चुका था, क्योंकि सबलोग उसमें घुस गये थे. आप उस वक़्त यह तय नहीं कर सकते थे कि आपातकाल का विरोध सिर्फ़ लोहिया के सिद्धांतों पर होगा. उस समय सबसे बड़ी पार्टी जनसंघ थी. 

अगर जनसंघ ही इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ आगे है तो लोहिया बहुत आगे जाते नहीं उस धारा में. इमरजेंसी की एडवांटेज जनसंघ ने लोहियावादियों से छीन ली. कांग्रेस-विरोध की विरासत तब से अब तक छिनी हुई ही है. वह आज तक लोहिया-विचार के खेमे में लौटी नहीं. रघुवीर सहाय इसीलिए एक बड़े भारी राजनीतिक कवि तो बनकर रह गये, उसके आगे नहीं पहुँचे. उसका लगातार दंड उन्हें भुगतना पड़ा. रघुवीर सहाय की जमापूँजी– उनकी राजनीति का एडवांटेज नया कवि लेता है. वह नया कवि– जो नक्सलवाद के उदय के बाद वामपंथी होकर लोहियावाद को नकार देता है, क्योंकि इसबीच वह लोहिया और जयप्रकाश नारायण की कई चालाकियों को समझ जाता है. चालाकी क्या सीमाओं को, कि ये इससे आगे जा ही नहीं सकते. इनका जो समाजवाद है, वह बहुत ज़्यादा काम आता ही नहीं है.


क्या लोहिया के विचार की सीमा रघुवीर सहाय और सहायोत्तर कविता की भी सीमा है ?
राजनीतिक राजनीति की सीमायें अलग होती हैं और राजनीतिक साहित्य की सीमायें अलग. अगर आप लोहिया से प्रभावित होकर संपूर्ण क्रांति की बात साहित्य में लिखें तो वह प्रैक्टिकल भले न हो, एक बड़ा मैसेज देती है. लोहिया कहते हैं कि अगर मेरी पॉलिटिक्स से संपूर्ण क्रांति आयेगी तो उसके औज़ार कहाँ हैं आपके पास ? उसका एजेंडा कहाँ है ? उसकी पद्धति क्या होगी ? यदि आपके ऊपर राष्ट्र की ज़िम्मेदारी गिर पड़ी तो आप डिफेन्स के सौदों में करेंगे क्या ? लाखों-करोड़ों की योजनाओं में किस तरह से आप करप्शन नहीं होने देंगे ? समर्पित कार्यकर्ता आपके पास कहाँ हैं ? वैसे अफ़सर कहाँ हैं आपके पास ? समाज उस ओर कब बदलेगा, जहाँ हर व्यक्ति कहे कि मैं एक पैसा न लूंगा, न दूंगा. मुझे ईमानदार काम चाहिए. जहाँ हर सर्विस फर्स्ट रेट हो. जहाँ चलती ट्रेन में करप्शन न होता हो. जहाँ स्लीपर की सीटें न बिकती हों. जहाँ नक़ली टिकटें न मिलती हों. कठिनाई असल राजनीति की बात से शुरू होती है.


आपके ख़याल में रघुवीर सहाय क्या इसी लाइन पर टिके रहे ?
हीं. बाद में रघुवीर सहाय ने एक लेफ्टिस्ट स्टांस अपना ही लिया. वह सुरक्षित था. लोहिया और जयप्रकाश ऐसा नहीं कर सकते थे. मुलायम सिंह यादव लोहियावादी समाजवाद के सबसे ख़राब उदाहरण हैं. उनका समाजवाद क्या है ? या बसपा की ही क्या नीति है ? जब तक आपके पास एक साइंटिफिक एजेंडा नहीं होगा, कुछ नहीं हो सकता. रघुवीर सहाय की कविता ने बहुत बड़े पैमाने पर राजनीति की भ्रष्टता को पहचाना. उन्होंने बताया कि राजनेताओं से उम्मीद नहीं की जा सकती.

लेकिन इसी बात को कोई कब तक दोहरायेगा ? कविता में या कविता के बाहर भी, कब तक ? इसके आगे क्या होगा ? लोग ज़रूर पूछेंगे. इसके बाद खाँटी आइडियोलॉजी में जम्प करना होगा, जो आप करना नहीं चाहते. रघुवीर सहाय एक हद के बाद कभी आगे गये नहीं. आलोक धन्वा जैसे जो कवि गये, उनका क्या हुआ ? जन संस्कृति मंच की विचारधारा को ही क्या लेखक अपना रहे हैं ? क्या सांस्कृतिक संगठनों के पास इस देश के भविष्य का कोई ख़ाका है ? इस देश के भयंकर डाइमेंशन्स हैं – उनको कोई संगठन समझता भी है ? रघुवीर सहाय की कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने हिंदी कविता को हमेशा के लिए पोलिटिकली कांशस बना दिया. उसने पहली बार यह बतलाया कि कविता का बहुत बड़ा इनपुट राजनीति है. यह निराला बता नहीं पाए थे. कबीर उस ज़माने में थे, जब ऐसा बताया जा नहीं सकता था. तब अधिक से अधिक हिंदू-मुसलमान और जातपात ही मुद्दे थे.

कविता आज बिल्कुल राजनीति के मोर्चे पर है. बल्कि वह एक और राजनीति ही बन गई है. हिंदी कविता हिंदीभाषी राजनीतिक क्षेत्र का वेद बन चुकी है. साहित्य में अगर राजनीति समझनी हो तो आपको हिंदी कविता के पास जाना पड़ेगा और आज की हिंदी कविता को दो ही लोग टेम्पर करते हैं. उसे लेफ्ट बनाते हैं मुक्तिबोध और आत्मवत्ता में डालते हैं रघुवीर सहाय. मुक्तिबोध उसका दिमाग़ तैयार करते हैं और रघुवीर सहाय उसका शरीर.


लेकिन दोनों में ज़्यादा बड़ा क्या है ? ज़्यादा बड़ा वामपंथी कमिटमेंट है या एक समग्र राजनीतिक अनुभव ?
हली स्टेज कमिटमेंट की ही है. लेकिन आप प्रगतिशील आन्दोलन की विफलता देखें. वह नकार दिया गया और रघुवीर सहाय और मुक्तिबोध को अपना लिया गया. आज कोई सुमन की बात नहीं करता, कोई नेपाली की बात नहीं करता, क्योंकि इनके पास सिवाय मोर्चेबाज़ी और छोटी मीटिंग के, कोई इन्टेलेक्ट ही नहीं है. बड़े आन्दोलन का इन्टेलेक्ट नहीं है. हिंदी कविता को बड़े मूवमेंट का इन्टेलेक्ट मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय देते हैं. यदि आज हिंदी साहित्य को यह एहसास है कि कितनी बड़ी समस्या उसके सामने है, तो यह मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय के दम का ही जलवा है, और किसी का नहीं. श्रीकांत वर्मा ने समझौता कर लिया. वह मारे गये. सर्वेश्वर के यहाँ एक रियरगार्ड एक्शन है, लेकिन वह बचकाना है. वह कन्विंस ही नहीं करते.

रघुवीर सहाय के बाद क्या होता है ?
घुवीर सहाय के बाद उनके कुँवर नारायण और केदारनाथ सिंह जैसे समकालीनों को भी सोशली कमिटेड होना पड़ता है. ये दोनों थोड़ा पॉलिटिकली कमिटेड होने का भी धोखा देते हैं, क्योंकि ये डरते हैं– मुक्तिबोध के कमिटमेंट से भी और रघुवीर सहाय के कमिटमेंट से भी. अगर ये दोनों आगे निकले होते तो वाकई अनुकरणीय होते. लेकिन कोई चीज़ है जो इन्हें आगे बढ़ने से रोके हुए है. ग़ालिब के शब्दों में, ‘आप  आते थे मगर कोई अनागीर भी था.’ इनके आने को कोई रोके हुए है. ये ख़ुद अपने घोड़े की लगाम पकड़े हुए हैं. वे घोड़े पर बैठे हुए हैं, उसे एड भी मार रहे हैं, लेकिन लगाम कसे हुए हैं. उनकी कविता उनका घोड़ा है और उस घोड़े को उनका आदेश है कि तू मेरी लात खा, लेकिन आगे मत जा. इस स्टांस के अपने फ़ायदे हैं, जो हम देख ही रहे हैं. जुड़े भी हैं, अलग भी हैं. इनकी कविता सर्कस वाला लोहे का घोड़ा है– पहिए वाला– एक जगह पर खड़ा– मनोरंजन करता हुआ. असली घोड़े वाले बहुत आगे निकल गये.

एक पुरानी फ़िल्म याद आ गयी. अल्सीद. अल्सीद बारहवीं-तेरहवीं सदी का एक नायक राजा है. वह इतना प्रतिष्ठित है कि उसकी मृत्यु के बाद राज्य के नागरिक सोचते हैं कि इसकी मृत्यु के बाद दूसरे राज्य की सेनायें हम पर हमला न कर दें. तो उन्होंने अल्सीद की लाश को घोड़े पर बिठाल कर आगे खड़ा कर दिया और शत्रु सेना मारे भय के पीछे हट गई.

मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय हमारे अल्सीद हैं. घोड़े पर बैठकर रण में सबसे आगे चलते हुए. युद्ध अभी जारी है और वे मैदान में हैं. उनके बाद धूमिल, आलोक धन्वा. धूमिल की असामयिक मृत्यु हो गयी. आलोक धन्वा चुप हो गये. इसके बाद हिंदी की प्रतिबद्ध कविता मुक्तिबोध के प्रखर सिद्धांतवाद और रघुवीर सहाय के इंटिमेट राजनीतिक अंतर्ज्ञान के गोल्डेन मीन पर है. इसका एक उदाहरण चंद्रकांत देवताले हैं. उनका पॉलिटिकल बेस कमज़ोर है. बौद्धिकता भी कम है. लेकिन राजनीति पर उसकी निगाह ज़्यादा रैडिकल है.


क्या चीज़ ज़्यादा रैडिकल है ?
घुवीर सहाय साम्प्रदायिकता को लेकर भी बहुत ज़्यादा मुखर नहीं हैं. हिंदू-मुस्लिम सवाल पर जितनी शिद्दत से आज का कवि बोलता है, रघुवीर सहाय के यहाँ आप नहीं पायेंगे. उन्हें यह सवाल ही नहीं लगता था. पहले राजनीति सुधार लो, यह अपने आप सुधर जायेगा. यही ग़लती वामपंथियों ने की. पहले समाज सुधार लो, साम्यवाद ले आओ, जातपात, धर्म आदि अपने आप सुधर जायेगा. दंगों पर लिखी गयीं रघुवीर सहाय की कविताएँ क्या उतनी मारक हैं, जितनी बाद में लिखी गयीं ? सहायजी के धर्मनिरपेक्ष आग्रह भी न्यूट्रल क़िस्म के हैं.

क्या ऐसा है ? मुझे तो केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस और नीम का पेड़ वाली उनकी कविताएँ याद आ रही हैं, जो आपकी स्थापना के विरुद्ध हैं. बहरहाल अगर आपकी स्थापना को मान लें, तो आज की कविता में जो पक्षधर धर्मनिरपेक्षता है, उसके उत्स कहाँ हैं ? क्या वह रघुवीर सहाय के बाद की चीज़ है ?

श्रीकांत वर्मा को देखिये. उनके यहाँ हिंदू-मुस्लिम सवाल है ही नहीं. सहायजी ने अपनी भाषा में उसको खोज और पा लिया था, लेकिन एक मुद्दे के तौर पर वह उनके लिए बड़ी चीज़ है नहीं. अग्रगामी धर्मनिरपेक्षता या साम्प्रदायिकता से सीधी भिडंत उनके यहाँ नहीं है. सीधी भिडंत श्रीकांतजी के यहाँ है, लेकिन वह विचारों नहीं, व्यक्तियों की मुठभेड़ है– इंदिरा गाँधी बनाम स्वर्ण सिंह.

तब धर्मनिरपेक्षता की हिंदी कविता में क्या अहमियत है ?
(फोटो सौजन्य : शुभो)

कैसी बात करते हो ? यह प्रोएक्टिव, ग़ैरतात्कालिक, ग़ैरराजनीतिक धर्मनिरपेक्षता हिंदी कविता, बल्कि भारतीय कविता का सबसे बड़ा हासिल है, जो एक मूल्य में बदल गई है और अपने सत्यापन के लिए उसे किसी दंगे या किसी अतिरेक की ज़रूरत नहीं है. 
(इंडिया टुडे की साहित्य वार्षिकी में भी प्रकाशित) 
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व्योमेश शुक्ल
कवि, रंगकर्मी 

vyomeshshukla@gmail.com
9519138988

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