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रंग- राग : मौलिकता का आग्रह : अखिलेश

Posted by arun dev on अक्तूबर 23, 2017
























(Clicked By  Rafique Shah)

प्रसिद्ध चित्रकार अखिलेश  हिंदी के अनूठे लेखक हैं. कलाओं पर उनका विशद लेखन हैं. अभी इसी वर्ष राजकमल प्रकाशन से ‘देखना’ शीर्षक से लेखकों और कलाओं पर उनकी टिप्पणियों की किताब प्रकाशित हुई है.  

मौलिकता क्या है ? अक्सर  इस पर एक उलझाव की स्थिति रहती है. कहा तो यह भी जाता है कि अब कुछ नया कहने को बचा नहीं है जिसे कहा नहीं जा चुका है.

ख़ासकर चित्रकला की दुनिया में मौलिकता के क्या मायने हैं ? और किस तरह से कला की तमाम पीढ़ियों ने अपने लिए इसे समझा और बरता है ? इस अर्थगर्भित आलेख में पीढ़ियों के तमाम अंतर्द्वंद्व भी सामने आते हैं.

यह लेख समालोचन के लिए है और यहीं प्रकाशित हो रहा है.  





मौलिकता का आग्रह                         

अखिलेश 


मौलिकता का आग्रह कलाओं में इन दिनों महत्वपूर्ण माना जाने लगा है. मैं अक्सर यह सोचता रहा हूँ कि मौलिकता क्या है? भरत नाट्यशास्त्र में कहा गया है सभी कलाएं अनुकृति हैं. याने किसी के मौजूद होने की कल्पना पहले से है और अब यह जो सामने प्रस्तुत है उसकी नक़ल है. यदि ये सब कलाएं एक बड़े अर्थ में अनुकृति हैं तब इस अनुकृतियों में मौलिकता का स्थान क्या है? ये कलाएं किस तरह से अपने अनूठेपन को सम्बोधित हैं? वह क्या है जो मौलिक है?

कलाकृति जिसकी अनुकृति है उस पर थोड़ी देर ठहरे, यहाँ मैं अपने को सिर्फ चित्रकला पर केन्द्रित रखूँगा, किसी भी चित्र की कल्पना ही उसकी उत्पत्ति का कारण है. चित्र बनाने से पहले एक चित्रकार उसकी कल्पना में डूबा रहता है. यह कल्पना ही उस चित्र का मूल है और उसकी अनुकृति अक्सर उससे बहुत भिन्न होती है. यह भिन्न होना कल्पना और उसके सम्पादन का फर्क है. कल्पना का लगातार बदलते रहना एक कलाकार की मुश्किल है. कल्पना निष्पादन एक स्थूल क्रिया है जिसमें शारीरिक क्षमता शामिल है. विचार और क्रिया का मेल कभी नहीं हो सकता. सभी कलाएं इसका प्रमाण हैं.

चित्रकला में अपनी तरह से चित्र बनाने को कलाकार की मौलिकता माना जाता है. एक लम्बे समय में जब वह इस लायक होता है कि अपने चित्र बनाने की प्रक्रिया को वह समझ सके, उसका चित्र बनाने की प्रक्रिया से तादात्म्य बन चुका हो, यह प्रक्रिया उसका अंग बन चुकी हो, तब तक शारारिक रूप से वह इतना थक चुका होता है कि उसी लीक पर चलते हुए अपना प्राण त्याग देता है.

यह लीक क्या है? उसके इतने सालों के काम को किस तरह देखा जाये क्या वह इस बात पर विचार भी कर सका कि उसे करना क्या है? क्या वह सिर्फ अनुकृति बनाने में संलग्न था? अधिकांशतः ऐसा नहीं पाया जाता है. चित्र में मौलिकता के प्रमाण के बरक्स यह दिखता है कि चित्रकार पर किस चित्रकार का प्रभाव है. यह प्रभाव साथ में रह रहे दो कलाकारों का एक दूसरे पर भी हो सकता है. किसी प्रसिद्ध कलाकार का हो सकता है. परम्परा से चले आ रहे किसी वाद या शैली का हो सकता है. उसके शिक्षक का प्रभाव भी हो सकता है. इस तरह के सभी प्रभाव को नक़ल कह दिया जाता है.

चित्रकार एक संवेदनशील प्राणी है और वह खुलकर देखता है. अपने पूर्ववर्ती के कामों से प्रभावित होकर प्रेरणा पाता है. चूँकि वह अतिरिक्त रूप से संवेदनशील है तो शायद उस पर अपने देखने  का प्रभाव भी गहरा पड़ता है. जाने-अनजाने देखे गए रूपाकार उसके काम में उतर आते हैं और वह  उसे ही अपनी सर्जना मानने लगता है. उसके आस-पास ऐसे लोग भी नहीं होते कि वे इस तरफ इशारा कर सके. अक्सर उन लोगो से घिरा रहता है जिनका कला से कोई वास्ता नहीं होता. यदि किसी ने नक़ल कह दिया तब वह उसके दुश्मन से कम नहीं होता. वह एक छद्म  आवरण अपने इर्द-गिर्द कस लेता है और इस नक़ल में सुरक्षित महसूस करते हुए उसका चित्रकारीय जीवन समाप्त हो जाता है.

इसे मैं कई तरह से देखता हूँ. मुझे ये सुअवसर मिला कि मैं चित्रकला की पिछली तीन पीढ़ी के साथ सीधा सम्बन्ध बना पाया जिसमें मेरी सबसे बड़ी सहायता मेरी प्रवृति ने की. इन सभी  पीढ़ी के साथ मेरे सम्बन्ध एक भटके हुए युवा चित्रकार के रहे और इनसे कभी मैंने किसी तरह का कोई लाभ उठाने की कोशिश नहीं की सम्भवतः इसीलिए इन सबसे जीवन्त सम्बन्ध बन सका. विषयांतर जरूरी लगता है सो मैं किये जा रहा हूँ, एक युवा चित्रकार की तरह मैं इनसे सहमत होने के बजाय असहमत ज्यादा रहा किन्तु अपनी सीमा का अतिक्रमण कभी नहीं किया

स्वामीनाथन के साथ बारह साल काम किया और अब पलट कर देखता हूँ तब पाता हूँ कि हमेशा मैंने उनसे एक चित्रकार की तरह ही बात की न कि उनके निदेशक होने को तवज्जो दी. हुसैन, रज़ा से हमेशा यह बहस चलती रही कि सूजा का भारतीय चित्रकला में कोई योगदान नहीं है जिससे वे दोनों असहमत रहते थे और अपनी तरह से मुझे समझाने की कोशिश करते रहे. किन्तु मेरी बातों का कोई जवाब भी नहीं होता था उनके पास. इस मौलिकता के आग्रह पर सूजा से बढ़िया उदाहरण और कोई न होगा. सूजा जो अपने शुरूआती दिनों से अत्यंत विद्रोही स्वभाव के कारण हर पारम्परिकता को प्रश्नांकित कर स्वीकार अस्वीकार करते रहे. हर चलन को अस्वीकार करने का आक्रामक ढंग हुसैन और रज़ा के लिए आकर्षण का बड़ा कारण रहा. ये दोनों उस वक़्त के मध्यप्रदेश से आये थे और इन दोनों का ही आधुनिक साहित्य और विचारधारा में वैसी गति न थी जैसी सूजा की रही.

सूजा उस वक़्त के आदर्श के रूप में इन दोनों के सामने था बल्कि और भी कलाकार जो उससे मिलता प्रभावित हुए बगैर नहीं रहता. सूजा ने गुप्तकालीन शिल्पाकृति को चित्रों में जगह देने से अपनी शुरुआत की और शायद पचास के दशक में यूरोप चले जाना ही सूजा के अंत का प्रारम्भ था. वहाँ पिकासो के चित्र देखने के बाद सूजा सूजा नहीं रहा. सूजा जो जीवन भर पिकासो की नक़ल करता रहा शायद इसी कारण बड़ा योगदान देने से वंचित रह गया. वह क्या बात थी जिसने सूजा को अपनी मौलिकता तक नहीं पहुँचने दिया?

सूजा का उदहारण इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उनकी तरह का कोई चित्रकार नहीं हुआ जो अपने साथी कलाकारों को उत्प्रेरित करे और उस वक़्त, आजाद हिन्दुस्तान के युवा चित्रकारों में जोश और उत्साह जगा सके कि वे इस आजादी के मूल्य को समझकर आजाद मुल्क में अपना योगदान दें. सूजा की तरह का बौद्धिक रूप से हस्तक्षेप करने वाला दूसरा कोई नहीं है. सूजा की यह ताकत ही पहले उसकी कमजोरी बनी बाद में कुण्ठा. सूजा के जगाये अलख का लाभ हुसैन और रज़ा को मिला जिन्होंने इस बात को समझा और अपनी तरह से उस राह पर चल दिए जो उन्हें उनके स्वभाव तक ले गया और इसी कारण आज़ादी के पचास साल बाद जब सूजा को यह दिखता है, जो इतना समझदार तो था कि अपने अच्छे बुरे को समझ सके, कि  संवेदनशील होने के कारण कभी पिकासो के योगदान को अपने चित्रों से बाहर नहीं निकाल पाया

ऐसा नहीं था कि हुसैन, रज़ा पर कोई प्रभाव नहीं था वे भी शुरूआती दौर में इन सबसे गुजरे और अपनी राह में आने वाले हर प्रभाव से मुक्त होते चले, कि इन दोनों से ज्यादा बौद्धिक और कर्मयोगी होने के बावजूद भी उसका कोई प्रभाव भारतीय चित्रकला संसार पर नहीं छूटा तब उसने उन बचकाने बयानों का सहारा लिया जिसमें हिन्दुस्तान के दस महान कलाकारों की सूची घोषित करता है और एक से दस तक सूजा का ही नाम रहता है. जिससे उन्हें कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

कुछ अज्ञानतावश या कुछ कृतज्ञता के चलते सूजा को योगदानी के रूप में हम स्वीकार करते रहेंगे किन्तु भीतर कहीं दूर यह  भी पता रहता है कि उन्होंने बहुत कुछ किया फिर भी हो न सका. सूजा अपने होने में एक उदहारण की तरह थे किन्तु चित्रकार के रूप में पिकासो की सस्ती नक़ल तक रहने के कारण उनके योगदान की कोई जगह नहीं बन सकी. सूजा के सृजन में इसे क्या मौलिकता की कमी की तरह देखे? सूजा का चित्र बनाने में भी आवेश का समावेश था और वो दिखता था. अक्सर उनकी आकृतियाँ उस गुप्तकालीन शिल्पों के सौन्दर्य को समेटे रही जिनकी लालसा सूजा की प्रेरणा थी. गुप्तकालीन आकृतियाँ भी पिकासो के गड्डे में जाकर ही लुप्त होती रही.

सूजा के चित्रों में जिस मौलिकता की तरफ इशारा है उसका कुछ हल्का सा प्रमाण पचास के दशक के प्रारम्भ की कलाकृतियों में दीखता है, पर सूजा उससे दूर जाते हुए भी दीखते हैं. सूजा के चित्र में जो नहीं दिखता है वो approach है. चित्रकार का स्वभाव उसके स्पर्श से प्रकट होता है. वो रंग को कैसे छूता है, ब्रश को किस तरह बरतता है, रंग को कैनवास पर कैसे उतारता है? दो रंग किस तरह पास पास लगाता है उसमें कौन सा सम्बन्ध बिठाता है. यह जो पहुँच है यह  उसके स्वभाव से संचालित होती है. यह  स्वभाव उसके अनुभव को बटोरे हुए है. यह अनुभव उसके देखने का प्रमाण है. अब यदि कोई चित्रकार अपने स्वभाव को समझने के रास्ते बन्द कर दे और पूर्ववर्ती की तरह रंग लगाने की कोशिश करे तब जान देकर भी नहीं सीख सकता. उसे अनुभव नहीं होगा वह दृश्य जो उसका देखना है जिसमें उसकी कल्पना साँस ले रही है. सूजा अपने मौलिक स्वभाव के कारण ज्यादा जाने गए. उनका मताग्रही होना उन्हें अपने समकालीनो से अलग करता है किन्तु ये अनूठापन उनके चित्रों में आने से बच  गया. एक तरफ सूजा बेहद सजग, असम्मत, विद्रोही स्वभाव के हैं दूसरी तरफ उन्होंने पिकासो के चित्रों के सामने घुटने टेक दिए.

किसी भी कलाकार की मौलिकता उसके देखने में है वो किस तरह संसार को देखता है और उसका क्या रूप उसके चित्र में बन रहा है. वह उसमें परम्परा को, साभ्यतिक समझ को, सांस्कृतिक परिवेश को, अपनी आधुनिक समझ से पुनर्परिभाषित करता है. ये परिभाषा उसके स्पर्श से बन रही है. उसका देखना उसे ही अचम्भे में डाल देता है. इसी देखने को सम्बोधित हैं सभी कलाकार और पिकासो जैसे कुछ विलक्षण कलाकार अपने देखने को लोगों के इतना पास ले आते हैं कि उनका देखना बन जाता है. सभी दृश्य अचम्भे से भरे हैं इसीलिए चित्रकला में दोहराव की जगह सम्मानीय नहीं है फिर अनेक चित्रकार इस दोहराव में अचम्भा भरने का दम रखते हैं ये उनके देखने की विशेषता है.      

वापस लौटें, हुसैन, रज़ा, बाल छाबड़ा, पारितोष सेन वाली पीढ़ी उसके बाद स्वामीनाथन, अम्बादास, एरिक बोवेन, ज्योति भट्ट, जेराम पटेल वाली पीढ़ी बाद में मनजीत बावा, लक्ष्मा गौड़, बिकास भट्टाचार्य, प्रभाकर कोल्ते, प्रभाकर बर्वे वाली पीढ़ी. इन सबमें बहुत अन्तर था. ये सब मौलिक हैं और इन सबने एक लम्बा समय गुजारा समकालीन कला का रूप सँवारने में. हुसैन वाली पीढ़ी बहुत ही जिन्दादिल और एकाग्र और एक दूसरे के कामों की सख्त आलोचक. आपस में लड़ना झगड़ना और अपनी बात साफ़ साफ़ रखने के अलावा जो सबसे खूबसूरत बात इन सबमें थी वो एक दूसरे की चिन्ता करना, ध्यान रखना, समय आने पर बिना बताये मदद करना. मान अपमान से परे अपने सम्बन्धो को बरतते थे और कभी एक दूसरे से नाराज ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाते थे. सभी मौलिक हुए भरपूर प्रभावों के साथ अपना अस्तित्व बनाये रखा. इन सभी का देखना अद्वितीय है.

मैं यहाँ इस बात पर भी विचार कर रहा हूँ कि कलाकारों के बीच का आपसी संवाद उनके रचनात्मक संसार में एक बड़ी भूमिका निभाता है. स्वामीनाथन वाली पीढ़ी भी कमोबेश इसी तरह की थी जिसमें उनके बीच संवाद लगातार और आपसी लेन-देन येन प्रकारेण होता रहा. इनके सभी के बीच कुछ समय का साथ रहा किन्तु ये सब वे लोग थे जिनका संसार आज़ादी के बाद का है और ये सभी चित्र बनाने के साथ साथ किसी न किसी नौकरी में भी अपना समय गवां रहे थे. विद्रोही उतने ही जितने इनकी पहली पीढ़ी के लोग. किन्तु इनके विद्रोह में ठहराव भी था. स्वामीनाथन इस दौर के बौद्धिक-केन्द्र रहे और उन्होंने अपनी तरह उस भारतीयता को नकारा जिसका आग्रह उनकी पिछली पीढ़ी का रहा. स्वामी के लिए भारतीयता नाम की कोई चीज न थी जिसे चित्रों में पाने कि कोशिश करनी है. उनके लिए खुद की तरह चित्र बनाना ही भारतीय होना है. इन लोगो में भी बहुत से प्रभाव और आपसी लेन देन चलता रहा किन्तु धीरे धीरे सभी अपनी राह पर चलें. इन सबके कामों में भारतीय चित्रकला का नया रूप नज़र आता है जिसमें परम्परा से लेकर आधुनिकता तक सभी अंगो को लेकर मुक्त विचार और सम्बन्ध दिखाई देता है. ये लोग भी एक दूसरे के प्रति उत्सुक और सहानुभूति भरे थे. एक दूसरे का ख्याल करना, सम्बन्धो में वैचारिक मतभेद के बाद भी टूटन न आने देना और आलोचना करना आदि सभी उस जीवन्त स्तर पर न रहा जैसी इनके पहली पीढ़ी में था, किन्तु खूब था.

इसके बाद वाली पीढ़ी अपने काम में मस्त और अब उन सभी विवादों, कला सम्बन्धी प्रश्नों से मुक्त रही जो इनके पहले वाली पीढ़ी की समस्या रही. ये सभी कलाकार वैयक्तिक रूप से बेहद प्रतिभावान और कर्मठ रहे. अपने स्टूडियो में बैठकर पूरी दुनिया से कटे इनका सृजन सभी को आकर्षित करता रहा और इन सबने अपने काम से भारतीय चित्रकला में वैयक्तिकता की तरफ़ ध्यान केन्द्रित किया. सभी चाक-चौबंद अपने संसार में डूबे यदा-कदा कभी कहीं मिलने पर खुलूस से मिलना और उस शाम को एक यादगार शाम में बदलना इन सबका गुण रहा. किन्तु यहाँ एक बात और लक्ष्य करने की है कि ये सब अपने साथी कलाकार के काम के बारे चुप्पी धारण किये रहे. शायद ही किसी ने कभी किसी दूसरे के काम पर कोई टिपण्णी की. यदि हुई भी है तो वो नगण्य सी है. एक दूसरे के कामों की आलोचना बहुत दूर की बात थी. यहाँ से भारतीय कला का का एक नया रूप शुरू होता दिखाई देता है इसमें कलाकार अपने साथी कलाकार के काम के बारे में चुप हैं. इनके बीच झगड़े का कारण चित्रकला नहीं रहा. कुछ जगह तो इर्ष्या की आग भी जलती  दिखाई देती है. एक दूसरे का ध्यान औचक ढंग से रखा जाने लगा. सम्बन्ध उतने जीवन्त नहीं हैं. ये सब आजाद हिन्दुस्तान में पैदा हुए हैं और आज़ादी का नया रूप कला में प्रकट हो रहा है जिसमें उतना भाईचारा नहीं दीखता जितने की जरूरत है.  इन सभी के सरोकार सिर्फ कला रही और उसके तत्व जहाँ भी इन्हें अपने उपयुक्त लगे उठा लिए. परम्परा से गहरा नाता और उसे आज के समय में पुनर्परिभाषित करने का माद्दा भी इन लोगो में रहा. सभी कला के इस मौलिक अनूठेपन से अनजाने प्रभावित, संचालित रहे.

विष्णुधर्मोत्तर पुराण में लिखा है कि सभी कलाओं में चित्रकला सर्वश्रेष्ठ है. ये बात मुझे नागवार इसलिए लगी कि भारतीय मिथकों में कभी उच्चावचन देखने को नहीं मिला और यहाँ पहली बार किसी एक कला को सर्वश्रेष्ठ बताया जा रहा है. मेरे लिए हमेशा संगीत ऐसी विधा रही जिसे मैं इन कारणों से श्रेष्ठ मानता रहा कि ये नैसर्गिक है और इसमें किसी तरह की बाहरी बाध्यता नहीं दिखायी देती. गला है आप गा सकते हैं और कान है सुन सकते हैं, बाकि सभी कलाओं के लिए बाहरी साधन की दरकार है तब चित्रकला सर्वश्रेष्ठ कैसे? उसका कोई कारण भी नहीं दिया. उन्होंने आपके लिए विचार करने को एक सूत्र दे दिया. इस विचार करने पर मुझे कई कारण मिले जो इस बात के पक्ष में खड़े दिखते हैं. एक कारण मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करता है वह चित्रकार का एक ही समय में सर्जकऔर दर्शकहोना है. जब वह पूरी तरह से विषयी है ठीक उसी वक़्त वो उससे बाहर है. यह सुविधा अन्य कलाओं में सम्भव ही नहीं है. नर्तक अपने को नृत्य करते कभी नहीं देख सकता. चित्रकला में यह सुविधा है कि जिस वक़्त आप अन्दर हैं उसी वक़्त बाहर भी. objectiveऔर subjectiveएक साथ होना दुर्लभ है. इस विषयी होने और न होने को महसूस करना सम्भव नहीं है. आज के अधिकांश कलाकार इस पर विचार इसलिए नहीं कर पाते कि उनका कला कर्म कर्ता भाव का है. वे बाहर ही हैं.  

मैं देखता हूँ और कई युवा कलाकारों से लगातार मिलता भी रहता हूँ कि उनमें इस देखनेका, objective होने का माद्दा ही नहीं है. उन्हें खुद पता नहीं होता कि उनका कौन सा चित्र अच्छा है. वे सिर्फ रंग लगाने का काम कर रहे हैं. बिना विचारे रंग का इस्तेमाल भी उन रंगों में रंगीनियत नहीं ला पाता. ऐसा नहीं है कि सभी के साथ यही होता है कुछ हैं जो इस बात को नहीं समझते किन्तु अपने चित्र के साथ सम्बन्ध बनाये रखते हैं. इस तरह वो यहाँ तक पहुँचने का द्वार खुला रखे हैं. यह देखना चित्रकला में महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि चित्र बनाते वक़्त भी देख रहे होते हैं. इस देखने में ही उसका गुण प्रकट होगा. दूसरे के चित्रों को देखकर भी पता लगता है कि इस रास्ते नहीं जाना है.

विष्णुधर्मोत्तर पुराण के सन्दर्भ में दूसरी बात जो मुझे सूझी वो यह है कि चित्रकला का कोई व्याकरण नहीं है. अन्य सभी कलाएं व्याकरण जानने पर ही साधी जा सकती हैं. यह एक ऐसा पक्ष है जो कलाओं के स्वभाव से मेल खाता है. कलाएं भविष्योन्मुखी हैं उनका सन्दर्भ भूतकाल नहीं भविष्यकाल है, ‘कैसा था कि जगह कैसा होगा इस पर जोर रहता है. इस तरह चित्रकला का गंतव्य हमेशा भविष्य ही रहा. नए चित्रकार के लिए ये समझ पाना जरा मुश्किल होता है. चित्रकला अपने पुराने स्वरुप को भी कुछ इस तरह प्रस्तुत करती है कि देखना अनुभव बन जाता है. चूँकि इसका कोई व्याकरण नहीं है अतः चित्रकार पर दोहरी जिम्मेदारी इस बात की आ जाती है कि भले ही वो आरम्भ कहीं से भी करें उसे अपना व्याकरण बनाना ही होगा. उसके लिए ये समझना मुश्किल होता है और ज्यादातर यही होता आया है कि किसी दूसरे चित्रकार के अधूरे व्याकरण की समझ से चित्र बनाते हुए वह परलोक सिधार जाता है और उसे पता नहीं लगता कि उसका ये जीवन व्यर्थ गया. इसे एक उदहारण से समझना ज्यादा आसान रहेगा हुसैन का व्याकरण के.सी.एस. पणिक्कर के लिए किसी काम का नहीं है.’ उसमें किया गया सारा काम हुसैन की नक़ल ही कहलायेगा जिस तरह सूजा के जीवन भर का काम पिकासो के नाम समर्पित रहा आया. सूजा का स्फूर्त चित्रण, उर्जा, वैचारिक प्रतिबद्धता, नए का आग्रह, बदलाव की कोशिश आदि सभी पिकासो के व्याकरण की भेंट चढ़ गया. सूजा अपनी बौद्धिकता के चलते वह  सबकुछ कह गए जो एक चित्रकार के सन्दर्भ में अब व्यर्थ है और जो रचना था, जिस व्याकरण की तरफ उन्हें जाना था वही रह गया.

एक चित्रकार जब अपना जीवन शुरू करता है तब उसके पहले का चित्रित संसार उसके सामने मौजूद है कि इस राह पर विद्वतजन चल चुके हैं और इनका बनाया व्याकरण भी सामने है इस उदहारण कि तरह कि इस राह पर चलने के ख़तरे नक़ल भरे हैं फिर वो क्या बात है जो उसे उकसाती है इस तथ्य को नज़रन्दाज करने को? ‘अक्षमता सबसे पहले तो यही ख्याल आता है. यह अक्षमता इस बात की भी है कि वह चित्रकला को भावाभिव्यक्ति का साधन मान रहा है. चित्रकला को साधन मान कर बरतना उसे उसके स्वभाव के विरुद्ध देखना है. उसका स्वभाव ही उसे साधन होने नहीं देता. चित्र कल्पना से उपजाते हैं और कल्पना में नक़ल की जगह नहीं हो सकती. कल्पना अक्सर उन्ही वस्तुओं, जगहों, हालातों, छवियों की होगी जो अप्राप्य हैं जिन्हें पाया नहीं जा सकता जिन्हें उसी कल्पना में खोया जा सकता है. कल्पना भी उसी की है जो अजूबा है. चित्र उस अजूबे को पकड़ने की कोशिश है अप्राप्य को पाने की बल्कि उस असम्भव को सम्भव करने की जिसमें चित्रकार अक्सर निष्फल ही रहने वाला है. यह निष्फलता उसका नैरन्तर्य है.

यहाँ अन्य कलाओं की तरह अपने उस्ताद को उदहारण की तरह नहीं बरतना है न ही उसे आशामानना है. अपने चित्रों में उसका निषेध ही सही राह और सही शिक्षा है. एक ख़राब शिक्षक के छात्र उसकी नक़ल करेंगे और वह कभी नहीं बता पायेगा कि इस राह नहीं जाना है. एक ख़राब चित्रकार, अब मैं उसे ख़राब किस आधार पर कहूँ, एक चित्रकार जानता है कि उसे क्या करना है, जो चित्रकार नहीं है वो नक़ल का रास्ता चुनता है जिस पर चलना व्याकरण बनाने के परिश्रम से कहीं ज्यादा आसान काम है. इस तरह वो कभी उस मौलिक स्वभाव का रस नहीं चख पाता जो सृजन के श्रम से उत्पन्न हो रहा है. यहाँ सूजा को याद किया जाना जरूरी है कि सूजा सक्षम था वैचारिक रूप से और समझने समझाने के लिए फिर भी ये न हो पाया. बौद्धिक रूप से मजबूत सूजा भी संवेदनशील होने के कारण अपने ऊपर आये प्रभाव से जीवन भर मुक्त नहीं हो सका. भारतीय कला संसार का एक और दुर्भाग्य यह कि उसमें कला आलोचक नहीं हैं. कला समीक्षक भी नहीं हैं. कुछ कला सूचना देने वाले हैं कुछ अंग्रेजी भाषा का ज्ञान प्रकट करने वाले और कुछ अहंकारी हैं दावा करने वाले, किन्तु कोई नहीं है जो कला पर लिख सकने की क्षमता रखता हो, इन सबमें वो समर्पण नहीं दिखता जो एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए उन्हें उकसाता हो. आनन्द कुमार स्वामी या मुल्कराज आनन्द जैसे समर्पित, तीक्ष्ण नज़र रखने वाले, मताग्रही, रूचि रखने वाले विद्वान इस आजाद मुल्क में आजाद हो गए और अब केट्लौग या एक लेख लिखने तक सीमित रह गए. जिसमें भी अंतर्दृष्टि नहीं दिखाई देती. इस तथ्य से मैं भी उस मौलिकता का बखान नहीं कर सकता जिसका आग्रह चित्रकला का प्रथम लक्षण है.

मौलिकता के तत्व उसी परम्परा में हैं जिससे कला का प्रादुर्भाव हुआ. यदि हमें अपने सांस्कृतिक सन्दर्भों में रेखांकन की मौजूदगी को  लक्ष करना है तब भीमबैठिका का उदहारण हमारे सामने है. अंजता का उदहारण इस बात का भी है कि फ़लक के चुनाव में कोताही नहीं की जा सकती. विषय की गम्भीरता और विशालता के अनुरूप उसका फैलाव और उसकी निरन्तरता के लिए तैयार की गई गुफाओं में किया गया चित्रण देखते बनता है. लघु-चित्रों के प्रमाण इस संसार के विराट स्वरुप को असम्भव रूप से दर्शनीय बनाने का भी है. ये सभी उदहारण अनुभव के उदहारण हैं. चित्रकार के देखने के उदहारण हैं. कल्पना और उसके प्रकटन के उदहारण हैं. असम्भव को सम्भव करने के उदहारण हैं. इनमें दर्शक बिला जाता है उसके सामने अद्भुत कल्पना का असीमित अनुभव संसार प्रस्तुत होता है जिसमें उसका अस्तित्व महसूस नहीं होता. वह रस के उस सागर में गोता लगा रहा होता है जो विस्मय और आकस्मिकता से परिपूर्ण है. भारतीय चित्रकला के इन विभिन्न रूपाकारों में संस्कार और मौलिकता के अनेक ऐसे बिंदु हैं जो किसी भी कलाकार के लिए प्रेरणा हो सकते हैं.
इसी मौलिकता तक पहुँचने का प्रयास शायद हर चित्रकार का होता होगा.  
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56akhilesh@gmail.com

फेसबुक (कहानी ) जयश्री रॉय

Posted by arun dev on अक्तूबर 20, 2017


सोशल मीडिया आभासी है पर यथार्थ में वास्तविक हस्तक्षेप करता है. कहानी की गीतिका जीवन के तमाम कटु-तिक्त अनुभवों से होती हुई प्रौढ़ता की दहलीज पर फेसबुक पर एक अकांउट खोलती है. यह एक नया संसार तो है पर यह उसके अपने संसार को तहस-नहस कर देता है.

जयश्री रॉय की यह नई कहानी समालोचन पर खास आपके लिए. यह कहानी न जाने कितनी दमित वंचित स्त्रियों की कहानी है पर छल यह है कि यह माध्यम भी उन्हें सबल नहीं करके अकेला छोड़ देता है.


बहुत निपुणता से जयश्री रॉय ने गीतिका को निर्मित किया है. पर कहानी अभी बाकी है. ‘स्क्रीन के बुझ’ जाने के बाद अभी जीवन तो नहीं बुझा है.  


कहानी  
फेसबुक                       
जयश्री रॉय




नोटिफ़िकेशन की घंटी बजी थी, साथ ही मोबाइल का स्क्रीन चमक उठा था. गीतिका की नींद से तंद्रिल होती पलकें अनायास खुल गई थीं- कहीं यह संवेग का मैसेज ना हो! इस सोच के साथ ही उसका दिल धडक उठा था. उसने आहिस्ता से उठ कर अपने बगल में सो रहे बेटे को देखा था- दिन भर का थका-हारा वह गहरी नींद में था. साइड टेबल पर रखे मोबाइल को उठाने से पहले उसने आश्वस्त होने के लिए एक बार दरवाजे की ओर भी देखा था, स्टडी की रोशनी जल रही थी. यानी अनिमेष जग रहा था. एक पल के लिए ठिठक कर उसने धीरे से मोबाइल उठा कर मेसेंजर चेक किया था- संवेग का ही मैसेज था- कैसी हो गुल्लू?

यह सम्बोधन पढ़ते ही उसे जाने क्या होता है. धमनियों में बहता रक्त यकायक उष्ण हो उठता है. लगता है एक ही पल में वह उम्र के अनगिनत बरस फांद कर वही सोलह साल की गीत बन गई है जिसे जमील के लिखे प्रेम पत्र पढ़ते हुये अक्सर बुखार चढ़ आता था! स्कूल यूनिफ़ोर्म की जेब में छिपा वह प्रेम पत्र जैसे कोई बम होता था जो किसी भी क्षण फट सकता था. जब तक किसी सुरक्षित स्थान में उसे छिपा नहीं देती थी, दिल गले में अटका रहता था! उन दिनों उसे पक्का यकीन होता था, जमील का नाम उसके चेहरे पर लिखा हुआ है और सारा शहर जानता है, वह जमील से प्यार करती है.

जमील-संवेग... बीच में रोज-रोज पसरती समय की कितनी बड़ी खाई है! पूरे तीस साल की! अब वह छयालीस साल की है. मेनोपाज से जूझती हुई एक प्रौढ़ा! एक 12 साल के बच्चे की माँ... वह बाथरूम में जा कर चेहरे पर पानी छपक कर खुद को आईने में देखती रही थी. दोनों गाल जल रहे हैं. उत्तेजना में तप कर गहरा सांवला चेहरा बैजनी-सा हो उठा है. तो अब भी ऐसा होता है! वह तो समझती थी वह कब की शुष्क, ऊसर हो गई है. शिराओं में अब खून नहीं दौड़ता,भीतर बहती इच्छाओं की अल्हड़ नदी रेत की ढूहों में बदल गई है ... रात के इस गहन नीरव में कहीं बहुत भीतर रह-रह कर अनायास कूक उठती कोयल को सुनते हुये उसकी पलकें जलने लगती हैं- तो मैं जिंदा हूँ! देह की अमराई एकदम से ठूँठ-बंजर नहीं हो गई है! मगर अनिमेष तो कहता है... अनिमेष का ख्याल आते ही उसकी गीली आँखें पत्थर के बेजान, सख्त टुकड़े में बदल गई थीं- नहीं उसकी कोई बात नहीं! अब एक पल भी उसके नाम बर्बाद नहीं करना...

शायद किन्हीं अर्थों में बेहतर मगर अंततः एक आम भारतीय औरत की-सी ही गीतिका की कहानी है. अब सोचती है तो ऐसा ही लगता है. घर से भाग कर सबकी मर्जी के खिलाफ अंतर्जातीय शादी की तो लगा, बहुत बड़ी क्रान्ति कर रहें! दुनिया बदल कर रख देंगे! शुरू-शुरू में ऐसा होता प्रतीत भी हुआ. उनकी जोड़ी अनोखी थी. साथ चलते रास्ते पर तो लोग मुड़ कर देखते. वो गहरी साँवली, लंबी-चौड़ी, स्थूल; अनिमेष गोरा-चिट्टा, छरहरा. लोग देख कर समझ जाते, अनिमेष उससे उम्र में छोटा है. एक-दो साल से नहीं, पूरे पाँच साल से! ऐसा अमूमन भारतीय समाज में नहीं होता. लोग तरह-तरह की अटकलें लगाते- किसी सेठ की बेटी होगी. दहेज से खरीद लिया होगा वरना कहाँ यह लड़की और कहाँ...

उन दिनों यह बातें उस तक पहुँच कर भी नहीं पहुँचती थीं. बीच में खड़ा अनिमेष सब कुछ खुद पर ले लेता था. उससे कहता था- तुम सुंदर हो! बहुत सुंदर हो! मेरी आँखों से खुद को देखो. वह आईने में प्रतिबिम्बित दोनों के चेहरे से अपनी नजरें फेर लेती- तुम्हारे चाँद-से गोरे-उजले व्यक्तित्व पर मैं चन्द्र गहन-सी लगती हूँ... अनिमेष उसे खींच कर अपने से लगा लेता- सुनो, सुन रही हो! ऐसा मत कहो, मेरे लिए प्रेम का रंग सांवला है, यह दुनिया का सबसे सुंदर रंग है!
वह उसके गाढ़े स्वर की चासनी में लिपटी देर तक पड़ी रहती. बिलकुल सुध-बुध खोई. जैसे नशे में हो. लगता, अनिमेष से लगी-लगी वह भी उजली हो आई है. अंगों में अशर्फियाँ-सी भर गई हैं. वह दमक रही है सर से पाँव तक. ठीक जैसे राधिका अपने श्यामल कृष्ण के स्पर्श से साँवली हो उठती थी! प्रेम का रंग कितना गाढ़ा चढ़ा था उन दिनों! जीवन का हर क्षण ओर-छोर रंग गया था.

जमील हर तरह से उसे प्रताड़ित कर एक दिन अनायास चला गया था. जाते हुये एक बार मुड़ कर भी नहीं देखा था. दिशाहारा-से उन पलों में गहरे आतंक के साथ उसने अनुभव किया था, प्रेम के नाम पर उसने उसके दिल से ही नहीं खेला था, जीवन ही तहस-नहस नहीं किया था, बल्कि जाते-जाते उसकी देह में जहर का बीज भी बो गया था. वह बीज अब हर बीतते दिन के साथ अंकुरित हो रहा था, कोंपलों में फूट रहा था, आकार ले रहा था...

वह दिन गहरी उलझन, अवसाद और भय के थे. अपना शरीर ही अबूझ पहेली बन गया था. तल पेट दुखता रहता, मन कच्चा-कच्चा होता, देह घुलाती रहती. पढ़ाई के टेबल से उठ कर दस बार उबकाई रोकते हुये बाथरूम की ओर भागना पड़ता, स्कूल ना जाने के दस बहाने गढ़ने पड़ते. आते-जाते आईने के पास ठिठक कर खुद को हर कोने से देखती, बिना किसी बात पेट के आगे ओढ़नी खींचती रहती.  अचानक से उसकी दुनिया उलट-पुलट गई थी. वह तो गनीमत थी कि माँ के गुजरने के बाद कोई औरत नहीं थी घर में उस पर नजर रखने के लिए. पिता रिटायर कर गए थे और बड़े भैया नौकरी और अपनी नई मंगेतर को ले कर मशगूल थे.

मगर इन सारी घटनाओं का मूक साक्षी एक मात्र अनिमेष था. अनिमेष जमील का दोस्त था. उसके साथ ही पहले-पहल उसके घर आया था. तब उनकी बेमेल दोस्ती उसे कहीं से खटकी भी थी. बीस साल का जमील अपने चाचा के गराज में मैकेनिक था जबकि अनिमेष आठवीं का छात्र. टाइफाइड तथा कुछ और कारणों से उसके भी तीन साल बर्बाद हो गए थे और उस समय वह दसवीं में पढ़ती थी. जमील के प्रेम में गले-गले तक डूबी उन दिनों उसने उसे ठीक से देखा भी नहीं था. वह जमील का प्रेम पत्र उस तक पहुंचाता और उसके संदेश जमील तक. जब दोनों घर के एकांत में मिलते, वह बाहर रुक कर आने-जाने वालों पर नजर रखता और उन्हें आने वाले किसी संभावित खतरे से आगाह करता.

जमील के चले जाने के बाद गीतिका ने अनिमेष के हाथों ही उसे कई बार संदेश भेजे थे. यह जानकारी भी कि वह प्रेग्नेंट है. जमील नहीं आया था. बस कहला भेजा था कि वह अपना बच्चा गिरा ले. इसके बाद उसके आग्रह पर अनिमेष ही केमिष्ट से दवाई खरीद लाया था.

उन दिनों जब वह ग्लानि, शर्म और दुख से भर कर रोती थी, अनिमेष उसका हाथ पकड़ कर बिना कुछ कहे चुपचाप बैठा रहता था. कहने के लिए उसके पास कुछ था भी नहीं. अपने दोस्त की करतूत से वह क्षुब्ध भी था और कहीं से शर्मिंदा भी. दुख के इन पलों में उसके साथ बने रहना ही उसके लिए उसका साथ देना था और वह यही कर रहा था. जमील को हर तरह से समझा कर और अंत में लताड़ कर उसने उससे बात करना बंद कर दिया था.

रोती हुई अक्सर गीतिका उसकी गोद में ढह पड़ती थी. ऐसे में वह धीरे-धीरे उसके बाल सहलाता या पीठ पर हाथ फेरता रहता. उन नितांत विह्वल क्षणों में भी गीतिका की देह उन आत्मीयता से भरे उष्ण स्पर्शों को अदेखा नहीं कर पाई थी और जल्द दोनों ने समझा था, सहानुभूति से शुरू हुए संबंध की दिशा साहचर्य, आंतरिकता और अनुराग की ओर मुड़ गई है. गीतिका आज नहीं जानती जो कुछ भी उन दोनों के बीच उन दिनों पनपा, वह प्रेम था या कुछ और. वह अकेली थी, गहरे तक आहत और अवसाद ग्रस्त. अनिमेष युवा था और किसी साथ की तलाश में. उन दिनों मन से ज्यादा देह अधिक मुखर थी. इच्छाओं में ज्वार भाटे का समय था. साधारण नाक-नक्श वाली गहरी साँवली और दुबली-पतली गीतिका आकर्षक ना सही, एक किशोर लड़की थी जिसके पास शरीर के नाम पर वह सब कुछ था जिसकी कामना उसे भीतर ही भीतर सता रही थी. इस तरह अपने-अपने अभाव के साथ दोनों मिले थे और अंजाने ही एक-दूसरे के पूरक बन गए थे.

प्यार सिर्फ हौसला ही नहीं देता. बल्कि इसके ठीक उलट तोड़ता और झुकाता भी है. कभी-कभी यह एक शर्मनाक अनुभव हो सकता है. खास कर तब जब दूसरे की नियत में बाल निकल आए. जमील के साथ मन के साथ-साथ शरीर का भी संबंध था मगर तब प्यार में सब कुछ सही लगता था. जिसे मन दे दिया उसे देह दे देना कौन-सी बात थी! प्यार में कुछ गलत नहीं होता...

एक लंबे समय तक बिना यकीन के वह जीती रही थी. एकदम डांवाडोल! सब झूठ, सब दिखावा! प्यार नहीं होता. होती है बस जिस्म की भूख, हबस! उसे लगता, उसकी कोख एक कभी ना भरने वाली खोह में तब्दील हो गई है. रातों को अपने बिस्तर पर हाथ-पाँव सिकोड़ कर पड़ी-पड़ी वह भीतर गूँजते सन्नाटे को सुनती रहती. कोई खंडहर है जिसमें छटपटाती हवा दीवारों से सर टकरा रोती फिरती है. कई बार उसे लगता था, रात के अंतिम प्रहर उसके भीतर कहीं बहुत गहरे कोई बच्चा धीरे-धीरे सुबक रहा है! उसने देखा नहीं था उस बच्चे को कभी मगर पहचानती हमेशा से थी. वह उसका हिस्सा था, उसके प्यार का साकार चेहरा!

एक लंबे समय तक वह उसके अंदर सांसें लेता रहा था, हिलता-डुलता रहा था. इस तरह उसके साथ पल-प्रतिपल जीना वास्तव में उसके अभाव में जीना था और यह बहुत त्रासद अनुभव था. अनिमेष ना होता तो जाने ऐसे में उसका क्या होता! सोच कर अब भी शरीर में झुरझुरी-सी दौड़ती है.

अनिमेष ने उसे बताया था, मरने से पहले कोई मौत नहीं होती. पहला प्यार हो सकता है,मगर आखिरी प्यार जैसा कुछ नहीं होता. जीवन की शुरुआत ठीक वहीं से होती है, जहां से हम चाहें... तो उसका हाथ पकड़ वह फिर कदम-कदम चलना सीखी थी; सीखी थी फिर से यकीन करना- खुद पर और दूसरों पर भी. लगा था, नहीं, यहाँ सब कुछ इतना गलत भी नहीं. यहाँ प्यार भी है, यकीन भी...

मन सूरजमुखी-सा होता है, हमेशा रोशनी की ओर ही बढ़ना चाहता है. अंधकार एक समय तक के लिए छा सकता है, ओर-छोर पसर कर सब कुछ ढाँप भी सकता है, मगरस्थायी नहीं हो सकता. उसे छंटना ही होता है, आज नहीं तो कल... जाने कितने समय बाद सहमे-ठिठके कदमों से सही, वह भी बाहर निकली थी, चली थी अनिमेष के साथ एक नए रास्ते पर, पहले झिझक,संकोच और संशय के साथ, फिर मजबूत कदमों से. धीरे-धीरे सूरत बदली थी, हालात बेहतर हुए थे, जीवन ऊंची-नीची पगडंडियों से उतर कर सम पर आया था.

उन दिनों वे स्कूल से लौटते हुये दूर तक चलते हुये आते थे. कितनी बातें होती थीं उस बीच. जाने क्या-क्या... अब गीतिका याद भी करना चाहती है तो याद नहीं आता. बहुत पहले की बात है यह सब, शायद पिछले किसी जनम की... अब उन में दिनों कोई बात नहीं होती. सारी बातें खत्म हो चुकी है. अब कुछ बची है तो ढेर-सी शिकायतें और कड़वाहट! वह अक्सर सोचने की कोशिश करती है, कहाँ क्या गलत हो गया! सब कुछ ठीक तो था...

अनिमेष के पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं. वह भी भीतर ही भीतर हैरान होता रहता है. जान-बुझ कर तो सायास उसने कुछ भी नहीं किया! जिसे वह हाल तक प्यार समझता रहा था, क्या वाकई वह प्यार था? अब वह नहीं जानता. एक बात वह भूल गया था, चैरिटी में मदद, दया, करुणा दी जा सकती है, प्रेम नहीं! जमील से ठुकराई हुई गीतिका एक बेहद असहाय, कातर लड़की थी. घोंसले से गिरे किसी चिड़िया के बच्चे की तरह उसके शरण आई थी. वह उसे कैसे लौटा देता! आज सोचता है तो लगता है, वह प्यार नहीं, उसका पुरुष अहम होगा. वह अहम जो किसी पीड़ित स्त्री की उपस्थिति में जाग उठता है कि कोई उसके शरण में आया है, उससे दया की अपेक्षा रखता है. कृतज्ञता में छलछलाती गीतिका की आँखें उसे बड़प्पन का एहसास दिलाती थी. उसका आश्रय बनते हुये उसने अपनी जरूरतों को भुला दिया, भुला दिया कि उसे क्या चाहिए... उन दिनों किसी मुसीबत में पड़ी औरत का सहारा बनने का नशा उस पर हावी रहा. बाकी बातें गौण हो गईं.

जमील ने एक बार उसके सवाल के जवाब में कंधे उचका कर कहा था, सुंदर लड़कियों को पटाने में बहुत मेहनत लगती है. बदसूरत लड़कियां आसानी से दाना चुग लेती है. तो यही समझ... तब यह बात सुन कर उसे बुरा लगा था मगर अब जब मुड़ कर गुजरे समय के पार देखता है, एक डर-सा उसे घेर लेता है- कहीं यही बात उसके भी अवचेतन में तो नहीं थी! थोड़ी-सी सहानुभूति और साथ के ऐवज में किस आसानी से गीतिका उसके पास खींची चली आई थी!

सालों वह एक भ्रम में जीता रहा. भ्रम कि गीतिका के साथ उसका जो कुछ भी है वह प्रेम है. कोई दूसरा नाम इस समाज और उससे रचा उसका व्यक्तित्व सहज स्वीकार नहीं कर सकता था. जिस्म की भूख और मन के अभाव को यहाँ समाज की स्वीकारोक्त्ति हासिल नहीं. जबकि प्रेम एक वैध शब्द है.  बहुत आसानी से प्रेम के नाम पर यहाँ मन की अराजक इच्छाओं को चलाया जा सकता है और शायद यही उसके साथ भी हुआ था. अपनी भूख और अहम को उसने पहचानने से अजाने ही इंकार कर दिया था और उसे एक सुंदर और जायज नाम दिया था- प्रेम! शायद ग्लानि के दु:सह्य भार से मुक्त होने के लिए या सबके साथ खुद को भी बहलाने के लिए...अब वह तय नहीं कर पाता, ठगा कौन गया, गीतिका या वह खुद!

खुद को छलने की सजा वह सालों से पाता रहा है, यह किसको बताए! आज वह बयालीस साल का है. एक भरा-पूरा मर्द! वह सुदर्शन है यह वह भी जानता है. वर्षों पहले एक छोटे-से कस्बे का दुबला-पतला किशोर नहीं जो संशय और संकोच से हर पल घिरा रहता था. अब वह एक मल्टी नेशनल में ऊंचेपद पर काम करने वाला अफसर है. आत्म विश्वास और अपने विशिष्ट होने की आश्वस्ति से भरा हुआ. आफिसर्स क्लब की पार्टियों में वह सब के आकर्षण के केंद्र में होता है. खास कर महिलाओं के. गीतिका और उसे साथ देख लोगों की नजरों में हैरत तैर आती है, वह देख सकता था. कई बार वह खुद ग्लानिबोध से भर आया है जब अपने ही अजाने गीतिका के साथ चलते हुये वह दो कदम आगे बढ़ जाता था.
(by Paul Lovering)

गीतिका आम भारतीय लड़कियों से इतर देह संबंधी बर्जनाओं से पूरी तरह मुक्त थी. बिस्तर पर जंगली बिल्ली जैसी आक्रामक तेवर रखा करती थी. संबंध में शरीर के वर्चस्व के दिनों में यह सब कुछ खासा उत्तेजक हुआ करता था उसके लिए. सालों इन्हीं बातों में उलझा रहा, मगर अब लगता है, प्रेम इससे भी आगे की कोई चीज होता है. क्या, वह सोच नहीं पाता. बस एक अभाव जो भीतर गहरे कहीं रात-दिन बना रहता है. रह-रह कर उसे अनमन करता है. लगता है, अब देह से बाहर निकलने का समय है. देह से बाहर निकलना यानी गीतिका से परे हो जाना होगा, उसने कब सोचा था...

अब एक कस्बाई जीवन के संकीर्ण घेरे से बाहर निकल वह देख सकता है, गीतिका में सौंदर्यबोध का नितांत अभाव है. खुद गहरी साँवली हो कर चटक रंगों के प्रति उस में अजीब रुझान है. यह कोई मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया होगी. विपरीत चीजें एक-दूसरे को आकर्षित करती है. हमेशा लाल, पीले, हरे कपड़ों में होती है. साथ ही भड़कीले मेकअप! उसे लगता है लिपस्टिक सिर्फ लाल रंग की ही होती है. फल, हरी सब्जी से तो मानो जन्म का बैर है. सिर्फ आलू खा-खा कर आलू की-सी ही गोल-मटोल होती जा रही है. उसके बनाए खाने पर तेल की कम से कम इंच भर मोती परत तैरती होती है. अनिमेष को अब सोच कर हैरत होती है, कभी इसी औरत से उसने प्यार किया था!

लोग कहते हैं, प्यार कभी नहीं मरता मगर वह अब जानता है, हर चीज की तरह प्यार भी मर सकता है. जिंदा रहने के लिए जिस हवा, धूप, पानी की जरूरत होती है उनके निरंतर अभाव में बेहद हरा-भरा, सजीला पौधा भी एक दिन ठूंठ में तब्दील हो सकता है. अपने भीतर रात-दिन सुगबुहगाती अभाव की प्रतीति को अदेखा कर वह एक खुशफहमी में जिये जा रहा था. खुशफहमी प्रेम में होने की, होते चले जाने की... मगर एक दिन अचानक सच्चाई सामने आ खड़ी हुई थी, अपनी पूरी कौंध के साथ और उसने पाया था, अब तक उसके भीतर जिस प्रेम के होने का विश्वास था, वह देह से उतर गई केचुल के सिवा कुछ भी नहीं था! खोखले सीप-शंख, सुंदर मगर एकदम रिक्त...उनसे आती समुद्र की लहरों की आवाज एक भ्रम के सिवा कुछ भी नहीं! इस अनुभव के साथ वह उतरे समुद्र के पीछे रह गई रेत की ढूंहों के बीच अवाक खड़ा रह गया था.

दैनंदिन जीवन की सामान्य घटनाओं के बीच कब एक-एक कर प्रेम की नियामतें खत्म हो गई, वह समझ नहीं पाया. साथ-साथ खाने-पीने, सोने के बीच उसके अंदर शनैः-शनैः कुछ कम हो रहा है, बीतता समय अपने साथ उसका बहुत कीमती कुछ चुपचाप बहा ले जा रहा है, उसे पता भी ना चला. एक सफल जीवन के गुमान में वह मगन रहा. वाकई शादी एक आदत की बात है और आदत भले ही सहज ना छुटे, ऊब और एकरसता तो पैदा कर ही सकती है...

बेहद भावुक और सहृदय अनिमेष को गीतिका ने धीरे-धीरे बदलते देखा था. शुरू में उसने देख कर भी नहीं देखा था. यह निश्चिंतता सालों के निष्कलंक साहचर्य और समर्पण से आया था. सुरक्षा कवच के इस सुदृढ़ घेरे से निकलना इतना सहज नहीं था. मगर धीरे-धीरे कुहासा छटा था और सारा परिदृश्य स्पष्ट हुआ था. एक दिन स्तब्ध हो कर उसने महसूस किया था, अनिमेष बदल गया है!

हमेशा ऊष्मा और उत्साह से भरा रहने वाला अनिमेष देखते ही देखते एक बेजान शीला खंड में बदल गया था. पहले बहुत धीरे-धीरे और फिर एकदम से उसने खुद को पूरी तरह समेट लिया था. कुछ इस तरह कि हजार कोशिश कर भी उसे कहीं से उस तक पहुँचने का कोई सिरा नहीं मिल पाया था. खुद तक पहुँचने के सारे कपाट बंद कर वह निर्लिप्त हो गया था. ओह! कैसे यातना भरे दिन थे वे! वह सुबह-शाम, हर दिन, हर पल उस तक पहुँचने की कोशिश में उसके बंद दरवाजे पर दस्तक देती रहती थी. इतना कि उसके दोनों बाजू टूट गए, उँगलियाँ झर गईं, हौसले चूर-चूर हो कर बिखर गए...

वह जानना चाहती थी उसका क्या कसूर है. सबसे बड़ा जुल्म यह था कि अनिमेष कुछ बोलता भी नहीं था. उसकी चुप्पी उसे पागल किए दे रही थी. वह सिर्फ उसका व्यवहार देख रही थी जो सिरे से बदल गया था. पढ़ने-लिखने के नाम पर उसने स्टडी में सोना शुरू कर दिया था. रात-रात भर स्टडी की रोशनी जलती रहती मगर बार-बार नॉक करने पर भी दरवाजा नहीं खुलता. जब भी वह करीब जाने की कोशिश करती, उसे कोई जरुरी काम याद आ जाता या नींद, थकान घेर लेती. अब उनके खाने का प्लेट भी अलग हो गया था. पहले सालों वे एक ही प्लेट से खाते आए थे.

क्लब में जाते तो वह उससे दूर अलग-थलग बैठता. उन दिनों अनिमेष हर सुंदर औरत को बहुत ध्यान से देखने लगा था. वह कुछ कहने जाती तो चिढ़ कर उसके हजार नुश्ख निकालने लगता- तो क्या तुम्हें देखूँ! कुछ सलीका सीखो इनसे. अब तक साड़ी बांधना नहीं आया...

शुरू-शुरू में उसे यकीन नहीं आता था कि अनिमेष उससे इस तरह से बातें कर रहा है. वह आईने के सामने खड़ी हो कर खुद को देखती और रोती. ओह! यह वही थी! इन कुछ सालों में कितना बदल गई थी वह- चर्बी से ठसाठस भरा मोटा थूल-थूल शरीर, झर-झर कर पतले हो गये बाल, झाई पड़े गाल, फुंसी, मुहासों से भरा चेहरा...  वह भी जानती है, सुंदर तो वह कभी नहीं थी मगर अब बीमारी और उम्र ने उसे एक हद तक विकर्षक भी बना दिया था. एक समय के बाद उसने आईने के सामने खड़ी होना ही छोड़ दिया था. अपना आप ही जैसे असहनीय हो उठा था उसके लिए.

अनिमेष को अब उस में ऐब ही ऐब नजर आते थे. खाने में तेल, ज्यादा नमक... अनगिनत शिकायतें! सबसे ज्यादा जो दुखता था वह था दूसरों से तुलना- मिसेज शुक्ला को देखो, कितने सलीके से सजती-संबरती हैं, उमा जी का ड्रेसिंग सेंस भी कमाल का, और एक तुम हो! कुछ भी डाल लेती हो! और कुछ नहीं तो अपनी ढलती उम्र का तो ख्याल करो! साथ निकलते शर्म आती है...

गीतिका अनिमेष को देखती है. इन दिनों सजने-संबरने में वह काफी दिलचस्पी लेने लगा है. तरह-तरह के आफ्टर सेव, कोलोन, सर्ट्स, कुर्ते की ऑन लाइन शॉपिंग... सालों का लड़कानुमा दुबला-पतला चेहरा परिपक्व हो कर निखरा है. वातानुकूलित कमरे में बैठे-बैठे धूप से संबलाया रंग भी अधिक गोरा हो आया है. लाल कुर्ते में दमकते उसके चेहरे की ओर देखते हुये उसका दिल बैठने लगता है- कहीं कोई इश्क-विश्क का तो चक्कर नहीं! आजकल जिस तरह से अपना मोबाइल सम्हालता फिरता है! बाथरूम में भी मोबाइल...

जो वह नहीं करती थी कभी अब वही करने लगी है- दिन में दस बार अनिमेष को फोन करके टोह लेने की कोशिश करती है कि वह कहाँ है; वह जब बाथरूम में होता है, उसके जेब की तलाशी लेती है, कपड़े सूंघ कर देखती है, लांड्री में देने से पहले उन्हें ध्यान से देखती है... असुरक्षा ने उसे कितनी कुंठित, कितनी शक्की बना दिया है!

आजकल फेसबुक एक नया शगल हुआ है. जब देखो फेसबुक में! ऐसा क्या है फेसबुक में! उसे फेसबुक आदि के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं. हाल ही में नया स्मार्ट फोन लिया है. वह भी बेटे की जिद्द पर कि ममा सबके पास होता है, ले लो! फिलहाल उलट-पुलट कर ही देख रही. वह अपने घर-गृहस्थी में उलझी रही और जमाना जाने कहाँ से कहाँ चला गया! रातों को बिस्तर में पड़ी-पड़ी वह तकिये में मुंह छिपा कर रोती रहती. सब कहते थे, गीत तू बड़ी किस्मत वाली, तुझे अनिमेष-सा नेक, सजीला दूल्हा मिला है... उसके सौभाग्य को किसकी नजर लग गई!

उस दिन बेटे के कराटे क्लास के बाहर मिसेज कक्कर ने उसे फेस बुक दिखाया था- आप फेसबुक में नहीं हैं? आपके श्रीमान तो हर वक्त फेसबुक पर ही रहते हैं. देखिये, अभी भी ऑन लाइन हैं... कमाल का कमेन्ट करते हैं... उसने देखे थे उसके कमेन्ट महिलाओं की तस्वीरों पर-अप्रतिम’,‘अद्भुत’,‘अद्वितीयअपनी सबसे सुंदर फोटो उसने प्रोफ़ाइल पर लगायी हुई थी. उस पर कमेन्ट की भरमार थी, खास कर औरतों की! आफिसर्स क्लब में उसे आँखों ही आँखों में निगलने वाली तमाम मिसेज कुलकर्णी, बालिया, मजूमदार यहाँ भी टूटी पड़ रही थीं. देख कर उसका खून देर तक खौलता रहा था.


उस दिन घर लौट कर उसने अनिमेष से अपना फेसबुक अकाउंट खुलवाया था. अनिमेष ने बिना कोई सवाल के कौतुक से मुस्कराते हुये उसका अकाउंट खोल दिया था. प्रोफाइल पिक्चर चुनते हुये तंज करने से नहीं चुका था- कोई भी लगा लो, क्या फर्क पड़ता है! अकाउंट खोल कर एक मुद्दत बाद वह दिनों तक रोमांच का अनुभव करती रही थी. पहले-पहल तो फेसबुक पर आने का एक मात्र उद्देश्य अनिमेष की गतिविधियों पर नजर ही रखना था मगर धीरे-धीरे उसने अनुभव किया था, फेसबुक इसके अलावा भी और बहुत कुछ है. शुरू-शुरू में कॉलोनी की दो-चार परिचित ही लाइक, कमेन्ट करते. प्रोफ़ाइल पर चार लाइक पड़े थे. देख कर अनिमेष मुस्कराया था- अरे वाह! चार लाइक्स! तुम तो छा गई यार गीत! वह भीतर ही भीतर कट कर रह गई थी. अनिमेष के नए प्रोफ़ाइल पर चार सौ लाइक, तीन सौ कमेन्ट आए थे, उसने देखा हुआ था. उसके बार-बार कहने पर भी अनिमेष ने दिनों तक उसका फ्रेंड रिकवेस्ट स्वीकार नहीं किया था. मित्र बनने के बाद भी उसके पोस्ट्स पर एक बार भी नहीं आया. शिकायत करने पर करवट बदल कर लेट जाता- कहीं तो पीछा छोड़ो!

बेटे ने प्रोफ़ाइल पिक देख कर मुंह बनाया- ऊँह ममा! फेसबुक पर कोई ऐसी तस्वीर लगाता है. यह तो आधार कार्ड में लगाने लायक है! सुन कर उसका चेहरा उतर गया था- तो अच्छी तस्वीर कहाँ से लाऊं! जैसी सूरत, वैसी ही ना आएगी! उसकी बात पर उसका बारह साल का बेटा ऐसे हंसा था जैसे उसने कोई निहायत बचकानी बात कर दी हो- ओहो! फॉटोशॉप के जमाने में सूरत की क्या चिंता करती हो. बताओ, तुम्हें क्या बनना है? प्रियंका चोपड़ा, श्रद्धा कपूर या तुम्हारी वही- रेखा...बेटे ने धड़ाधड़ कई ऐप डाउन लोड कर दिये थे- यह लो, ब्युटि प्लस, स्नैपसीड, रेटरिका... जो बनना है बन जाओ- गोरी, दुबली, लंबी...

वह अपने बेटे का चेहरा देखती रह गई थी. अब तक नाक पकड़ कर दूध पीने वाला और बात-बात पर रोने वाला उसका गोलू इतना सब कुछ कैसे जानता है! उसकी बहनें ठीक ही कहती हैं, वह अब तक सोई ही रही...

इसके बाद इंटरनेट ने एक नई दुनिया ही खोल दी थी उसके सामने. पहले संकोच से, फिर उत्साह के साथ वह आगे बढ़ी थी. अब तक बहुत छोटी-सी थी उसकी दुनिया जिसके केंद्र में अनिमेष और उसका बेटा ही था. उनके इर्द-गिर्द वह किसी उपग्रह की तरह चक्कर लगाती रहती थी. उन्हीं से जीवन, वही जीवन का उद्देश्य भी. अपना कुछ नहीं. रोशनी, ऊर्जा सब उधार की... बेटे ने फोटो एडिट करके दिया तो वह खुद को पहचान ही नहीं पाई. एकदम गोरी-गुलाबी, चमकती हुई. वह चाह कर भी तस्वीर का गोरापन कम नहीं कर पाई. बचपन से अपनी गहली साँवली त्वचा के लिए उसने कम उपहास-अवहेलना नहीं झेली थी. पहले-पहल तो चटक रंग कपड़े पहनने में भी संकोच होता था. गली के बच्चे काली मैया कह कर चिढ़ाते थे. उसके जन्म के समय तो सुना था दादी आँख पर आँचल धर रोने ही बैठ गई थी कि एक तो तीसरी बेटी ऊपर से इतनी काली! कवि मामा ने ढांढस बँधाया था, आषाढ़ में आई है बिटिया, श्यामल मेघ-सी साँवली, कृष्णा... सुन कर दादी चिढ़ गई थी- तुम्हारी कविता से दुनिया नहीं चलती, समझे!

धड़कते दिल से प्रोफ़ाइल बदला और फिर हैरत से देखा, दो घंटे में सौ लाइक्स. कमेंट्स उससे भी ज्यादा- ब्यूटीफूल, सुंदर, अनुपम... यह सब उसके लिए था! उसे यकीन नहीं आ रहा था. अनिमेष को दिखाया तो वह बिना कुछ बोले ऑफिस के लिए निकल गया. उसकी चुप्पी में उसे कहीं कुछ जलने की बू आई. दिनों बाद मन को ठंडक पहुंची. वह दिन उसके जीवन की एक नई शुरुआत का दिन था.

इसके बाद फ्रेंड रिक्वेस्टकी झड़ी लग गई. देखते ही देखते मित्र संख्या पाँच हजार की सीमा छूने लगी. इनबॉक्स में सैकड़ों संदेश- गुड मॉर्निंग, गुड नाइट से ले कर पिक्चर्स और शेर ओ शायरी, कविता आदि. यह एक अजीब किस्म का नशा था. कल तक वह एक अधेढ़ होती उपेक्षित हाउस वाइफ़ थी जिसके लिए किसी के पास समय नहीं था और आज जैसे अचानक से कोई सेलीब्रिटी हो गई थी. जाने कितने लोगों के आकर्षण के केंद्र में हो आई थी वह! सब चैट करने, फोन नंबर लेने के लिए आतुर! पचास को छूती-छूती उम्र के अवसाद के साथ अनिमेष की जानलेवा उदासीनता तो थी ही, साथ ही बुझने से पहले एक बार पूरी कौंध से जल उठने की कोई छिपी अभिलाषा भी शायद रही होगी. एक औरत होने की हैसियत से अब भी अपनी क्षमता और प्रभाव आजमाने का दुर्वार लोभ, लंबी अवधि से बार-बार आहत हो रहे अहम को दुरुस्त करने की जरूरत... वह बांध टूटी नदी की तरह अपना कूल-किनारा तोड़ कर अबाध्य बह चली थी, बिना इस बात की परवाह किए कि वह किस दिशा में जा रही है; इस उद्दाम प्लावन की परिणति क्या होगी!

गहरे नशे की-सी अवस्था में उसे लग रहा था, कैशोर्य के वे सुनहरे दिन लौट आए हैं जब उठती उम्र का लावण्य उसके साधारण शक्ल-सूरत पर भी हल्दी के उबटन की तरह चढ़ा था. चलते हुये कुछ लोग उसे मुड़ कर देखने लगे थे, पत्थर में लिपटे खत भी आँगन में गिरते थे, सर्दी की धूप में छत पर कभी बैठी तो पड़ोसियों के घर कई आईने एक साथ चमक उठते थे. स्कूल में भी किताबों में छिप कर कुछ प्रेम पत्र उस तक आए थे. उन्हीं दिनों तो जमील उसके जीवन में आया था! वह भी क्या दिन थे! लोगों की नजरों ने उसे कुछ खास होने का एहसास करवाया था. उसे लगता था, वह यकायक कुछ हो गई है. बार-बार आईने के सामने खड़ी हो कर खुद को देखती थी, घर से निकलने के पहले बनती-संबरती थी. एक बार उसके लिए उसके स्कूल के दो लड़कों के बीच मारपीट भी हो गई थी. यह सब किसी के भी अहम के लिए बहुत आश्वस्ति भरा अनुभव हो सकता था...

जिस्मानी तौर पर उसका जीवन कुछ अर्थों में बेहतर हो कर भी चार दीवारी के भीतर कैद एक आम भारतीय स्त्री का जीवन ही था जिसकी दुनिया घर की जिम्मेदारियों के इर्द-गिर्द एकरस निरंतता के साथ बरसों-बरस किसी चक्र की तरह घूमती रही थी. निजता के क्षण बस उतने ही जो हर तरह के घरेलू काम के बाद बच जाते थे. अपनी सोच के दायरे में भी उसका स्व सबसे आखिरी में होता था. भुलता हुआ-सा! तरजीह की फेहरिस्त में दाल, चाबल, आटा पहले आता था, उसके सपने बहुत बाद में. याद गली का हर चेहरा धुंधला पड़ने लगा था गुजरते वक्त के साथ.

मगर अब जैसे संभावनाओं की एक पूरी दुनिया खुल गई थी उसके जीवन में फेसबुक के साथ. जाने कब के बिछड़े परिचित, बचपन की सहेलियाँ, संबंधी एक-एक कर आ जुड़े थे फ्रेंड लिस्ट में! देखते ही देखते कुनबा बढ़ा था आभासी दुनिया का. हर पल नोटिफिकेशन की घंटी बजती रहती, मेसेज बॉक्स, फ्रेंड रिकवेस्ट आदि की भीड़ लगी रहती. उसने धीरे-धीरे फोटो डालना, टैग करना आदि सीखा था. इन नए तजुर्बों में गज़ब का रोमांच था. पाँच इंच का वह छोटा-सा फोन जैसे पूरी दुनिया पर खुलने वाली एक जादुई खिड़की था जिस पर बैठी वह हर क्षण इधर-उधर झाँकने को लालायित रहती थी. सुबह उठते ही सबसे पहले फोन उठा कर मैसेज देखना, सबके गुड मॉर्निंग का जवाब देना, फेसबुक का जायजा लेना उसके रूटीन में शामिल हो गया था. दिन भर काम के बीच भी मन मोबाइल पर ही अटका रहता. हर पाँच-दस मिनट में मोबाइल उठा कर चेक करना एक तरह की बाध्यता.

इनके पीछे कभी दाल जल रही थी तो कभी बेटा टिफिन में जैम-ब्रेड ले कर ही स्कूल जा रहा था. अनिमेष लंच ब्रेक में घर आता तो अक्सर खाना तैयार नहीं मिलता. पूछने पर वह डिफेंसिव हो उठती और झगड़ने लगती. फेसबुक ने गीतिका को एक नए आत्म विश्वास से भर दिया था. शादी के बाद हर तरफ से कट कर इस नई जगह के अजनबी परिवेश में वह जिस तरह से खुद को अकेली और असहाय पाती थी वह एकदम से चला गया था. फेसबुक के हजारों दोस्तों, क्ंप्लीमेंट्स, मेसेज, फोन, चैट से घिरी उसे लगता, वह अकेली नहीं है. उसके भी कई अपने हैं जो उसे सराहते हैं, उसकी बात सुनते हैं और साथ भी देते हैं. रात के किसी भी प्रहर उसके एक आह्वान पर दस लोग निकल आते हैं, मदद के लिए हाथ बढ़ाते हैं!

तो अब बात-बात पर वह फेसबुक की ओर दौड़ती है, हजारों लोगों से दिल की बात इस तरह शेयर करती है जैसे वे अदेखे,अजाने लोग उसके बचपन की सहेलियाँ हो. रात को नींद नहीं आ रही, तबीयत खराब है, यह पका रही, वह खा रही... साथ ही हर रोज आठ-दस सेल्फी, खुद के उठाए फोटो... उसकी आत्मीय बातें, खुलापन, भावुकता आभासी दुनिया की भीड़ को खूब भा रही थी. कोई प्रगतिशीलता तो कोई स्त्रीवाद के नाम पर उसे ऊपर और ऊपर चढ़ाये जा रहे थे. लोगों की शह पा कर उसके भीतर लंबे समय से दबा पड़ा लावा फूट पड़ा था और वह स्त्री समस्याओं पर जम कर लिखने लगी थी. देखते ही देखते दमित और कुंठाग्रस्त औरतों की एक बहुत बड़ी संख्या उसके आसपास इकट्ठी हो गई थी. 
(by Paul Lovering)

स्कूल के दिनों में डायरी में छिप-छिप कर कवितायें लिखा करती थी. एक दिन हिम्मत करके उनमें से एक एफबी पर डाल दिया अपनी सोती हुई तस्वीर के साथ. दिन भर में दो सौ कमेन्ट आ गए. साथ ही किसी पत्रिका के संपादक का उसे अपनी पत्रिका में छापने का ऐलान! इससे हौसला बढ़ा तो डायरी, कविता आदि नियमित लिखने लगी और जल्द ही फेसबुक की चर्चित लेखिका बन गई! ऊपर से  रूप की प्रशंसा! इसके जादू से बाहर आना तो एकदम कठिन था. जो कमप्लीमेंट उम्र के सोलहवें साल पर नहीं मिल पाये थे वह सैतालीस साल की उम्र में मिल रहे थे.

रात के एकांत में ऑन लाइन हो कर उसे प्रतीत होता वह कोई सुंदर सेलीब्रेटी है. रह-रह कर बज उठती मैसेंजर की घंटी और स्क्रीन पर चमक उठते रोमांटिक संदेश उसे किसी फिल्म से निकले ड्रीम सीक्वेंस जैसे लगते- हाई ब्यूटीफूल! हैलो बेबी! मुझसे दोस्ती करोगी? क्या कर रही हो... अब अनिमेष की उपेक्षा, अपना एकाकीपन उसे नहीं चुभता. भांड में जाये वह और उसका प्यार. वह अकेली नहीं ना उसे चाहने वालों की कमी है. हालांकि इन मैसेजों का जवाब देने की उसकी हिम्मत नहीं होती मगर वह उन्हें स्वप्न भरी आँखों से बार-बार पढ़ती रहती.

मगर बहुत दिनों तक इसके आकर्षण से बाहर रहना उसके लिए संभव नहीं रह गया. खास कर उस गहरे साँवले लड़के के आकर्षण से जिसका नाम संवेग था. कैसी उदास आँखें थीं उसकी... बातें भी औरों से हट कर. जैसे शब्द-शब्द कविता! बहुत दिनों तक वह उससे निर्लिप्त रह नहीं पाई और धड़कते दिल से उसके साथ चैट करने लगी, पहले कभी-कभार फिर नियमित. संवेग की बातों से लगता था वह निहायत अकेला है और जीवन से विरक्त भी. पहले दिन से ही वह उसे बताने लगा था कि ना जाने क्यों, उसकी तस्वीर देखते ही उसे उससे प्यार हो गया है. उसकी इस हद तक बेलाग बातों ने जहां गीतिका को स्तंभित कर दिया था वही उसकी निर्भीकता और स्पष्टवादिता ने प्रभावित भी किया था. एक अर्से से प्रेम और साहचर्य के अभाव में मरुभूमि बन चुकी गीतिका के लिए यह शब्द बारिश की बूंदों की तरह सुखद थे जिन्हें पढ़ते हुये अपने ही अजाने वह भीतर ही भीतर हरिया उठी थी.

वह खुद क्या चाहती थी उसे पता नहीं मगर कुछ था जो उसे हवा में तिनके की तरह उड़ाए ले जा रहा था. ना चाहते हुये भी वह उसके आमंत्रण पर चैट पर बैठ जाती. उसके दिलफरेब बातों पर सिहरती हुई हाँ हूँ में जवाब देती रहती. रात-दिन, सुबह शाम... अब हर वक्त उसे भी संवेग के मैसेज का इंतज़ार रहता. कोई उसके रूप पर मोहित है, उसे दीवानों की तरह चाहता हैहर तरह से शुष्क उसके जीवन में यह सब मौसम की पहली बारिश-सा सरस, सुंदर था. इनसे बूंद-बूंद तर हो कर वह मिट्टी की तरह सौंधी महक से भर उठी.

उसे उसकी कई बातें अनिमेष की याद दिलाती थी. कभी वह भी इसी तरह की बातें किया करता था.इस एहसास ने उसे कहीं से शंकित भी कर दिया था. उसके लिए यह जानना जरूरी था कि संवेग एक हकीकत है, कोई आभासी दुनिया का छ्ली नहीं. निश्चिंत होने के लिए उसने उसे तरह-तरह से परखा था. उससे फोन पर बात करने की जिद्द की थी. संवेग ने बात की थी. फिर उसने उससे कहा था जब अनिमेष उसके सामने हो तब उसे मैसेज करे. संवेग ने मैसेज किया था. अब गीतिका हर तरह से आश्वस्त हो गई थी संवेग के बारे में कि वह ना अनिमेष है ना कोई बहुरूपिया. इस विश्वास के साथ ही उसकी हर तरह की वर्जनाएं टूट गई थीं. वह संवेग के साथ पूरी तरह खुल गई थी. हर सुबह बेटे और अनिमेष के घर से निकलते ही वह चैट करने बैठ जाती. शाम बेटे को कराटे स्कूल छोड़ पार्क में बैठी-बैठी भी वह फोन, चैट में मगन रहती. रात देर तक चैट कर सुबह उठ नहीं पाती और सर दर्द, तबीयत खराब होने का बहाना बना पड़ी रहती. रस भीनी, मन की निसिद्ध इच्छाओं की बातें,कविताओं का आदान-प्रदान, तस्वीरें...देह की बातें करते हुये गीतिका वही सोलह साल की लड़की हो जाया करती थी जिसके लिए स्पर्श की कल्पना रोमांच के साथ एक कौतुक मिश्रित भय भी जगाया करती है. संवेग उसे ऐसी-ऐसी उत्तेजक तस्वीरें भेजता था जिन्हें देख कर वह रात भर सो नहीं पाती थी. धीरे-धीरे उसने भी अपनी निजी तस्वीरें, अंतर्वस्त्रों के साइज, कामनाओं का लेखा-जोखा उसे सौंप दिये थे.

अनिमेष कुछ हैरत, कुछ कौतूहल के साथ गीतिका में आए परिवर्तन देख रहा था. जाने इन दिनों उसका ध्यान किधर था. अपने में खोई-खोई रहती, घर की ओर भी उदासीन. तबीयत की बात कर दिन चढ़े तक सोई रहती है. आए दिन ऑफिस जाने से पहले उसे गोलू को भी स्कूल के लिए तैयार करना पड़ता है. लंच ब्रेक पर आ कर कई बार लांच नहीं मिलता. कुछ कहने जाओ तो काटने को दौड़ती है. कई बार ऑफिस में उसके खिलाफ शिकायत करने की भी धमकी दे चुकी है. बात-बात पर नारी अस्मिता और नारी के अधिकार पर भाषण शुरू कर देती है. कुछ समय से अपने रख-रखाव पर विशेष ध्यान देने लगी है. जन्म की आलसी शाम गिरने तक कई किलोमीटर चल आती है. फैशन का भी वही आलम. जब देखो किसी ना किसी ऑन लाइन स्टोर का कूरियर बॉय दरवाजे पर खड़ा है. हर दूसरे दिन फोन रिचार्ज करने का निर्देश भी!

ऑफिस में सब दबी जुबान बात करते. उसके फेसबुक पोस्ट्स उसके लिए खासा सर दर्द बन गए थे. खास कर सेल्फीस. नित नई मुद्रा और परिधान में. फॉटोशॉप की महिमा से एकदम स्नो व्हाइट! फिर वह हृदय विदारक विलाप, गीत, शेर, कवितायें... लोग चेहरे पर गंभीरता ओढ़ कर पूछते, अनिमेष बाबू! घर पर सब ठीक है ना? वह क्या जवाब देता. बस सब से बचता फिरता.

और एक दिन वह मेल आया था! देख कर वह सन्न रह गया था. गीतिका का किसी संवेग से हॉट चैट! पन्ना-पन्ना. साथ ही अंतरंग मुद्राओं और वस्त्रों में तस्वीरें! अपनी आँखों से देख कर भी वह विश्वास नहीं करना चाहता था मगर उनके निहायत निजी जीवन की बातें, तस्वीरें, विवरण उसे यकीन करने पर बाध्य कर रहा था. उसने उसी दिन गीतिका से सीधे-सीधे पूछा था. सुनते ही घर में बंद पड़ गई बिल्ली की तरह वह आक्रामक हो उठी थी. घबराहट और गुस्से में जाने क्या-क्या अनर्गल बोलती चली गई थी- उसका अकाउंट हैक किया गया है, यह उसे बदनाम करने के लिए किसी की चाल है आदि-आदि और अंत में चांटे से तिलमिला कर- अगर वह उसकी जिस्मानी जरूरतों को पूरी नहीं कर सकता तो उसे पूरा हक है कि वह किसी और से संबंध बनाए! सुनते हुये अनिमेष का धैर्य जवाब दे गया था और उसने उसे कई चांटे जड़ कर उसके माँ-बाप को फोन लगाया था.

अब गीतिका नर्म पड़ी थी और रोते हुये माफी मांगना शुरू कर दिया था कि उससे भूल हो गई. वह उसे एक मौका दे. आगे से ऐसा कभी नहीं होगा. स्कूल से लौट कर बेटा भी माँ को रोते हुये देख कर रोने लगा था. दोनों को इस तरह रोते देख अनिमेष वहाँ से चला गया था.

इसके बाद दिनों तक गीतिका चुप पड़ी रही थी. इस बीच अनिमेष अपने मोबाइल में उसका फेसबुक अकाउंट खोले उसकी गतिविधियों पर नजर रखने लगा था, उसे उसका पासवर्ड पता था ही. साथ ही वह उसका कॉल लॉग भी चेक करता. गीतिका का टेक्नॉलॉजी ज्ञान शुरू से शून्य था. हर बात के लिए वह अनिमेष या मुंबई में रहने वाली अपनी बहन पर ही निर्भर करती थी. अनिमेष देख रहा था कि अब वह कॉल लॉग, चैट मिटाने लगी थी और थोड़े ही दिनों बाद अपना फेसबुक पासवर्ड भी बदल लिया था. शायद अपने किसी फेस बुक शुभचिंतक या बहन के परामर्श से. मगर अनिमेष के फोन पर उसका फेसबुक खुला ही रह गया है इस बात का उसे एहसास नहीं था.

अनिमेष ने कहा था, अब अगर उसने एक भी गलत हरकत की, वह सभी को सच्चाई बताने पर बाध्य हो जाएगा. इस बात ने गीतिका को सहमा दिया था. अपने निजी जीवन में अब तक उसकी छवि एक सीधी-सादी घरेलू औरत की थी. जहां अनिमेष के उजले रंग, आकर्षक चेहरे और स्मार्टनेस के कारण लोग उसे तेज-तर्रार और अग्रेसिव समझते थे वहीं उसके साधारण रूप-रंग और स्थूल काया के लिए उसे घरेलू और सीधी-सरल. वह सबके स्नेह और सहानुभूति की पात्र थी- गीतिका जैसी सादा औरतें कभी कुछ गलत कर नहीं सकती! चालाक तो उसका पति है. देखते नहीं उसकी कंजी- भूरी आँखें, लच्छेदार बातें...

हाल ही में पायी हुई आजादी का स्वाद, शोहरत, तारीफ और रोमांस उससे भुल नहीं पा रहा था. वास्तविक जीवन में बस अकेलापन और उदासी थी, आभासी दुनिया में सब कुछ परीकथाओं-सा सुंदर, स्वप्निल! घर की दहलीज के भीतर वह एक माँ, हाउस वाइफ़, नेट के विंडों के पार एक सुंदर, सबके आकर्षण की केंद्र नायिका! अब रोटी पकाने, स्वेटर बुनने में उसका दिल नहीं लगता. अब वह जानती है, घर की चार दीवारी के बाहर हवा, धूप और रोशनी है. जिस वक्त वह बेटे को थपक कर सुलाने की कोशिश करती, उसका बेलगाम मन अपने काल्पनिक रेशमी बाल खोले अपने किसी प्रेमी के साथ तेज बारिश के बीच लंबी ड्राइव पर निकल जाता. बिस्तर पर पड़ी-पड़ी उसे संवेग के शब्द याद आते. गहरे विषाद के साथ जिस्म के रोएँ थियरा उठते. जाने उसने किस जन्म का बैर निभाया था! उससे चैट के दिनों में लगता था वह प्रेम में है. अब जानती है, वह बस भूख थी. जीवन के अकाल से उपजी सर्वग्रासी भूख!

सालों देह-मन की क्षुधा, अभाव के बीच वह किसी तरह जीती रही थी मगर संवेग ने इस तरह आ कर एक सूखे जंगल में आग लगा दी थी और अब यह आग दावानल बन गई थी. दिन-रात देह में कुछ धू-धू जलता है, मन भीगी लकड़ी-सा धुआँता रहता है. अपनी हताशा में वह रात-दिन फेस बुक पर रोती रहती. इसके पीछे उसके भीतर का अभाव तो था ही, साथ ही कहीं से एक डिफेंस मेकानिज़्म भी था- अनिमेष के किसी भी तरह के हमले के विरुद्ध अपनी सीधी-सादी और अच्छी औरत होने केछवि निर्माण की स्ट्रेटेजी!

दूसरी तरफ मैसेज बॉक्स में लुभावने निमंत्रणों के अंबार लगे रहते. अपनी बहन आदि से पूछ कर जब वह इस बात के लिए पूरी तरह आश्वस्त हो गई कि पासवर्ड बदलने के बाद अब उसका फेस बुक सुरक्षित है, वह फिर अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट गई थी. सारी वर्जनाओं को तोड़ कर. वह जीना चाहती है और जीने के लिए कोई भी कोशिश नाजायज नहीं हो सकती!

विडम्बना यह कि इस बार उसे एक साथ दो लोगों से प्रेम हो गया! एक तेज तर्रार जर्नलिस्ट और दूसरा एक रेडियो जॉकि! जर्नलिस्ट की हिम्मत भरी बातों की वह दीवानी थी तो रेडियो जॉकि के जादू भरी आवाज की. दोनों फेस बुक पर चमकने वाली उसकी तस्वीरों पर फिदा थे. आवाज भी उसकी भारी और सांद्र थी. गीतिका की औरत को उनकी मर्दानगी आकर्षित करता था.

दोनों ने शुरू-शुरू के चैट में ही उससे शब्दों के माध्यम से जिस्मानी ताल्लुक स्थापित कर लिए थे. उनके सामने वह बिलकुल दुर्बल पड़ जाती. वे आते और उससे अपनी मनमानी कर चल देते. फोन पर भी वही सब. फोन रख कर उसे प्रतीत होता, वह हर तरह से रुँद्ध गई है. रेडियो जॉकि अपनी नशीली आवाज में जब कहता गुड नाईटी’, नाईटी के भीतर उसकी देह पिघलने लगती. जर्नलिस्ट से वह अपनी दुख भरी कहानी सुनाती और वह उसे एक दिन सारी तकलीफों से निजात दिलाने का वादा करता. अड़तालीस छूते-छूते एक बार फिर वह अपने कैशोर्य में लौट गई थी. कभी जर्नलिस्ट के वाल पर उसकी दूसरी प्रशंसिकाओं के साथ होड़ लेती तो कभी रेडियो जॉकि के साथ भीगी, सांद्र आवाज में देर तक बातें करती. मान-मनुहार, रूठना-मनाना...
सोलह साल की मुग्धा की तरह अभिसार में डरना, सिहरना, खुद को तुम्हारी पगलू दोस्त कहना... जर्नलिस्ट भावुक हो कर कहता, मुझे लग रहा है मैं तुम्हें अनिमेष से छिन रहा हूँ या मैं तो मर ही जाऊंगा अगर किसी दिन तुम कहो, रवीश, तुम भी देह से आगे बढ़ ना सके! जॉकि कहता, सब कुछ छोड़ कर मेरे पास आ जाओ...

वह बार-बार उनसे पूछती रहती, उनके चैट कहीं अनिमेष पकड़ तो नहीं पाएगा और दोनों उसकी मासूमियत पर मुस्करा पड़ते. उन दोनों की बातों से और फेस बुक के सैकड़ों लाइक्स, कमेंट्स से वह एक बार फिर खुद को मजबूत महसूस करने लगी थी. वह अकेली नहीं, कमजोर नहीं, सब उसके साथ है!

अनिमेष किसी तरह अपने गुस्से पर काबू रख कर गीतिका की हरकतों पर नजर रख रहा था. उसके सब्र की अब इंतिहां होने लगी थी. गीतिका से उसका मन फिर गया था मगर आज भी वह उसके बच्चे की माँ और उसका परिवार थी. हजार प्रलोभनों के बावजूद उसने कहीं और जा कर अपनी जरूरतों को पूरी करने की कोशिश नहीं की थी. गीतिका के प्रति सारे दायित्त्वों का निर्वहन भी उसने आज तक किया था. सामाजिक प्रतिष्ठा और बेटे की खातिर उसने गीतिका को उसकी पहली गलती के लिए माफ कर आगे बढ़ने का निर्णय लिया था. मगर गीतिका...!

रात के एक बजे अनिमेष के सामने गीतिका का फेसबुक खुला हुआ था. गीतिका अपने कमरे में बंद हो कर एक साथ अपने दो प्रेमियों के साथ हॉट चैट पर थी. एक उससे अपनी गोद पर बैठने के लिए इसरार कर रहा था तो दूसरा कहीं मिलने की योजना बना रहा था. पढ़ते हुये अचानक अनिमेष के भीतर एक विस्फोट-सा हुआ था और वह अपना सुध-बुध खो बैठा था. काँपते हुये उसने गीतिका के दरवाजे पर धीरे-से दस्तक दिया था और जैसे ही थोड़ा रूक कर उसने दरवाजा खोला था, उसे खींचते हुये ड्राइंग रूम के सोफ़े पर गिराया था और कई चांटे एक साथ तरातर जड़ दिये थे. इस आकस्मिक घटना से गीतिका सन्न रह गई थी और पूरा माँजरा समझ आते ही डर से पीली पड़ गई थी. मोबाइल अब भी उसके हाथ में था और चश्मा टूट कर दूर जा गिरा था.

इसके बाद वह रो-रो कर माफी मांगती रही थी मगर अनिमेष पर तो जैसे भूत सवार था. उसने एक-एक कर उसके सारे रिशतेदारों को, दोस्तों को फोन कर उसके बारे में बताया था और फिर उसे घर से बाहर धकेल कर पीछे से दरवाजा बंद कर लिया था. सीढ़ी पर बैठ रोते-रोते अचानक गीतिका की सांस रूक-सी गई थी. उसने विस्फारित आँखों से देखा था, बाहर चारों तरफ गहरा अंधकार था और तेज बारिश हो रही थी. दूर कहीं सियार की हूक सुनाई दे रही थी. अपने तमाम दोस्त, लाइक्स, कमेंट्स, इमोजी, स्माइली और फूल-पत्ते समेट कर जगमगाती आभासी दुनिया यकायक अन्तरिक्ष के असीम अंधकार में अंतर्ध्यान हो चुकी थी और पीछे बची रह गई थी वह- अकेली और असहाय! हाथ में मोबाइल पकड़े जिसका स्क्रीन बुझ कर काला पड़ चुका था.
12/10/2017)
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जयश्री रॉय
18 मई, हजारीबाग (बिहार)
एम. ए. हिन्दी (गोल्ड मेडलिस्ट), गोवा विश्वविद्यालय

अनकही, तुम्हें छू लूं जरा, खारा पानी, कायांतर, फ़ुरा के आंसू और पिघला हुआ इन्द्रधनुष, गौरतलब कहानियाँ (कहानी-संग्रह) औरत जो नदी है, साथ चलते हुये, इक़बाल, दर्दजा (उपन्यास), तुम्हारे लिये (कविता संग्रह) हमन हैं इश्क मस्ताना (सम्पादन - कहानी-संग्रह)

युवा कथा सम्मान (सोनभद्र), 2012, स्पंदन कथा सम्मान, 2017      
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