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अम्बर रंजना पांडे की कविताएँ

Posted by arun dev on जुलाई 26, 2017






सदी (२१ वीं) की हिंदी कविता पर यह आरोप बार-बार दुहराया जाता रहा कि इनमें अधिकतर पिछली सदी के कवियों की नकल हैं और कि खुद इनमें दुहराव है और कि पता नहीं चलता - कौन किसकी कविता है.  मतलब - कवियों ने अपने अलहदा मुहावरे विकसित नहीं किए हैं आदि आदि.

यह सही है कि केदारनाथ सिंह और रघवीर सहाय से २१ वीं सदी के अधिकतर युवा कवि / कुकवि प्रभावित रहे हैं और केदार जी का या मुहावरा ‘हमारे समय की सबसे’ बहुत अधिक इस्तेमाल हुआ है. इतना कि अब तो उब सी होती है.

पर जिनसे सदी की युवा कविता का चेहरा बनता है उनमें से अधिकतर ने खुद अपना कवि व्यक्तित्व विकसित किया है. पूर्वज हैं उनमें शामिल पर एक सीमा तक.

अम्बर रंजना पांडे इसी तरह के कवि हैं. उनकी कविताएँ हिंदी कविता का नया पड़ाव हैं. भाषा, शिल्प, संवेदना सबमें वह नवोन्मेषी हैं.
उनकी कुछ नई कविताएँ 


अम्बर रंजना पांडे की कविताएँ                 




वेश्या से मिलना जुलना
(सच्ची घटना पर आधारित)

अर्धरात्रि से दूसरे दिवस दोपहर तक 
आगंतुकों की सेवा, फिर स्नान, पूजा,
भोजन, नींद
ऐसे कट गया जीवन पर वर्षा होते ही
उसे याद आता डिहरी, सोन के किनारे
उसकी जीर्ण कुटी और गृहदाह

एक दिन जब आगंतुक अधिक न थे
बहुत वर्षा हो रही थी और उसने खाट पर
बिछाई थी धुली हुई, कमलिनियों से भरी
चद्दर, निकट ही
स्टोव पर दूर दार्जिलिंग की चायपत्ती
गुड़गुमुड़ बोलती उबलती थी, उसने पूछा
'तुम क्या करते हो अमरन साहब?'

जैसे अम्माँ मुस्कुरातीं खिचड़ी स्वादिष्ट बनने पर
अम्माँ खिचड़ी अच्छी से अच्छी बनाने के
बहुत जतन करतीं
'रोगी का पथ्य उत्तम हो तब रोगी
फटाफट निरोग होता है' मूँग की दाल
दुबराज, नमक और जल
जैसे पंचतत्त्वों से भाँत भाँत के जीव हुए
वैसे ही इन पाँच पदार्थों से
खिचड़ी के भिन्न भिन्न स्वाद होते

'मैं कवि हूँ, कैथी.' पता नहीं क्यों
उस बज़ार की सब निर्धन वेश्याएँ साड़ी ही
क्यों पहनती थी, साड़ी की किनोर से चाय की
पतीली पकड़े, वह हँसती, ठठाकर

'कवियों को नमक लेने को धन नहीं होता
कवि लोग वेश्याओं के घर बस
उपन्यासों में आते है अमरनचंद्र.'

एक रात्रि बहुत नशे में उसके ब्लाउस में
अपनी कविता रखकर
आ गया मैं, उस रात्रि रुपया नहीं था मेरे निकट

बहुत दिनों बाद उसने फ़ोन किया
पैसे माँगती होगी किंतु वह शुरू हो गई
'संवाद पर संवाद ही तो लिखे है
कथा हो सकती है. कवि नहीं हो तुम
झूठे हो.'

फिर अगली बेर गया तो कहा
'मत आओ हर्पीज़ हो गया है.
बहुत पीड़ा है.
बहुत खेद है.'

मन बहुत विशाल पाकशाला है
उसमें अंधकार है मिट्टी का तेल है
मैं वहीं बैठ गया
और मन में ही चौके में
स्टोव में हवा भरने लगा
बहुत वर्षा होती थी
चौके की छत चूती थी

कालीमूँछ धान अल्प था
दाल मटर की थी मूँग की नहीं थी

इतने दुःख में भी वह हँसने लगी 'कवि हो
तब भी कल्पना में भी
ऐसा अभाव है तुम्हारे.'

किस कवि ने कहा कि अदहन में भी
चावल डालते नहीं अकेले
मन जो एक विशाल पाकशाला है
तो देह उसमें खदकता अदहन है
सब अकेले ही जलते है

'हमेशा हाथ से नमक डालना
चम्मच से कभी नहीं' अम्माँ की
शिक्षा

नमक लेकर मैं अंगुलियों से
उसे तौलता रहा; कमर के एक ओर
जहाँ हर्पीज़ अधिक थी, उसे ऊपर कर
करवट ली, 'अमरनचंद्र जी, अपने मन की
इस विशाल, आँधमयी
जिसकी छत चूती है
उस पाकशाला में चाय बनाकर ही मुझे
पिला दो
नमक आँकते तो लम्बा टेम खटेगा.'

रोगी का पथ्य उत्तम हो
तब रोगी फटाफट निरोग होता है

'अच्छा मैं अदरक लेकर आता हूँ तब.'
छाते कविताओं की ही भाँति
दुःख से पूरा नहीं बचा पाते थे- पतलून सोरबोर
बुशर्ट बरबाद, जनेऊ तक भीग गया
(पता नहीं क्यों मैं क्यों पहनता था उन दिनों
विष्णुपुर का जनेऊ!)

सब सृष्टि जलमयी थी, बुधवारपेठ में
कोई दिखता ही नहीं था, पनोरे, पड़ोह धलधल
बहते
सब दिशा गोड़डुबान जल था, एक चाय के ठेले पर
हम्माल मजूर चिमनी से बीड़ी सुलगाते थे

'पता था रीते हाथ लौटोगे, घटा कहती है कि
आज ही सब बरसूँगी' चाय छानते उसने कहा
'बाहर गमले में अदरक बो रखी है मैंने
आपको बताने आती तब तक आप फ़रार.'

'अदरक को छुआछूत बहुत होती है न! कोई ऐसा वैसा हाथ
लग जाये सड़ जाती है' मैंने कहा

उसने मुख उठाया 'ओह रे बाबा, तुम्हें तो
माता निकली है' जलते स्टोव के आलोक में
उसका कपाल देखकर मैंने कहा

'माता तो छोटी थी तब निकली थी
यह हाथभर केश थे मेरे
आधे माता ले गई आधे कालाजार लील गया

लम्बे केशोंवाली वेश्याएँ बहुत कमाती है.'

'बार बार वेश्या क्यों कहती हो?'
'कोई शब्द पुरातन होकर बुरा तो
नहीं हो जाता न.'

पत्नी से अलग होने के पश्चात्, प्रतिदिन का
आना-जाना था उसके निकट
बहुत पहले की बात नहीं है
हाँ, तब वर्षा बहुत होती थी

और चिमनी से ही हो जाता था इतना
प्रकाश
कि जीवन चल जाए, एक-दूसरे के
दुःख और सुखों से भरे कपाल दिख जाए

'मैंने जब भी कोई कविता लिखनी चाही
दुख की छाया ने उसपर पड़कर सब नाश
कर दिया.'

'दुःख की छाया सुख की भूमि पर पड़ती है
सुख की छाँह मेघों की छाँह जैसी है
अभी थी अब नहीं. भंगुर है.'

'तुम कवि हो क्या, कैथी?'

हँस हँसकर उसने कहा 'हाँ हूँ
काहे से कि संवाद करना ही तो
कविता है तुम्हारी दृष्टि में' हर्पीज़ में भी
उसने हँस हँसकर कहा.
___________
*बुधवारपेठ- पुणे का एक इलाक़ा जो वेश्यावृत्ति के लिए प्रसिद्ध है.
*अमरनचन्द्र- कवि का धोखे का नाम. कवि वेश्या से अपना असली नाम नहीं बताना चाहता.

मल्लबर्मन 


अद्वैत मल्लबर्मन का टीबी अस्पताल से
आधी रात को भाग जाना

(अद्वैत मल्लबर्मन ने तिताश एकटी नदीर नाम नामक उपन्यास लिखा था। उन्होंने अविभाजित बंगाल में एक दलित परिवार में जन्म लिया था।)

जधावपुर के कुमुदशंकर राय टीबी अस्पताल से
ख़ून की उलटी करते भाग गया अद्वैत मल्लबर्मन
'पद्मा पद्मा' पुकारते
'होगी कोई विस्मृत हतभागिनी' वार्डबॉय ने कहा

'पद्मा पाकिस्तान चली गई' कहते भाग गया
सन्निपात के सातों लक्षणों से क्लांत, यक्ष्मा का रोगी
वय: ३६/३८

एक रात कहने लगा रोगी, फाँसी लगाई तो
श्वेत कनइल के हार की लगाऊँगा
जधावपुर में कहाँ धरी है
नदियों में केवल सायंकाल फूलनेवाली कनइल की लताएँ

फिर एक दिवस भू पर पग धरने से
मना कर दिया, किसी मूल्य पर पलंग से
नहीं उतरता था, कहता, भारतवर्ष में
जौंक बहुत है

सरोजिनी के नवदल में पेड़ा माँगता था
देश आज़ाद हुआ है
किंतु वह तो दो वर्ष पूर्ण ही हो गया
उसे कहाँ पता था डाक्साब

तिताश में तैरते मेरी लंगोट बह गई
सिंघाड़े के आटे का हलवा बल भया
मेरी आठवर्ष की स्त्री को नाग डँस गया
दिनभर बकबक झिकझिकी वृथा विलाप
बीड़ी के लिए रुपए देता था
सौगंध खाता कि सिनेमा वाली स्त्री से मिलाएगा

एक बालक आता तो था मिलने, नाम कोई घटक वटक था
बोतल लाता था
दोनों ही पद्मा की रट लगाते 'पद्मा पद्मा पद्ममयी पद्मा
पद्मवर्णा दुर्गम तरणा पद्मा'

कोई कोई निशा टेबुल बजा बजाकर गाते थे
मुसलमानी गान

'देश नष्ट हो गया है अब कौन पढ़ेगा
मासिक पत्रिका मोहम्मदी में छपी मेरी कविताएँ
आनंद बाज़ार पत्रिका से कहो मुझे भूल जाए'

सबके नाम ऐसे ही नष्ट होंगे
किंतु उससे पहले देश नष्ट होगा
उससे पहले भाषा नष्ट होगी
जैसे हो गई नष्ट तुम्हारी हिंदी.

टाकाचोर


टाकाचोर
 
भृंगराजों के झुण्ड में शिकार करता
आ बैठा है टाकाचोरों का कुटुंब
देखना अशुभ है निमीलित आँखों से
कहता है शैलेंद्र

'कौआ है रे' अज्ञानी जन कहते हैं
'टाकाचोर टाकाचोर'
कहकर दौड़ता जाता है शैलेंद्र
आँखों को करतलों से ढँके

प्रातः निपटा चुका है बसंतों की पंगत में
निम्बोरियों के ढेर
उड़ती दीमकें खा चुका सकल

कितने पक्षियों के अण्डे खाकर
अब भृंगराजों के दल में यह
भुखमरा क्या खाने आया है

लग्गा लेकर टाकाचोर का  नीड़ उजाड़ने को
टॉर्च से खोज रहे है शैलेंद्र के पापा
सब ओर साँय साँय है
'टाकाचोर के रहते कोई और गृहस्थी नहीं कर सकता'

'भरी रात्रि क्यों किसी का नीड़ नष्ट करते हो
भीतर गरम कम्बल में जो
नष्ट नीड़ पढ़ते थे, वही जाकर पढ़ो न '

साँय साँय है टाकाचोर का ज़रा अंदेसा नहीं

प्रातः ही फिर स्वर किया, शर्करा
तो जल में ही घुलती है
तब वायु में कैसे घुलकर स्वर हो गई

'को कि ला को कि ला को कि ला '
श्रीमद्अमरसिंह ने शब्दकोश बनाने में
शताब्दियों पूर्व
कर दी थी बड़ी भारी मिस्टेक

टाकाचोर 'को कि ला को कि ला ' टेरता है
अज्ञानी जन हतप्रभ, कागला नहीं है
कोकिला है'

नीड़ नहीं किया पताकाओं के संग निकल गया
श्यामाओं की फ़िराक़ में.



फ्रांसीसी भाषा का प्रेमी

अग्नि हैं भाषा, पंख सा जलकर
भस्म हो जाऊँगा. नित्य सात बजे
सायंकाल फ्रांसीसी भाषा का प्रेमी
अपनी प्रेयसी की प्रतीक्षा
करता हैं, दिनभर की थकी, जिसका
मन बासे दूध सा फट फट
पड़ने को हैं, धीरज से क्रोशिया
बुनती हैं.

नित्य दिन के जाते जाते
फ्रांसीसी भाषा कहाँ खो जाती
हैं? शब्द गिनता हैं अँगुलियों पर वह,
मात्राएँ और उच्चारण में भेद भ्रमित
कर देता हैं अर्थ. यह भाषा जिसे सीख
रहा हैं प्रेयसी से, गद्य में, अपने अनर्थ में
भी कैसी कविता लगती हैं. वह कहती हैं
हैं  ''cava bien merci.'' चन्द्रमा निकल
आता हैं सुदी प्रथमा को ही. कहो तो

फ्रांसीसी में क्या कहते हैं चन्द्रमा को.

________

अम्बर रंजना पाण्डेय 
दर्शन शास्त्र में स्नातक अम्बर रंजना पाण्डेय ने सिनेमा से सम्बंधित अध्ययन पुणे, मुंबई और न्यूयॉर्क में किया है. संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी और गुजराती भाषा के जानकार अम्बर ने इन सभी भाषाओं में कवितायें और कहानियाँ लिखी हैं. इसके अलावा इन्होने फिल्मों के सभी पक्षों में गंभीर काम किया है. इकतीस दिसंबर 1983 को जन्म. अतिथि शिक्षक के रूप में देश के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में अध्यापन कर चुके अम्बर इंदौर में रहते हैं.

हस्तक्षेप : वैज्ञानिक शोध पत्रिकाएँ हिंदी में क्यों नहीं छपती हैं ? आशीष बिहानी

Posted by arun dev on जुलाई 24, 2017














आशीष बिहानी हिंदी के कवि हैं और ‘कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र’ (CCMB), हैदराबाद में जीव विज्ञान में शोधार्थी हैं.

ज़ाहिर है उन्हें हिंदी में वैज्ञानिक शोध पत्रिकाएँ की अनुपलब्धता का अहसास और दर्द दोनों है. हिंदी की दुनिया को जो लोग सिर्फ साहित्य तक सीमित समझते हैं उन्हें इस बात की क्यों कर चिंता होगी ?  कम से कम ‘नेचर’ के अनुवाद की ही व्यवस्था कर दी जाती, जबकि विज्ञान को बढ़ावा देने और लोकप्रिय बनाने के बड़े दावे किए जाते हैं.

वैज्ञानिक चेतना और विज्ञान दोनों को फलने, फूलने. पसरने के लिए निज भाषा के खाद पानी की जरूरत होती है. रोपेंगे नहीं तो फल कहाँ से मिलेगा श्रीमान. महोदय. 


वैज्ञानिक शोध पत्रिकाएँ हिंदी में क्यों नहीं छपती हैं ?
आशीष बिहानी





क्या कारण है कि दुनिया के दूसरे सबसे विशाल भाषी समूह होने के बावज़ूद कोई भी वैज्ञानिक शोध पत्रिका भारतीय भाषाओँ में अपने शोध-पत्रों का अनुवाद करके प्रसारित नहीं करतीं है? नेचर और स्प्रिन्गर के विलय से बने प्रकाशन दानव की पत्रिका नेचर का प्रमुख हिस्सा विज्ञान की विविध शाखाओं में अत्याधुनिक शोध को प्रकाशित करता है. यह पत्रिका कोरिया, चीन और जापान जैसे देशों में, उनकी राष्ट्र भाषाओँ में अनूदित-प्रकाशित की जाती है. इसी प्रकाशन की पत्रिका साइंटिफिक अमेरिकन”, जो कि विज्ञान में अभिरुचि रखने वाले सामान्य पाठक वर्ग के समक्ष नवीन वैज्ञानिक खोजों, अविष्कारों और उनसे उत्पन्न होने वाली विचारधारा को आकर्षक तरीक़े से पेश करती है. यह पत्रिका स्थानीय अनुवादकों और प्रकाशकों के सहयोग से तकरीबन बीस भाषाओँ में प्रकाशित की जाती है, जिनमे रूसी, ताईवानी और ब्राज़ीलियाई भाषाएँ शामिल हैं.

नेचर की सालाना वेटेड फ्रेक्शनल काउंट इंडेक्स के हिसाब से भारत में शोध का आयतन ताइवान, ब्राज़ील और रूस जैसे देशों को कड़ी टक्कर दे रहा है. यद्यपि इस मामले में हम चीन और अमेरिका जैसे देशों के आस-पास भी नहीं फटकते, हमारे यहाँ शोध बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है, ख़ास कर जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान में. हिंदी, मेंडेरिन के बाद दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है और बोलने वालों की संख्या रूसी, जापानी, कोरियाई इत्यादि से बहुत ज़्यादा है. तत्पश्चात, तमिल/ तेलुगु/ पंजाबी/ बंगाली आदि भाषाएँ भी बहुत पीछे नहीं हैं.

इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत में शोध की स्थिति संतुष्टिपूर्ण है. बस यह कि अपने सामर्थ्य का एक नगण्य अंश देता हुआ भारत भी बहुत महत्वपूर्ण है. शोध की बढ़ोतरी से भी खुश मत होइएगा, सरकार ने जो अभी आधारभूत शोध की फंडिंग पर कुल्हाड़ी चला दी है उसका असर कुछ समय में नज़र आयेगा. डेढ़ अरब की आबादी वाले हमारे देश से जितने वैज्ञानिक शोध पत्र निकलते हैं उससे दो गुना ज़्यादा स्पेन से निकलते हैं और तकरीबन छः गुना चीन से. हर नेता के भाषण में हम यूएसए बनने के सपने देखते हैं. हमें याद रखना चाहिए कि मौजूदा तंग हालात के बावज़ूद यूएसए से निकलने वाला शोध आयतन में भारतीय विज्ञान का बीस गुना है!

भारत एक तेज़ी से बढती अर्थव्यवस्था है जहाँ आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा विज्ञान और प्रोद्योगिकी से वंचित है क्योंकि वो शेष छोटे हिस्से की भांति अंग्रेज़ी सीख नहीं सकता, आर्थिक और भाषिक मजबूरियों के कारण. ऐसे में सिर्फ़ अंग्रेज़ी का ज्ञान अभ्यर्थियों को कौशल और योग्यता की तुलना में कहीं आगे ले जाता है -- ऐसे स्थानों पर भी जहाँ अंग्रेज़ी की कोई आवश्यकता नहीं है. 

अंग्रेज़ी से इस विकारग्रस्त मोहब्बत का नतीज़ा है कि हमारे युवा दूसरे देशों की बनाई आधारभूत संरचनाओं में सस्ते बैल बनने को तैयार हैं बजाय अपने ही देश की आधारभूत संरचना को मज़बूत करने की कोशिश करने के. सच्चे अर्थों में उद्यमशील बनने के. उनको उदासीन महसूस कराने में हमारे संस्थानों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. UGC द्वारा अनुमोदित शोध पत्रिकाओं की सूची देख लीजिये. विज्ञान और प्रोद्योगिकी वर्ग में एक भी भारतीय भाषा का जर्नल नहीं है. बंगाली/ तमिल/ तेलुगु तो दूर की चिड़ियाएँ है, हिंदी तक में विज्ञान का दस्तावेज़ीकरण शून्य के बराबर है. क्यों कोई सीखना चाहेगा हिंदी, अगर तकनीकी रूप से मज़बूत होना चाहता हो तो? यदि कोई सीखेगा, तो उसे मिलेगा क्या पढ़ने को? UGC की सूची से बाहर भारतीय भाषाओं में विज्ञान की दुर्दशा देखकर ही दिल दुहरा होने लगता है, जहाँ विज्ञान बस जादुई दवाइयों, बॉडी-बिल्डिंग और तथ्यों का अश्लील ढेर रह जाता है.

इसकी तुलना में जापान में जीव विज्ञान के 400 शोध जर्नल्स में से 300 जापानी भाषा में प्रकाशित होते हैं. आलम यह है कि वहाँ किये जाने वाले शोध को अंग्रेज़ी में अनुवाद करने की आवश्यकता पड़ती है. इन दोनों बातों में सम्बन्ध सिद्ध नहीं हुआ है पर यह एक सम्भावना है जो हमें भारतीय भाषाओँ के लिए खोजनी होगी. अन्यथा भारतीय विज्ञान इसी लूली रफ़्तार से चलता रहेगा और देश के भावी बेहतरीन वैज्ञानिक या तो वेंकी रामकृष्णन की तरह लन्दन में पनाह पाने को भागेंगे या फिर द्विभाषी न होने के ज़ुर्म में किसी ऐसे काम को करते हुए सज़ा काटेंगे जो करना उन्हें पसंद नहीं.

संभव है कि वित्त की कमी विज्ञान के प्रसार और शोध को धीमा कर दे. पर भारत में वैज्ञानिक गतिविधियों का अभाव मूलभूत रूप से स्थानीय भाषाओँ में उसकी अनुपलब्धता के कारण है. पर हिंदी तो काफी लचीली भाषा है जो किसी भी ढाँचे में ठीक-ठीक फिट हो सकती है. तो फिर हिंदी में विज्ञान का अभाव क्यों?

कारण अनावश्यक रूप से उलझी हुई अधिकतर समस्याओं की तरह स्पष्ट है. हिंदी विश्वार्द्ध में अपनी भाषा में विज्ञान में भाग लेने के प्रयास हो ही नहीं रहें है. सभी अंग्रेज़ी के माध्यम से उत्पन्न हुए हमारे योगदान से खुश हैं जो कि भारत की विशालता और संभावनाओं के आगे नगण्य है. हमारे निकट भविष्य के लक्ष्य, सुदूर भविष्य के लक्ष्यों पर हावी हो गए हैं. यदि अंग्रेज़ी सीखने से किसी को गोल्डमेन साक्स में नौकरी मिल जाती है, वो क्यों कोशिश करेगा भारत में वैसी कंपनी बनाने की! 2003 में फ़िनलैंड के वैज्ञानिकों ने अकादमिया में बढ़ते अंग्रेज़ी के प्रयोग के प्रति चेताया था कि यदि विज्ञान से फिन भाषा को हटाया गया तो प्रकृति की बारीकियों को पहचानने के मामले में धीरे-धीरे उनकी भाषा पंगु हो जाएगी. स्पष्ट है कि हिंदी में वो असर अभी से नज़र आने लगे हैं. किसी भाषा का हाल संस्कृत और लैटिन जैसा होने में समय नहीं लगता. लगभग सामान परेशानियाँ जापान और स्पेन के वैज्ञानिकों ने भी जताईं हैं.

हिंदी के तथाकथित कर्णधार हिंदी का प्रचार-प्रसार करने और अहिंदी प्रदेशों में उसे थोपने में जुटे हैं. हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश हो रही है. और हिंदी के बचे खुचे वक्ता और लेखक हिंदी की जड़ों को, उसके कारकों को भूलकर, राष्ट्रभाषा होने के दंभ में भरे अन्य भारतीय भाषाओँ को सीखने से इनकार कर चुके. हिंदी का क्रमिक विकास रुक चुका. दक्षिण भारतीय सरकारी विभागों में CCTV स्क्रीन्स पर हिंदी शब्द और उनके अंग्रेज़ी अर्थ दिखाए जाते हैं और कई कर्मचारी उन्हें सीखने का प्रयास करते नज़र आते हैं. हिंदी प्रदेशों में अन्य भाषाओँ के शब्द नहीं दिखाए जाते. ये कहना भर भी हिंदी भाषियों को अटपटा सा लगेगा. जब परा-सिन्धु प्रान्तों को एकीकृत करने निकली भाषा की दूसरी संस्कृतियों को आत्मसात करने की क्षमता विन्ध्याचल पार करते करते दम तोड़ दे तो उसका राष्ट्र-भाषा बनना तो लाज़मी नहीं. बजाय दक्खिन को शामिल करने के, हमारा झुकाव रोमन और लैटिन से उद्भूत भाषाओँ की ओर है जो फाइलो-लिंग्विस्टिकली हमसे कोसों दूर है. उन तत्वों को शामिल करना प्रगतिशीलता के खिलाफ़ नहीं है पर गड्ड-मड्ड प्राथमिकताओं का नतीज़ा अवश्य है.

ट्रांस-इंडियन भाषा के नारे लगाने की बजाय बेहतर होगा कि हम लोग विज्ञान और अर्थशास्त्र जैसे विषय, जो वैश्विक प्रगति में एक देश की भूमिका और महत्ता को निर्धारित करते हैं, अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं. अंग्रेज़ी को देश के विद्यालयों में पढाए जाते हुए 180 साल हो गए हैं. हमें यह भूलना होगा कि भारत के हर कोने में लोगों को अंग्रेज़ी या हिंदी सिखाई जा सकती है. हिंदी, बंगाली, पंजाबी, मराठी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, उड़िया, गुजराती इत्यादि भाषाएँ उनके विशाल भाषिक आधार से ऊपर किसी वैश्विक मंच की मोहताज़ नहीं है. इतने सारे पाठकों की जरूरतों को दुस्साध्यकहकर दुत्कार देने की बजाय हमें उन जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए. प्रयोग के तौर पर विश्व के प्रमुख वैज्ञानिक शोध पत्रों (जिनमें से अधिकतर ओपन सोर्स हैं) का अनुवाद करके ग्रामीण स्तर तक मुहैया कराना होगा. भारतीय भाषाओँ में इस प्रयोग की पहली हकदार हिंदी होगी (2001 की जनगणना के मुताबिक 41 प्रतिशत भारतीय हिंदी समूह को मातृभाषा मानते हैं और कुल 53 प्रतिशत हिंदी को जानते समझते हैं). तत्पश्चात, अन्य भाषाएँ सीधे अंग्रेज़ी से हिंदी वाले प्रयोग की समझ काम में लेते हुए या हिंदी अनुवाद से पुनः अनुवाद कर लाभान्वित हो सकतीं हैं.

तो हिंदी को दो लम्बी दूरी की दौड़ें तुरंत शुरू करने की आवश्यकता है: विश्व भर के वैज्ञानिक शोध को यथावत हिंदी में अनूदित करना और अन्य भारतीय भाषाओँ से ऐसी शब्दावली और संरचनाएं सोखना जो हिंदी में काम लीं जा सकतीं हैं.

इस प्रकार का प्रयोग सिर्फ़ प्रयोग के लिए नहीं होगा. यदि हम इतनी जानकारी लोगों को उपलब्ध करवाते हैं,

१. भारतीय पुरातन विज्ञान के बारे में फैले झूठ को सत्यों से अलग करने में जनता की भागीदारी होगी, बशर्ते अनुवाद पूर्णतया खुले मंच पर उपलब्ध हो
२. हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ के लिए तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली तैयार होगी, बशर्ते उस शब्दावली को हम संस्कृत-करण से बचा पाएं
३. हिंदी और अन्य भाषाओँ के बीच खड़ी दीवारें कमज़ोर होंगी क्योंकि इस समय इनमें से कोई भी विज्ञान के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है.
४. लोगों को उनकी अपनी भाषा में कुछ नया करने का मौक़ा मिलेगा और घरेलू इनोवेशन होने की संभावना बढ़ेगी.
५. भारत की मुख्यधारा के डिस्कोर्स में अंग्रेज़ी न जानने वाले लोगों की आवाज़ मज़बूत होगी. वर्तमान में देशज भाषाओँ को निम्न मानकर दरकिनार किया जाता है, यह सभी को विदित है.

समस्या यह है कि ये सब हवाई किले हैं. बड़ी संख्या में अलग-अलग विषयों से नौज़वान विद्वानों को व्यक्तिगत स्तर पर अनुवाद करना शुरू करना होगा. हिंदी में वैज्ञानिक डिस्कोर्स को जगह देनी होगी. हम यह मानकर विज्ञान को दरकिनार नहीं कर सकते हैं कि हम एक ग़रीब देश हैं. हमारी समस्याओं को सुलझाने के लिए बाहर से कोई नहीं आने वाला है. हो सकता है कि ये बीड़ा उठाने को पर्याप्त लोग न हों पर उस अक्रियता का अंजाम हमें ही भुगतना होगा.
______________

आशीष बिहानी 
जन्म: ११ सितम्बर १९९२बीकानेर (राजस्थान)
पद: जीव विज्ञान शोधार्थीकोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र (CCMB), हैदराबाद
कविता संग्रह: "अन्धकार के धागे" 2015 में हिन्दयुग्म प्रकाशन द्वारा प्रकाशित

ईमेल: ashishbihani1992@gmailcom

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