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सहजि सहजि गुन रमैं : नरेंद्र पुण्डरीक

Posted by arun dev on दिसंबर 02, 2016
पेंटिग : लाल रत्नाकर


नरेंद्र पुण्डरीक की इन कविताओं  में गाँव घर है. माँ, पिता, भाई, बेटी, पत्नी और स्त्रियाँ हैं.
कविताएँ कथ्य से बहुत मजबूत हैं.
अनुभव पर विचारों का सेंसर एक सीमा तक ही है.  
जो सच्चाई है वह बयां है.  
हमारे परिवारों में खुद छुपी हुई हिंसा है जिसका शिकार स्त्रियाँ होती हैं. कवि के शब्दों में -

‘हर आदमी की आंख में
एक सूअर का बाल होता है
जो औरत के दिल में अक्सर गड़ता रहता है.’

नरेंद्र पुण्डरीक अपनी इन कविताओं से सीधे चोट करते हैं. 
उनकी पांच कवितायें आपके लिए.

नरेंद्र पुण्डरीक की कविताएँ                                                    




पुल बनी थी माँ


हम भाइयों के बीच
पुल बनी थी माँ
जिसमें आये दिन
दौड़ती रहती थी बेधड़क
बिना किसी हरी लाल बत्ती के
हम लोगों की छुक छुक छक छक

पिता के बाद
हम भाइयों के बीच
पुल बनी माँ
अचानक नहीं टूटी
धीरे धीरे टूटती रही
हम देखते रहे और
मानते रहे कि
बुढ़ा रही है माँ ,

माँ के बार बार कहने को
हम मान कर चलते रहे
उसके बूढे़ होनें की आदत और
अपनी हर आवाज में
धीरे धीरे टूटती रही माँ ,

हाथेां हाथ रहती माँ
एक दिन हमारे कंधों में आ गई
धीरे धीरे महसूंस करनें लगे हम
अपने वृषभ कंधों में
माँ का भारी होना,

जब तक जीवित रही माँ
हम बदलते रहे अपने कंधें
माँ आखिर माँ ही तो है
बार बार हमें कंधे बदलते देख
हमारे कंधों से उतर गई माँ
और माँ के कंधों से उतरते ही
उतर गये हमारे कंधे.



बेसूरत होती औरतें

पत्नी से एक दिन पूछा  कैसी रही अब तक की ?

उसने कहा
निभा लिया मैनें
दूसरी होती तो पता चलता

मैनें कहा दूसरी होती तो
तुम जैसी तो नहीं ही होती
नहीं होती तो भी निभ जाती
उससे भी जैसे तुमसे निभ गयी,

औरतों से निभना उसके  आदमी से अच्छा कौन जानता है
आदमी निभता है
और औरत निभाती है
निभने निभानें के इस बारीक अन्तर को जब तक औरत समझे
समझे तब तक उसकी दुनियां ही निपट जाती है,

ज्यादातर औरतें  आदमी की लंपटई को
उसके हाल में छोड़
अपने को बचती बचाती हुयी
लड़के लड़कियों से होती हुई
नाती पोतों से लग जाती हैं ,

वे अच्छी तरह जानती हैं कि
हर आदमी की आंख में
एक सूअर का बाल होता है
जो औरत के दिल में अक्सर गड़ता रहता है
कोई भी औरत उसको उसकी आंख से निकाल नहीं पाती,

जब भी निकालनें के  लिए  उसकी आंखों में देखती है
तो उसे उसमें अपनी सूरत दिखाई देती है
और
हमेशा वह अपनी ही सूरत के झांसें में आ जाती है ,

अपनी सूरत के झांसें में
आती हुई यह औरतें
उसकी आंखों में कब बेसूरत हो जायेंगी समझ नहीं पातीं.



चलने वाले पांवों में

चलनें वाले पांवों में ही  फटती हैं बिवांइयां
चलनें वालें पांवों में ही  लिपटती है चंदनवर्णी धूल
चलनें वाले पांवों में ही लद कर आते हैं शब्द,

अक्सर चलनें वाले पांवों को देखकर
मुझे अपने पिता के पांव याद आते हैं
जिनकी बिवांइयों में पिता
बसंत के दिनों में
पिलाते थे रेड़ का तेल ,

पिता के पांवों केा देखकर
याद आये थे मुझे त्रिलोचन के पांव
जो पिता की तरह चलते थे तेज तेज
सागर की सड़कों में चलते हुये उनके साथ
मुझे पिता के पांव याद आ रहे थे ,

अब जब मैं चलनें वाले पांवों की चर्चा कर रहा  हूँ.
तों मुझे बमियान में खडे़ बुध्द के
उन पांवों की याद आ रही है
जिनमें अभी कुछ दिन पहले ही
तालिबानियों ने लगाई थी आग
क्योंकि उन्हें निश्चित हो गया था कि
इन्हीं पांवों में चल कर आये थे वे शब्द
जो हजारों साल बाद भी
उनकी नींद को हलाकान करते हैं ,

हालाकि शब्दों से तालिबानियों को
कोई खास परिचय नहीं रहा है
जो अब भी नहीं है लेकिन
यह अंदाजा उनको हैं कि
पैरों की एक भाषा होती है
जो छटा में बेजोड़ और
अनुभव के शीरे में इतनी सीझी होती है कि
जहाँ जाती है उसके
अपने होनें का विश्वास होता है ,

चलते हुये पांव हर
घेरे को तोड़ते और रचते हुये
चलते हैं अपनी इबारत
जिस पर सृष्टि अपना पहिया रखती है.
 


साबका

सबसे पहले मेरा साबका
उन स्त्रियों से पड़ा
जो हवा-धूप के
होते हुये भी
अपने अंधेंरे और सड़न में खुश थी ,

जिनके पति साल के तीन सौ पैसंठ दिन
देवता बने रहते थे
इन्हीं स्त्रियों में मेरी माँ थी
जो हमसे अधिक
शालिग्राम की बटिया के
भोजन और पहनावे के लिए
चिन्तित रहती थी ,

इसके बाद मेरा साथ
उन स्त्रियों से रहा
जो दिन भर चरेर धूप में
रहते हुये भी अपने दुखों को
तनिक भी नहीं काट पा रही थीं ,

हवा-धूप -पानी के
स्वाद के साथ
चढ़ी धोतियों और पानी से उपजा इनका सौन्दर्य
अब भी कहीं
मेरे भीतर सुरक्षित है,

चालीस साल बाद भी जिसे
नहीं व्यक्त कर पाये शब्द
बिंब नहीं उठा पाये
जिसका बोझ
प्रतीक नहीं ठहर पाये
जरा भी जिसके सामने
कुछ भी कहे मर्मज्ञ

मैं इसे कविता में
रख रहा हूँ जस का तस.


बिटिया को देख कर

शादी के बाद पहली बार
घर आयी बिटिया को देखकर
मैं भांप लेना चाहता था कि
जिस घर में बिटिया गई है
घर का आंगन इतना तो है न कि
वह अपने गीले बालों को धूप दिखा सके ,

मै जान लेना चाहता था कि
घर की दीवारे इतनी
उंची तो नहीं हैं कि
चार पाई खिसका कर दरवाजों की
सिंटकनी न खोली जा सके,

और खिडकियों के परदे इतने
भारी तो नहीं हैं कि
बाहर की हवा भीतर न आ सके
किसी के माँ बाप हमेशा तो नहीं रहते
किसी के याद दिलानें पर ही न
उसे याद आयेंगें हम ,
और मेरे बाद
मेरा नाम लेते हुये
नहीं आयेगी अपने भाई के घर ,

न चाह कर भी
मैं यहां यह सब लिख रहा हूँ
क्योंकि बेटी का सुख सीधे
पिता तक पहुंचता है.

 ___________________________


नरेन्द्र पुण्डरीक
(15 जनवरी, 1958) 
कविता संग्रह : नगे पांव का रास्ता, सातों आकाशों की लाडली, इन्हें देखने दो इतनी ही दुनिया,इस पृथ्वी की विराटता में 

सचिव : केदार शोध पीठ न्यास, (बाँदा) 
मो. 8948647444
pundriknarendr549k@gmail.com 

मंगलाचार : दिव्या विजय (कहानी)

Posted by arun dev on नवंबर 29, 2016
























(Photo: Courtesy  Woody Gooch)

बायोटेक्नोलॉजी से स्नातक, सेल्स एंड मार्केटिंग   में   एम.बी.ए.
बैंकाक में आठ  साल रहीं फिर लौट कर ड्रामेटिक्स से स्नातकोत्तर और नाटकों में अभिनय और लेखन आदि. यह दिव्या विजय हैं. और यह है इनकी कहानी.

दिव्या विजय की इस कहानी में वो सारे तत्व मौजूद हैं जो उनके अंदर के कथाकार के भविष्य को लेकर आशान्वित करते हैं.
भाषा पर उनकी पकड़ है और स्फीति से वह बचती हैं,  प्रारम्भिक कहानियों में जिन्हें साध पाना मुश्किल ही होता है.


उनका स्वागत और आप जरुर बताएं कि इस कहानी में आपको क्या अच्छा लगा.


बनफ़्शई ख़्वाब                                                      
दिव्या विजय 



घंटी बजी और उसने चौंक कर घड़ी की ओर देखा. सात बज गए... इतनी जल्दी! वो मन ही मन पलों का हिसाब करने लगी. उसे पता था ठीक पंद्रह सेकंड बाद फिर डोर बेल बजेगी. तब तक दूध वाला लगभग बीस क़दम चलकर बाक़ी दो घरों में दूध के पैकेट पकड़ा देगा. यही पंद्रह सेकंड उसके पास तय करने को थे कि उसे उठना है या नहीं. उसे उठ जाना चाहिए...उसने कोशिश की मगर नहीं उठ पायी. घंटी चीख़ती रही....इतनी तेज़ कि दीवारें उस चीख़ से अट गयीं. दीवार से फिसलते हुए उसकी नज़र ज़मीन तक गयी...फ़र्श भीगा है. फ़र्श पर क्या गिरा है...कहीं कल रात फिर...? अब सब पोंछना होगा. बिखरा हुआ समेटना क्यूँ पड़ता है? नहीं, वो कुछ नहीं करेगी.


पेड़ की हिलती हुई शाख़ पर उसकी निगाह अटक गयी. पत्तों की ओट से छन आ रही धूप की किरचियाँ उसे ज़ुबान पर चुभती महसूस हुईं. उसे गर्म थूक को उगलने की शदीद इच्छा हुई पर उसने उसे निगल लिया. कल चौथी रात थी जब उसकी आँखों ने झपकने से इंकार कर दिया था. शुरू में उसे घबराहट हुई पर अब वो अभ्यस्त हो चली है. ज़्यादा थकान होने पर अब वो आँखें खोल कर भी सो सकती है. यह आँखें बंद कर सोने से ज़्यादा आसान है. उसने नज़रें बाहर जमा दीं. 


पेड़ की शाख़ पर कूदती गिलहरी के पंजों की बुनावट देख उसका मन भीग आया. कितना कस कर तने को पकडे है...एक बार भी नहीं गिरती. फ़ोन फिर बजा..इस बार माँ का. कल बमुश्किल दो-चार शब्दों की बात हुई थी. बोलना बाज़ दफ़ा कितना मुश्किल हो जाता है. पर उसे बोलना पड़ा क्योंकि नहीं बोलती तो माँ यहाँ आ जाती. वो नहीं चाहती यहाँ कोई भी आए. किसी की भी उपस्थिति से उसका मन घबरा जाता है. किसी से बात करना बड़ा भारी मालूम होता है. इस सोफ़े से हिलना उसे नामुमकिन लगने लगा है. उसका सारा वक़्त यहीं बीत रहा है. आस-पास पैकेज्ड फ़ूड की पन्नियों का ढेर इकट्ठा है और पानी की ख़ाली बोतलें बिखरी हैं. परसों मेड को फ़ोन कर उसने हफ़्ते भर की छुट्टी दी है. ज़िंदा इंसान को देखना उस से बर्दाश्त नहीं हो पा रहा....इस से ख़ुद की मुर्दनगी का अहसास और बढ़ जाता है.

उसने अपने हाथों को देखा. मैल की परतें गोरे रंग के बीच से झाँक रही हैं. वो कई दिनों से नहायी नहीं...कितने दिनों से...शायद वही आख़िरी दिन था. हाँ वही था...पहने हुए कपड़ों को देख उसने सोचा. बनफ़्शई ड्रेस उसी रोज़ पहनी थी. उसकी बाँहें मटमैली हो चली हैं. सिलवटों से भरी ड्रेस उसे चुभने लगी. क्या उसे कपड़े बदलने चाहिए? उसने भीतर झाँक कर देखा. अंदर इनर था. उसने ड्रेस झटके से उतार कर फेंक दी. उसे राहत महसूस हुई. क्या उस रोज़ उसे पता था कि यह होने वाला है? शायद नहीं या हाँ...वो पहली बार उस से मिली थी उसी रोज़ से उसे मालूम था कि यह होने वाला है. 


उसके दोस्त कहते हैं..."शी इज़ सो गुड ऐट आयडेंटिफ़ायइंग पीपल."
'
ओह येस शी इज़! एंड शी इज़ डम्ब इनफ़ टू फ़ॉल फ़ॉर सेम पीपल हूम हर हार्ट रेजेक्ट्स.

हार्ट...आह!ये दिल! दिल की धड़कन अचानक बढ़ गयी तो उसने सोफ़े को बाहें फैला कस कर सीने से लगा लिया. सोफ़े ने उसका दिल थाम लिया. सोफ़े का सफ़ेद रंग उसके भीतर उतरने लगा...ठंडक पिघलते हुए उसके दिल पर गिरने लगी...बूँद-बूँद. ड्राई आइस....अपनी ठंडक से जला देने वाली बर्फ़. 


उसे बहुत जोर की चीं-चीं सुनायी दी. नीले काकातुआ का जोड़ा झगड़ रहा है. वो सोफ़े से उतरने की कोशिश में नीचे गिर गयी. ख़ुद के इस तरह गिरने पर उसकी हँसी छूट गयी. वो अकेले ही हँसने लगी....हँसते-हँसते उसे रोना आने लगा. उसने घड़ी देखी..साढ़े सात हो रहे हैं. उसे लगा कि आज का दिन फिर इस तरह शुरू नहीं करना चाहिए. वो किसी तरह घिसटते हुए रिमोट तक पहुँची और टीवी चालू कर दिया. 


फ़ुटबॉल मैच आ रहा है. वो खिलाड़ियों को पहचानने की कोशिश करने लगी पर उसे ठीक से कुछ दिखायी नहीं दिया. फ़ुटबॉल की जगह एक सफ़ेद धब्बा उसे उछलता हुआ दिखायी दे रहा था. वो उसी धब्बे के पीछे भागने लगी. धब्बा एक झील में जा गिरा. उसने झील में जाने के लिए क़दम बढ़ाया मगर तुरंत पीछे ले लिया. उसने अपने बूट्स उतारे और झील में पैर डुबो दिए. ठंडा पानी पहली बार में नश्तर की तरह चुभा. उसके तलवे सिकुड़ने लगे लेकिन उसे ख़याल आया कि वो आने वाला है. उसकी देह गर्माहट से भर गयी. उसने हाथ में पकड़े तोहफ़े नीचे घास पर रख दिए. उसका जन्मदिन है...वो आने वाला है. उसने कहा था वो आएगा. उसने कहा था आज सारा दिन वो उसके साथ बिताएगा. वह जल्दी तो नहीं पहुँच गयी. उसने इधर उधर देखा. यह जगह भी उसी ने चुनी है....उसकी पसंद कितनी अच्छी है.

झील के चारों ओर हल्की हरी चादर बिछी है और झील का पानी हल्का नीला. उसने अपनी ड्रेस ज़रा ऊपर की...जाने कब खिसक कर पानी को छूने लगी थी. हल्का गीला हिस्सा घुटनों पर ठहर गया. गोरे रंग पर बनफ़्शई झालर का कंट्रास्ट.....एक पुरानी बात याद आयी जब उसके रंग पर इस से भी गहरा एक रंग ठहरा था...उसके होंठ ताम्बई जो थे. झील के पानी में गुलाल घुल गया. गुलाबी रंग से उसने अपनी अँगुलियाँ भिगोयीं और घास पर कुछ बूँदें छितरा दीं. वहाँ गुलाबी फूल उग आए....फूलों को लड़ी में पिरो उसने माला बनायी...कुंडल बना कर पहन लिए...वो वनकन्या दिखने लगी. उसे जंगल-जंगल फिरना होगा...तब क्या उसका महबूब आएगा? उसने ज़ोर से आवाज़ लगायी....आ जाओSSS.....


आवाज़ चिड़िया बन गयी...उसने चिड़िया को अपनी पुकार थमा दी और उड़ा दिया. अब वो आता ही होगा. सूरज के बीचों बीच एक धारी उग आई और वो उसे निगलने लगी....पानी जमने लगा. उसके पैर बर्फ़ हो गए तो वो महबूब के गले कैसे लगेगी? उसने अपने पैर झील से निकाले और घास पर बिछा दिए. एक कनखजूरा जाने कहाँ से उसके पैरों पर आ लिपटा. उसे डर नहीं लगा...उसे कहानियाँ याद आयीं जब प्रेम की परीक्षा लेने कोई और रूप धर ख़ुदा चला आया. वो ग़ौर से उसे देखती रही....अनगिनत पैर....उसके इतने पैर होते तो वो बग़ैर थके मीलों भागते हुए अपने महबूब को यहाँ लिवा लाती. कनखजूरा उसके पैरों पर से होता हुआ कहीं खो गया.

वो अब फिर अकेली थी. धब्बा बड़ा हो रहा था और फ़ुटबॉल एक खिलाड़ी के पास थी. अब शायद गोल होगा. काकातुआ फिर चिचियाने लगे. उनका पानी ख़त्म हो गया था. उसने उनके लिए पानी भरा और उन्हें बाहर रख दिया. उन्हें बाहर रहना अच्छा लगता है...खुले आसमान के नीचे. तय समय बाहर न निकालो तो शोर मचा देते हैं. उन्हें सीधी धूप नहीं सुहाती इसलिए कभी उनके ऊपर छतरी तान देती है कभी ख़ुद कुर्सी पर बैठ उनकी छाँव बन जाती है. 


वो भीतर जाने को पलटी तो उसके कानों में साँप रेंगने लगे....उसने लकड़ी के दरवाज़े पर अपने कान टिका दिए. आवाज़ें थीं...पुकारें थीं...भीड़ का शोर था....जयकारे थे...ज़रूर कोई शहंशाह युद्ध जीत कर आ रहा था. यह वही हो सकता है...बस वही. उसे झील के पार जाना होगा. झील को बर्फ़ हो जाना होगा...बर्फ़ जिस पर दौड़ते हुए वो उस पार जा सकेगी. उसने अपने दिल की आह झील पर रख दी. वो भागती गयी...अब किसी भी पल वो दिखायी देगा...घने जंगल के अँधियारे चीरते हुए उसकी आँखें मशाल बन गयीं. वो हर साये को सहलाती गयी. जो साया उसे जकड़ लेगा वही उसका महबूब होगा.

साये ख़त्म हो गए...दिल डूब रहा था. सामने पहाड़ था...पहाड़ के ऊपर...वहाँ कुछ है. उसने नंगे पैरों को देखा...वो उसे मिलेगा... वो फिर दौड़ चली. वो आया क्यों नहीं...उसे कुछ हुआ तो नहीं. उसने कहा था...उसने जगह चुनी थी...उसने बनफ़्शई रंग कहा था...उसने कहा था वह उसे चाहता है. उसने वादा किया था वो उसके सामने फिर जन्म लेगा. वो रुकी..उसने अपने पेट पर पत्थर बाँध लिए. अब वो उसे जन्म देगी...वो बढ़ चली. 


वो पहाड़ की चोटी पर थी. वहाँ तेज़ हवा थी...वो दो इंच ऊपर उठ कर तैरने लगी. वहाँ कंकाल थे...उसने हाथ बढ़ाया...उन्होंने हाथ थाम लिया. क्या वो उसे पंख देंगे? उसे और आगे जाना है. वो बिना पंखों के आगे बढ़ चली है...पर वो तो  नीचे जा रही है. उसे किसी ने धकिया दिया है. किसने? गोल हो गया था. 


खिलाड़ी ख़ुशी से चीख़ रहे थे. काकातुआ की चहचहाहट थम गयी थी. वो तंद्रा से जागी...एक बिल्ली पंजा भीतर घुसा उनकी गर्दन मरोड़ चुकी थी. 
____________

दिव्या विजय :
(२० नवम्बर १९८४, अलवर, राजस्थान)

ई मेल-  divya_vijay2011@yahoo.com

फिदेल कास्त्रो : पाब्लो नेरुदा

Posted by arun dev on नवंबर 27, 2016





















(A photo of Fidel Castro in New York in 1959 taken by Roberto Salas)
फिदेल कास्त्रो (जन्म: 13 अगस्त 1926 - मृत्यु: 25 नवंबर 2016) :
___________

बीसवीं शताब्दी के महान क्रांतिकारी नेताओं में अग्रगण्य फिदेल के लगातार घंटो तक जोशीले भाषण देने की कला के कारण उनके मित्र उन्हें, ‘द जाइंट’ नाम से पुकारते थे.
फिदेल ने छोटे से द्वीप क्यूबा को अपने समय के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य अमेरिका के सामने स्वाभिमान और खुदमुख्तारी से खड़ा होना सिखाया.
फिदेल शायद अंतिम राजनेता थे जिनकी अपने समय के महान साहित्यकारों से घनिष्ठता थी.
मार्केज़ तो उनके निकटतम मित्र थे.
इसके अलावा हेमिंग्वे, पाब्लो नेरुदा आदि भी उनके मित्रों में शामिल थे.

पाब्लो नेरुदा की पुस्तक कन्फैसो क्यू बे विविदोः मैमोरियाज  के स्पानी से अंग्रेजी अनुवाद मैमोयर्स (अनुवादक- हार्दिए सेंट मार्टिन) से  हिंदी में यह अनुवाद कर्ण सिंह चौहान ने किया है. जो ग्रन्थ शिल्पी से प्रकाशित “मेरा जीवनः मेरा समय" में संकलित है.

फिदेल को याद करते हुए. समालोचन की यह प्रस्तुति.

फिदेल कास्त्रो                                                    
पाब्लो




पनी जीत के बाद हवाना में प्रवेश के दो हफ्ते बाद फिदेल कास्त्रो कराकस में थोड़ी देर के लिए आए. वह वहां वेनेजुएला की सरकार और जनता को मदद के लिए धन्यवाद देने आए थे. इस मदद में उनकी सेनाओं को दिए हथियार भी थे जो वर्तमान राष्ट्रपति द्वारा नहीं उनके पहले के राष्ट्रपति लर्जाबल द्वारा दिए गए थे. लर्जाबल वेनेजुएला के वामपंथियों (साम्यवादियों समेत) के मित्र रहे और उन्होंने जब जरूरत पड़ी तो क्यूबा के साथ अपनी एकजुटता दर्शाई.
वेनेजुएला की जनता ने क्यूबा क्रांति के युवा नेता कास्त्रो को जैसा राजनीतिक स्वागत-सम्मान दिया वैसा कम ही देखने को मिलता है. फिदेल ने कराकस के विशाल एल सिलेंसियो मैदान पर बिना रुके चार घंटे तक भाषण दिया. मैं भी उस दो लाख की भीड़ में खड़ा होकर वह लंबा भाषण सुनने वालों में से एक था. मेरे लिए और बाकी तमाम के लिए फिदेल का भाषण एक तरह का रहस्योद्घाटन था. उन्हें इतने लोगों के सामने भाषण देते सुन मुझे लगा कि लातीन अमेरिका में एक नए युग की शुरूआत हुई है. मुझे उनकी भाषा की ताजगी बहुत अच्छी लगी.
आम तौर पर मजदूर वर्ग के अच्छे से अच्छे नेता और राजनेता उन्हीं घिसी-पिटी बातों को दोहराते रहते हैं. इन बातों का अर्थ भले ही महत्वपूर्ण हो लेकिन उनके शब्द बार-बार के दुहराव से भोंथरे हो जाते हैं. फिदेल ने इस तरह की जुमलेबाजी नहीं की. उनकी भाषा आगमनात्मक और प्राकृतिक थी. ऐसा लगता था कि बोलते और पढ़ाते वक्त वह स्वयं भी उससे सीख रहे थे.
हेमिग्वे के साथ फिदेल
(A photo of Ernest Hemingway and Fidel Castro in Cuba in 
1960 taken by Roberto Salas)

वेनेजुएला के वर्तमान राष्ट्रपति बेटनकोर्ट वहां नहीं थे. उसे कराकास की जनता का सामना करना बिल्कुल पसंद नहीं था क्योंकि लोग उसे पसंद नहीं करते थे. जब फिदेल ने अपने भाषण में उसके नाम का उल्लेख किया तो लोगों की सीटियां और आवाजें आने लगीं, जिन्हें फिदेल ने हाथ के इशारे से शांत किया. मुझे लगा उसी दिन से बेटनकोर्ट और क्यूबा के इस क्रांतिकारी के बीच वैमनस्य पैदा हो गया. उस समय तक न तो फिदेल मार्क्सवादी थे न कम्युनिस्ट और न ही उनके भाषण का उनके सिद्धांतों से कुछ लेना-देना था. मेरी निजी राय है कि उस भाषण में फिदेल की तेजस्विता और बुद्धिमत्ता, जनता के मन में जोश पैदा करने की क्षमता, कराकास के लोगों द्वारा उस भाषण को हृदयंगम कर लेने की तीव्र इच्छा ने बेटनकोर्ट को परेशान किया होगा. बेटनकोर्ट लफ्फाजी, कमेटियों और गुप्त सभाओं की पुरानी परिपाटी वाला राजनेता था. उसके बाद से बेटनकोर्ट ने हर उस चीज को बेरहमी से कुचलना शुरू किया जिसका संबंध क्यूबा की क्रांति से हो.
सभा के अगले दिन मैं देहात में रविवार की पिकनिक पर था कि कुछ मोटरसाइकल सवारों ने हमें क्यूबा के दूतावास का निमंत्रण-पत्र दिया. वे सारा दिन मुझे ढूंढ रहे थे कि मैं कहां मिल सकता हूं. यह समारोह उसी शाम को था. मटील्डे और मैं वहां से सीधे दूतावास गए . बुलाए गए अतिथियों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि वे हाल और बगीचे में नहीं समा रहे थे. दूतावास के बाहर भी लोगों की भारी भीड़ थी और दूतावास को जाने वाली सड़कों से भवन तक जाना मुश्किल था .
हम किसी तरह लोगों से भरे कमरों को पार करते हुए वहां पहुंचे जहां कुछ लोग हाथों में जाम उठाए हुए थे. फिदेल की सबसे करीबी और उनकी सचिव सीलिया घर के एक खाली हिस्से में हमारा इंतजार कर रही थी. मटील्डे उसके साथ रही और मुझे दूसरे कमरे में ले जाया गया. वह शायद नौकर का या माली का या ड्राइवर का कमरा था. उसमें एक बिस्तर लगा था जिसे जल्दी में खाली किया गया था और उसके कपड़े तितर-बितर थे. तकिया फर्श पर था और कोने में एक मेज थी. बस. मैंने सोचा कि वहां से मुझे किसी एकांत कमरे में ले जाया जायगा जहां मैं क्रांति के सेनापति से मिलूंगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अचानक कमरे का दरवाजा खुला और फिदेल कास्त्रो के भव्य व्यक्तित्व से कमरा भर गया.
वह मुझसे बहुत ऊंचे थे. वह मेरी तरफ तेज कदम बढ़ाते हुए आए.
हैलो पाब्लोकहकर उन्होंने मुझे बाहों में भर लिया.
उनकी पतली लगभग बच्चों जैसी आवाज सुनकर मैं तो दंग रह गया. उनके व्यक्तित्व में कुछ था जो इस आवाज के अनुकूल था. फिदेल बहुत बड़े आदमी होने का अहसास नहीं कराते. उन्हें देख ऐसा लगता है जैसे कोई बच्चा टांगों के अचानक बढ़ जाने पर लंबा हो गया जबकि उसका चेहरा और कोमल दाढ़ी अभी बच्चे की ही है.

(मार्केज़ के साथ फिदेल)
अचानक गले लगने की क्रिया को छोड़ वे सक्रिय हुए और मुड़कर कमरे के कोने की तरफ चले गए. मैंने ध्यान नहीं दिया कि एक कैमरामैन चुपके से कमरे में दाखिल हो गया था और हमारा फोटो लेने की तैयारी कर रहा था. तभी बड़ी फुर्ती से फिदेल उस तक पहुंचे और उसे गले से पकड़कर लगभग अधर में उठा दिया. कैमरा फर्श पर गिर गया. मैं फिदेल के पास गया और उनकी बांह को पकड़कर उस मरियल से फोटोग्राफर को उनसे छुड़ाने की कोशिश की. लेकिन फिदेल ने उसे दरवाजे के बाहर फेंक दिया. फिर वह मेरी तरफ मुड़े, फर्श से कैमरा उठाया और उसे बिस्तर पर फेंक दिया.
हमने उस घटना पर कोई बात नहीं की केवल लेटिन अमेरिका के लिए एक प्रैस एजेंसी की संभावना पर बात की. मुझे याद पड़ता है कि प्रेन्सा लातीना एजेंसी उसी बातचीत का नतीजा थी. उसके बाद हम वापस समारोह में चले गए, दोनों अपने-अपने दरवाजों से होकर.
जब एक घंटे बाद मटील्डे के साथ मैं दूतावास के समारोह से वापस जा रहा था तो उस फोटोग्राफर का भयभीत चेहरा और गुरिल्ला नेता की फुर्ती जिसने अपनी पीठ के पीछे से घुसने वाले को महसूस कर लिया, याद आए.
वह फिदेल कास्त्रो से मेरी पहली मुलाकात थी. उसने फोटोग्राफ लेने देने का इतना विरोध क्यों किया ! क्या इसमें कोई राजनैतिक रहस्य छिपा था!  आज तक मैं यह नहीं समझ पाया हूं कि हमारा यह साक्षात्कार इतना गुप्त क्यों रखा गया.


(इंदिरा गाँधी के साथ)
लातीन अमेरिका को आशाशब्द बहुत प्रिय है. हमें स्वयं को आशाका महाद्वीप कहलाना पसंद है. संसद, राष्ट्रपति और अन्य प्रतिनिधि स्वयं को आशा के प्रत्याशीकहलाना पसंद करते हैं. यह आशा स्वर्ग का वायदा है, एक ऐसा वायदा जो कभी पूरा नहीं होगा. वह अगले चुनावों तक, अगले साल तक, अगली सरदी तक टलता जाता है.
जब कयूबा की क्रांति हुई तो लाखों लातीन अमेरिकी नींद से जगे. उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. एक ऐसा महाद्वीप जिसने उम्मीद करना ही छोड़ दिया था, वह इस पर कैसे विश्वास करता. लेकिन यहां फिदेल कास्त्रो था जिसे कोई जानता भी नहीं था जिसने आशा को बालों से पकड़ लिया, पैरों पर खड़ा किया और कस कर पकड़ कर अपनी मेज पर बिठा लिया यानी लातीन अमेरिका के लोगों के घर में बिठा दिया.
तब से हम इस आशा को संभाव्य वास्तविकता मान उसे पाने के रास्ते पर चल पड़े हैं. लेकिन अभी भी हम डरे हुए हैं. एक पड़ोसी देश, जो बहुत ही शक्तिशाली और साम्राज्यवादी है क्यूबा को और आशा को खत्म करने पर तुला है. लातीन अमेरिका की जनता रोज अखबार पढ़ती है, रोज रात रेडियो से कान लगाए रहती है. और वे संतोष की सांस लेते हैं. क्यूबा अस्तित्वमान है. एक और दिन, एक और साल. और पांच साल. हमारी उम्मीद का सिर अभी कटा नहीं है. उसका सिर नहीं काटा जा सकता है .

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karansinghchauhan01@gmail.com

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