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परख : वह औरत नहीं महानद थी (कौशल किशोर) :रामकुमार कृषक

Posted by arun dev on दिसंबर 12, 2019










कवि, संस्कृतिकर्मी कौशल किशोर का कविता संग्रह ‘वह औरत नहीं महानद थी’ का प्रकाशन ‘बोधि’ ने किया है. इसकी समीक्षा लिखी है रामकुमार कृषक ने. 







जीवन संगीत की काव्यात्मक लय                    
रामकुमार कृषक



प्रगतिशीलता समकालीन कविता का केंद्रीय जीवन मूल्य है. सामाजिकता उसकी परिधि, और संप्रेषण उसकी कलाधर्मिता का निकष. कविता के इस गुण-धर्म को युगीन जीवन-जटिलताओं के नाम पर अनदेखा नहीं किया जा सकता. परिवर्तन की आकांक्षा और रूढ़िभंजन उसका सहज स्वभाव है. इस बात को हम किसी भी समय-सजग कवि के रचनात्मक विस्तार में देख सकते हैं. ठहराव वहां नहीं हुआ करता. वह अपने भावबोध के साथ जो यात्रा करता है, वह सिर्फ उसी की नहीं हुआ करती, बल्कि एक व्यापक समाज उसके साथ चलता है.

इस संदर्भ में सुपरिचित कवि, संपादक और संस्कृतिकर्मी कौशल किशोर के नए संग्रह ‘वह औरत नहीं महानदी थी’ की कविताएं देखी जा सकती हैं. स्त्री और महानद, यहां दोनों पर्यायवाची हैं. दोनों के गुण-धर्म तक जाएं तो समानार्थी भी. संवेदनात्मक तरलता और गतिशीलता से आप्लावित. लेकिन सिर्फ यही नहीं. स्त्री-जीवन के अनेक रूप इन कविताओं में हैं. उदाहरण के लिए एक कविता ‘आग और अन्न’- जैसे कोई पेंटिंग या गतिमान कोई दृश्य, जिसमें मौजूद रंग-बिम्ब अपने भावक से बातें करते हों. चूल्हा है जलता हुआ और उसके पास बैठी हुई स्त्री. दोनों के इस रिश्ते को आज भी नकारा नहीं जा सकता. और फिर उन दोनों से आग और अन्न का संबंध! कितना प्रगाढ़, कितना सार्थक और कितना रागात्मक. कुछ पंक्तियां लें -

कितना अद्भुत है यह प्रेम
कि जैसे-जैसे बढ़ती है आँच
वैसे-वैसे फैलती है
पके हुए अन्न की खुशबू
महमह कर उठता है घर.’

चाहें तो हम यहां नागार्जुन को याद कर सकते हैं, लेकिन ‘अकाल और उसके बाद’ जैसी स्थिति यहां नहीं है. न वैसा दुख, न उल्लास. भूख दोनों कविताओं में है और उससे उबरने की उम्मीद भी. यह उम्मीद आग में भी है, और उस स्त्री में भी जो दोनों का उपयोग करना जानती है. कवि ने इसे कुछ और बड़ा कैनवस दिया है -

अन्न का आग से
जब होता है ऐसा मिलन
सृजित होता है
जीवन का अजेय संगीत
भूख जैसा हिंस्र पशु भी
इसमें हो जाता है
नख दंत विहीन.’

स्त्री, श्रमशील स्त्री कौशल किशोर की काव्य-चेतना का अनिवार्य हिस्सा है. घर-गृहस्थी में है, खेत खलिहान में है, और सड़क-फुटपाथ पर भी है. कहीं भी देखा जा सकता है उसे. अभावग्रस्त घर को, घर-भर को लेकर उसकी कशमकश अद्भुत है. साक्ष्य के लिए निम्नलिखित कविता पंक्तियां-

यह औरत घर के लिए जितना ज्यादा परेशान होती है\
उतना ज्यादा डूबती है नदी में
विचारों में घर का खूबसूरत नक्शा बनाती है
और यथार्थ में पीछे की दीवार ढह जाती है
सोफे का खोल बदलने की बात सोचती है
और बैठकखाने की ज्यादा फट जाती है
साहब दिखें जींस में स्मार्ट
कि बच्चे हो जाते हैं नंगे
या फट जाती है उसकी अपनी ही साड़ी.’

हिंदी कविता में नारी जीवन की अनेक छवियां मिलती है, जिनमें से निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर’, नागार्जुन की ‘सिंदूर तिलकित भाल’, त्रिलोचन की ‘चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती’, आलोक धन्वा की ‘ब्रूनो की बेटियां’ और कात्यायनी की ‘हाकी खेलती लड़कियां’ को याद किया जा सकता है. हालांकि कौशल किशोर पुस्तक मेले से गुजरते या घूमते हुए प्रेमचंद या शरतचंद्र में खो जाती पत्नी को ही नहीं देखते, बल्कि इस्मत चुगताई, मन्नू भंडारी और मैत्रेयी पुष्पा को भी देखते हैं. साथ ही दर्द बांटती उस तस्लीमा को भी जो पूरी ताकत से इस सत्य को कहती हैं कि ‘औरतों के लिए कोई देश नहीं होता’. अनुत्तरित सवाल यह है कि घर और देश-दुनिया के बीच बंटे स्त्री-जीवन के इस यथार्थ को कैसे समझा जाए? इस सवाल को सीमा आजाद जैसी जुझारू महिला और शिक्षा संस्कृति के लिए गोली खाने वाली मलाला जैसी लड़कियों के संकल्प संघर्ष से समझा जा सकता है. कवि जैसे स्वयं उनके साथ है -

वह जुलूस में चल रही थी पीछे पीछे
नारे जब हवा में गूंजते
जुलूस के उठते थे हाथ
और उसके उठते थे सिर ऊध्र्वाधर दिशा में तने हुए
लहरा उठते बाल
मचलती आवारा लटें
हवा में तरंगित स्वर-लहरी
वह बखेर रही थी सौंदर्य
खुशबू ऐसी
जिसमें रोमांचित हो रहा था
उसका प्रतिरोध......’

स्पष्टतया यहां संग्रहित कविताओं का यह एक पक्ष है. कौशल किशोर लखनऊ में रहते है, बेशक किसी बाशिंदे की तरह नहीं, नागरिक की तरह. लखनऊ एक तहजीब है. एक इतिहास. एक जीवन-शैली. लिबास से लेकर बोली-बानी की मिठास तक. उसकी गलियों से गुजरते हुए कवि को गालिब याद आते हैं. मीर याद आते हैं. सरमायेदारी से पंजा लड़ाने वाले शायर मजाज याद आते हैं. और वह ‘रिफा-ए-आम क्लब’ जहां से मुंशी प्रेमचंद ने उस तरक्की पसंद तहरीक की शुरुआत की जिसे हम आज तारीख की तरह नहीं तवारीख की तरह याद करते हैं. आकस्मिक नहीं कि कवि भगवती बाबू की ‘चित्रलेखा’ और यशपाल के ‘विप्लव प्रेस’ को भी याद करता है क्योंकि लखनऊ उसके लिए एक
‘अकथ कथा है
जो शुरू होती है
पर खत्म नहीं होती.’

जाहिरा तौर पर,, खत्म न होने वाली इस कथा का भी अपना यथार्थ है. ऐसा यथार्थ जो कल्पना से ही नहीं हर तरह की नॉस्टैल्जिया से भी बड़ा है. कवि शैलेंद्र के शब्दों में कौशल किशोर ने जिसे ‘चकाचैंध का अंधेरा’ कहा है, जिसमें उन्हें दिखाई देती हैं -

तबाह होती बस्तियां
उजड़ते खेत
बजबजाते नाले नालियां
अस्त-व्यस्त शहर
भागते लोग
बेरोजगारों की भीड़
सफाई, पानी और बिजली के लिए हाहाकार
जिधर जाओ, उधर जाम/चारों तरफ जाम, जाम, जाम
सब जाम.....’

लेकिन क्या समकालीन कविता भी इस विकासजन्य जाम की शिकार है ? जनता के बीच होकर भी आखिर वह उसके साथ क्यों नहीं है ? कौशल किशोर की कविताओं को पढ़ते हुए यह प्रश्न मेरे मन में तब उठे, जब ‘पहल-115’ में कुछ विशिष्ट कवियों को पढ़ा. खासकर देवी प्रसाद मिश्र और प्रभात की कविताएं जिनके बारे में सिर्फ यही कहा जा सकता है कि बूझो तो जानें.

विडंबना यह है कि आज हम सब जिस कालखंड से गुजर रहे हैं, मनुष्य जैसे अपनी अपूर्णता में ही पूर्णता के अभिमान से भरा हुआ है. रिश्ते-नाते, परिवार और समाज उसके लिए जैसे कोई मायने नहीं रखते, क्योंकि विकास की समूची अवधारणा पूंजी-केंद्रित है, जहां मानवीय और सामाजिक मूल्यों का कोई मोल नहीं रह गया है. मनुष्य का सारा श्रम, सारा सौंदर्य और कला साहित्य की सामाजिक भूमिका नगण्य या गैरजरूरी मान ली गई है. यही कारण है कि ‘कला-साहित्य-संस्कृति से जुड़े तमाम परंपरापुष्ट जीवन मूल्यों को आधुनिकता-विरोधी सिद्ध करने की कोशिशें हो रही है. इसी के चलते अबूझ बौद्धिकता और निरी गद्यात्मकता को कविता कहा जा रहा है, गोया हिंदी कविता स्थानीय होने से पहले अनिवार्यता ग्लोबल होनी चाहिए, जहां न किसी राग की जरूरत है, न अनुराग की. छंद तो खैर, उनके कहे आधुनिक भावबोध का वाहक हो ही नहीं सकता!’ (आलेख-कविता में बंटवारा)

कौशल किशोर की कविताएं भी गद्यात्मक हैं लेकिन अति बौद्धिकता की शिकार नहीं हैं. इसीलिए वहां संप्रेषणीयता का भी कोई संकट नहीं. असल में संप्रेषणीयता का गुण उन कविताओं में होता है, जो अपनी जनता की दुख-तकलीफों को समझती हैं, जिनका कोई अपना देश-काल और समाज होता है और जो उन ताकतों को पहचानती हैं जो श्रमशील जनता के लहू और पसीने की आस्वादक हैं.

किंतु सिर्फ यही नहीं. ऐसी ताकतों को पहचानना ही काफी नहीं है. उनका काव्यात्मक प्रतिरोध भी जरूरी है. ऐसी कविता आत्मग्रस्तता की नहीं, आत्मप्रक्षेपण की पक्षधर होंगी. उसे मानवीय संवेदन और जनवादी विचार दोनों चाहिए. कौशल किशोर की कविता काव्यकर्म के इसी दायित्व का निर्वाह करती हैं. उनकी एक कविता ‘भेड़िया निकल आया है मांद से’ उससे ही कुछ पंक्तियां -

वह आ सकता है
लोकतंत्र के रास्ते आ सकता है
स्मृतियों को रौंदता
संस्कृति का नया पाठ पढ़ाता/वह आ सकता है
जैसे आया है इस बार
ढोल, नगाड़ा, ताशा
एक ही ध्वनि-प्रतिध्वनि
अबकी बार.....
बस अपनी सरकार.....’

यह कविता उन तमाम देशों को आईना दिखाती है, जहां लोकतंत्र के नाम पर जनता को ठगा जा रहा है, जहां पुरोगामी ताकतें तेजी से उभर रही हैं और जहां ‘रंगमंच पर अब देश नहीं/दृश्य हैं/विडंबनाओं, विसंगतियों और भ्रमों से भरा परिदृश्य है.’ आकस्मिक नहीं कि यह कविता सर्वेश्वर की ‘भेड़िया’ कविता से प्रेरित है क्योंकि समय बदलता है, समय की विडंबनाएं नहीं. इसीलिए कौशल किशोर उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता को ताजा करते हैं.

उठो, तुम मशाल जलाओ
भेड़िया निकल आया है माँद से
तुम मशाल को ऊँचा उठाओ
भेड़िए के करीब जाओ
करोड़ों हाथों में मशाल लेकर
एक-एक झाड़ी की ओर बढ़ो
भेड़िया भागेगा.....’

कवि के इस आशावाद की उपेक्षा नहीं की जा सकती. इसके बावजूद वह उस भेड़िया-वृति को भी अनदेखा नहीं करता, जिससे तानाशाह पैदा होते हैं. इस संदर्भ में कौशल किशोर की ‘तानाशाह’ शीर्षक कविता श्रृंखला को देखा जा सकता है. ‘तानाशाह की विध्वंसक राजनीति के प्रभावों या विशेषताओं की पहचान कराते हुए वे कहते हैं-

वह हरे-भरे खेतों को देखता है
और खेत युद्ध के मैदान में बदल जाते हैं
वह दिन को देखता है
वहां अंधेरे का सैलाब फैल जाता है
वह शहर को देखता है
वहां कफ्र्यू का सन्नाटा
या मौत का नगर बस जाता है
वह जीवन को देखता है
और देखते-देखते लाशों का ढेर लग जाता है!’

ऐसी अनेक कविताएं हमें मध्यकालीन इतिहास अथवा मध्य एशियाई देशों तक ही नहीं ले जातीं, हमारे अपने वर्तमान को भी चिन्हित करती हैं. लेकिन इसी वर्तमान का एक पहलू और भी है और जो हमारी जनता की तमाछन्न धार्मिकता या उसके जड़ परंपरावाद को दिखाता है, और उस विडंबना को भी, जो किसी तानाशाह के उदय या निर्मिति का निमित्त बनती हैं. संदर्भतः ‘इंतजार’ कविता-श्रृंखला से यह कवितांश -

हमारा ही रंग उतर रहा है
और हम ही हैं
जो कर रहे हैं इंतजार
कि कोई तो आएगा उद्धारक
कोई तो करेगा शुरुआत
कोई तो इस धरती को
बनाएगा रजस्वला
किसी से तो होगा वह सब कुछ
जिसका हम कर रहे है
इंतजार.....’

इंतजार भुलावा तो है ही, छलावा भी है. हां, यदि उसके पीछे कोई तर्क हो, और उस तर्क का भी कोई जमीनी आधार तो बेशक हम इंतजार करें. कटे, बल्कि काट दिये पेड़ के भीतर जो ज्वलनशीलता होती है, उसे ‘धधकाने’ के लिए भी तो ‘आग’ चाहिए. कवि उसी आग की तलाश में है, उसी के इंतजार में. कहता भी है –
‘बीड़ी से
क्यों जलाते हो अपने सीने को
कितना इंधन भरा है इसमें
इसे धध़काने को माचिस के तीली
या थोड़ी-सी आग चाहिए
बस!’

कवि ने यहां आग की आकांक्षा में न सिगार का जिक्र किया है, न मशाल का. बीड़ी का जिक्र किया है और उसे जलाने के लिए माचिस की तीली का. इससे हम कवि की वर्ग चेतस भाषाई सजगता को समझ सकते हैं. आग से जुड़े यह दोनों ही माध्यम हमें उस मजदूर तक ले जाते हैं जो निरर्थक ही अपने सीने को बीड़ी से जला रहा है, जबकि उसे ‘जलाने’ का नहीं, ‘धधकाने’ का काम करना चाहिए. याद करें दुष्यंत का यह शेर -

तेरे सीने में नहीं तो, मेरे सीने में सही 
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए.

या फिर इसी भावबोध की संगति करती हुई मेरी यह गीत पंक्तियाँ हैं -

आग बिन रोटी नहीं होगी 
अन्न के संग 
आग भी पैदा करें!’

कहने का आशय यही कि कविता की अंतर्वस्तु के साथ भाषाई प्रयोगों का भी बुनियादी महत्व है और कौशल किशोर की कविताएं इस महत्व का बखूबी निर्वाह करती हैं. उनके यहां पुराने बिंबों और प्रतीकों की उपस्थिति प्रायः नहीं है. वे एक नारे को भी किसी बिम्ब की जगह दृश्य में बदलना चाहते हैं, ताकि वह एक व्यापक संदेश या आवाहन की प्रतीति करा सके, और उस काव्यात्मक सौंदर्य की भी जो उसे रुचिकर बनाए. इसी के चलते ‘हमें बोनस दो’ जैसी कविता उनकी भाषायी संवेदना का स्पर्श पाकर सिर्फ नारा ही नहीं रह जाती. कहते हैं -

यह जीवन-संगीत की जानी-पहचानी तुक है
यह वीण के टूटे तारों को
जोड़ने की हमारी पुरजोर कोशिश है
यह एक उत्तेजना है
यह एक बिंदू पर पहुंचने की
संगठित ललकार है’
आकस्मिक नहीं कि कविताओं की शक्ल में कवि का यह रचनात्मक संघर्ष उसकी ‘भाषा की प्रौढ़ता का इम्तहान भी है’, और कुछेक सवालों का जवाब भी.
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रामकुमार कृषक
मो - 9868935366

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