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कथा-गाथा : ख़यालनामा : वन्दना राग

Posted by arun dev on जनवरी 14, 2019













आलोचक और कथाकार राकेश बिहारी के स्तम्भ ‘भूमंडलोत्तर कहानी’ का समापन वन्दना राग की कहानी ‘ख़यालनामा’ की विवेचना से हो रहा है, इसके अंतर्गत आपने निम्न कहानियों पर आधारित आलोचनात्मक आलेख पढ़ें हैं –

1)  लापता नत्थू उर्फ दुनिया न माने (रवि बुले)
2)  शिफ्ट+ कंट्रोल+आल्ट = डिलीट (आकांक्षा पारे)
3)  नाकोहस (पुरुषोत्तम अग्रवाल)
4)  अँगुरी में डसले बिया नगिनिया (अनुज)
5)  पानी (मनोज कुमार पांडेय)
6)  कायांतर (जयश्री राय)
7)  उत्तर प्रदेश की खिड़की (विमल चन्द्र पाण्डेय)
8)  नीला घर (अपर्णा मनोज)
9)  दादी,मुल्तान और टचएण्डगो (तरुण भटनागर)
10) कउने खोतवा में लुकइलू ( राकेश दुबे)
11) चौपड़े की चुड़ैलें (पंकज सुबीर)
12) अधजली (सिनीवाली शर्मा)
13) जस्ट डांस (कैलाश वानखेड़े)
14) मन्नत टेलर्स (प्रज्ञा)
15) कफन रिमिक्स (पंकज मित्र)
16) चोरसिपाही (आरिफ)
17) पिता-राष्ट्रपिता (राकेश मिश्र)
18) संझा (किरण सिंह)
19) अगिन असनान (आशुतोष)
20) बारिश के देवता (प्रत्यक्षा)
21) गलत पते की चिट्ठियाँ (योगिता यादव)
22) बंद कोठरी का दरवाज़ा (रश्मि शर्मा)
23) ख़यालनामा (वन्दना राग)


चयनित कथाकार और उनकी कहानियाँ ही श्रेष्ठ हैं ऐसा कोई प्रस्ताव यह श्रृंखला नहीं रखती है, इस उपक्रम का लक्ष्य समकालीन समय-सत्यों का अन्वेषण और उसकी विवेचना है. एक तरह से २१ वीं सदी की कथा-प्रवृत्तियों की पड़ताल की यह एक कोशिश रही है, अब यह पुस्तकाकार भी प्रकाशित होकर आपके समक्ष होगी. आलेखों के साथ संदर्भित कहानियाँ दी गयीं है जिससे यह ‘पाठ-चर्चा’ युवा अधेय्ताओं के लिए भी उपयोगी हो. कथा को समझने के अनेक औजार उन्हें यहाँ मिलेंगे.

आलोचना के लिए आलोचकीय विवेक, अन्वेषण और साहस की जरूरत होती है जो राकेश बिहारी के पास है. कहानियों की आलोचना के सिलसिले में वे पाठ तक ही केन्द्रित नहीं रहें हैं, पाठ के बाहर की बहसों और विमर्श तक वे जाते रहें हैं, शोध और खोज की जहाँ जरूरत थी वहाँ भी वे गये हैं.



लगभग चार वर्षो के इस आलोचकीय परिघटना का सहभागी और साक्षी समालोचन रहा है. यह स्तम्भ खूब पढ़ा जाता रहा है और इसने अपने समय को कई तरह से प्रभावित किया है. इस सार्थक श्रृंखला के पूर्ण होने पर राकेश बिहारी बधाई के हकदार हैं. जल्दी ही समकालीन उपन्यास पर अपने नये स्तम्भ के साथ वह समालोचन पर आपको मिलेंगे.


ख़यालनामा                            

वन्दना राग










चारों ओर रेत का विस्तार है. चिलचिलाती धूप है. लगता है कि सोना बरस रहा है. अंधड़, सोने के उन कणों को आँखों में झोंक रहा है. कुछ दिखाई नहीं दे रहा है. अब और चला भी नहीं जाता है. एक पैर उठता है तो दूसरा इन रेतीले खंदकों में धँस जाता है. यह बेदम, बोझिल शरीर गिरने वाला है. अब गिरा... तब गिरा. गिर ही गया. गिरने पर दिखलाई पड़ता है, अभी तक तो जलते सूरज के अलावा आसमान में कुछ नहीं था, फिर ये गिद्धों का मंडराता मंज़र कहाँ से पैदा हो गया? अरे ! ये गिद्ध तो अपनी चोंच नीचे झुका कर फड़फड़ाते हुए शरीर पर आ रहीं हैं. सीधा हमला है... आँखों पर. जल्दी से आँखें बंद कर लेनी चाहिए वर्ना नोच ली जाएँगी. झुलसता हुआ शरीर पिघल रहा है. अब पिघल कर गगरी भर द्रव्य बन गया है. खत्म... सब खत्म हो गया है.

ऊँह...ऊँह..ऽऽ! एक घुटी हुई सिसकी के साथ राघव रमण की आँखें खुलती हैं. चेतना का बोध होते ही, वे अपनी काँपती ऊँगलियों से अपनी आँखों को छूते हैं. आँखें हैं वहीं, मौजूद. वे कमरे में फैले घुप्प अंधेरे को देखती हैं. वहीं से, वे दुबारा मशक्कत करते हुए चीजों की शिनाख्त शुरू कर देती हैं. उन्हीं का अपना बेडरूम है यह. कोने में बेंत से बना लैम्प है, सामने टी.वी. का स्क्रीन अपने ही स्थान पर ठोस झिलमिला रहा है, कमरे की दायीं दीवार पर मकबूल फिदा हुसैन का रंगीन घोड़ों वाला प्रिंट टँगा है. बायीं ओर की खिड़की पर सफेद झीना पर्दा पड़ा है, जहाँ से नज़र आ रही है आम के पेड़ की शाखा और उससे ऊपर नज़र आता है, पीले कटे हुए चाँद का एक टुकड़ा. टुकड़ा चाँद बता रहा है कि अभी रात बीती नहीं हैं. रात ही का कोई पहर अभी भी चल रहा है. आँखें लौटकर बिस्तर पर आ जाती हैं. सफेद चादर पर वे लेटे हुए हैं. सफेद ही चादर ओढ़े हुए भी हैं. एयर कंडीशनर की हवा से चादरें ठंडी हो गई हैं. अचानक उन्हें भी ज़ोर की ठंड लगने लगी  है. क्या उनका शरीर भी ठंडा हो रहा है? नहीं.....यह तो शरीर से बहता ठंडा पसीना है जो ठंड पैदा कर रहा है. मतलब? मतलब वे हाल-हाल तक एक सपने में यात्रा कर रहे थे. डर की रस्सियों से बँधे, बेहाल, पसीने से तरबतर. वही डर, वही पसीना उस यात्रा से यहाँ तक ले आया है उन्हें. और प्यास


कितनी प्यास लग रही थी उन्हें. कितने युगों की प्यास थी वह. अभी भी लगातार सता रही है. वे हड़बड़ा कर उठते हैं. उनके हाथ में पलंग पर से उठाया रूमाल है. बत्ती जलाए बिना ही वे अपना पसीना पोंछने लगते हैं. रगड़-रगड़ कर. इतनी नृशंसता से कि पूरे शरीर पर लाल-लाल निशान उग जाते हैं. बत्ती जलाने पर दिखलाई पड़ता है, माथे पर उभरी चिंता की रेखाएँ लाल-लाल हो और गहरा गई हैं. वे उन्हें मिटा देना चाहते हैं, लेकिन ताज्जुब है कि वे और गहराती जाती हैं. अब तो दाग बनीं सजी रहेंगी कई दिनों तक. अपनी आक्रमकता पर उन्हें खुद ही हैरत होती है. उनकी पहचान तो शांति और सौम्यता से रही है, और ठीक उसके विपरीत आजकल वे अपने प्रति कितने अशांत व्यवहार का प्रदर्शन करने लगे हैं. ख़ासतौर से अकेले होने पर अपने प्रति कितने क्रूर हो जाते हैं वे, मानों अपने से नहीं किसी घृणित वस्तु से व्यवहार कर रहे हों.

वे तेज़ कदमों से चल कमरे के दूसरे छोर पर रखे पानी के गिलास को उठाने का प्रयास करते हैं, और पाते हैं, कि दिमागी आँकलन की अपेक्षा शारीरिक गति धीमी रह गई. मुझे तेज़ी से वहाँ पहुँचना हैउन्हांेने तय किया है मगर उनके कदम बोदे, शिथिल चाल से गिलास तक पहुँचे. इधर कुछ दिनों से इस प्रकार के बेगिनती विरोधाभासों के काँटे उनके आसपास उगते जा रहे थे. वे चाहते हैं, सारे काँटों को उखाड़ कर दूर फेंक दें. वे ऐसी कोशिश भी करते हैं, मगर जल्द थक जाते हैं. उन्हें थकना कभी पसंद नहीं था. फिर वे क्यों थक रहे हैं? मगर क्या पसंद की सारी चीजें कर पा रहे हैं वे आजकल? बिल्कुल नहीं कर पा रहे हैं, इसीलिए आजकल बदली हुई पसंदों को अपनाना पड़ रहा है.

वे सुबह टहलने जाते हैं. दस साल पहले अपने जीवन के अड़सठवें वर्ष में इसे सिलसिला बतौर अपनाया था, वर्ना पर्यावरण में घनी रूचि के बावजूद उन्हें रोबोटिक ढंग से नियमानुसार टहलना कभी पसंद नहीं रहा था. वहीं कुछ महीनों पहले टहलते वक्त लोदी गार्डन में अनिकेत कुलकर्णी ने उन्हें पहली बार नमस्ते किया था. बहुत गौर से देखने पर समझ पाए थे, उन्हीं का शोध छात्र था वो.
क्या रोज टहलने आते हो?
जी. उसने आदर भाव से गर्दन को झुका लिया था.
वाह ! तब तो मुलाकात होती रहेगी.
जी.

उसके दुबारा सिर्फ जी में जवाब देने को लेकर वे पशोपेश में पड़ गए. क्या उसके ऊपर अनावश्यक दबाव बना दिया उन्होंने? रोज़ मिलने का प्रस्ताव निहायत आम किस्म का था, मगर क्या उनकी टोन से आम होने की अभिव्यक्ति प्रतिबिम्बित हुई थी? रोज़ मिलने से बात औपचारिकता छोड़ अनऔपचारिक हो सकती थी. मित्रता की संभावना हो सकती थी. एक अच्छा सा भरोसे का रिश्ता बन सकता था. क्या यही सब तो नहीं दर्शा दिया उन्होंने? यही सब, इसीलिए, क्योंकि यही सब वे तीव्रता से चाह रहे थे. वही प्रकट हो गया क्या? लगता है हो गया, क्योंकि अनिकेत कुलकर्णी तो मितव्यवहार कर रहा था. उत्साह ही नहीं दिखा रहा था. ओह! फिर गलती हो गई!

इधर बातों को तोलने में बार-बार गड़बड़ा रहे हैं वे. कहाँ किस बात को कितने वज़न से तोलना चाहिए तय करने में चूक हो रही है उनसे. उन्होंने लोदी गार्डन की पगडंडी को देखते हुए कहा आगे से कोशिश करेंगे, लोगों से बात करते वक्त इस तरह ही आतुरता ज़ाहिर ना हो, वह जो दयनीय नज़र आए.

बाद में अनिकेत कुलकर्णी से अंतरंग हो जाने पर, अपने पहले हुए वार्तालाप पर कोफ्त हुई थी राघव रमण को. वैसे मूर्खतापूर्ण वाचाल लम्हें कम आए थे उनके जीवन में. वह तो इधर के वर्षों में इस तरह के लम्हों की निरंतरता बढ़ती जा रही थी. अनियंत्रित ढंग से वे इतना सब कुछ सोचते रहे थे. और सबको एक लौजिकल कड़ी में पिरो, घटनाओं पर जो नियंत्रण चाहते थे, वह हो-ही नहीं पा रहा था.

उस दिन शाम को अचानक ही जब अनिकेत उनके घर पहुँच गया था, तो वे कैसे हड़बड़ा गए थे. घर में आजकल यूंही धोती लपेटे रहते थे, लुँगी की तरह, और ऊपर आधी बाँह की कुर्ती. गर्मी में धोती को आधा कर बाँधने लगे थे. खुले और ढीले कपड़े शरीर को शीतल सा एहसास देते थे. एक तरह की थपकी सा सूकून भरा स्पर्श लगता था. खूब पसर कर टाँग टेबल पर रख बैठे हुए थे जब, अनिकेत को ठीक अपने सामने खड़ा पाया. एकदम से उठ भी नहीं पाए थे, मगर अपने कपड़ों और मुद्रा पर थोड़ी शर्म आई थी. शर्म आने के वाजिब कारणों में सिर्फ इतना ही एक कारण महत्वपूर्ण था कि उन्हें जीवन भर दूसरों के सामने खूब अच्छे चुस्त दुरूस्त कपड़े पहनने की आदत रही थी.

अरे तुम?
जी! आपको डिस्टर्ब तो नहीं किया?
नहीं-नहीं,  बैठो, मैं अभी आता हूँ.

वे उठे और बेडरूम की ओर चले गए. वहाँ बिखरी चीजों के बीच से अपनी पतलून ढूँढने लगे. एक ऐसी पतलून जो घर में पहनने वाली लगे, बाहर जाने वाली नहीं, अनिकेत के सामने यह ज़ाहिर करना बिल्कुल ठीक नहीं होगा कि वे अपनी स्थिति पर शर्म महसूस कर रहे हैं और उसे दिखाने के लिए सज रहे हैं. उन्हें आत्मप्रदर्शन करता, लाचार व्यक्ति नहीं नज़र आना चाहिए. वे नए ज़माने के टेर से वाकिफ हैं. अनिकेत जैसे नए ज़माने के लोग इन सब चीजों से विकर्षित हो जाते हैं. 

बहुत  ढूंढनें पर भी उन्हें लेकिन मनमुताबिक पतलून नहीं मिली, लिहाज़ा उन्होंने बाहर जाने वाली पतलून ही हैंगर से उतार, जल्दी-जल्दी पहननी शुरू कर दी. जल्दी करने से पैर फँसने लगा और दिमाग न जाने कहाँ दौड़ने लगा ऐसा कि एक ही पाँयचे में उन्होंने दोनों पैर डाल दिये. वह तो अलमारी की ओट पीछे थी, जिसने उन्हें गिरने से बचा लिया, वर्ना, उस दिन भारी चोट लग सकती थी. थक कर वे दुबारा कमरे में लौट आए, पतलून पहने बिना ही. अंदर एक सिसकी उठ कर गिर रही थी. बड़ी मुश्किल हुई थी उन्हें संयत होने में और अपनी देह को इस तरह बेतरतीब अध खुले ढंग से अनिकेत के सामने प्रस्तुत करने में.

उस दिन अनिकेत, ‘सरके साथ देर तक बैठने का मन बना के आया था. उनकी झिझक और उनका संकुचित महसूस करना, गाढ़ी बुनाई खोलने के समान, खोल कर, सुलझा दिया था उसने. वह वाकई सहज था. ढेर सारी बातें हुईं अनिकेत के साथ जिनके बीच तैरते हुए वे फिर से वैसा ही साहसी महसूस करने लगे जैसे हुआ करते थे.

वैसे-जैसे, छात्र जीवन में थे, अपनी नौकरी में थे. वह नौकरी जिसने उन्हें इतनी इज्जत और शोहरत दी. जिसके बावजूद उन्होंने कभी आत्मश्लाघा या श्रेष्ठता का छद्म सुख प्राप्त नहीं किया. इन भावों को छद्म ही माना, इसीलिए सुख मिला तो काम में मिला, ’महान पर्यावरणविद्या लीजेंडकहलाने में नहीं मिला. उनके साथी मानते थे, उनमें महत्वकांक्षा की आग नहीं, इसीलिए वे कभी अस्त-व्यस्त नहीं होते. वर्ना उनके जैसे प्रतिभाशाली लोग न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच जाते, सरकार में होते, राज्यसभा में, और न जाने कहाँ .......कहाँ? उनके साथी उनके अदम्य साहस के भी कायल थे. सचमुच उनमें इतना अधिक साहस था कि अपने बारे में प्रचलित अनेक जिज्ञासाओं और व्यवहार संबंधी अफवाहों को लेकर वे कभी उद्धिग्न नहीं हुए, ना ही उन्होंने आत्मरक्षा में कभी कोई सफाई ही दी. अहाँऽऽ कभी ज़रूरत ही नहीं समझी!
आप अकेले रहते हैं? अनिकेत की आवाज़ में आश्चर्य से ज्यादा जानकारी ले लेने की औपचारिकता थी.
ओऽऽ हाँ? जवाब देते वक्त वे विश्वसनीय सफाई देने की मुद्रा में आने लगे. यह कैसी बात हुई? अंदर एक तड़प सी उठी, ’वो साहस वाला भाव कहाँ बिला गया है’? उनके अकेले रहने के चुनाव के पीछे किसी भी प्रकार की योजना नहीं रही थी. सच तो ये है, उन्होंने जीवन जीने को लेकर कभी बहुत सोचा ही नहीं. घटनाएँ घटती चली गईं और पड़ाव पार होते चले गए. काम के बीच फुर्सत ही नहीं मिली, कि वे पारंपरिक घर बनाते. वैसे भी उन्हें परंपराओं से चिढ़ थी.

अनिकेत कुलकर्णी, तुम्हारे साथी तुम्हें क्या कह कर पुकारते हैं? उन्होंने बातों का रूख मोड़ा. ऐसी बातें की जाएं. जिनमें कुछ गढ़ने की मेहनत न लगे. किसी सफाई की आवश्यकता न हो.

अन्नू, बुलाते हैं सर. इसकी मितभाषिता इसकी फितरत है. राघव रमण इसे ही सत्य मान अपनाना चाहते हैं. ये उन्हें बल देता है. वर्ना अपने बारे में कितना कम बताता है ये नौजवान, कि उससे बात करने वाला, उसके भाव को ले असमंजस से घिर जाए.
अच्छा? आज से मैं भी तुम्हें अन्नू ही बुलाऊँगा. आज यहीं खाना खाओ. मगर उससे पहले बताओ क्या पीओगे?
नहीं सर, प्लीज परेशान न हों, मैं तो यूँ ही चला आया.
कोई बात नहीं, थोड़ी बियर तो चल जाएगी.
जी.
सोमेश, उन्होंने अपने यहाँ काम करने वाले वर्षों पुराने सेवक को आवाज़ दी,
बियर ले आओ!
जी, लाया....
बियर के तीसरे गिलास पर पहुँचने तक, उन्होंने अपने आप को कसे रखा. कुछ भी खुलने नहीं दिया, न इच्छा, अकांक्षा, न कसक और अतीत. अन्नू बोलता रहा, अपने विभिन्न प्रोजेक्टस की बात, पर्यावरण रिसर्च की नई बातें और वे सुनते रहे, उसी संतुष्ट शांत भाव से जिससे दुनिया परिचित थी. मगर उसके बाद, उनसे रहा नहीं गया, लगा एक पहाड़ी झरने से जूझते हुए, उसी के आवेग से नीचे बहा दिए जा रहे हों. कुछ बीयर पीने के बाद उनका नियंत्रण उनके मन मस्तिष्क से छूट कर बाहर आ गया. यह बेसंभाल होने वाली स्थिति भी उनके लिए, उनके व्यवहार की नई बात हो गई है. लिहाज़ा जो पहली निजी बात मन में आई उसे ही खट् से कह डाला.

अन्नू क्या तुम सपने देखते हो? कैसा वाहियात असंगत सवाल था यह. सवाल करते ही वे खुद समझ गए और शर्मसार हो गए. अपने अतिथि से नज़र न मिलाना पड़े इस उद्देश्य से कमरे में टहलने लगे.

अन्नू ने सवाल के बारे में, उसकी टाईमिंग के बारे में उनके बराबर सोचा ही नहीं. आराम से बोला,

नहीं सर, पता नहीं क्यों मुझे सपने नहीं आते. उनके लिए जवाब बहुत खुश करने वाला नहीं था. वे आतुरता से उसे अपने इधर के सपने बताना चाहते थे, कि, उन्हें कैसे-कैसे सपने आने लगे हैं, आजकल. अपने सपने बता वे अनिकेत के जवाबों से कुछ हल ढूँढना चाह रहे थे. सपनों से पैदा होती उधेड़बुनों से पलायन का रास्ता बनाना चाह रहे थे उसे, मगर अनिकेत का रवैया उस दूत समान कत्तई नजर नहीं आ रहा था, जो आगे बढ़कर उन्हें गले लगा उनकी आशंकाएं दूर करता. इससे वह यह सोचने पर मजबूर हो गए कि यही फर्क होता है, नौजवानों और उन जैसे लोगों में जिसे न चाहने पर भी, समय तय कर देता है. नौजवानों को सपने कैसे आएंगे, और यदि आएँगे तो याद कहाँ रह पाएँगे? कितनी गहरी नींद आती है, इस उम्र में. जब चाहे सो लें, फिर भी कम पड़ जाए. खुद उन्होंने कितनी डाँट खाई थी अपने पिता से इसी नींद को लेकर. वे जब भी सोते, पिता को लगता आवश्यकता से अधिक सो रहे हैं, समय जाया कर रहे हैं!
क्या हुआ सर? अन्नू को लगा सर कहीं खो गए हैं.
कुछ नहीं....! वे तन्द्रा से जगते हुए बोले.
उस दिन के बाद टहलने के अलावा एक और सिलसिला बन गया दोनों के जीवन का. दिन भर अनिकेत और सर अपने काम में व्यस्त रहते थे और शाम को अक्सर दोस्ताना ढंग से साथ. शहर में कहीं बाहर जाना हो तो भी साथ ही जाते थे. अनिकेत उनकी गाड़ी ड्राईव कर लेता था. एक दिन किसी आयोजन में राघव रमण को किसी ने टोक दिया था,
यह लड़का आपका बेटा है?
आपका रिश्तेदार?
नहीं...नहीं, मित्र है मेरा. इस बार वे विश्वास से भरकर बोले थे. मिथ्या वाला, गढ़ा हुआ नहीं, सचमुच वाला. वह विश्वास जो अन्नू ने बार-बार अपनी उपस्थिति से उनके भीतर रोपा था.
अच्छा... उस व्यक्ति ने कहा था,
माफी चाहता हूँ मगर कुछ छूट ले सकता हूँ?
हाँ, हाँ, गो अहेड, राघव रमण मुस्कुरा कर बोले थे,

आप दोनों में बड़ी सिमिलेरिटी है, ट्विंस लगते हैं, एकदम जुड़वाँ! कमरे में एक ठहाका उछल पड़ा था. जिसपे राघव रमण घबरा गए थे. आशंका से भर उन्होंने अन्नू की ओर देखा था. वह सहज था, और बातों के मज़ाक को ही जी रहा था. कोई अवांतर अर्थ की शिकन उसके चेहरे पर नहीं थी. वह खूब हँस भी रहा था. इसके बावजूद उन्हें सहज नहीं लगा, कपड़ों के भीतर पसीना चुह-चुहा गया था. वे डरे गए थे. यदि अन्नू बातों को अन्यथा ले लेगा, तो उनसे मिलना बंद कर देगा. क्या कोई नौजवान आज की तारीख में उनका मित्र होना चाहेगा? क्यों चाहेगा? उनके पास किसी नौजवान को देने के लिए क्या था? या कुछ था? उनके साथ रहने से एक पहचान जरूर मिल सकती थी. एक नई आइडेटिंटी, विषय संबंधित कुछ सहूलियतें भी और...! सोचना चाहते तो फेहरिस्त लंबी हो जाती. सोचने से उबकाई भी आने लगी थी. साथ को लाभ के साथ जोड़ने पर. इसीलिए उन्होंने इस दिशा में सोचना बंद कर दिया. इस दिशा से दूसरी दिशा में चले गए. सोचने लगे, क्या फिर वही दयनीय आतुरता उन पर हावी हो गई है, जिसे व्यक्तित्व से उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया था बहुत बचपन से और जिसे ताजीवन निभाते भी रहे बखूबी


क्या अन्नू के लिए सहज वातावरण तैयार करने के लिए वे अन्नू जैसा ही आचरण करने लगे थे? क्योंकि अन्नू तो उनके जैसा आचरण करने से रहा.......क्या वे ही उसके रूप के बरअक्स अपने रूप को गढ़ने लगे थे?  इस व्यक्ति ने जो जुड़वाँ वाला ठप्पा लगा दिया था, उसके मायने क्या हुए? कैसे इंकार करें कि अनिकेत को मित्रता खो देने से बचाने के लिए, उन्होंने अपने अंदर अनजाने ही यह साम्य पैदा कर दिया होगा या जानबूझ कर ही करते जा रहे हैं? कैसे इंकार करें? उसे किसी कीमत पर खोना नहीं चाहते हैं? उसे अपने साथ बनाए रखने के लिए कुछ भी करेंगे वे. कुछ भी. ऐसा मन में आने लगा है. भले ही वह सब कुछ उनके इसके पहले वाले जीवन से भिन्न ही क्यों न हों? भले ही उन्हें अपने व्यक्तित्व के साथ कई समझौते भीकरने पड़ें.

सोमवार का दिन था जब वे टहल कर लौटे होंगे. सुबह-सुबह उनके भीगे लॉन की घास, तरावट देती थी, वे वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ गए. सोमेश ने अखबार और मौसम्बी के जूस का गिलास उन्हें पकड़ा दिया. गिलास लेते वक्त, सोमेश ने देखा राघव रमण का हाथ एक क्षण के लिए काँप उठा था. उन्होंने देख लिया कि सोमेश ने उनके काँपते हाथ को देख लिया है. अजीब सी पराजय भावना से वे भर उठे,

क्या देख रहे हो?
वे आदत के विपरीत चिल्ला उठे.
कुछ नहीं,
वह सिर खुजाने लगा,
आप ठीक हैं, ?

हुँ, बड़े आए मेरा ख्याल रखने वाले, पहले अपने आप को देखो. पागलों की तरह पीते हो, रोज़ रोज़. लगता है मरना ही चाहते हो! अंतिम वाक्य बोलते-बोलते वे शब्दों को चबा गए, मानों कुछ शब्द सुनना चाहते ही नहीं भले ही वे उनकी अपनी ज़्ाुबा से निकले शब्द क्यों न हों.

सोमेश के आँखों की पतली डोरियाँ ललाई की अधिकता से फटने को तैयार दिखीं, वह सिटपिटाते हुआ अंदर चला गया. अभी ये नौबत नहीं आई है कि सोमेश उनके लिए चिंता का नाटक करे. वे अपनी चिंता कर लेंगे. करते ही हैं. आगे भी करेंगे. यह वाक्य उन्होंने ज़ोर से कहा. पूरी प्रकृति को सुना कर रहा. इसके बाद उन्होंने अखबार पर नज़र डाली.

अखबार का सातवां पन्ना इधर के वर्षों में उनका प्रिय पन्ना हो गया था. उस पन्ने पर चिकित्सा संबंधी खबरें छपती थीं. आज हेड लाईन थी स्टेम सेल थेरेपी’, कुछ ऐसा मजमून छपा था जिससे लगता था असाध्य से असाध्य रोगों का इलाज, स्टेम सेल थेरेपी में मौजूद है. खबर पढ़ते ही उनके समूचे शरीर में एक मधुर तरंग फैलने लगी. उन्होंने उत्साह से अपने डाक्टर मित्र को फोन मिला दिया. डाक्टर का स्वर हमेशा की तरह उत्साही मगर संवेदनाशून्य था. डाक्टर का यही अंदाज पेशेवर अंदाज था. जिससे उसके व्यक्तिगत अंदाज को अब अलग कर नहीं देखा जा सकता था. उन्होंने जब से इस सच से समझौता किया था, उन्हें डाक्टर के रवैये से परेशानी नहीं होती थी.
कैसे हो?
- अच्छा हूँ, डाक्टर ऐसे ही फोन मिला दिया.
रियली?
डाक्टर ठठा के हँसा, मानो आगाह कर रहा हो, इससे ज्यादा झूठ वह पकड़ लेगा.
फिर भी बताओ कुछ? अचानक क्यों मेरी याद आई?

डाक्टर ने चुस्ती से इसरार किया. वह जानता था, कोई बात बाकी है, जिसे राघव रमण जल्दी नहीं खोलेंगे. उसने उन्हें कई बार समझाया था, डाक्टर को सारे सच जल्दी से बता देने चाहिए. डाक्टर से कैसा पर्दा? डाक्टर देख रहा था, मगर राघव रमण इधर, पहले के बनिस्बत कुछ और घुन्ने होते जा रहे थे. अपनी तकलीफों को लेकर और ज़्यादा. उसे हैरानी होती थी, उनके इस रूप पर. वह उनको अब लगभग बीस वर्षों से जानता था. उसने देखा था, उस आदमी के साहस को. कैसे सरकारों से लड़ना पड़ता था, पर्यावरण के मुद्दे को ले. सरकारी मुद्दों पर लड़ने के बावजूद सरकारें उसका सम्मान करती थीं. उसके परामर्श के बिना कोई नई योजना नहीं बनती थीं. कितना भव्य उदात्त व्यक्तित्व रहा था उसका. लेकिन वही व्यक्ति कैसे पिछले दस वर्षों से सिमटने लगा था, संकोच और द्वंद्व के दो पायों में जकड़ा हुआ. सबसे छिपता फिरता.....! अपने आप से भी शायद!

आकर एक बार, मुझे देख लो. राघव रमण दबी जुबान से बोले.
क्या हुआ है? अब बताओ भी? डाक्टर की चिड़चिड़ाहट समय ज़ाया होने को लेकर नहीं थी, वह एक चिंता की वजह से गूँजी थी, मगर राघव रमण ने वही समझना स्वीकार किया जो नहीं था.
इट्स ओ के, कल बताता हूँ.
उनकी कायरता से डाक्टर और चिढ़ गया वह सर्द आवाज़ में बोला,
बताओ!
राघव रमण चिहुँक गए, दबे स्वर में बोले मानो कितनी लज्जाजनक बात कर रहे हों;
आजकल मेरे हाथ पैर काँपते हैं.
क्या हर वक्त?
नहीं, कभी कभी.
डाक्टर खासा चिंतामुक्त हुआ, उसने दुबारा टनक से कहा,
कल आके देखता हूँ तुम्हें....
कल नहीं, कल मैं एक सेमिनार में चंडीगढ़ जा रहा हूँ. लौटने पर काल करूँगा, तब आना.
ओ.के., रिलैक्स, तुम ठीक हो, बस टेक इट ईज़ी, डोंट ड्रिंक टू मच.
हाँ...! वे हताशा से ढल गए. वे डाक्टर से अखबार में छपी खबर का उत्सव बाँटना चाहते थे, मगर कह ही नहीं पाए, और मामूली सी फुसफुसी बात कह गए हाथ पैर कांपते हैं मेरे.
इसके बाद जल्दी-जल्दी में उनके हाथ अन्नू का नम्बर डायल करने लगे,
अन्नू कल चंडीगढ़ चलोगे मेरे साथ? काम से जाना है.
अरे सर अभी तो मिले थे, मगर आपने बताया नहीं?
वह उलाहना नहीं दे रहा था, मगर उन्हें अपने ऊपर खीज हुई, कैसे भूल गए उसे यह बताना?
हाँ यार, मिस हो गया, बताना. निमंत्रण कार्ड, कहीं रख दिया है, आज जब उनका फोन आया याद दिलाने के लिए तो याद पड़ा..... बहुत अच्छा होगा......चलोगे न इंटरनेशनल सेमिनार है?

उन्होंने लालसा और सम्मोहन में अपनी पेशकश को लपेटा, वे चाहते थे, बुरी तरह चाह रहे थे, अन्नू को अपने साथ ले जाना, बाहर अकेले जाने पर अजीब सी असुरक्षा होती थी उन्हें,
चलूँगा सर, क्यों नहीं चलूँगा. मेरे लिए तो यह ऑनर होगा सर, निश्चिन्त रहें मैं पहुँच जाऊँगा आपके यहाँ, सुबह ही.
यह सुनकर राघव रमण में गजब की ऊर्जा भर गई, इतनी कि अखबार के बजाए वे कुर्सी उठाकर घर के अन्दर रखने लगे. यह देख सोमेश घबरा गया, ’हड्डी चटक जाएगी तो’, वह रसोई में खड़ा खड़ा ही चिल्लाया, सर कुर्सी मत उठाइए, हम रख देंगे.
चुप-नाश्ता लगाओ. वे हुँकारे.

सर की इतनी फुर्ती, और इतनी बेदिली सोमेश को नौजवानों सी ही लगी. वो मन ही मन बुदबुदाने लगा कैसे आदमी हैं? कैसा जीवन, जीते हैं? बुढ़ापे में जवानी दिखा रहे हैं बप्पा, कौन रहे इनके साथ, दिनों दिन सनकते जा रहे हैं. अगर हमारे परिवार को नहीं पाल रहे होते तो हम कब का छोड़ चुके होते इन्हें. आज कल कितने जिद्दी होते जा रहे हैं..? हर बात में जोश दिखाना चाहते हैं.
रात के खाने पर वे अकेले ही थे, उस दिन. खाने के पहले वाईन पी रहे थे. सोमेश खड़ा इंतजार कर रहा था. खुद तो रोज़ पीते हैं, हमको मना करते हैं.
खाना लगाऊँ? वह अपनी परिधि का अतिक्रमण कर उनके स्टडी रूम में पहुँच गया.
नहीं. वे किसी सोच में डूबे हुए थे.
यही न, अकेले बुढ्ढों के साथ यही प्रोबलम है, हमेशा सोचते रहते हैं जाने कौनसी बातें? आज यदि घर गिरस्ती बसाए होते तो ऐसा नहीं होता. अकेले पड़े-पड़े ऐसे सिर्फ सोचते नहीं रहते. अभी दो पोता-पोती तो जरूर होते. सोमेश कुढ़ रहा था.

क्या सोच रहे हो? वे उसकी सोच के बीच में टपके.
सोमेश घबराया, अच्छे हैं मगर ज़ालिम भी है, हमारे मन की बात समझ तो नहीं लिए?
पूरी इज्जत से बोला, कुछ नहीं सर - चलिए खाना खा लीजिए.
अच्छा. चलता हूँ. पत्नी और बच्चे आ गए तुम्हारे.
नहीं कुछ दिन में आएँगे.
हाँ.... वे धीरे से बोले मानो किसी और कि पत्नी और बच्चों को याद कर रहे हों इसपे सोमेश और कुढ़ गया.
जाओ खाना लगाओ.
जी.

सोमेश चला गया तो उन्हें वहयाद आने लगी. वही जिसे याद करते रहे थे, फिर मसरूफ वक्तों में, वह कहीं लुक सी गई थी, लेकिन आजकल फिर अक्सर याद आने लगी है.

पहली बार जब उससे मिले थे तो जिज्ञासा हुई थी कि जाने, कौन से शहर से आई हुई चिड़िया थी वह. हर वक्त फुदकती रहती थी. गर्मी की उस बरस की छुट्टियों में केरल के पुश्तैनी गाँव में सारे पास-दूर के रिश्तेदार इकट्ठा हुए थे. वह भी दूर की कोई रिश्तेदा की ही लकड़ी थी. तेरह वर्ष की उम्र थी उनकी और उस लड़की की रही होगी एक-दो वर्ष छोटी. शायद प्रेम जैसा ही कुछ हो गया था उससे. उन्हें याद है, उस लड़की का मुँह छोटी गौरय्या जैसा था. एक दिन उसने सबके सामने एक नृत्य प्रस्तुत किया था. वह जब अपना लहँगा थोड़ा सा उठाकर नृत्य करने लगी थी, तो उन्हें लगा था थप-थप-थप कर लड़की ज़मीन पर नहीं, उनकी ही छाती पर नाच रही है, और इस नृत्य के खत्म होते ही उन्हें उस लड़की को अपनी छाती पर गिरा कर चूम लेना चाहिए, एक बार, फिर लगता रहा, अनेक बार, अकस्मात, बार-बार. वह लड़की बड़ी सीधी थी, इसीलिए किसी को कभी बता नहीं पाई कि बाद के दिनों में कैसे राघव रमण ने उसे पहली बार चूमा था. ज़ोर से. इतने अधिक ज़ोर से कि उसका होंठ कट गया था और वह उस होंठ को अपने हाथ से दो दिन तक छिपाती फिरी थी. तीसरे दिन किसी ने जबरदस्ती उसके हाथ को खींच कर पूछा था,
ये क्या हुआ?
कुछ नहीं. उसने नज़रें नीची कर थरथराती आवाज़ में कहा था,
बोलते वक्त अपने ही दाँत से लग गया था.
लोग उसके बेशऊर होने पर खूब हँसे थे.

आज वही लड़की उनके ममरे भाई की पत्नी है. पिछली बार जब केरल गए तो उसके चेहरे में उसका छोटा गौरय्या सा मुँह ढँूढते ही रह गए थे. समय उसके प्रति बेमुरव्वत रहा था. उसकी त्वचा पर इतनी सारी महीन रेखाएँ बुनीं हुई थी, मानों चारों ओर थिलगियाँ सिली गईं थीं. जब वह उनसे ऊँसस कर कुछ बोली थी, तो उसका वही मुँह झलक भर दिखलाई पड़ा था, और उसके अंदर से दिखाई दिए थे उसके दाँत. सारे मध्यम आकार के थे, सारे के सारे बेहद संतुलित और व्यवस्थित.... सिहर पर राघव रमण ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया था. शुक्र है, उनके दाँत अभी भी असली हैं.
खाना खाते वक्त वे उनका खूब, धीरे-धीरे, इस्तेमाल करते रहे, मानों कुदरत की इस नियामत को पोस रहे हों.

उन्हें चंडीगढ़ जाना, हमेशा से अच्छा लगता था. बहुत बार मन में आता था, अपने जाने की इच्छा को परमीता आनंद से न जोड़ें, युक्ति संगत नहीं है यह. मगर यह उनका मन ही तो था जो चंडीगढ़ से आए सारे निमंत्रणों को स्वीकार कर लेता था.

दस साल पहले से परमीता को जानते हैं. वह उन्हें अच्छी लगती थी, हमेशा से ही. जब बहुत व्यस्त रहते थे तब उससे पहला परिचय हुआ था. उन दिनों विदेशी निमंत्रण बहुत आते थे उनके पास और वे उन्हें धड़ल्ले से स्वीकार भी कर लेते थे. परमीता काफी कमिटेड थी, काम को लेकर और उसकी उर्जा उन्हें प्रभावित करती थी, इसीलिए एक बार जब फ्राँस चलने का निमंत्रण दिया था उसे, तो भावावेश में वह उनके गले लग गई थी. वह चकित रह गए थे. वह सबकुछ खुले ढंग से व्यक्त करती थी. स्वस्थ कुंठा रहित जीवन था उसका. वे प्रभावित हुए थे, और  आज भी वह उन्हें अच्छी नहीं, बहुत अच्छी लगती है. वह उनके अंदर उस परिभाषित रोमाँच की संभावना जगाती है, जिसे आश्चर्यजनक ढंग से पहले कभी उन्होंने तरजीह ही नहीं दी, मगर आज जिसे वे लगभग व्याकुल हो खोजते हैं. वे अपने हृदय पर हाथ रखते हैं, धड़क रहा है हृदय. स्वस्थ है.

कार से चंडीगढ़ के सफर के दौरान वे कई बार मन ही मन दुहराते हैं तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो परमीता.मानो बार-बार कहने से रोमांच की ओर पहुँचने वाले क्रेसेंडो की भाव भूमि तैयार कर रहे हों. उन्हें लगता है अन्नू उनका कंधा झकझोर रहा है और उनसे कुछ पूछ रहा है.
सर... आप ठीक तो हैं?
ऐं...? वे अचकचा जाते हैं. लगता है झपकी आ गई थी उन्हें. ऐसा कैसे हो जा रहा है? बिना पूर्व सूचना के झपकी आ जाती है और उन्हें बेबस नींद में अनावृत कर देती है. क्या कुछ अनाप-शनाप बड़बड़ाए भी थे? कुछ न उद्घाटित करने वाला सत्य मुँह से निकल तो नहीं गया? ढेरों शंकाओं से लबालब उन्होंने पूछा
क्या, कुछ कह रहा था मैं?
हाँ सर, मगर सब अस्पष्ट था, कुछ समझ में नहीं आया. मुझे लगा किसी परेशानी में तो नहीं आप, इसीलिए उठा दिया. सॉरी.
अरेऽऽ नहीं.

उन्होंने बढ़ती धड़कन को रोकना चाहा, मगर चूँकि अन्नू की बातों पर विश्वास ठहर नहीं रहा था, इसीलिए धड़कन भी बढ़ी रही. और तो और उन्हें लगा अन्नू उन्हें अतिरिक्त सहानुभूति से देख रहा है. उनका शक बढ़ने लगा, ’जरूर इसने मेरे मुँह से निकली कोई बात सुन ली है.अब क्या उपाय था? उन्हें अब चालाकी बरतते हुए अन्नू से कबूलवाना पड़ेगा, कि आखिर उसने सुना तो क्या सुना.

वाह! चंडीगढ़ के नज़दीक पहुँचते ही मौसम कितना अच्छा हो गया! नहीं?
जी.
बड़ी रोमानी जगह है. शिमला के फुटहिल्स में होने की वजह से यहाँ का टेम्परेचर दिल्ली से कम रहता है और शहर का...? अरे कहना ही क्या, मुझे तो चप्पे-चप्पे रोमानी लगते हैं. तुम्हारा क्या ख्याल है?
जी, अच्छा शहर है. बहुत योजनाबद्व तरीके से बसा हुआ.

अन्नू की मितभाषिता से तो वे पहले से ही परिचित थे. पहले की मुलाकतों में उसके व्यवहार को ले तरह-तरह की शंका भी मन में उठती थी, मगर धीरे से उन्हें मानना पड़ा था कि अन्नू जानबूझकर ऐसा नहीं करता. वह है ही ऐसा. इसके बावजूद आजकी मितभाषिता उन्हें चकराने वाली लगी. दोनों के इतने आत्मीय रिश्ते के बावजूद वह अपनी निजी स्पेस पर उन्हें बढ़ने ही नहीं देता था. अब यह देखो हद ही तो  है, वे रोमान की बात छेड़ रहे हैं और यह शहर की संरचना की बात कर रहा है.

हाँ....हाँ, हो हो हो. वे नौसिखुआ खराब अभिनेता की तरह हँस पड़े और अपने कँधे उचकाने लगे.
अन्नू उनके कंधों को उचकते देख एक काली हँसी हँस पड़ा. हँसी तो उसकी हमेशा की तरह ही थी, लेकिन राघव रमण को वह रहस्मय काले रंगों में रंगी नज़र आई. उन्होंने दृढ़ता से माना, अन्नू की हँसी उनकी हँसी उड़ा रही थी. उन्हें अन्नू से बैचेन शिकायत होने लगी. रास्ते भर वे बैचेन बने रहे.

सेमिनार के बाद परमीता के घर डिनर था. अन्नू ने पहली बार परमीता को देखा, गोरी भारी बदनवाली खूबसूरत महिला थी वह. गुलाबी रंग की शीफान की साड़ी पहने हुए थी. उम्र लगभग पचास होगी, मगर उम्र से कम से कम दस वर्ष छोटी लगती थी. अच्छा खुला-खुला सा व्यवहार था उसका. अन्नू के संकोची स्वभाव के ठीक विपरीत सा. अन्नू को ज़्यादा वक्त नहीं लगा उससे प्रभावित होने में. राघव रमण दूर ही से, अन्नू की हरकतों का मुआयना कर रहे थे. उन्हें खुशी हुई कि अन्नू परमीता को पसंद कर रहा है. सही समय आने पर, परमीता से अपने लगाव की बात अन्नू को बता देने पर उज्र नहीं होगा उन्हें. लगाव का पात्र यदि सबकी पसंद का हो तो उस लगाव की बात किसी अपने से बाँटने में कितना सुख होगा? वे उस सुख को भोगना चाहते थे. वे अन्नू को अपने मन की सारी बातें निर्बाध रूप से खोल कर बताना चाहते थे. उन्होंने कभी किसी से अपने मन की सारी बातें नहीं बताई थीं. कभी जरूरत ही नहीं पड़ी. एक तो उनका स्वभाव ही ऐसा नहीं था, दूसरे उनके काम ने उनको खूब उलझाए रखा, जीवन भर. आजकल लेकिन उनके अंदर एक बढ़ती हुई ललक उभर रही थी, जो लोगों से खूब बतियाना चाहती थी. लोगों को अपना सारा आज और आने वाला कल बता देना चाहती थी. इधर वे खूब बतियाने भी लगे थे, फिर भी और चाहते थे, और...और.

उन्होंने चारों ओर देखा. कमरे में पसरी हल्की दूधिया रोशनी और कम वौल्यूम में बजता संगीत एक मादक रहस्यमय वातावरण निर्मित कर रहे थे. अब परमीता हल्के हल्के थिरकने लगी थी. उसने अन्नू को भी अपने साथ थिरकने के लिए बुला लिया. देखा-देखी और जोड़े भी उठने लगे. कमरे के बीचों बीच एक डांस, फ्लोर बन गया. आरोह-अवरोह के बीच कमरे में हँसी की हल्की फुहारें, नृत्य करने लगीं. राघव रमण ने देखा, अन्नू कमरे में उपस्थित सभी लोगों से ज्यादा आकर्षक और युवा था.

वे विचित्र से अभिमान के आनंद से भर गए. अन्नू ने उनका मित्र होना चुना था और वे ही अन्नू को यहाँ लाए थे. अपनी कृति की सफलता से मदमाते कलाकार की तरह वे अपनी जगह से उठने लगे. उठने में तकलीफ हुई उन्हें. लम्बी कार यात्रा ने कमर में पीड़ा के बल डाल दिए थे. उठने के पहले शरीर आगे झुकाना पड़ा, फिर एक कदम आगे बढ़े आधे-सीधे हुए, फिर और कुछ कदम चल, दोनों हाथ पीछे कमर पर रख पूरे सीधे हो पाए. अन्नू दूर से उन्हें ही देख रहा था. कैसे देख रहा था? नियंडरथल मैन को होमो सेपियन्स में बदलते क्या? जैसे ही यह एहसास मन में आया तो, पल भर पहले अन्नू के लिए उपजा अभिमान, फिर स्वामित्व बोध, तड़कते रश्क में तब्दील हो गया. उन्होंने अघोषित, अन्चीन्हें अपमान से भर सोचा, यही-यही... सच है न कि दुनिया नौजवानों की है, और वे अब नौजवान नहीं...? इसीलिए उनके अंदर के हास्यास्पद किरदार को अन्नू ने देखा..... ऊँह. डगमगाते हुए वे परमीता के नज़दीक पहुँचे और अन्नू को चिढ़ से देखा. देख तख़लीया’,  कहा नहीं, अन्नू ने बखूबी समझ लिया. वह लिहाज़ से परमीता से अलग हो गया, और शब्दों में दूसरे आदेश की प्रतीक्षा करने लगा. यदि वह सर की इस भाव भंगिमा से चक़ित हुआ भी तो उसने नहीं दर्शाया. नियंत्रण तो नौजवानों की योग्यता नहीं, मगर यह इतना नियंत्रित क्यों है? ये बौखलाता क्यों नहीं? इन सवालों ने भी राघव रमण को परेशान कर दिया. अन्नू निर्दोष ढंग से मुस्कुराया, लेकिन राघव रमण को उसमें अनुग्रह का भाव दिखा. वे और चिढ़ गए;

सो, यंगमैन होटल वापस जाओगे? उन्होंने यंग मैन को ज़ोर देकर कहा.
जी सर, चलें?
मैं नहीं, उन्होंने परमीता आनंद को रोमानी अंदाज में देखते हुए कहा मानो दोनों के बीच के गूढ़ रहस्य को अनावृत करने का सुख अन्नू को दिया जा सकता था, जिससे अब उसे वंचित होना होगा.
तुम जाओ, यदि जाना चाहते हो तो. उन्होंने तिरस्कार से कहा.
जी. वही छोटा सा उत्तर.

वे खीजने लगे. और तो ओर अन्नू के जाने के बाद उन्हें कोई खुशी भी नहीं हुई. खोखला सा लगने लगा. खुद समझ नहीं पाए कि जिससे इतना स्नेह करते हैं, उसी से इतना कठोर व्यवहार क्यों कर रहे हैं? परमीता उन्हें नाचने के लिए उकसा रही थी. उन्होंने एक दो बार उसी की लय में अपने कंधे हिलाए. फिर परमीता को रूखाई से रोक उस मस्ती के क्षण में कह बैठे,
सारी परमीता, आज नाचने का जी नहीं, टायलेट जाऊँगा.

हाँ...हाँ वह शालीनता से बोली और घर की दूसरी मंजिल पर ले जाने लगी. वे सीढ़ियाँ चढ़ने लगे, कलेजे को हाथ में थामे, सतर्कता से. चिढ़ और थकान से उखड़ती साँसों को परमीता के सामने उद्घाटित करना कहाँ की अक्लमंदी होती?

वे टायलेट से निकले तो देखा टायलेट के बाहर लगे आईने में परमीता अपनी बिखरी लटों को सँवार रही थी. आईने के ऊपर लगे बल्व से उसका चेहरा आलोकित हो रहा था. गुलाबी, चमकदार. उन्होंने चुपके से पीछे से जाकर उसकी गर्दन की तलहटी में एक चुम्बन जड़ दिया. परमीता अनजाने पल में घिरने पर हैरत से भर गई,

ओहऽऽ! बस इतना ही कह पाई. लेकिन अगले ही पल उनके चेहरे की चमक देख, धीरे से बोली,
सर मेहमानों के जाने के बाद, कुछ देर रूक सकेंगे? वे परमीता की प्रतिक्रिया से अधिक अपनी ताकत की पुष्टि से प्रसन्न थे. उनके चुम्बन में अभी भी बड़ा दम था. चुम्बन गर्दन की तलहटी पर, बड़ी देर तक गहरा लाल बना रहा.
मेहमानों के जाने के बाद, ड्राईंगरूम में ही परमीता उनकी कुर्सी के पास जमीन पर एक बड़ा कुशन डाल बैठ गई, उनके पैरों से, उसके शरीर का बाँयाँ हिस्सा हल्के-हल्के छू रहा था.
सर, हीर सुनेंगे.
हाँ. उन्होंने आत्मविश्वास से भरी खुशी के संतोष से आँखें, आधी मूँद लीं.

परमीता गाने लगी. अपनी भारी नासीय आवाज़ में. गाते वक्त कभी-कभी वह, उनकी दिशा में देख मुस्कुराती जाती थी, इच्छा की लपट से जलती, खुशी से, हैरत से. अब उनके लिए उसके इतने पास यूँही, बैठा रहना दूभर हो गया. वे अपनी जगह से उठकर कमरे में धीरे-धीरे चहलकदमी करने लगे. वह आरोह की ओर बढ़ रही थी और गीत के दर्द से उसकी आँखें बंद होने लगी थी. वे उसे अपलक देखते रहे देर तक, और फिर समझ गए उन्हें परमीता इतनी अच्छी क्यों लगती थी. अंदर मानों एक सोता लबालब भर गया हो जैसे, वैसा महसूस करते हुए उन्होंने वह किया जो आज तक नहीं किया था, वे धीरे से झुककर परमीता के ठीक सामने बैठ गए, और बहुत एहतियात से कभी खत्म न होने वाली गिरफ्त में, परमीता के होठों को अपने होठों से बाँध लिया.
उस रात होटल लौटने पर उनके कमरे में, एक नन्हीं गौरय्या, न जाने कैसे सुबह होने से पहले ही चली आई थी और चीं-चीं करने लगी थी. वे चौंक कर उठ बैठे थे, मगर बहुत ढूँढने पर भी गौरय्या कहीं नहीं दिखी थी.
दिल्ली वापसी पर डाक्टर ने उन्हें देखते ही कह दिया,
राघव कुछ टेस्ट करवाने होंगे, जस्ट रूटीन चेकअप के लिए. बाकी तो फिट लग रहे हो. वैसे तुम आजकल अनुशासन तोड़ते जा रहे हो. खबर लगी है, मुझे....
कैसी खबर..... उनका दिल भागने लगा था कौन सी छिपी हुई बात जान गया था डाक्टर.

सुना है चंडीगढ़ में बहुत बैचेनी हुई थी तुम्हें? सफोकेशन और साँस नहीं आना जैसा कुछ. ऐसा क्या कर लिया था तुमने? हाँ? ये तो अच्छा हुआ अन्नू तुम्हारे साथ था, मगर हर बार तो वह तुम्हारे साथ नहीं हो सकता न. यू हैव टू बी केयरफुल.
उन्हें लगा वे अचानक नंगे कर दिए गए हैं और उनका शिक्षक उन्हें पूरी सच्चाई से जाहिर करवा रहा है कि वे गंदे बच्चे हैं और उन्होंने गंदे काम किए हैं. वे बेजा अपने आसपास के लोगों को तंग कर रहे हैं. अब उन्हें अच्छा बच्चा बनना शुरू कर देना चाहिए. उन्हें डाक्टर से नफरत हुई, हमेशा नन्हा बच्चा बना देता था उन्हें लेकिन उन्होंने अपनी नफरत को प्रकट नहीं किया, उल्टे भविष्य में अच्छा बन जाऊंगा वाले तरीके से हँसते हुए बोले,
मैं सावधान रहूँगा डाक्टर, आगे से किसी प्रकार की अति नहीं होगी. शायद उस दिन ड्रिंक्स...वे आगे की बात कैसे बताते? 
गुड! रिपोर्ट आ जाए तो खबर करना. इसके बाद डाक्टर चुस्ती से उठा और राघव रमण को गले लगाकर बोला,
यू आर फाईन राघव, बिलीव मी. कोई चिंता की बात नहीं है मैं तुमपे चिल्लाता जरूर हूँ लेकिन यूँही......!

इतना सुन राघव रमण के गले में कुछ अटकने लगा. डाक्टर जिसे वे इतने वर्षों से जानते थे जो कभी भावना में नहीं बहता था, आज भावुक हो रहा था, उनके लिए? क्या गर्त में जाने वाली फिसलन उनके बहुत नज़दीक पहुँच चुकी थी? उन्होंने गले में पैदा होने वाली अटकन को दबा दिया और अचानक चौकस हो गए. डाक्टर मेरी क्या देखभाल करेगा? और ये अन्नू बड़ी गोपनीय साँठगाँठ है इसकी डाक्टर के साथ. उस दिन, ऐसा भी कुछ नहीं हो गया था? ये दोनों मेरी क्या देखभाल कर पाएँगे ऊँह? ये तो सारे खुद डरे हुए लोग हैं. फिर उन्होंने अपने अंदर झाँका और समझने की कोशिश में लग गए कि, उनके अंदर क्या कोई नया डर पैदा हो रहा है? जो वे अब डाक्टर का सामना करने से भी हिचक रहे हैं? ना-ना....उन्होंने अपनी गर्दन खूब सीधी कर अपने चारों ओर देखा, और निष्कर्ष पर पहुंचे- उन्हें कभी किसी बात से डर नहीं लगा तो आज क्यों लगेगा? ’वे अपनी देखभाल खुद कर लेंगे. आज तक की है, आगे भी करेंगे आगे...आगे भी.
सोमेश का परिवार आ चुका था. उसके बच्चे के रोने की आवाज सुनाई पड़ी.
सोमेशऽऽ वे चिल्लाए,
ज़रा बच्चे को ले आओ.
सोमेश को चिड़चिड़ाहट हुई. आजकल बात बेबात उसके छोटे बच्चे को देखना चाहते हैं. फिर सोचा चलो ठीक ही है, देख कर कुछ न कुछ दे भी देते हैं.
बुलाने पर सोमेश की पत्नी सिर पर आँचल रखते हुए, दमकती चली आई. अपने पीहर वालों से मिलकर लौटी है, अभी भी मानती है, उसके अपने हैं वहाँ. सोमेश और बच्चों से अलग भी एक दुनिया है उसकी. उन्हें अच्छा लगा. महिलाओं की स्वायत्ता पसंद थी उन्हें.
ओऽहोऽ.. लड़का तो बड़ा हो गया?
लाओ, मेरी गोद में दो!
बच्चे की माँ हड़बड़ा गई, ’ये लेंगे गोद में? संभलेगा इनसे?’

सर अब इ बड़ा हो गया है. भारी है; खामख्वाह गोद लेने में आपको परेशानी होगी. उसने अटपटी स्थिति को अपने ढंग से टालने की कोशिश की और पति की ओर असमंजस से देखा. सोमेश ने इशारों में जवाब दिया, ’आजकल सनका रहे हैं, जाने दो......दे दो बच्चा गोद में.

बच्चे को उनकी गोद में डालते हुए जो बहुत हिचकी थी बच्चे की माँ, उस हिचकिचाहट को राघव रमण ने पकड़ लिया था. उन्होंने अपने बाजुओं में अपनी सारी ताकत केन्द्रित कर, बच्चे को ले उछालने दिया. बच्चा उन्हें नहीं पहचानता था, उछाले जाने पर बुरी तरह डर भी गया. ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा और गोदी से उतरने को मचलने लगा. अजीब सी रस्साकशी का दृश्य उत्पन्न हो गया. वे बच्चे को गोदी में थामे रहने को जूझने लगे. इतने में बच्चे ने उनके सिर के बालों को अपनी नन्हीं मुट्ठी में समेटा और खींच दिया. वे दर्द से बिलबिला उठे और बच्चा उनकी गोदी से लगभग गिर चुका होता अगर बच्चे की माँ ने उसे उनकी गोद से खींच न लिया होता तो. इसके बाद वह अंड-बंड कुछ बोलने भी लगी. वे हतप्रभ देखने लगे, बच्चे के किए पर माफी मांगने की बजाए, वह उन्हें दोषी ठहरा रही थी,
सर कभी बुजरूग देखा नहीं है न, इसीलिए डर गया....

वे ठक से रह गए. उन्होंने अपने टूटे बालों को हाथ में बिन कर रखा और अपने कमरे में चले गए. कमरे का दरवाजा बंद कर वे आईने के सामने खड़े हो अपने अंगों को एक-एक कर परखने लगे. दिखाई पड़ा, कंधे कुछ झुक गए है. पोस्चर खूब सीधा नहीं रहा और...और क्या भयानक बदलाव हो गया है उनमें जो डरावना लगने लगा है? क्या है? उनके बाल? सफेद हैं मगर सिर भरा हुआ है उनसे. अन्नू कहता है वे बाल उन्हें भव्यता प्रदान करते हैं. हूँऽऽ. और रंग बहुत गुलाबी नहीं रहा उनका तो बहुत उजड़ा हुआ भी नही है. हाथ पैर सलामत हैं. हाथ की त्वचा जबसे थोड़ी झूली हुई नज़र आने लगी है तभी से हमेशा पूरी बाहों के कुर्ते पहनने लगे हैं. वह भी अपनी जगह ढका हुआ सच है. सबसे अंत में वे अपनी आँखों को परखते हैं. अपनी आँखों पर वे अब भी वैसे ही रीझ जाते हैं, जैसे कालेज के दिनों में लड़कियाँ उन्हें देख रीझ जाया करती थीं.

राघव तुम्हारी आँखें कितनी बड़ी हैं?
राघव उनमें ये बच्चों जैसा कौतूहल अभी तक कैसे बचा पाए हो? उन दिनों लड़कियाँ कहती ही रहती थीं, और प्रशंसा से भर हँसती जाती थीं.

उन्होंने गौर से देखा तो पाया कि, अरे, वह कौतूहल अभी भी मौजूद है. फिर लोग उन्हें देखने में क्यों गलती कर रहे हैं? वे राघव को ठीक से समझ क्यों नहीं पा रहे हैं? कायदे से लोगों को समझना चाहिए यदि किसी और वज़ह से ना सही, तो भी राघव रमण को दुनिया की अभी कितनी बातें देखनी बाकी हैं. और बस इतनी ही वजह क्या काफी नहीं है और वर्षों तक सक्रिय रहने के लिए, जीवन जीने के लिए? अगर लोग देखना चाहेंगे, तो देख ही लेंगे उनके अन्दर का वही कौतूहल तो आँखों में बसा हुआ है. उन्हें अपनी आँखें बहुत पसंद हैं और वे उन्हें बचाए रखेंगे.

उन्हें बिल्कुल समझ में नहीं आया कब उनका घर उनको ले हवा में उड़ने लगा था, एक दिन. उन्होंने खिड़की से झाँक कर नीचे देखा तो पाया अरे वे तो बहुत ऊपर थे, बादलों के पास.नीचे दिल्ली शहर था, और सुबह का लोदी गार्डन भी.अरे वह तो अन्नू है, उन्होंने किलक कर देखाअन्नू आज टहल नहीं रहा है, दौड़ रहा है, तो क्या उसे टहलने से ज़्यादा दौड़ना पसंद है? रोज जो वह उनके साथ टहलता है, उसके पीछे कोई दबाव है क्या? उन्हें खुश करने का दबाव? उन्हें सहज बनाए रखने का दबाव? नहीं-नहीं यह ठीक नहीं. उन्होंने तय किया कि वे आज ही अन्नू से साफ-साफ कह देंगे देखो अन्नू तुम्हें दौड़ना पसंद है तो दौड़ो, और जब पसंद है तब दौड़ो, मेरे साथ रोज़ मिलकर टहलने की यह कयावद जरूरी नहीं. इतना सोचते ही उन्हें लगा, पहले वाली बात कह देंगे, दूसरी वाली (रोज न मिलने वाली) कह भी सकते हैं और नहीं भी और यदि भूल से कह भी देते हैं तो थोड़ा जल्दी से कह देंगे, धूल उड़ाती लापरवाही से, क्योंकि अन्नू रोज नहीं मिलेगा तो...? उन्हें घर के साथ हवा में उड़ते हुए अन्नू की पसंद के बारे में ऐसा बोध हुआ, इसके लिए उन्हें घर के अंदर बिठाकर तागों से उनके घर को बाँध उड़ा रहे हैं बच्चे पर बड़ा प्यार आया, वह जो लटाई लिए हुए था और रंगबिरंगी पतंग उड़ा रहा था. डोर अपने हाथ में रखे हुए है शैतान.

सोमेश की समझ से बाहर की बात थी यह, ’जिस लड़के ने इतना तंग किया था कल, उसी के लिये सुबह सुबह नींद से जग, पाँच सौ का नोट पकड़ा रहे थे सर, यह कहते हुए कि बच्चे के लिए नए कपड़े ले लेना.
कैसे समझाते सोमेश को राघव रमण कि बच्चे द्वारा हवा में उड़ाया जाना कितनी अद्भुत घटना थी. आकश में उड़ना, कितना भार-रहित हो जाना है. चंडीगढ़ से लौटने के बाद पहली बार इतना हल्का लगा था उन्हें.
अन्नू से मिलने पर लिहाज़ा निहायत खुलेपन से पूछा था उन्होंने, उसी स्नेह से, जिससे भर वह अन्नू से मिला करते थे चंडीगढ़ जाने से पहले,
अन्नू दौड़ते हो तुम, मतलब दौड़ना पसंद है तुम्हें?
जी, सर.
पहले दौड़ता ही था.. बोल वह चुप हो गया.
शायद उसे लगा होगा सर इसमें भी कोई अवांतर अर्थ न ढूँढने लगें और परेशान हो जाएँ.
तो दौड़ा करो यार, जब मन में आए. जब मैं वहाँ टहलूंगा तो तुम वहाँ दौड़ना.
मन की बात भक्क से निकल गई अन्नू के.
सर, मैं शहर मैराथन में दौड़ने वाला हूँ, सोच ही रहा था, अब आपने भी कह दिया है तो दौडूंगा ही दौडूँगा. वह चंचल हो उठा था.

जानते हो? वे धीमे से बोले, मानों यदि यहाँ उन्होंने जल्दी कर दी तो बात की महत्ता कहीं खो जाएगी. मेरा भी स्वप्न है, शहर मैराथन! अन्दर एक पंछी फड़फड़ाने लगा. वह क्यों इतने दिन कैद रहा? आज़ाद हवा में उड़ने की उत्तेजना को उद्घाटित कर रहा था पंछी. उनके पैर उत्तेजना में धीरे धीरे काँपने लगे.
अरे वाह सर, ये तो बड़ी अच्छी बात है. लेट्स डू इट.

अन्नू के उत्साह पर उन्हें थोड़ी चिंता होने लगी. अन्नू महज हौसला अफज़ाई तो नहीं कर रहा? बातों को गुलाबी शायरी की तरह वाह-वाह कर भुला तो नहीं देगा? उन्हें अच्छा नहीं लगेगा. वे बहुत गंभीरता से अपनी बात कह रहे हैं. अन्नू को बात की गंभीरता की कद्र करनी चाहिए. सचमुच उनका स्वप्न है यह.

ग्रीस था या रोम... याद नहीं पड़ रहा. कोई प्राचीन ऐतिहासिक शहर था जहाँ चालीस वर्ष पहले इसी तरह का मजमा देखा था उन्होंने. वहाँ की तरह यहाँ भी भीड़ थी कि बढ़ती जाती थी. वेन्यू खचाखच भरा था. लगता था सारे दिल्ली वाले यहीं जमा हो गए थे. सब दिल्ली मैराथन शुरू होने का इंतजार कर रहे थे. चालीस साल से वे भी इंतजार कर रहे थे. उन दिनों जब ग्रीस या रोम में साँस रोक जो दौड़ देखी थी, वह ऐतिहासिक इमारतों से शुरू होकर कहीं गुम हो गई थी. फिर कहीं और जाकर खत्म हुई थी किसी नए स्टेडियम में.

ऐसा ही कुछ आज भी होने वाला है. वे तैयार हैं. पूरी तरह तैयार. एक...दो...तीन, सीटी बजी और अब सब दौड़ने लगे हैं. राघव रमण की गति, सब तैयारियों के बावजूद दूसरों से कम है लेकिन वे इससे विचलित नहीं दिखते हैं. वे दौड़ रहे हैं, खुशनुमा नीली टी शर्ट और शाटर््स पहने. बचपन में ऐसे आसमानी नीले कपड़े पहनने पर माँ कहती थी, ’कितना सुंदर लग रहा है मेरा बेटा’, आज भी ज़रूर वे वैसे ही सुदर्शन लग रहे होंगे, क्योंकि लोगों की नज़र उन पर रह रहकर टिक जा रही थी. लोग-बनाम-दर्शक उन्हें गौर से देख रहे हैं. वे खूब दौड़ रहे हैं. कुछ देर बाद लगता है वे थकने लगे हैं. उन्होंने दौड़ते हुए ही, साईडटेबल पर रखे पानी के पाउच को उठा लिया है और दौड़ते हुए उसे खोल कर पीने लगे हैं उन्हें पता है, कि उन्हें साँसों को उखड़ने से बचाना है वर्ना डाक्टर उन्हें बिस्तर से बाँध देगा या अस्पताल में भर्ती कर देगा. 


वे अपनी आज़ादी खोना नहीं चाहते हैं लिहाजा सीमित गति से दौड़ रहे हैं. वे देख रहे हैं, सब पीछे छूटता चला जा रहा है. अब लेकिन उनका मुँह लाल होने लगा है. उन्हें खाँसी भी आने लगी है, मगर वे ठान चुके हैं, आज उन्हें अपनी दौड़ पूरी करनी ही होगी, लिहाज़ा वे रूकते नहीं. वे देखते जा रहे हैं रास्ते में हरे भरे पेड़ हैं, स्वस्थ सुंदर लोग हैं, दिल्ली की जानी पहचानी सड़कें हैं; और एक जगह तो उन्हें वह आम का पेड़ भी दिखलाई पड़ गया, जिसे उन्होंने दिल्ली के अपने पिता के आवास में, बचपन में रोपा था इस आशा के साथ कि गुठली को रोपते ही, पेड़ उग जाएगा, बढ़ जाएगा और ढेरों फल देने लगेगा. उनका जादुई पेड़ होगा वह. ऐसा जल्द हो जाए, उसके लिए कुछ अगड़म-बगड़म जादुई मंत्र भी पढ़े थे उन्होंने. आम का कैसा लोभ था उन्हें. बाद में पिता का वह आवास छूट गया था और वे, दिल्ली के कई ठिकानों के रिहायशी हुए थे, लेकिन इस पेड़ की याद बनी रही थी. कुछ यादें कैसे हमेशा बनी रहती हैं. उन्हें एक-एक कर अपनी पसंदें याद आ रही हैं. उन्हें दिल्ली बहुत पसंद है, उन्हें गौरय्या चिड़िया बहुत पसंद हैं. उन्हें परमीता भी बहुत पसंद है, उन्हें अन्नू पसंद और इन सबसे ज़्यादा और......और उन्हें आम बहुत पसंद हैं. उन्हें पसंद है...चुनौती, उन्हें अपने हक में हल भी बहुत पसंद है, इसीलिए आज उन्हें दौड़ पूरी किए बिना चैन नहीं मिलेगा.

वे लगातार दौड़ते जा रहे हैं, समय बीतता जा रहा है, क्या बहुत देर लगा रहे हैं वे? कौतूहल से भरी उनकी बड़ी आँखें और खुल गई हैं. लगता है पूरा दृश्य पी जाएंगी, वे बड़ी हो रही हैं... और बड़ी. वे देख रही है वृत्ताकार दृश्य' के भीतर एक केन्द्र है, और वह बदलता जा रहा है. आज केन्द्र में अन्नू दिख रहा है, सामने. अरे, अन्नू तो दौड़ पूरी कर आ रहा है. वह उन्हीं के पास सबसे पहले आ रहा है. अब सबकुछ गड्डमड्ड हो रहा है. अरेरे... यह क्या, अब वे वे अन्नू हो गए हैं. वे दौड़ पूरी कर आ रहे हैं, अपनी तरफ, अपने से मिलने.
बधाई-बधाई-बधाई.
वे अपनी जगह पर खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं, मगर चारों ओर बहुत सारे लोग हैं, बड़ी आपाधापी है. वे हतप्रभ हैं. यह क्या हो रहा है? चारों ओर इतना शोर क्यों है? बाहर का शोर उनके भीतर भरने लगा है. उनके शरीर के तंतु नतीजे का संदेश मस्तिष्क की कोशिकाओं से चारों ओर संचारित करने का प्रयास करते हैं. 

राघव रमण पहले की अपेक्षा ठीक पैंतीस सेकेंड बाद शोर के सत्य को समझ पाते हैं. उस शोर से बचने के लिए राघव रमण को अपने कान बंद कर लेने चाहिए थे, मगर उन्होंने अपनी आँखें मींच लीं है.

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