मैं कहता आँखिन देखी : उदय प्रकाश से संतोष अर्श की बातचीत

Posted by arun dev on फ़रवरी 09, 2019




























उदय प्रकाश साहित्य में अब एक वैश्विक उपस्थिति हैं. उनके कथा-संसार का विश्व की अनेक प्रमुख भाषाओँ में अनुवाद हो चुका है, कई राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सम्मान उन्हें मिले हैं, सत्ता के प्रतिपक्ष के एक जन-प्रतिनिधि के तौर पर अब वे जाने जाते हैं.

उदय प्रकाश से संतोष अर्श की इस महत्वपूर्ण बातचीत में उनके जीवन और साहित्य के प्रसंगों के अलावा भारतीय समाज की जटिल बनावट की एक गहरी समझ भी हमें देखने को मिलती है, वे तमाम बंधी अवधारणाओं पर सवाल उठाते हैं.

उनके उपन्यासों की ही तरह रोचक और बौद्धिकता से भरपूर यह उत्तेजक बातचीत ख़ास आपके लिए.





गेंदे के एक फूल में कितने फूल होते हैं पापा !               
उदय प्रकाश से संतोष अर्श की बातचीत



(यह दिल्ली की प्रदूषित और तीखी ठंड वाली 10, जनवरी, 2018 की शाम है जब संतोष अर्श और पूर्णिमा कुमार उदय प्रकाश के आस्ताने पर पहुँचते हैं. लेखक की पत्नी कुमकुम जी हमें दरवाज़े पर लेने आती हैं. सर्दी अजीब सी है, जलवायु परिवर्तन से आक्रांत सर्दी. ठंड कुछ ज़्यादा ही ठंडी और चुभन भरी है. संतोष अर्श जिस लेखक से मिलने पहुँचे हैं उसने कुछ ही दिन पहले लेखकों की हो रही हत्याओं के विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया है और मौज़ूदा सत्ता की हिटलरी मूँछ से एक बाल उखाड़ने की हिमाकत की है. घर में समृद्ध जीवन-शैली की चमक और धमक है. संतोष अर्श हिंदी-लेखक का ऐसा रहन-सहन देख कर थोड़ा ठिठकते हैं. लेकिन कुछ देर बाद उदय प्रकाश भीतर से आ कर क़रीने से सजे हुए दीवानख़ाने में बैठते हैं. संतोष अर्श संयत हो जाते हैं. लेखक की मौज़ूदगी आगंतुकों को सहज अनुभव कराती है. सामने कुमकुम जी भी जलपान रख कर बैठ जाती हैं.     
    
वह साठ के ऊपर का लेखक है और हँसता है बच्चों की तरह. उसका स्मित जादुई यथार्थवाद है और उसके हाव-भाव में उसके लेखन जैसी त्वरा है. भौंहें रुपहली हो चुकी हैं और माथे की शिकन बढ़ने-घटने के साथ चाँदी सी चमकती हैं. लेखक वार्तालाप के बीच में अंग्रेज़ी बोलने का आदी है. वैश्विक साहित्यिक-राजनीतिक संदर्भों को वह अपनी बातों में विश्वकोशीय लहजे में इस्तेमाल करता है. उसमें साहित्य पर बात करने की अद्भुत ऊर्जा है. वह अपनी उम्र से आधे से भी कम उम्र के युवा से बात कर रहा है. उसकी आँखों की चमक में कहीं करुणा है तो कहीं जलते-बुझते चिरागों की रौशनी. लेखक के स्वर में साहित्यिक साहस है, ओज है, जो हेमिंग्वे की बात स्मरण दिलाता है कि, एक कायर आदमी कभी अच्छा लेखक नहीं बन सकता.  
    
हम दो-तीन घण्टे लगातार बातचीत करते रहे. लेखक मेरे असाक्षात्कारीय प्रश्नों के उत्तर भी देता रहा और कहता रहा कि इंटरव्यू फिर कभी ले लेना. उस लंबी और यादगार गुफ़्तगू में से कुछ बातें चुनकर कर यहाँ अवाम के बीच रख रहा हूँ. इन बातों में उदय प्रकाश के निजी जीवन के दुर्लभ क़िस्सों के साथ-साथ मौज़ूदा समाज, भाषा-साहित्य और राजनीति के रंग-ढंग भी पेश हुए हैं. यह पूरी बातचीत नहीं है, एक क़िस्त है. : संतोष अर्श ) 




संतोष अर्श : आपको अनूपपुर (मध्य प्रदेश) से दिल्ली क्यों आना पड़ा? ऐसी क्या ज़रूरत थी, जो दिल्ली खींच लाई ?





उदय प्रकाश: मेरी माँ जो थीं न! उनकी मृत्यु हो गयी थी, जब मैं ग्यारह साल का था. कैंसर से. और कैंसर से मेरा भी साथ देखिए कि अभी-अभी कैंसर हॉस्पिटल से ही लौटकर आ रहा हूँ. तो उस समय बहुत छोटा था. मेरे पिता जी फ़्यूडल वर्ग से थे. फ़्यूडल क्लास में बुराइयाँ बहुत होती हैं, किन्तु कुछ अच्छाइयाँ भी होती हैं. मार्क्स ने भी यह बात लिखी है. अच्छाई यह कि उसमें भावुकता बहुत होती है. इसमें जो रिलेशन होते हैं वे स्टेटिक होते हैं. और उसको एनालाइज़ भी किया गया है, कि जो भूमि-संबंध होते हैं वही उत्पादन के साधन बनते हैं. मोड ऑफ प्रोडक्शन इज़ लैंड. तो ज़मीन जो है वो चलती नहीं है. स्टेटिक रहती है. इससे जो रिश्ते बनते हैं, स्थिर होते हैं. और इसीलिए जितने भी मॉडल हैं आपके पास रिलेशंस के, आज भी, वो सब फ्यूडलिस्ट हैं. चाहे वो किसी का भी लें. शीरी-फ़रहाद, लैला-मजनूँ. सब में पायेंगे आप. तो ऐसा है. मेरे पिता बहुत भावुक थे. एंड ही वाज़ रियली टू अटैच्ड विथ माय मदर. तो मेरी माँ की जब मृत्यु हुई तब वो सैंतीस साल की थीं. थर्टीसेवन. और माँ की मृत्यु के बाद....

हमारे यहाँ क्या होता है कि दशगात्र वगैरह होता ही है. तेरहवीं भी होती है. फिर बीसर होता है बीसवें दिन. अब तो लोग ये सब नहीं मानते हैं, लेकिन उन दिनों होता था. तो बीसर के दिन से पीना-वीना, नॉन वेजेटेरियन, बिरादरी सब शुरू हो जाता है. तो बस उसी दिन से जब उन्होंने पीना शुरू कर किया...! अलमोस्ट ही स्टार्टेड सुसाइडल ड्रिंक एण्ड ही बिकेम एल्कोहलिक. और मैं जैसे ग्यारह साल का भी नहीं हूँ. और जो बहन थी छोटी वाली वो बहुत ही छोटी थी. पाँच साल की थी. और मेरे जो बड़े भाई थे उनकी शादी हो चुकी थी. एक बहन और थी वो शादी हो के जा चुकी थी. तो हम दो ही बचे थे. मैं और छोटी बहन. और पढ़ने का बहुत मन था. मैं शुरू से ही थोड़ा सा अलग था. कैमरा एक से उधार लिया था. चित्र भी बनाता था. पेंटिंग से ही शुरुआत हुई थी. कविताएँ लिखता था. माँ जो थीं, वो भी !! गाती भी थीं. भोजपुरी की थीं वही बोलती थीं. तो वही गीत गाती थीं, जैसा गाना अभी आपने सुनाया, वैसे ही. (संतोष अर्श ने उन्हें अपने फ़ोन में संग्रहीत अवधी के कुछ निर्गुण सुनाये थे, ननकी यादव के स्वर में)

पहले बहुत कम उम्र में शादी हो जाती थी. बारह-तेरह साल की उम्र में. तो वहाँ से जब आईं थीं तो एक सहेली भी आ गई थी उनके साथ. एक नोटबुक भी उनके साथ थी. जिसमें गीत लिखे हुए थे. चैती वगैरह और जो होते थे सभी. तो वो गातीं थीं तो गाँव की औरतें भी आ जातीं और वे भी साथ-साथ गातीं थीं. तो ये लगभग चलता ही रहता था. लेकिन उनकी हैंडराइटिंग बहुत अच्छी थी. और हर हर गाने के शुरू में वो कॉपी में एक चित्र बनाती थीं. चिड़िया या फूल-वूल कुछ भी. तो...(हँसते हुए) वो मुझे बहुत...! बहुत ज़्यादा फैसिनेट करता था. मैंने उसी की कॉपी करनी शुरू की. मैंने कोशिश की, कि मैं उनके जैसा चित्र बनाऊँ और उनके जैसी हैंड राइटिंग में लिखूँ. तो ये शुरुआत थी. कविताएँ लिखनी शुरू कीं. चित्र बनाने शुरू किए. एंड आई वाज़ आल्सो टू अटैच्ड विथ माय मदर. लेकिन उनकी मृत्यु के बाद ये हुआ कि पिता बहुत ज़्यादा पीने लगे, तो लोगों को लगा कि इनको इस स्कूल से निकाल दिया जाय. तो मैं वहाँ से शहडोल आ गया. आठवीं पास करके, नवीं से. उसी उम्र में.

ग्यारह साल की उम्र में. माँ की मृत्यु हुई है 1964 में. दिसंबर में. और मैं 1965 में, वही जो एडमिशन का समय होता है, शहडोल आ गया. शहडोल डिस्ट्रिक्ट टाउन है और शहर है. तो वहाँ कुछ समय के बाद मिल गए मुझे एक टीचर. इनका नाम है मोहन श्रीवास्तव. वे हायर सेकेन्डरी में पढ़ाते थे. और देखते थे कि ये लड़का चित्र बनाता है और कविताएँ लिखता है. तो उन्होंने जब देखा तो अच्छी-ख़ासी, ठीक-ठाक कविताएँ थीं. (हँसते हुए) और चित्र भी ठीक थे, ज़रा मॉडर्न पेंटिंग थी. तो उनको लगा थोड़ा सा अलग है ये. तो उन्होंने परिवार के बारे में जाना. देन ही इज़ एक्चुअली आई कन्सीडर माय सेकेंड फादर.

और मेरे पिता कैंसर से ख़त्म हो गए. ही डाइड इन कैंसर !! बल्कि वो जो दरियाई घोड़ा कहानी है पिता की मृत्यु पर ही आधारित है. उसमें भी कैंसर है. ....और  फिर उसके बाद मैं कम्युनिस्ट पार्टी में आ गया. सोलह साल की उम्र में.



संतोष अर्श: यानी कम्युनिस्ट पार्टी में आप मध्य प्रदेश से ही आ गए थे ?

उदय प्रकाश: शहडोल...शहडोल..बल्कि वहाँ के एआईएसएफ़ का संस्थापक हूँ मैं. और काफ़ी काम किया. उसमें क्या है, कि देखिए, आज तो बहुत आसान है... उस समय चाइना वार के बाद, 62 के बाद 64-65 में कम्युनिस्ट होना आज का माओवादी होना था. कभी भी एनकाउंटर हो सकता था. कभी भी आप अरेस्ट हो सकते थे. कुछ भी हो सकता था. उस समय आसान नहीं था. लेकिन हिम्मत भी थी और थोड़ा सा... (हँसते हुए) दिमाग़ में बैठ गया था, कि नहीं...समाज को बदलना है. बहुत ईमानदारी से काम करते थे. तो काम किया... और फिर सागर आ गया और सागर इसलिए आया क्योंकि वहाँ से रिस्टिकेट हो गया. शहडोल की यूनिवर्सिटी से मैं पहला था, जिसे रिस्टिकेट किया गया था. केसेज़ बहुत हो गए थे ऊपर. क्योंकि इनके लोग इंप्लीकेट कर देते हैं. इलेक्शन हो रहा था कॉलेज में, मैं खड़ा था प्रेज़ीडेंट के लिए. और होता है कि मारपीट होती है. मारपीट हुई तो हम लोग भी थोड़े से ज्यादा मिलिटेंट थे, हम लोगों ने भी मारा. इस पर इतनी उन्होंने दफ़ाएँ लगा दीं जितनी डाकू मलखान सिंह के ऊपर थीं. (कुमकुम जी इस बात पर खिलखिला पड़ीं) एक साल वो बर्बाद हुआ. फिर सागर आ गया.

सागर में भी ख़ूब काम किया. जबकि सागर में...!! यह जो पीली छतरी वाली लड़की है वह पूरा सागर विश्वविद्यालय का ही वृत्तांत है. वही एज़ थी अट्ठारह-उन्नीस साल की. तो लव-अफ़ेयर वगैरह उसमें होता ही है. प्रेम और रिवॉल्यूशन सब साथ-साथ चलता है. फिर वहाँ रहा. उसी दौर में  इमरजेंसी लग गई. इमरजेंसी को ऊपर से सीपीआई की लीडरशिप सपोर्ट कर रही थी. कम्युनिस्ट पार्टी के लोग उसे सपोर्ट कर रहे थे, लेकिन ग्रासरूट पर हम पकड़े जा रहे थे और आरएसएस वाले ही पकड़वा रहे थे. ...और सब उन्हीं के हाथ में है...आज भी सबकुछ...(हँस पड़े) हर जगह है... आप जानते ही हैं.



संतोष अर्श: इमरजेंसी को तो आरएसएस ने कैश किया बहुत क़ायदे से ?

उदय प्रकाश: बहुत-बहुत...!! फिर वहाँ से भागना पड़ा. क्योंकि वारंट हो गया. बल्कि बड़ी इंटरेस्टिंग कहानी है. एक कॉमरेड जगदीश पाण्डेय थे. वे लड़के ही थे और उनकी शादी हो रही थी. तो हम लोग वहाँ उनके गाँव में गए हुए थे. वहाँ पर खाना-पीना हुआ जैसा कि होता है कॉमरेड्स में. रात में लौट कर आए टैगोर हॉस्टल में कमरा नंबर दस था. मैं और जगदीश तिवारी दोनों रूममेट्स थे. दोनों लोग नशे में धुत्त थे. तो... लौट कर आए तो देखा वहाँ पर एक बड़ा सा ताला लगा हुआ है. हमने सोचा यह क्या हो गया ? फिर लगा शायद कुछ रह गया होगा मेस-वेस का (बाक़ी, उधार) इसलिए वार्डन ने ताला लगा दिया है. वार्डन थे एक राय. उनको जाकर रात में हल्ला मचा कर जगाने लगे. वो उठे तो काँप रहे थे. बोले, “कहाँ आए हो तुम लोग ?”… भागो...!! बोले, पुलिस ने शायद रेड किया है हॉस्टल में और तुम लोगों के रूम से कट्टे बरामद हुए हैं. और तमाम किताबें भी बरामद हुई हैं. हमारे कमरे से जो देसी कट्टे होते हैं... बरामद हुए थे. तो हो गया फिर. भागे वहाँ से. एक पुरुषोत्तम सेन थे ! हमारे कॉमरेड परसू. अब तो कम है, लेकिन उस समय छूरेबाजों की ज़रूरत होती थी, कि थोड़ा सा अपने डिफेंस में रहे कोई.


परसू मशहूर छूरेबाज़ थे. पुरुषोत्तम सेन परसू मशहूर लड़ाके थे. सागर में दो गुट हुआ करते थे. एक ओर कांग्रेस और आरएसएस को मिलाकर उत्तम खटिक थे. वे भी बड़े छूरेबाज़ थे. दूसरी ओर हमारी यानी लेफ्ट की तरफ से परसू थे. वे भी बड़े एक्सपर्ट थे. अगर किसी को मारना है तो धाराओं में बात करते थे. पूछते थे कि 327 कराना है, कि 302 कराना है, या 307 कराना है....तो उनके यहाँ रात में छुपे रहे और जब कुछ अप्रोच किया गया तो शिव कुमार मिश्र लेफ़्ट के बहुत ऑनेस्ट व्यक्ति थे, जो आपके गुजरात के आनंद में भी रहे. वे बहुत सहानुभूति रखते थे और जिनको अभी मिला है... साहित्य अकादमी !! रमेश कुंतल मेघ... उनके भाई हैं. रमेश कुंतल मेघ से मैं जेएनयू में मिला हूँ,… एक बार. जब भाग कर आया था शहडोल से सागर और शिव कुमार मिश्र से मिला था तो उन्होंने दूसरे-तीसरे दिन ही वह फाइल दे दी थी जो रमेश कुंतल मेघ उनके घर पर  छोड़ गए थे. उसमें चे ग्वेरा से जुड़ी जितनी न्यूज़ थीं, वह कटिंग काट-काट कर उन्होंने चिपका रखी थी. और तब तक मैंने चे ग्वेरा की जो वेंसेरेमॉस है उसका अंग्रेज़ी अनुवाद पढ़ डाला था. तो शिवकुमार मिश्र ने वो फ़ाइल दी और कहा कि उदय तुम जेएनयू चले जाओ. “वहाँ नामवर आया है, नामवर आया है.”... (देर तक हँसते हुए) उन्होंने एक चिट्ठी भी लिखी. परसाई जी ने भी चिट्ठी लिखी. फिर वो लेकर...!! हम चार-पाँच लोग जेएनयू आए थे....पता नहीं आप उनको जानते भी होंगे कि नहीं...!! सुधीर मिश्रा भी...! जो फिल्म मेकर हैं...!! 



संतोष अर्श: हाँ...हाँ... जानता हूँ !! ये साली ज़िंदगी जिन्होंने बनाई थी.... 

उदय प्रकाश: वह सोशलिस्ट थे. एसयूसीआई में थे. मैं, सुधीर मिश्रा, विभूति दत्त झा, परशुराम हरनेपाल, हम चार-पाँच लोग आए थे. तो हुआ क्या...? सिर्फ़ मेरा एडमिशन हुआ. और एडमिशन बिना नामवर जी की सिफ़ारिश के हो गया. अब तक मैं न उनसे मिला था और न ही उनको शिव कुमार मिश्र की चिट्ठी दी थी. क्योंकि मैं पढ़ने-लिखने में ठीक था. अगली बार सुधीर मिश्रा का भी हो गया, सुधांशु का भी हुआ था जो उनके छोटे भाई थे. वह भी बहुत टैलेंटेड थे और विभूति दत्त झा का भी हो गया. लेकिन एक साल के बाद हुआ. लेफ़्ट में जितने भी टैलेंटेड पढ़ने-लिखने वाले लोग थे सागर में...तो इस तरह जेएनयू आ गए.

हम लोग विरोध करते थे इमरजेंसी का... और जो यह टेपचू कहानी है, वह यहीं लिखी गई. इमरजेंसी के दौरान इसको पढ़ते थे. रात में मानसरोवर जाते थे, दिल्ली विश्वविद्यालय भी जाते थे. उस समय एक आरएफ़एसआई (RFSI) बन गई थी. रिवॉल्यूशनरी एसएफआई. इसी की तर्ज़ पर हमने एक आरएआईएसएफ (RAISF) बना लिया था रिवोल्यूशनरी एआईएसएफ़ (ठहाका लगाते हुए) तो टेपचू उसी समय लिखी गई थी और बहुत पॉपुलर हुई. 



संतोष अर्श:  दिल्ली में आपने बहुत संघर्ष किया है. किया जा चुका जो संघर्ष होता है, वह उन लोगों को बहुत ऊर्जा देता है, जो संघर्ष कर रहे होते हैं. तो दिल्ली के अपने संघर्ष को उदय प्रकाश कैसे बयान करेंगे ?

उदय प्रकाश: संघर्ष...(देर तक सोचते हुए) क्या कहेंगे उसको !! क्या होता है न.., आपको टारगेट कर लिया जाता है. यू आर मार्क्ड !! और उसका रिजल्ट होता है आपका स्ट्रगल. आपके पास सब कुछ है ! आपके पास प्रतिभा है, आपके पास योग्यता है, क्षमता है ! हर कोई जानता है कि ही कैन बिकम ए वेरी गुड टीचर ! अ गुड ऑफिसर, व्हाटएवर !! बट यू आर टैलेंटेड एंड दे डोंट ट्रस्ट यू. तो यह होता है. तो ये जो नतीजा निकलता है, इसको आप संघर्ष भी कहिए, ये डिफ़रेन्स है. एक तरह का विंडक्टिवनेस भी कहिए. यानी आप संघर्ष भी कर रहे होते हैं और एक तरफ से आपको सजाएँ भी मिलती चलती हैं. मेरी बात समझिए. यानी आप हैं किसी और डिसिप्लिन के... मान लीजिए आपने बॉटनी में एक्स्पर्टाइज़ किया और अब आपको पूरे बॉटनी के क्षेत्र में कहीं नहीं घुसने दिया जा रहा है. तब पता लगा आप फिल्म बना रहे हैं या और कुछ कर रहे हैं.


तो स्ट्रगल ये देता है... कि बहुत सारे काम आपको अपनी आजीविका के लिए ऐसे करने पड़ते हैं जिन्हें आपने सोचा नहीं हैं. लेकिन बाद में आप ये रियलाइज़ करते हैं कि उन सबने आप में कंट्रीब्यूट किया. आप हर जगह से सीखते गए. और आप के अनुभव का दायरा बढ़ता गया. ये होता है. आर्थिक कठिनाइयाँ आती हैं. लेकिन कभी-कभी बहुत अधिक हो जाता है....  जैसे हमारी शादी हो गई थी (कुमकुम जी को ओर इशारा करते हुए). बहुत पहले हो गई थी. मेरे ख़याल से उन्नीस साल की ये थीं और पच्चीस साल का मैं था. शादी जेएनयू में हुई थी. इन्होंने फ्रेंच और स्पेनिश में पोस्ट ग्रेजुएशन किया हुआ है...पुर्तगीज़ में भी. तो ये सोच लिया था कि शादी करनी है. और मैं सच कहता हूँ कि मैंने कभी कास्ट सिस्टम में बिलीव नहीं किया. मैं विरोधी रहा हूँ...!! सिंस वेरी बिगिनिंग. हमारी इंटरकास्ट मैरिज थी. बल्कि हम लोगों को बहुत सारे कॉम्प्लीमेंट आए... (मुस्करा कर) सारिका से लेकर अन्य हिंदी-अंग्रेज़ी के पत्र-पत्रिकाओं, अख़बारों में. और आप सोचिए, उस समय !! यह 1976-77 का समय था. हम लोगों  ने (कुमकुम जी की ओर स्नेह से देखते हुए) साथ काम किया और काफ़ी मेहनत की. इन्होंने भी...दोनों ने की. लेकिन यह हुआ कि एक समय पैसे नहीं थे. बच्चे भी हो गए थे. तो बहुत सी जगहों पर रहे. जैसे कि टाइप वन में रहे ! जहाँ पर सफ़ाई कर्मचारी रहते हैं. और एक कमरा होता था, जिसमें हमने एक फोल्डिंग बिछा लिया और एक उठा कर दीवार से लगा दिया और वहीं कोने में खाना बना लिया. उसी में कुछ कर लिया.

उसी में बाबा नागार्जुन भी आते थे. त्रिलोचन जी भी आते थे. केदार जी भी आते थे...कभी-कभी. मैरिड मेंस हॉस्टल में चले गए. वहाँ भी एक कमरा था. (कुछ क्षण मौन रह कर) ...तो यह ज़रूर है  कि जब आप पढ़ते-लिखते हैं, थोड़ा सोचते हैं, तब आर्थिक कठिनाइयाँ होती हैं, लेकिन वह इतना कष्ट नहीं देती. आपका लक्ष्य कुछ और रहता है. और अगर नौकरी ही पाना जीवन का लक्ष्य बना लें तो फिर हताशा ज़्यादा होती है. ...ये भरोसा भी रहता था कि कुछ ना कुछ कर लेंगे. ...और बहुत काम किये. इंटरप्रिटर (दुभाषिए) के काम किए. ट्रांसलेशन तो भरपूर किये. एक समय होता था कि लगातार ट्रांसलेशन. तो यह सब हुआ. मेरा यह मानना है कि रहा जा सकता है, एज़ अ एक्सक्लूसिव रैडिकल फ्रीलांसर...!! वन कैन रिअली सरवाइव व्हाइल लर्न एंड ग्रो. बस यह है कि उसमें लगन चाहिए. अनुशासन चाहिए. जितना किसी नौकरी में होता है उससे ज़्यादा डिसिप्लीन आपकी फ्रीलांसिंग में होनी चाहिए. डेडलाइंस आप को मीट करनी होती हैं. बहुत सारा प्रेशर रहता है. तो वह भी है.

फिर नौकरी भी की मैंने बीच-बीच में. जेएनयू में ही मेरा अपॉइंटमेंट हो गया. और अपॉइंटमेंट भी इन लोगों के ना चाहने पर हुआ क्योंकि नारायणन बन गए थे वाइस चांसलर. के. आर. नारायणन. जो बाद में राष्ट्रपति बने. वह हमारे वी.सी. थे. और इंटरव्यू हो रहा था नामवर जी नहीं चाहते थे...! इंटरव्यू में नारायणन जी को लगा कि नहीं, दिस ब्वाय इज़ ब्रिलिएंट...और उन्होंने वहीं कह दिया. तो नौकरी मिल गई. असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हो गए जेएनयू में ...!! जल्दी ही हो गए. उससे भी बड़ी मुसीबतें पैदा हुईं. लोगों को लगा कि आया और उसको नौकरी मिल गई. तो यह बताने लायक नहीं है. वहीं के हिंदी विभाग के लोगों ने मेरे खिलाफ़ प्रोपेगेंडा करना शुरू कर दिया... कि ये जो उदय प्रकाश है बिहार की पत्रिकाओं में सेक्स पर आर्टिकल लिखता है. यह झूठ था... बिल्कुल झूठ था लेकिन कहीं से लिखकर, उसे मेरे नाम से छपवा कर लेकर चले भी आए और डिस्ट्रीब्यूट भी कर दिया. मैं भी बहुत यंग था. मैंने उनको कहा कि क्यों झूठ बोलते हो ? पीटा भी उनको !! मारपीट भी की. स्टूडेंट वर्सेज़ टीचर का मामला बना.

चूँकि मैं स्टूडेंट भी रह चुका था. और सब जानते भी थे... तो यह सारा प्रोपेगेंडा फ्लॉप कर गया. उससे कुछ हुआ नहीं, लेकिन इस तरह की कठिनाइयाँ आईं. तो ये जो कांसपिरेसीज़ हैं, बहुत होती हैं. इसीलिए मैं कहता हूँ कि पीली छतरी वाली लड़की जरूर पढ़ा जाना चाहिए...कि लैंग्वेज़... भाषा जो है न...!! वह जितना कंज़रवेटिज़्म है, जितना रिट्रोग्रेशन है, जितनी संकीर्णताएँ हैं; उन सब का एक तरह से न्यूक्लियर सेंटर होता है. किसी भी भाषा में आप जाइए. उर्दू में जाइए, अंग्रेज़ी में जाइए, हिंदी में जाइए...तो ये भाषा इंस्टीट्यूटलाइज़ है. इसीलिए पीली छतरी वाली लड़की में मैंने हिंदी विभाग ही चुना. और मैं वास्तव में हिंदी के लिए आया नहीं था. मैं साइंस का स्टूडेंट था. मेरी रुचि थी एंथ्रोपोलॉजी. एंथ्रोपोलॉजी के लिए आया था और एडमिशन भी मिल गया था एंथ्रोपोलॉजी के डिपार्टमेन्ट में. और मेरे एक कज़िन थे, जो एंथ्रोपोलॉजी के बहुत प्रसिद्ध विद्वान थे...



संतोष अर्श: (बीच में ही बोलते हुए) हाँ...हाँ...हाँ...पीली छतरी वाली लड़की में एंथ्रोपॉलाजिकल ब्यौरे मिलते हैं.

उदय प्रकाश: अब भी...! एंथ्रोपोलॉजी के बारे में अब भी बहुत जानता हूँ. पीली छतरी वाली लड़की में देखिए...!! और वह पूरा जेनेटिक बेसिस है. यह कोई हिंदी वाला नहीं है कि इधर-उधर से उठा कर, ला कर लिख दूँ, कि मनुस्मृति में यह लिखा है, वेदों में वो लिखा है, और पुराणों में ये लिखा है, यह सब बहस नहीं करना चाहता हूँ !! क्योंकि इसका कोई अंत नहीं है. अच्छा है कि आप उसको जेनेटिक बेसिस पर चैलेंज करिए. कास्ट सिस्टम है नहीं. इसकी कोई रिअलिटी नहीं है. ये ऊपर से बनाया गया है. और ये...ये सिर्फ एक फ़ेकार्ड है. इसे ख़त्म हो जाना चाहिए. और ये नहीं होने दिया जाएगा. अंबेडकर नहीं कर पाए, बुद्ध नहीं कर पाए तो हम लोग क्या हैं ? अपनी तरफ़ से कितना कर पाएंगे ? तो सर देखिए...!! स्ट्रगल को केवल इकोनॉमिक स्ट्रगल मत मानिए. मेरा यही कहना है.  



संतोष अर्श: भीतर का संघर्ष और बाहर का संघर्ष ! बाह्य और अभ्यंतर का संघर्ष. बाहर से कई गुना ज़्यादा भीतर... जो मुक्तिबोध के यहाँ मिलता है?    

उदय प्रकाश: संघर्ष सिर्फ़ आर्थिक ही नहीं होता है. मुक्तिबोध को क्यों मिला ? क्योंकि वे बहुत ऑनेस्ट मार्क्सिस्ट थे. अगर वह ना होते उस तरह से, तो उनको क्या स्ट्रगल था? कहीं भी नौकरी ना छोड़नी पड़ती उनको. आकाशवाणी में थे, वहीं रह जाते. अध्यापक थे, अध्यापन कर लेते. संघर्ष आपको शांत नहीं रहने देता. कहीं-न-कहीं वह आपको परेशान करता है...और आपको लगता है कि यह ठीक नहीं है. एंड दैट ब्रिंग्स यू इन अ एरिया व्हेयर यू हैव स्ट्रगल्ड मोर !! तो संघर्ष बढ़ता जाता है. इस उम्र में हर कोई चाहता है कि वह आराम से रहे. मुझको क्या पड़ी थी अवॉर्ड लौटाने की ? आप खुद सोचिए कि जब एक-एक करके लोग मारे जा रहे हैं और उसी तरह के लोग मारे जा रहे हैं, जिस तरह के आप हैं. और जो संस्था अवॉर्ड दे रही है, वह इस पर चुप्पी साधे है, तो क्या करेंगे आप? तब ऐसा लगता है, कि कोई मतलब नहीं है ऐसे पुरस्कारों का, और उसको लौटा देना चाहिए. तो लौटा दिया !! तो वह एक मूवमेंट बन गया. पूरा-का-पूरा एक आंदोलन खड़ा हो गया.



संतोष अर्श: उदय जी साहित्य अकादमी अवॉर्ड आपने पहली बार लौटाया. हिंदी सुजन-समाज में यह अभूतपूर्व घटना है. जब आप ने पुरस्कार लौटाया तो सत्ता से टक्कर भी ली. सत्ता भी कोई ऐसी-वैसी सत्ता नहीं है, एक ताक़तवर फ़ासिस्ट सत्ता है, जिसे आप चैलेंज कर रहे हैं. यह करते हुए आपको डर नहीं लगा ?

उदय प्रकाश: क्यों नहीं डर लगा !! काफ़ी डर था. और हम लोग तो मार्क्ड हैं. चिह्नित हैं. (कुमकुम जी ने बीच में एंटर करते हुए कहा : धमकियाँ भी दी गईं दो-तीन बार)

संतोष अर्श: मैंने एक वीडियो देखा था यूट्यूब पर, उसमें भी आपको धमकाया जा रहा था...!

उदय प्रकाश:  हाँ मैं शिकागो से लौटा था और उस प्रोग्राम में गया था. वहाँ से लौट रहा था. मेरा फोन चार्ज नहीं था. और ये (कुमकुम जी) फोन कर रही थीं. यह घबरा गईं. क्योंकि माहौल ऐसा था कि कहीं कुछ हो न गया हो. जब बरखा दत्त ने मेरा इंटरव्यू लिया था एनडीटीवी पर, उसमें भी मैंने कहा था... और खुलकर कहा था कि ख़तरा बहुत है. और अभी भी बहुत खतरे हैं. एक नहीं है. यह मत सोचिए, कि अब नहीं है. क्या समस्या थी गौरी लंकेश के साथ? अख़बार निकालती थीं ! किसी को उससे क्या दिक्कत थी? लेकिन नहीं बर्दाश्त कर पाए. कलबुर्गी को क्यों मारा गया ? कलबुर्गी तो अच्छे-खासे स्कॉलर थे. वाइस चांसलर रह चुके थे. वचना-साहित्य पर काम था. वचना कन्नड़ भाषा का दलित-लेखन है, आदि-दलित लेखन. उसी की परंपरा के लेखक थे. आज से पहले भी लोग रहते थे. अचानक इस समय क्या हुआ कि आप उसको भी नहीं बर्दाश्त कर पा रहे हैं ? एक बूढ़े आदमी को ? तो ऐसा एक फैनाटिसिज़्म पैदा हुआ है. जो एलिमिनेट करना चाहता है. जो नहीं चाहता है कि लोग बचें.

ऐसा पहले कभी नहीं था. मैं जब आपके अहमदाबाद में था, वहाँ बोल रहा था तब भी कहा था कि, कम्युनल राइट्स पहले भी होते थे, कास्ट कॉनफ्लिक्ट भी होते थे; लेकिन मार्क्ड अससिनेशन नहीं होते थे. ...कि, किसी को चिह्नित कर लें और जा कर उसका मर्डर कर दें. अब ऐसा होने लगा है और पूरी लाइन लगी हुई है. और लेखकों पर तो... मुझे नहीं लगता है कि ऐसा कभी हुआ है, इस तरह का हमला. और पूरे साउथ एशिया में यह हो रहा है, पाकिस्तान में हो रहा है, बांग्लादेश में हो रहा है. आप अच्छे ब्लॉगर हैं, रैशनल बातें कर रहे हैं, तो पता चलेगा कि कुछ भी हो सकता है. इस समय ऐसा है. और हिंदी की समस्या तो बहुत अलग है क्योंकि अगर आप यहाँ हैं, तो अकेले हैं और हर जगह आपको अकेले स्ट्रगल करना पड़ेगा. यदि आप ईमानदार हैं, समाज के प्रति जागरुक हैं, तो आपको संघर्ष करना-ही-करना पड़ेगा. हिंदी पत्रकारिता को आप देखिए ! कौन बचा है ? जिसका हम नाम ले सकते हैं? रवीश चल रहे हैं... शायद इसलिए भी कि, ही बिलोंग्स टु अपरकास्ट !! आप कल्पना कीजिए कि अगर वह दलित होते या और कुछ होते, तो क्या नहीं किया जाता? तो यह सचाई है. 



संतोष अर्श: हिंदी की जहाँ तक बात है, पिछले दिनों जो लेखक मारे गए हैं वे गैर-हिंदी क्षेत्र, दक्षिणी-पश्चिमी भाषाओं के थे. इस सत्य के वज़न पर मेरा प्रश्न यह है कि हिंदी का लेखक क्यों नहीं मारा जाता है? क्या हिंदी-लेखन फ़ासिस्टों के लिए निरापद है? या जो लेखन हो रहा है हिंदी में, वह फ़ासिस्टों के लिए मुफ़ीद है ?

उदय प्रकाश : (हँसते हुए) हा...हा...!! हिंदी में जो लिखा जाता है उसकी कितनी रीच कितनी है? जो एंटी कम्युनल राइटिंग है, जो धर्मनिरपेक्ष लेखन है, वह किस भाषा में लिखा जा रहा है, उसकी पहुँच कितनी है ? सवाल सबसे पहले भाषा पर होता है. हम बलराज साहनी का उदाहरण ले सकते हैं. वे रावलपिंडी में पैदा हुए. पंजाबी के थे. अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर बने. शांतिनिकेतन में पढ़ाते थे. शांतिनिकेतन के कैंपस की जो भाषा थी, वह हिंदी थी. वहाँ पूरे भारत के राज्यों के स्टूडेंट होते थे और कैंपस के भीतर हिंदी ही कम्युनिकेटिंग लैंग्वेज़ थी. लेकिन उसका कहना था, “कि मैं जब हिंदी विभाग में जाता था, तो वहाँ के लोग कौन सी भाषा बोलते थे, यह मैं समझ नहीं पाता था.” हिंदी विभाग की भाषा निश्चित ही कैंपस की हिंदी भाषा से बिलकुल अलग थी. ...और यही मैं कहना चाहता हूँ, जो बलराज साहनी कहते थे.

...कि हिंदी तो बाद में उसको शांतिनिकेतन के कैंपस में विमल रॉय ने सिखाई और विमल रॉय बंगाल से थे. बंगाली हिंदी सिखा रहा है, पंजाब से आए हुए एक्टर को, जो इंग्लिश का प्रोफ़ेसर है....तो हिंदी वो है. एक तो हिंदी को बनाया गया कॉलोनियल टाइम में. हिंदी खड़ी बोली कोलकाता में बनी. और बनी तो यह मार्केट के लिए बनी. और एक अच्छी कम्युनिकेटिव लैंग्वेज़ के रूप में डेवलप होना चाहिए था इसको. किसी भी जगह के व्यापारी आएँ और ख़रीदार आएँ तो आपस में संवाद कर सकें. ...फिर कैसे इसको प्यूरिफाई किया गया. कैसे उसमें समेशन शुरू हुए. उन शब्दों को निकालो, इन शब्दों को भीतर लाओ का समीकरण किया गया. एक तत्सम शब्दों का, संस्कृत के शब्दों का फ्लाईओवर बनाया गया. अरबी, पर्सियन सबको बाहर किया गया है.


पालि, प्राकृत, अपभ्रंश के शब्दों को बाहर किया गया है. आपने पालि को बाहर किया, प्राकृत को बाहर किया, तो बुद्ध को बाहर कर दिया. यानी आप की जो पूरी लिबरल लीगेसी थी, उसको आपने बाहर का रास्ता दिखा दिया. ... 

तो फिर बचा क्या हिंदी में ? बचा है वही, जो तुर्की में बचा है !! जैसे नाज़िम हिकमत तो यही कहता था, “कि मैं तुर्की में लिखता हूँ इंकलाब और मतलब निकलता है जेहाद.” (हँसते हुए) तो हिंदी में आप कहाँ क्या लिखेंगे? क्योंकि इतने लोडेड होते हैं शब्द, शब्दों के पीछे जो अर्थ का इतना लोड होता है, पहले से ही उनके भीतर एक उद्भार होता है, वे वही अर्थ वहन करते हैं, जो वह करते हैं आए हैं. इसीलिए हिंदी का असर नहीं पड़ता है. इंपैक्ट नहीं है, सोशल इंपैक्ट नहीं है. और यह बहुत बड़ा फैक्टर है... कारण है. जो आपको रिवॉल्यूशनरी सॉन्ग्स भी मिलेंगे, जो पॉपुलर सॉन्ग्स मिलेंगे, उर्दू में मिलेंगे. जिसे आप उर्दू कहते हैं, दरअसल वही हिंदी है. आप चाहे फ़ैज़ को लीजिए, साहिर को लीजिए, किसी को भी ले लीजिए...तो उसका इंपैक्ट है. आप नारे भी लगाते हैं, तो इंकलाब जिंदाबाद कहते हैं...तो लगता है कि कुछ है. 




संतोष अर्श: यानी हमारे पास अभी जो हिंदी है, वह फ़ासीवाद के लिए पूरी तरह से निरापद है. ऐसा कह सकते हैं ?

उदय प्रकाश: हाँ बिल्कुल कह सकते हैं !! निरापद है. संस्कृत निरापद है. इसे नियो-संस्क्रेट कह सकते हैं. और इसका परपज़ वह नहीं है. बेसिकली इट इज़ फॉर एंटरटेनमेंट एंड आलसो टु कैरी सम रिलीज़ियस.. सेमी रिलीज़ियस लीगेसी. तो अब जैसे कोई मार्क्सवादी भी होगा हिंदी में तो वह तुलसीदास को बहुत प्रोग्रेसिव, डेमोक्रेटिक सिद्ध कर देगा. असंभव है, लेकिन वह कर देगा. अब आप अरगुमेंट्स देते रहिए कोई असर नहीं पड़ेगा. अब जैसे मान लीजिए कबीर का ही है. अब कबीर के बारे में ऐसी बहुत ही धारणाएँ बनाई गईं. निष्कर्ष क्या निकलता है ? ..कि वो रामानंद के शिष्य थे. चेलों की परंपरा में आ गए थे. वैष्णव परंपरा में आ गए थे.



संतोष अर्श: हा..हा..हा...!! विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे !!
उदय प्रकाश: (ठहाका)... तो यह जो कन्वर्टिंग है, कनवर्ज़न है, इसमें बुद्ध तक को नहीं छोड़ा उन्होंने. तो कबीर को कहाँ छोड़ेंगे ? तो यह समस्या है हिंदी के साथ. को-ऑपरेटिव नहीं है, क्योंकि मैंने देखा है, हिंदी विभागों में जो विद्वान होते हैं, उनका एकेडमिक कंट्रीब्यूशन कुछ नहीं होता है. पता लगा कोई है, जो बहुत अच्छा उपन्यास लिखने लगा, कोई कुछ और लिख रहा है या और करने लग गया है, उनकी क्या कोई अकादमिक कंट्रीब्यूशन है? कोई अच्छा शोध है? नहीं मिलेगा !! जो अच्छे रिसर्च हैं, वह भी गिनती के हैं, दो-चार. वह बहुत कम लोगों के पास हैं. जैसे नामवर जी का अच्छा है. नामवर जी का क्यों? क्योंकि उन्होंने मेहनत की है, अपभ्रंश में गए वो. हजारी प्रसाद द्विवेदी का बहुत अच्छा है. सिद्ध-नाथ परंपरा रही हो या कुछ और रहा हो. या कबीर पर रहा हो. कबीर भी उनको बंगाल से मिले. कहा जाता है ना; कि क्षितिमोहन सेन को ना पढ़ा होता उन्होंने तो कबीर पर उस दृष्टि से नहीं देख सकते थे. नवजागरण तो हुआ नहीं हिंदी में. नवजागरण कहीं से खोज लाये हैं रामविलास जी. कहीं कमेंट किया था नामवर जी ने कि, पूरे यूरोप में एक बार या दो बार नवजागरण हुआ है, लेकिन यहाँ हिंदी में कई बार, दर्जनों बार नवजागरण हुआ है. (ठहाका लगाते हुए) तो वो आए उन्होंने एक नवजागरण पैदा कर दिया.

भारतेंदु आए तो उन्होंने एक बार नवजागरण पैदा कर दिया. महावीर प्रसाद द्विवेदी आए तो उन्होंने एक बार नवजागरण पैदा कर दिया. हर बार तो नवजागरण हुआ है. लेकिन नवजागरण हुआ कहाँ है? नवजागरण हुआ होता तो आज यह हालत होती? कि खाप पंचायतें लगतीं और लड़कियों को गर्भ में मारा जाता? इतना सारा कुछ, जो हम सारी जनता में देखते हैं. तो कहीं कोई नवजागरण नहीं हुआ. और देखिए मेरा यह मानना है, आधुनिकता बहुत बड़ी चुनौती है हिंदी के लिए. हिंदी-समाज के लिए. इसका मॉर्डनाइज़ेशन नहीं हुआ. सबसे पहले तो इसको आधुनिक होना है.



संतोष अर्श: उदय जी पिछली शताब्दी में साहित्य और राजनीति के जो संबंध हुआ करते थे, साहित्यकार और राजनेता के जो संबंध हुआ करते थे. क्या वो अब नहीं रहे ? याद आता है कि अदम गोंडवी की मरणासन्न अवस्था में उन्हें पीजीआई में भर्ती नहीं किया जा रहा था, तो मुलायम सिंह यादव ने सुबह-सुबह लखनऊ पीजीआई जा कर अदम गोंडवी को वहाँ भर्ती कराया था. यानी साहित्य और राजनीति के अच्छे संबंध हुआ करते थे. आपको क्या लगता है, कि पिछली शताब्दी में ही वे संबंध ख़त्म हो गए ?

उदय प्रकाश : आपका कहना बिल्कुल सही है. ये था. पहले राजनीति का इतना विसंस्कृतीकरण नहीं हुआ था. डीकल्चरलाइज़ेशन नहीं हुआ था. जैसे आप नेहरू को ही देखिए सारे बड़े लेखकों के साथ चाहे वो जोश मलिहाबाद रहे हों, फ़िराक़ साहब रहे हों, निराला या नागार्जुन रहे हों...कोई ऐसा नहीं था...सबसे उनके संबंध रहते थे. दिनकर की किताब की तो उन्होंने भूमिका ही लिखी थी. फिर बाहर से आने वाले जो लेखक थे बर्नार्ड शा...पाब्लो नेरुदा सबसे ! तो एक रिस्पेक्ट था. और नेहरू पढ़ने वाले थे. गाँधी क्या कम-पढ़े लिखे थे? तल्सताय को पढ़ना और उस समय की फिलासफ़ी के पूरे डिबेट को समझना. बल्कि जो एस. गोपाल ने कहा कि गाँधी अधिक वेस्टर्नाइज़्ड थे. गाँधी ने पश्चिम को ज़्यादा समझा था...बहुत पढ़ा था. और उसे रिजेक्ट भी किया था.

नेहरू थोड़े से कमज़ोर थे. नेहरू ने सरेंडर कर दिया था. ये एस. गोपाल का कहना था. उस समय पढ़े-लिखे लोग थे. और अभी आपने समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव का जो ज़िक्र किया, तो समाजवाद की बुनियाद रखने में लोहिया का बड़ा योगदान है. फिर खुद समाजवादी पार्टी में आप देखिये ! आचार्य नरेंद्र देव कम पढ़े-लिखे थे? मानवेंद्र नाथ राय, जय प्रकाश नारायण सब पढ़ने-लिखने वाले नेता थे.

अब कौन है बताइये आप? किससे उम्मीद करेंगे कि वो साहित्यकारों को समझेगा. ये लोग तो मंच के कवियों के लायक भी नहीं हैं. इनकी कोई इंटलेक्चुअल जड़ें ही नहीं हैं. तो कैसे आप उम्मीद करेंगे? और धीरे-धीरे जो एसर्सन हुआ...एक लुंपेनाइज़ेशन समाज का, तो पहले जो नेताओं के आस-पास वोट बटोरने, बूथ लूटने वाले जैसे लोग होते थे, अब वो खुद नेता बन कर आ गए हैं. वो पुराना वाला नेता तो चला गया बैकग्राउंड में...और वही सत्ता में है. 

तो जो लंपटता सत्ता में आई, उसका साहित्यकारों से क्या लेना-देना? या लेखकों से क्या लेना-देना? वो तो किसी क्रिकेटर या बॉलीवुड स्टार को साथ लेकर ज़्यादा ख़ुश होगा. तो ये पॉपुलिज़्म आया और इसका बहुत प्रभाव पड़ा है साहित्य के उत्सवों पर. बल्कि अभी किसी ने कहा भी था कि जो लिट्रेचर फेस्टिवल हो रहे हैं, उसमें लिट्रेचर है कहाँ ?
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संतोष अर्श
poetarshbbk@gmail.com  
क्रमश: ......