हस्तक्षेप : गाय की पवित्रता का मिथ : संजय जोठे

Posted by arun dev on अक्तूबर 09, 2015










समकालीन भारत की विडम्बनाओं में एक ‘गाय’ भी है, राजनीति ने इसे विद्रूप में बदल दिया है. गाय की पवित्रता की वैचारिक संरचना की शुरुआत कब से हुई, क्या यह ‘हिन्दूमत’ है या ‘बौद्ध’ और ‘जैन’ संक्रमण है या सत्ता का खेल ? निरीह गाय के नाम पर निरीह मनुष्यों की हत्याओं के इस हिंसक दौर में यह जानना बहुत ही आवश्यक है. ऐसे तमाम प्रश्नों पर युवा समाज- वैज्ञानिक संजय जोठे का शोधपरक आलेख.   


गाय की पवित्रता का मिथ                 

संजय जोठे


भारत में हाल ही में जिस तरह से गाय के प्रति धार्मिक भावनाएं उभर रही हैं और जिस तरह से उन भावनाओं का हिंसक या उग्र प्रगटीकरण हो रहा है उसे देखकर निराशा होती है. यह निराशा दोहरी है. पहली निराशा इस इस अर्थ में है कि एक कृषि प्रधान देश के लिए गाय या गौ वंश का जितना और जैसा मूल्य होना चाहिए वह इतनी सदियों में हम स्वयं भारतीय ही समझ नहीं पाए हैं और गाय को पवित्र माने जाने के बावजूद वह सिर्फ राजनीतिक विवाद का विषय बनती जा रही है. दूसरी निराशा इस अर्थ में है कि  गाय या गौ वंश के प्रति अहिंसक होने का आग्रह स्वयं में अपनी अंतिम सीमा तक हिंसक होता जा रहा है, और जिस धार्मिक या आध्यात्मिक अर्थ में गाय को पवित्र माना जाता रहा है वह अध्यात्म स्वयं अब बदनाम और विस्मृत होने के कगार पर खडा है. पहली निराशा समझ में आती है, कृषिप्रधान समाज में गाय, कृषि  और पर्यावरण से जुड़ा अर्थशास्त्र हम सब समझते हैं. उसमे कोई विशेष कठिनाई नहीं है. लेकिन इस दूसरी निराशा को समझना होगा. यह पहलू उन लोगों को विशेष रूप से समझना चाहिए जो गाय के सम्मान में हिंसक आन्दोलन छेड़ने को तत्पर खड़े हैं.

असल में गाय को प्रेम करने वालों के लिए ही यह लेख है. उन्हें समझना होगा कि उनकी स्वयं की आध्यात्मिक विरासत किस अर्थ में और क्यों गाय को पवित्र मानती आई है. उन्हें यह भी समझना चाहिए कि जिस ढंग से गौवंश के प्रति उनकी भावनाएं या रणनीतियां आकार ले रही हैं वे असल में गाय और उससे जुड़े आध्यात्मिक ज्ञान का हनन कर रही है. उस पर दुर्भाग्य ये है कि सत्ता और धर्म के ठेकेदार इस दिशा में किसी तरह की स्पष्टता निर्माण करने से जानबूझकर बच रहे हैं. ऐसा करते हुए वे गौवंश की रक्षा के मुद्दे को सिर्फ दो समुदायों के सहजीवन की अनिवार्य सामाजिक, विधिक  व राजनीति शर्त के रूप में देख और दिखा रहे हैं. इस तरह वे अपनी ही आध्यात्मिक विरासत को राजनीतिक षड्यंत्र का चारा बनाकर उसे बदनाम कर रहे हैं.

अब यह आध्यात्मिक विरासत कितनी तर्कसंगत, वैज्ञानिक  या उचित है मैं इसमें नहीं जा रहा हूँ लेकिन इसके बावजूद एक बड़े विरोधाभास और षड्यंत्र को बेनकाब करने के लिए मैं उस विरासत से आने वाले निष्कर्षों का उपयोग भर कर रहा हूँ इस पूरे लेख से गुजरते हुए इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए.

आइये इसपर विचार करें. वो कौनसी आध्यात्मिक विरासत है और वो कौनसे निष्कर्ष हैं जो गाय को इतना पवित्र बनाते है? इसे अधिकाँश गौभक्त भी नहीं जानते हैं. राजीव मल्होत्रा, राजीव दीक्षित या दीनानाथ बत्रा को मानने वाले अधिकाँश लोग इस बात को शायद नहीं जानते हैं कि गाय की पवित्रता और अवद्यता की मौलिक जड़ें किन अनुभवों या मान्यताओं में हैं. वे यह बात नहीं बतला सकते क्योंकि इसमें उनके अपने धर्म की मौलिक समझ पर ही प्रश्न चिन्ह उठ खडा होता है. वे इस बात को दबाते चले जायेंगे कि गाय की पवित्रता का मूल विचार किस परम्परा या किस साधना पद्धति से और क्यों आया है.

इसमें गहरे चलते हैं. इस देश में दो तरह की साधना पद्धतियाँ रही हैं. एक ब्राह्मण और दूसरी श्रमण. वैदिक और ब्राह्मण पद्धति में भक्ति प्रमुख मानी गयी है और परमात्मा की कृपा को मुक्ति का साधन माना गया है. इसीलिये मुख्यधारा का हिन्दू समुदाय मुसलामानों और ईसाईयों की तरह अनिवार्य रूप से एक भक्ति समुदाय है. इसके विपरीत श्रमण परम्परा में स्वयं के प्रयास या श्रम को कैवल्य या निर्वाण का साधन माना गया है इसमें कोई परमात्मा बीच में नहीं आता. इस परम्परा में जैन और बौद्ध आते हैं जो कालान्तर में अपने धर्म को वैदिक हिन्दू धर्म से अलग कर लेते हैं. विशेष रूप से जैन धर्म इस गौवंश के मुद्दे पर बहुत विचारणीय है. जैन धर्म में आत्मा को परम मूल्य दिया गया है और इश्वर या सृष्टिकर्ता जैसी किसी सत्ता को नकार दिया गया है. इसीलिये जैनों में सृष्टि के बजाय प्रकृति शब्द का व्यवहार होता है. अब जैसे ही आत्मा और प्रकृति को मान्यता मिलती है, वैसे ही सारी चिन्तना आत्मा और पुनर्जन्म सहित आत्मा के उद्विकास पर केन्द्रित हो जाती है. तब कैवल्य सहित बंधन का सारा उत्तरदायित्व आत्मा पर आ जाता है.

अब इसके कुछ विशेष इम्प्लीकेशंस हैं जिन्हें बारीकी से समझना चाहिए. जैन विचार में आत्मा और उसका कर्म स्वयं ही अपनी मुक्ति या बंधन का कारण है. कोई एक्सटर्नल एजेंसी या कोइ परमात्मा (इश्वर/सृष्टिकर्ता  के अर्थ में) यहाँ किसी काम का नहीं है. दिगंबर परम्परा में सर्वाधिक प्रतिभाशाली तीर्थंकर, भगवान् कुन्दकुन्द का प्रसिद्द ग्रन्थ है समयसारउसमे वे लिखते हैं कि न कोई बंधन है न कोई मुक्ति है वस्तुतः यह राग से भरा मन है जो बंध जाता है यह अध्यात्म के जगत की सर्वाधिक क्रांतिकारी बात है, यही बात गौतम बुद्ध, वसुबन्धु और नागार्जुन सहित सारे जापानी झेन बौद्ध फकीर दुसरे अर्थ में कहते हैं कि मुक्ति और बंधन दोनों ही मन के खेल हैं.

अब इस जैन या बौद्ध मान्यता की गहराई में चलिए. इसका एक अर्थ यह हुआ कि बंधन या दुःख असल में मन के कर्मों का उत्पाद है. इसलिए उसकी निर्जरा के लिए मन को निर्मूल करना है. इसका अर्थ यह भी हुआ कि मन जिस-जिस अर्थ में कर्मबंध या संस्कार निर्मित करता है उस-उस अर्थ विशेष में उस-उस मार्ग पर विराम लगाया जाये. यहाँ विराम लगाने की प्रक्रिया का चुनाव करते हुए बौद्ध और जैन मार्ग अलग हो जाते हैं. जैन परम्परा उन मार्गों पर विराम लगाकर भौतिक शरीर के अनुशासन को अत्यधिक मूल्य देने लगती है और बौद्ध दर्शन केवल और केवल मन पर विराम लगाने पर केन्द्रित हो जाता है. जैन मुनि आहार निद्रा आदि के अनुशासनों को अंतिम उंचाई तक विकसित करने लगते हैं और बौद्ध आचार्य मन और मनोविज्ञान की गहरी प्रक्रियाओं को समझ लेने में ही मुक्ति का आश्वासन बतलाने लगते हैं. इस तरह जैन और बौद्ध दोनों दर्शनों में अंतिम रूप से शरीर और मन की चेष्टाओं को समझकर उनका नियंत्रण करना ही मुक्ति का मार्ग है. यहाँ हिन्दू परम्परा का इश्वर या उसकी भक्ति या उसकी कृपा दूर दूर तक किसी काम की नहीं समझी जाती है. और जो भक्ति हम इन जैन या बौद्ध धर्म में देखते भी हैं वह असल में इन धर्मों के पतन का सूचक है, इसके बावजूद वे किसी सृष्टिकर्ता इश्वर को नहीं बल्कि किसी तीर्थंकर या बुद्ध को मानव रूप में पूज रहे हैं.

अब और गहरे चलते हैं, जब शरीर और मन की चेष्टाओं पर बंधन या मोक्ष निर्भर करता है तब सवाल उठता है कि मन कैसे बंधन में पड़ता है? इसके उत्तर के लिए भोग के चुनाव और पुनर्जन्म को आधार बनाया जाता है. विशेष रूप से जैन धर्म में चूँकि आत्मा को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है इसलिए उसके उद्विकास को बहुत गहराई से देखा गया है. इसी से पुनर्जन्म की श्रृंखला का पीछा करते हुए यह देखा जाता है कि इस मन का पिछ्ला अवतार या भव क्या था. यह व्यक्तित्व जो आज सामने खडा है यह पिछले जन्म में क्या था? इसलिए पूर्वजन्म की स्मृति जगाने का विज्ञान सभी श्रमण धाराओं में सबसे विक्सित विज्ञान माना गया है. बौद्ध और जैन दोनों इस विज्ञान को विकसित करने वाली परम्पराएं रही हैं. 

हिन्दुओं में एक मान्यता के रूप में पुनर्जन्म अवश्य रहा है लेकिन एक क्रियान्वित किये जा सकने वाले अनुशासन या विज्ञान के रूप में पुनर्जन्म कभी नहीं रहा है. इसीलिये जब मंडन मिश्र की पत्नी ने शंकराचार्य को कामशास्त्र पर शास्त्रार्थ के लिए ललकारा तो आदि शंकर अपने पूर्व जन्म की स्मृति के आधार पर काम के अनुभव में नही गए. बल्कि उन्होंने किसी अन्य राजा के शरीर में प्रवेश करके काम का अनुभव लिया और फिर शास्त्रार्थ को उपस्थित हुए. अगर उनके पास पुनर्जन्म की खोज की तकनीक होती (जो जैन और बौद्ध विज्ञान है) तो वे अपनी जान दांव पर नहीं लगाते, कई रहस्यवादी ऐसा मानते हैं कि चूंकि आदिशंकर छः माह तक अपने शरीर से बाहर रहे इसीलिये उनका शरीर कमजोर हुआ और वे अल्पायु में चल बसे.

इस तरह यह स्पष्ट होता है कि पुनर्जन्म का विचार मूलतः जैन और बौद्ध विचार है और उसका विकसित विज्ञान भी जैन व बौद्ध श्रमण परम्परा से आता है. जैनों की मान्यता है कि हर तीर्थंकर पशु योनी से मनुष्य योनी में आने के क्रम में किसी पशु योनी से गुजरता है. इसीलिये उन्होंने प्रत्येक तीर्थंकर के साथ उनके पशुयोनी के अवतार का संकेत भी बना रखा है. जैसे भगवान् ऋषभदेव के साथ वृषभ या सांड का चिन्ह है, भगवान् महावीर के साथ सिंह का चिन्ह है. इसी तरह गौतम बुद्ध के साथ भी हाथी का चिन्ह है. यह जाहिर  करता है कि ये सब तीर्थंकर पशुयोनी में अंतिम रूप से इन इन पशुओं के रूप में जन्मे थे. इस मान्यता या रहस्यवादी अनुभव के आधार पर उनके हजारों शिष्यों और मुनियों ने अनुभव किया कि सामान्यतया अधिकाँश मनुष्य गाय की योनी से मनुष्य योनी में आ रहे हैं. इस प्रकार चूँकि मनुष्य योनी में छलांग लगाने के लिए गाय योनी अनिवार्य जंपिंग बोर्ड है इसलिए गाय पवित्र और अवध्य मान ली गयी है. इस बात को ओशो रजनीश ने भी अपने प्रवचनों में स्पष्ट किया है.

यह बात गहराई से नोट की जानी चाहिए कि यह जैनों और बौद्धों की खोज है. हिन्दू साधुओं ने कभी भी इस तरह की बात नहीं उठाई. इसीलिये श्रमण परम्परा ने इस निष्कर्ष पर आते ही गाय सहित सभी पशुओं की बलि पर अनिवार्य रूप से रोक लगा दी. जैनों की अहिंसा और बौद्धों की अहिंसा का मूल कारण यही था. और इसमें भी गाय को इतना पवित्र मानने का कारण भी यही था कि यह पशु योनी से मनुष्य योनी के बीच की यात्रा में अनिवार्य कड़ी है. यह ज्ञान हिन्दू परम्परा में बहुत बाद में आया, या फिर ये कहें कि उन्होंने जैनों और बौद्धों से सीखा. शुरुआती वैदिक धर्म में यहाँ तक कि उपनिषद्काल में भी पशु बलियाँ और गौ बलियाँ दी जाती थीं. बाद में जैन व बौद्ध धर्म के निष्कर्ष को और उससे जन्मे आचरण शास्त्र को ब्राह्मण परम्परा ने भी अपना लिया.

अब गौर से देखने की बात ये है कि जिस मौलिक प्रतीति पर गाय या गौ वंश की दिव्यता या पवित्रता का भवन खड़ा है उसकी आधार भूमि संवेदनशीलता और अहिंसा है. वह भी इसलिए ताकि पशुयोनी से मानव योनी की यात्रा में बाधा न हो. इस दृष्टि से देखें तो मनुष्य योनी तक आने में गाय एक पड़ाव है इसीलिये उसकी ह्त्या नहीं की जानी चाहिए. इसका यह अर्थ हुआ कि मनुष्य गाय से अधिक महत्वपूर्ण है. गाय एक संभावना है मनुष्य उस संभावना का साकार रूप है. इसलिए गाय या मनुष्य के जीवन में चुनाव होगा तो मनुष्य को ही बचाया जाना चाहिए.

अब इस सबके बाद गौमांस के मुद्दे पर मनुष्यों की ह्त्या की घटना को देखिये. यह न तो सामाजिक या मानवीय दृष्टिकोण से उचित है न ही धार्मिक या आध्यात्मिक अर्थ में उचित है. यह सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक ड्रामा है जो वोटों के ध्रुवीकरण के लिए रचा गया है. इसीलिये यह जोर देकर कहना चाहिये कि धर्म का नाम लेकर गौवंश को मुद्दा बनाने वाले लोग न तो धर्म या अध्यात्म को समझते हैं न इंसानियत को. अगर गौवंश को बचाना है तो उसे दंगा या विभाजन पैदा करने वाली मानसिकता से नहीं बचाया जा सकता. गाय को  बचाना है तो उसे इतना मूल्यवान और उपयोगी बनाना होगा कि उसकी मौत की बजाय उसकी जिन्दगी की कीमत ज्यादा हो. अभी गाय कटती है क्योंकि ज़िंदा गाय की तुलना में मरी हुई गाय अधिक मूल्यवान है. जिस दिन ज़िंदा गाय से मरी हुई गाय की तुलना में अधिक आमदनी होने लगेगी उस दिन गाय अपने आप बच जायेगी. तब किसी अभियान की जरूरत नहीं होगी.


इसीलिये गाय की नस्ल सुधार का आन्दोलन चलना चाहिए. गाय के दूध की मात्रा बढनी चाहिए. विदेशी सांडो से डर लगता है तो देशी विकल्पों पर ही ध्यान दीजिये. जैसे भैंस की दूध देने की क्षमता बढ़ गयी है वैसे ही गाय की देशी संकर प्रजातियों की क्षमता भी बढ़ सकती है. उसके बाद कोई किसान या गरीब आदमी अपनी गाय को मैला खाने के लिए या सडक पर आवारा घूमने के लिए खुला नहीं छोड़ेगा. क्या किसी ने दुधारू भैस को आवारा घुमते या गन्दगी खाते देखा है? उसे कटते देखा है? यह सबसे महत्वपूर्ण बात है जो गौभक्तों को समझनी चाहिए. गाय धर्मशास्त्र से नहीं अर्थशास्त्र से बचेगी. जिस दिन ज़िंदा गाय एक मरी गाय से अधिक मूल्यवान हो जायेगी उसे दिन किसी धार्मिक, नैतिक या कानूनी आग्रह या नियम की कोई जरूरत नहीं रह जायेगी.
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संजय जोठे, युवा समाजशास्त्री और पत्रकार. समाज कार्य मुद्दों पर पिछले बारह वर्षों से कार्यरत. 
इंस्टिट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट स्टडीज यूनिवर्सिटी ऑफ़ ससेक्स से अंतर्राष्ट्रीय विकास में एम्. ए. संप्रति टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस से पीएचडी कर रहे हैं. 
sanjayjothe@gmail.com