निज घर : रवीन्द्र कालिया : मनोज कुमार पाण्डेय

Posted by arun dev on अप्रैल 02, 2016

 







हिंदी में पत्रिका निकालना जोखिम का काम है और यह और भी बढ़ जाता है जब आपके पास आय का कोई नियमित स्रोत नहीं हो. हरे प्रकाश उपाध्याय अपनी जिद्द और जीवट से  ‘मंतव्य’ के पांचवे अंक के साथ एक बार फिर सामने हैं.  पत्रिका ३३० पेज की है और तमाम तरह की पठनीय सामग्री से भरपूर है.  इस पत्रिका में मशहूर कथाकार रवीन्द्र कालिया पर मनोज कुमार पाण्डेय का एक रोचक संस्मरण प्रकाशित हुआ है. समालोचन के पाठकों के लिए यह आलेख आभार सहित.

यह संस्मरण जितना कालिया जी पर है उतना ही इसमें मनोज खुद शामिल हैं, इलाहबाद, कोलकाता, दिल्ली भी शामिल है. एक पूरी साहित्यिक संस्कृति का ताना बाना  यहाँ आपको मिलेगा.


म सी हा मुहब्बत के मारों का                                      
मनोज कुमार पांडेय




सूलाबाद में मैं जिन कुछ दोस्तों के साथ रहता था उनमें से ज्यादातर साहित्यिक रूप से शुद्धतावादी वामपंथी थे. उनमें से किसी ने भी रवींद्र कालिया की एक पंक्ति भी नहीं पढ़ी थी पर वह कुछ अफवाहों के चलते उनके विरोधी थे. उनके ही क्या वे हिंदी के ज्यादातर लेखकों के बारे में अच्छी राय नहीं रखते थे और उन्हें कुछ बुर्जुआ वुर्जुआ टाइप का मानते थे. कहने की जरूरत नहीं कि मैं भी ऐसा ही सोचता था. आज मुझे उन दो तीन सालों का गहरा मलाल है कि एक ही मुहल्ले में रहते हुए कुछ हवाई गलतफहमियों के चलते मैं कालिया जी के साथ से वंचित रहा. इस हद तक कि मैं उन्हें पहचानता तक नहीं था. जबकि इस बीच कितनी बार वे मेरे सामने से गुजरे होंगे.

कालिया जी से मेरा पहला परिचय मृत्युंजय ने कराया, ‘गालिब छुटी शराब’ थमाकर. इस किताब के खत्म होते होते मैं उनका गहरा प्रशंसक बन गया. इसके बाद मैंने उनका उपन्यास पढ़ा ‘खुदा सही सलामत है’, फिर कहानियाँ. ‘सिर्फ एक दिन’, ‘नौ साल छोटी पत्नी’, ‘काला रजिस्टर’, ‘डरी हुई औरत’, ‘हथकड़ी’, ‘चाल’, ‘पनाह’, ‘नया कुरता’, ‘गरीबी हटाओ’, ‘अकहानी’, ‘पचास सौ पचपन’ या ‘सुंदरी’ जैसी उनकी कहानियाँ भीतर बसीं तो आज तक जस की तस बनी हुई हैं और इस बीच उनका जादू बढ़ता ही गया है. मैं कह सकता हूँ कि मैं उनके उन पाठकों में से हूँ जिन्होंने उनका लगभग सारा कुछ पढ़ रखा है. बल्कि उनके उपन्यास ‘ए बी सी डी’ और आखिरी कहानी ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ का तो मैं पहला पाठक रहा हूँ.

उनका उस समय तक का लिखा तकरीबन पूरा पढ़ चुका था, जब कृष्णमोहन के साथ एक दिन उनके घर गया. यह सन दो हजार के शुरुआती दिन थे. उनसे वह मुलाकात मुझे आज तक याद है. वे बेडरूम में थे, अपने बिस्तर पर. उस मुलाकात में मैं शरमाया सकुचाया सा रहा पर जल्दी ही उन्होंने मेरी सारी झिझक दूर कर दी. उस पहली मुलाकात में वे मुझसे मेरे घर-परिवार, खेती, पढ़ाई आदि के बारे में बात करते रहे. अगली दो-तीन मुलाकातों के बाद मैं उनके प्यार में था और इन पंद्रह-सोलह सालों में यह प्यार आज भी न सिर्फ बना हुआ है बल्कि दिन पर दिन बढ़ता ही गया है. उन दिनों वे दिन भर घर में ही रहते थे. जल्दी ही मेरा पूरा पूरा दिन उनके घर पर बीतने लगा.

तो होता यह कि कई बार यह भी सोचता कि रोज रोज जाकर उन्हें बोर करता हूँ. सोचता कि अब कुछ दिन नहीं जाऊँगा. एक दो दिन यह कर भी गुजरता, पर तीसरे चौथे दिन तक जैसे कोई नशा तारी होने लगता और मैं आप से आप उनके यहाँ पहुँच जाता. तब तक लिखने के नाम पर मैंने दो-तीन समीक्षाएँ भर लिखी थी. या कुछ नाटकों के मंचन की खबरें, कुछ गोष्ठियों की प्रेस रिलीज, बस. मैं रंगमंच में सक्रिय था और अभिनेता के नाम पर मेरी जो ख्याति थी उसके चलते पेड़ नदी पहाड़ आदि की कठिन भूमिकाएँ मुझे ही मिलतीं. मुझे वह भी करके मजा आ रहा था. उधर कृष्णमोहन चाहते थे कि मैं थियेटर से किनारा करूँ और आलोचना में हाथ आजमाऊँ. उनकी चलती तो वे मुझे पूर्णकालिक आलोचक बनाकर ही दम लेते.

इसके पहले मेरा पढ़ाई का दायरा बेहद सीमित था. मैंने अब तक ज्यादातर रूसी साहित्य ही पढ़ा था. हिंदी में प्रेमचंद के साहित्य के अलावा बस आठ-दस किताबें ही पढ़ीं थी. कालिया जी के यहाँ पहुँच का फायदा यह हुआ कि एक बहुत बड़ी लायब्रेरी यूँ ही मिल गई. जो भी किताबें पढ़ता उन पर कालिया जी से बात होती. एक वामपंथी आदर्शवाद तब हावी था मुझ पर... हर जगह क्रांति ढूँढ़ता... न मिलने पर रचनाओं को खारिज करता. मैं अक्सर उनसे असहमत होता और उत्तेजित होकर बहस पर उतर आता. पर वे कभी धैर्य न खोते. धीरे धीरे उनकी संगति में मैंने रचनाओं के पास जाने की सही तमीज सीखी. रेणु, अमरकांत, मोहन राकेश, भीष्म साहनी, शैलेष मटियानी जैसे लेखकों से रचनात्मक परिचय कालिया जी ने ही कराया. शहर और शहर के बाहर के न जाने कितने लोगों से पहली मुलाकात उनके घर पर हुई. कमलेश्वर, श्रीलाल शुक्ल, मार्कंडेय, दूधनाथ सिंह, ज्ञानरंजन, अखिलेश, अरविंद जैन, कन्हैयालाल नंदन, गिरिराज किशोर, मधुकर सिंह, देवेंद्रराज अंकुर, विभूति नारायण राय सहित और भी न जाने कितने लोगों से पहली बार मिलना और उन्हें देखना कालिया जी के घर पर ही हुआ.

उन दिनों उनके पास एक पुरानी सी स्कूटर होती थी, जिसे देखकर कई बार यह सोचना पड़ता था कि यह चलती भी होगी क्या. उस पर उनके पीछे बैठकर काफी हाउस, लोकनाथ की सैर न जाने कितनी बार की होगी. यह वह समय था जब वे उतनी ही सहजता से मेरे या मृत्युंजय के कमरे पर पहुँच जाते थे. या कि कुमार विजय के यहाँ बाटी चोखा की दावत में रवींद्र कालिया, ममता कालिया और लालबहादुर वर्मा शरीक हो सकते थे. वे हमेशा आपको बराबर का महत्व देते थे. ऐसी बराबरी नहीं जो एक दो चुभते हुए सवालों के साथ ही एक खीझ में बदल जाए. बल्कि किसी भी हद तक बहस या सवाल... कई बार तो बत्तमीजी की हद तक. और वे कि हमारी सारी बत्तमीजियों की हवा किसी एक वाक्य से निकाल देते. अगले दिन फिर उतने ही प्यार और अपनेपन से उस घर में स्वागत होता. मृत्यंजय तो खैर तब मृत्यंजय ही था, घनघोर अराजक, पर उनको सामने पाकर मैं भी कुछ ज्यादा ही उत्साही हो जाता. हम अक्सर उनसे सिगरेट माँगते. न जाने कितनी मर्तबा उन्होंने हमारी सिगरेटें जलाई होंगी. ममता जी को जब पता चलता वे अक्सर हम दोनों को डाँटतीं, पर उससे ज्यादा कालिया जी पर बिगड़तीं. कहतीं तुम बच्चों को बर्बाद कर रहे हो. वे कई बार कुछ न बोलते. कई बार हँसकर कहते कि ये बर्बाद नहीं होंगे तो हमारी जगह कौन लेगा.

न जाने कितनी बातें हैं. मैं २००१ में एनएसडी के इंटरव्यू के लिए दिल्ली जा रहा था. तब तक मैं दिल्ली में किसी एक आदमी को भी नहीं जानता था. उन्होंने मुझसे पूछा कि रहोगे कहाँ. मैंने कहा कि कोई छोटा-मोटा होटल या सराय खोज लूँगा. तुरंत वे कुछ नहीं बोले. अगले दिन जब मैं उनके यहाँ गया तो उन्होंने कहा कि गंगा प्रसाद विमल जी से कहकर उन्होंने गोमती में मेरे लिए कमरा बुक करवा दिया है. मुझे विमल जी का नंबर भी दिया कि बस ज्यादा कुछ नहीं तो उन्हें फोन करके बस एक बार शुक्रिया बोल देना. यहीं पर एक और ऐसी ही बात याद आ रही है. जब वे दिल्ली में लाजपत नगर वाले मकान में रहते थे. मैं उनके घर गया हुआ था. रात ग्यारह पर निजामुद्दीन से मेरी ट्रेन थी वर्धा के लिए. मैं खा-पीकर निकला, वे सीढ़ियाँ उतर कर नीचे तक छोड़ने आए. मुझसे यह कहते हुए कि मैं आटो वाले का नंबर उनको एसएमएस कर दूँगा और स्टेशन पर पहुँचते ही उनको फोन करूँगा. वे यह बात ऊपर भी एक बार कह चुके थे और ममता जी से मीठी झिड़की भी खा चुके थे कि मनोज कोई बच्चा नहीं है जो इस तरह समझा रहे हो.

मैं कोई अकेला नहीं हूँ. वे बहुतों के लिए वैसे ही वत्सल थे. अभी सात-आठ महीने पहले की बात है, मेरा एक रंगकर्मी दोस्त शराब पीकर उन्हें फोन कर बैठा. शायद कुछ वैसी ही उम्मीद से कि ‘तू मसीहा मुहब्बत के मारों का है...’ और वे घंटों उससे बतियाते रहे. जब तक कि उसने अपना खोया हुआ संतुलन फिर से वापस नहीं पा लिया. अगले ही दिन सुबह सुबह मुझे फोन करके वह चिंतित स्वर में मुझसे उसका हाल पूछ रहे थे और मुझे ताकीद कर रहे थे कि मैं उसको फोन करते रहा करूँ. दोस्तों को कभी भी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए और न उनसे हमेशा चिपके ही रहना चाहिए, यह उस दिन की सीख थी. साथ में यह भी जोड़ा कि उसे पता न चले कि मैंने तुम्हें कुछ बताया है.

न जाने कितने प्रसंग हैं. जिस दिन सलमान खान ने कथित रूप से कुछ लोगों को कुचल दिया, मैं उस शाम उनके घर में ही बैठा हुआ था. उनके एक रंगकर्मी मित्र अपनी पत्नी के साथ सब्जी खरीदने निकले थे और कालिया जी के यहाँ आ गये थे. उनके झोले में जिन था. उन्होंने गिलास मँगाई और वहीं बैठकर जिन पीने लगे. कालिया जी कहीं से व्हिस्की निकाल लाए और मेरे लिए भी पैग बना दिया. ऐसे ही इधर-उधर की तमाम बातें चल रही थीं कि टीवी पर सलमान खान वाली खबर दिखी. यह संयोग था कि इस घटना से प्रभावित सभी लोग मुसलमान थे. रंगकर्मी महोदय यह देखकर ठठाकर हँसे और बोले ‘कालिया कितनी बढ़िया बात है काँटे से काँटा निकल रहा है.’ कालिया जी का चेहरा लाल हो गया पर वे कुछ भी नहीं बोले. एकदम चुप जैसे स्तब्ध से हो गए. मैं चुप न रह सका. मैंने रंगकर्मी जी से कहा कि सर मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूँ फिर भी कह रहा हूँ कि आप मेरी बराबरी के होते तो मैं अभी आपका मुँह तोड़ देता. रंगकर्मी जी तुरंत कुछ नहीं बोले पर माहौल में एक तनाव पसर गया. थोड़ी देर बाद साहित्य पर बात चली तो रंगकर्मी महोदय ने कहा कि साहित्यकार कुत्ते होते हैं कमीने होते हैं, मैंने फिर प्रतिवाद किया तो वे मेरे ऊपर भड़क गये कि तुम्हारी साहित्य पर बोलने की औकात क्या है? दूधनाथ सिंह बोलें, डा. रघुवंश बोलें, रामस्वरूप चतुर्वेदी बोलें, रवींद्र कालिया बोलें... वे अपनी बात पूरी कर पाते कि कालिया जी ने कहा, रंगकर्मी जी हम क्या बोलेंगे, हम तो कुत्ते हैं, कमीने हैं. ममता जी मुझे चुप रहने का इशारा कर रही थीं, खुद रंगकर्मी महोदय की पत्नी चुपचाप स्तब्ध सी बैठी थीं. और उधर रंगकर्मी महोदय की नशे की तरंग जैसे जैसे बढ़ती गई वैसे वैसे मुझ पर हमलावर होते गए. मेरे पहनावे पर, चाल-चलन पर, सिगरेट पीने पर... इस पर उस पर.... मैं भी भड़क गया और मैंने कहा कि आपके पैसे से नहीं पीता हूँ. और आपको इस तरह मेरा अपमान करने का कोई हक नहीं है. वे उठ खड़े हुए. कालिया जी से बोले, कालिया ये कल का लौंडा मेरा अपमान कर रहा है और तुम कुछ बोल नहीं रहे हो. कालिया जी बोले, ‘आपने तो अपनी मनुष्यता को ही अपमानित किया, मैं क्या बोलूँ, मुझसे क्या उम्मीद रखते हैं आप कि आप का समर्थन करूँ? फिर बोले, आप दोनों मेरे घर में इस तरह लड़ते हुए मुझे अपमानित कर रहे हैं. रंगकर्मी महोदय कालिया जी पर लानत भेजते हुए निकल गए और उसके बाद सालों तक कालिया जी से इस हद तक नाराज रहे कि बोलचाल तक बंद रही. मैं अगले दिन फिर से कालिया जी के घर पर था और बातचीत में वे रंगकर्मी महोदय के अकेलेपन, उनकी कुछ निजी कुंठाओं और अवसाद पर चिंतित हो रहे थे.

ऐसे ही एक बार मैंने स्वदेश दीपक के नाटक ‘कोर्टमार्शल’ पर एक समीक्षा लिखी थी जो उस नाटक पर प्रचलित स्वर के विरोध में खड़ी थी. मुझे वह नाटक तब भी व्यवस्था का पक्षधर नाटक लगता था और आज भी लगता है. वह समीक्षा ‘साक्षात्कार’ में प्रकाशित हुई थी और इस कदर तीखी थी कि अनेक लोग मुझसे नाराज हो गए थे. यह अलग बात है कि खुद स्वदेश दीपक जो गोमती में हफ्ते भर मेरे बगल वाले कमरे में रहे थे, उन्होंने उस पर एक लफ्ज भी बात नहीं की, हालाँकि उनसे उस दौरान उनकी कहानियों पर और कुछ दूसरे नाटकों पर खूब खूब बातें हुईं. एक आईपीएस अधिकारी जो स्वदेश दीपक के मित्र थे, उस समीक्षा को लेकर मुझसे बहस करते हुए इतने उत्तेजित हो गये कि अगर बीच में कालिया जी नहीं होते तो मैं पिट ही गया होता. उन्होंने अधिकारी महोदय को डपटा और बैठकर बात करने की हिदायत दी.

इलाहाबाद में उनके साथ के न जाने कितने प्रसंग हैं. शाम को सब्जी लेने निकलते तो तेलियरगंज का शायद ही कोई सब्जी वाला होता जिससे उनकी दुआ सलाम न होती. पान की गुमटियों वाले उन्हें नमस्ते करते. कई बार वह रुककर उनसे उनका हालचाल जानते. सभी से उनका बातचीत का बेहद सहज रिश्ता था. उन्हें रानी मंडी छोड़कर मेंहदौरी कालोनी आए हुए एक लंबा अर्सा बीत चुका था पर रानी मंडी के लोगों से भी उनका बेहद जीवंत संवाद बना हुआ था. वे वहाँ जाते तो लोग अपना काम बीच में छोड़ देते. बकरीद के अवसर पर रानी मंडी से आया हुआ कई किलो गोश्त उनके घर में इकट्ठा हो जाता. वे इतने गोश्त का क्या करते, वे उसे अपने यहाँ आने जाने वाले लोगों में बाँट देते. और शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता कि दसियों लोग उनके यहाँ न आते-जाते. एक पुलिस अधिकारी जिनकी बेटी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ती थी और जो बाद में उत्तर प्रदेश के डीजी बने, अपनी बेटी से मिलने इलाहाबाद आते तो उनका पूरा पूरा दिन कालिया जी के घर में बीतता. पूरे दिन में वह मुश्किल से दो-चार वाक्य बोलते. कहते मैं तो सर को सुनने और उनका सानिध्य पाने आता हूँ.

उनके घर का माहौल हमेशा हरा भरा रहता. दो दो कद्दावर कथाकार एक साथ, एक ही छत के नीचे. बस एक दो लोग भी और पहुँच जाते कि किसी अनौपचारिक गोष्ठी जैसा माहौल हो जाता. दोनों एक दूसरे के रचनात्मक जीवन में लगभग न के बराबर हस्तक्षेप करते. उनमें कभी गलती से भी मैंने एक दूसरे के प्रति कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं महसूस की. वे एक दूसरे के प्रति प्रेम, समर्पण और सम्मान से भरे हुए थे. इसके बावजूद उनमें एक मीठी नोक-झोंक भी बराबर चलती रहती. यह कभी कभी कभी थोड़ी तीखी भी हो जाती. ऐसा दस में से दस बार खाने की टेबिल पर होता. ममता जी बहुत ज्यादा केयरिंग हैं. वे इसरार करतीं कि रवि यह और लो, यह खाओ, वे एक बार दो बार मना करते, या कि कहते हाँ अभी लेता हूँ. पर वही बात फिर से कहने पर उनमें थोड़ा खीझ भर जाती. यह स्थिति जितना मैं जानता हूँ आखिरी तक बनी रही. बल्कि आखिरी दिनों में तो यह बेहद मार्मिक दृश्य में बदल गई थी. कालिया जी अपनी बीमारी के चलते खाने के प्रति एक गहरी अरुचि से भर गए थे. वे दिन पर दिन कमजोर हो रहे थे. कुछ भी खाना उन्हें अच्छा न लगता, दूसरी तरफ ममता जी हमेशा उनकी चिंता में घुलतीं रहतीं. वे कुछ न कुछ लिए हुए दिन में कई कई बार उनका पीछा करतीं कि वे थोड़ा सा ही खा लें. और जब वे कुछ खा लेते तो ममता जी के चेहरे का संतोष देखने लायक होता.

अपनी आखिरी वर्धा यात्रा में वे घर आए हुए थे. हालाँकि उन्होंने पहले से ही मना कर रखा था कि कुछ भी विशेष करने की जरूरत नहीं है. वैसी भी अपनी बीमारी की वजह से उन दिनों वे बेहद कम खाते थे. तब भी हमसे जितना कुछ संभव हो सकता था हमने किया था. हम उनके आने को लेकर बहुत ही खुश और उत्साहित थे. उन्होंने मुश्किल से हरी आलू के एक दो टुकड़े लिए. बाकी चीजों की तरफ आँख उठाकर देखा भी नहीं. ममता जी ने कुछ दूसरी चीजें उन्हें खिलानी चाही तो वे इरिट्रेट होने लगे. लगे हाथ यह भी कि ममता जी और कालिया जी दोनों चाय के बेहद शौकीन. चाय मतलब चाय, एक खास फ्लेवर, उसमें किसी तरह की मिलावट उन्हें पसंद नहीं. जब कल्पना चाय बनाने जाने लगी तो उसने मुझसे धीरे से पूछा कि अदरख वगैरह डाल दें. कालिया जी ने सुन लिया, मुस्कराते हुए बोले, अदरख ही क्यों, थोड़ी मिर्च, थोड़ी धनिया, अलग से थोड़ा गर्म मसाला सब कुछ डाल देना. कल्पना मुस्कराते हुए चली गई.

वे जल्दी कभी नाराज नहीं होते थे. उनकी समग्र कहानियाँ वाणी प्रकाशन से छपकर आने वाली थीं. उन्होंने प्रूफ देखने का काम मुझे सौंपा. मैं प्रूफ क्या पढ़ता, मैं तो कहानियाँ पढ़ने लगा और उनमें ही खो गया. जाहिर है कि ऐसे में बहुत सारी गल्तियाँ छूटनी थीं. उनकी किताब पुस्तक मेले में आनी थी. मेरी वजह से वह नहीं आ सकी. एक बार भी उन्होंने इसके लिए मुझे कुछ भी नहीं कहा. आखिरकार उन्होंने खुद ही प्रूफ पढ़े. बावजूद इसके प्रूफ पढ़ने का पैसा मुझे ही दिलवाया. और भी कई मौके ऐसे थे जब वे मेरे व्यवहार से नाराज हो सकते थे, मेरी बत्तमीजियों के लिए मुझे फटकार सकते थे पर मुझे हमेशा ठंडी छाँव ही मिली. वे मेरी पत्नी कल्पना से भी वैसे ही बतिया लेते थे जैसे मुझसे. इलाहाबाद के अपने आखिरी दिनों में जब वह सिगरेट छोड़ने की कोशिश कर रहे थे तो उनके कुर्ते की जेब में तरह तरह की टाफियाँ भरी रहती थीं. वे अक्सर लोगों को टाफी पेश करते. एक बार कल्पना ने उनसे कहा कि उसके पिता भी बचपन में उसे ऐसे ही टाफियाँ खिलाया करते थे. वह सोफे पर उनके बगल ही बैठी हुई थी. उन्होंने उसका सिर सहलाया और बोले मैं भी तुम्हारे पिता की तरह ही हूँ. कल्पना आज भी उस पल को याद करके उनकी यादों में डूब जाती है. जब मेरी शादी हुई मेरे पास कोई काम नहीं था. कभी कभार अखबारों में फ्रीलांसिंग और कुछ भी नहीं. वह अक्सर परेशान होती. उसे कई बार कालिया जी ने समझाया. मैं तो करता ही था वह भी उन पर आँख मूँदकर भरोसा करती थी.

वे जी भर बात करते थे. उनकी खूबी यह भी थी कि वे गंभीरता के जामे से दूर ही रहते थे. हमेशा शरारत या चुहल के मूड में. वे गहरी से गहरी बात भी बेहद हल्के फुल्के अंदाज में कह जाते. उतना अकुंठ कोई दूसरा व्यक्ति मैंने नहीं देखा. अपने लिखे पर कम से कम बात करने वाले. हल्का-फुल्का हँसी मजाक दूसरी बात है पर कभी किसी की अनुपस्थिति में किसी के बारे में कोई अपमानजनक बात उन्होंने कभी नहीं की. उन लोगों के बारे में भी नहीं जो अपने साक्षात्कार आदि में कालिया जी पर तमाम लांछन लगाया करते थे. हालाँकि वे सामने होते तब वे उन्हें कभी नहीं बख्शते थे. तब भी कोई तीखी बात नहीं, बस हँसी-मजाक के बीच में कुछ ऐसा बोल देते कि सामने वाले को देखकर यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल होता कि वह हँस रहा है कि रो रहा है. मैंने इलाहाबाद में कइयों की ऐसी हालत होते देखी है. पर वे लोग भी कभी बीमार पड़ते, मुश्किल में होते तो उनसे ज्यादा चिंतित कालिया जी होते.

दूधनाथ जी ने अपनी डायरियों में जो कुछ भी लिखा हो पर जब वे बीमार थे और जहाँ तक मुझे याद है कि शायद नाजरेथ में भर्ती थे, उन दिनों कालिया जी लगातार उनकी चिंता में डूबे रहते थे. वे उनके लिए बेहद बेचैन दिन थे. उन्हीं दिनों मैंने यह भी महसूस किया कि वे अपने यारों से बहुत गहरा प्रेम करते थे. ऊपरी लड़ाई-झगड़ा शायद चुहल मात्र थी. और शायद उनके यार भी ऐसे ही थे. मुझे वर्धा का एक प्रसंग याद आ रहा है. कालिया जी की बीमारी का दूसरा दौर शुरू हो चुका था. वे वर्धा में आए हुए थे. उन दिनों दूधनाथ जी वर्धा में अतिथि आवासीय लेखक के रूप में मौजूद थे. एक  पूरी शाम दूधनाथ जी कालिया जी का हाथ अपने हाथों में लिए बैठे रहे थे. यह कोई पल भर की बात नहीं थी. बातचीत अपनी जगह चलती रही थी और दूधनाथ जी कालिया जी का हाथ अपने हाथों में लगातार लिए हुए बैठे थे. बीच बीच में उसे सहलाते हुए. वह विह्वल कर देने वाला दृश्य था.

मैं खुशनसीब हूँ कि उनके साथ कुछ यात्राओं का भी मौका मिला. इलाहाबाद के बाहर जो पहली यात्रा मैंने उनके साथ की थी वह मध्य प्रदेश के एक जिले सीधी की थी जहाँ कहानी पर केंद्रित कोई आयोजन था और कालिया जी मुझे अपने साथ लेते गए थे. वहीं पर भगवत रावत, कमला प्रसाद और अरुण प्रकाश जी से मेरा पहली बार मिलना हुआ था. हम टैक्सी से गये थे. मेरे लिए वह बेहद यादगार सफर था. उसके बाद एक बार उनके साथ लखनऊ जाना हुआ. वे वहाँ एक होटेल में रुके. मैं रात में अखिलेश जी के यहाँ रुका. शाम को बातचीत के क्रम में मैंने उनसे पूछा कि इस बार तद्भव के नए अंक में उपन्यास किसका दे रहे हैं तो अखिलेश जी ने जवाब दिया कालिया जी का. मैं चकित रह गया कि कालिया जी उपन्यास लिख रहे हैं और मुझे पता ही नहीं. अगले दिन लौटते हुए रास्ते में मैंने उनसे पूछा कि आप उपन्यास लिख रहे हैं? कालिया जी कुछ जवाब देते उसके पहले मेरे जितनी ही चकित ममता जी पूछ बैठीं कि रवि तुम उपन्यास लिख रहे हो? उन्होंने बच्चों की तरह शरमाते हुए जवाब दिया हाँ, अखिलेश ने कहा तो मैंने हाँ कर दिया. यह उपन्यास था ए बी सी डी. प्रवासी मनःस्थित खासकर प्रवासियों के अंधविश्वासों और पाखंडों के बीच यह वहीं पैदा होने वाली नई पीढ़ी के द्वंद्व पर केंद्रित है.

मैं इस उपन्यास का पहला पाठक था. उपन्यास मुझे अच्छा लगा पर शायद मैं उनसे और बेहतर की उम्मीद कर रहा था. इसलिए इस पर मेरी प्रतिक्रिया बेहद ठंडी रही थी. उन्होंने मुझसे पूछा कि कैसा लगा, मैंने जवाब दिया ‘ठीक है’. वे दुखी हो गये. बाद में उन्होंने कृष्णमोहन से कहा कि शायद कुछ बात बनी नहीं. मनोज ने बेहद ठंडी प्रतिक्रिया दी. कृष्णमोहन से मैंने क्या कहा मुझे याद नहीं पर यह हक और लोकतंत्र तो खुद कालिया जी से ही मिला था कि जैसा और जो भी लगे वैसा ही कह सकूँ. बाद में वह उपन्यास जब वाणी प्रकाशन से छपने को हुआ तो उन्होंने कहा कि अगर मन करे तो उसका ब्लर्ब मैं लिख दूँ. मैंने लिखा और वह मेरे नाम के साथ ही किताब पर छपा. यह मेरे लिए निजी तौर पर बेहद सम्मान की बात थी. तब मेरी एक भी कहानी कहीं नहीं छपी थी. मुश्किल से मैंने दो-तीन समीक्षाएँ भर लिखी थीं. उनकी बाद की सभी किताबों के ब्लर्ब कुणाल सिंह, शशिभूषण द्विवेदी, शंभुनाथ मिश्र या कि कुमार अनुपम जैसे युवाओं ने लिखे.

मैंने उनके बारे में सोचते हुए हमेशा पाया कि अपनी बुनावट में वह बिल्कुल बच्चों की तरह थे. बेहद निष्छल और मासूम. पर उनकी मुश्किल यह थी कि वे सोचते थे कि लोग उन्हें चालाक समझें. उनकी बहुत सारी चुहलें और शरारतें उनके इसी स्वभाव से पैदा होती थीं. यही नहीं कोई उन्हें चालाक समझता था तो वे खुश भी होते थे. बिल्कुल बच्चों की ही तरह. उनकी बच्चों वाली चालाकी के कई किस्से मेरे पास हैं. जैसे जब वे कोलकाता में रहते थे और मन्नू और मैं मेंहदौरी कालोनी इलाहाबाद में तो उनके समय से ही खाना बनाने के लिए एक लड़की घर पर आती थी. वे कोलकाता से पहली बार इलाहाबाद आए हुए थे. उन्होंने मुझे भरोसे में लेकर कहा कि यह लड़की मुझे थोड़ा तेज लग रही है. तुम मन्नू पर निगाह रखना. बाद में पता चला कि यही बात वह मेरे बारे में मन्नू से भी कह गए थे. हम दोनों खूब हँसे और तय किया कि हम दोनों एक दूसरे पर पूरी निगाह रखेंगे.

वागर्थ में जाने से पहले एक जमाने की चर्चित पत्रिका ‘कहानी’ के फिर से निकाले जाने को लेकर दो-तीन बैठकें हुई थीं. उस काम में डीपीटी मध्यस्थता कर रहे थे. एक बैठक में मैं भी बतौर भावी सहायक संपादक शामिल रहा. जो भी रहा हो वह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया. उसके तुरंत बाद उन्हें भारतीय भाषा परिषद की मासिक पत्रिका वागर्थ से न्योता मिला. उन्हें निमंत्रण था कि वे एक बार वहाँ जाकर सब कुछ देख ताक लें और अगर ठीक लगे तो वागर्थ के संपादन का दायित्व स्वीकार करें. वहाँ से वे हाँ कहकर लौटे. उन्होंने मुझसे कहा कि तुम तैयार रहना. मैं जल्दी ही तुम्हें वहाँ बुलाने वाला हूँ. यह अलग बात है कि वहाँ उन्हें कुणाल मिला और वह जल्दी ही कुणाल के प्रेम में पड़ गए. एक शाम को उन्होंने मुझसे कहा कि यहाँ एक लड़का है कुणाल. बहुत ही जहीन और संपादन का काम जानने वाला. कोई नाकारा होता तो अलग बात थी पर तुम्हें बुलाने के लिए उसको हटाना हर लिहाज से गलत होगा. बाद में जल्दी ही कोलकाता में मेरा कुणाल से मिलना हुआ. वह था ही ऐसा कि कालिया जी को उससे प्यार हो सकता था. जल्दी ही मुझे भी हो गया जो आज तक कायम है.

कलकत्ते में एक दिन उन्होंने कुणाल से कहा कि जाओ मनोज को मल्टीप्लैक्स दिखा लाओ. इलाहाबाद में तब तक एक भी मल्टीप्लैक्स नहीं था और इलाहाबाद के अलावा कोई और शहर मैं जानता नहीं था. एक दिन वे और ममता जी मुझे काली मंदिर दिखाने ले गए. उस मुलाकात में मेरे और कुणाल के बीच जो दोस्ती बनी उसकी एक वजह कालिया जी भी थे. हम दोनों को उनका स्नेह भरपूर मिला था. और हम दोनों ही उनको डूबकर प्यार करते थे. पर उनको प्यार करने वाले हमारे अलावा भी बहुत थे. जब वह इलाहाबाद से कोलकाता के लिए निकले थे तो इलाहाबाद से उन्हें विदा करने के लिए सैकड़ों लोगों का हुजूम स्टेशन पर इकट्ठा था. शहर के अनेक साहित्यकार, विश्वविद्यालय के छात्र, मन्नू के दोस्त, खुद कालिया जी के तमाम दोस्त सभी स्टेशन पर उपस्थित थे. कई साहित्यकार भावुक हो रहे थे पर कालिया जी उनकी भावुकता का एक मीठा उपहास ही कर रहे थे.


कोलकाता जाने के पहले एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि तुम यहीं क्यों नहीं आ जाते. मन्नू (कालिया जी के छोटे बेटे) भी अकेला है, इतना बड़ा घर है दोनों रहो. मेरे लिए भी बढ़िया रहेगा कि हम ज्यादा संपर्क में बने रहेंगे. मैंने उनसे कहा कि अगर मन्नू की भी इसमें सहमति है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है. उनके जाने के एकाध हफ्ते बाद मैंने रसूलाबाद वाला अपना कमरा खाली कर दिया और बी-२३३ मेंहदौरी कॉलोनी में रहने आ गया. यहाँ मैं करीब तेरह महीने रहा. आज भी सपनों में मैं अक्सर उस घर में पहुँच जाता हूँ. मैं दिन भर घर पर ही रहता था और साथ में था ममता जी और कालिया जी का विशाल पुस्तकालय. उन तेरह महीनों में मैंने जितनी किताबें पढ़ीं न उसके पहले कभी पढ़ना हुआ था न कभी बाद में संभव हो पाया.

शाम को अक्सर उनका फोन आता. वे दिन भर का हालचाल पूछते. मन्नू का हालचाल पूछते. और भी न जाने कितनी बातें. उसी दौरान एक दिन मुझे डाँट भी पड़ी कायदे से. ऐसी ही कुछ बातों के बाद उन्होंने मुझसे पूछा कि मन्नू कहाँ है? मैंने कहा मुझे पता नहीं. वे किसी बात पर भरे बैठे थे पहले से. उन्होंने कहा कि ऐसे ही तुम दोनों साथ में रहते हो. उसको तुम्हारे बारे में कुछ पता नहीं, तुम्हें उसके बारे में कुछ पता नहीं, खूब निभ रही है तुम दोनों की. उसके बाद उन्होंने उन किताबों के बारे में पूछा जो समीक्षा के लिए दो-तीन महीने पहले मेरे पास भेजी थी. मैंने कहा कि लिख रहा हूँ, जल्दी ही भेज दूँगा. वे भड़क गए. बोले समझते क्या हो तुम अपने आपको? मैं मौका दे रहा हूँ तुमको कुछ काम करने का और तुमको आवारगी सूझ रही है. अगर तीन-चार दिन में नहीं भेज सकते तो भेजने की जरूरत नहीं है. और भी देर तक वे मुझे डाँटते रहे. यह पहला और आखिरी मौका था जब मैंने उनसे डाँट खाई. पर अगले दिन शाम को वे फिर पहले की तरह ही वत्सल और प्यारे थे.

जहाँ तक मन्नू से निभने का सवाल है तो सचमुच हम दोनों की बहुत बढ़िया निभ रही थी. हम दोनों एक दूसरे के कामों में दखलंदाजी नहीं करते थे. मन्नू का कमरा ऊपर था. वह रात भर काम करता और दोपहर एक-दो बजे तक सोता. उसके दोस्त आते तो सीधे ऊपर जाते. एक तरीके से मैं घर के मालिक की तरह रह रहा था और मन्नू मेहमान की तरह. कुछ संयोग भी इस तरह के बने कि कई बार बीमारी आदि के दौरान कुछ रिश्तेदार वगैरह भी आकर मेरे साथ टिके. तमाम दोस्त तो थे ही, जाहिर है कि उनमें लड़कियाँ भी थीं. इस स्थिति को लेकर मुहल्ले के और आसपास के कई लोग कालिया जी और ममता जी को लगातार रिपोर्ट कर रहे थे कि मनोज का क्या पर आपकी बड़ी बदनामी हो रही है. मुझको रहते हुए सात-आठ महीने हो चुका था. कालिया जी इलाहाबाद आए हुए थे. एक के बाद एक तमाम लोग उनसे मिलने आ रहे थे. कृष्णमोहन भी प्रतापगढ़ से आए हुए थे. शाम को कृष्णमोहन ने मुझसे कहा कि मनोज चलो थोड़ा घूम कर आते हैं. तब उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अपने रहने की कोई अलग व्यवस्था कर लूँ. मुझे बहुत बुरा लगा. मुझे लगा कि अगर कालिया जी कोई शिकायत थी तो सीधे मुझसे ही कहना था. मैं कृष्णमोहन से बार बार पूछता रहा कि बात क्या है और कालिया जी या ममता जी ने उनसे मुझको लेकर क्या कहा. कृष्णमोहन बार बार कहते रहे कि ऐसी कोई बात नहीं है पर तुमको लेकर तमाम बातें फैलाई जा रही हैं जो बाद में बुरा रूप ले सकती हैं.  

अगले दिन सुबह सुबह मैंने कालिया जी से कहा कि अगर उन्हें मुझसे कोई शिकायत थी तो सीधे मुझसे बात करनी चाहिए थी. मैं दुखी और उत्तेजित था. वे तब तब तक सिगरेट छोड़ चुके थे. जितना मैं उनको जानता हूँ अगर वे तब तक सिगरेट पीते होते तो कहते सिगरेट पियोगे? खैर उन्होंने कहा कि उनको मुझसे कोई शिकायत नहीं हैं. मैं मन्नू से बात कर लूँ और मुहल्ले के कुछ वैसे लोगों से सँभल कर रहूँ जो मुँह पर मित्र और शुभचिंतक बनते हैं और पीठ पीछे अफवाहें फैलाते हैं. मैं समझ गया कि कौन लोग थे. मन्नू से हुई बातचीत में मेरा शक सही निकला. और उसके बाद भी हम तब तक साथ उसी मकान में रहे जब तक कि मैं इलाहाबाद छोड़कर लखनऊ ही नहीं चला गया.

इस बीच वे अक्सर इलाहाबाद आते और तब घर में उनके मित्रों का जमावड़ा लग जाता. शाम को तो लगभग रोज ही महफिल सजती जबकि कालिया जी ने तब तक दोबारा पीना नहीं शुरू किया था. वे साहित्यिक मित्रों के साथ होते तो मैं भी वहाँ होता ही होता पर अगर उनके वैसे मित्र होते जो साहित्य में सीधे सक्रिय नहीं थे तो मैं ऊपर अपने कमरे में होता. ऐसा कई बार हुआ कि वे मेरा पैग बनाते और सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर मेरे कमरे में दे आते. उन शामों का नशा मुझमें आज तक भरा हुआ है. ऐसी ही एक रात मुझे थोड़ी ज्यादा हो गई थी, मैं वहीं ड्राइंगरूम में दीवान पर जाकर लेट गया था. जब सब लोग चले गये तो ममता जी मुझे खाना खाने के लिए उठा रही थीं. मैं उठने की हालत में नहीं था. मुझे उठाने की असफल कोशिश के बाद वे खाना बगल की टेबिल पर ढक कर चली गईं कि उठना तो खा लेना. और मैंने सुबह उठने पर पहला काम खाना खाने का किया कि ममता जी से डाँट न खानी पड़े. हालाँकि ज्यादा पीने के लिए थोड़ी सी डाँट तो तब भी पड़ी.

अभी तो थोड़ा कम हो गई पर एक समय मैं मिठाइयों पर बहुत लट्टू था. कालिया जी, ममता जी कोलकाता से इलाहाबाद आए हुए थे. वे वहाँ से कोई बंगाली मिठाई लाए थे जो मुझे कुछ ज्यादा ही पसंद आ गई थी. सुबह का समय था, मैंने ब्रश वगैरह किया और फ्रिज खोलकर एक साथ उतनी मिठाई मुँह में भर ली जितनी कि समा सकती थी. मेरा मुँह मिठाई से इस कदर भरा हुआ था कि मैं बोल पाने की हालत में भी नहीं था. वह पेट में जाती कि उसके पहले अपने कमरे से कालिया जी आ गए. वह मुझसे संबोधित होने ही जा रहे थे कि उन्होंने मेरा हाल समझ लिया. उनके चेहरे पर एक अनायास मुस्कान उभरी और वह पलट कर हवा में कुछ ढूँढ़ने लगे. उन्होंने इंतजार किया कि मिठाई मेरे पेट में चली जाय तब बात शुरू करें. और जब बात शुरू हुई तो यह मिठाई के बारे में न होकर थोड़े दिन पहले आए हुए वागर्थ के नवलेखन विशेषांक पर थी. वे साथी कथाकारों के बारे में, उनकी ताकत और कमजोरियों के बारे में मुझसे बात कर रहे थे और जाहिर है कि मेरी भी राय जानना चाहते थे.

वे नए कथाकारों के प्रति उत्साह से भरे हुए थे. और यह भी कमाल की बात थी कि उन्हें तब भी इस बात का लगभग सही सही अंदाजा था कि किसकी लेखकीय पारी कैसी होने जा रही थी. यह कोई संपादकीय दंभ नहीं था. वे उन संकेतों को पकड़कर बात कर रहे थे जो कहानियों में मौजूद थे. आज दस-ग्यारह साल बीत जाने के बाद साफ साफ नजर आता है कि वे अपने आकलन में कितने सही थे. नयेपन और नई चीजों के प्रति वे किसी भी तरह के पूर्वाग्रह से मुक्त थे. जहाँ वे असहमत पाते खुद को वहाँ भी वह सामने वाले के पक्ष को समझने की पूरी कोशिश करते.

जहाँ तक मेरी बात है, मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे कहानियाँ भी लिखनी हैं. इलाहाबाद में रहते हुए वे कई बार कहते कि तुम्हें कहानियाँ लिखनी चाहिए. वे कहकर भूल जाते और मैं सुनकर. एक बार उनका मन रखने के लिए मैंने कहानी जैसा कुछ लिखकर सुनाया तो उसका शुरुआती हिस्सा तो उन्हें ठीक लगा पर बाकी कहानी उन्होंने खारिज कर दी. फिर लंबे समय तक मैंने ऐसी कोई कोशिश दोबारा नहीं की. जब वह कोलकाता गए तो कहानी लिखने वाली बात फिर से बातचीत में सामने आने लगी. तब एक दिन मैंने उन्हें एक छोटी सी कहानी लिखकर भेजी. इसे पहले मैंने कविता की तरह से लिखा था और बाद में कहानी में बदल दिया था. जिस दिन कहानी उन्हें मिली, शाम की बातचीत में उन्होंने बताया कि कहानी पढ़ी. बस किसी तरह से छापने लायक है. मुझे तुमसे इससे बहुत बेहतर कहानियों की उम्मीद है. अगली कहानी थी ‘चंदू भाई नाटक करते हैं’ जो नवलेखन विशेषांक में छपी. इसके बाद तो जब भी वह कोई विशेषांक प्लान करते, बिना पूछे नाम घोषित कर देते. जब अंक छपकर आ जाता तो बताते कि फलाँ महीने में आने वाले अंक में तुम्हारा भी नाम घोषित है. जल्दी से कहानी भेजो. इस तरह से उनके संपादन में कुल सात कहानियाँ छपीं. मैं अपनी काहिली और आवारगी में गुम ही हो गया होता. यह उनका स्नेह और भरोसा था कि उन्होंने मुझे उससे बाहर निकाल लिया. आज मुझे लगता है कि अच्छा-बुरा जैसा भी होना था मुझे यही होना था पर मैं यह भी जानता हूँ कि वे मुझे न मिले होते तो मैं कुछ भी करता पर कहानियाँ तो शायद ही कभी लिखता.

लखनऊ के दिनों में उनसे मिलना कम हुआ. तब भी साल में दो तीन बार तो हो ही जाता था. फोन पर बात होती पर पता नहीं क्यों एक-दूसरे के हालचाल पर बातें खत्म हो जातीं. वर्धा आने के बाद उनसे मिलना जुलना और बातचीत फिर से पहले जैसी चल निकली थी. कई बार वे मेरे लिए चिंतित होते, कुणाल के लिए बहुत चिंतित रहते. एकदम उसी तरह जैसे वे मन्नू के लिए चिंतित रहते थे. हमसे पहले के लोगों में वे अखिलेश जी के प्रति गहरा स्नेह रखते थे और उनके बारे में हमेशा प्रेम से भरे रहते थे. पर एक सहज स्नेह और सद्भाव उनमें सबके लिए भरा हुआ था. कुछ साथी युवा कथाकारों से उनके मतभेद हुए जो कटुता की तरफ बढ़ सकते थे पर उन्होंने किसी के प्रति अपने मन में मैल नहीं रखा बल्कि स्थिति को सामान्य बनाने की पहल भी अपनी तरफ से ही की.

वर्धा में जब आखिरी बार वे आए हुए थे. मैं नागार्जुन सराय में उनके साथ बैठा हुआ था. उन्होंने कहा चलो फल खरीदकर आते हैं. उन्होंने बताया कि आजकल रात ढाई बजे के आसपास उन्हें भूख लग जाती है. ऐसे में वे ऊठते हैं और केला खा कर फिर से सो जाते हैं. गाड़ी में उनके अलावा ममता जी भी साथ में थीं. रास्ते में मैंने उनसे पूछा अभी भी पीते हैं तो सहसा पल भर को जैसे मायूस हुए हों, बोले, अब क्या पिएँगे. जब तक चली चले वही बहुत है. यह पल भर की बात थी पर पल भर की उनकी मायूसी मुझमें गहरे पसर कर बैठ गई थी. शायद यह इसलिए था कि मैंने उनको पहले इस रूप में कभी भी नहीं देखा था. मैंने तुरंत ही बात बदल दी. मैंने उन्हें बताया कि मैं उनकी कहानियों पर एक लेख के लिए नोट्स ले रहा था. उन्होंने यह बात अनसुनी कर दी और मेरे बेटे की तबीयत के बारे में पूछने लगे. वे ऐसे ही थे. तकरीबन पंद्रह-सोलह साल के साथ में कई मौके आए जब मैं उनकी कहानियों या कि उपन्यास पर लिखने वाला था और उन्होंने मुझे बरज दिया. जबकि मैं ऐसे भी अनेक वरिष्ठों को जानता हूँ जो परिचय होते ही किताब पकड़ा देते हैं और यह सदिच्छा जाहिर कर देते हैं कि आपको उस पर लिखना चाहिए. कई बार तो वे आदेश देने की मुद्रा में आ जाते हैं.

पिछले साल अक्टूबर में दिल्ली गया तो एक दिन मैं और कबीर संजय उनसे मिलने उनके घर गाजियाबाद गए. हम करीब तीन चार घंटे वहाँ रहे. वे हमेशा की तरह ही थे. विट और चुहल से भरे हुए. मैंने उन्हें बताया कि मैं जल्दी ही मुंबई शिफ्ट करने की सोच रहा हूँ तो उत्साहित और खुश हुए. वे मुझसे खोद खोद कर वह सब कुछ पूछते रहे जो मैं मुंबई में करने वाला था या कि अभी कर रहा था. वे बच्चों की तरह इस बात पर खुश थे कि मुंबई में रहने पर हमारा मिलना और बढ़ जाएगा क्योंकि वह वहाँ अन्नू (उनके बड़े बेटे) के पास अक्सर जाते रहते हैं. जब हम वहाँ से लौट रहे थे तो लगातार उनके बारे में ही बात कर रहे थे. वे थोड़े कमजोर तो दिखे थे पर हमें यह दूर दूर तक अंदाजा नहीं था कि आमने सामने बैठकर उनसे की गई यह आखिरी बातचीत है.

वैसे भी इन दिनों वह रचनात्मक योजनाओं से भरे हुए थे. दिल्ली वाले दिनों में उनसे कभी पूछता कि आजकल क्या लिख रहे हैं तो वे जवाब देते कि अब मैं क्या लिखूँगा. अब तुम लोग लिखो और जमकर लिखो. हालाँकि पढ़ते वह तब भी खूब थे. पर इस बीच जब भी बात होती वह कांग्रेस कल्चर को केंद्र में रखकर लिखना शुरू करने जा रहे अपने उपन्यास के बारे में बतियाते. वह इलाहाबाद के बारे में खूब बात करते. इलाहाबाद पर वह पूरी एक किताब लिखनी शुरू कर चुके थे जो तद्भव में धारावाहिक रूप में प्रकाशित होनी थी. जिसका पहला अंश तद्भव के नए अंक में प्रकाशित भी है. उस मुलाकात में भी इलाहाबाद पर काफी बातचीत हुई थी. वह संजय से गंगा, कछार और मल्लाहों की जीवन स्थिति पर देर तक बात करते रहे थे. उन्होंने संजय से उसकी कहानी ‘सुरखाब के पंख’ दोबारा पढ़ने की इच्छा जाहिर की थी जो इस भूगोल को केंद्र में रख कर लिखी गई थी.

फोन पर अक्सर बात होती उनसे. कभी किसी वजह से न उठा पाते तो देखते ही पलटकर करते. यह दिसंबर के आखिरी दिन थे कि कई बार फोन करने के बाद भी उनका फोन न उठा न आया. भीतर भीतर डर सा लगा. पिछले कुछ दिनों से उनकी तबीयत ज्यादा खराब हो रही थी. हालाँकि कभी कभार छोड़कर उनसे उनकी तबीयत के बारे में सवाल पूछना उन्हें अच्छा नहीं लगता था. फिर भी अखिलेश जी से उनकी तबीयत की जानकारी मिलती रहती थी. एक दिन ममता जी को फोन किया पर कालिया जी के बारे में, उनकी तबीयत के बारे में एक सवाल भी पूछने की हिम्मत नहीं पड़ी. अगले दिन फिर कालिया जी को फोन किया तो ममता जी ने उठाया और बताया कि उनकी तबीयत बहुत खराब है और वे अभी बातचीत कर पाने की हालत में नहीं हैं. जैसे ही हुए वे बात कराएँगी और वे बात करने लायक नहीं ही हो पाए. दो दिन बाद एक सुबह फेसबुक पर देखा कि वे बेहद गंभीर स्थिति में अस्पताल में भर्ती हैं. मेरा चेहरा उतर गया और मैं बैठ गया. कल्पना ने पूछा कि क्या हुआ तो मैंने मोबाइल उसकी तरफ बढ़ा दिया.

उसने देखा तो वह भी मायूस हो गई. उसने कहा तुमको जाना चाहिए और अगले दिन सुबह मैं दिल्ली में था. शाम को उनको देखा. मृत्यु ने उन्हें एकदम नवजात बच्चे की तरह बना दिया था. लंबा चौड़ा कद्दावर जिस्म सिकुड़ कर रह गया था. वे बिस्तर में लेटे हुए किसी छोटे से असहाय बच्चे की तरह लग रहे थे. अगले दिन फिर शाम को उनसे मिलना हुआ. वे एक दिन पहले की तुलना में बेहतर दिख रहे थे पर बेचैन भी. बेहद बेचैन उनकी आँखें इधर उधर घूम रही थीं. उन्होंने जैसे मुस्कराने की कोशिश की. इशारे से पास बुलाया. मैं पास गया तो कुछ कहा उन्होंने, जो मैं समझ नहीं पाया. मुझे रुलाई आने को हुई पर मैं रोया नहीं, मुस्कराता हुआ खड़ा रहा. मैंने आते हुए उनके पाँव छुए पर वे मेरी तरफ नहीं देख रहे थे. वे कहीं और देख रहे थे.
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मनोज कुमार पांडेय
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