कथा - गाथा : हृषीकेष सुलभ

Posted by arun dev on दिसंबर 12, 2014


पेंटिग के.रवीन्द्र

वरिष्ठ रंगकर्मी और कथाकार हृषीकेष सुलभ का नया कहनी संग्रह ‘हलंत’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. ‘द्रुत विलम्बित’ इसी संग्रह की मार्मिक कहानी है जो अंत तक पहुँचते पहुँचते विडम्बना में बदल जाती है. कहानी के अंत की यह विद्रूपता जैसे हमारा समय हो जिसमें मानवीय चाहतें क्रूर अंत को प्राप्त होती हैं, और हर सुंदर चीज पूर्वनियोजित व्यावहारिक तलखर में दफ्न हो जाती है.  

द्रुत विलम्बित                                      
हृषीकेष सुलभ



(एक)
पारुल लहराती हुई घर में घुसी. मानो पंख लग गए हों उसको. वह विज्ञापन में दिखनेवाली उस लड़की की तरह उड़ रही थी, जो अपनी हथेलियों से कबूतर उड़ाती है.परुल ने अपने बैग को उड़ा दिया. बैग जाकर पलंग से टकराया, फिसड्डी बम की तरह. किताबों-कापियों और अगड़म-बगड़म से भरे बैग से एक अजीब-सी आवाज़ हुई. वह अपनी दीदी से टकराते-टकराते बची और फिर दीदी के गले में बाँहें डालती हुई झूल गई. बोली - ‘‘उन्हें सुनना एक विलक्षण अनुभव है दी. .......एक ऐसा अनुभव, जो जीवन भर की थाती बन जाए. ........ऐसी स्मृति, जिसे कोई भी अपना सबकुछ खोकर बचाना चाहे. ........जानती हो दी, वह जब बोल रहे होते हैं, आनंद की अनुगूँजों से भरी एक ऐसी दुनिया में लेकर चले जाते हैं, जहाँ से जल्दी लौटना सम्भव नहीं. .......’’

वह अपनी रौ में थी. अब यह सिलसिला नया नहीं था. विश्वविद्यालय से आते ही वह सर-पुराणमें लग जाती और हाल-फिलहाल में पढ़ी हुई किताबों की भाषा में बातें करती.
‘‘सब्ज़ी गरम कर दूँ?’’ शुभा ने बहन के विलक्षण अनुभव के प्रति तटस्थता बनाए हुए पूछा.
‘‘ दी,...... थोड़ी देर रुको तो सही. .......तुम मेरी बातें नहीं सुनती हो आजकल. .....पहले मेरी बातें सुनो, ........फिर सब्ज़ी.’’ बाईस साल की पारुल नन्ही-सी बच्ची की तरह ठुनक उठी.
शुभा ने जबरन एक नकली और फींकी मुस्कान अपने चेहरे पर चस्पाँ किया. बोली - ‘‘चल, सुना अपने विलक्षण अनुभव के बारे में......’’

‘‘जाओ, नहीं सुनाती मैं. ......तुम मेरा मज़ाक उड़ा रही हो. मैं जब भी सर के बारे में बातें करती हूँतुम कोई न कोई काम लेकर बैठ जाती हो.....तुम्हें अच्छा नहीं लगता.’’
‘‘सुन तो रही हूँ तेरी बातें. .....अब कैसे सुनूँ? ....बता?’’
‘‘ऐसे नहीं.’’
‘‘ तो कैसे?’’

‘‘ऐसे.......’’ और वह शुभा के गले में बाँहें डालकर झूल गई.
अपने ऊपर लदी जवान लड़की की लहराती हुई देह की बोझ से तनिक झुक गई शुभा. कमर में हल्की-सी चिलकन हुई. ‘‘ऊफ़! .....अच्छा चल, .....पहले खा ले.’’

शुभा अब थकने लगी है. उसके और पारुल के बीच उम्र का फ़ासला भी तो है. तेरह वर्षों का फ़ासला. वैसे पैंतीस की उम्र कोई ऐसी उम्र भी नहीं होती कि देह साथ देना छोड़ने लगे. पर मन की थकन जब देह पर तारी हो जाती है, उम्र साथ नहीं देती. अपने आप टूटने लगती है देह. तेरह की उम्र से वह सम्भाल रही है पारुल को. अम्मा तो देख भी नहीं सकीं पारुल को. जन्म देकर विदा हो गईं. बाईस की हुई पारुल. उसके और पारुल के बीच में है विभास. दस साल के भाई और नवजात बहन को पालते-पोसते उम्र ऐसे बीती कि........... और पिता भी तो शिशु ही थे. पारुल को जनमती हुई अम्मा के अनायास चले जाने को वह जीवन भर सहजता से नहीं ले सके. इसे अपना ही अपराध मानते रहे और पीड़ा की गठरी ढोते रहे. कई बार तो वह अपने भीतर उठती पीड़ा की लहर से इतना आकुल हो जाते थे कि उन्हें सम्भालना कठिन होता था. शुभा का मन इस बात को नहीं मानता कि जीने और मरने का सम्बन्ध पीड़ा से होता है. प्रेम ही होता है पीड़ा का संगी-साथी. इसी की डोर में बँधकर संग-साथ जीना सम्भव होता है. जाने के बाद यही डोर जब-जब तनती है पीड़ा की लहरें उठती हैं. अम्मा के जाने के बाद पिता पीड़ा की वन्या में डूबते-उतराते रहे अपने अंतिम दिन तक.

शुभा ने रोटियाँ सेंकी. ......सब्ज़ी गरम किया. और दोनों बहनें खाने बैठीं. फागुन महीने की दोपहर थी. बदलते हुए मौसम की अफ़रा-तफ़री में तेज़ हवा, जाती हुई ठंड और आती हुई गरमी; सब आपस में उलझी हुई थीं. धूप के चमकते हुए कुछ टुकड़े खिड़की पर टँगे पर्दों की दरारों के रास्ते आकर कमरे की फ़र्ष पर बिछ गए थे और अबरख़ की तरह झिलमिल कर रहे थे.


वह अभी-अभी यहाँ से गया है.
हमेशा की तरह घूँट-भर काली चाय उसके कप में पड़ी है, जिसे वह आदतन छोड़ गया है. उसके मौजूद होने का अहसास एक भींगे हुए कम्पन की तरह यहाँ पसरा हुआ है. उसका होना, सचमुच एक विलक्षण अनुभव की तरह इस कमरे में सजीव है. उसकी आवाज़ की अनुगूँज के उत्कट आनंद और बात-बात पर खुलकर ठहाके लगाने की उसकी अदाओं के जादू से उबरना एक मुश्किल काम है. ........शुभा अभी सरापा डूबी हुई है. न चाहते हुए भी यह डूबना उसे अच्छा लग रहा है.


वह जब बोल रहा होता है, उससे असहमत नहीं हुआ जा सकता है. तमाम असहमतियों को वह अपने जादू से ढँक लेता है. पारुल जिस विलक्षण अनुभव की बात करती है, उस अनुभव से शुभा असंख्य बार गुज़री है. उस अनुभव की तासीर महसूस करती रही है. बस यही एक अनुभव तो है जिसने....... विचित्र है यह अनुभव. जैसे ही इसके उत्कट आनंद का जादू छँटता है, वह मन के अतल से बाहर निकलकर दूर खड़ा दिखता है; जैसे कोई प्रिय वस्तु मुट्ठी से छिटककर पहुँच से दूर चली गई हो और आपकी पकड़ की ताक़त को मुँह चिढ़ा रही हो. फिर उसकी आवाज़ की अनुगूँज किसी बीहड़ स्वर में बदल जाती है, पहाड़ों के टूटने, गिरने, धँसने  वाली आवाज़ की तरह. शुरुआत के दिनों में वह भी पारुल की तरह ही,......पर बाद में जब उसके रचे उत्कट आनंद के गर्भ से प्रकट हुए इस बीहड़ को उसने जाना, तब से अब तक वह किसी एक छोर तक पहुँचने के लिए भटक रही है.

आज वह कई महीनों के बाद आया था. इसके पहले, जब पारुल ने बी. ए. की परीक्षा पास की थी, ठीक रिजल्ट के दिन आया था वह. अनायास ही आया था, पर पारुल के पास होने की ख़ुशी को ऐसे सेलिब्रेट किया उसने, मानो उसे युगों से प्रतीक्षा हो इस क्षण की. अपनी कायरता को उत्सव में बदल देना उसकी अदा रही है. अब तक ऐसे अवसरों पर वह चुप ही रहती आई है. सब कुछ जानते-बूझते हुए भी वह चुप रहती है और वह अपनी चालाकियों से आगे निकल जाता है,........बहुत आगे.

आज इतने महीनों के बाद आया था और अपनी उसी पुरानी अदा के साथ उसकी दायीं हथेली को अपनी दोनों हथेलियों के बीच दाबकर बातें करता रहा..........पारुल की बातें,.........विश्वविद्यालय की बातें,.......अपनी किताबों की बातें. बताता रहा कि पिछले साल कैंसर से हुई पत्नी की मृत्यु के बाद उसका जीवन किस तरह बदल गया है. ........और देहरादून में पढ़ रहे छोटे बेटे और दक्षिण भारत के किसी दूरस्थ शहर में इंजीनीयरिंग कालेज में इसी साल दाखि़ला लेनेवाले बड़े बेटे की बातें करता रहा. दुनिया-जहान की बातें. शुभा की हथेली उसकी हथेलियों के बीच पसीजती रही और वह पसीजती हथेलियों के नमक से अनजान बातें करता रहा.

शायद वह अपने भीतर के किसी डर पर विजय पाने आया था! ........पारुल का डर..........डर इस बात का कि कहीं पारुल इस रिश्ते का सच तो नहीं जानती ! वह समय को लेकर हमेशा सतर्क रहा है. यह चैकन्नापन उसकी आँखों से टपकता है. कब आना और कब जाना है, हमेशा वही तय करता रहा है. वह अचानक ही अपने जाने की सूचना देते हुए उठता और चल देता. आज भी जैसे उसने  तय कर रखा था कि उसे कब इस घर से निकल जाना है. उसे मालूम था कि पारुल के घर लौटने का वक़्त क्या हो सकता है.........वह जा चुका है अपने विलक्षण अनुभव सौंपने की कला की बिसात बिछाकर........

पहली बार जब उसने बिसात बिछाई थी, शुभा एम. ए., दर्षनशास्त्र की छात्रा थी. अभी-अभी एडमिशन हुआ था और कुछ ही दिन हुए थे विश्वविद्यालय जाते. दर्षनशास्त्र विभाग को विश्वविद्यालय के लड़के महिला मंडल बुलाते थे उन दिनों. छात्राओं की संख्या ज़्यादा थी. दर्षनशास्त्र विभाग में फ्रेशर्स डे मनाया जा रहा था. सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन था. दूसरे विभागों के शिक्षक भी आमंत्रित थे. शुभा ने उस शाम राग यमन में माखननलाल चतुर्वेदी का एक गीत गाया था -  आज नयन के बँगले में संकेत पाहुने आए री सखि. उसकी आवाज़ जब ऊपर उठी,.......और उसने आरोह में तीव्र म लगाते हुए आलाप भरी.....सारेग मप ध निसा......, वातावरण आह्लाद से भर उठा और लोग वाह-वाह कर उठे. अपना गायन समाप्त कर जब शुभा मंच से उतरी, वह सामने था. बेलौस अंदाज़ में बोला - ‘‘लीजिए......एक पाहुन और हाजि़र है.‘‘

शुभा अकबका गई. समझ नहीं सकी क्या जवाब दे.......! क्या कहे! और उसने नज़रें झुका ली.......पर वह कहाँ माननेवाला था! वह तो बिसात बिछा चुका था. फिर अपना अंदाज़ बदलते हुए उसने कहा - ‘‘ कुलाँचें भरकर पहाड़ी पर चढ़ती हुई मद भरी हिरनी की तरह ऊपर उठती है आपकी आवाज़. और नीचे आती है जब..... जाकर सीधे लिपट जाती है प्राण से......बहुत ख़ूब!.......मैं इसी विष्वविद़यालय में अँग्रेज़ी पढ़ाता हूँ.‘‘
उस शाम सामूहिक भोज के दौरान दर्शन विभाग के छात्र-छात्राओं के साथ दूसरे विभागों के शिक्षक भी शामिल थे. उसकी आँखें शुभा का पीछा करती रही थीं और शुभा की आँखें भागती रही थीं इधर-उधर.
‘‘आप विधुशेखरजी की बेटी हैं?‘‘ वह फिर शुभा के सामने था.
‘‘जी.....!‘‘ शुभा की आवाज़ लरज़ रही थी.
‘‘वाह! क्या मणिकांचन संयोग है!.....चित्रकार पिता की संगीतज्ञ पुत्री........और ऊपर से सोने में सुहागा की तरह दर्शनशास्त्र की छात्रा. है न?‘‘ वह शुभा को घेर रहा था. शह-मात के खेल में लगा हुआ था और उसके इस खेल से अनजान शुभा उसके सामने खड़ी थी.
‘‘जी.....‘‘ शुभा असमंजस में थी. पर जाने कैसे उसके होठ खुले. ‘‘......आपको पढ़ा है मैंने.......आपकी कविताएँ,.....आपके लेख......‘‘
‘‘अरे वाह! मैं तो सौभाग्यशाली निकला......वर्ना आज के समय में कौन पढ़ता है कविताएँ!.........विधुशेखरजी को मेरा प्रणाम कहिएगा. मैं उनके चित्रों का घोर प्रशंसक हूँ..........दर्षनशास़्त्र की गुत्थियों से फ़ुरसत मिले तो कभी अँग्रेज़ी विभाग की ओर आइए.......आपसे बातें करके अच्छा लग रहा है. चलता हूँ.‘‘
और वह पलक झपकते अंतर्ध्यान हो गया था. मानो शुभा ही लिए आया हो और अपना काम ख़त्म कर चला गया हो.

बस यहीं से शुरु हुआ था सिलसिला. आज तक नहीं समझ सकी शुभा कि क्या नाम दे इस रिश्ते को?.....झिझक तो नहीं, पर दुविधा होती रही है उसे. यह दुविधा ही शायद शुभा की कमज़ोरी रही और वह इसे ही अपना हथियार बना उसे घेरता रहा......पराजित करता रहा...........उस दिन किसी नवजात की त्वचा की लालिमा अपने चेहरे पर लिये घर लौटी थी शुभा. मन काँप रहा था. देह काँप रही थी. सारी देह की त्वचा तनी हुई थी, जैसे बाएँ तबले की खाल हो और स्वप्न-लोक से झरती आवाज़ों से मिलकर बज रही हो. शुभा गिरती-पड़ती हुई घर पहुँची थी. आठ साल की पारुल से क्या बातें करती! पिता को क्या बताती वह!......बस बजती रही......बजती रही अनाघात. आधी रात में तानपुरा लेकर बैठ गई और काफी की बंदिश....आज रंग है री सखी.............गाती रही. अपनी आँखें मूँदकर सारेग म प धनिसा के आरोह और सांनिध प मग रेसा के अवरोह से खेलती रही शुभा. आँखें खुलीं तो पिता सामने बैठे थे. उसे गाते हुए सुन रहे थे.

एक सप्ताह बाद पिता के नए चित्र में अपने को पाकर लाज से दोहरी हो गई थी शुभा. अब तो नहीं, पर उन दिनों जब-जब उस चित्र को देखती उसकी साँसों की आवाजाही तेज़ हो जाती,.......हलक़ सूखने लगता...........नृत्य की उत्ताप भरी भंगिमा में एक स्त्री-देह की छाया,.......पृष्ठभूमि में समुद्र के गर्भ से उगते हुए सूरज की आभा का विस्तार,.........जल-सतह को हिलकोरतीं लहरों के फेन में घुलकर उमगता हुआ कनक-रंग. समुद्र तट पर चारों ओर सोना ही सोना........जल-सतह पर तट की ओर आते हुए पद्-चिह्न और तट की रेत पर समुद्र की ओर जाते हुए पद्-चिह्न.......और दूर,.......बहुत दूर से तिरती हुई आती एक छोटी-सी नाव. जाने कौन सी दुनिया रची-बसी थी इस चित्र में जोे शुभा को नई लगती!......वह आज याद करती है तो....... बिना किसी संवाद के ही पिता उसके मन को पढ़ लिया करते थे. बाद के दिनों में उन्होंने ख़ुद ही अपने इस चित्र को उलटकर दीवार से टिका दिया था.

बहुत कम बोलते थे शुभा के पिता. हाँ, अपने चित्रों में ज़रूर अपने को अभिव्यक्त करने से नहीं हिचकते. सुख हो या दुःख, मन का उछाह हो या मौन, या हों दुविधाएँ; विधुशेखरजी ने अपने चित्रों में इन्हें आने से कभी नहीं रोका. शुभा की अम्मा के जाने के बाद उनके चित्रों के रंग धूसर बने रहे. उन चित्रों में बजरी से पटी नीरव पगडन्डियाँ, जंगल की नीलिमा पर छाई हुई धुन्घ, पहाड़ों के अवसन्न षिखरों पर अटकी हुई मटमैली रोशनी के सिवा  और कुछ भी नहीं देख पाती थी शुभा. उन दिनों वह अपने पिता के चित्रों से उपजे, गिरने को आतुर पीले पत्तों का उच्छवास, जाती हुई पगध्वनियों की आसलताओं, झाडि़यों, पेड़ों के गझिन रन्ध्रों से हू-हू कर फूटते हुए सन्नाटे की आवाज़ को साफ़-साफ़ सुना करती थी. उससे मुलाक़ातों के बाद जब शुभा की जि़न्दगी ने पहली करवट ली, विधुशेखरजी के चित्रों के रंग बदलने लगे और उनसे उपजती आवाज़ों का संसार भी बदल गया. ........पर जैसे-जैसे दिन बीतते गये और शुभा की देह की तनी हुई त्वचा सिकुड़ने लगी, उसके पिता के चित्रों ने फिर अपना कलेवर बदला. दुविधा, प्रतीक्षा और अनहोनी की आशंका;.......और भी बहुत कुछ,......एक दूसरे में उलझा हुआ, अस्पष्ट और अधूरा. इस दौर के आरम्भ होने के बाद से पिता के अंतिम दिनों तक के सभी चित्र शुभा को आधे-अधूरे लगते हैं.

बेटी को गाते हुए सुनना उन्हें बेहद प्रिय था. शायद शुभा के स्वरों की बाँह पकड़ वह उसके मन और उसके जीवन के तिलिस्म में उतरने की कोषिषें करते थे. अंतिम समय में उन्होंने अपना प्रिय निरगुन सुनने की इच्छा प्रकट की थी. अपने होठों को कँपकँपाते हुए इशारे से शुभा को गाने के लिए कहा था. उसने तानपुरा लेकर भरे गले से गाना शुरु किया था - भोला मन जाने अमर मोरी काया.............और जाने कब उनकी आँखें लग गईं!........और ऐसी लगीं कि.........

विभास की अनुपस्थिति में शुभा ने ही पिता को मुखाग्नि दी थी. वह अपनी पत्नी के साथ अमरीका में था. उसने फ़ोन पर कहा था कि वह श्राद्ध के दिन पहुँचने की कोशिश कर रहा है, पर उसे नहीं आना था, सो चार साल बीत गए अब तक नहीं आया. अब तो उसके फ़ोन भी साल में दो-चार बार ही आते हैं. पिछली बार फ़ोन पर उसने बताया था कि उम्मीद है जल्दी ही उसे यूएस का सिटीज़नशिप मिल जाएगा.

वह जा चुका है. अब जब भी आता है, उसके जाने के बाद शुभा के लिए कठिन होता है समय काटना. जैसे शांत-थिर पोखर को कोई अपने पाँवों से हिलकोर कर जल को मटमैला कर दे, वैसे ही हो जाता समय उसके लिए. सेमल के पके फल-सी फटती हैं बीते हुए समय की गाँठें और बातें, घटनाएँ, आहत क्षण, ठिठकी हुई चाहतें - सब रुई लिपटे बीज की मानिन्द शुभा के इर्द-गिर्द उड़ने लगती हैं.


(दो)
पारुल ने एम. ए. पास किया और शोध के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया. शुभा ने सैंतीस की उम्र पार की. विभास और उसकी पत्नी को यूएस की नागरिकता मिल गई. दोनों कुछ ही महीनों पहले अपने पुरखों का देश देखने आए थे. दिल्ली आए और वहीं से केरल घूमने निकल गए. अपने शहर नहीं आ सके. दोनों ने बहुत जि़द की और बार-बार फ़ोन करते रहे कि पारुल को साथ लेकर शुभा दिल्ली पहुँचे ताकि यूएस जाने से पहले मुलाका़त हो सके, पर वह नहीं जा सकी. उसने पारुल से ज़रूर कहा कि अगर वह चाहे तो जाकर मिल आए, पर पारुल ने नकार दिया. विभास और उसकी पत्नी अपने घर नही आए पर उनके यूएस लौटने तक घर में एक अबोला पसरा रहा. शुभा और पारुल एक दूसरे से बतिया नहीं पा रही थीं. शुभा को बार-बार पिता याद आते रहे. उसे लगता, जैसे यह घर, घर नहीं आकाश का अनंत विस्तार हो और पिता की अनश्वर आत्मा किसी पंछी की तरह अपने ठौर के तलाष की लीला रच रही हो. वह अपनी ख़ामोशी के साथ विभास के प्रति पारुल के भीतर उबलते क्षोभ का सामना करती और अपने दबे हुए आँसुओं को बेरोक-टोक बहने से रोकती. विभास ने स्वतंत्रता अर्जित कर ली थी. मुक्ति पा ली थी उन दोनों से. उसकी यह स्वतंत्रता,.....उसकी यह मुक्ति शुभा को जितना आहत करती, उससे ज़्यादा दुष्चिंताओं से घेरती. विभास ही नहीं, वह भी लगातार अपनी स्वतंत्रता और मुक्ति का नाट्य रचता हुआ शुभा के पीछे छाया की तरह लगा हुआ था. शुभा के मन में सवाल उठते, क्या यह उनकी आत्माओं का विगलन है?......आत्महीन मनुष्य की स्वतंत्रता का जीवन के लिए क्या अर्थ?......वह हो या विभास, क्या ये लोग अपने जीवन में उस विराट अनुपस्थिति को कभी महसूस कर सकेंगे, जिसे ये स्वयं अर्जित कर रहे हैं?

शुभा ने अवसाद की बदली को अपने भीतर की उष्मा से पिघलाकर अपने जीवन के लिए नमी पैदा करने का हुनर अब सीख लिया है. इस युद्ध में संगीत उसका साथ निभाता है, कभी साथी बनकर, तो कभी अस्त्र बनकर........ उसे केवल पारुल की फि़क्ऱ है. पारुल, जिसे उसने अपने कलेजे से सटाकर पाला है. जिस रोती हुई पारुल को वह बिना दूघवाले अपने क्वाँरे स्तनों से दूध पिलाने का भ्रम रच-रच कर चुप कराती रही है, उस पारुल की फि़क्ऱ है उसे. पहली बार रजस्वला होने पर जो पारुल सप्ताह भर तक भयभीत हिरनी की तरह उसकी छाती से चिपकी रही, उस पारुल की फि़क्ऱ शुभा की भूख और नींद में शामिल है.

शुभा के ड्राइंग रूम में सोफे नहीं थे. बेंत की एक आरामकुर्सी थी, जिसका अपने जीवनकाल में उसके पिता उपयोग करते थे. और बेंत के ही कुछ छोटे-छोटे मोढ़े थे. एक छोटे-से चैकोर तख़्त पर दो तानपुरों के बीच वाग्देवी की प्रतिमा थी. सामने की दीवार पर पिता की बनाई उसकी अम्मा का एक तैलचित्र था. बहुत कम ऊँचाईवाला एक दीवान दीवार से सटा रखा हुआ था. इस दीवार पर पटना कलम चित्रशैली के अप्रतिम चित्रकार और विधुशेखरजी के गुरु ईश्वरी बाबू का बनाया एक चित्र टँगा था. विषय पारम्परिक होने के बावजूद इस चित्र में ग़ज़ब का आकर्षण था. एक हाथ में थाली लिये और दूसरे हाथ से आँचल सम्भालती पूजा करने जाती, पर पीछे मुड़कर देखती हुई औरत. सामने मन्दिर, पर नज़र अपने पीछे-पीछे आते एक पुरुष की छाया पर. इस औरत की आँखों में जादू था. विधुशेखरजी अक्सर शुभा से कहते कि इसकी आँखों में एक महाकाव्य छिपा हुआ है........एक नहीं कई-कई जि़न्दगियों की कहानियाँ रचा-बसी हैं इसकी आँखों में. उन दिनों शुभा को पिता का यह कथन अतिरेक से भरा लगता, पर अब उसे लगता है कि ऐसा भी हो सकता है. आँखों का विस्तार समुद्र की तरह अछोर हो सकता है या आँखों की गहराई पृथ्वी के अतल की तरह अनंत हो सकती है क्योंकि शुभा ने उसकी आँखों में बार-बार उतरकर ही अपने और उसके रिष्ते का सच ढूँढ़ा है.

दीवान पर बैठी थी शुभा. सामने खिड़की के पार फैली रोशनी को निहार रही थी. जबसे म्युनिस्पल कारपोरेशन वालों ने यह सोडियम वैपर लाइट लगाई है खिड़की सेअनावश्यक रोशनी के टुकड़े घर में घुस आते हैं और घर की रोशनी से धींगामुश्ती करते रहते हैं. अपने कमरे से निकलकर पारुल आई. उसके पास दीवान पर बैठी. फिर उसने अपने पाँव ऊपर किए और शुभा की गोद में सिर रखकर दीवान पर पसर गई. बोली - ‘‘ आँखें दुख रही हैं.’’
‘‘चश्मा चढ़ेगा अब तेरी नाक पर.’’ उसके बालों में अँगुलियाँ फिराती हुई शुभा ने कहा.
‘‘मैं नहीं लगाने वाली चश्मा.’’ लाड़ दिखाती हुई ठुनकी पारुल.
‘‘अंधी बनकर रहेगी क्या?.......चल, कल तुझे डाक्टर के यहाँ ले चलती हूँ.’’
‘‘कान्टैक्ट लेंस लगाऊँगी.......चश्मा नहीं.’’
‘‘पर उसके लिए भी तो डाक्टर के पास जाना होगा.’’
 ‘‘दी! आज कविजी मिले थे.’’

कविजी, यानी वह. अब पारुल उसे सरनहीं, कविजी बुलाती है. पहले उसे लगा था कि कहीं पारुल के इस सम्बोधन में चुहल या फिर व्यंग्य तो नहीं शामिल है! पर ऐसा नहीं था. उसने तत्काल जान लिया था कि इसमें कुछ और घुला-मिला है. कुछ और.........इस कुछ और से ही वह भयभीत रहती है इन दिनों.
‘‘दी!’’

‘‘हूँ.’’
‘‘तुमने कुछ पूछा नहीं?’’ पेट के बल होकर पारुल ने शुभा की जाँघ पर ठुड्डी टिका दी.
शुभा के सामने विनाश के ठीक पहले मचनेवाले हाहाकार के अतल में छिपी विरानी की भयावहता कौंध गई. पल-छिन के लिए उसका मन काँपा और देह थरथरा उठी. वह पारुल का सिर सहलाने लगी. फिर शुभा को उसकी हथेलियों के बीच दबी अपनी पसीजती हुई दायीं हथेली याद आई. उसको बोलते हुए सुनने का विलक्षण अनुभव याद आया. उसकी आवाज़ के जादू का उत्कट आनन्द याद आया. याद आई पिता के बनाए उस चित्र की वह नृत्य करती स्त्री, जिसकी उत्ताप भरी मुद्रा की अलौकिक निर्भयता ने शुभा को पंख सौंप दिए थे उन दिनों. वे दिन चमत्कारिक अनुभवों से भरे हुए थे. दिन हो या रात, साँझ की फींकी होती लालिमा हो या सुबह की चमक भरी झिलमिलाहट, लू भरी हवा के थपेड़े हों या फुहियों-सी गिरती चांदनी; उसकी धमनियों में बहते रुधिर का ताप कभी मद्धिम नहीं होता था. वह पारुल का सिर सहलाती रही और फिर धीमे स्वर में पूछा - ‘‘ क्या बता रही थी तू? ............बता.......’’
‘‘नहीं बताती मैं.........तुम्हें जब कुछ सुनना ही नहीं, फिर क्यों बताऊँ मैं?’’
‘‘सुन तो रही हूँ.‘‘ शुभा का स्वर डूब रहा था. शब्द छिटककर इधर-उधर हो रहे थे. पारुल के बालों में घूमती उसकी अँगुलियाँ अपनी ताक़त खो रही थीं. पारुल के कविजी के साथ बीता हुआ अपना समय शुभा को विभ्रम की तरह लग रहा था. उसे लगता, जैसे उसके कानों में फुसफुसा रहा हो बीता हुआ कल. यह एक जानलेवा, पर विस्मयकारी अनुभव था शुभा के लिए. वह इस फुसफुसाहट का कोई एक सिरा पकड़ना चाहती थी. चाहती थी इस फुसफुसाहट के साथ अपने भीतर उतर रहे अथाह अँधेरे से उबरना.
अचानक पारुल ने अपने को उसकी गोद से अलग किया. उठकर सामने रखे मोढ़े पर बैठ गई और शुभा की आँखों में अपनी आँखें डालकर पूछा - ‘‘दी, तुम मुझसे नाराज़ हो?’’
‘‘नहीं,.......नहीं तो........नाराज़ क्यों होऊँगी भला?’’ शुभा का प्रतिप्रश्न काँप रहा था. पारुल की दीठ उसकी आँखों के रास्ते उसके भीतर उतर रही थी. शुभा को पता था कि उत्कट आनन्द के क्षणों में आँखों की ताक़त कैसे बढ़ जाती है और दीठ लेज़र किरणों की तरह कितनी तीक्ष्ण हो जाती है.

 ‘‘अगर नाराज़ नहीं हो, तो फिर मुझसे बातें क्यों नहीं करती?......बोलो?.......दी, तुम क्या सिर्फ़ मेरी बहन हो?.....माँ भी तो हो.......बोलो, नहीं हो क्या?’’ पारुल की आँखें झरने लगीं, मानो किसी पहाड़ी नदी की राह में अँटका हुआ बड़ा सा शिलाखण्ड जल के दबाव से अचानक हट गया हो और नदी उमग उठी हो.

‘‘हूँ,.....माँ ही तो हूँ तेरी.’’ शुभा ने उन अदृष्य हाथों को, जो उसके हलक में उतरकर उसका कलेजा खींच रहे थे एकबारगी झटक दिया. दोनों घुटनों पर दोनों हथेलियों का दबाव बनाती हुई एक मद्धिम कराह के साथ उठी. कहा - ‘‘चल,.....खाना खा ले.......रोटियाँ सेंकती हूँ.’’

हाल के पास कविजी मिल गए. उनके साथ रीगल में लंच किया......फिर लाइब्रेरी गई.’’ सूचना के अंदाज़ में बोले गए पारुल के एक-एक शब्द में ठोसपन था.
यह ठोसपन पारुल के साहस से उपजा था या उसके सौंपे विलक्षण अनुभव और उत्कट आनन्द के गर्भ से उपजा था! शुभा के लिए अनिर्णय की स्थिति थी. जो भी हो, अगर इस ठोसपन ने पारुल को उसकी समूची थाती से काटकर अलग कर दिया विभास की तरह, तब क्या होगा? शुभा कुछ भी नहीं सोच पा रही थी. 

(तीन) 
चालीस पार किया शुभा ने और पारुल ने अपना शोध-प्रबन्ध सबमिट किया. इस बीच वह शुभा के पास नहीं आया. चार साल से ऊपर हुए उसे आए. लम्बे समय के बाद, जिस दिन पारुल का बी. ए. का रिजल्ट आया था उस दिन आया था. फिर जब पारुल ने एम. ए. में दाखि़ला लिया था और नया-नया विश्वविद्यालय जाना शुरु किया था, तभी आया था और उस दिन उसकी पसीजती हथेली के नमक से अनजान जो वह गया, सो फिर नहीं लौटा. 

..............पर क्या वह सचमुच नहीं आया उसके घर? क्या वह पारुल के साथ रोज़ नहीं आता है? कभी पारुल की आँखों की चमक में, तो कभी पारुल के पाँवों की गति में शामिल होकर या कभी पारुल की बातों में, तो कभी बिन हवाओं के उड़ती पारुल की जुल्फों में लिपट कर वह इस घर में रोज़ नहीं आता! उसकी आवाजाही का आलम यह है कि कभी वह पारुल की कि़ताबों के पन्नों से झाँकता है और वह पढ़ना छोड़ मुस्काती है, तो कभी खाने की मेज़ पर रखी पारुल की थाली में अपना अक्स चस्पाँ कर चुपके से निकल जाता है और बिना खाए उसकी भूख मिट जाती है. .

.......अब कुछ भी शुभा से छिपा नहीं है. जितनी बातें होती हैं, उनमें वह शामिल होता है, पर अब शुभा और पारुल के बीच उससे जुड़ी किसी बात या घटना या प्रश्न को लेकर सीधी बातचीत नहीं होती. शुभा उस निरीहता और विवशता के बारे में सोचती, जिसे वह दूर रहते हुए भी पारुल के माध्यम से उसके भीतर लगातार प्रक्षेपित करता रहा है. शुभा अपने जीवन का लेखा-जोखा नहीं करना चाहती और न ही सुख और आनन्द की कसौटी पर बीते दिनों को घिस-घिस कर परखना चाहती है, पर वह इन निरीह और निष्कवच अनुभवों का क्या करे! किससे कहे जाकर कि वह उसे पत्नी नहीं, रखैल बनाकर रखना चाह रहा था! एक ऐसा भेडि़या है वह, जो भावनाओं की खोल ओढ़कर शिकार करता है. भावुक शब्दों के विष से बुझे अपने तीक्ष्ण नाख़ूनों और दाँतों को  बहुत सधाव के साथ वह कलेजे के भीतर उतारता है. उसकी आँखों की पुतलियों से नेह-छोह की जो किरणें फूटती हैं, उनका विष भरा रसायन दिमाग़ को सुन्न कर देता है. अनुभवों की इस गठरी को किस समुद्र में तिरोहित करे! कौन समुद्र इसे पचा पाएगा! समुद्र भी तो तट पर उलीचते रहते हैं अपनी सम्पदा........

पारुल का बी. ए. का रिजल्ट जिस दिन आया, पत्नी के मरने के बाद पहली बार आया था वह. यह बताने आया था कि वह अब उसे अपनी पत्नी की ख़ाली जगह देना चाहता है. वह आया और बेहद चालाक़ भाषा में विलक्षण अनुभव और उत्कट आनन्द का कुहा फैलाकर चला गया. उसके जाने के बाद जब कुहा की चादर फटी, शुभा ने इस सत्य को जाना कि वह ख़ाली जगह भरने आया था,........न कि उसे उसकी जगह देने........शुभा को उस दिन पता चला कि उसकी तो कोई जगह ही नहीं थी. वह तो उसका इन्द्रजाल था और शुभा उसके सम्मोहन में हवा में झूलती हुई औरत भर थी.

पारुल बाहर गई है. वह पारुल को लेने आया था. उसने पुरानी कार बेचकर नई कार ली है. वह कार से उतरकर भीतर नहीं आया. अपनी नई कार का हार्न बजाकर उसने पारुल को बुलाया. पारुल पहले से तैयार थी. इंतज़ार कर रही थी. बाहर जाते समय पारुल ने कहा - ‘‘दी, मैं कविजी के साथ रात के खाने पर बाहर जा रही हूँ. रात को लौटने में देर हो सकती है क्योंकि हमलोग फ़्लोटिंग रेस्तराँ में खाना खाने जा रहे हैं. दी, आज शरद की अंतिम रात है,.......पूरे चन्द्रमा की रात इसलिए रेस्तराँ देर रात तक खुला रहेगा और रेस्तराँ वाला जहाज़ गंगा की सैर कराएगा. कविजी की इच्छा है कि हमारी शादी के बाद इसी रेस्तराँ में पार्टी हो, इस कारण भी हमलोग वहाँ कुछ ज़्यादा समय गुज़ारना चाहते हैं ताकि उसकी सर्विस स्टैन्डर्ड का सही-सही अंदाज़ लगा सकें.......’’


(चार)
शुभा की देह में झुरझुरी भर गई. उसे लगा, जैसे बर्फीली आँधी के  भँवर में उड़ती चली जा रही हो वह. उसे अपनी साँसें उखड़ती हुई लगीं. उसकी आँखों के सामने अजीब-सी सफ़ेदी छाने लगी, जैसे पुतलियों से बर्फ़ के बुरादे झर रहे हों. उसे अपना कमरा क़ब्र की तरह लगने लगा और वह यह सोचकर दहल उठी कि अगर इस कमरे से बाहर नहीं निकली तो यह बफऱ्ीली आँधी उसे इसी में दफ़्न कर देगी. शुभा लगभग भागती हुई कमरे से बाहर निकली. लिविंग रूम में पहुँचकर दीवान पर बैठ गई. उसने खिड़की से बाहर देखा. बाहर रात पसरी हुई थी. उसे लगा उसकी साँसों की आवाजाही भटक रही है. शुभा ने अपनी आँखों से कमरे में टँगी तस्वीरों को,....वाग्देवी की प्रतिमा को,......वाद्यों को बारी-बारी टटोला. वह कहीं भी अपनी नज़रें टिकाकर अपने को सहेजना चाहती थी, पर उसकी पुतलियों से अभी भी बर्फ़ के बुरादे झर रहे थे. अपने पैरों को खींचते हुए वह जैसे-तैसे सीढि़याँ चढ़ती हुई ऊपर भागी. छत खुली हुई थी. 

कुआर की अंतिम रात का टहकार चन्द्रमा मटमैले बादलों में तैर रहा था. उसने रेलिंग पर हथेलियाँ टिकाकर आसमान की ओर देखा. हल्की सिहरन भरी हवा ने उसकी साँसों को सम्भाला. छत से सटा आम का पेड़ चन्द्रमा और बादलों के खेल को निहार रहा था. उसकी हरीतिमा कभी चमक उठती, तो कभी छिन भर बाद ही उदास हो जाती. चमक और उदासी के इस खेल में उसने कुछ देर तक अपने को उलझाए रखा. उसे, उससे अपनी पहली मुलाक़ात याद आई. विश्वविद्यालय के सभागार में उस दिन का अपना गायन याद आया. राग यमन की वह बंदिश याद आई. पुतलियों से झरते बर्फ़ के बुरादे पिघलकर जलबूँदों में बदलने लगे. हवा के हल्के बहाव के साथ  तैरकर आती अपनी ही आवाज़ को सुनती रही वह. आकाश मानो विशाल मंच में बदल गया हो और वह उस मंच पर बैठकर गा रही हो और सारा जगत सुन रहा हो उसके गाए गीत को........पुतली पर बढ़ता-सा यौवन, ज्वार लुटा न निहार सकी मैं!......दोनों कारागृह पुतली के सावन की झर लाये री सखि! आज....


जिस समय शुभा की पुतलियों से झरते बर्फ़ के बुरादे पिघल रहे थे.........जिस समय वह अपनी छत के ऊपर टँगे आकाश के मंच से सारे जगत को अपनी करुण-कथा गा-गा कर सुना रही थी,.........जिस समय उसकी पुतलियों के कारागृह में सावन की झड़ी लगी हुई थी; ठीक उसी समय गंगा की विशाल छाती पर तैरते एक छोटे-से जहाज़ की पहली मंजिल पर बने रेस्तराँ में पारुल आपने कविजी यानी, कई पुरस्कारों-सम्मानों से विभूषित, कई काव्य-पुस्तकों के प्रणेता पचासवर्षीय कवि अग्निमुख उर्फ़ यूनिवर्सिटी प्रोफेसर डॉ. बाँकेबिहारी मिश्र के साथ बैठी चिकन टिक्का खाते हुए टकीला पी रही थी. टेबल पर एक लिफाफा रखा था. अब तक यूनिवर्सिटी कालोनी में रह रहे प्रोफेसर साहेब ने पारुल यानी अपनी होनेवाली पत्नी पारुल मिश्र के नाम शहर के नए बसे पाश इलाक़े के एक अपार्टमेंट में जो फ्लैट बुक कराया था, उसके क़ाग़ज़ात टेबल पर रखे इस लिफाफे में थे. और इसी लिफाफे में था कविजी के बैंक अकाउन्ट का पासबुक, जिसमें उनकी दिवंगत पत्नी के बदले होनेवाली पत्नी का नाम आज ही दर्ज़हुआ था.


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हृषीकेष सुलभ

15 फरवरी 1955, ग्राम-लहेजी, छपरा (बिहार)
कहानी संग्रह : बंधा है काल, वधस्थल से छलांग, पत्थरकट, तूती की आवाज़ , वसंत के हत्यारे
नाटक : धरती, आबा, बटोही
रंगमंच आलोचना : रंगमंच का जनतंत्र 
सम्मान :इन्दु शर्मा अंतर्राष्ट्रीय कथा सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, अनिल कुमार मुखर्जी शिखर सम्मान, रामवृक्ष बेनीपुरी सम्मान, पाटलिपुत्र पुरस्कार, सिद्धार्थ कुमार स्मृति सम्मान