कथा - गाथा : अपर्णा मनोज

Posted by arun dev on अक्तूबर 17, 2012




































अपर्णा मनोज की कहानिओं ने इधर अपनी पहचान बनाई है. प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में वह लगातार छप रही हैं. ‘ख़ामोशियों का मुल्क’ में एक ही शहर में, एक ही नदी के साथ रहने वाले दो कौमों की शोक – गाथा है, पढ़ने पर वैसा ही उदास प्रभाव छोड़ जाने वाली. 

ख़ामोशियों का मुल्क                    
अपर्णा मनोज




शहर में अमावस्या आती और अपने पीछे बित्ता-सा अँधेरा छोड़ जाती. पूनम आती और बित्ती-सी हंसी दे जाती, पर कोई सुन नहीं पाता, कि कहीं कोई हँसता है, कि कहीं कोई उससे भी जोर से सिसकियाँ भरता है. दूर-दूर गलियारे में सूरज रोज़ भटकता. रात को नियोन लाइट्स धोखा देतीं. और शहर अपने पेट में हाथ-पैर घुसा दाखिल होता..अपनी तरह देह को पसारता ..अकड़ाता.. कि दूर बहती नदी सिकुड़कर और किनारे लग जाती. नदी की शक्ल हौआ से मिलती थी.. उसकी देह काठ के हिंडोले की तरह कांपती. अर्हर्र..अर्हर्र..हिचकोले खाती और उदास होकर बहती..सूखती..अपनी दुबली देह लिए जित-तित घूमती.उसका आदम कहीं खो गया था.

नदी ने शहर को देखा था.
और शहर ने कई मौसम देखे थे..बेहिसाब आते और बेखबर जाते.

उसके पास बेख्वाबी का शोर था. बड़ी से बड़ी घटना चुपचाप इसमें पैबस्त हो जाती.

शोर में एक नक्शा काले तिल की तरह दिल पर जमा रहता.  इस नक़्शे में न जाने कहाँ-कहाँ से घर उड़-उड़कर आते. ट्रकों में, बसों में उनकी ढीली गन्दी आस्तीनें झूलती रहतीं. कभी वे ट्रेनों के दरमियाँ अपना पिछला शहर तलाश रहे होते. अपने टोलो-मोलों में एक नयी पट्टी बनाते. कहीं से अपने अतीत की मुर्गियां ढूंढ़ लाते. तब कहीं से मटमैली फाख्ताएं नीम अँधेरे इन बस्तियों में आ जातीं. लदे-फदे घरों को कहीं कुछ सालता था..उनका उधड़ा पुश्तैनी ज़ख़्म. फिर भी वे कई दफे बनते और अगले पल उजड़ जाते.


वही बेताब नदी अब भी हुआ करती है शहर में. एक समय था उसे पुलों की जरुरत नहीं थी. वह अपने जानवरों, पखेरुओं और झीम-झाम जंगलों की लोक कथाएँ सुनाती थी.  कहते हैं कि उसके किनारों पर घूमते नरम खरगोश शिकारी कुत्तों तक को हुलकार दिया करते थे.  इसके शफ्फाक पानी के पास ढेर सारी नावें थीं.  हर रंग की. उनमें जीवन भर-भरकर वह बस बहा करती. बच्चों के नन्हे हाथ पूरी की पूरी नदी दूर-दूर तक उछाल देते. घड़ियाल अपनी पीठ पर नौका बैठाये सुनहले किनारे को ले जाते.  बेख़ौफ़ थी नदी.  न उसे आर की चिंता न पार की..अपने समूचे इतिहास के साथ वह खंडहरों को धोती-पोंछती बहती. वह नहीं जानती थी कि उसके सिरहाने बजती महादेव की घंटियाँ किन ख़ास अर्थों में क्वणन - क्वणन किया करतीं हैं. उधर घुमावदार किनारे पर अलग-थलग बैठी मस्ज़िद की नीली मीनारें उसकी छाती के आर-पार अपना सुख-दुःख उंडेल देतीं. वे सुन्दर-सुन्दर आँखों वाले उसके पानी से वुज़ू करते और नदी उस वुज़ू से भीगी-भागी महादेव को दौड़ जाती. महादेव के माथे पर जाकर बरसती. काले महादेव स्तवन से और काले पड़ जाते. वे आदिम काले रंग से पैदा हुए थे. 

कहते हैं कि किसी कृष्ण विवर में ऊर्जाएं सोती-जागती हैं.
इसी काल कोठरी में सात रंग पैदा होते हैं, इसीमें से सूरज अपनी लिपियाँ लिखता धरती का रुख लेता है, तमाम ग्रहों का रुख लेता है.
उसीमें रात गिरती है. सुबह जलती है.

तो महादेव काबा हो जाते और काबे पर कसका खींच नदी खुश-खुश लौट जाती.

दुनिया की गेंद अजीबो-गरीब तरह से कई खिलाड़ियों के हाथ लुढ़कती रही. अब इसमें जीत-हार-हू-हू-धतकार-चीत्कार सब शामिल था. सो नदी भी उस गेंद के साथ पलटियां खा रही थी. नामालूम समय ने नदी से सब छीन लिया. उस पर पुल सज गए. जिन पाटों का नदी को ज्ञान न था अब वे उसे अलग किये दे रहे थे. महादेव इधर छूट गए और अल्लाह उस पार अपनी बस्तियों की फ़िक्र में मशगूल हुए. 


नदी के पास न बनने का सुख बचा..
न उजड़ने की पीड़ा..
उसके पाटों पर घर निशानदेही छोड़ते रहे.
घर लड़ते रहे. घर हँसते रहे.
एक घर वह भी था.
कहीं से उड़ कर आ गया था.

खामोश.

उसपर कोई नेम प्लेट नहीं खुदी थी.
नाम के सुख से वंचित उसकी दीवारें या तो बहुत मुक्त थीं या इतनी सतायी गई कि अपने पीछे छूटी जगह पर छोटे -छोटे दरवाजे तो थे पर सबके - सब भीतर को खुलते थे. बाहर खुलने से भयानक डर भीतर घुस आता था. मैं इसमें दाखिल होना चाहता था.


और एक तीसरे आदमी की तरह इस घर में दाखिल हुआ.
फिर कभी बाहर नहीं निकला.
मुल्के खामोशां ..क्या मेरी महबूबा का घर था यह?
अलबत्ता घर देखकर लगता था जैसे रातों-रात किसी चित्रकार ने इसे रंग डाला हो. छोटा-सा घर. खिड़कियाँ अखरोटी रंग की. मालती की गहराई बेल. छोटा बरामदा. उसके सामने एक बड़ा पेड़..मुझे उसका नाम नहीं पता, लेकिन मेरे लिए वह नख्ले मर्यम था. न जाने कौनसी हज़रत मर्यम इन सूखे दरख्तों के नीचे दर्द से तड़पा करती होंगी कि सूखे खजूर भी हरे हो जाते. खैर, इस घर को भीतर से देखने की इच्छा थी. इससे भी ज्यादा बड़ी इच्छा उनसे मिलने की.

उस दिन उन्होंने मुझे पहली बार देखा था. लॉन मोअर से दूब काट रही थीं. घिर्र-घिर्र की आवाज़ में उनकी शांत आँखें मुझपर टिक गई थीं.पसीने की बूँदें उनके माथे पर छलक आई थीं. पीली दूब जहाँ-तहां बालों में गुत्थम-गुत्था थी. धूप में उनकी आँखें और छोटी हो गई थीं.एकबारगी मुझे लगा कि वह मुझे इशारा कर रही हैं. नहीं, कुछ कह रही हैं. 
मैं पूछ बैठा, " जी...क्या कह रही हैं आप?" 

वह अपने शरीर से दूब झाड़ने लगीं. मैंने शर्मिंदगी महसूस की. अब वह मुस्करा रही थीं. मैंने देखा कि उनके शरीर को एक बड़ी परछाई लील रही है. एक चील ऐन उनके सिर पर मंडरा रही थी. मैं उचक-उचककर चील को उसके आसमान में लौटा देना चाहता था. पर उसके पास बन्दूक की घोड़ेनुमा मुड़ी चोंच थी, हवाओं में धाँय-धाँय करती सब झपट लेना चाहती थी..मैं चील देखता रहा और वे, हलकी भूरी आँखों वाली भीतर चली गईं.
भीतर खुलने वाला द्वार खट से भीतर ही बंद हो गया.
दिन का पर्दा गिर गया.

पड़ौस का सालों से बंद पड़ा घर क्या इन्होंने खरीद लिया है? इस घर को देखने कई खरीदार आये, किन्तु घर बिका नहीं. गौमुखी घर उत्तर को मुंह किये..कहते हैं ऐसे घरों में मौतें बहुत होती हैं या फिर घर की औरत परेशानियों से घिरी रहती है. इसलिए यह बिकता नहीं था. माँ अकसर कहा करतीं कि कोई आये तो यहाँ की वीरानगी दूर हो. उस दिन उन्हें देखकर माँ का चेहरा खिल गया था. पर अगले दिन ही माँ ने घोषणा कर दी थी कि, "इससे तो घर खाली रहता..."और वह चुप हो गई थीं. मैं अचरज से माँ को देख रहा था. ऐसा क्या किया पड़ौसी ने कि माँ इतनी नाराज़ हैं.और पड़ौस मेरी उत्सुकता का केंद्र हो गया. काश उनका नाम ही जान लेता. पर मैंने अपने मन में एक नाम गढ़ लिया था, "चश्मे बद्दूर".. तो वही कहकर मैं उनके बारे में सोचा करता. सुबह का अख़बार उठाते समय उनके घर पर निगाह चली ही जाती. बमुश्किल ही वह बाहर दिखाई देती थीं. कभी-कभी जी करता कि सोसायटी के बच्चों के साथ क्रिकेट खेलते में गेंद उनके घर उछाल दूँ ..फिर अपनी इस बचकानी हसरत पर मुस्करा देता.


फिर कई दिन तक मैं उनके लॉन की दूब बढ़ने का इंतजार करता रहा.पर वह बढ़ नहीं रही थी. उलटे सर्दी में पाला खा गई थी. चौहद्दी पर लगा गुड़हल खूब फूल रहा था..
एक दिन वह फिर दिखाई दीं. मैं पूजा के लिए गुड़हल चुरा रहा था और पकड़ा गया. वह मुझे देखती रहीं. मैंने माफ़ी मांग ली. "माँ पूजा करती हैं न, फूल ..." उनके होंठ हिले. 
क्या बोलीं? इतना धीमा बोलती हैं कि पूरे कान लगाने पर भी कुछ सुन नहीं पड़ता. उन्होंने हाथ हिलाया. मुझे बुला रही थीं. मैं लगभग बाउंड्री वॉल से कूदकर जाने को हुआ. तुरंत अपनी अशिष्टता का बोध हुआ और गेट खोलकर उनके घर को चल दिया. गुड़हल के फूलों से हाथ भरा था और दिल पूरा लाल. उन्होंने मुस्कराकर स्वागत किया.
घर ने मुझे भीतर समेट लिया.

भीतर तो कुछ था नहीं. ज़मीन पर गद्दा पड़ा था. एक तिपाई. दीवारें सपाट. कोई तस्वीर तक नहीं. शो केस पर रखा रेडियो बज रहा था. कोई बहुत पुराना गीत..आवाज़ फटी-फटी,ऊपर से नाक से गीत गाया जा रहा था. मन हुआ रेडियो बंद कर दूँ. मन हुआ और बंद हो भी गया. तो क्या ये मन पढ़ लिया करती हैं! मैं चकित इधर-उधर देख रहा था. वह आयीं..हाथ में स्लेट थी.वहीँ ज़मीन पर बैठ गईं. मेरे लिए मूढ़ा खिसका दिया. थोड़े संकोच के साथ मैं वहां बैठ गया. हमारे दरमियान ख़ामोशी पसर गई. न मैं बोलूं ,न वह. वह फिर उठीं और रेडियो के पास जा पहुँचीं. मैं कुछ जानूं इसके पहले ही रेडियो फिर तेज़ी से बजने लगा. मेरे ठहाके के साथ संवादहीनता खत्म हुई. बाजा बंदकर वह अपनी जगह आयीं और स्लेट पर कुछ लिखने लगीं...

लिखा था-"आपका नाम.."
फिर उन्होंने अपना मुंह खोलकर अंगूठा इस तरह हिलाया कि सब साफ़ हो गया. मैं चश्में बद्दूर को हैरानी से देख रहा था. मन पलभर के लिए बुझ गया. लौटकर स्लेट पर अपना नाम लिखने लगा तो उन्होंने स्लेट छीन ली.
अपने कान खींचकर लिखा- "सुनाई देता है...नाम बताइए..."
"मृत्युंजय.."

उन्होंने लिखा, "मैमूना"...और स्लेट उलट कर रख दी. बच्चों की तरह बत्ती कुतर रही थीं.

मैं चश्मे बद्दूर को देखता रहा. मैं स्लेट को देखता रहा. वहां खल्वत के सिवा और क्या था!मैं इस एकांत में चाक-चाक शब्दों की तरह पड़ा था जिनके पास चाबुक जैसी जुबां होती है और यह चाबुक हर बार खुद के सीने पर चोट करता है.
जेब से निकाल कर सारे गुड़हल मैंने स्लेट पर रख दिए.
समय मुझे वहां रोक नहीं रहा था. लेकिन यह तय था कि समय ने मुझे इस घर में उसी तरह ला छोड़ा था जैसे वक्त एक पंछी को किसी टहनी पर नीड़ में अटका देता है.पंछी की मुक्ति मौसम के पास होती है और मौसम कौन आज़ाद है..समय उसे अपनी घड़ी में तिकतिकाता है.....दुनिया बस उसके काँटों के बीच पैर रखती-बढ़ती है..न एक कदम आगे, न एक कदम पीछे.

मैमूना ने रोका नहीं.
अब कब मिलूँगा उनसे...मैं लौट गया.

उस दिन मेरी उनसे मुलाकात सिन्धी की दूकान पर हुई. इस सिन्धी का भी कोई नाम नहीं था. दूकान पर जरुर कोई नाम लिखा होगा पर सिन्धी के चेहरे पर कुछ ऐसी इबारत थी कि वही उसका इश्तहार करती थी. साइनबोर्ड महज औपचारिकता थी. उन्होंने अपना झोला मुझे थमा दिया. मुझे अच्छा लगा. हम दोनों साथ चल दिए. यहाँ हमारे बीच स्लेट नहीं थी. पर चश्मे बद्दूर की उँगलियों से अर्थ उड़कर मुझ तक आते. यह जानना कठिन था कि उँगलियाँ ओठों के इशारे पर बोलती थीं या उँगलियों के संकेत पर उनके ओंठ थरथराते थे. ज़बरदस्त सामंजस्य था उनमें.चलते-चलते कई बार मैं उनके बहुत करीब हो आता. हलके से उनकी बांहों का स्पर्श पा जाता.रास्ता तो समय से भी छोटा था. जल्दी उनका घर आ गया.

एक बार फिर घर ने मुझे भीतर समेट लिया.
वह स्लेट नहीं ला रहीं थीं. और मैं मैमूना को जानना चाह रहा था. स्लेट के बदले आज वह पुराने अख़बार ले आई थीं. इनका मैं क्या करता. वह मेरी तरफ देखे बिना अखबार पर उँगलियाँ चला रही थीं.फिर उनकी ऊँगली एक जगह आकर ठहर गई.जैसे पत्थर हो गई. जैसे बर्फ हो गई. जैसे वहीँ जम गई. मैंने उँगलियाँ छूकर अपना वहम दूर करना चाहा...नहीं वे सच में बर्फ हो गई थीं. सर्द..ठंडी.उन्होंने उसे सीने में भींच लिया. एक धुंधली तस्वीर थी.बुर्कापोश. केवल हिनाबस्त: पैर दिखाई दे रहे थे.तस्वीर के नीचे उर्दू में लिखा था.

मैंने पूछा,"किसकी तस्वीर है ..?"
उन्होंने मेरी जेब से पैन निकाल लिया.पर उसमें रिफिल नहीं थी. मैं सकुचा गया. वह भीतर चली गईं और स्लेट ले आयीं. यही मैं चाहता भी था.
उन्होंने लिखा- "हबीबा, मेरी बेटी...और यह रफ़ीक."
वह रोने लगीं.मुझे लगा कि मेरे कंधे पर है उनका सिर. उन्हें लगा कि मैंने अपने कंधे ढीले छोड़ दिए ताकि वह सिर टिका सकें.
फिर उन्होंने लिखा-"शहर..माचिस....आग..हरसू आग..तलवारें..पैट्रोल बम.."
वह लिखती गईं, मैं पढ़ता गया..

"हबीबा उसके कंधे पर थी. वह भाग रहा था.वह चीख रहा था.पागल हो गया था वह. नकाबपोश. अच्छा हुआ हबीबा ने उसे नहीं पहचाना.
उस रात सड़कें और काली पड़ गई थीं..घुप अँधेरे में उनके पंजे नुकीले हो आये थे.उनकी पहचानें अपनी शिनाख्त खो चुकी थीं. पहचानें पागल हुई पड़ी थीं. सड़कें नकाबपोश थीं. सड़कें हैवान थीं. वे घरों को निगल रहीं थीं. जो कभी मेलों में फिरकियाँ लिए नाचती थीं, मंडी में हरी-हरी सब्जियां हो जाया करती थीं,मसालों की ख़ुशबू से तर खैरोबरकत से आबाद थीं,अचानक किसी शैतान के वहम का शिकार हो गईं.
वहशी सिफत रात थी वह.
हम दोनों अकेली थीं. पड़ौस की ऊंची मिर्ज़ा दीवारें पुश्तैनी लड़ाइयों से सिलहपोश रही. पर उस रात उस पार की औरतों ने हमें पनाह दी. तीन औरतें वे और दो हम. पाँचों वहशतअंगेज़ सटी-सटी बैठी थीं. कहीं से हलकी सी रौशनी भी घुसती तो हम पाँचों अपने काले बुर्कों में अपना मुंह भींच लेतीं. रौशनी से बचने के लिए आज हमने बुर्के पहने थे.

पर जंगली सड़कों ने हमारे दरवाज़े तोड़ दिए. भारी-भरकम पैरों की आवाजें अँधेरे की पड़ताल करने लगीं.

कई चीखें..
वह हबीबा की थी..
ठन्डे अँधेरे में गरम लावा बहकर मेरे पैरों तक आया...
हिनाबस्त गरम खून ......
मेरी हबीबा का था. हाय! कुछ दिन ही तो बचे थे उसके निकाह में.
वह मुझ पर झपटा और फिर दो कदम पीछे हट गया. नहीं कई कदम पीछे हट गया. पागलों की तरह अँधेरे में हाथ-पैर पटकता.
मैं उसकी छुअन कैसे न पहचानती भला या वो मेरी!
"बलवाइयों में तुम?"
"दुश्मन के घर तू....मिर्ज़ा के घर तू ...तू और हबीबा..वह बुदबुदाया."
हू..हू..हू ...
जंगल में एक भेड़िया रो रहा था.
फिर ज़ालिम सिर पकड़कर धप्प से ज़मीन पर बैठ गया. जोर से चीखा...जैसे जिबह किया जा रहा हो. उठा. हबीबा का सर्द शरीर कंधे पर लादा और मेरा हाथ पकड़ भागता गया.मैं कब अँधेरे में पीछे छूटी..याद नहीं.
मेरे कपड़े तो चील कब के लेकर उड़ चुकी थी..
और वो 

शायद किसी ट्रेन चढ़ा होगा. कोई बस ले गई होगी उसे. उसके कंधे पर हबीबा बैठी होगी...

अखबार कहता है,देखो तो क्या कहता है,"शहर में पागल एक लड़की की लाश लिए घूम रहा है..." 

इसी शहर वह देखा गया था.
चश्मे बद्दूर चुप हो गई. उसने स्लेट पर लिखा सब मिटा दिया..
अब फर्श पर एक गुड़िया ठुमक-ठुमक कर चल रही थी..
ज्यों रूकती तो मैमूना उसमें चाबी भर देती.
वह फिर ठुमकने लगती ..
मैमूना रोती जाती 
गुड़िया ठुमकती जाती...

सिसकते-सिसकते उसने स्लेट पर लिखा ..गुड़िया लाया था, जब हबीबा पांच की थी. और जब कंधे पर ले गया तब...हाथ-पैर में हिना लगी थी..गाढ़ी होकर काली पड़ गई थी.
वही उसकी उम्र ठहरी.
तौबा ! शहर ने उसकी उम्र तक भुला दी.
चश्मे बद्दूर मेरे सीने से लगी थी.
मैं उसकी उम्र सोच रहा था..
अपनी उम्र सोच रहा था.
चालीस पार होगी..
मैं तीस का...
घर मेरे भीतर था....चुप.
और मेरा भीतर ..मुल्के खामोशां.





कविताएँ , कहानियाँ , अनुवाद और संपादन