21वीं सदी की हिंदी कहानी का स्वरूप: विनोद शाही


नई सदी में समय के हिसाब से तो अभी दो दशक ही गुज़रे हैं लेकिन जिन प्रवृत्तियों से कोई सदी नई बनती है उस लिहाज़ से देखें तो और पीछे जाना पड़ेगा. आलोचक विनोद शाही ने इन दो दशकों में प्रकाशित वरिष्ठ और स्थापित कथाकारों की चर्चित इक्कीस  कहानियों का संचयन किया है जिसकी भूमिका यहाँ दी जा रही है. ज़ाहिर है हर संचयन की अपनी सीमा होती है., उम्मीद है इसका दूसरा भाग भी वे संपादित करेंगे जिसमें युवा कथाकारों की कहानियां होंगी जिनसे वास्तव में यह नयी सदी बनती है.   

 

21वीं सदी की हिंदी कहानी का स्वरूप
विनोद शाही

 

एक अच्छी कहानी क्या होती है? अच्छी भी और बड़ी भी? सतही तरीके से देखने पर ये दोनों बातें एक लग सकती हैं, पर हैं नहीं. 

 

कहानी को देखने समझने के कुछ तयशुदा मानदंड बन गये हैं, जिन्हें अनेक कारणों से, हिंदी की इधर की कहानी की आलोचना, जाने अनजाने स्वीकार करके बैठ गयी लगती है. उस आधार पर कुछ कहानियों को अच्छी और कुछ को बुरी कह दिया जाता है. पर ज़रूरी नहीं कि जिसे हम एक अच्छी कहानी कहते हों, वह बड़ी कहानी भी हो.

 

हिंदी में प्रेमचंद-प्रसाद के दौर से कहानी के अच्छी होने के बारे में आलोचनात्मक समझ की कुछ रूढियां बन गयी हैं. वे ज़्यादातर कहानी के कथ्य के बारे में हैं. 

 

उस आधार पर बाद में प्रगतिशील, आधुनिकतावादी और नयी कहानी के विविध नज़रियों ने कुछ जोड़ा घटाया भी है. इस से कथालोचन का जो परंपरागतपरिदृश्य निर्मित हुआ, उसमे किसी कहानी के एक अच्छी कहानी होनै के आधार के रूप में कुछ कथ्यगत प्रवृत्तियां केंद्र में आ गयीं. जैसे समाज के वंचित वर्गों के उपेक्षित जीवन में झांकने और सहभागी होने, स्त्री और दलित के कोण से सामाजिक यथार्थ में रूपांतरकारी सरोकारों के साथ हस्तक्षेप करने तथा संबंधों और मूल्यों के तल पर मौजूद अंतर्विरोधों को बेनकाब करते हुए चेतना मे तब्दीली से ताल्लुक रखने वाली कहानियों को आम तौर पर अच्छी कहानी कह देने का चलन हो गया. इससे नुकसान यह हुआ कि इससे हट कर जो कहानियां यथार्थ की चिंता में मौलिक तरीकों से गहरे में उतरने की कोशिश करती हैं, उन्हें यदि उपेक्षित नहीं भी किया जाता, तब भी उनके सम्यक मूल्यांकन में अवरोध पैदा होने लगता है. 

 

कथालोचन की सैद्धांतिकी के क्षेत्र की उपेक्षा ने कहानी के विवेचन और मूल्यांकन को अंतर्विरोधग्रस्त बना दिया है. कथ्य-केंद्रित परिदृश्य में कहानी के कहानीपन की व्याख्या की पद्धतियों का सम्यक विकास नहीं हो पाया है. इससे कहानियों के, 'कहानी की तरह' अच्छी या बुरी होने की बात सामने नहीं आ पाती. 

 

ऐसे में कोई कहानी अच्छी भी हो और बड़ी भी, यह तय करना कठिन हो जाता है. इसके लिये एक कहानी को एक लंबे वक्त तक इंतज़ार करना पड़ सकता है. 

 

मैंने जब यह तय किया कि इक्कीसवीं सदी की ऐसी कहानियों तक पहुंचूं, जो अच्छी ही नहीं, बड़ी भी हों, तो पाया कि मेरी नज़र कई ऐसी कहानियों पर अधिक टिक रही थी, जिनकी हिंदी के आलोचना परिदृश्य में कोई खास चर्चा नहीं थी. इस बात से मैं इस नतीजे तक पहुंचा कि असल बात पहले यह स्पष्ट करने की है कि हम किसी कहानी को कब और क्यों बड़ी कहानी कहेंगे

 

मैंने कुछ अर्सा पहले 'कथा की सैद्धांतिकी' पर केंद्रित एक किताब लिखी थी. अब मुझे लग रहा है कि हिंदी कहानी के समकाल  को समझने के लिये, कथा की सैद्धांतिकी के कुछ निष्कर्षों को व्यावहारिक समीक्षा की ज़मीन पर कस कर देखना तर्कसंगत होगा. तो जो बातें इस संदर्भ में मुझे रेखांकित करने लायक लग रही हैं, वे इस प्रकार हैं:

 

1.   किसी कहानी को एक अच्छी कहानी कहने की वजह परंपरा से आती है, जबकि उसके बड़ी हो सकने की संभावना का आधार युगबोध के किसी आख्यान की शक्ल ले सकने में होता है.


2.   इक्कीसवीं सदी की युगबोधक तब्दीलियों के आख्यान किसी कहानी को बड़ा बनाने का आधार तभी बनते हैं, जब कोई कहानी इन आख्यानों को अपनी 'वैकल्पिक दुनियां की परिणति' तक ले जाये .


3.   युगबोध के वैकल्पिक आख्यान हो सकने की स्थिति, कहानी के कथानक और पात्रों की अंतस्संरचना को मौलिक रूप में बदलती है. यह मौलिकता किसी कहानी को एक खास युगबोधक संदर्भ में बड़ा बना सकती है.


4.   मौलिकता, युगबोधक तब्दीली के प्रति कहानी के अधिक संवेदनशील होने का लक्षण तो है, पर वह किसी कहानी के बड़ी होने के लिये एकमात्र पर्याप्त कारण नहीं है. वह कहानी, जो एक नयी ज़मीन तोड़ रही होती है, तभी बड़ी होती है, जब उसकी दृष्टि पर्याप्त गहराई और व्यापकता को एक साथ छूती है. गहराई और व्यापकता, दो अलग चीज़े नहीं हैं. वे एक साथ पारस्परिक संतुलन में घटती हैं, तभी उनका साहित्यिक मूल्य होता है. अलहदा अलहदा, उल्टे वे रचना का दोष हो जाती हैं.


5.   संतुलित गहराई और व्यापकता, कहानी को किसी ऐसे उद्घाटन की संभावना तक ले आती है, जिसे हम 'बड़ी बात' कह सकते हैं. इसका संबंध कथानकों की परिणतियों से ही नहीं, बीच बीच में कहीं भी उपस्थित उप-परिणतियों से भी होता है. कथानकों के बहुस्तरीय होने और पात्रों की मानसिकता के अधिक जटिल हो जाने वाले मौजूदा युगबोधक परिदृश्य में ये उप-परिणतियां अधिक अहम होती जाती हैं.

 

 

कहानी को जानने समझने से ताल्लुक रखने वाली सूत्र रूप में प्रस्तुत अपनी इस दृष्टि को आधार बना कर, मैंने इक्कीसवीं सदी के पहले दो दशकों की ऐसी कहानियों तक पहुंचने का प्रयास किया है, जिन्हें मेरी नज़र में बचाया जाना ज़रूरी है. इस कालावधि में प्रकाशित विविध कहानी संकलनों और पत्रिकाओं की बेशुमार अच्छी बुरी कहानियों के बीच से होकर गुज़रते हुए, अपने नज़रिये से अच्छी ही नहीं, बड़ी कहानियों को खोजना, एक कठिन और श्रमसाध्य कार्य था. इसलिये मैंने इस कार्य के लिये अपने कुछ मित्रों की मदद ली. उन्होंने मुझे अपनी अपनी दृष्टि से बचायी जा सकने वाली कहानियों की सूचियां ही नहीं दीं, कुछ ने उन्हें उपलब्ध भी कराया. इनमें देश निर्मोही, मुकेश वर्मा, विनेद तिवारी, हरि नारायण, अरुण देव, सूरज पालीवाल और तरसेम गुजराल सहित अनेक लेखक आलोचक शामिल हैं. मैं जिन लेखकों की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों तक पहुंचा, उनसे अनुरोध किया कि वे अपनी दृष्टि से अपनी प्रिय कहानियों के बारे में मुझे बतायें. इस क्रम में मैं कुछ ऐसी कहानियों तक भी पहुंचा, जिनकी हिंदी जगत में अभी तक कोई खास चर्चा नहीं हुई थी. स्वयं लेखक अपनी उन कहानियों को लेकर अधिक आश्वस्त थे, जिनका अपेक्षाकृत अधिक नोटिस लिया गया था. पर जब मैंने उनकी किन्हीं अन्य कहानियों को चुना, तो उनकी मन की व्यथा सामने आ गयी. उनके मुताबिक उन्होंने अपनी उन कहानियों में जैसे अपनी आत्मा को ही ढ़ाल दिया था, पर उनकी उपेक्षा के कारण से खुद उन कहानियों के महत्व के संबंध में असमंजस की स्थिति में थे. 'आईने से' तथा 'भीतर का वक्त' जैसी कहानियां उसी कोटि की हैं. 

 

अंततः मैं जिन कहानियों को चुन पाया, उन्हें यहां दे रहा हूं. मैं जानता हूं कि भविष्य में मैं इनमें कुछ और कहानियों को भी जोड़ना चाहूंगा, तो मुमकिन है कि मुझे इसके दूसरे खंड को तैयार करने की बाबत भी निर्णय करना पड़े. तथापि उसे भविष्य के लिये छोड़ता हुआ चुनी गयी इन कहानियों के महत्व के संबंध में अपनी संक्षिप्त राय आपके सामने रखना चाहता हूं.  

 

इस संदर्भ में ली गयी उदय प्रकाश की कहानी  'दिल्ली की दीवार' को आप पढ़ेंगे, तो पाएंगे कि वहां इक्कीसवीं सदी की पहचान तक ले जाने वाला उसका युगबोधक पक्ष, उनकी अधिक चर्चित कहानी 'मोहनदास' के मुकाबले कहीं अधिक सघन रूप में मौजूद है. 'पाल गोमरा के स्कूटर' में पिछली सदी की युगबोधक स्थितियों का वह संक्रांतिकाल है, जो इतिहास के विखंडन तक ले गया है. वह विखंडन प्रक्रिया उसकी कहानी 'दिल्ली की दीवार' तक आते आते अपने चरम तक ही नहीं पहुंचती, विकल्प की तलाश में असफल होने की नियति को भी उदघाटित कर जाती है. 

 

इस बड़ी कहानी को, हिंदी कथालोचन के परंपरागत नज़रिये के आधार पर, बड़ी कहानी कहना तो क्या, एक अच्छी कहानी भी नहीं माना गया. मेरे साथ संवाद करते हुए अनेक वरिष्ठ कहानीकारों और आलोचकों ने अपनी अनौपचारिक चर्चाओं में यह कहा किइसे छोड़ देना बेहतर होगा, क्योंकि यह एक कमज़ोर कहानी है. अचानक मुझे अहसास हुआ कि  हिंदी में आलोचनात्मक दृष्टि का संकट इस हद तक गहरा गया है कि लेखक-संपादक-आलोचक, बिना गहन विश्लेषण के, यह कहने लग पड़े हैं कि अमुक कहानी तो कूड़ेदान में फेंक देने लायक है. जबकि होना यह चाहिये कि  हम अपनी अपनी दृष्टि से विवेचन विश्लेषण करके जब किसी कहानी को अच्छा या बुरा बतायें, तो उन कसौटियों की बात अवश्य करें, जिन्हें मूल्यांकन का आधार बनाया गया हो. इसके अभाव में बनायी गयी राय को, 'सम्यक निर्णय' कम, 'फतबा' अधिक कहा जाना चाहिये. आलोचना के अंतर्विकास के संदर्भ में यह स्थिति चिंताजनक है. 

 

'दिल्ली की दीवार' को ठीक से पढ़ना हो, तो हमें इस बात पर अपनी निगाह टिकानी होगी कि वहां किस प्रकार अंग्रेज़ और मुगल काल के प्रतीकों के ध्वंस के भीतर से, हमारे दौर के नये इतिहास के प्रकट होने की आहट सुनाई देनी आरंभ हो गयी है. अतीत के ध्वंस के क्षेत्र  की तरह एक पार्क में स्थापित बुत और एक वीरान मस्जिद के खंडहर, इस कहानी में समाज के हाशिये पर पड़े लोगों के आश्रय हो गये हैं. यह युगप्रवर्तक स्थिति है, जिसके भीतर से किसी विकल्प को खोजने की असफल कोशिश सामने आती है. इसके बाद कहानी का समय, इतिहास और स्वप्न के बीच उतरता हुआ एक नयी तरह के कथानक  को गढ़ने की मौलिक ज़मीन तक पहुंचता है. स्थितियां हास्यास्पद हैं, पर गंभीर अर्थ तक ले जाती हैं. 'गंभीर हास्यास्पदता' और 'हास्यास्पद गंभीरता' को ध्यान से देखेंगे, तो इस में हम मौजूदा दौर की विडंबना को परिभाषित करने के सूत्र भी खोज पायेंगे. इस कहानी में वे तमाम बातें हैं, जो किसी कहानी को इक्कीसवीं सदी की प्रतिनिधि कहानी के रूप में बड़ा बनाती हैं.

 

संजीव की सन् दो हज़ार के बाद की कहानियां पढ़ीं तो लगा कि 'मानपत्र' में रविशंकर के निजी जीवन और संगीत वाले आयामों के कारण, कहानी के समयबोध का विस्तार तो हुआ है, पर अपनी परिणति में वह कहानी स्त्री विमर्श के तयशुदा ढ़ांचे वाले अर्थो की व्यंजना करने की दिशा पकड़ लेती है. नतीजतन यह कहानी 'बड़ी' होती होती रह जाती है.      

 

प्रियंवद की इस दौर की अनेक कहानिया खासी चर्चित रही हैं. नयी ज़मीन तोड़ने के लिहाज से वे अपने बाकी तमाम समकालीनों से बहुत आगे नज़र आते हैं. उनकी 'दिलरस' और '1934 के न्यूरंबर्ग में जवान होती हुई एक लड़की' जैसी कहानियां युगबोधक तबदीली को अधिक करीब से समझने के लिये एक आईने की तरह हैं, परंतु दृष्टि की गहराई और व्यापकता में संतुलन लाते हूए कोई बड़ी बात कह जाने की संभावना को खोजना हो, तो  हमें उनकी 'गोधूलि' कहानी की ओर रुख करना पड़ता है. हालांकि इस कहानी की, उनकी कुछ अन्य कहानियों के मुकाबले, अधिक चर्चा नहीं हुई है, पर यह कहानी, कहानी के तल पर 'संतुलन' को बेहतर तरीके से साध पाने की वजह सेबचा लिये जाने लायक लगती है. 

 

अखिलेश की 'श्रृंखला' कहानी इस लिहाज से अन्यतम कहानी है कि इसमें युगबोधक यथार्थ के अंतर्विरोध, एक 'वैकल्पिक इतिहास' का 'आख्यान' बनते दिखाई देते हैं. इसके लिये वे एक अल्पदृष्टि व्यक्ती की 'दूरदर्शिता' को आधार बनाते हैं, जो एक तरह की युगबोधक विसंगति है. यह कहानी फिर और गहराई नापती हुई, स्वप्न और इतिहास की बीच की दुनियां तक चली जाती है. यह कहानी, दृश्य, परिदृश्य और अंतर्दृश्य- इन तीन  धरातलों पर एक साथ गतिशील होती हुई, इतनी बड़ी ज़मीन नापती है कि इसे सहज ही एक मुकम्मल कहानी कहा जा सकता है. यह कहानी, युगांतर के मौजूद होने के संकेत देती है. 

 

'दिल्ली की दीवार' तथा 'श्रृंखला' कहानी से इतिहास और स्वप्न के बीच की दुनियां में प्रवेश से एक नया रास्ता खुलता है. बाद में उस रास्ते पर पुख्तगी व हिम्मत से चलते हुए, शिवेंद्र अपनी 'चौकलेट फ्रेंडज़' जैसी कहानी में तो गोया, इतिहास और स्वप्न के बीच की दीवार को ही गिरा देने लगते हैं. ऐसा करते हुए वे एकदम मौलिक कहानियों के साथ इस परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराते हैं. 'चौकलेट फ्रेंड्ज़' में हम एक जादुई वक्त मे दाखिल होते हैं, जो इतिहास और स्वप्न की बीच की वह दुनियां है, जहां एक कहानी यथार्थ का वैकल्पिक आख्यान बनती में दिखाई देने लगती है. 

 

इस दौर में स्त्री और दलित विमर्श की 'अच्छी' कहानियां लिखी गयी हैं, पर 'बड़ी' कहानियां वे हैं, जो इस विमर्श के हाशियों का इतना विस्तार कर देती हैं कि ये विमर्श अपने सीमित सरोकारों को पीछे छूटता पाते हैं. ऐसा होने पर हाशियों के क्षैतिजिक पटल पर, वहां दूर पार से वह मनुष्य झांकने लगता है, जिसकी व्याप्ति सार्वभौम है. किरण सिंह को, इस संदर्भ में, अपनी 'संझा' जैसी समर्थ कहानी के कारण, अपने समकालीनों से अलग खड़े साफ देखा जा सकता है. उनके पास  'द्रौपदी पीक' और 'शिलावहा' जैसी कई और बड़ी कहानियां भी हैं. परंतु वे स्त्री विमर्श की सीमाओं का उस तरह अतिक्रमण नहीं कर पातीं, जैसा कि 'संझा' में अकस्मात संभव हो सका है. यह कहानी उनके जीवनानुभव से बिना किसी बनाव और लगाव के, सीधे कहानी के आख्यान में रूपांतरित हो जाती है. समाज के  लैंगिक यथार्थ के हाशिये को केंद्र मे लाती यह कहानी, जल्द ही और गहराई में उतर कर, प्रकृति और जीवन के रिश्तों की कहानी में बदल जाती है. सभ्यता और संस्कृति के विविध समयों के जीवनानुभव समकाल का हिस्सा होकर कहानी को अनेक स्तरीय बनाते हैं. यह कहानी युगांतर की यवनिका उठा कर, स्त्री विमर्श के चोर दलवाज़े से, सार्वभौम जीवन में जिस तरह प्रवेश करती है, उसे देखते हुए इसे, भविष्य का पथ प्रदर्शन करने वाली एक 'बड़ी' कहानी कहा जा सकता है. 

 

किरण सिंह की 'संझा' का महत्व इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि यह  हमें लिंगबोधक अस्मिताओं की ऊपरी पर्तों के नीचे मौजूद उस तलस्पर्शी सत्य के निकट ले जाती है, जो सभी तरह के लिंगबोध के विभाजनों के पार है.

 

अल्पना मिश्र, प्रत्यक्षा और नीलाक्षी सिंह जैसी समर्थ कहानी लेखिकाएं, इस बीहड़ यथार्थ के भीतर से, अपनी अपनी तरह से रास्ता बनाती हैं. इन सब की कहानियों को एक साथ रख कर देखेंगे, तो पाएंगे कि इनकी कहानियां, स्त्री की दृष्टि से किये जाने वाले पाठ की तुलना में, युगबोध की दृष्टि से पढ़े जाने के लिये, अधिक व्याकुल हैं. स्त्री की अस्मिता यहां, युगबोधक इतिहास विखंडन की प्रक्रियाओं की वजह से, इसकी सीमाओं में न बंध पाने वाले, व्यापक सरोकारों से आंखें मिलाने लगी है. 

 

अल्पना मिश्र की कहानी 'भीतर का वक्त' में एक स्त्री की वह प्रसव वेदना है, जिसे एक स्त्री बेहतर तरीके से समझ सकती है. पर जल्द ही कहानी में इतिहास का पिछला दौर ही जैसे, इक्कीसवीं सदी का प्रसव करता हुआ, क्षत-योनि  होता दिखाई देने लगता है. बाबरी मस्जिद के ध्वंस के उत्तरकाल के सह समांतर, भविष्य का प्रतीक हो गया एक मरियल सा बच्चाहमारे सामने आ जाता है, जिसे उसकी मां अपना दूध भी नहीं पिला पा रही है. इतिहास के विकास की गाड़ी में सफर करती यह मां कहां जा रही है, आगे या पीछे, पता ही नहीं चलता. एक कहानी इतिहास का वैकल्पिक आख्यान कैसे होती है, इसे देखना हो, तो इस कहानी को पढ़ना चाहिये  

 

प्रत्यक्षा अपनी कहानी 'आईने से' में और आगे तक चली जाती है. वह स्त्री पुरुष के प्रेम की सार्बभौम दुनियां में सीधे प्रवेश करती  है और समकाल को बदलने के मनसूबे बांधने वाले  इन्कलाबी परिदृश्य में, जब कुछ भी नहीं बदल पाती, तो सीधे जीवन को बदलने निकल पड़ती है. आसन्न मृत्यु वाले हालात के बावजूद इसकी नायिका हमें उस अनुभव संसार में ले जाती है, जो जितना प्रागैतिहासिक है, उतना ही हमारे अपने समय का भी है. 

 

नीलाक्षी सिंह की कहानी 'उन के बाद' इसलिये एक 'बड़ी' कहानी हो जाती है, क्योंकि वह स्त्री धिमर्श को पहले एक सभ्यतामूलक स्थापत्य की शक्ल देकर, कहानी की दुनियां में एक मौलिक ज़मीन तोड़ती है, फिर एक ऐसी बड़ी सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि को उदघाटित करती है, जो अपनी अंतर्वस्तु में अर्धनारीश्वर से भी आगे की चीज़ है.

 

इन दो दशकों की कहानियों में से अगर हमें 'बड़ी बात' को उदघाटित करने वाली कुछ कहानियों को खोजना हो तो हम, 'संझां' और 'उनके बाद' के अलावा, तीन और कहानियों को बाकियों से ऊपर रख सकते हैं. ये तीन कहानियां हैं- योगेंद्र आहूजा की कहानी 'लफ्फाज़', मनोज रूपड़ा की कहानी 'टावर औफ सायलेंस और राजकुमार राकेश की कहानी 'कैंसर वार्ड'.


'लफ्फाज़' के साथ हिंदी कहानी एक विरल क्षेत्र में प्रवेश करती है, जो इसके परंपरागत परिदृश्य के लिये अभी तक अजाना था. एक मनुष्य के लिये दूसरे मनुष्यों स संबंध बनाने के लिये, भाषा उसका बुनियादी और सर्वस्पर्शी माध्यम है. पर भाषा के इस्तेमाल के तरीके, मनुष्यों के संबंधों को ही नहीं, मनुष्य को समग्रता में परिभाषित करने की हद तक जाते हैं. भाषा और चेतना के इन रिश्तों की ओर अमूमन ध्यान नहीं दिया जाता. भाषा का नियंत्रण संस्कृति के हाथ में होता है.  वह मूल्यों की ज़मीनहोती है. पर भाषा पर अगर कोई निरंकुश रूप में अधिकार कर ले, तो वह अचानक इस कदर मूल्य निरपेक्ष हो सकता है कि अमानवीय लगने लगे. मानव चेतना के इस रहस्य से पर्दा उठाने वाली बात को 'बड़ी बात' तो कहा ही जायेगा. इसे एक कहानी में ढ़ालना तो और भी कठिन है. इस लिहाज से 'लफ्फाज़', हिंदी कहानी के इतिहास में एक नया मोड़ लाने वाली घटना लगती है. ऐसी कहानियां कभी कभार ही लिखी जाती हैं. 

 

मनोज रूपड़ा की 'टावर औफ सायलेंस' हमारे सामने इस 'बड़ी बात' को उदघाटित करती है कि उत्पादन के लिये जलायी जाने वाली भट्ठी की आग, जीवन की सृजनशील ऊर्जा और सृष्टि के उदभव की आधार अग्नि, सभी एक सूत्र में पिरोये हैं. इस कहानी की स्थितियों की गहराई में उतरते ही, उनका यह व्यापक अर्थ अचानक हमारे सामने उदघाटित हो जाता है.     

 

राजकुमार राकेश की कहानी 'कैंसर वार्ड' हमे सामाजिक संबंधों के बीमार हो जाने से उपजने वाले उस सभ्यतामूलक कैंसर के रूबरू खड़ा करती है, जिसका कोई ईलाज नहीं है. पर कहानी इस के बाद हमें, स्मृतियों के सिलसिले वाले उस जीवनेतिहास में ले जाती है, जहां मृत्यु तक को जीने लायक बनाना संभव हो जाता है. यह कहानी इस 'बड़ी बात' के ऊपर से पर्दा उठाती है कि इतिहास और कुछ नहीं, बचा ली गयी स्मृतियों का पिटारा होता है और जैसे ही हम स्मृतियों के पार होते हैं, इतिहास हमें बांधने की सामर्थ्य खो देता है.

 

इस क्रम में एक अन्य अविस्मरणीय कहानी है,, चंदन पांडेय की 'भूलना'. वहां हम आतंकवाद और प्रशासन के दमन की पृष्ठभूमि मैं पैदा होने वाले ऐसे संकट के रूबरू होते हैं, जहां आदमी अचानक सब भूल जाता है. स्मृतियों हैं, तो इतिहास है और युगबोध की तरह उसका सार भी है. पर भूलने की स्थिति का क्या किया जाये. इस संकट को यह कहानी अपने कथानक और पात्रो के बीच पैदा हो गये भूलने के अंतरालों की तरह बुनने का एक नया शिल्प रचती है. सहज ही इसे हम एक नयी ज़मीन तोड़ने वाली कहानी कह सकते हैं. 

 

इक्कीसवी सदी में प्रवेश करते ही हिंदी कहानी अचानक इतनी ऊंचाई को छू लेगी, किसे अनुमान रहा होगा. हालांकि योगेन्द्र आहूजा के पास 'अंधेरे में हंसी' और मनोज रूपड़ा के पास 'साज़ नासाज़ जेसी कुछ दूसरी कहानियां भी हैं, जिन्हें हम इसी कोटि की कहानियां कह सकते हैं. तथापि अपनी व्यापकता में 'लफ्फाज़' और 'टावर औफ सायलेंस' अधिकाधिक बुनियादी धरातलों में उतरने का साहस दिखाती है. 

 

सामाजिक यथार्थ को सर्वोपरि मानने वाली अब तक की हिंदी कहानी इक्कीसवी सदी मे जीवन के अधिक बुनियादी क्षेत्रों में प्रवेश कर रही है. इसलिये अब हमें उन कहानियों के साथ समुचित न्याय कर पाने के लीये अपनी सैद्धांतिकी का अंतर्विकास करना होगा. यहां ऐसी बहुत सी कहानियां एक साथ प्रस्तुत की जा रही हैं, जिनकी सम्यक व्याख्या हिंदी के पारंपरिक कथालोचन के  लिये एक चुनौती सावित  हो सकती है. 

 

ऐसी ही कुछ अन्य कहानियाअअं हैं- एस आर हरनोट की 'आभी', तरुण भटनागर की 'प्रलय में नाव', मनोज कुमार पांडेय की 'पानी' और सत्यनारायण पटेल की 'तीतरफांद'. यहां ऐसे बहुस्तरीय कथानक मिलेंगे, जहां अनेक समयों का इतिहास बोध, समकाल में एक दूसरे के सह समांतर मौजूद दिखाई देगा. ये कहानियां समाज के मनुष्य केंद्रित ढांचों को तोड़ती हैं और हमारी कहानी को प्रकृति में स्वतंत्र विचरण के लिये आज़ाद करती हैं. इससे सामाजिक संघर्ष के तयशुदा सरोकार भी बदले हैं. मनुष्य के साथ, उसके संघर्ष में अब, वन्य प्राणी और प्राकृतिक शक्तियां तक सहयात्री होती दिखाई देने लगी हैं. ये कहानियां मौलिक प्रयोगशीलता का उदाहरण हैं. इनको, अपने कथानकों के भीतर से प्रकट होती मिथक जैसी संरचनाओं के लिये, देर तक याद रखा जायेगा. 

 

इनके समांतर ओमा शर्मा की 'दुश्मन मेमना' तथा आशुतोष की 'अगिन असनान' ऐसी कहानियां हैं, जो प्रकृति और उसके प्राणियों से अपने संवाद के दमित होने की वजह से, प्रकट हुई विकृतियों का प्रकोप झेलती हैं. वे मनुष्य के सभ्यता व संस्कृति की अमानवीयता के खिलाफ मरणांतक लड़ाई लड़ने की विवशता से अभिशप्त हैं. 'दुश्मन मेमना' में अर्थतंत्र की मंदी और 'अगिन असनान' में संपत्ति के बंटवारे के विकल्प की अनुपस्थिति, इन कहानियों को युगबोधक जटिलताओं के रूबर ऊ खड़ा करती है. ऐसे हालात में इन कहानियों के पात्रों की निजी दुनियां हारती है, पर व्यवस्था भी विजयी नहीं होती. जिसे शतरंज में 'स्टेलमेट' कहा जाता है, वह इस नये दौर की कहानियों के नये शिल्प की शक्ल ले रहा है. प्यादे मर रहे हैं, पर राजा रानी की विजय भी संदेहास्पद है. यह सत्ता के विकेंद्रित होने का लक्षण है, पर सत्ता पर काबिज़ होने वालों को भी अंततः कुछ नहीं मिलता. हालात अराजक हैं, पर उन्हें विस्फोटक होने से बचा लिया जाता है. ये कहानियां यथार्थ की जटिलता को इतने विश्वसनीय रूप में बांधती हैं कि अविश्वसनीय मालूम पड़ती हैं.. 

 

यहां ओमा शर्मा की 'भधिष्यद्रष्टा' और आशुतोष की 'रामबहोरन की अनात्म कथा' की बात  इसलिये ज़रूरी लगती है, क्योंकि ये कहानियां भी उतनी ही बड़ी हैं, जितनी कि यहां प्रस्तुत अन्य कहानिया. तथापि उनकी बजाय जिन कहानियों यहां बचाये जाने लायक मान कर विवेचित किया  गया है, वे यथार्थ की जटिलता में उतर कर, उसकी बहुस्तरीयता की 'स्टेलमेट' वाली दशा को अधिक स्पष्टता से हमारे सामने लाती हैं. वे इनकी दूसरी कहानियों की तरह अर्थतंत्र और संस्कृति का विखंडन करने तक ही रुकी नहीं रहतीं. 

 

एक अच्छी कहानी इतिहास का विकल्प होती है. पर एक बड़ी कहानी, उस विकल्प के द्वारा, इतिहास का विखंडन ही नहीं करती, उस का पुनर्गठन भी करती है और उसे जीने लायक भी बनाती है. वह ऐसा उसके अंतर्विरोधों को खारिज किये बगैर करती है. ये दोनों कहानियां इस लिहाज से उदय प्रकाश की 'दिल्ली की दीवार' से आगे के हालात में प्रवेश करती हैं और हमें इतिहास में एक नये अर्थबोध के साथ पुनर्प्रवेश के लिये तैयार करती है. 

 

राकेश मिश्र की 'पिता राष्ट्रपिता' गांधी से जुड़े इतिहास का ऐसा विखंडन करती है जैसे कि बचाने को कुछ शेष नहीं रह गया हो. पर फिर वह उसे हमारे रक्त में बहते एक अन्य तरह के इतिहास के साथ पुनः जीने लायक बना देती है. इतिहास की, कहानी के एक अन्य समयाख्यान की तरह वापसी, उसे इक्कीसवीं सदी के उस यथार्थ की कहानी बना देती है, जिसका संबंध विखंडन के बाद प्रकट हो रही  पुनर्गठन की ज़रूरत से है. राकेश मिश्र के पास एक और उल्लेखनीय कहानी है- 'नागरी सभ्यता'. यह कहानी औद्योगीकृत हो रहे आधुनिक इतिहास के दुष्चक्र में फंसी सभ्यता के अंतर्विरोधग्रस्त हो जाने की कहानी है. इस अंतर्विरोध के एक ओर नागरी यानी नगरीकृत होती सभ्यता है, तो दूसरी ओर लोक पक्ष है, जो उसके हाशिये पर छिटक गया है. लोक की संघर्षशील जिजीविषा को यहां इतिहास के विकल्प के आख्यान में बदल दिया गया है. तथापि वह न तो इतिहास के दुष्चक्र को भेद पाती है और न अपने विकल्प को ज़मीन दे पाती है. इससे लोक का इतिहास के पुनर्गठन के लिये इस्तेमाल नहीं हो पाता. नागरी सभ्यता की विजय, यथार्थ के करीब तो है, परंतु वह उसकी बहुस्तरीय अंतः संभावनाओं को खोज कर भी उन्हें उस तरह हमारे रक्त में उतार कर जीने लायक नहीं बनाती, जैसा कि 'पिता राष्ट्रपिता' में संभव हो पाता है. 

 

रणेंद्र की कहानी 'बाबा, कौए और काला चांद' को भी इसी लोक पक्षीय ज़मीन के प्रति गहरी संवेदनशीलता को पैदा करने की वजह से महत्वपूर्ण माना जा सकता है. यह उस लोक चेतना के साथ खड़ी कहानी है, जो उकसावे में आकर आत्मदाह तो कर सकती है, पर जीवन संघर्ष के मानवीय मोर्चे से उसे कभी खदेड़ा नहीं जा सकता.

 

पंकज मित्र की कहानी 'बाशिंदा@तीसरी दुनियां', 'पिता राष्ट्रपिता' का अगला चरण लगती है. वह ''पिता राष्ट्रपिता'' की विकल्प चेतना. के रूप में प्रस्तुत परंपरा के, जातीय स्मृतियों वाले पक्ष के, और भीतर के सच को उधेड़ती है. इसे पढ़ कर सवाल पैदा होता है कि  जिसे रक्त में बहती परंपरा' कहा जाता है, क्या वह अनिवार्य होने के साथ-साथ, वांछित भी है? बात सम्यक तरीके से देखने की है, वर्तमान को ही नहीं, अतीत को भी. यह कहानी हमें भारत की उस मेधा में ले जाती है, जिसके स्रोत प्रागैतिहासिक समयों से विकसित होते आ रहे अध्यात्म में हैं. ऐसे अध्यात्म में, जो सहनशील बनाता है, कष्ट सह कर भी प्रसन्न बने रहने का रास्ता दिखाता है. इस मेधा से युक्त सामान्य लोगों की आज भी कोई कमी नहीं है, पर आज वह चेतना इतनी अप्रासंगिक हो गयी है कि उसका होना न होना बराबर हो गया है. 


कहानी के नायक करेला झा का संबंध उसी चेतना के साथ है. पर वह हमारे उत्तर आधुनिक समय में फेंक दिया गया है. इससे उसे आत्मबोध नहीं होता, उल्टे वह आत्म ग्रस्त होकर जीने की विकृति का शिकार हो जाता है. हालांकि वह इस स्थिति में भी इस तरह प्रसन्न है, जैसे कि उसे 'आत्मा का आलोक' मिल गया हो. परिदृश्य का इतना फैलाव और गहरे से झांकती आलोचना दृष्टि की विवेकशीलता, इस कहानी की खूबियां हैं. इन दोनों पक्षों के बीच इस कहानी के पात्र जिस तरह का संतुलन साधते है, वह  इस कहानी को अनायास एक बड़ी कहानी बना देता है. इस कहानी के नायक को हम अपने समय के मूल अंतर्विरोध का सटीक रूपक कह सकते हैं.

          

ये सब ऐसी बड़ी कहानियां हैं, जो यहां एक साथ मौजूद होकर हिंदी कहानी के एक नये गहन पाठ के लिये आमंत्रण देती हैं. ऐसी कहानियों को अपनी धरोहर की तरह समेटने वाली हिंदी कहानी अपनी पिछली सदी को बहुत पीछे छोड़ती हुई दिखाई देती है. 

(आधार प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य '21वीं सदी की 21 आधार कहानियां की भूमिका)

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  1. दयाशंकर शरण28 दिस॰ 2020, 11:23:00 am

    एक पाठक की हैसियत से अच्छी और बड़ी कहानी की कसौटी यह होती है कि वह उसे कितनी गहराई तक उसकी आत्मा को और उसकी संवेदना को झकझोर पाने में कामयाब हो पाती है। इधर की लिखी ढेर सारी कहानियों में, खासकर उनकी भाषा और कथ्य में, उत्तर आधुनिक विमर्श जो पश्चिम से आयातित है,उसका प्रभाव ज्यादा दीखता है। सार्त्र के अस्तित्ववाद का प्रभाव भी कहानी की जमीन को अपनी जातीय परंपरा से काटकर पश्चिमी सभ्यता के सांस्कृतिक संकट को पहचाननें में हीं अपनी सर्जनात्मक ऊर्जा का अपव्यय कर रहा है। कहानी अपनी जमीन छोड़,अपनी आबो-हवा से कटकर जब कोई और ठिकाने तलाशती है,तो पाठक के लिए वह निरस,उबाँऊ,और कुछ बेगानी-सी लगती है। विनोद शाही का आलेख 21वीं सदी की कहानियों को समझने की दिशा में एक गंभीर सुचिंतित प्रयास है।

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  2. कहानी की सैद्धांतिकी पर यह गंभीर पहल है। असल में विमर्शों ने कथा-साहित्य को इस कदर घेर लिया है कि परखने के सामान्य माप ही खो गए हैं। बदलते हुए युगबोध में भी जो कहानी हमारे वर्तमान युगबोध की समझ बेहतर करे वही बड़ी कहानी हो सकती है। यह कहूं वह भी।

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