भाष्य : ब्रह्मराक्षस ( मुक्तिबोध) : सदाशिव श्रोत्रिय


सदाशिव श्रोत्रिय ने ‘श्रेष्ठ काव्य के प्रति पाठकों की बढती अरुचि और घटती समझ को देखते हुए’ अपनी पसंद की कविताओं के भाष्य का उपक्रम इधर आरम्भ किया है. कविता की उनकी अपनी सुगम व्याख्या आप समालोचन पर पढ़ते आ रहें हैं. इसके साथ ही उन्होंने अपनी ख़ुद की कविताओं की रचना प्रक्रिया पर दिलचस्प और अनूठी किताब लिखी है ‘कविता का पार्श्व’. कविता और उसकी प्रक्रिया को समझने में यह मदद करती है.

मुक्तिबोध की महत्वपूर्ण कविताओं में ब्रह्मराक्षस का स्थान है. इसके अर्थ को उद्घाटित कर रहे हैं सदाशिव श्रोत्रिय.


मुक्तिबोध
ब्रह्म रा क्ष स                                                                                                                                                              
सदाशिव  श्रोत्रिय
  

मुक्तिबोध की कविता  ब्रह्मराक्षस ” पढ़ने पर  जो बात सबसे पहले मेरे मन में आती है  वह यह है  कि बावड़ी में बैठे जिस ब्रह्मराक्षस का वर्णन इसमें किया गया है वह  है कौन ? वह असल में कोई ऐसा मनोरोगी तो नहीं है जो  स्कित्ज़ोफ्रीनिया जैसी किसी मानसिक व्याधि से पीड़ित है और जो इसीलिए इस बावड़ी के एकांत अन्धेरे में आ बैठा है कि  वहां दूसरे लोग उसे तंग न करें.

वह उन असहाय लोगों में से तो नहीं जो आज भी कई बार हमारे यहां इधर-उधर घूमते, बड़बड़ाते और लोगों को अपनी पागल हरकतों से परेशान करते या उनकी गालियों, हंसी या पत्थरों का शिकार होते देखे जा सकते है , जिन्हें आज भी उनकी मानसिक रुग्णावस्था में किसी मनश्चिकित्सक के बजाय किसी तांत्रिक के पास ले जाया जाता है जो उनके बारे में  कह सकता है कि उन्हें कोई ब्रह्मराक्षस लग गया है ? 

कोई आश्चर्य नहीं यदि यह मनोरोगी इस तरह के निदान के बाद स्वयं को एक ऐसा ब्रह्मराक्षस ही मानने लग गया हो  जिसके बारे में लोगों की मान्यता यह है कि वह किसी ऐसे विद्वान की प्रेत-योनि में पड़ी आत्मा होती है जो अपनी मृत्यु के बाद मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकी  क्योंकि इस विद्वान ने अपने ज्ञान का उपयोग किसी पाप-कर्म के लिए किया था. किसी विद्वान की प्रेतात्मा होने के कारण ब्रह्मराक्षस की कल्पना लोगों को अन्य प्रेतात्माओं के मुक़ाबले अधिक भयजनक  भी लग सकती  है.

मेरे ऐसा सोचने की मुख्य वजह यह है  कि ब्रह्मराक्षस का जो वर्णन इस कविता की अगली कुछ पंक्तियों में हुआ है वह किसी मनोरोगी के वर्णन से काफ़ी मेल खाता है. अपना मैल छुड़ाने की कोशिश में हाथों को बार-बार धोने या बार-बार नहाने को  मनश्चिकित्सक अक्सर किसी मनोरोग के लक्षण के रूप में देखते हैं. इसीलिए जब हम पढ़ते हैं :

तन की मलिनता
दूर करने के लिए प्रतिपल
पाप-छाया दूर करने के लिए , दिन-रात
स्वच्छ करने -
ब्रह्मराक्षस
घिस रहा है देह
हाथ के पंजे , बराबर
बांह –छाती – मुंह  छपाछप
खूब करते साफ़ ,
फिर भी मैल
फिर भी मैल !!

तब ऐसे ही निरंतर हाथ धोने या नहाने वाले  किसी  मनोरोगी की तस्वीर बरबस हमारी आंखों के आगे खिंच जाती है.

कोई भी पाठक बड़ी आसानी से यह देख सकता है कि जिस ब्रह्मराक्षस का वर्णन मुक्तिबोध ने अपनी कहानी  ब्रह्मराक्षस का शिष्य” में किया है उसके चरित्र में और कविता के इस ब्रह्मराक्षस के चरित्र में ज़मीन–आसमान का अंतर है. यदि कहानी का ब्रह्मराक्षस एक विजेता (विनर) है तो कविता का ब्रह्मराक्षस एक पराजित व्यक्ति (लूज़र) है. कहानी का ब्रह्मराक्षस एक भव्य इमारत में रहता है जहां की सारी व्यवस्था बिना किन्हीं सेवकों  के हो जाती है. एक गुरु के रूप में जब यह ब्रह्मराक्षस कोई छंद सिखलाता है और  उसका शिष्य इसे गाने लगता है तो इस भवन में रखे मृदंग और वीणा आदि वाद्य–यंत्र अपने आप बज उठते हैं. इस भवन की आठवीं मंज़िल पर रहते हुए दोनों गुरु-शिष्य निश्चित समय पर भोजन करते हैं. सुव्यवस्थित रूप से उन्हें सादा किंतु सुचारु भोजन मिल जाता है. विशालबाहु पृथु-वक्ष तेजस्वी ललाट वाले इस गुरु के पास अनेक चमत्कारी सिद्धियां हैं. आवश्यकता पड़ने पर वह अपने हाथ को इतना लम्बा कर  सकता है कि वह  कक्ष के  पार जा,  अन्य कक्ष में प्रवेश कर, वहां से घी की चमचमाती लुटिया उठा लाए. अपने ज्ञान का उत्तरदायित्व बड़ी चतुराई से  अपने शिष्य को सौंप कर यह ब्रह्मराक्षस  अंतत: मुक्ति प्राप्त कर लेता है. अब जब तक ज्ञान का अपना  उत्तरदायित्व यह शिष्य अपने किसी शिष्य  को नहीं सौंप देता तब तक उसकी मुक्ति असम्भव  है.

इस कहानी के बारे में यह कहना भी अप्रासंगिक न होगा कि ब्रह्मराक्षस का जिस तरह का जीवन इसमें चित्रित किया गया है वह हो सकता है एक लेखक–अध्यापक के रूप में स्वयं मुक्तिबोध का ही सपना रहा हो. मुझे अपने दिवंगत लेखक मित्र स्वयं प्रकाश की बहुत पहले कही  बात याद आती है  कि कोई ऐसा कमरा होना चाहिए जो अपनी पसन्द की किताबों से भरा हो और  जहां कोई ऐसा पात्र भी हो जिसकी टोंटी घुमाते ही गर्मागर्म चाय पीने को मिल जाए.  

कविता से लगता है कि अपना मानसिक संतुलन खोने से पहले इसमें वर्णित ब्रह्मराक्षस कोई बहुत पढ़ने-लिखने वाला व्यक्ति रहा था. उसे संस्कृत भाषा पर भी इतना सहज अधिकार है कि जब वह क्रुद्ध होकर गालियां देता है तब उसकी ये  गालियां भी सामान्य लोक-भाषा में न होकर संस्कृत में होती हैं. वर्णन से यह भी लगता है कि यह कोई अत्यंत व्यथित और अपने आप से परेशान व्यक्ति है जैसा कि मनोरोगी अक्सर हुआ करते हैं :

और ...होठों  से
अनोखा स्तोत्र कोई क्रुद्ध मंत्रोच्चार
अथवा शुद्ध संस्कृत गालियों का ज्वार ,
मस्तक की लकीरें 
बुन रहीं
आलोचनाओं के चमकते तार !!
उस अखंड स्नान का पागल प्रवाह ....
प्राण में संवेदना है स्याह  !!

जो मनोरोगी पेरेनोइक स्कित्ज़ोफ्रीनिया  से ग्रसित होते हैं  उन्हें  अक्सर यह मतिभ्रम ( डिल्यूज़न)  हो जाता है कि वे साधारण मनुष्य न होकर कुछ असाधारण–गुण- सम्पन्न व्यक्ति  हैं  और इस धरती पर उनका जन्म किसी विशेष उद्देश्य से हुआ है. जब हम इस कविता की निम्नलिखित पंक्तियां पढ़ते हैं तो हमें इसके नायक में भी किसी  ऐसे पेरेनोइक के  ही लक्षण  नज़र आते हैं :

किंतु , गहरी बावड़ी
की भीतरी दीवार पर
तिरछी गिरी रवि-रश्मि
के उड़ते हुए परमाणु , जब
तल तक पहुंचते हैं कभी
तब ब्रह्मराक्षस समझता है , सूर्य ने
झुक कर ‘नमस्ते’ कर दिया.
पथ भूल कर जब चांदनी
की किरन टकराए
कहीं दीवार पर ,
तब ब्रह्मराक्षस समझता है
वंदना की चांदनी ने
ज्ञान-गुरु माना उसे.
अति-प्रफुल्लित कंटकित तन-मन वही
करता रहा अनुभव कि नभ ने भी
विनत हो मान ली है श्रेष्ठता उसकी ! !

एक बार अपने आप के विशिष्ट और असाधारण होने का निश्चय  हो जाने पर पेरेनोइक स्कित्ज़ोफ्रीनिया का यह मनोरोगी अपने अब तक के अर्जित ज्ञान की पुनर्व्याख्या में जुट जाता है. उसकी बड़बड़ाहट में अब कई दार्शनिकों, रचनाकारों, गणितज्ञों, इतिहासज्ञों, विचारकों और सिद्धांतकारों के संदर्भ शामिल हो जाते हैं जिन्हें उसने पढ़ रखा है  :

....तब दुगुने भयानक ओज से
पहचानवाला  मन
सुमैरी –बैबिलोनी जन –कथाओं से
मधुर वैदिक ऋचाओं तक
व तब से आज तक के सूत्र
छन्दस , मंत्र , थियोरम ,
सब प्रमेयों तक
कि मार्क्स ,एंजेल्स , रसेल ,टॉएन्बी
कि  हीडेग्गर व स्पेंग्लर ,सार्त्र , गान्धी भी
सभी के सिद्ध -अंतों का
नया व्याख्यान करता वह
नहाता ब्रह्मराक्षस , श्याम
प्राक्तन बावड़ी की
उन घनी गहराइयों में शून्य .  

किंतु यह सब चूंकि एक मनोरोगी का प्रलाप है, उसका कोई तर्कसंगत अर्थ लगाना असम्भव है. उसके विचार, शब्द-बिम्ब और ध्वनियां एक दूसरे को काटते से लगते हैं :

......ये गरजती , गूंजती , आन्दोलिता
गहराइयॉं  से उठ रही ध्वनियां , अत:
उद्भ्रांत शब्दों के नए आवर्त में
हर शब्द निज प्रति-शब्द को भी काटता ,
वह रूप अपने बिंब से ही जूझ
विकृताकार –कृति
है बन रहा
ध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से यहां .

एक और तथ्य जो मुझे इस पात्र के मनोरोगी होने के पक्ष में लगता है यह है कि मानसिक तनाव से ग्रस्त कोई भी   मनोरोगी प्रकृति के सान्निध्य में अपने आप को तनावमुक्त महसूस करता है. मनोरोगियों को प्रकृति में हमेशा अपना एक हमदर्द मित्र नज़र आता है. प्रकृति और मनोरोगियों के इस पारस्परिक संबंध को अत्यंत काव्यात्मक तरीके से मुक्तिबोध ने अपनी इस कविता में दर्ज़ किया है. इसके साथ ही एक और बात जिसकी ओर पाठक का ध्यान जाना चाहिए यह है कि किसी विद्वान गुरु के लिए सर्वाधिक प्रीतिकर  किसी ऐसे शिष्य को पाना होता है जो न केवल अपनी  कुशाग्रता से अपने गुरु के विचारों की गहराई को  पूरी तरह समझने में समर्थ हो बल्कि जो उसके प्रति आदर और सहानुभूति भी रखता हो. हम देखते हैं कि इस कविता का पर्सोना (वाचक), जो वृक्षों और लताओं के  प्राकृतिक परिवेश में नीचे बावड़ी से आती ध्वनियों को सुन रहा है, कोई ऐसा व्यक्ति है जो इस तथाकथित ब्रह्मराक्षस के प्रति गहरी सहानुभूति रखता है और जो उसे उसके  इस वर्तमान मानसिक क्लेश से मुक्त करवाना चाहता है :

बावड़ी  की इन मुंडेरों पर
मनोहर हरी कुहनी टेक सुनते हैं
टगर के पुष्प-तारे श्वेत
                      वे ध्वनियां  !
सुनते हैं करौंदी के सुकोमल फूल
सुनता है उन्हें प्राचीन औदुंबर
 सुन रहा हूं मैं वही
पागल प्रतीकों में कही जाती हुई
वह ट्रैजेडी
जो बावड़ी में अड़ गई.

कविता पढ़ते हुए हमें यह भी लगता है कि अपना मानसिक संतुलन खोने से पहले यह विद्वान शोधक  किसी ऐसे ज्ञान की  खोज  में लगा था जिसका उद्देश्य  मानव-मात्र की बेहतरी था. मानवीय उन्नति के लिए  ब्रह्मराक्षस के इस संघर्ष के लिए कवि एक ऊंचे, अंधेरे और कठिन ज़ीने के रूपक का प्रयोग करता है. चढ़ाई के रूप में निरूपित इस संघर्ष में इस विद्वान शोधकर्ता को कई चोटें  सहनी पड़ी  हैं. वह मानवीय स्थिति को अच्छी से अधिक अच्छी  बनाना चाहता है. अपने प्रयत्नों में उसे कभी  थोड़ी महत्वपूर्ण सफलता भी मिलती है किंतु उसे इस सफलता के पीछे- पीछे ही आती कुछ बड़ी असफलताओं से भी दो-चार होना  पड़ता है. कवि कहता है कि मानव सभ्यता का समूचा इतिहास इस बात का गवाह है कि जब- जब किसी ने मानव जाति के लिए किसी अतिरेकवादी पूर्णता की तलाश की तब- तब अंतत: निराशा ही उसके हाथ लगी  :

खूब ऊंचा एक ज़ीना सांवला
             उसकी अंधेरी सीढ़ियां
वे एक आभ्यंतर निराले लोक की .
एक चढ़ना औ’  उतरना ;
पुन: चढ़ना औ’  लुढ़कना ,
मोच पैरों में
व छाती पर अनेकों घाव .
बुरे-अच्छे –बीच  के  संघर्ष
                       से भी उग्रतर
अच्छे व उससे अधिक अच्छे बीच का संगर
गहन किंचित सफलता
अति भव्य असफलता !!
...... अतिरेकवादी पूर्णता
        की ये व्यथाएं बहुत प्यारी हैं ........
ज्यामितिक संगति –गणित
की दृष्टि से कृत
            भव्य नैतिक मान
आत्मचेतन  सूक्ष्म नैतिक भान
.....अतिरेकवादी पूर्णता की तुष्टि करना
                             कब रहा आसान
मानवी अंतर्कथाएं बहुत प्यारी हैं  !!

प्रगति के लिए सीढ़ियां चढ़ने के रूपक का प्रयोग मुक्तिबोध इस कविता में दुबारा भी करते हैं. इस दूसरी बार के प्रयोग में तथ्यों को थोड़ा बदल दिया गया है. इस विद्वान द्वारा किसी योग्य गुरु की तलाश का अतिरिक्त विवरण भी इस वैकल्पिक रूपक में जोड़ दिया गया है :

व्यक्तित्व वह कोमल स्फटिक  प्रासाद-सा,
प्रासाद में ज़ीना
व ज़ीने की अकेली सीढ़ियां
चढ़ना बहुत मुश्किल रहा.
वे भाव –संगत तर्क-संगत
कार्य सामंजस्य-योजित
समीकरणों के गणित की सीढ़ियां 
हम छोड़ दें उसके लिए.
उस भाव-तर्क व कार्य सामंजस्य –योजन -
शोध में
सब पंडितों , सब चिंतकों के पास
वह गुरु प्राप्त करने के लिए
भटका !!

एक और बात जो मुझे इस मनोरोगी के संबंध में मान्य लगती है यह है कि अपने मतिभ्रम में उसने शायद यह कल्पना भी कर ली है कि वह मर कर अपने किसी पाप-कर्म की वजह से एक ब्रह्मराक्षस बन चुका  है  और जो जीवन वह अब जी रहा है वह ब्रह्मराक्षस का यह  प्रेत-जीवन ही है. मनश्चिकित्सकों के मुताबिक स्कित्ज़ोफ्रीनिया से पीड़ित  मनोरोगी की चेतना का संपर्क वास्तविक दुनिया से कभी- कभी पूरी तरह टूट जाता है और तब वह कई तरह की असंगत  कल्पनाएं कर सकता है. कविता की निम्नलिखित पंक्तियां मुझे इसी तरह की  उस कल्पना का मार्मिक वर्णन लगता  है जो यह मनोरोगी अपने बारे में करता है :

रवि निकलता
लाल चिंता की रुधिर-सरिता
प्रवाहित कर दिवालों पर ;
उदित होता चन्द्र
व्रण पर बांध देता
             श्वेत –धौली पट्टियां
उद्विग्न भालों पर.
सितारे आसमानी छोर पर फैले हुए
अनगिन दशमलव से
दशमलव-बिन्दुओं के सर्वत:
पसरे हुए उलझे गणित मैदान में
मारा गया ,वह काम आया ,
और वह पसरा पड़ा है .....
वक्ष-बांहें खुली फैलीं
एक शोधक की .

इस कविता के संदर्भ में जो एक प्रश्न आवश्यक रूप से पाठक के मन में खड़ा होगा  यह है कि आखिर वह कौन सा पाप-कर्म रहा होगा  जिसके संबंध में किसी अपराध-बोध  ने  इस विद्वान के मानसिक संतुलन को बिगाड़ कर उसे इस मनोरोगी  की अवस्था में पहुंचा दिया. कविता पढ़ते हुए हमें लगता है कि जिस एक घटना ने मानवजाति की बेहतरी तलाशते इस शोधक को सर्वाधिक प्रभावित किया है वह पूंजीवादी व्यवस्था का आगमन और ज़्यादातर लोगों द्वारा उसका स्वीकार रहा है :

किंतु युग बदला व आया कीर्ति-व्यवसायी
.....लाभकारी कार्य में से धन ,
व धन में से हृदय-मन ,
और , धन-अभिभूत अंत:करण में से
सत्य की झाईं
               निरंतर चिलचिलाती थी.

जब हम इस ‘सत्य’ की प्रकृति पर विचार करते हैं जिसकी झाईं लोगों के धन –अभिभूत अंत:करण में से निरंतर चिलचिलाती  रहती है तब हमें बरबस उस ‘जलते सत्य’ का स्मरण हो आता है जिसका ज़िक्र मुक्तिबोध अपनी कविता “पूंजीवादी समाज के प्रति”  में करते हैं और जिसे टाल कर ही समूची पूंजीवादी व्यवस्था खड़ी रह सकती है. हम अनुमान लगा सकते हैं कि शारीरिक श्रम के बजाय पूंजी, बड़े उद्योगों और मुनाफ़ाखोरी पर आधारित अर्थव्यवस्था के व्यापक स्वीकार ने इस विद्वान शोधकर्ता को उस निराशा की ओर धकेला है जो अंतत: उसकी विक्षिप्तता  का कारण बनी है. संभव है  आत्मचेतना से शून्य भौतिकवाद की इस विजय ने और अन्य लोगों के साथ-साथ उसके भी मौन स्वीकार ने उसे किसी पाप-कर्म में साझेदारी और तज्जनित  अपराधबोध का  शिकार बनाया है :

आत्मचेतस  किंतु इस
व्यक्तित्व में  थी प्राणमय अनबन ..

”विश्वचेतस” अब तक भी ठीक से परिभाषित नहीं था. वह अब तक भी बहुत हद तक “ बे-बनाव” था. उसके लिए अपेक्षित “ भाव-तर्क व कार्य सामंजस्य –योजन -/ शोध ”  अभी तक पूरी नहीं हो पाई थी और इसीलिए ब्रह्मराक्षस का  इस आर्थिक प्रगति-रूपी

महत्ता के चरण में था
विषादाकुल मन  !

कविता के इस बिन्दु पर हम फिर से  पर्सोना (वाचक) को इस बात के लिए अफ़सोस प्रकट करता हुआ पाते हैं कि वह समय पर इस विद्वान गुरु से मिल कर तथा उसके सोच के औचित्य के बारे में चर्चा करके उसे अपना  आत्मविश्वास खोने से बचा नहीं पाया. मानसिक संतुलन खो देने और अपने आप को मृत मान लेने की यह ट्रैजेडी एक “नीच ट्रैजेडी” थी क्योंकि इसके घटित होने में बाहरी (विदेशी ,पूंजीवादी ,दक्षिणपंथी ) बलों का भी उतना ही हाथ था जितना कि भीतरी (भारतीय, आंतरिक, समतावादी ) राजनीतिक–आर्थिक बलों का.

कविता के अंत में हम इसके पर्सोना को उन तमाम बातों को सुन कर दुखी होता पाते  है जो यह तथाकथित ब्रह्मराक्षस अपने पागल प्रतीकों में बावड़ी के भीतर से  निरंतर कह रहा है. उसकी इच्छा आज भी अपने गुरु के अधूरे कार्य को उसका शिष्य बन कर उन  संगत और पूर्ण निष्कर्षों तक पहुंचाने की है जिन्हें अपना कर मानवता का वास्तविक कल्याण सम्भव हो सके.

________________________________________                                                                              
सदाशिव  श्रोत्रिय 
5/126 ,गोवर्द्धन विलास हाउसिंग बोर्ड कोलोनी,
हिरन मगरी, सेक्टर 14,
उदयपुर-313001
(राजस्थान) 
मोबाइल -8290479063  

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  2. प्रेम शंकर शुक्ल26/7/20, 9:34 pm

    पढ़ गया। बढ़िया विवेचन है। एक ही शीर्षक की कविता और कहानी के भीतर के द्वंद्व को भी देखने की कोशिश। बेहतरीन पाठ-प्रयास

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  3. सदाशिव श्रोत्रिय ने बहुत मनोयोग से एकाग्र होकर मुक्तिबोध की इस महत्वपूर्ण और जटिल कविता की सटीक विवेचना की है। ब्रह्मराक्षस की मिथकीय अवधारणा को किसी मनोरोगी का पर्याय समझ लेने की बात तो मुझे उचित नहीं लगती, लेकिन सदाशिव जी ने कविता के भीतर के इस चरित्र की अंत:पृकृति को बहुत सावधानी से समझने और व्याख्यायित करने का सफल प्रयत्न किया है। उन्हें बधाई और शुभकामनाएं ।

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    1. दिक्कत नायक के एक साथ जीवित और मृत होने को लेकर है जिसे किसी मनोरोगी की सोच-पद्धति की असंगतता से ही व्याख्यायित किया जा सकता है | कविता का अनूठापन मैं कवि की एक मनोरोगी के संसार को भीतर से देख सकने की क्षमता में पाता हूँ |

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  4. मुक्तिबोध की ब्रह्मराक्षस संबंधी कविता और कहानी की यह मनोवैज्ञानिक विवेचना निश्चय ही समीक्षा के नये आयाम उद्घाटित करती है ।
    आजकल इस तरह की व्याख्याएं कम देखने को मिलती हैं।
    सदाशिव श्रोत्रिय जी ने दोनों रचनाओं का गंभीर अध्ययन कर जो निष्कर्ष दिए हैं वे सर्वथा अलग हटकर हैं ।
    ऐसे अभिनव प्रयास की सराहना की जानी चाहिए ।
    - डॉ. रमाकांत शर्मा
    जोधपुर ( राज.)

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