पितृ-वध : आशुतोष भारद्वाज

(sculpture by great ketelaars)



पुत्र एक समय के बाद पिता बन जाता है. क्या वह पिता को अपदस्त करके पिता बनता है ? सत्ता के लिए पुत्र द्वारा पिता का वध इतिहास ने देखा है. साहित्य में भी ख़ासकर पुरुष लेखन में पिता-पुत्र के तनावपूर्ण रिश्ते चित्रित हुए हैं. पश्चिम ने जहाँ पिता सरीखे ईसा का वध देखा है वहीँ भारत अपने राष्ट्र-पिता की हत्या के अपराधबोध में आज भी धंसा हुआ है.

‘पितृ-वध’ अलग तरह का आलेख है. इसे आशुतोष भारद्वाज ही लिख सकते हैं. साहित्य, पुराण, इतिहास से होते हुए वह समकालीन उस जगह ऊँगली रखते हैं जो आज भी लहू जमने से स्याह पड़ी हुई है. 

ख़ास समालोचन के पाठकों के लिए यह 

पितृ-वध                              
आशुतोष भारद्वाज



फ़्योडोरोविच करामाजोव मारे जा चुके हैं. पिता निर्दयी था. धन और स्त्री को लेकर बेटे पिता से अरसे से झगड़ते आए थे. पिता की हत्या करना चाहते थे, बड़े बेटे दिमित्री ने उन पर हमला भी किया था. लेकिन पिता के जाने के बाद बेटों के भीतर सहसा अपराध-बोध उमड़ आया है.


मैं दोषी नहीं हूँ. मैं अपने पिता की हत्या का दोषी नहीं हूँमैं उन्हें मारना चाहता था. लेकिन मैं दोषी नहीं हूँमैं वाक़ई उनकी हत्या कर देना चाहता था…  कई बार मैंने सोचा थामैंने इस बारे में कभी अपनी भावनाओं को नहीं छुपाया था. पूरा शहर इस बारे में जानता था.
यह दिमित्री करामाजोव का पुलिस को दिया बयान है जब उसे अपने पिता की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया जाता है.

इसके थोड़ी देर बाद फ़्योडोरोविच का सबसे छोटा बेटा अल्योशा मँझले भाई ईवान से कहता है:

इन भयावह दो महीनों में जब भी तुम अकेले पड़े हो तुमने यह ख़ुद से कई बार कहा है. तुमने ख़ुद को दोषी ठहराया है, यह स्वीकार किया है कि तुमने ही हत्या की है, किसी और ने नहीं. लेकिन तुम हत्यारे नहीं हो. सुना तुमने? वह तुम नहीं हो. ईश्वर ने मुझे तुम्हें यह बताने केलिए भेजा है.

दिमित्री पर हत्या का मुकदमा चलता है, फ़्योडोरोविच का एक अन्य बेटा स्मेरद्याकोव तब तक आत्महत्या कर चुका है. कथा एक नया मोड़ लेती है जब ईवान भरी अदालत में कहते हैं:


मेरे पिता की हत्या उसने (स्मेरद्याकोव) की थी. हत्या उसने की थी और मैंने उसे इसके लिए उकसाया थाकौन अपने पिता की मृत्यु की कामना नहीं करता?”
दोस्तोयवस्की का यह उपन्यास उस अंधेरे बंद कमरे की एक चाभी है जो शायद तमाम रचनाकारों के भीतर छुपा रहता है लेकिन जिसकी सीढ़ियाँ उतरने का साहस कम लेखक कर पाते हैं. एक सजग रचनाकार को अक्सर बहुत जल्द यह बोध हो जाता है कि जिन पूर्वजों को वह अपना आदर्श मानता आया है, जिनके शब्द उसकी सर्जना को रोशनी देते आए हैं उन्होंने दरअसल उसकी चेतना को अपनी गिरफ़्त में ले रखा है, उनका स्वर उसकी कृतियों को चुप दिशा देता चलता है.

इस बोध के बाद उस पूर्वज से मुक्ति पाने के लिए भीषण संघर्ष शुरू होता है जिसकी परिणति एक अन्य बोध में होती है कि उस पूर्वज या शायद उसके प्रेत का वध अपने काग़ज़ पर किए बग़ैर, अपनी स्याही से उसका शोक-गीत लिखे बग़ैर इस लेखक को मुक्ति नहीं मिलेगी. लेकिन किसी लेखक के लिए यह स्वीकार करना आसान नहीं है कि उसका रचना कर्म उसके पितामह की शव-साधना है या हो जाना चाहता है क्योंकि पितृ-वध मुक्ति का साधन हो या न हो, आख़िर मुक्ति का समूचा प्रत्यय एक विराट मायाजाल है, लेकिन यह मनुष्य को असहनीय अपराध-बोध में डुबो सकता है.


स्वतंत्र भारत की नींव राष्ट्र-पिता के वध से निर्मित होती है. भारतीय अवचेतन आज भी इस अपराध बोध की गिरफ्त में है. स्वातंत्रयोत्तर भारत की राजनीति कारतूसों से बिंधे इस शव के इर्द-गिर्द घूमती आयी है. सत्तर से अधिक वर्ष हुए लेकिन यह अपराजेय और असम्भव लाश अभी तक नहीं बुझी है, इस राष्ट्र के आकाश पर अपने डैने फैलाये पसरी है. 

पश्चिमी सभ्यता की नींव भी उन दो पितृ-पुरुषों के शव से रची गयी है जो इस सभ्यता के दर्शन, धर्म, विचार और व्यवहार के आदि स्रोत हैंसुकरात और ईसा मसीह. पश्चिम के अवचेतन में दफ़न एक स्याह तहख़ाने में इस पिता की लाश दो हज़ार वर्षों से रखी हुई है. लेकिन पश्चिम इस घाव को स्वीकारना नहीं चाहता. वह इससे संवाद करने से भी बचता रहा है. क्या पश्चिम द्वारा दुनिया भर में की गयी हिंसा की एक वजह इस पितृ वध से उपजा अपराध बोध है? क्या अन्य समुदायों और संस्कृतियों को सैविजघोषित कर वह अपने नृशंस कृत्य, अपने ओरिज़िनल सिनपर पर्दा डाल देना चाहता है? इस प्रश्न को किसी आगामी निबंध के लिए रखते हैं. 





(दो)
ए के रामानुजन द इंडियन इडिपस निबंध में कहते हैं कि समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के साहित्य, इतिहास, मिथक और लोक कथाओं में सोफ़ोक्लीज के नाटकों की इडिपल हत्या जैसा लगभग कोई उदाहरण नहीं है. महाभारत में कुछ संक्षिप्त-से उल्लेख हैं, लेकिन वह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है. मकरंद परांजपे अपनी किताब द डेथ एंड आफ़्टरलाइफ़ अव महात्मा गांधी में इस्लामिक शासन के दौरान राजगद्दी पाने के लिए बेटे द्वारा पिता की हत्या के उदाहरणों का जिक्र करते हैं लेकिन जोर देकर कहते हैं कि हिंदू चेतना इसे घनघोर वर्जित मानती है. हिन्दू इतिहास में ऐसी एकाध घटनायें हैं ज़रूर, मसलन मगध सम्राट बिंबिसार के पुत्र अजातशत्रु ने अपने पिता को क़ैद कर उसे भूखा मार दिया था लेकिन यह कृत्य हिन्दू संस्कार और स्मृति में इतना वीभत्स माना जाता है कि समाज और इतिहासकार इसे याद तक रखना नहीं चाहते.



यह निबंध उपरोक्त प्रस्तावनाओं से परे जा दो प्रस्तावना देना चाहता है. पहली, भारतीय संदर्भ में पितृ-हत्या को माँ के केंद्रीय आइने से देखने की आवश्यकता नहीं है. चूँकि माँ की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है इसे इडिपल हत्या कहने के बजाय, एक कृत्य जो माँ को बीच में रख पिता और पुत्र के बीच एक विशिष्ट यौनिक तनाव का संकेत देता है, पितृ-वध कहा जा सकता है. हत्या नहीं, वध. वध में वैधानिकता का भाव है. वध अमूमन ऐसे विराट व्यक्तित्व का होता है जिस पर प्रहार करते वक्त भी वधिक उसे नमन करना नहीं भूलता. वध मृतक की गरिमा में वृद्धि करता है, अक्सर अनुत्तरित प्रश्न पीछे छोड़ जाता है.

पांडव भीष्म के पास उनके वधकी वजह जानने गए थे, गोड़से ने भी अपने कृत्य को गांधी-वधकहा था.

दूसरा, इस वध के अनेक रूप हो सकते हैं. यह सिर्फ़ इतिहास या पुराण के पन्नों में ही नहीं विचार में भी घटित होता है, अपने अविजित पिता को रास्ते से हटा देने की आकांक्षा में घटित होता है. वह क्षण जब पुत्र को एहसास हो जाता है कि भले ही पिता की मृत्यु के बाद उसके भीतर का पुरुष भी धीरे-धीरे मरना शुरू हो जायेगा, लेकिन पिता के रहते वह सिंहासन हासिल नहीं कर पायेगा.

यह महापुरुष भी अपने परवर्ती की इस आकांक्षा से अनजान नहीं है, शायद वह भी यही चाहता है, इसमें ही उसकी मुक्ति है, और पहले से कहीं विराट पुनर्जन्म है. संस्कृत का श्लोक है --- सर्वतो जयमिच्छेत. पुत्राच्छिष्यात्पराजयम्. सभी लोगों को जीतना चाहता हूँ, लेकिन पुत्र और शिष्य से पराजय की इच्छा रखता हूँ.

इसलिए रामानुजन और मकरंद जब लिखते हैं कि चूँकि भीष्म की मृत्यु उनकी अनुमति से हुई थी इसलिए वह पितृ-वध नहीं है, वे व्यास की कथा के मर्म को शायद अनदेखा कर देते हैं.

महाभारत के युद्ध को नौ दिन हो चुके हैं. पांडव हताश हैं. उन्हें अपनी पराजय दिख रही है. नवीं रात पांडव शिविर में युधिष्ठिर कृष्ण से कहते हैं: 


विकट पराक्रमी महात्मा भीष्म हमारी सेना का उसी प्रकार विनाश कर रहे हैं जैसे हाथी सरकंडों के जंगलों को रौंद डालते हैंअब मैं वन को चला जाऊँगा. मेरे लिए वन में जाना ही कल्याणकारी होगा. मेरी युद्ध में रुचि नहीं रही क्योंकि भीष्म हमारा विनाश कर रहे हैं. जैसे पतंगा अग्नि की ओर दौड़ा जाकर मृत्यु को प्राप्त करता है, हमने भी भीष्म पर आक्रमण कर मृत्यु का ही वरण किया है.

अर्जुन का युद्ध से पहले मोहभंग हुआ था, युद्ध की निरर्थकता जान वह युद्धभूमि से हट जाना चाहते थे. युद्ध के बीच भीष्म के सामने अपनी पराजय अवश्यंभावी देख युधिष्ठिर रण छोड़ देना चाहते हैं. चारों भाईयों और कृष्ण से मंत्रणा के बाद उन्हें लगता है कि देवव्रत भीष्म के पास जा उन्हीं से उनके वध का उपाय पूछा जाए. लेकिन पितामह के प्रति यह विचार आते ही युधिष्ठिर ग्लानि से भर उठते हैं: 


बाल्यावस्था में जब हम पितृहीन हो गए थे, उन्होंने ही हमारा पालन पोषण किया था. माधव, वे हमारे पिता के पिता और हमारे प्रिय हैं, फिर भी मैं उनका वध करना चाहता हूँ. क्षत्रिय की इस जीविका (धर्म) को धिक्कार है.

जीवित बचे रहे आने की आकांक्षा व पितामह की मृत्यु कामना से उपजे अपराध बोध के बीच फँसे पाँचों भाई और कृष्ण भीष्म के पास जाते हैं. युधिष्ठिर कहते हैं: 


हे सर्वज्ञ, युद्ध में हमारी जीत कैसे हो?…आप स्वयं ही हमें अपने वध का उपाय बताइए.

और तब भीष्म कहते हैं: 


यह तुम्हारे लिए पुण्य की बात है कि तुम्हें मेरे इस प्रभाव का ज्ञान हो गया है” कि मेरे रहते तुम कभी विजयी न हो सकोगे.
यह पितृ-वध का विलक्षण उदाहरण है. यहाँ इडिपल या स्त्री की तलाश निरर्थक है. यह कोरी हत्या नहीं है. भले यह वध पुत्र की आकांक्षा की परिणति है लेकिन यह पितामह की अनुमति और भागीदारी से सम्भव होता है, पितामह की प्रतिष्ठा को संवर्द्धित करता है.

घृणा से भरे गोड़से भी गांधी के योगदान को स्वीकारते थे. अदालत में उन्होंने अपने बयान में कहा था कि ट्रिगर दबाने से पहले वह गांधी के समक्ष सम्मान में झुक गएथे. जैसा आशीष नंदी और उनसे पहले रॉबर्ट पायने ने लिखा है कि गांधी की हत्या किसी एक इंसान ने नहीं की थी, इस कृत्य के अनेक मूक सहभागी थे, गांधी ख़ुद उनमें से एक थे. कांग्रेस के अनेक नेता निश्चित ही गांधी की मृत्यु नहीं चाहते थे, लेकिन वे गांधी को नए भारत की राह में बाधा ज़रूर मानते थे. गांधी की भी भीष्म जैसी ही स्थिति थी. गांधी की राजनैतिक संतानों को बोध हो गया था कि गांधी के रहते वे भारत को हासिल नहीं कर पाएँगे. यह बोध ज़ाहिर है गांधी को दरकिनार करते जाने के अपराध बोध का जुड़वाँ था.

यह तीखा अंतर्द्वंद्व सिर्फ़ पांडव भाईयों या कांग्रेसी नेताओं तक ही सीमित नहीं है, वे तमाम पुत्र इससे गुज़रते हैं जो पिता के प्रति आदर और उनसे उपजती असंभव चुनौतियों के बीच ख़ुद को पिसते पाते हैं.



(तीन)
उपरोक्त दृष्टांत सिर्फ़ भूमिका बतौर हैं. भीष्म और गांधी और करामाजोव के सहारे यह निबंध कहीं और पहुँचना चाहता है, एक रचनाकार के अपने पितामह के साथ त्रासद सम्बंध को, उसकी मृत्यु की कामना को टटोलना चाहता है जिसका ज़िक्र ऊपर किया था.

लेकिन उससे पहले दो कृतियों के जरिये देखते हैं कि यह भाव कितने रूप में और कितनी बारीकी से प्रकट हो सकता है. निर्मल वर्मा की लम्बी कहानी बीच बहस में और उपन्यास अंतिम अरण्य. एक कथा का नायक पिता को अस्पताल में मरते हुए देख रहा है, दूसरा पिता-तुल्य मेहरा साहब की अंतिम साँसों को सहेज रहा है. इन दोनों युवकों के भीतर पिता की मृत्यु एक कोरी घटना बतौर दर्ज नहीं हो रही, उनके अंदर इस मृत्यु की आकांक्षा भी बनी हुई है. दोनों पिता की मृत्यु के साक्षी होने उनके अंतिम समय पर आ गए हैं. लेकिन वे तटस्थ दर्शक नहीं हैं, इस मृत्यु में भागीदार हैं, जीवित पिता की कपाल क्रिया करते हैं, इस प्रक्रिया में खुद अपनी मृत्यु की तरफ बढ़ते जाते हैं. पिता की सेज सजाते हैं, उनके शव का अपनी अस्थियों से श्रृंगार करते हैं.

(death-of-jesus)
मेहरा साहब ने नायक को अपनी जीवनी सुनने और लिखने के लिए बुलाया है, लेकिन वह सिर्फ़ जीवनी नहीं लिख रहा, दरअसल उन्हें अपनी मृत्यु-कथा रचने में मदद कर रहा है. वह मेहरा साहब की ओर चलती आती मृत्यु को लिपिबद्ध कर रहा है, बग़ैर उन्हें बताए अपने रजिस्टर के पन्नों में उस मृत्यु को दर्ज कर रहा है.

दोनों ही युवकों को यह बोध है कि पिता की मृत्यु बग़ैर न पिता को मुक्ति मिलेगी न उन्हें. दोनों इससे भी अनभिज्ञ नहीं हैं जो ओर्हान पामुक ने अपने पिता की मृत्यु पर लिखा था: एक आदमी की मौत अपने पिता की मृत्यु के साथ शुरू हो जाती है.





(चार)
किसी लेखक के सामने यह प्रश्न शायद कहीं गहरा और तीखा होता है. अपने पितामह लेखक से मुक्ति कैसे पायी जाए? उसके वध का उपाय किससे पूछा जाए? किस तरह अपने स्वर की संप्रभुता हासिल की जाए?

कुछ बरस पहले मैंने एक कहानी लिखी थी जिसमें एक युवा लेखक एक बूढ़े लेखक की श्रद्धांजलि कई बरसों से लिख रहा है जबकि वह बूढ़ा अभी ज़िंदा है. वह युवा उसे अपना गुरु मानता है, इस गहन अपराध-बोध से ग्रस्त है कि उसने अभी तक कुछ भी ऐसा नहीं लिखा जिसे वह बूढ़े को बतौर गुरु-दक्षिणा समर्पित कर सके. इस पाप से मुक्त होने के लिए वह दुनिया का सबसे महान शोक-गीत लिखने का स्वप्न देखता है. बूढ़ा अभी कम-अस-कम दो चार साल तो जीवित रहेगा ही, यानि उसके पास काफी समय है शोक-गीत लिखने के लिए. उसकी मृत्यु के अगले दिन वह इसे प्रकाशित करवा देगा. पूरी दुनिया अचम्भित रह जाएगी कि महज़ एक रात में उसने यह विलक्षण रचना कैसे कर डाली.
(Death of Socrates )

इस जुनून में वह इस कथा के कई मसौदे तैयार करता है, बूढ़े को अनेक विधियों से मरता दिखाता है. हार्ट अटैक, सुबह की सैर पर किसी ट्रक ने कुचल दिया, अपनी डेस्क पर मरा पाया गया, अधूरी कहानी से न जूझ पाने की निराशा में हुई मृत्यु, हेमिंग्वे जैसी आत्महत्या. युवा लेखक उसकी मृत्यु की कल्पना करता चलता है लेकिन बूढ़ा नहीं मरता. युवक के भीतर दिन रात मृत्यु बजने लगती है. उसे चारों तरफ़ मृत्यु का विलाप सुनायी देने लगता है, वह हरेक शै में अपने गुरु को मरता हुआ, उसके शव को लकड़ियों पर धधक कर जलते हुए देखता है, लेकिन बूढ़ा नहीं मरता.

इस कहानी का अंतिम वाक्य था: 

तुम उस बूढ़े का शोकगीत लिख रहे थे या उसके ज़रिए दरअसल तुम ख़ुद को ही सम्बोधित थे? क्या तुम ही तो वह बूढ़े नहीं थे जो इस युवक के भेष में अपना शोकगीत लिखने आ गए थे?”

यह भाव वह नहीं है जिसके बारे में एलियट ने लिखा है कि हरेक लेखक अपने पूर्वजों को रचता है, या जब काफ़्का को पढ़ते वक़्त बोर्हेस उनके तमाम पुरखों को चिन्हित कर लेते हैं, काफ़्का के शब्दों के आलोक में पूर्ववर्ती रचनाओं का पाठ एकदम बदल जाता है. यह भाव वह भी नहीं जिसे हैरल्ड ब्लूम द ऐंज़ाइयटी अव इन्फ़्लूयन्स कहते हैं जो अपने पूर्वज के ग़लत पाठसे जन्म लेता है, एक ऐसी प्रक्रिया जहाँ एक लेखक अपने अग्रज के शब्दों को संशोधित करने की आकांक्षा लिए उन्हें मरोड़ देता है, उनसे एक नया अर्थ हासिल कर लेता है.

लेखकीय परम्परा का ज़िक्र जिस तरह इन आलोचकों ने किया है, यह निबंध उससे अलग धुरी पर स्थित है. यहाँ यह सजग बोध है कि पूर्वज से मुक्त हुए बग़ैर लेखक की मुक्ति असम्भव है, लेकिन यह बोध भी है कि यह आकांक्षा और इस दिशा में किया गया कर्म शायद एक छलावा ही रहा आयेगा, इस दौरान पूर्वज कहीं विराट स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाएगा, जिससे बचना चाह रहे थे वह सदा को बना रहा आयेगा, लेकिन फिर भी यह कर्म अनिवार्य नज़र आयेगा.




(पांच)
एक सत्य लेकिन और भी है. इस प्रश्न के मायने पुरुष और स्त्री रचनाकार के लिए भिन्न हो सकते हैं. स्त्री का लेखकीय परंपरा के साथ शायद वह संबंध नहीं जो पुरुष का होता है. चूँकि मानव इतिहास के लम्बे अंतराल में अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी से पहले कुछ अपवादों के सिवाय लेखन पुरुष-कलम से ही हुआ है, जिन अर्थों में परम्परा को पुरुष देखता है वह स्त्री के लिए सम्भव नहीं है, उसका सरोकार भी नहीं है. स्त्री के पास शायद ऐसे बहुत अधिक पूर्वज नहीं है जिन्हें वह जिन्हें गुरु-स्थान पर अधिष्ठित कर सके. 


पुरुष अपनी परम्परा को व्यास, वाल्मीकि, होमर और अरस्तू से लेकर बाणभट्ट, शेक्सपियर, कबीर और बंकिम चन्द्र में देख सकता है, लेकिन स्त्री शायद इनमें से अनेक के साथ कोई अपनापा नहीं जोड़ पाएगी. वह अरस्तू जो कथा में किरदार के चित्रण की चर्चा करते वक्त अपने ग्रंथ पोएटिक्स में घोषित कर देते हैं कि स्त्री हीन प्राणी है, उसके अंदर शौर्य का गुण नहीं है. वह होमर जिनके महाकाव्य ओडिसी में पश्चिमी साहित्य की शायद पहली ऑनर किलिंगघटित होती है जब यूलिसीज़ अपनी पत्नी की बारह सहायिकाओं की हत्या करवा देता है क्योंकि उन्होंने उसकी अनुपस्थिति में अन्य पुरूषों को अपने साथ सम्बंध बनाने की अनुमति दे दी थी.

स्त्री का इन अग्रजों के प्रति संबंध संकटग्रस्त ही रहेगा. चूँकि स्त्री की पहली फ़िक्र पुरुष द्वारा रचित लेखकीय संसार में अपनी जगह बनाने की रही है, इसलिए वह गुरु-दक्षिणा को एक अनिवार्य पुरुष-प्रश्न बतौर भी देख सकती है. जैसाकि द मैडवुमन इन द ऐटिक में सैंड्रा गिल्बर्ट और सूज़न ग़ुबर लिखती हैं: 


उसका (स्त्री) अपने पुरुष पूर्वजों से संघर्ष सृष्टि के प्रति उनकी दृष्टि को लेकर नहीं, बल्कि ख़ुद उसके (स्त्री) प्रति उनकी दृष्टि पर है.

वर्जीनिया वूल्फ़ भी कहती हैं कि साहित्य की तमाम महानतम रचनाओं में स्त्री को अपने लिए कुछ भी नहीं मिलेगा. ये किताबें पुरुष संसार को लिखती हैं, पुरुष मूल्यों का उत्सव मनाती हैं. स्त्री के पास कोई परम्परा नहीं है, अगर है भी तो वह इतनी छोटी और अपर्याप्त है कि उसका कोई अर्थ नहीं. 


स्त्रियाँ अपनी माताओं के ज़रिए विचार करती हैं. महान पुरुष लेखकों के पास सहारे के लिए जाना व्यर्थ है.

ज़ाहिर है पुरुष के लिए तो बतौर प्रेरणा-स्रोत अनेक पिता उपलब्ध हैं, स्त्री के पास बहुत अधिक माताएँ नहीं हैं. इस तरह स्त्री का लेखन भी इन पूर्वजों के प्रति विद्रोह है, उनसे मुक्ति पाने का रास्ता है.
रचनाकर्म, भले वह स्त्री का हो या पुरुष का, शायद इन्हीं जुड़वाँ आकांक्षाओं से संचालित होता है गुरु-दक्षिणा और गुरु-वध.

लेकिन वह बुज़ुर्ग? इस पूरी कथा में उसकी क्या भूमिका है? क्या यह एकतरफ़ा कर्म है जिसमें उसकी कोई जगह नहीं? क्या वह अपने परवर्ती के हाथों मिटाए जाने को अभिशप्त है? नहीं. वह कोई निरीह शिकार या बलि का प्राणी नहीं है. यह समूची क्रीड़ा उसकी उदार अनुमति, सहृदय भागीदारी से ही सम्भव होती है. भले ही आप उससे उसकी मृत्यु का उपाय जान उसे रणभूमि से हटा दें लेकिन वह महारथी जमीन पर नहीं गिरेगा, उसकी गरिमा के अनुकूल उसकी शैया अभेद बाणों की ही बनेगी, वह सूर्य के तेज़ के साथ उस सेज पर लेट जायेगा, और भले ही वह शर-शैया पर लेटा हो लेकिन वह प्राण अपनी इच्छा से ही त्याग करेगा. अलेहांड्रो जंब्रा के उपन्यास बोनसाई का बूढ़ा उपन्यासकार युवा नायक से कहता है: 

हम बूढ़े लोगों को युवाओं से सिर्फ़ चापलूसी ही नहीं चाहिए, कहीं गहरे हमें उनके ख़ून की भी ज़रूरत होती है. एक बूढ़े को ढेर सारा ख़ून चाहिए.

इस बुजुर्ग ने अपने उत्तराधिकारी को जितना ख़ून अपने समूचे जीवन में दिया है, उससे कई गुना अधिक उसका लहू वह अपने अंतिम क्षणों में निचोड़ लेता है.

लहू के इन्हीं क़तरों को समेटने की आकांक्षा की कोख़ से अक्सर एक महान कृति जन्म लेती है.
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आशुतोष भारद्वाज
abharwdaj@gmail

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  1. आशुतोष भारद्वाज को पढ़ना हमेशा रोमांचकारी होता है।
    उनका यह निबंध भी बहुत पठनीय है।

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  2. संदर्भ संपन्न। बहसपरक।

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  3. अंचित27/6/19, 9:59 am

    लेख हैरल्ड ब्लूम के anxiety of influence की याद दिलाता है.

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  4. रोहिणी अग्रवाल27/6/19, 10:00 am

    पठनीय लेख. बेहद सुचिंतित और नये आयामों को छूने वाला

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  5. विनोद पदरज27/6/19, 10:00 am

    बहुत अच्छा आलेख आशुतोष जी का शुक्रिया

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  6. मनोवज्ञान, मिथक, इतिहास और राजनीति की गलियों से गुज़रता यह आलेख वर्तमान के कई सवालों को जांचता परखता है। जीवन और रचनात्मकता इसी संघर्ष से जूझते दिखाई देते हैं अक्सर । लेख उस संघर्ष से परे जाकर उनके जवाब ढूंढने का बेहद अच्छा प्रयास है।

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  7. अत्यंत सारगर्भित, सुसंदर्भित और प्रासंगिक आलेख । आशुतोष की शैली बहुत आकर्षक है ।

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  8. अलका सिंह27/6/19, 1:09 pm

    संतान पैदा करना और पिता बनाना दो अलग अलग चीजें हैं ... जिस पिता बनाने की बात इस लेख में की जा रही है वह पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पिता के चरित्र को धारण करने वाले व्यक्ति की ह्त्या की बात है ........दरअसल पिता होना एक भूमिका है , पिता एक व्यवस्था का हिस्सा है और जब नयी पीढी उस व्यवस्था की नयी फसल के रूप में उत्तराधिकार ग्रहण करने की अभिलाषी होती है तो उसे पिता को अपदस्थ करने की चाहत होती है ...वह उसे अपदस्थ करना ही चाहता है ताकि वह अपने विचार , कृत्य और भोभूमिका को नए कलेवर में लोगों के सामने लाये ........इस लेख की आलोचना की भी बातें इसमें निहित हैं लेकिन फिर भी यह दो पीढ़ियों का संघर्ष तो है ही

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  9. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (28-06-2019) को "बाँट रहे ताबीज" (चर्चा अंक- 3380) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  10. Sanjeev Sathe27/6/19, 3:19 pm

    We have to hate our immediate predecessors to get free of their authority. - D. H. Lawrence
    Lawrence is bang on. By "hate" he means hate towards their ways, or a stubborn disagreement in following their ways. That's how the next generation breaks free of the grooves cut by the earlier generation. They (younger people) eventually outgrow their predecessors by doing this.

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  11. Vijay Sharma27/6/19, 6:24 pm

    अच्छा विचारपूर्ण लेख। मेरा विचार है कि बिना पितृ वध के भी संतान-लेखक आगे जा सकता है। आगे निकलने के लिए किसी की हत्या या किसी को कुचलना जरूरी नहीं है। मेरे विचार से सहमत होना जरुरी नहीं।

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  12. Rustam Singh28/6/19, 6:35 am

    गाँधी जी को राष्ट्रपिता कह कर उन्हें पिता के तौर पर सब पर थोप दिया गया है। पर वे सब के लिए राष्ट्रपिता नहीं हैं, न थे, न होंगे। उन्हें राष्ट्रपिता कहना भारतीय बुर्जुआज़ी को सूट करता है। इससे वे सब मिलिटेंट लोग किनारे पर चले जाते हैं जिन्होंने भी आज़ादी के लिए संघर्ष किया था और जाने दी थीं। स्पष्ट है कि आप भी उन्हें राष्ट्रपिता मानते हैं। पर क्या गोडसे के लिए भी गाँधी पिता-समान थे ? बात को खींचा गया है यहाँ।

    सभी लेखकों के पिता नहीं होते, पुरुष लेखकों के भी नहीं। ऐसे लेखक किसी पिता-विता का वध किये बग़ैर ही अपनी लेखकीय ज़मीन बना लेते हैं।
    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ईडीपस ने अपने पिता का वध अज्ञान में किया था, जानबूझकर नहीं। फ्रायड ने इसे तोड़-मरोड़कर इडिपस काम्प्लेक्स की अवधारणा बनाई, जो पता नहीं कितनी सही थी। इस अवधारणा को खींचकर लेख लिखने की बजाय पहले तो उस पर सवाल उठाने की ज़रूरत है।

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  13. Bibhas Kumar Srivastav28/6/19, 8:42 am

    पूरा लेख मन से पढ़ा लेकिन जिस वाक्य ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया वह है: हम बूढ़े लोगों को युवाओं से सिर्फ़ चापलूसी ही नहीं चाहिए, कहीं गहरे हमें उनके ख़ून की भी ज़रूरत होती है. एक बूढ़े को ढेर सारा ख़ून चाहिए।
    गाँधी के वध-हत्या (मैं हत्या मानता हूँ) के बारे में कांग्रेस के अन्तर्मन का पर्दाफ़ाश करना वाक़ई एक हक़ीक़त है।
    मैं बाग़बान और अवतार जैसी फ़िल्मों का घोर आलोचक हूँ। एक वक्त ऐसा आता है कि माँ-बाप को अपने संतान की चापलूसी पसंद आने लगती है। उसका मुख्य कारण है उनकी अपनी ज़िन्दगी के प्रति अस्थिरता का भान होना। तब वो अपने पुत्रों में चापलूसी की प्रतियोगिता पैदा करके अपना भविष्य सुरक्षित करते हैं। माँ-बाप को अपने बच्चों का ख़ून भी चाहिए अपने एहसानों के प्रतिफल के रूप में। इस प्रकार परिवार एक नए नर्क की ओर अग्रसर हो जाता है।
    यह बात बिलकुल सही है कि एक व्यक्ति की मौत उसके अपने पिता की मौत की प्रतीक्षा से शुरू हो जाती है।
    भारतीय परिवार में पिता-पुत्र के बीच द्वंद्व और सत्ता की लड़ाई पर हिंदी साहित्य में शायद ही कोई रचना हो जो महत्वपूर्ण हो। कारण हिंदी साहित्य पर्दाफ़ाश करने के बजाए आदर्श गढ़ने में ही विश्वास रखता है। इसीलिए यहाँ बाग़बान और अवतार जैसी फ़िल्में हैं। कहानियाँ ये भी हैं कि पुत्र अपने माँ-बाप को प्यार देना चाहता है लेकिन माँ-बाप उसे रिजेक्ट कर देते हैं।
    बहरहाल लेख पढ़कर आनन्द आ गया।

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  14. बेहद विचारणीय प्रभावशाली लेख

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  15. राजेन्द्र सिंह28/6/19, 10:18 am

    यह लेख अच्छा है । इस लेख के लिए जो विजुअल चुने गये हैं वे भी प्रशंसनीय हैं। कुलमिलाकर यह पत्रिका एक कलाकृति की तरह विमोहित करती है।

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  16. विजया सिंह28/6/19, 11:25 am

    आशुतोष भारद्वाज के पितृ-वध लेख को पढ़ कर बेहद निराशा हुई। यह सही है कि उन्होंने दिग्गज लेखकों जैसे, दोस्तोयवस्की , सुकरात , ऐ. के. रामानुजन , व्यास , पामुक, काफ़्का , बॉर्हेस , गिल्बर्ट, गुबर , वूल्फ़, नंदी के अलावा गांधी और अन्य लोगों का ज़िक्र भी किया है जो उनके विस्तृत पठन को दर्शाता है । लेकिन सिर्फ़ उनके कहे को रेखांकित करने से बात नहीं बनती । एक बारीक और तीक्षण विश्लेषण की कमी अखरी । जो पहलू विशेष रूप से खले उनका विस्तार से नीचे ज़िक्र कर रही हूँ ।
    सबसे पहले तो पितृ वध के जो ऐतिहासिक , दार्शनिक , सांस्कृतिक और कलात्मक आयाम हैं , पश्चिम में और भारत में, उन्हें सिर्फ़ आस -पास रख देने भर से काम नहीं चल सकता । उससे भी चिन्ताजनक बात यह है कि भारतीय होने को वे गैर -आलोचनाआत्मक तरीक़े से हिंदू चेतना से जोड़ देते हैं । वे मकरंद परांजपे की पुस्तक The death and afterlife of Gandhi का ज़िक्र करते हुए इस्लामिक और हिंदू चेतना की भिन्नता को रेखांकित करते हैं, कि “इस्लामिक शासन के दौरान राजगद्दी पाने के लिए बेटे द्वारा पिता की हत्या के उधारण हैं” लेकिन ” अजातशत्रु के द्वारा अपने पिता को भूखा मार देने को सिर्फ़ विभत्स कृत्य कह कर दरकीनार कर देते हैं । यह परम्परा को देखने का संकरा नज़रिया तो है ही, चयनात्मक भी है । भारतीय परम्परा बहुत विशाल है, उसमें सिर्फ़ हिंदू चेतना ही नहीं है । यह बात जितनी ज़ोर देकर कही जा सकती है , कहनी चाहिए , ख़ासकर आज के माहौल में , जब भारतीयता के सवाल पर ही घनीभूत बादल मँडरा रहे हैं , और उसे संकीर्ण तरीक़े से परिभाषित करने की पुरज़ोर कोशिश जारी है ।
    आशुतोष आगे अपने लेख में पितृ-वध को भारतीय सन्दर्भ के मार्फ़त सोफोक्लीज के इडिपस से अलग कर देते हैं, लेकिन साथ ही पितृ- वध को रचनात्मकता से जोड़ भी देते हैं । पितृ वध को रचनात्मकता से जोड़ते ही Freud हमारे साथ हो लेते हैं । उन्हें आप सिर्फ़ यह कह कर रद्द नहीं कर सकते की “भारतीय सन्दर्भ में पितृ हत्या को माँ के केंद्रीय आइने से देखने की आवश्यकता नहीं हैं ।”चूँकि माँ की उपस्तिथि अनिवार्य नहीं है, इसलिए इसे इडिपल हत्या कहने के बजाय …..पितृ-वध कहा जा सकता है, हत्या नहीं ” और ना ही रामानुजन का हवाला दे कर कि उन्हें “समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के साहित्य , इतिहास , मिथक, और लोक कथाओं में सोफोक्लीज के नाटकों की इडिपल हत्या जैसा कोई उधाहरण नहीं...” मिला ।

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  17. विजया सिंह28/6/19, 11:27 am

    जब Freud इडिपल काम्प्लेक्स की बात करते हैं तो वे उसे पूरी मानव जाति के psychosexual stages of development का ज़िक्र करते हुए पिता, पुत्र और माँ के बीच योनिक तनाव के अवचेतन डायनामिक्स की बात करते हैं । यदि , सोफोकलेज ने ‘इडिपस रेक्स’ नाटक ना लिखा होता तो भी Freud ‘इडिपस’ काम्प्लेक्स’ को खोज निकालते । या तो आप Freud को पूरी तरह से ख़ारिज करदें , जैसा की कुछ लोग करते हैं। लेकिन आप Freud को ख़ारिज ना करते हुए उसके इडिपल काम्प्लेक्स को विशेष रूप से भारतीय परिपेक्ष में यह कह कर बर्खास्त नहीं कर सकते कि चूँकि हमारे यहाँ के किसी मिथक इत्यादि में माँ पिता और पुत्र के केंद्र में नहीं आती तो हमारे यहाँ पितृ- हत्या , नहीं पितृ-वध होता है । यहाँ सुधीर कक्कड़ ने जो विस्तृत तरीक़े से भारतीय समाज का मनोवैज्ञानिक अध्यन किया है उसका ज़िक्र बनता है ।
    ‘वध’ में , आशुतोष लिखते हैं , “वैधानिकता का भाव है और वह किसी विराट व्यक्तित्व का होता है जिस पर प्रहार करते वक़्त भी वधिक उसे नमन करना नहीं भूलता”। इडिपस के पिता , सुकरात, ईसा ये सब विराट व्यक्तित्व के लोग थे । तो उनकी हत्या हुई या वध ? गोडसे के घृणित कृत्य को अन्य कांग्रेसी नेताओं की गांधी के प्रति बेरुख़ी और असहमतियों से जोड़ कर देखना गांधी की हत्या का सरलीकरण है , जिस में उस राजनीतिक सोच का जिससे यह भयानक कृत्य उपजता है का कहीं कोई ज़िक्र नहीं है।
    एक बात और जो विशेष रूप से अखरी वह है उनका स्त्री सम्बंधी लेखकीय परम्परा के प्रति बेहद उदासीन और उपेक्षपूर्ण रवैया । वे लिखते हैं , “जिन अर्थों में परम्परा को पुरुष देखता है वह स्त्री के लिए सम्भव नहीं है , उसका सरोकार भी नहीं है। स्त्री के पास शायद ऐसे बहुत अधिक पूर्वज नहीं है जिन्हें वह गुरु स्थान पर अधिष्ठित करे”। अपनी बात की सहमति में वे सैंड्रा गिल्बर्ट और वर्जीनिया वूल्फ़ का हवाला अवश्य देते हैं पर चयनात्मक तरीक़े से । ज़ाहिर है फ़ेमिनिज़म में कई तरह की बहसें और मतभेद हैं पिता/ माता और स्वयं Freud को लेकर । इस बहस का एक अलग पक्ष एलैने शोवॉल्टर अपने लेख “ Feminist criticism in wilderness” के तहत देती हैं । उनका कहना है , पुरुष और स्त्री दोनो ही अपने वालिदैन के साये में/प्रभाव में लिखते हैं । Feminsim में परम्परा के प्रशन को कई -कई तरीक़ों से खंगाल गया है और प्रभावशाली तरीक़े से पितृसत्ता की बहुदा आलोचनाएँ प्रस्तुत की हैं जो हमें सोचने पर ही मजबूर नहीं करती एक नया नज़रिया भी देती है पुराने सवालों को देखने का । बकौल , वर्जीनिया वूल्फ़, “I thought how unpleasant it is to be locked out; and I thought how worse it is, perhaps , to be locked in.”
    इन सब के परे एक प्रशन जो ज़ाहिर तौर पर उठना चाहिए वो यह कि Freud का psychoanalytic model एक सिमित मॉडल है जिससे हमें सामाजिक , अर्थ -शास्त्रीय, और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को समझने में कोई ख़ास मदद नहीं मिलती। रही बात पितृ-वध की, तो क्या यह ज़रूरी ही है उसका वध किया जाए ? Feminism के हवाले से, “why are men so obsessed about killing their fathers?”
    यहाँ यह बात भी विशेशतौर पर रेखांकित की जानी है कि हिंदू मिथकों, इतिहास में माताओं, बहनों और बेटियों के वध की कथाएँ बहुदा आसानी से मिल जाएँगी। सबसे प्रमुख उधाहरण तो परशुराम का ही, है । क्या परशुराम ने माता का वध करने से पहले अपनी माता से उनकी ही हत्या की अनुमति ली थी? स्त्री -वध, भारतीय सन्दर्भ में, मनोवैज्ञानिक , सामाजिक, ऐतिहासिक और आर्थिक विश्लेषण के ऐसे क्षेत्र हैं , जो बिनपहचानी लाशों से अटे पड़े हैं ।

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  18. Ashutosh Bhardwaj28/6/19, 5:57 pm

    To Rustam Singh प्रश्न यह नहीं कि कौन गांधी को राष्ट्र पिता मानता है या नहीं, बल्कि यह कि गांधी के शव ने आखिर क्यों और किस तरह पिछले सत्तर वर्ष की राजनीति और समाज को प्रभावित किया है। अगर गोडसे ने किसी और इंसान पर गोली चलाई होती तो क्या उसके वही राजनैतिक परिणाम होते जो गांधी-वध के हुए? गोडसे के भीतर गांधी किस तरह कुलबुला रहे थे इसके लिए उनके अदालती बयान को पढ़ना चाहिए। उन्होंने भरी अदालत में स्वीकारा कि गोली चलाने से पहले वह गांधी के समक्ष झुक गए थे, उन्हें नमन किया था।
    एकदम सही। सभी लेखकों के पूर्वज नहीं होते, या शायद वे उनसे संवाद करना, उन्हें स्वीकारना नहीं चाहते। लेकिन तमाम लेखकों के पूर्वज होते भी हैं। यह निबंध उन्हीं लेखकों के रचना-कर्म को समझना चाहता है।
    यह निबंध कहीं से इडिपस का समर्थन नहीं करता, उससे अलग जा अपना तर्क रखता है। एकदम स्पष्ट करता है कि “पितृ-हत्या को माँ के केंद्रीय आइने से देखने की आवश्यकता नहीं है….इसे इडिपल हत्या कहने के बजाय पितृ-वध कहा जा सकता है।“
    इडिपस पर प्रश्न करना, उससे सहमत होना या उसे नकारना इस लेख की परिधि से बाहर है। फ्रायड की अवधारणा पर विचार इस लेख के लिए एकदम जरूरी नहीं है।

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  19. बहुत खूब आशुतोष भाई। शानदार निबन्ध। आपने इस निबन्ध में प्रखरता, विद्वता और तार्किकता का अद्भुत संतुलन हासिल किया है। नये ढ़ंग से सोचने के लिए प्रेरित करने वाले इस निबन्ध के लिए आपका बहुत आभार।
    आशुतोष
    सागर विश्वविद्यालय।

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  20. Vijaya Singh: आपने कई महत्वपूर्ण प्रश्न किये हैं लेकिन मेरे ख्याल से आप मेरे लेख को फिर से पढेंगी तो शायद कई सवालों के जवाब मिल जायेंगे.

    यहाँ सिर्फ एक प्रश्न का जवाब दे रहा हूँ: " एक बात और जो विशेष रूप से अखरी वह है उनका स्त्री सम्बंधी लेखकीय परम्परा के प्रति बेहद उदासीन और उपेक्षपूर्ण रवैया ।"

    जैसा आपने लिखा है कि स्त्री लेखकीय परम्परा पर कोई एक विचार नहीं है, खुद मेरे इस लेख पर आये अगर कमेंट आप देखें तो एक वरिष्ठ लेखक कहते हैं सभी लेखकों के "पिता-विता" नहीं होते। एक अन्य ने लेखकीय परम्परा की खोज को इसे पितृ-सत्ता का प्रश्न का बताया है, यानि इस प्रश्न की प्रासंगिकता को स्त्री के लिए नकार दिया है, मुझसे सहमति जताई है.

    जैसा आप खुद कहती हैं कि फेमिनिज्म में कई तरह के मतभेद हैं इस विषय पर, यानि तमाम लेखकों का इस विषय पर नजरिया अलग हो सकता है. आप मेरे नजरिये से एकदम असहमत हो सकती हैं, लेकिन उसका अर्थ यह तो नहीं होगा कि मेरा रवैया 'उपेक्षापूर्ण' है?
    दूसरे, मैं गिल्बर्ट का पक्षधर हूँ. क्या आप गिल्बर्ट की किताब को भी स्त्री परम्परा के प्रति उदासीन और उपेक्षापूर्ण कहेंगीं?

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