पितृ-वध : आशुतोष भारद्वाज

Posted by arun dev on जून 26, 2019





















(sculpture by great ketelaars)




पुत्र एक समय के बाद खुद पिता बन जाता है. क्या वह पिता को अपदस्त करके पिता बनता है ? सत्ता के लिए पुत्र द्वारा पिता का वध इतिहास ने देखा है. साहित्य में भी ख़ासकर पुरुष लेखन में पिता-पुत्र के तनावपूर्ण रिश्ते चित्रित हुए हैं. पश्चिम ने जहाँ पिता सरीखे ईसा का वध देखा है वहीँ भारत अपने राष्ट्र-पिता की हत्या के अपराधबोध में आज भी धंसा हुआ है.

‘पितृ-वध’ अलग तरह का आलेख है. इसे आशुतोष भारद्वाज ही लिख सकते हैं. साहित्य, पुराण, इतिहास से होते हुए वह समकालीन उस जगह ऊँगली रखते हैं जो आज भी लहू जमने से स्याह पड़ी हुई है. 

ख़ास समालोचन के पाठकों के लिए यह 

पितृ-वध                              
आशुतोष भारद्वाज



फ़्योडोरोविच करामाजोव मारे जा चुके हैं. पिता निर्दयी था. धन और स्त्री को लेकर बेटे पिता से अरसे से झगड़ते आए थे. पिता की हत्या करना चाहते थे, बड़े बेटे दिमित्री ने उन पर हमला भी किया था. लेकिन पिता के जाने के बाद बेटों के भीतर सहसा अपराध-बोध उमड़ आया है.


मैं दोषी नहीं हूँ. मैं अपने पिता की हत्या का दोषी नहीं हूँमैं उन्हें मारना चाहता था. लेकिन मैं दोषी नहीं हूँमैं वाक़ई उनकी हत्या कर देना चाहता था…  कई बार मैंने सोचा थामैंने इस बारे में कभी अपनी भावनाओं को नहीं छुपाया था. पूरा शहर इस बारे में जानता था.

यह दिमित्री करामाजोव का पुलिस को दिया बयान है जब उसे अपने पिता की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया जाता है.

इसके थोड़ी देर बाद फ़्योडोरोविच का सबसे छोटा बेटा अल्योशा मँझले भाई ईवान से कहता है:

इन भयावह दो महीनों में जब भी तुम अकेले पड़े हो तुमने यह ख़ुद से कई बार कहा है. तुमने ख़ुद को दोषी ठहराया है, यह स्वीकार किया है कि तुमने ही हत्या की है, किसी और ने नहीं. लेकिन तुम हत्यारे नहीं हो. सुना तुमने? वह तुम नहीं हो. ईश्वर ने मुझे तुम्हें यह बताने केलिए भेजा है.

दिमित्री पर हत्या का मुकदमा चलता है, फ़्योडोरोविच का एक अन्य बेटा स्मेरद्याकोव तब तक आत्महत्या कर चुका है. कथा एक नया मोड़ लेती है जब ईवान भरी अदालत में कहते हैं:


मेरे पिता की हत्या उसने (स्मेरद्याकोव) की थी. हत्या उसने की थी और मैंने उसे इसके लिए उकसाया थाकौन अपने पिता की मृत्यु की कामना नहीं करता?”

दोस्तोयवस्की का यह उपन्यास उस अंधेरे बंद कमरे की एक चाभी है जो शायद तमाम रचनाकारों के भीतर छुपा रहता है लेकिन जिसकी सीढ़ियाँ उतरने का साहस कम लेखक कर पाते हैं. एक सजग रचनाकार को अक्सर बहुत जल्द यह बोध हो जाता है कि जिन पूर्वजों को वह अपना आदर्श मानता आया है, जिनके शब्द उसकी सर्जना को रोशनी देते आए हैं उन्होंने दरअसल उसकी चेतना को अपनी गिरफ़्त में ले रखा है, उनका स्वर उसकी कृतियों को चुप दिशा देता चलता है.

इस बोध के बाद उस पूर्वज से मुक्ति पाने के लिए भीषण संघर्ष शुरू होता है जिसकी परिणति एक अन्य बोध में होती है कि उस पूर्वज या शायद उसके प्रेत का वध अपने काग़ज़ पर किए बग़ैर, अपनी स्याही से उसका शोक-गीत लिखे बग़ैर इस लेखक को मुक्ति नहीं मिलेगी. लेकिन किसी लेखक के लिए यह स्वीकार करना आसान नहीं है कि उसका रचना कर्म उसके पितामह की शव-साधना है या हो जाना चाहता है क्योंकि पितृ-वध मुक्ति का साधन हो या न हो, आख़िर मुक्ति का समूचा प्रत्यय एक विराट मायाजाल है, लेकिन यह मनुष्य को असहनीय अपराध-बोध में डुबो सकता है.


स्वतंत्र भारत की नींव राष्ट्र-पिता के वध से निर्मित होती है. भारतीय अवचेतन आज भी इस अपराध बोध की गिरफ्त में है. स्वातंत्रयोत्तर भारत की राजनीति कारतूसों से बिंधे इस शव के इर्द-गिर्द घूमती आयी है. सत्तर से अधिक वर्ष हुए लेकिन यह अपराजेय और असम्भव लाश अभी तक नहीं बुझी है, इस राष्ट्र के आकाश पर अपने डैने फैलाये पसरी है. 

पश्चिमी सभ्यता की नींव भी उन दो पितृ-पुरुषों के शव से रची गयी है जो इस सभ्यता के दर्शन, धर्म, विचार और व्यवहार के आदि स्रोत हैंसुकरात और ईसा मसीह. पश्चिम के अवचेतन में दफ़न एक स्याह तहख़ाने में इस पिता की लाश दो हज़ार वर्षों से रखी हुई है. लेकिन पश्चिम इस घाव को स्वीकारना नहीं चाहता. वह इससे संवाद करने से भी बचता रहा है. क्या पश्चिम द्वारा दुनिया भर में की गयी हिंसा की एक वजह इस पितृ वध से उपजा अपराध बोध है? क्या अन्य समुदायों और संस्कृतियों को सैविजघोषित कर वह अपने नृशंस कृत्य, अपने ओरिज़िनल सिनपर पर्दा डाल देना चाहता है? इस प्रश्न को किसी आगामी निबंध के लिए रखते हैं. 





(दो)
ए के रामानुजन द इंडियन इडिपस निबंध में कहते हैं कि समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के साहित्य, इतिहास, मिथक और लोक कथाओं में सोफ़ोक्लीज के नाटकों की इडिपल हत्या जैसा लगभग कोई उदाहरण नहीं है. महाभारत में कुछ संक्षिप्त-से उल्लेख हैं, लेकिन वह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है. मकरंद परांजपे अपनी किताब द डेथ एंड आफ़्टरलाइफ़ अव महात्मा गांधी में इस्लामिक शासन के दौरान राजगद्दी पाने के लिए बेटे द्वारा पिता की हत्या के उदाहरणों का जिक्र करते हैं लेकिन जोर देकर कहते हैं कि हिंदू चेतना इसे घनघोर वर्जित मानती है. हिन्दू इतिहास में ऐसी एकाध घटनायें हैं ज़रूर, मसलन मगध सम्राट बिंबिसार के पुत्र अजातशत्रु ने अपने पिता को क़ैद कर उसे भूखा मार दिया था लेकिन यह कृत्य हिन्दू संस्कार और स्मृति में इतना वीभत्स माना जाता है कि समाज और इतिहासकार इसे याद तक रखना नहीं चाहते.



यह निबंध उपरोक्त प्रस्तावनाओं से परे जा दो प्रस्तावना देना चाहता है. पहली, भारतीय संदर्भ में पितृ-हत्या को माँ के केंद्रीय आइने से देखने की आवश्यकता नहीं है. चूँकि माँ की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है इसे इडिपल हत्या कहने के बजाय, एक कृत्य जो माँ को बीच में रख पिता और पुत्र के बीच एक विशिष्ट यौनिक तनाव का संकेत देता है, पितृ-वध कहा जा सकता है. हत्या नहीं, वध. वध में वैधानिकता का भाव है. वध अमूमन ऐसे विराट व्यक्तित्व का होता है जिस पर प्रहार करते वक्त भी वधिक उसे नमन करना नहीं भूलता. वध मृतक की गरिमा में वृद्धि करता है, अक्सर अनुत्तरित प्रश्न पीछे छोड़ जाता है.

पांडव भीष्म के पास उनके वधकी वजह जानने गए थे, गोड़से ने भी अपने कृत्य को गांधी-वधकहा था.

दूसरा, इस वध के अनेक रूप हो सकते हैं. यह सिर्फ़ इतिहास या पुराण के पन्नों में ही नहीं विचार में भी घटित होता है, अपने अविजित पिता को रास्ते से हटा देने की आकांक्षा में घटित होता है. वह क्षण जब पुत्र को एहसास हो जाता है कि भले ही पिता की मृत्यु के बाद उसके भीतर का पुरुष भी धीरे-धीरे मरना शुरू हो जायेगा, लेकिन पिता के रहते वह सिंहासन हासिल नहीं कर पायेगा.

यह महापुरुष भी अपने परवर्ती की इस आकांक्षा से अनजान नहीं है, शायद वह भी यही चाहता है, इसमें ही उसकी मुक्ति है, और पहले से कहीं विराट पुनर्जन्म है. संस्कृत का श्लोक है --- सर्वतो जयमिच्छेत. पुत्राच्छिष्यात्पराजयम्. सभी लोगों को जीतना चाहता हूँ, लेकिन पुत्र और शिष्य से पराजय की इच्छा रखता हूँ.

इसलिए रामानुजन और मकरंद जब लिखते हैं कि चूँकि भीष्म की मृत्यु उनकी अनुमति से हुई थी इसलिए वह पितृ-वध नहीं है, वे व्यास की कथा के मर्म को शायद अनदेखा कर देते हैं.

महाभारत के युद्ध को नौ दिन हो चुके हैं. पांडव हताश हैं. उन्हें अपनी पराजय दिख रही है. नवीं रात पांडव शिविर में युधिष्ठिर कृष्ण से कहते हैं: 


विकट पराक्रमी महात्मा भीष्म हमारी सेना का उसी प्रकार विनाश कर रहे हैं जैसे हाथी सरकंडों के जंगलों को रौंद डालते हैंअब मैं वन को चला जाऊँगा. मेरे लिए वन में जाना ही कल्याणकारी होगा. मेरी युद्ध में रुचि नहीं रही क्योंकि भीष्म हमारा विनाश कर रहे हैं. जैसे पतंगा अग्नि की ओर दौड़ा जाकर मृत्यु को प्राप्त करता है, हमने भी भीष्म पर आक्रमण कर मृत्यु का ही वरण किया है.

अर्जुन का युद्ध से पहले मोहभंग हुआ था, युद्ध की निरर्थकता जान वह युद्धभूमि से हट जाना चाहते थे. युद्ध के बीच भीष्म के सामने अपनी पराजय अवश्यंभावी देख युधिष्ठिर रण छोड़ देना चाहते हैं. चारों भाईयों और कृष्ण से मंत्रणा के बाद उन्हें लगता है कि देवव्रत भीष्म के पास जा उन्हीं से उनके वध का उपाय पूछा जाए. लेकिन पितामह के प्रति यह विचार आते ही युधिष्ठिर ग्लानि से भर उठते हैं: 


बाल्यावस्था में जब हम पितृहीन हो गए थे, उन्होंने ही हमारा पालन पोषण किया था. माधव, वे हमारे पिता के पिता और हमारे प्रिय हैं, फिर भी मैं उनका वध करना चाहता हूँ. क्षत्रिय की इस जीविका (धर्म) को धिक्कार है.

जीवित बचे रहे आने की आकांक्षा व पितामह की मृत्यु कामना से उपजे अपराध बोध के बीच फँसे पाँचों भाई और कृष्ण भीष्म के पास जाते हैं. युधिष्ठिर कहते हैं: 


हे सर्वज्ञ, युद्ध में हमारी जीत कैसे हो?…आप स्वयं ही हमें अपने वध का उपाय बताइए.

और तब भीष्म कहते हैं: 


यह तुम्हारे लिए पुण्य की बात है कि तुम्हें मेरे इस प्रभाव का ज्ञान हो गया है” कि मेरे रहते तुम कभी विजयी न हो सकोगे.
यह पितृ-वध का विलक्षण उदाहरण है. यहाँ इडिपल या स्त्री की तलाश निरर्थक है. यह कोरी हत्या नहीं है. भले यह वध पुत्र की आकांक्षा की परिणति है लेकिन यह पितामह की अनुमति और भागीदारी से सम्भव होता है, पितामह की प्रतिष्ठा को संवर्द्धित करता है.

घृणा से भरे गोड़से भी गांधी के योगदान को स्वीकारते थे. अदालत में उन्होंने अपने बयान में कहा था कि ट्रिगर दबाने से पहले वह गांधी के समक्ष सम्मान में झुक गएथे. जैसा आशीष नंदी और उनसे पहले रॉबर्ट पायने ने लिखा है कि गांधी की हत्या किसी एक इंसान ने नहीं की थी, इस कृत्य के अनेक मूक सहभागी थे, गांधी ख़ुद उनमें से एक थे. कांग्रेस के अनेक नेता निश्चित ही गांधी की मृत्यु नहीं चाहते थे, लेकिन वे गांधी को नए भारत की राह में बाधा ज़रूर मानते थे. गांधी की भी भीष्म जैसी ही स्थिति थी. गांधी की राजनैतिक संतानों को बोध हो गया था कि गांधी के रहते वे भारत को हासिल नहीं कर पाएँगे. यह बोध ज़ाहिर है गांधी को दरकिनार करते जाने के अपराध बोध का जुड़वाँ था.

यह तीखा अंतर्द्वंद्व सिर्फ़ पांडव भाईयों या कांग्रेसी नेताओं तक ही सीमित नहीं है, वे तमाम पुत्र इससे गुज़रते हैं जो पिता के प्रति आदर और उनसे उपजती असंभव चुनौतियों के बीच ख़ुद को पिसते पाते हैं.



(तीन)
उपरोक्त दृष्टांत सिर्फ़ भूमिका बतौर हैं. भीष्म और गांधी और करामाजोव के सहारे यह निबंध कहीं और पहुँचना चाहता है, एक रचनाकार के अपने पितामह के साथ त्रासद सम्बंध को, उसकी मृत्यु की कामना को टटोलना चाहता है जिसका ज़िक्र ऊपर किया था.

लेकिन उससे पहले दो कृतियों के जरिये देखते हैं कि यह भाव कितने रूप में और कितनी बारीकी से प्रकट हो सकता है. निर्मल वर्मा की लम्बी कहानी बीच बहस में और उपन्यास अंतिम अरण्य. एक कथा का नायक पिता को अस्पताल में मरते हुए देख रहा है, दूसरा पिता-तुल्य मेहरा साहब की अंतिम साँसों को सहेज रहा है. इन दोनों युवकों के भीतर पिता की मृत्यु एक कोरी घटना बतौर दर्ज नहीं हो रही, उनके अंदर इस मृत्यु की आकांक्षा भी बनी हुई है. दोनों पिता की मृत्यु के साक्षी होने उनके अंतिम समय पर आ गए हैं. लेकिन वे तटस्थ दर्शक नहीं हैं, इस मृत्यु में भागीदार हैं, जीवित पिता की कपाल क्रिया करते हैं, इस प्रक्रिया में खुद अपनी मृत्यु की तरफ बढ़ते जाते हैं. पिता की सेज सजाते हैं, उनके शव का अपनी अस्थियों से श्रृंगार करते हैं.

(death-of-jesus)
मेहरा साहब ने नायक को अपनी जीवनी सुनने और लिखने के लिए बुलाया है, लेकिन वह सिर्फ़ जीवनी नहीं लिख रहा, दरअसल उन्हें अपनी मृत्यु-कथा रचने में मदद कर रहा है. वह मेहरा साहब की ओर चलती आती मृत्यु को लिपिबद्ध कर रहा है, बग़ैर उन्हें बताए अपने रजिस्टर के पन्नों में उस मृत्यु को दर्ज कर रहा है.

दोनों ही युवकों को यह बोध है कि पिता की मृत्यु बग़ैर न पिता को मुक्ति मिलेगी न उन्हें. दोनों इससे भी अनभिज्ञ नहीं हैं जो ओर्हान पामुक ने अपने पिता की मृत्यु पर लिखा था: एक आदमी की मौत अपने पिता की मृत्यु के साथ शुरू हो जाती है.





(चार)
किसी लेखक के सामने यह प्रश्न शायद कहीं गहरा और तीखा होता है. अपने पितामह लेखक से मुक्ति कैसे पायी जाए? उसके वध का उपाय किससे पूछा जाए? किस तरह अपने स्वर की संप्रभुता हासिल की जाए?

कुछ बरस पहले मैंने एक कहानी लिखी थी जिसमें एक युवा लेखक एक बूढ़े लेखक की श्रद्धांजलि कई बरसों से लिख रहा है जबकि वह बूढ़ा अभी ज़िंदा है. वह युवा उसे अपना गुरु मानता है, इस गहन अपराध-बोध से ग्रस्त है कि उसने अभी तक कुछ भी ऐसा नहीं लिखा जिसे वह बूढ़े को बतौर गुरु-दक्षिणा समर्पित कर सके. इस पाप से मुक्त होने के लिए वह दुनिया का सबसे महान शोक-गीत लिखने का स्वप्न देखता है. बूढ़ा अभी कम-अस-कम दो चार साल तो जीवित रहेगा ही, यानि उसके पास काफी समय है शोक-गीत लिखने के लिए. उसकी मृत्यु के अगले दिन वह इसे प्रकाशित करवा देगा. पूरी दुनिया अचम्भित रह जाएगी कि महज़ एक रात में उसने यह विलक्षण रचना कैसे कर डाली.
(Death of Socrates )

इस जुनून में वह इस कथा के कई मसौदे तैयार करता है, बूढ़े को अनेक विधियों से मरता दिखाता है. हार्ट अटैक, सुबह की सैर पर किसी ट्रक ने कुचल दिया, अपनी डेस्क पर मरा पाया गया, अधूरी कहानी से न जूझ पाने की निराशा में हुई मृत्यु, हेमिंग्वे जैसी आत्महत्या. युवा लेखक उसकी मृत्यु की कल्पना करता चलता है लेकिन बूढ़ा नहीं मरता. युवक के भीतर दिन रात मृत्यु बजने लगती है. उसे चारों तरफ़ मृत्यु का विलाप सुनायी देने लगता है, वह हरेक शै में अपने गुरु को मरता हुआ, उसके शव को लकड़ियों पर धधक कर जलते हुए देखता है, लेकिन बूढ़ा नहीं मरता.

इस कहानी का अंतिम वाक्य था: 

तुम उस बूढ़े का शोकगीत लिख रहे थे या उसके ज़रिए दरअसल तुम ख़ुद को ही सम्बोधित थे? क्या तुम ही तो वह बूढ़े नहीं थे जो इस युवक के भेष में अपना शोकगीत लिखने आ गए थे?”

यह भाव वह नहीं है जिसके बारे में एलियट ने लिखा है कि हरेक लेखक अपने पूर्वजों को रचता है, या जब काफ़्का को पढ़ते वक़्त बोर्हेस उनके तमाम पुरखों को चिन्हित कर लेते हैं, काफ़्का के शब्दों के आलोक में पूर्ववर्ती रचनाओं का पाठ एकदम बदल जाता है. यह भाव वह भी नहीं जिसे हैरल्ड ब्लूम द ऐंज़ाइयटी अव इन्फ़्लूयन्स कहते हैं जो अपने पूर्वज के ग़लत पाठसे जन्म लेता है, एक ऐसी प्रक्रिया जहाँ एक लेखक अपने अग्रज के शब्दों को संशोधित करने की आकांक्षा लिए उन्हें मरोड़ देता है, उनसे एक नया अर्थ हासिल कर लेता है.

लेखकीय परम्परा का ज़िक्र जिस तरह इन आलोचकों ने किया है, यह निबंध उससे अलग धुरी पर स्थित है. यहाँ यह सजग बोध है कि पूर्वज से मुक्त हुए बग़ैर लेखक की मुक्ति असम्भव है, लेकिन यह बोध भी है कि यह आकांक्षा और इस दिशा में किया गया कर्म शायद एक छलावा ही रहा आयेगा, इस दौरान पूर्वज कहीं विराट स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाएगा, जिससे बचना चाह रहे थे वह सदा को बना रहा आयेगा, लेकिन फिर भी यह कर्म अनिवार्य नज़र आयेगा.




(पांच)
एक सत्य लेकिन और भी है. इस प्रश्न के मायने पुरुष और स्त्री रचनाकार के लिए भिन्न हो सकते हैं. स्त्री का लेखकीय परंपरा के साथ शायद वह संबंध नहीं जो पुरुष का होता है. चूँकि मानव इतिहास के लम्बे अंतराल में अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी से पहले कुछ अपवादों के सिवाय लेखन पुरुष-कलम से ही हुआ है, जिन अर्थों में परम्परा को पुरुष देखता है वह स्त्री के लिए सम्भव नहीं है, उसका सरोकार भी नहीं है. स्त्री के पास शायद ऐसे बहुत अधिक पूर्वज नहीं है जिन्हें वह जिन्हें गुरु-स्थान पर अधिष्ठित कर सके. 


पुरुष अपनी परम्परा को व्यास, वाल्मीकि, होमर और अरस्तू से लेकर बाणभट्ट, शेक्सपियर, कबीर और बंकिम चन्द्र में देख सकता है, लेकिन स्त्री शायद इनमें से अनेक के साथ कोई अपनापा नहीं जोड़ पाएगी. वह अरस्तू जो कथा में किरदार के चित्रण की चर्चा करते वक्त अपने ग्रंथ पोएटिक्स में घोषित कर देते हैं कि स्त्री हीन प्राणी है, उसके अंदर शौर्य का गुण नहीं है. वह होमर जिनके महाकाव्य ओडिसी में पश्चिमी साहित्य की शायद पहली ऑनर किलिंगघटित होती है जब यूलिसीज़ अपनी पत्नी की बारह सहायिकाओं की हत्या करवा देता है क्योंकि उन्होंने उसकी अनुपस्थिति में अन्य पुरूषों को अपने साथ सम्बंध बनाने की अनुमति दे दी थी.

स्त्री का इन अग्रजों के प्रति संबंध संकटग्रस्त ही रहेगा. चूँकि स्त्री की पहली फ़िक्र पुरुष द्वारा रचित लेखकीय संसार में अपनी जगह बनाने की रही है, इसलिए वह गुरु-दक्षिणा को एक अनिवार्य पुरुष-प्रश्न बतौर भी देख सकती है. जैसाकि द मैडवुमन इन द ऐटिक में सैंड्रा गिल्बर्ट और सूज़न ग़ुबर लिखती हैं: 


उसका (स्त्री) अपने पुरुष पूर्वजों से संघर्ष सृष्टि के प्रति उनकी दृष्टि को लेकर नहीं, बल्कि ख़ुद उसके (स्त्री) प्रति उनकी दृष्टि पर है.

वर्जीनिया वूल्फ़ भी कहती हैं कि साहित्य की तमाम महानतम रचनाओं में स्त्री को अपने लिए कुछ भी नहीं मिलेगा. ये किताबें पुरुष संसार को लिखती हैं, पुरुष मूल्यों का उत्सव मनाती हैं. स्त्री के पास कोई परम्परा नहीं है, अगर है भी तो वह इतनी छोटी और अपर्याप्त है कि उसका कोई अर्थ नहीं. 


स्त्रियाँ अपनी माताओं के ज़रिए विचार करती हैं. महान पुरुष लेखकों के पास सहारे के लिए जाना व्यर्थ है.

ज़ाहिर है पुरुष के लिए तो बतौर प्रेरणा-स्रोत अनेक पिता उपलब्ध हैं, स्त्री के पास बहुत अधिक माताएँ नहीं हैं. इस तरह स्त्री का लेखन भी इन पूर्वजों के प्रति विद्रोह है, उनसे मुक्ति पाने का रास्ता है.
रचनाकर्म, भले वह स्त्री का हो या पुरुष का, शायद इन्हीं जुड़वाँ आकांक्षाओं से संचालित होता है गुरु-दक्षिणा और गुरु-वध.

लेकिन वह बुज़ुर्ग? इस पूरी कथा में उसकी क्या भूमिका है? क्या यह एकतरफ़ा कर्म है जिसमें उसकी कोई जगह नहीं? क्या वह अपने परवर्ती के हाथों मिटाए जाने को अभिशप्त है? नहीं. वह कोई निरीह शिकार या बलि का प्राणी नहीं है. यह समूची क्रीड़ा उसकी उदार अनुमति, सहृदय भागीदारी से ही सम्भव होती है. भले ही आप उससे उसकी मृत्यु का उपाय जान उसे रणभूमि से हटा दें लेकिन वह महारथी जमीन पर नहीं गिरेगा, उसकी गरिमा के अनुकूल उसकी शैया अभेद बाणों की ही बनेगी, वह सूर्य के तेज़ के साथ उस सेज पर लेट जायेगा, और भले ही वह शर-शैया पर लेटा हो लेकिन वह प्राण अपनी इच्छा से ही त्याग करेगा. अलेहांड्रो जंब्रा के उपन्यास बोनसाई का बूढ़ा उपन्यासकार युवा नायक से कहता है: 

हम बूढ़े लोगों को युवाओं से सिर्फ़ चापलूसी ही नहीं चाहिए, कहीं गहरे हमें उनके ख़ून की भी ज़रूरत होती है. एक बूढ़े को ढेर सारा ख़ून चाहिए.

इस बुजुर्ग ने अपने उत्तराधिकारी को जितना ख़ून अपने समूचे जीवन में दिया है, उससे कई गुना अधिक उसका लहू वह अपने अंतिम क्षणों में निचोड़ लेता है.

लहू के इन्हीं क़तरों को समेटने की आकांक्षा की कोख़ से अक्सर एक महान कृति जन्म लेती है.
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आशुतोष भारद्वाज
abharwdaj@gmail