कृष्ण कल्पित की कविताएँ

Posted by arun dev on जून 02, 2018

























(फोटो द्वारा - शायक आलोक)

समकालीन हिंदी कविता का परिदृश्य बिना कृष्ण कल्पित के पूरा नहीं होगा. उनका पहला कविता संग्रह १९८० में ही आ गया था, अब लगभग चार दशकों में फैला उनका सृजन हमारे समक्ष है. आज भी वह नवोन्मेष और उर्जा से भरे हुए हैं. दुर्भाग्य से कुछ अप्रीतिकर विवादों को भी वह ‘युद्धम देही’ अंदाज़ में आमंत्रित करते रहते हैं.

कृष्ण कल्पित के पास उर्दू की सोहबत से अर्जित दिलफ़रेब भाषा है, उनकी कविताएँ अक्सर समय की धूल से उठती हैं और संदिग्ध महानता (ओं) पर पसर जाती हैं, उनमें एक सूफ़ियाना बेअदबी है. इतिहास के साथ उनकी कविताओं का रिश्ता मानीखेज है. 
आइए कृष्ण कल्पित को पढ़ते हैं.   


कृष्ण   कल्पित   की   कविताएँ                   






नमक की मंडी

वह १९८० की एक तपती हुई दोपहर थी
जब जयपुर के इंडियन कॉफी हॉउस का
जालीदार दरवाज़ा खोलकर
हुसेन अंदर दाख़िल हुये थे
नंगे पांव
कूचियों और कैमरे से लैस

हुसेन जब भी जयपुर आते
यहां ज़रूर आते
कॉफ़ी हॉउस उनका पुराना अड्डा था
और हमारा नया

आते ही हुसेन घिर गये
चित्रकारों कवियों पत्रकारों से
जैसे थम गया हो समय
जैसे पूर्ण हो गया हो चित्र
जैसे अपनी धुरी पर आ गयी हो पृथ्वी

राजपूताने के गहरे-गाढ़े रंग लुभाते थे हुसेन को
लाल रंग मिर्च की तरह तीखा
हरा अश्वत्थ के कोमल पत्तों की तरह शीतल
सुनहरा बालू रेत की तरह चमकता
सफ़ेद कैनवास की तरह कोरा
काला अमावस्या की रात की तरह गाढ़ा

वे आते थे राजस्थान रंगों की खोज में
जीवन की खोज में आकृतियों की खोज में
और उन मनुष्यों की खोज में
जो आधुनिकता के अंधड़ में
निरन्तर ग़ायब हो रहे थे कैनवास से

रेगिस्तान के बीचों-बीच बसा हुआ जैसलमेर
सत्यजित रे की तरह हुसेन का भी प्रिय नगर था
जहां जाते हुये और आते हुये
हुसेन आते थे गुलाबी नगर

जब कॉफी और गपशप का दौर ख़त्म हुआ
हुसेन उठे उन्हें जाना था चौड़ा रास्ता
अपने मित्र और बंगाल शैली के
पुराने चित्रकार रामगोपाल विजयवर्गीय से मिलने
मैं इस तरह हुसेन के साथ हो लिया था
रास्ता दिखाने को

लेकिन चौड़ा रस्ता से पहले ही वे मुड़ गये
किशनपोल बाज़ार की तरफ़
जहां दूर-दूर तक रंग-बिरंगे कपड़े सूखते थे
दीवारों और छतों पर
वे नमक की मंडी के पास मुड़ गये
रंगरेजों के मोहल्ले की ओर
जहां चूल्हे पर रखी हंडिया में
उबल रहा था गाढ़ा-पक्का रंग
ऐसा रंग जिसके बाद चढ़े न दूजो रंग

हुसेन वहीं एक चबूतरे पर बैठ गये
अपने मूवी कैमरे से खेलते हुये
गली के बच्चों ने जब घेर लिया हुसेन को
तब वे अपनी लम्बी कूची से
उन्हें हटाने लगे  भगाने लगे
तब तक मुझे नहीं पता था कि
कूची से छड़ी का काम भी लिया जा सकता है

इसके इतने बरसों बाद
जब भी गुज़रता हूँ नमक की मंडी से
मुझे हुसेन याद आते हैं
एक मुसाफ़िर एक मुसव्विर एक दरवेश
याद आता है एक रंगरेज
जिसे कालांतर में दे दिया गया देश-निकाला !






चेतना पारीक की याद

आऊंगा ज़रूर आऊंगा
मैं युद्ध के ख़त्म होने का इन्तिज़ार कर रहा हूँ, चेतना पारीक !

युद्ध अधिक दिन तक नहीं चलते
कोई कब तक पहने रख सकता है लोहे के जूते

३० अक्तूबर का टिकट है
तब तक बहाल हो जायेगी भारतीय रेल सेवा

तुम्हें याद होगा
हम कलकत्ता की एक ट्रॉम में मिले थे
जब एक दाढ़ी वाला बिहारी कवि तुम पर फ़िदा हो गया था !


२)

तुम पर कविता लिखकर एक कवि अमर हो गया
और तुम मर गई, चेतना पारीक !

मैं तुम्हें याद करता हूँ
तुम्हारी दुर्बल काया को
तुम्हारे चश्मे को
तुम्हारी कविता की कॉपी को
और उस क़स्बे की धूल को
जहाँ तुम कलकत्ते से चली आई थी

मैं तुम्हें अमर करता हूँ, चेतना पारीक !


३)

तुम उम्र में हमसे बड़ी थी

एक खोया हुआ प्यार
एक न लिया गया चुम्बन

कवि हम तब भी उससे बेहतर थे
जिसने तुम पर कविता लिखी, चेतना पारीक !


४)

एक कवि ने तुम पर कविता लिखी
एक कवि ने तुम से प्रेम किया
एक कवि ने तुमसे विवाह किया

कवियों को तुम से अधिक कौन जानता है, चेतना पारीक !


५)

हम पहली बार उस ट्रॉम में मिले थे
जिससे टकराकर
बांग्ला कवि जीबनानन्द दास मर गये थे

क्या तुम कवियों की मृत्यु हो, चेतना पारीक !





कल्पना लोक
(नज़्र-ए-इरफ़ान हबीब)

पहलू ख़ान काल्पनिक था
वे गायें काल्पनिक थीं जिन्हें वह जिस ट्रक में ले जा रहा था वह ट्रक काल्पनिक था

वे गौरक्षक काल्पनिक थे जिन्होंने पहलू ख़ान की अंतड़ियों में चाकू उतारा वह चाकू काल्पनिक था

पहलू ख़ान की हत्या एक कल्पना थी
उमर मोहम्मद काल्पनिक था

अलवर किसी शहर का नहीं एक किंवदंती का नाम था

फ़ासीवाद किसी कवि की कल्पना थी

पिछले बरसों में देश में जो साम्प्रदायिक दंगे हुये वह तुम्हारा एक दुःस्वप्न था

सड़कों पर जो ख़ून बिखरा हुआ था वह दरअस्ल एक महान कलाकृति थी

वह अग्निकुंड काल्पनिक था जिसमें कूदकर अनगिनत स्त्रियां भस्म हो गयी थीं

पद्मिनी एक कल्पना थी
और तुम्हारा इतिहास भी काल्पनिक था

यह दुनिया एक कल्पना-लोक थी और जिसे तुम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवरसिटी कहते हो वह वास्तव में मजाज़ लखनवी की क़ब्रगाह है !










पद्मिनी एक कल्पना का नाम है

हम केवल कल्पना पर जान दे देते थे

पेड़ों से कहते थे अपने दुःख
भेड़ों से बातें करते थे गड़रिये
जितने भी बुतखाने थे वे हमारे ख़्वाबों की तामीर थे

हम रक्त से अभिषेक करते थे पत्थरों का
फिर बजाते थे नगाड़ा ढोल घण्टाल

मिथक हमारे बचपन के खिलौने थे

यहाँ का भगवान भी काल्पनिक था क्योंकि अंग्रेज़ इतिहासकारों को अयोध्या में उसके पोतड़े नहीं मिले

पद्मावती होगी किसी कवि की कल्पना

और पद्मिनी के साथ जो सौलह हज़ार स्त्रियाँ अग्निकुण्ड में कूद गईं थीं वे काल्पनिक थीं

आग में जलना क्या होता है तुम क्या जानो मृदभांड ढूंढने वालो

कभी जलती हुई सिगरेट का जलता हुआ सिरा अपनी हथेली से छुआ कर देखना

मूर्ख इतिहासकारो
कल्पना की जाने के बाद यथार्थ हो जाती है !




वरिष्ठ कवियो !

वे जो जिनकी कविताएँ दीवारों पर खुद चुकी हैं
वे जो पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं
वे जो अन्य भाषाओं में अनूदित हो चुके हैं
वे जो छात्रों की भाषा ख़राब कर चुके हैं
वे जो जिनकी प्रतिनिधि कविताएँ कबाड़ी ले जा चुके हैं
वे जो जिन्हें दफ़नाया जा चुका है अपनी क़ब्रों में

कितना लहू पिओगे
कितने युवा कवियों का कलेजा चबाओगे

वरिष्ठ कवियो, जाओ
सुसज्जित सभागारों में आपकी प्रतीक्षा हो रही है
फूलमालायें मुरझा रही हैं आपके इन्तिज़ार में

वे जो जिनकी भाषा एक अरसे से ठहरी हुई है विचार धुंधलाया हुआ है और कल्पनाशक्ति हर-रोज़ क्षीण हो रही है वे जिन्हें रोज़ कच्ची कोंपलें चबाने को चाहिये वे जो अपनी ख्याति के दलदल में धंसे हुये क़दमताल कर रहे हैं

वे जो जिनकी आँखों से लहू नहीं लालच टपकता रहता है हर-घड़ी वे जो किसी असम्भव प्रेम की आशा में अभी भी लिखे जा रहे हैं प्रेम-कविता

वरिष्ठ कवियो, थोड़ा हटो
रास्ता दो युवा कवियों को

एक जो एक मृत चित्रकार के पैसे से हर साल पेरिस में गर्मियाँ गुज़ारता है

एक जो अब भूलता जा रहा है कि जीवन में किन किन स्त्रियों का नमक खाया है

एक बरसों से अचेत है
उसे अचेतावस्था में ही किया गया सम्मानित

एक मुम्बई में घायल है
एक देहरादून के एक होटल में पस्त है

एक जयपुर में उपेक्षित है
एक पटना में सम्मानित है

एक लखनऊ में बांसुरी बजा रहा है
एक भोपाल में चित्रकारी कर रहा है

एक संगीत में डूबा हुआ है एक सिनेमा में
एक इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में स्कॉच पी रहा है और दूसरा लक्ष्मी नगर में ठर्रा

आदिवास का एक कवि किसी आदिवासी की हत्या से नहीं
किसी पेड़ से पत्ते झरने से व्यथित होता है

एक कवि कथाकारों की बस्ती में फ़रारी काट रहा है
एक को अभी-अभी निगमबोध घाट पर जला कर आ रहे हैं

एक जो किसी रामानन्द की लात  की प्रतीक्षा में
मणिकर्णिका घाट की सीढ़ियों पर लेटा हुआ है बरसों से

एक गठिया से परेशान है एक आंधासीसी का शिकार है
एक को नोबेल का शक पड़ गया है

एक ग़ालिब की आड़ में जिन्ना की भाषा बोलने लगा है
एक ने कब लिखी थी कविता उसे याद नहीं

जिसकी एक भी पंक्ति नहीं बची
उसके पास सर्वाधिक तमगे बचे हुये हैं

वरिष्ठ कवियो, जाओ
अपनी-अपनी क़ब्रों में अपने-अपने तमगों के साथ सो जाओ अब अधिक धूल मत उड़ाओ

कृपया जाओ
खिड़की से धूप आने दो
और मुझे खींचने दो चिल्ला !

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कृष्ण कल्पित
30-10-1957, फतेहपुर (राजस्‍थान)

समानांतर साहित्य उत्सव के संस्थापक संयोजक.
भीड़ से गुज़रते हुए (1980), बढ़ई का बेटा (1990), कोई अछूता सबद (2003), शराबी की सूक्तियाँ (2006), बाग़-ए-बेदिल (2012), कविता-रहस्य (2015) कविता संग्रह प्रकाशित

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सरकारी सेवा से अवकाश के बाद स्वतंत्र लेखन
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जगतपुरा
जयपुर 302017 / (म) 7289072959