ज्येष्ठ में तपे प्रेम के तीन रंग : मनीषा कुलश्रेष्ठ

Posted by arun dev on मई 18, 2018

(Sculpture:  by Kay Singla)


कथाकार मनीषा कविताएँ भी लिखती हैं. अक्सर कहानियाँ लिखने वाले कवियों से पता नहीं क्यों हम कविताओं की उम्मीद छोड़ बैठते हैं, जबकि उनकी स्वाभाविक इच्छा यह रहती है कि उनकी कविताओं को भी तवज्जो मिले. मनीषा की इस कविता में उतरते हुए यह महसूस होता है कि आप किसी अनुभवी कथाकार की सधी हुई कविता पढ़ रहे हैं.

प्रेम का रंग गुलाबी है पर जब यह प्रौढ़ (वय) होता है, धूसर क्यों हो जाता है ? आकर्षण की तप्त सुर्ख आग कहाँ चली जाती है. यह कविता उम्र की नदी में प्रेम के सूखते चले जाने की उदासी और असहायता को मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है.               
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कविता
ज्येष्ठ में तपे प्रेम के तीन रंग                             
मनीषा कुलश्रेष्ठ







१.
जाने कौनसा क्षण था प्रिय जब
तुम्हारी प्रेम और कामना से आवेष्टित छवि
मुझसे खंडित हो गई
और वह दिन कि आज का दिन
मैं खुद से उस तरह प्रेम नहीं कर सकी
दर्पण सारे धुंधले हो गए
सौंदर्य - प्रलेप सूखते रहे पात्रों में
आसव सारे वाष्पित हो गए

क्या तुम मानते हो?
मुझसे ही खंडित हुई होगी!
तुम्हारी व्यस्तता के पीछे छिपी
उपेक्षा के खुरदुरे तल पर चलते
मैं शायद लड़खड़ा गयी थी
कि जाने किसी भोले-भाले झूठ की
फिसलन पर मेरा पैर रपटा था
या कोई प्रवंचना कुसमय द्वार खटखटा गई थी

हजारों सूर्य मानो एकदम बुझ गए थे
न केवल देह धरा पर बर्फ के बवंडर चले थे
बल्कि कहीं अंतस के जीवंत द्वीप सदियों के लिए
बर्फ में बदल गए थे
भावुकता का समुद्र बर्फ़ीली चट्टानों पर
सर पटकता रहा था
वे गीले मौसम फिर कभी लौटे ही नहीं थे

तुम कहते हो, तुम वैसा ही प्रेम करते हो
मै मान लेती हूं
मै भी दोहराती हूँ, हाँ तुम प्रेम करते हो
इस सहज बात में मैं कोई कलुष नहीं पाती
मगर क्या बात है कि तुम्हारे फेफड़ों से निकली
समस्त ऊष्मा भी
मेरी चेतना तो दूर, मन-शरीर क्या
मेरी उंगलियों के पोरुओं तक को गर्मा नहीं पाती
क्योंकि तुम्हारे ह्रदय से उठने वाले ऊष्ण भाव
मुझ तक पहुंचते ही नहीं
या बीच में ही कहीं वाष्पित हो जाते हैं
मेरे ह्रदय से निकलती धमनियों शिराओं में
अब रक्त नहीं बहता
एक घनीभूत उदासीनता वहाँ जमी है
लहकती कामनाओ, बहती बहकती श्लेष्माओं
माँस - मज्जा, रज्जुओं पर
अंतरिक्ष से उतरी राख छा गई है.

मैं सोचती हूं, प्रेम से आविष्ट वह छवि तो
जैसे भी टूटी, तुम्हारी थी और केवल छवि ही थी
मेरा मुझसे प्रेम करना कैसे छूट गया?
मेरा श्रृंगार मुझसे कैसे रूठ गया?
मेरी कामनाएं तो तुमसे पहले भी धधकती थीं
उन्हें तुम्हारे पलटने पर भी धधकना था
लास्य रचित इस देह को तो हरदम थिरकना था

तुम्हारा प्रेम एक विप्लव था
तुम्हारी छवि में साक्षात अनंग विराजता था
तुम्हारे अतीत के प्रगाढ़ अनुभवों ने मुझमें प्रस्तुत
रति को और और उकसाया था
हमने देह के गोपन की पराकाष्ठाओं को
अनंत के छोर-अछोर तक पहुँचाया था
तुम्हारी कल्पना मात्र मेरी देह पर कुमार संभव सी बीतती थी

अब यह देह तुमसे ही नहीं मुझसे भी रूठ गई है
मेरा-तुम्हारा निरंतर प्रेम-जाप
अब इसे बहलाता तक नहीं है
कोई फांस तो थी जो प्रेम के पग में गड़ी होगी
हठात तुम्हारी छवि हाथ से छूट गिरी होगी
महान-अभंग प्रेम, अनंत आकर्षण, आत्माओं का अद्वैत
कितने भ्रम इस छवि के साथ कण कण बिखरे होंगे

कि अब यह मन प्रेम शब्द पर अन्यमनस्क हो
उंगली फिराता है, ये होंठ और कोई नाम तो नहीं जानते
तुम्हारा नाम उच्चारते हुए अनमनेपन से घिर जाते हैं
न अब तुम्हारी पुकार में वह सघन लालसा होती है
मेरे उत्तर भी अब तुमसे कोई आशा नहीं बाँधते
मिलन के मेरे आग्रहों के निरंतर
मंत्र-लिखित भूर्ज पत्र भूल गए हैं अपनी राह
भटका करते हैं ठौर-बेठौर
अपने पूर्व मिलन-संयोगों  की
समीक्षा करती फिरती है ये श्वास-समीर

सुनो ! इस ढीठ और चंचल मन ने तो नहीं माना था
पर शायद देह ने पहली बार मान लिया था
कि
अब जो यह प्रेम है, चिरंतन है, एकनिष्ठ है
ये जो स्पर्श हैं, वही लक्ष्य हैं, अलक्ष्य भी.
किसी चित्र प्रहेलिका के दो टुकड़ों के
अनायास ही जुड़ जाने की संपूर्णता पर इठलाती थी
जाने किस संकुचित क्षण में
किसी छूटे अदृश्य तीसरे टुकड़े की आशंका ने
इसे काठ कर दिया है.

काष्ठ की यह पुत्तलिका बस अब मोह के धागों से बंधी है
मन-प्राण-चेतन-अचेतन-राग-काम-अध्यात्म से नहीं!










२.
जाने ऐसा है
कि मेरे वहम के वहम को
ऐसा लगता है
तुम शब्दों में छिपाते हो प्रेम
जैसे कोई जंगल में छिपा आए
बालों में आ टंकी पतझरी सुर्ख सुनहरी पत्ती
यूं तो बहुत
निरापद है तुम्हारा साथ
लेकिन मेरा मन धड़कता है
कभी
किसी छोटी - सी निरापद आपदा के लिए
माना बहुत कोरी है स्लेट
लेकिन
बच्चों के से अनभ्यस्त हाथों से
मन करता है
एक कमल, एक बिल्ली, एक बतख
तो बना ही दूं एक कोने में
ताकि तुम चाहो तो
एक गीले स्पंज से तुरंत मिटा सको
गरिमा के तट पर आ बैठी है उम्र
जो कहती है छाया मत छूना मन
बहाव के बीच की होती तो
कहती - कह देने से आसान हो जाती हैं चीजें
अब क्या !
अब सब कुछ स्थगित है
अगली किसी मदिरा के मीठे ताप में
एकान्तिका रचती किसी दूसरी शाम तक
जब कविता के फड़फड़ाते पन्ने - से मन पर
एक बार फिर
उम्र, विवेक, गरिमा अपना पेपरवेट रख जाएंगे
या कि उस पेपरवेट से
निकल भागेंगे पन्ने?
बिखर जाएंगे दिगान्तों तक.







३.
सारी नैतिकताओं गरिमाओं का
भारी दुशाला ओढ़े बैठ गई है उम्र
वो सारी उच्छृंखलता कहाँ  जा कर सो गई है
जब लगता था, हुआ जिस पल भी किसी से प्रेम
तुरंत कह देंगे.

तब हवाओं में घुली बसंत की
महक तक से प्रेम हो जाता था
अब जब संतृप्त हैं सभी भाव
बहुत खोल कर खुल कर देख लिए सब रिश्ते
प्रेम हर जगह एक हद बाद सर पटकता मिला
दुनियादारी की चट्टान पर

अब प्रेम शब्द पर हंसी आती तो है
याद आता है कम्बख्त वह पागलपन
जब एक उजास की उम्मीद में प्रेमी
सौ योजन चल कर आते जाते रहे

अब प्रेम चुक कर प्रभावित होने में  घट गया है.
आकर्षण सवा योजन तक चल कर कहीं नहीं पहुंचता
उम्र अपनी संख्याएँ जल्दी जल्दी पार कर गई है
देह के स्वर्ण उजास और मन की करवटों का
अब होने लगा है ममीफिकेशन

कि तुम मर चुकी होगी एक तयशुदा उम्र जी कर
तुम्हारे बिना ढले वक्षों के बीच से निकलेगी एक सीली कविता
तुम्हारे आतप्त भावों की एक सुरीली चटक चीख सी
तुमसी ही पागल फिर लिखेगी तुम्हारा जीवन
ओ प्यारी !

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