सेवादार : पॉवर प्ले की कविता : आशुतोष कुमार

Posted by arun dev on मई 17, 2018














समालोचन पर सदाशिव श्रोत्रिय की सेवादार (देवी प्रसाद मिश्र) की प्रकाशित व्याख्या ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा है. हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओँ में भी इस पर बहस ज़ारी है. आलोचक आशुतोष कुमार ने इस कविता और इस पर आधारित विमर्श को फिर से परखा है. वह इसे ‘पॉवर प्ले’ की कविता मानते हैं. क्या यह स्त्री-पुरुष के बीच का पॉवर प्ले’ है या मालिक और मातहत के बीच का. आइए पढ़ते हैं.  



सेवा  करना  हिंदी  की  सबसे ख़तरनाक  क्रिया  है        
आशुतोष कुमार







देवी प्रसाद मिश्र की कविता सेवादारपर समालोचन पर एक बहस हो गई है. पुरस्कारों और लेखकों के चरित्र-चित्रण से अलग किसी रचना पर बहस हो तो अच्छा ही लगता है. लेकिन इस बहस को अधिक ध्यान से यह जानने के लिए देखना चाहिए कि कविता के गम्भीर पाठक भी कविता पर बात करते हुए कितनी असावधानी से काम लेते हैं.

सारी उठापटक इस कविता पर सदाशिव श्रोत्रिय की टिप्पणी से शुरू हुई. कविता के संवेदनशील पाठक-आलोचक श्रोत्रिय जी इस कविता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं. युगचेतना की काव्यात्मक अभिव्यक्ति के कारण और एनजीओ संस्कृति की गर्हित वास्तविकता को रोमांचक और आह्लादकारी ढंग से व्यक्त करने के लिए. इस टिप्पणी में कविता की प्रशंसा तो है, लेकिन कविता के साथ न्याय नहीं. लेकिन इस पर कुछ देर में लौटेंगे. पहले यह देख लें कि इस पर विवाद क्या हुआ.

पहला विवादी स्वर आया शिव किशोर तिवारी की ओर से. तिवारी जी कविता के अनन्य प्रेमी, संग्राहक, आलोचक और अनुवादक हैं. उन्हें कविता के चुनाव पर ही आपत्ति है. यानी कविता टिप्पणी करने लायक नहीं है. कहते हैं-
इस कविता में कोई गहराई नहीं है. व्यंग्य छिछला है क्योंकि चरित्र अतिरंजित हैं. उनकी बातें अस्वाभाविक हैं. बीच-बीच में अंग्रेज़ी के (अशुद्ध) वाक्य बेतुके हैं. आख़िरी पंक्तियों में पता ही नहीं चलता कि 'सर' ने क्या कहा -"यू आर सच अ रैविशिंग स्टफ़" (इसका अर्थ? कोई किसी को रैविशिंग स्टफ़ कहता है क्या?) या " संजीवनी सूरी क्यों है इतनी दूरी"?

कविता में सर ने जो कहा साफ-साफ ही कहा. वाचक ने उसे साफ-साफ दर्ज भी किया. हालांकि सर ने किसी को सुनाने के लिए नहीं, बुदबुदाते हुए अपने आप से कहा. कोई किसी को रैविशिंग स्टफ या दिलकश चीज उसके मुंह पर भी कह सकता है, बशर्ते उनके ऐसे सम्बंध हों. संजीवनी सूरी से सर के सम्बन्ध ऐसे नहीं हैं, इसीलिए वे बुदबुदाकर रह जाते हैं. आख़िर इसमें न समझ में आने वाली कौन सी बात है? क्या तिवारी जी को यह समझ नहीं आ रहा सर के मन में अपनी युवा कलीग के लिए ऐसे पापी विचार कैसे आ सकते हैं? क्या यह स्थिति ही उन्हें अस्वाभाविक लग रही है? और क्या इसी कारण कविता भी अस्वाभाविक, अतिरंजित और बेतुकी लग रही है?


सर के इन पापी खयालों में अस्वाभाविक जैसा तो कुछ है नहीं. अगर हो भी तो सवाल यह है कि क्या कविता का काम केवल स्वाभाविक, सांस्कारिक और नैतिक का बयान करना है? ज़ाहिर है तिवारी जी ने इस कविता कुछ अधैर्य के साथ पढा और जहां उलझने की गुंजाइश नहीं थी, वहीं उलझ गए.

बहस में तिवारी जी को सबसे जोशीला समर्थन मिला हमारे प्रिय कवि विष्णु खरे से. उन्हें यह कविता इतनी ख़राब लगी कि वे समीक्षा के लिए इस कविता को चुनने के लिए श्रोत्रिय जी को, इसके पहले जलसा पत्रिका में इसे छापने के लिए जलसा वालों को और इसे छपने देने के लिए कवि की सख़्त मज़म्मत करते हैं. आगे इस बात को यहां तक ले जाते हैं कि ऐसी कविताओं के छपने औऱ उन पर चर्चा होने से केवल देवी प्रसाद जैसे श्रेष्ठ कवि की छवि ही ख़राब नहीं होती,  हिंदी कविता के समूचे पर्यावरण के नष्ट हो जाने का खतरा है.

लेकिन विष्णु जी देर तक इस बात का खुलासा नहीं करते कि आख़िर उन्हें यह कविता इतनी ख़राब क्यों लगी. खुलासा तब करते हैं,  जब कवि आलोचक कात्यायनी इस कविता के पक्ष में अपने तार्किक विश्लेषण के साथ उतरती है और विष्णु जी को लगता है कि उन्होंने ऐसी बमबारी कर दी है कि कविता की समूची पृथ्वी झुलस गई है. मामला स्कॉर्च्ड अर्थ में तब्दील हो गया है.

अब जाकर वे साफ-साफ  कहते हैं कि 


कविता इसलिए भी संदिग्ध और आपत्तिजनक है कि मूलतः वह pathalogically स्त्री-विरोधी है और संजीवनी को एक भावी महँगी, बड़े पैकेज वाले casting couch पर स्वेच्छा से बिछ-बिछ जाने वाली slut दिखाने पर आमादा है. इस लिहाज़ से यह पोर्नोग्राफी-उन्मुख है.
आगे भी जोड़ते हैं-
मैं देवी प्रसाद का तब से प्रशंसक हूँ जब वह और भी ज़्यादा युवा थे. उनकी और उस स्तर के कई रचनाकारों की कविताओं में स्वयं को एक stakeholder समझता हूँ. लेकिन मैं उनकी ''सेवादार'' से बहुत निराश हूँ कि उसमें एक अभागी युवती को लेकर सिर्फ़ घृणा और तिरस्कार है, उसकी वैसी ज़िन्दगी को समझने की कोई कोशिश नहीं है. मैं अभी-अभी समझ नहीं पा रहा हूँ कि देवी प्रसाद से ऐसी reactionary और cliche कविता संभव कैसे हुई.

कविता में क्या सचमुच ऐसा कुछ है, जैसा विष्णु जी बता रहे हैं? इसकी जांच करने के पहले कहना जरूरी है कि इस कविता पर इस इल्जाम के बीज ख़ुद श्रोत्रिय जी के प्रशंसात्मक भाष्य में मौज़ूद हैं.
उन्होंने लिखा है-

सेवादारी के इस खेल की असलियत को देवी प्रसाद इस कविता की अंतिम पंक्तियों में जिस तरह खोलते हैं वह सचमुच अनूठा है. संजीवनी अंततः  अपने सर से जो कहती है वह इस बात को प्रकट करने के लिए पर्याप्त है कि उसे भी अब इस बात का पूरी तरह अनुमान हो  गया है कि उसके सर असल में उससे चाहते क्या हैं. उसका नाटकीय ढंग से कुत्ते के गले में लिपटते हुए  कर दूंगी सर कर दूंगी कहना इस बात को स्पष्ट कर देता है कि पैसे और पवित्रता के बीच सौदेबाज़ी के इस खेल में संजीवनी ने 10 लाख के सालाना पैकेज के लिए अपने आप को समर्पण के लिए तैयार कर लिया है. विडम्बना यह है कि वर्तमान परिस्थितियों में  अपने  मध्यवर्गीय परिवार की बाहर टीमटाम को बचाए  रखने के लिए शायद उसके पास इसके अलावा कोई विकल्प  नहीं  बचा  है.

जो बात सदाशिव श्रोत्रिय जी और विष्णु जी के सामने इतनी स्पष्ट है,  वह कविता में ख़ुद सर के सामने साफ नहीं है. अगर होती तो वे ‘संजीवनी सूरी क्यों है इतनी दूरी’ जैसी बातें बुदबुदाते वहां से फूट न लेते.

आश्चर्य की बात है कि कविता असल में संजीवनी सूरी और उसके सर के बीच ताक़त की जिस खींचतान या पावर प्ले को चित्रित करती है, उसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया.

सर की पापी  बुदबदाहटों से उनकी मंशा तो साफ है,  लेकिन यह भी साफ है कि वह अभी पूरी नहीं हुई है. कविता पाठक को यह अनुमान लगाने का मौका देती है कि हो सकता है मीटिंग में जान बूझकर देर की गई हो. यह भी कि इसके पीछे नीयत यह रही हो कि दिल्ली जैसे असुरक्षित शहर में लड़की को घर छोड़ने का बहाना मिल जाएगा. इसके आगे पाठक के लिए कयासबाजी की गुंजाइश नहीं है, क्योंकि इसके आगे की कहानी कविता ख़ुद कहती है.

देर रात के उस वक़्त छोड़ने आए सर को संजीवनी सूरी घर के भीतर चलने का न्यौता जरूर देती है, लेकिन उसी सांस में यह भी कह देती है कि घर के भीतर माँ मौज़ूद है, जो पिता के मरने के बाद से काफी अकेलापन महसूस कर रही हैं. मतलब सर भीतर तभी तशरीफ़ लाएं जब उन्हें इस वक़्त बूढ़ी अम्मा के साथ ढेर सारा वक़्त बिताना मंजूर हो.

सर इस पर अगली बार देखेंगे के सिवा कहते भी तो क्या कहते?

लड़की जानती है कि अब वह सुरक्षित है. बाज़ी पूरी तरह उसके हाथ में है. अब वह अपनी जीत और सर के मंसूबों की हार का मज़ा लेने के मूड में आ चुकी है. सर के घावों पर पूरी तरह नमक छिड़कते हुए कहती है- अगर आप अंदर नहीं आ रहे तो कम से कम मेरे कुत्ते से मिल लीजिए!

इतना ही नहीं, सर के सामने ही अपने कुत्ते से लिपट भी जाती है. कितना मारक तरीका है यह एक स्त्री के यह जताने का कि सर की तुलना में कुत्ता उसे कहीं अधिक प्यारा लगता है! अगर सर के मंसूबों के बारे में पाठक का अनुमान सही है तो अब वह अच्छी तरह जानता है कि इस पावर प्ले में सर पूरी तरह नेस्तनाबूद हो चुके हैं. उनके अरमानों की कम से कम फ़िलवक्त मिट्टी पलीद हो चुकी है.

इस हश्र से बचने के लिए अपना एकमात्र तुरुप का पत्ता वो पहले ही चल चुके हैं. नौकरी का आश्वासन और वेतन वृद्धि की गोली पहले ही दी जा चुकी है. लड़की पर इन चालों का कुछ ख़ास असर नहीं हुआ. क्यों? क्या इसलिए कि ग्रेटर कैलाश में रहने वाली दिल्ली यूनिवर्सिटी में शोध कर चुकी छात्रा को भरोसा है कि नौकरी तो मिल ही जाएगी? एनजीओ सेक्टर की ऐसी ही किसी नौकरी के लिए माता पिता ने  शुरू से ही उसे तैयार किया है. इतने दूरदर्शी और सक्षम माता पिता की इस तेज तर्रार संतान के लिए जीवन इतना असुरक्षित और अभावग्रस्त शायद नहीं है. वह अपनी युवा देह के आकर्षण की कीमत पहचानती है. कुत्ते के बहाने सर को दूर से ललचा कर आजमाती भी है. लेकिन उसका काम इतने भर से चल सकता है, यह भी जानती है.

लेकिन यह सब, जाहिर है, अनुमान का विषय है. कविता स्वयं इन प्रश्नों के उत्तर नहीं देती.  इतना जरूर बताती है कि सूरी और सर के बीच शिकार और शिकारी जैसा इकतरफा मामला नहीं है. दोनों ही एक दूसरे का शिकार कर लेने की फ़िराक़ में हैं. कविता इन दो चरित्रों के बीच ताक़त की रस्साकशी को नाटकीय ढंग से किंतु बिना तमाशा बनाए दिखा देती है.

सर भी जानते हैं कि आज के दिन वे भले ही मात खा गए हों, लेकिन बाजी अभी खत्म नहीं हुई है. इस पावर प्ले को लम्बा चलना है और इसमें अंततः जीत उनके हाथ लग सकती है, क्योंकि वे पुरुष हैं. संजीवनी के लिए सिली गर्ल या बेवक़ूफ़ लड़की जैसे विशेषण इसी सोच से निकले हैं.

कविता जो रचती है, वो यही पावर प्ले है. इसे श्रोत्रिय जी के अंदाज़ में शुद्ध सौदेबाजी समझना या विष्णु जी की तरह स्त्री के दारुण शोषण के प्रति कवि की क्रूरता का नमूना मानना कविता पढ़ने में बरती गई असवाधानी का नतीजा है.

सौदेबाजी और शोषण पर बहुत साहित्य रचा गया है, लेकिन देवीप्रसाद की कविता इंसानी सम्बंधों में शक्ति के जिस खेल को पकड़ती है, वह हिंदी कविता में ख़ास उनका इलाक़ा है. इस इलाक़े की खोज करने वाला शुरुआती प्रमुख कविता संग्रह प्रार्थना के शिल्प में नहींथा.

सूरी और सर के रिश्तों में भावुकता अथवा सामान्य मानवीय संवेदना की भी कोई गुंजाइश नहीं है. यह पावर प्ले ऊपर से बहुत शिष्ट और मासूम दिखता है, लेकिन इसके  भीतर विशुद्ध हिंसा भरी हुई है. यह शत प्रतिशत निश्चित नहीं है कि इसमें आखिरकार किसका वध होगा, लेकिन पलड़ा निश्चय ही सर की तरफ झुका हुआ है. उन्हें पितृसत्तात्मक सामाजिक- आर्थिक संरचना का  मजबूत समर्थन हासिल है.

कविता पाठक को जहां छोड़ती है,  वहां कोई आवेश नहीं है, कोई उत्ताप नहीं है, कोई उत्तेजना नहीं है. जहां सरलता से कोई मूल्य निर्णय नहीं किया जा सकता.  वह कत्लगाह की तरह एक ठंढ़ी क्रूर जगह है. कविता पाठक को इस ठंढ़ी क्रूरता के सामने निष्कवच खड़ा कर देती है. उसे इसका सामना करना है, बिना किसी भावुकता या मूल्य निर्णय के. यह निचाट सामना ही देवीप्रसाद की कविता की ताकत है. यह निचाट सामना ही स्थितियों की विडम्बना को बिना किसी काट- छांट के उजागर कर सकता है.  हिंदी में कितनी ऐसी कविताएँ होंगी, जो ऐसा कर सकती हैं?

सेवादार कविता के अंदाज़े बयां में धोखेबाज किस्म की सरलता है. जरा ठहर कर पढ़ें तो इसमें पावर प्ले के अनेक स्तर दीख पड़ेंगे. सर और सूरी के बीच एक तरह का पावर प्ले है तो  यूरोपीय फंडिंग एजेंसियों और भारत जैसे विकाशील देशों में काम करनेवाले ग़ैर सरकारी संगठनों के बीच दूसरे तरह का. एक और पावर प्ले है जो इन संगठनों और उन लोगों के बीच चल रहा है, जिनके कल्याण के  नाम पर  यह सारा तामझाम खड़ा हुआ है.

कविता में साफ संकेत है स्त्रियों के लिए काम करने के नाम पर फंड लेने वाले सर स्त्री को सिर्फ़ उपभोग की नज़र से देख पाते हैं. खरिआर की गरीब औरतें भी उनके लिए महज फंड जुटाने का जरिया हैं. वे अपनी शिष्या संजीवनी सूरी को भी यही शिक्षा दे रहे हैं, और उसे भी इससे कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं है. दिक़्क़त है तो महज पैकेज आशानुरूप न होने से.

खरिआर की औरतें शोषण का शिकार होती रहेंगी तभी सर और सूरी धंधा चलेगा. वे फंडिंग एजेंसियों को रिपोर्ट भेजते रहेंगे, लेकिन उन शोषित स्त्रियों को वाजिब मज़दूरी दिलाने की कोई कोशिश नहीं करेंगे. एजेंसियां भी रिपोर्ट लेकर संतुष्ट रहेंगी. क्या इसलिए कि उनकी दिलचस्पी भी मुख्यतः प्रामाणिक आंकड़ों में है न कि सूरतेहाल को बदलने में. सम्पत्ति और सत्ता का वैश्विक साम्राज्य आखिरकार खरिआर जैसे पिछड़े इलाकों के औरतों-आदमियों-बच्चों के श्रम की नृशंस लूट पर ही टिका हुआ है. औरतों का शोषण दुगुना होता है, क्योंकि वे औरतें हैं.

हर स्तर पर शक्ति का यह खेल उतने ही  क्रूर हिमशीतल ढंग से चलता है. सर और सूरी के बीच घर के बाहर देर रात की यह बातचीत इस बहुस्तरीय हिमशीतल क्रूरता को पाठक की नसों तक ले जाने का एक बहाना भर है. अगर आपने उसे महसूस किया तो यह सवाल बेमानी हो जाएगा कि इस कविता में गहराई है या नहीं. वैसे गहराईकी खोज भावप्रधान कविताओं के लिए ठीक हो सकती है, लेकिन वैसी कविताओं के लिए शायद नहीं, जिन्हें मुक्तिबोध अनुभव-प्रेरित फैंटेसी के रूप में देखते थे, जो अनुभव के गहन क्रियाशील साक्षात्कार से निर्मित होती हैं. इन कविताओं में गहराई की जगह गहनता, जटिलता, व्यापकता और विडम्बना की खोज करना अधिक सार्थक हो सकता है.

सदाशिव श्रोत्रिय के भाष्य की बुनियादी समस्या यह है कि वो कविता को विषय आधारित रचना के रूप में विश्लेषित करते हैं.  इस कविता को इस रूप में पढ़ना कि यह एनजीओ सेक्टर पर लिखी गई हिंदी की पहली कविता है, पाठक के भटकाव की शुरुआत है. कविता निबंध की तरह या उसकी जगह नहीं लिखी जा सकती. ह कविता एनजीओ सेक्टर पर किसी निबंध का स्थानापन्न हरगिज नहीं है. कविता के सामूहिक कुपाठ से खिन्न कवि देवीप्रसाद भले स्वयं ऐसा घोषित करते फिरें!

सो यह बहस भी प्रासंगिक नहीं है कि कविता एनजीओ सेक्टर के समूचे यथार्थ को उद्घाटित करती या उसकी एक प्रवृत्ति को. हर कविता किसी यथार्थ से ही उपजती है, और किसी न किसी ढंग से उसे उद्घाटित करती है, लेकिन वह अख़बारी यथार्थ का रजिस्टर नहीं हो सकती. कुछ एनजीओ अच्छे और कुछ ख़राब हो सकते हैं. कुछ लोग भले और बुरे हो सकते हैं. लेकिन सम्बंधों में शक्ति का खेल हमेशा सक्रिय रहता है. निजी स्तर पर भी,  सामाजिक स्तर पर भी और अंतरराष्ट्रीय सम्बंधों के स्तर पर भी. शक्ति के इस खेल को, इसकी क्रूरता को और  विडम्बना को  मानवीय अनुभव के स्तर पर पर पकड़ना कविता है, निबंध नहीं. इस प्रक्रिया में समकालीन यथार्थ का एक  टुकड़ा लगा लिपटा चला आता है, यह और बात है.

इस कविता का शीर्षक सेवादारहै. शीर्षक की व्यंजकता पर ही ध्यान दिया गया होता तो शायद पढ़ने में इतनी लापरवाहियां न होतीं. सेवादार कहने से लगता है जैसे सेवा करने का ठेका लेने वाले ठेकेदारों  की बात हो रही है. सेवा करना शायद हिंदी की सबसे खतरनाक क्रिया हो. इसके ख़तरों का दायरा सेवादार से प्रधान सेवक तक फैला हुआ है!
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आशुतोष कुमार
प्रोफेसर  (हिंदी विभाग), दिल्ली विश्वविद्यालय
ashuvandana@gmail.com



सेवादार और उसका भाष्य यहाँ पढ़ें.
ख़ राब कविता का अंत:करण  : देवी प्रसाद मिश्र