रंग - राग : चौथी कूट (ਚੌਥੀ ਕੂਟ) : सूरज कुमार

Posted by arun dev on अगस्त 07, 2016














निर्देशक गुरविन्दर सिंह की सिख अलगाववादी आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर बनी पंजाबी फ़िल्म चौथी कूट (ਚੌਥੀ ਕੂਟ) अभी प्रदर्शित हुई है. यह कथाकार वरयाम सिंह संधु की दो कहानियों पर आधारित है. यह पहली ऐसी पंजाबी फिल्म है, जो कान्स फिल्म महोत्सव में दिखाई जा चुकी है. 

इस फ़िल्म पर चर्चा कर रहे हैं सूरज कुमार.    



भारतीय सिनेमा की चौथी दिशा: चौथी कूट (FOURTH DIRECTION)            

सूरज कुमार


भारतीय परिप्रेक्ष्य में अगर सार्थक सिनेमा की बात करें तो बड़ी तादाद में ऐसी फिल्में साहित्यिक कृतियों पर आधारित मिलती हैं. ऐसे में  ये आकस्मिक नहीं  है कि चाहे बांङ्ग्ला में सत्यजित रे हों या कन्नड में गिरीश कासरवल्ली या हिन्दी में मनी कौल इन सबकी फिल्मों का आधार मूलतः साहित्य ही रहा है. भारतीय सिनेमा में ऐसे कई निर्देशक और भी  हुए हैं  जिन्होंने साहित्य आधारित गंभीर फिल्में बनायीं लेकिन उस पर अलग से चर्चा  की जा सकती है.  यहाँ इसी श्रृंखला में नवोदित निर्देशक गुरविन्दर सिंह का नाम लिया जा रहा है जिनकी दूसरी फीचर फिल्म चौथी कूट 5 अगस्त, 2016 को  रिलीज हुई है. 

गुरविन्दर की पहली फीचर फिल्म अंधे घोड़े दा दान (Alms for a blind horse) 2011 में रिलीज हुई थी जो गुरदयाल सिंह के इसी नाम के उपन्यास (1976 में प्रकाशित) पर आधारित थी. चौथी कूटपंजाबी कथाकार वरयाम सिंह संधु की दो कहानियों पर आधारित है. पहली और दूसरी फिल्म के बीच पाँच साल का अंतराल बताता है कि निर्देशक ने इस फिल्म के लिए कितनी तैयारी की होगी. इस पंक्ति के लेखक को इस फिल्म को देखने का अवसर FTII पूणे में 6 जून को वहाँ हुए प्रदर्शन के दौरान  मिला. वहाँ निर्देशक से हुए संवाद से केवल दो-तीन  उदाहरण  इस तैयारी को स्पष्ट करता है . प्रीप्रॉडक्शन  में कहानी तय करने के बाद सबसे महत्वपूर्ण होता है कास्टिंग और लोकेशन तय करना. ऐसे में कहानी के चरित्र के अनुरूप अभिनेता तय करना सबसे महत्वपूर्ण होता है, जिसका चयन  निर्देशक ने स्क्रीन टेस्ट और पूर्व में संपर्क में आए व्यक्तियों की पात्रों से उनकी साम्यता के आधार पर किया. 

लेकिन सबसे विलक्षण बात इस फिल्म के दूसरे महत्वपूर्ण पात्र टॉमी को लेकर है जो एक कुत्ता है. स्पेनिश फिल्म  ‘Amores  Perros’ की तरह इस  कुत्ते की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी. जाहिर है निर्देशक को भी वैसा ही कुत्ता चाहिए था सो उन्होंने तय किया कि इसके लिए गद्दीनस्ल का कुत्ता चाहिए. ट्रेनर के पास ये नस्ल नहीं थी इसलिए गद्दी नस्ल के पपी को पाला गया फिर उसे ट्रेनकिया गया. दूसरी बात फिल्म के लोकेशन को लेकर है. गौरतलब है कि  फिल्म में space और Time सबसे महत्वपूर्ण होता है. कहा भी जाता है Film is a spatiotemporal audio-visual medium’. समय 80 के दशक का है जबकि स्पेस तत्कालीन पंजाब और उसका ग्रामीण अंचल है. 

साहित्य में किसी स्थिति को  शब्दों के माध्यम से बड़ी आसानी से अभिव्यक्त किया जा सकता  है लेकिन सिनेमा में  वही बात अभिव्यक्त करना खासा कठिन हो जाता है. जैसे साहित्य में ये लिखना कि  हजारों लोग जा रहे थे बहुत आसान है जबकि फिल्म में उसे दिखाना उतना ही कठिन. फिल्म निर्माण में इस बात का खास खयाल रखना पड़ता है. इस फिल्म की स्क्रिप्ट में फ़ार्महाउस खेतों के बीच है. बक़ौल- निर्देशक इसे ढूँढने के लिए उनकी टीम को लगभग सौ घर देखने पड़े.

फ़िल्म का एक दृश्य

फिल्म दो कहानियों पर आधारित है. आम तौर पर जब उपन्यास पर आधारित फिल्म बनाई जाती है तब फिल्म की अवधि की तुलना में उपन्यास का आकार बड़ा होने के कारण उसमे काट-छांट की जाती है जबकि अगर कहानी को आधार बनाया जाता है तब उसमें आमतौर पर फ़िल्मकार अपनी तरफ से जोड़ता है या एक से अधिक कहानी का संयोजन करता है. यह कोई सिद्धान्त नहीं है, लेकिन इसके कुछ उदाहरण हैं- सत्यजित रे ने शतरंज के खिलाड़ी फिल्म में जनरल औट्रम और वाजिद अली खान की कहानी का पल्लवन किया था  जबकि कहानी में उसके संकेत मात्र  थे.  जबकि उनकी ही फिल्म तीन कन्या रवीन्द्रनाथ ठाकुर की तीन कहानियों (पोस्टमास्टर, समाप्ति और मनिहारी) पर आधारित थीं.

चौथी कूट  दो कहानियों पर आधारित है और फिल्म में भी दो समानान्तर कहानियां हैं जो एक जगह पर एक-दूसरे को छूती भर है. कई समीक्षकों ने दूसरी कहानी को अप्रासंगिक बताया है. दरअसल यह एक अलग विश्लेषण का विषय हो सकता है जिसके तहत फिल्म और वरयाम सिंह संधु की दो कहानियों को साथ मे रख कर पढ़ा जाय. पर चूंकि सिनेमा निर्देशक का माध्यम है इसलिए यहाँ फिल्म को आधार बना कर बात करना अधिक समीचीन होगा. मुझे प्रेमचंद के उपन्यास गोदान की याद आती है जिसमें  समीक्षकों ने शहर की कथा को असंबद्ध कहकर खारिज करने का प्रयास किया था तब नलिन विलोचन शर्मा ने अपनी आलोचना के जरिये समानान्तर शिल्प के जरिये ग्रामीण और शहरी कथा के औचित्य को सिद्ध किया था. बिलकुल वैसा तो नहीं है लेकिन व्यक्तिगत रूप से मैं समझता हूँ  पूरे पंजाब में पसरे हुए दहशत के माहौल को केवल गाँव की जगह उसके बाहर के माहौल को भी इकठ्ठा पकड़ने के लिए फ़िल्मकार ने दोनों कथाओं को मिलाया होगा. 

फिल्म की कहानी अस्सी के दशक में, ऑपरेशन ब्लूस्टार (जून1984) के बाद की है. यह  हिंसा - निस्तब्धता - हिंसा के बीच की कहानी है. उल्लेखनीय है  हिंसा मुखर रूप में इसमे सामने नहीं आती लेकिन उसका अहसास पूरे वातावरण में व्याप्त है. सत्ता और अलगाववादियों के बीच फंसी आम जनता की ज़िंदगी कितनी त्रासद है इसे इस फिल्म में सटीक ढंग से उभारा गया है. कहा जा सकता है की पंजाब में अब ऐसे हालत तो नहीं हैं तो अब ऐसी फिल्म बनाने की क्या प्रासंगिकता है ? अगर हम अपने आसपास कश्मीर, उत्तरपूर्व , टर्की , बोको हरम और ISIS के इलाके में सत्ता और प्रतिसत्ता के बीच फंसे लोगों को देखें तो उनकी भी समस्या यही है. एक समीक्षक ने इस फिल्म कि तुलना Bruegel की पेंटिंग Fall of Icarus’ से की है जिसका भाव है  इतिहास की महत्वपूर्ण घड़ी घटित होने के पार्श्व में सामान्य जीवन यथावत चलता रहता है.

पेंटिग : Fall of Icarus

फिल्म की शुरुआत जुगल और राज नाम के दो हिन्दू दोस्तों से शुरू होती है जो जल्दी में अमृतसर के लिए ट्रेन पकड़ना चाह रहे थे जो छूट जाती है. उनके साथ एक सिख भी है. पता चलता है एक मालगाड़ी को अमृतसर जाना है लेकिन  आर्मी वालों ने चेतावनी दी है कि उस गाड़ी में कोई न बैठे. वो लोग बहुत चिरौरी करते हैं गार्ड से साथ ले चलने के लिए, वो मना करता है, ट्रेन चलने पर  बाद में वो लगभग जबर्दस्ती मालगाड़ी के गार्ड के डब्बे में घुस जाते हैं जहां पहले से और भी पैसेंजर होते हैं. गार्ड पहले तो भलाबुरा कहता है फिर पैसे भी लेता है. डिब्बे में पहले से जो यात्री हैं उनके बीच  बहुत कम संवाद की स्थिति है, एक अंजाना सा तनाव डिब्बे में भी पसरा होता है.

यहाँ से फिल्म फ़्लैशबैक में चलती है जहां जुगल याद करता है कि कैसे वह अपनी पत्नी और बच्ची  के साथ गाँव का रास्ता भूल जाता है जिससे जुड़ता हुआ कहानी का मुख्य हिस्सा शुरू होता है. गाँव के  रास्ते में एक  फ़ार्महाउस होता है, डरते-डरते वे  आवाज देते हैं, प्रतिक्रिया देर से होती है, फिर  भी दरवाजा खुलने पर भय दूर होता है. बाद में संक्षिप्त बातचीत के बाद घर का मुखिया जोगिंदर उन्हें उनके घर तक छोड़ता है. जोगिंदर अपनी बीवी, दो बच्चों, माँ और कुत्ते टॉमी के साथ  वहाँ रहता है. यहाँ जोगिंदर का परिवार  आतंकवादी और आर्मी वालों के बीच फंसा हुआ है. रात में आतंकवादी आकर  धमकाते हैं और दिन में आर्मी वाले. आतंकवादी चाहते हैं कि जब भी वो चाहें वे उन्हे आश्रय दे और आर्मी वाले आतंकवादियों को शरण देने के शक में उनके पूरे घर को उलट-पुलट देते हैं. रात में कुत्ते(टॉमी) का भौंकना  आतंकवादियों को नागवार लगता है और वो  जोगिंदर को उसे मार देने को कहते हैं. लेकिन टॉमी जोगिंदर और उसके परिवार के लिए मात्र कुत्ता नहीं है बल्कि परिवार के सदस्य जैसा है. उसे दूर छोड़ आने पर भी वो वापस आ जाता है. मारने की कोशिश करने पर भी वो उसे मार नहीं पाते. आतंकवादियों में से एक जोगिंदर की पहचान कबड्डी के खिलाड़ी के रूप में करता है, वो मजबूत भी है लेकिन उनके सामने असहाय है. लेकिन यह टॉमी ही है जो भूँकना नहीं छोडता, चाहे आतंकवादी हो या आर्मी वह किसी के सामने नहीं झुकता.

दरअसल टॉमी एक प्रतीक है प्रतिक्रियावादी ताकतों के खिलाफ खड़े होने का, उनसे सामना करने का डर, भय आतंक और त्रास  के अंधेरे के खिलाफ टॉमी उम्मीद की एक रौशनी है. कुल मिलकर चाहे वो आतंकवादी हों या सुरक्षा बल सभी आम जनता की समस्याओं को लेकर असंवेदनशील हैं. आम आदमी का इन दो चक्कियों के बीच अपने वजूद को बचाए रखना अपने-आप  में बड़ी चुनौती है.

बॉलीवुड की  फिल्मों में दिखाया जाने वाला पंजाब बहुत ही अस्वाभाविक और कृत्रिम सा दिखाई पड़ता है.   सरसों के खेत और नाचते-गाते  हुए पंजाबियों के  दृश्यों से हर सिनेमा दर्शक परिचित है .लेकिन वह केवल एक फैंटेसी है, वास्तविकता नहीं. वहाँ की वास्तविक राजनीतिक और सामाजिक स्थिति इतनी सरलीकृत नहीं है.  गुरदयाल सिंह की  इस फिल्म में परिवेश को यथासंभव प्रामाणिक बनाए रखते हुए परिस्थिति की जटिलता को दर्शाया गया  है.  इनकी फिल्मों में प्रकृति का अपना एक अलग व्यक्तित्व है. दिन का समय घने बादल और हरे खेत, वहीं रात की नीरवता ऐसी लगती है मानो हम खुद पात्रों के साथ खड़े हों. सत्यराय नागपाल की सिनेमैटोग्राफी  निर्देशक की सोच को पर्दे पर साकार करती है.

बाद में फिल्म वापस ट्रेन की ओर लौटती है और वहाँ स्टेशन आने से पहले ही गार्ड उन सभी यात्रियों से उतरने कहता है, इससे पहले की कोई उन्हें देख न ले. किसी भी फिल्म को बनाने से पहले फ़िल्मकार उस फिल्म को अपनी कल्पना में साकार करता है, अपनी टीम के साथ उसे रजत पट पर साकार करता है, तीसरी बार दर्शक उस फिल्म की अपने मस्तिष्क में छाप बनाता है. उसकी सार्थक प्रतिक्रिया फ़िल्मकार को संतुष्टि देती है. 

ऐसे दौर में जबकि आम भारतीय सिनेमा के दर्शक हॉलीवुड,बॉलीवुड और फॉर्मूला पंजाबी/क्षेत्रीय फिल्मों  के बने-बनाए ढांचे से अलग कुछ सोच नहीं पाते या कहें देखने पर जज़्ब नहीं कर पाते ऐसे में गुरविंदर की यह फिल्म देखने वालों को भी चौथी कूट (दिशा) दिखाती है. निश्चित ही यह फिल्म नए फ़िल्मकारों को कुछ सार्थक करने की प्रेरणा देगी.
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सूरज कुमार
केन्द्रीय  विश्वविद्यालय, कर्नाटक
surajhilsayan@gmail.com