परख : आलाप और अन्तरंग (गोबिंद प्रसाद)

Posted by arun dev on अगस्त 24, 2016















कवि गोबिंद प्रसाद के सृजनात्मक-आलोचनात्मक गद्य 
आलाप और अन्तरंग’  पर राजेश कुमार का आलेख.






अनुभव संवेदन का गझिन ग्राफ़                           
राजेश कुमार

मानान्तर खड़ी-ऊर्ध्वमुखी रेखाओं के सहारे लिपटी-उलझी हुई डोरियाँ...या विचार-तन्तु कहें ! जैसे सीधे खड़े हुए लम्बे-ऊँचे पेड़ों के साफ़ और छरहरे तने...और उनसे लिपटती-लड़खड़ाती विकसित होती बेतरतीब लताएँ. उनकी कलात्मक संरचना में उभरती विभिन्न आकृतियाँ.  आवरण पर यह रेखांकन ही जैसे पुस्तक के अन्तर्मन को मूर्त कर रहा हो. शीर्षक-- आलाप और अन्तरंग. लेखक-- गोबिन्द प्रसाद.

पेशे से प्राध्यापक गोबिन्द प्रसाद मूलतः कवि हैं...साथ ही चित्रकार और अच्छी समझ व शौकिया रियाज़ के साथ संगीत में रुचि रखने वाले सहृदय भी. युवाकाल की रंगमंचीय सक्रियता भी उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पहलू है. संक्षेप में, वे स्वयं में एक सम्पूर्ण संस्कृतिकर्मी हैं. ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के मौलिक चिंतन से बुनी हुई यह पुस्तक उनके ‘अन्तरंग का आलाप’ भी है और ‘आलाप का अन्तरंग’ भी.

कवि-कलाकार कैसे-कैसे और क्या-क्या सोचता है, सोचे हुए की अभिव्यक्ति कैसे करता है, उस अभिव्यक्ति का उद्देश्य क्या होता है, क्या वह जितना अभिव्यक्त करता है उतना ही सोचता है—साहित्य और कला में रुचि रखनेवाले प्रायः हर व्यक्ति में यह सब जानने की उत्कंठा होती है. इन प्रश्नों का संक्षेप में, किन्तु विस्तृत उत्तर है यह पुस्तक. संक्षेप में इसलिए कि लेखक ने एक विषय का विश्लेषण एक वाक्यांश से लेकर कुछ पृष्ठों तक किया है; विस्तृत इसलिए कि इसमें कथ्य की बुनावट इतनी गझिन और सूत्रात्मक है कि उधेड़ने पर उसके तार दूर-दूर तक फैले हुए विषय-सन्दर्भों को अपने घेरे में समेट लेते हैं. साहित्य-कला-समाज-दर्शन तथा सामान्य जन-जीवन से जुड़े प्रायः हर विषय पर लेखक के चिंतन की अभिव्यक्ति इस पुस्तक में है.

गोबिंद प्रसाद
कला और साहित्य की विभिन्न विधाओं में सहज ही प्रवेश-प्राप्त गोबिन्द प्रसाद जिस विषय पर लिखते हैं उसी के विशेषज्ञ प्रतीत होते हैं. वे जो भी लिखते हैं, पूरे आत्मविश्वास, अधिकारभाव और ‘स्थापनाभाव’ के साथ; हालांकि उनकी केन्द्रीय विधा कविता है. इस पुस्तक में उनकी अधिकांश टिप्पणियाँ कविता और कवि पर ही हैं . भाषा में अभिव्यक्त होने से पहले कविता क्या है, इस पर उनकी स्थापना देखिए —

“कविता प्रकृति के समक्ष प्रार्थना रूप है जो हृदय के आकाश में शब्दातीत भास्वर होती रहती है.” (आलाप और अन्तरंग,पृष्ठ:85)

कविता को परिभाषित करने के उत्कृष्ट बौद्धिक चिंतन का यह ‘रहस्यात्मक’ स्तर है...थोड़ा गूढ़ भी है. दूसरा स्तर रहस्यात्मक होने के साथ-साथ थोड़ा सरल-सहज भी है —

“कविता रूह का लिबास है. (पृष्ठ:17)

एक तीसरा स्तर भी है,जो नितांत लौकिक है; जहाँ वे कविता को सामान्य जीवनानुभव के माध्यम से परिभाषित करते हैं —

“कविता मेरी बेतरतीबी की ‘कलाई पकड़’ है. वह मुझे हर बार तरतीब देने की कोशिश है. वह मेरे बेगानेपन से हाथ मिलवाती है.” (पृष्ठ:19)

पकड़ की सबसे मज़बूत विधि है ‘कलाई पकड़’. अब इस संयोग की ओर संकेत करना और भी रोचक होगा कि अपने युवाकाल में गोबिन्द प्रसाद ने पहलवानी भी खूब की है, जिसके प्रभाव से वे आज भी युवा हैं — श्रम से, शरीर से और शब्द से भी.

कविता के विविध आयामों को लेकर गोबिन्द प्रसाद ने इस पुस्तक में बहुत ही मौलिक और सुगठित चिंतन किया है. लय, ताल,  छंद, प्रतीक, रूपक, शब्द, अर्थ, भाषा, संवेदना, जीवन-दर्शन जैसे कविता के दर्जनों संघटक तत्वों पर उन्होंने घनी चर्चा की है. उनका हर वाक्य एक सूत्र होता है, जिसका विश्लेषण करने पर बातें स्वतः ही स्पष्ट हो जाती हैं.

इस क़िताब में खुसरो, कबीर, मीर, ग़ालिब, इकबाल, प्रसाद, निराला आदि के माध्यम से विभिन्न साहित्यिक विषयों पर चर्चाएँ हैं और अज्ञेय, शमशेर, त्रिलोचन, नागार्जुन, रघुवीर सहाय, मुक्तिबोध, केदारनाथ सिंह आदि की काव्यगत विशेषताओं से सम्बंधित विश्लेषणात्मक और यथाप्रसंग सूत्रात्मक टिप्पणियाँ हैं, जो हिंदी भाषा-साहित्य के अध्येता-अध्यापक तथा चिन्तक-सर्जक सभी के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं.

एक ओर जनपद के कवि त्रिलोचन गोबिन्द प्रसाद की दृष्टि में ‘अनावृत्त के कवि’ हैं, जिनकी सहजता ही उनका आकर्षण है, उनके काव्य-मर्म की गहराई है तो दूसरी ओर वे काव्य-भाषा के सन्दर्भ में भाषा-सजग माने जाने वाले कवि अज्ञेय जैसे बीसवीं सदी के दिग्गज हिंदी कवि तक की आलोचना चुटकी लेकर करते हैं. एक जगह तो वे अज्ञेय-काव्य के अंतर्विरोध को ‘आध्यात्मिक छाया’ कहकर उनका बचाव करते हैं, लेकिन जब बात आधुनिकता के सन्दर्भ में भारत की खोखली सांस्कृतिक परम्परा की हो तो वे अपने इस प्रिय कवि को भी आड़े हाथों लेते हैं. दरअसल भारतीय आधुनिकता का अधिकांश दिखावा मात्र है. प्रगतिशीलता के तमाम दावे करके भी परम्परा के मोह में पड़कर अपने पिछड़ेपन से चिपका रहनेवाला ‘समाज का दर्पण’ हिंदी साहित्य भी इस प्रवृत्ति से मुक्त नहीं. यह स्थिति और भी विडम्बनापूर्ण तब हो जाती है जब ‘आधुनिक हिंदी साहित्य’ का प्रतिनिधि कवि भी आधुनिकता के पैमाने पर कमज़ोर उतरता है. इस सन्दर्भ में गोबिन्द प्रसाद लिखते हैं --

“बावजूद आधुनिक कवि होने के,अज्ञेय में इस प्रश्नाकुल आलोचक व्यक्तित्व की छवि कुछ कमज़ोर जान पड़ती है . आधुनिकता की ताल पर गाते-गाते वस्तुतः कहीं गहरे अर्थों में आस्था की डोर से वे इस तरह भारतीय-संस्कृति और परम्परा की गोद में समाते जाते हैं कि विद्रोह की ललकार आस्था के द्वारा लील ली जाती है. अज्ञेय की आधुनिकता जैसे ही आध्यात्मिकता के गलियारे में प्रवेश करती है उसकी काव्य-दीप्ति मद्धिम पड़ने लगती है. ” (पृष्ठ:151) 
     
भाषा को व्यवहृत करने का गोबिन्द प्रसाद का तरीका निराला ही है. किसी कवि की चर्चा करते समय वे प्रायः पूरे काव्य-व्यक्तित्व का सूत्र ही प्रस्तुत कर देते हैं. कवि को समझने और उसकी कविता को परखने के लिए ये सूत्र जितने उपयोगी हैं,उतने ही रोचक भी . ‘प्रसाद-सूत्र’ (!) का एक उदाहरण देखें —

“ प्रसाद : प्रसाद अतीत के आइने को इतिहास-चिन्तन से प्रक्षालित करते हैं; बार-बार. शायद उन्हें भरम है कि खोया हुआ सांस्कृतिक गौरव और प्रेम (सम्बन्धों) की मादकता उन्हें फिर से मिल जाएगी . ” (पृष्ठ:143)

उनकी इस सूत्रात्मकता की चरम परिणति वहाँ होती है जहाँ वे एक ही वाक्य में किसी बात या व्यक्ति के लिए एकदम सही नाप का खाँचा तैयार कर लेते हैं. यह काम उनके लिए एक खेल है . अज्ञेय की नाप का एक वाक्य देखिए—

“ अज्ञेय : शब्दों की ओट में रहनेवाला कवि ! ” (पृष्ठ:131)
तो गोबिन्द प्रसाद की अभिव्यक्ति प्रायः सूक्तिपरक होती है, कविताओं में भी और आलोचनात्मक निबंधों-टिप्पणियों में भी. बल्कि कहना चाहिए कि उनकी गद्य-भाषा में काव्य-भाषा की सूक्तिपरकता का संक्रमण हुआ है. वे एक विषय को कई दृष्टियों से और कई कोणों से देखते हैं, तो उसकी अभिव्यक्ति भी उसी तरह करते हैं और एक ही विषय पर एक साथ कई सूक्तियाँ गढ़ लेते हैं. इस पुस्तक में तो यह सूक्तिपरकता उनके लेखन की केन्द्रीय प्रवृत्ति सी जान पड़ती है . कुछ उदाहरण देखें...थोक में..
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“ सुख का सातत्य आनन्द को जन्म नहीं दे सकता . ” (पृष्ठ:17); “ कविता रूह का लिबास है .” (पृष्ठ:17); “ लय अनुभव-संवेदन की गति का ग्राफ़ है . ” (पृष्ठ:17); “ तरतीब अपने क़िस्म का ठहराव है .” (पृष्ठ:43); “ मिथक : जातीय स्मृतियों एवं प्रक्कल्पनाओं का एलबम . मिथक : संस्कृति एवं काल की रचनात्मक व्याज स्तुति . मिथक : काल की गोद में समाहित सम्पुंजित परम्परा,इतिहास और संस्कृति का जीवाश्म (फॉसिल). ” (पृष्ठ:61); “ मुहावरा : किसी दुसरे का कमाया हुआ सत्य है .” (पृष्ठ:145)

ऐसे सैकड़ों उदाहरण इस पुस्तक में देखने को मिल जाएँगे. किन्तु वे केवल सूक्ति देकर अपना काम ख़त्म नहीं मान लेते,बल्कि सन्दर्भ-प्रसंग के अनुसार उनका विश्लेषण भी करते हैं . विश्लेषण के माध्यम से लेखक पाठक को वहाँ खींचकर ले जाता है जहाँ ‘अर्थ’ छिपा हुआ होता है . ऐसा ही एक विशिष्ट उदाहरण देखें —

“कवि हृदय का वकील होता है . ” (पृष्ठ:68)
सही को ग़लत और ग़लत को सही साबित करने की कुतर्क-प्रणाली के कारण अपनी नकारात्मक छवि के लिए ही वकील अधिक जाना जाता है...तो पाठक इस वाक्य को पढ़कर एक बार चौंकेगा ज़रूर — कितना विचित्र रूपक है ! लेकिन आगे लेखक ने जो विश्लेषण किया है,उसे पढ़कर पाठक संयत होगा —

“उसकी वकालत तर्क की झूठी बैसाखियों के सहारे नहीं वरन सच्चे मनुष्यत्व की नैतिकता और निष्ठा की अदृश्य बहनेवाली अन्तःसलिला-सी बहती है जिसके होठों पर सदा इनसानपरस्ती का राग फूटता रहता है . कवि का तो झूठ भी काम आता है कल्पना बनकर .” (पृष्ठ:68)

हालांकि विश्लेषण का उनका यह तरीका कभी-कभी उल्टा भी पड़ जाता है, बात समझ में आने की बजाय और उलझ जाती है. दरअसल वे सोचने की भाषा में लिखते हैं,तो उनकी भाषिक अभिव्यक्ति (वाक्यों की बनावट) अक्सर वैसी ही होती है. ऐसी भाषा में उनकी बातें आसानी से समझ में तो आ जाती हैं, लेकिन संकट यह है कि कोई भी व्यक्ति जितनी तेज़ी से सोचता है उतनी ही तेज़ी से लिख नहीं सकता. यानी सोच आगे चली जाती है और भाषा पीछे रह जाती है. तो सोच को पकड़ने की कोशिश में भाषा लड़खड़ा जाती है. चिंतन की लम्बी दूरी को जब भाषा कम समय और शब्द में तय कर ले तो सूक्ति बन जाती है, लेखक इसमें सिद्धहस्त है; लेकिन कई बार इसके विपरीत स्थिति भी आ जाती है — जब कम चिंतन को व्यक्त करने के लिए भाषा को अपेक्षाकृत अधिक लम्बी दूरी तय करनी पड़े.  

कई बार गोबिन्द प्रसाद अपनी संक्षिप्त किन्तु व्यावहारिक व्याख्यात्मक चर्चा के माध्यम से हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण सन्दर्भों पर ऐसा सूत्रात्मक निर्णय देते हैं जो सामान्यतः लम्बी बहस के बाद भी संभव नहीं हो पाता. मुंशी प्रेमचंद के कथा साहित्य पर भले ही अब तक दर्जनों किताबें लिखी-छापी जा चुकी हों,उनकी कालजयी कहानी ‘कफ़न’ की भी खूब चर्चा हुई हो,लेकिन ‘कफ़न’ शब्द को विभिन्न सन्दर्भों से जोड़कर इसके बहुआयामी मर्म को उद्घाटित करने वाला जो सूत्र गोबिन्द प्रसाद ने सहज ही ढूंढ़ निकाला वह नितांत नवीन है—

“ किसका कफ़न : बुधिया का...चमारों का...या चमारों के कुनबे का...या फिर गाँव वालों का xxx कहीं जाति व्यवस्था के कफ़न की बात तो नहीं कर रहे प्रेमचंद ? xxx कहीं समाज व्यवस्था का कफ़न तो नहीं...भारतीय संस्कृति का कफ़न ? ” (पृष्ठ:100)

भारतीय समाज, राजनीति, साहित्य और संस्कृति का केन्द्रीय मुद्दा बन चुके दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श पर भी लेखक की सार्थक टिप्पणियां इस पुस्तक में संकलित हैं. इनके मूल्यांकन के बहाने इन विमर्शों के पीछे छिपे अवसरवादी वर्चस्ववादियों पर भी उनकी सीधी नज़र है. शायद इसीलिए वे इन विमर्शों की लोकप्रिय, बहुप्रशंसित, लगभग सर्वसुलभ अच्छाइयों और मजबूतियों का नाम लिये बिना इनके तमाम अंतर्विरोधों,संकटों,कमज़ोरियों आदि की ही चर्चा अधिक करते हैं. अंत में भूल-सुधार करने की मुद्रा में दिये गए उनके निष्कर्षात्मक अंश अलग से चिपकाए हुए ज़रूर लगते हैं , लेकिन एक सामंजस्यपूर्ण समाज की स्थापना की दृष्टि से ये बहुत महत्वपूर्ण हैं.

सूचना-साम्राज्यवाद,भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद के अप्रत्याशित वर्चस्व ने दलितों-स्त्रियों की मुक्ति के अवसर तो उपलब्ध कराए, साथ ही उनके शोषण के नए लुभावने तंत्र भी विकसित किए. शब्दों की संस्कृति उन्हीं में से एक है. लेकिन इस लेखक को शब्द-संस्कृति की गहरी समझ है, जिसका उपयोग वह दलित-विमर्श की सार्थकता के सन्दर्भ में बखूबी करता है --

“ मैं सोचने लगा ‘अछूत’ शब्द से ही ‘अछूती’ शब्द बनता है लेकिन दोनों में अर्थ का संसार कैसे दो किनारों पर जा बसा है. एक में (‘अछूती’) कितना भव्य,पावन और अनोखेपन का भाव है तो दूसरे (‘अछूत’)में कितना गर्हित, दालान, अन्याय और क्रूरता का सामाजिक (या कि अ-सामाजिक) कोढ़ !! कैसी विडम्बना है . समाज भी खूब है. अजब लीला है शब्दों की . ‘अछूत कन्या’ और ‘अछूती कन्या’ .” (पृष्ठ:51)
       
गोबिन्द प्रसाद ने नियमित अभ्यास और पेशे के रूप में संगीत को भले ही न अपनाया हो,  लेकिन इस कला-रूप पर लेखन वे लगातार करते रहे हैं – कभी संगीत के अंग-प्रत्यंग पर तो कभी संगीतकारों के गायन-वादन पर. इस विषय से सम्बंधित उनके सूक्ष्म-समर्थ चिंतन के कई उदाहरण इस पुस्तक में भी संकलित हैं — कहीं विविध आयामों और दृष्टियों से ताल को परिभाषित करते हुए तो कहीं नाद को विश्लेषित करते हुए. एक टिप्पणी में वे अपनी सूक्ष्म दृष्टि और भाषा-शक्ति से ‘आलाप’ को परिभाषित करते हुए लिखते हैं –

“स्वरों के अनुत्क्रामी रूप से यत्किंचित विस्तार देते हुए नई राहों का अन्वेषण और नए आयाम देते हुए राग को अपने मूल में वही बनाए रखकर भी उसके स्वरूप को अधिकाधिक और चारुता के साथ पुष्ट करना ही आलाप है .” (पृष्ठ:74)

इतना सूक्ष्म और गहन विश्लेषण एक बहुविध कलावंत ही कर सकता है...और वही काव्य-चिंतन को संगीत-चिंतन से जोड़ सकता है --

“गद्य कविता को ऐसे ही समझो जैसे बिना साज़ के आवाज़ .” (पृष्ठ:27)

कला की तमाम विधाएँ सामान रूप से महत्वपूर्ण हैं,शायद इसीलिए लेखक की कलात्मक प्रवृत्ति भी बहुआयामी है. गोबिन्द प्रसाद कला को जीवन से इतर नहीं मानते. उनकी दृष्टि में कला जीवन का मर्म है, जीवन का विवेक है,जीवन जी समग्रता है. वे कला के प्रति जितने चिंतनशील हैं उतने ही चिंतित भी. लिखते हैं कि कला का प्रारम्भ एक ‘आदि कौशल’ से होता है. इसी आदि कौशल का विशिष्ट रूप एक पद्धति के रूप में विकसित होकर कलाकार की शैली बन जाता है. यहीं से वह एक ‘ब्रांड’ या ‘ब्रांडनेम’ में तब्दील होने लगता है. अपनी विकसित पद्धति के आधार पर जब कलाकार कला को एक ‘तंत्र’ के रूप में अपनाता है तो वह (कला) ‘प्रोडक्शन’ (उत्पादन) में बदल जाती है. यहीं से बाज़ार कला पर नियंत्रण करने लगता है. इसीलिए वे कला को ‘ब्रांड’ या ‘प्रोडक्शन’ नहीं होने देना चाहते; वे बाज़ार-तंत्र को कला पर हावी नहीं होने देना चाहते. लेकिन इससे आगे उनकी चिन्ता और भी गहरी है. उन्हें लगता है कि इस ‘अल्ट्रा आधुनिक संस्कृति’ में (कविता और) कला के लिए कहीं कोई अवकाश नहीं. वे चिंतित हैं कि कहीं तमाम विलुप्त प्रजातियों की तरह प्राण-वायु रूपी कला और कविता भी धरती से मिट न जाए ! यह लेखक की केवल चिंता नहीं, ‘प्राण-वायु’ के लिए उसकी व्याकुलता भी है.

गोबिन्द प्रसाद केवल कला और कला-समय के प्रति ही चिंतित नहीं हैं; इस पुस्तक में यथाप्रसंग वे अन्य विभिन्न समकालीन समस्याओं के प्रति भी अपनी चिंता व्यक्त करते हैं. एक टिप्पणी में वे अंतर्राष्ट्रीय पूँजीवाद के संकट को बड़े ही रोचक ढंग से एक ऐसे रूपक के माध्यम से व्यक्त करते हैं, जहाँ पूँजीवाद तांगा है, पूँजीवादी और दलाल उसकी सवारियाँ हैं,आम आदमी तांगे में जुता घोड़ा है,आतंकवाद चाबुक है और लोकशाही तंत्र कवच. लेखक चिंतित है कि आख़िर घोड़े की जान कैसे बचे ! विडंबना यह है कि आतंकवाद का चाबुक पड़ते ही घोड़ा अपना दुख-दर्द भूलकर पूँजीवाद की सवारियों को उनकी मंज़िल तक पहुँचाने के लिए पहले से भी तेज़ गति से दौड़ पड़ता है. वे पूँजीवाद की बैसाखी पर चलनेवाली भारतीय राजनीति पर व्यंग्य करते हैं और राजनीति से इतर समाज के हाल-चाल से भी असंतुष्ट हैं. समकालीन समाज में शराफ़त का ‘फ़ालतू’ हो जाना और इंसानियत का ग़ैर-ज़रूरी हो जाना भी उनकी चिंताओं में शामिल है --

“उसने कहा , ‘ज़रुरत से ज़्यादा मुझे कुछ नहीं चाहिए .’ मैंने कहा , ‘ इनसानियत भी नहीं ?’ अचकचाकर उसने कहा , ‘ इनसानियत ! उससे तो ज़रूरत भी पूरी नहीं होती ....ज़्यादा की तो बात छोड़िए .’(पृष्ठ:59)

हिंदी-संस्कृत-अंग्रेज़ी के अलावा गोबिन्द प्रसाद उर्दू और फ़ारसी के भी विद्वान हैं. उन्होंने उर्दू से हिंदी में महत्वपूर्ण अनुवाद किये हैं; कई वर्षों से ईरान कल्चर हाउस, नई दिल्ली के फ़ारसी शोध केंद्र द्वारा संयुक्त रूप से चार भाषाओं (फ़ारसी-अंग्रेज़ी-हिन्दी-उर्दू) में प्रकाशित होने वाले शब्दकोश ‘फ़रहंग-ए-आर्यान’ के संपादक-मण्डल में शामिल हैं. उनका लेखन विविध विषयों के प्रति उनकी रुचि का प्रतिबिम्ब है. उनकी बातचीत और टिप्पणियों  में अक्सर मीर, ग़ालिब, इक़बाल, जिगर, शाद, हसन नईम, दाग़, अहमद फ़राज़ आदि की शायरी शामिल रहती है. इनके बिना जैसे उनकी बात ही न पूरी होती हो. उर्दू की बात करते हुए तो उनकी शब्दावली भी उर्दूनुमा हो जाती है. हालांकि वे हिंदी-उर्दू को एक ही मानते हैं ; बस दोनों का मिज़ाज थोड़ा अलग है — इसे वे अपने तार्किक-प्रामाणिक विश्लेषण से सिद्ध भी करते हैं —

“भाषा (दोनों भाषा) अलग नहीं हैं...फ़क़त भाषा का स्वभाव अलग है : एक का मिज़ाज और तबीयत कुछ दुनियावी रंगत लिए हुए ज़्यादा है...उसके लिबास में कुछ नफ़ासत पसन्दी और शोख़ अदाओं से दिल में उतरने वाली मदहोशी कुछ इस क़दर है कि चेतना को सुला दे,हिस्सो-हरकत को भुला दे . और दूसरी में जैसे चेतना के समुद्र-तल में बहती प्रशांत लहरें...मानस के आकाश में उड़ती दिव्य  छायाएँ,अर्थ-छटाओं की सूक्ष्म ध्वनि-तरंगों को...रूप-छटाओं के प्रकाश-पुंजों को छूने की ललक – एक अन्तरतम में निर्धूम ज्वाला की पावन लौ की दीप्ति का बोध लिये अपने भीतर ! ” (पृष्ठ:67)

लेखन में गंभीर विचार-विमर्श करते हुए गोबिंद प्रसाद हास्य-व्यंग्य को भी शामिल करते चलते हैं...बड़ी कुशलता से विषय का विश्लेषण भी करते हैं और मौक़ा मिलने पर चुटकी भी लेते रहते हैं. वे उर्दू भाषा की विशेषताओं का केवल काव्यात्मक विश्लेषण ही नहीं करते , बल्कि उसकी लिपिगत कमज़ोरी पर भी नज़र डालते हैं ; हम भी नज़र डालें...बहुत दिलचस्प है...

“ बहुत से शब्द ऐसे हैं जहाँ ‘ज़ेर’ न लगाई जाए तो शब्द कुछ से कुछ हो जाएगा xxx एक बार एक साहब ने ‘किताबचा’ को कुत्ता बच्चा पढ़ दिया . एक बार एक साहब ने ‘मुतनव्वो’ लफ्ज़ को ‘मुतनू’ कहकर एक बड़े नक़क़ाद की शख्सियत में ‘चार चाँद’ अनजाने ही लगा दिए . ” (पृष्ठ:95)

तो भाषा पर गोबिन्द प्रसाद की पकड़ बेजोड़ है. यह पुस्तक विविध विषयसन्दर्भों के अतिरिक्त भाषा और शिल्प की दृष्टि से भी उनकी एक विरल और महत्वपूर्ण उपलब्धि है . इसमें बहुत से नए विषय हैं,नई दृष्टियाँ हैं;लेकिन जहाँ पुराने विषय हैं वहाँ भी लेखक के मौलिक चिंतन और भाषा-शिल्प की नवीनता ने उन्हें रोचक और संप्रेषणीय, फलतः महत्वपूर्ण बना दिया है.

इधर काफ़ी लम्बे समय से आलोचना के सन्दर्भ में दो महत्वपूर्ण सवाल उठते रहे हैं – पहला,क्या आलोचना रचना है ? दूसरा, आलोचना की भाषा इतनी बनावटी और नीरस क्यों है...क्या इसका कोई विकल्प नहीं ? इन दोनों ही सवालों का ज़वाब है यह किताब. आलोचना की भाषा भी सरल-सहज, स्वाभाविक और सरस-रोचक हो सकती है. इस किताब में संकलित लेखक की आलोचनात्मक टिप्पणियाँ इसका अच्छा उदाहरण हैं. इन टिप्पणियों की भाषा अपनी स्वाभाविकता और सरसता को समेटे हुए उस कलात्मक ऊँचाई तक जाती है जहाँ पहुँचकर कोई भाषिक अभिव्यक्ति ‘रचना’ के पद पर प्रतिष्ठित होती है. कवि का गद्य अन्य से इतर और विशिष्ट होता है. यह गद्य-भाषा हिंदी आलोचना को नई धार और इस विधा से विरक्त पाठक के हृदय में इसके प्रति सहर्ष सशक्त स्वीकार्यता देगी.

गोबिन्द प्रसाद का यह सृजनात्मक-आलोचनात्मक गद्य भविष्य के आलोचक को भाषा का सरस और सहज स्वीकार्य संस्कार देगा. 
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राजेश कुमार
8755201713
rabbijnu@gmail.com