रंग - राग : राजेश खन्ना : वेद उनियाल

















राजेश खन्ना अब हमारे बीच नहीं हैं. सितारे हमारे बीच से कहीं  जाते नहीं. उनकी चमक सदिओं सदिओं बनी रहती है. पत्रकार लेखक वेद उनियाल ने  राजेश खन्ना के विविध  जीवन प्रसंगों, उनकी फिल्मों,  उनका राजनीति में आना और फिर मोहभंग सबको इस लेख में समझा और सहेजा है.   राजेश के न होने पर राजेश के होने का मतलब समझ में आता है.  राजेश खन्ना पर एक जरूरी आलेख. 


राजेश खन्ना ::
फिर भी मेरा मन प्यासा ....

वेद विलास उनियाल


राजेश खन्ना अनायास ही राजनीति में आए. मैं जानता था कि  मुंबई में कांग्रेसी नेता और बेस्ट कमेटी के पूर्व अध्यक्ष रामजनक सिंह से उनकी निकटता है. मैंने उनसे कहां था कि कभी काका से तो मिलवाइए.  राजेश खन्ना नई दिल्ली लोकसभा का उपचुनाव जीत गए थे. टीवी पर उनके जीतने की खबरें चल रही थींउस  दिनरात नौ बजे के आसपास रामजनकजी का फोन आया,  “क्या काका से मिलना है. मैंने कहा, “जरूर.   उन्होंने कहा, “तो फिर घर पर जाओ,".   मैं चौंका, "वे चुनाव जीते हैं. टीवी उन्हें दिल्ली में दिखा रहा है.उन्होंने कहा, "मैं कह रहा हूं कि काका से मिलने जाओ. आज ही मिलोगे.साथ ही यह भी कहा कि काका चुपचाप रहे हैं, किसी से कहना नहीं. आज समय नहीं दे पाएंगे. मैं उसी क्षण उनके घर के लिए निकल गया.

वे मुझे मुंबई की घूमती सड़कों से यहां -वहां से किसी जगह ले गए. इतना पता था कि वह आशीर्वाद नहीं था. वहां कुछ लोग बाहर लॉन में थे. हम अंदर एक कक्ष में बैठ गए. करीब एक घंटे का इंतजार करना पड़ा. तभी  अंदर से रामजनक सिंह आए और मुझे अपने साथ ले गए. देखा, एक व्यक्ति  पीठ किए हुए बैठा है. झक सफेद कु्र्ता पहने है. मैं जान रहा था कि यही राजेश खन्ना है. वह मुड़े़ और फिर चिरपरिचित शैली में कहा, कहिए, क्या कहना है आपको वो जिस अदा से बोले, वह अंदाज मुझे बरसों पीछे उन्हीं दिनों में ले गया. मुझे लगा फिल्मों में इसी खास अंदाज में ही अपने संवादों को बोलते थे काका. मैने उन्हें जीत की शुभकामना दी, तो बड़े अदब से शुक्रिया कहा. उनके हर हावभाव से नजाकत झलक रही थी. यह सब दिखावटी या ओढ़ा हुआ नहीं था. मैं महसूस कर रहा था कि उन्हें यह अंदाज, नजाकत, अदा जो भी कहिए, सब ईश्वर से मिला है. मैंने उनसे कहा, आपसे बात करने का मन था. और आपको देखने का भी मन था.देखने का ? ” उन्होंने बड़ी गौर से मेरी तरफ देखा.    मैंने उन्हें बताया कि अपने स्कूली दिनों में आप हमारे लिए क्या थे. आज पहली बार सामने देख रहे हैं तो बड़ा अच्छा लग रहा है. उन्हें यह भी बताया कि किस तरह वो गीत मन में छाए हुए थे जो उन पर फिल्माए गए थे. जिन पर वे इशारे नुमा अभिनय करते थे. हम ज्यादा नहीं, कुछ देर ही वहां रहे थे. वे जताना नहीं भूले थे कि बहुत मुश्किल सीट पर जीत कर आए हैं. राजनीति में चुके थेशत्रुघ्न सिन्हा को हराकर सांसद भी बन गए थे, लेकिन उतनी देर में उन्हें देख कर एक बार भी नहीं लगा कि वे नेता बन गए हैं.

आगे भी कभी नहीं लगा. पता नहीं सही था गलत, मैंने उनसे यह भी पूछ लिया था कि आप और डिंपल वै साथ-साथ क्यों नहीं रहते हैं. जवाब भी वैसा ही था. उन्होंने कहा, आपके मन में अच्छी बात आई है. अब कहीं कोई गिला नहीं है. मिल भी रहे हैंबाहर निकलने के लिए  कुछ कदम आगे बढ़े ही थे, कि आवाज आई, “ जरा, सुनो ”  मैं उनके पास गया.  वही  पलक झपकाकर पूछा, : " बॉबी  कितनी बार देखी है? “इस छोटी-सी मगर एक अच्छी मुलाकात के साथ वहां से निकले.

 सुपर स्टार होना क्या हैइसे सबसे पहले राजेश खन्ना से ही जाना और महसूस किया गया. अपने दौर में  क्या युवा, क्या बच्चे, हर किसी पर उनका जादू छाया रहा. अभिनय तो दिलीप कुमार के पास थारुपहले पर्दे पर  निर्दोष, मासूम प्यार राजकपूर ने किया था  और रोमांस के साथ जीना देवानंद को ही आता था. इस त्रयी के बाद कुछ सितारों के बीच से राजेश खन्ना इस तरह सामने आए कि लोग बस उनकी एक झलक पा लेना चाहते थे. एक नहीं उनकी कई फिल्में सुपरहिट हुईं. एक सिलसिला-सा बन गया. बच्चों ने "हाथी मेरे साथी"  ही नहीं देखीं,  "आराधना"  भी  देखी. युवाओं ने "आन मिलो सजनाही नहीं देखी, बाबू मोशाय वाली "आंनंदभी देखी.  "आराधना",  "दो रास्ते", " सफर",  "कटी पतंग", "दाग से लेकर  प्रेम कहानी" तक उनके नाम पर ही सिनेमा हाल में हाउस फुल के बोर्ड लग जाते थे. वे हर तरफ नजर रहे थे. फिल्म के पोस्टरों में, किशोर कुमार के गीतों मेंशर्मिला टैगौर और  मुमताज के साथ फिल्म की रोमांटिक जोड़ी बनाने में. कभी "ये शाम मस्तानी" गाने पर सीटी बजाते हुए. बात केवल कलात्मकता या अभिनय की होती तो दूसरे कई उनसे आगे निकले होते, पर उनका ग्लैंमर लोगों के मन पर इस तरह छाया कि उन्होंने एक पल निहारने के लिए घंटों इंतजार किया. फिल्में आती रहीं, जाती रहीं, लेकिन सिनेमा हाल तो तभी गुलजार हुए जब राजेश खन्ना की कोई फिल्म आई. इसे उनकी अदा कहिए या नफासत, वे सबके चेहते कलाकार हो गए. वह भी तब जबकि ज्यादा नहीं, मात्र छह बरस तक उनका ही राज था.

राजेश खन्ना हर तरह से पसंद आए. कभी उन्होंने तिरछी नेपाली टोपी पहनी, कभी गुरु कुर्ता. उन्होंने कुर्ता पेंट पहना तो वह भी फैशन बन गया. बड़ी मोरी वाली पेंट "बालबाटम"  भी उनके साथ चलन में गया था. साधना ने ही खास तौर पर  अपने बालों को नहीं संवारा, उन्होंने भी बालों के बीचों-बीच इस तरह मांग निकाली कि  युवाओं के बाल उसी तरह संवरने लगे. आंखें मिचकाना, एक खास अदा से बाईँ तरफ आधा घूमते हुए शरीर को हल्का-सा लहराना और नजाकत से मुस्कराना उनकी इन अदाओं पर लोग रीझ गए, दीवाने हो गए. अभिनय तो सभी करते थे, पर अदा राजेश खन्ना के पास ही थी. लेकिन पता नहीं वो कैसा सम्मोहन था कि बच्चे भी उस फिल्म को जरूर देखा करते थे जिसमें राजेश खन्ना हीरो होते थे. सही मायनों में वे एक हीरो की तरह ही रहे.

उनकी धीरे-धीरे अपने संवादों को कहने की शैली मौलिक ही रही है. दशक बीत गए पर आज भी मन में घुमड़ती है वो आवाज... बाबू मोशाय. उनकी संवाद अदायगी का एक खास अंदाज रहा है.  याद आता है उनका कहना, " पुष्पा आई  हेट  टियर्स.

उन दिनों राजेश खन्ना की पहली फिल्म "हाथी मेरे साथी" देखी थी. उन दिनों छोटे कस्बों, शहरों में भी कोई भी नई फिल्म तीन-चार साल के बाद आया करती थी. हां! फिल्मों के आने से पहले उसके गीत खूब चर्चित हो जाते थे. जब किसी फिल्म का टाइटिल ही "हाथी मेरे साथीहो तो  बचपन में उसके प्रति रोमांचित होना स्वाभाविक  था. ऊपर से अक्सर यहां-वहां इस फिल्म के गाने भी सुनाई देते थे. बहुत कौतूहल था इस फिल्म के लिए. तब इस बात से कोई  सरोकार नहीं था कि यह फिल्म वन्यजीवों के प्रति मानवीय संवेदना  जगाने के लिए बनी है. बिल्कुल इसी तरह जैसे "मेरा नाम जोकर" में बच्चों को केवल जोकर से ही मतलब था, राजकपूर का राजू जोकर जमाने से  क्या कहना चाहता है, यह दर्शन तो बड़ों के लिए था. बच्चों के लिए तो वह सर्कस का रंग-बिरंगे कपड़े पहने. ऊंची टोपी लगाए हुए एक जोकर है. जो जानवरों से भी खेलता है, और अपनी हरकतों से सबको हंसाता है. दो बातों ने "हाथी मेरे साथी" के लिए आकर्षण जगाया था. यह पता लगा था कि  हाथी फुटबॉल भी खेलता है. तरह-तरह के करतब करता है. और फिर हीरो तो राजेश खन्ना थे ही.

"हाथी मेरे साथी" फिल्म लगी तो सिनेमा हॉल  के एक बड़े पोस्टर ने उत्सुकता जगा दी थी. उसमें देखा, लड़की  कार में बैठी हुई है और हाथी उसकी लाल रंग की गाड़ी को रस्से से आगे खींच रहा है. बहुत उत्साह से देखी थी वह फिल्म. पोस्टर वाला दृश्य भी फिल्म में था. मगर आखिरी दृश्य ने उदास कर दिया था. राजू के दोस्त हाथी पर किसी ने गोली चलाई थी. "रामू हाथी" के शव पर फूल मालाएं चढ़ाई जा रही थीं. और पार्श्व में गीत चल रहा था, "नफरत की दु्निया को छोड़ के." दक्षिण के एक फिल्मकार तिरुमूघम दवेर  ने इस संवेदनशील विषय पर फिल्म बनाई थी. इतना पता था कि रामू हाथी किसी सर्कस से आया है. वह राजेश खन्ना का ही नहीं, बच्चों का भी दोस्त बन गया था. बहुत कुछ इसके बाद ही राजेश खन्ना की फिल्में पसंद आने लगी थीं. सही मायनों में फिल्म के दो हीरो थेरामू हाथी और राजेश खन्ना.

फिल्मों में राजेश खन्ना को लेकर जो गीत फिल्माए जाते थे, उनकी खूब धूम रहती थी. जब उनका स्टारडम नहीं रहा, तब भी उनकी पुरानी पिक्चरें लगती तो बड़े शौक से देखा जाता था. छोटे कस्बे और शहरों के लिए वे किसी नई फिल्म की तरह ही होतीं.  प्रेमनगर", “आप की कसम" ,  “प्रेम कहानी जैसी फिल्में इसी श्रृंखला में  देखी थीं. हां राजेश खन्ना का जो क्रेज बचपन में मन में बन गया था उसके चलते  अंमर प्रेम", “आराधना",  “दाग",  “कटी पंतंग", “रोटी",  आप की कसम  जैसी पुरानी हो चुकी फिल्में देखी थीं. भारतीय सिने दर्शकों के लिए तब वे सुपर स्टार नहीं रह गए थे, डिंपल से शादी भी कर चुके थे, लेकिन अपने लिए वह सुपर स्टार ही थे. दूसरे जहां अमिताभ बच्चन की फिल्में देखते , मैं राजेश खन्ना की कहीं, कोई फिल्म लगती तो उसे जरूर देखता. ऐसे ही कई फिल्में स्कूल कॉलेज  के समय में देखी. इसी तरह "आनंद "  को बहुत गौर से देखा. महसूस किया कि इसे अभिनय की दृष्टि से राजेश खन्ना की सबसे याद रखी जाने वाली फिल्म कहा जा सकता है.

फिल्मों की दुनिया में ट्यूनिंग का बड़ा महत्व है. राजेश खन्ना के लिए किशोर दा की आवाज ही फबी. याद कीजिए वह किशोर का भी जमाना था और राजेश खन्ना का भी. हर जुबान पर किशोर के गीत थे. और उन गीतों में लोग राजेश खन्ना की छवि देखते थे. रूप तेरा मस्ताना" ,  “मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू", “ये शाम मस्तानी",  “  मेरी प्यारी बहनियां बनेगी दुल्हनियां  जिंदगी के सफर", ये जो मुहब्बत है", “मेरे दिल में आज क्या है",  ये क्या हुआ",  “चिंगारी कोई भड़के",  “चल चल मेरे हाथी जैसे गीत सुने जाते हैं तो राजेश खन्ना की छवि सामने जाती है. उन पर फिल्माये गए रोमांटिक युगल गीतों  को भी  किशोर ने ऐसे मस्ती से गाया कि चारों तरफ बहार-सी गई. खूब बजते रहे वो युगल तराने  "छुप गए सारे नजारे," "अच्छा तो हम चलते हैं" "जय जय शिवशंकर, "रंग रंग के फूल खिले.जैसे गीतों में बस किशोर ही थे. और उस आवाज पर फिल्म में अभिनय करते-गाते राजेश खन्ना सबको बेहद पसंद रहे थे. ऐसा भी नहीं कि वह कोई अजब डांस करते हों. बल्कि वह गीतों पर तो वह अपने अभिनय को दोहराते हुए दिखते थे. पर फिर भी कोई बात थी कि वे उस समय सबके चेहते थे.

कहते हैं कि जब आराधना बन रही थी कि किशोर कुमार गानों की रिकॉर्डिंग से पहले फिल्म के निर्देशक शक्ति सांमंत ने कहा था कि वह पहले हीरो को देखना चाहते हैं. राजेश खन्ना जब उनके घर पहुंचे तो  किशोर  ही दरवाजे पर आए! उनकी तरफ घूरकर देखा, कहा कुछ नहीं. बस यही परिचय था. राजेश खन्ना अपने ही अंदाज से मिले थे. और किशोर को लगा था कि वे उनके लिए गा सकते हैं.

फिर तो सिलसिला ही चल पड़ा. यह भी कहा जाता है कि कई बार किशोर किसी गीत को गाने को लेकर आनाकानी करते थे, तो राजेश खन्ना ही उन्हें मनाते थे. इन दोनों का साथ फिल्म रसिकों के लिए बहार बन कर आया. हर जगह किशोर के गाने गुनगुनाए जाने लगे. हर जगह राजेश खन्ना की बातें होने लगी.

राजेश खन्ना के उस दौर को याद करते हुए आरडी बर्मन का संगीत भी मन में छाने लगता है. आराधना का संगीत एसडी बर्मन का है. लेकिन उसमें उनके बेटे का स्पर्श नजर आता है. इस फिल्म में राजेश खन्ना के मिजाज के अऩुरूप गीतों के लिए धुन बनी. जिस खास अंदाज में राजेश आते, चलते, बोलते, उसी के अऩुरूप धुनों को सजाया गया. "रूप तेरा मस्ताना," "मेरे सपनों की रानी"  गीत तो ऐसे बने हैं जो राजेश खन्ना को ही अभिव्यक्त करते हैं. बाद की फिल्मों में किशोर और राजेश खन्ना की शोहरत के लिए आरडी बर्मन का संगीत को भी श्रेय मिलता रहा. "कटी पतंग", "महबूबा", अमर प्रेम", "आप की कसम" इसी श्रेणी की फिल्में थी. आरडी ने किशोर और राजेश खन्ना दोनों के मिजाज को बखूबी भांपा था. आराधना में आरडी बर्मन के संगीत की झलक भी साफ दीखती है.  "मेरे सपनों की रानी"  गीत में स्वयं  उन्होंने माउथ आर्गन बजाया था.

राजेश खन्ना पर फिल्माए गए इस गीत में  माउथ आर्गन इस तरह बजा कि युवाओं की जेब में माउथ आर्गन दिखने लगा. इससे पहले माउथ आर्गन से एसडी बर्मन के सगीत पर ही बेहद सुरीली धुन सुनी गई थी, " है अपना दिल तो आवारा.तब भी पंचम ने माउथ आर्गन बजाया था . फिर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल आए तो लगा राजेश खन्ना के लिए ही आए. राजेश खन्ना के सुपर स्टार वाले दिन, और संगीत में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का दौर. आनंद बख्शी ने आम बोलचाल के शब्दों पर गीत लिखने शुरू किए. हाथी मेरे साथी", “दुश्मन", “आन मिलो सजना", “सच्चा झूठा",  दाग", प्रेमनगर ऐसी फिल्में हैं, जिनका गीत-संगीत राजेश खन्ना के अभिनय को चमकाता रहा. किशोर की यूडलिंग तो लगा  राजेश खन्ना के लिए ही है.

मुमताज. शर्मिला टैगौर  के साथ उनकी जोड़ी खूब जमी. खासकर मुमताज तो उनकी पड़ोसी भी थी. दोनों ने आठ फिल्में कीं. राजेश और मुमताज जिन फिल्मों में आए, उन्हें खासी शोहरत मिली. दोनों एक साथ चमके और एक साथ सफल फिल्मों का सिंलसिला चला. हालांकि दोनों के अभिनय को किसी भी लिहाज से विलक्षण नहीं कहा जा सकता.  लेकिन लोगों को दोनों की रोमांटिक जोड़ी खूब भा गई. फिर दोनों के अपने घर भी बस गए. कहते हैं कि राजेश खन्ना ने मुमताज से कहा था कि वह इतनी जल्दी घर बसाए, कुछ बेहतर फिल्में उसके पास हैं, और कुछ उसका इंतजार कर रही हैं. पर राहें अलग हो गईं. हालांकि उसने अपनी अधूरी फिल्मों की शूटिंग पूरी की. दो रास्ते , रोटी", प्रेम कहानी", “आपकी कसम फिल्में सुपर हिट रहीं. मुमताज राजेश खन्ना के दौर की यादों के साथ ये फिल्में बाद में सिनेमाहालों में आईं.

गालों में डिंपल और तीखे नैन नक्शों वाली  बेहद नाजुक-सी शर्मिला टैगोर में संभ्रांत किस्म का सौंदर्य दिखा. वे बंगाल के एक नामी परिवार से वह फिल्म जगत में आई थीं. मुंमताज  हों या शर्मिला टैगोर सबने राजेश खन्ना की अपार शोहरत के किस्से सुनाए हैं. मुमताज  ने कभी कहा  था कि एक बार  मद्रास के एक होटल के प्रांगण में आधी रात तक भी करीब छह सौ लड़कियां राजेश खन्ना की एक झलक देखने के लिए बेताब थीं.

शर्मिला ने कहा कि कई बार तो स्टूडियो की गैलरी के दोनों तरफ लड़कियां लाइन बनाकर खड़ी होतीं. उनके हाथों में राजेश खन्ना के फोटो होते. वे उन्हें छूने का प्रयास करतीं. उनके कपड़े तक खींचतीं. ऐसे में राजेश खन्ना की स्टाइल देखने लायक होती. वह अक्सर लड़कियों की तरफ देख इस तरह आगे बढ़ जाते जैसे कुछ जान ही रहे हों. यह भी उनकी अदा थी. अपने समय की दो जानी-मानी हीरोइनें जब उनके स्टारडम के ऐसे किस्से सबको बता रही हों तो समझा जा सकता है कि राजेश खन्ना के वे कैसे दिन रहे होंगे.

मुंबई में वे कुल एक दो मौको पर नजर आए. जहां भी उन्हें देखता, कहीं से पुराने हीरो की तरह नहीं दिखे. काका को तब भी लोग बड़े उत्साह से देखा करते थे. मुंबई के  आयकर विभाग में एक बार आए तो वहां की कैंटीन में बैठे रहे. लोग उनके पास आए.  इन्हीं काका के बारे कभी कहा जाता था कि होटलों के लान में खड़ी लड़कियां छह छह घंटे उनकी एक झलक पाने के लिए इंतजार करती थीं. यह भी सुना कि उनकी सफेद कार पर लड़कियां लाल लिपस्टिक से चुंबन के चिह्न छोड़ देती थीं. हर तरफ उनका जलवा था. पर क्या मजाल कि कोई उनसे मिल सके. एक अद्द आटोग्राफ तक के लिए तरस जाते थे लोग. उनके स्टारडम की अपनी रौनक थी. तब राजेश खन्ना उन लोगों की तरफ ज्यादा नजर नहीं फेरते थे, जो इंतजार में घंटो बिता देते थे.  


कोई उन्हें अड़ियल कहता, कोई गुरूर से भरा हुआ. कोई कहता कि ये तो स्ट्रगल थे तब भी आलीशान कार में बैठकर निर्माताओं से मिलने जाते थे.  सफलता की चकाचौंध में तो ऐसा मिजाज होना ही था. कुछ उनके आसपास के चमचों को कोसते. कहा जाता था कि आम लोगों की बात तो दूर, तब वे ब़ड़े निर्माता-निर्देशकों को भी लिफ्ट नहीं देते थे. जो फिल्मे मिलनी थीं, वे अमिताभ को मिल गई. लेकिन फिर भी सब उन्हें देखना चाहते थे, मिलना चाहते थे.  कुछ भी हो, कहा यह भी जाता है कि सफलता देखी तो राजेश खन्ना ने देखी. राजनीति में आकर वे बदल सकते थे. लेकिन इस मोड़ पर भी वे बहुत फासले बना कर चले. आखिर फिल्मों के सफर से  राजनीति का सफर बहुत अलग होता है. राजेश खन्ना राजनीति के सफर के नायक नहीं बन पाए

न जाने क्यों गीतकारों ने   जिंदगी के बहुत से तराने उनके लिए लिखे. "जिंदगी कैसी है पहेली," " जिंदगी एक सफर है सुहाना,"  "जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं,". उनकी जिंदगी भी रहस्य की तरह रही. कभी  सतरंगी रोशनी बनकर जगमगाई. कभी इतनी धूंधली कि नजर भी न आई. स्टारडम, चकाचौंध शादीफिर एकाएक उनका ओछल हो जाना, जो भी हुआ सब पलक झपकते ही हुआ.

राजेश खन्ना की कई छवियां देखीं. पर एक छवि बिल्कुल नहीं भाई थी. "आप की कसम"  के आखिरी दृश्यों में उन्हें असहाय-सा देखा था. कमजोर, जमाने के ठुकराए हुए, बिखरे बालपथराई आंखे. फिल्म की कहानी राजेश खन्ना को इस रूप में दिखा रही थी. लेकिन पता नहीं क्यों उन्हें परदे पर इस तरह देखना भी अच्छा नहीं लगा था. उनकी स्टाइलिश अदा को देखते हुए यही लगता था कि राजेश खन्ना यह चोला अभी उतार कर फेंक देंगे और फिर अपनी रोंमांटिक अदाओं में सिर झुकाकर नायिका से कहेंगे  "आई हेट टियर्स". पर नियति तो अपनी ही चाल से चलती है. वे राजनीति  में आए जरूर लेकिन सिमटे हुए रहे. कहीं कोई हलचल नहीं. ऐसे ही  टीवी पर एक पंखे  की माडलिंग  करते हुए दिखे. पुराने राजेश खन्ना नहींवही उनके रुके- रुके से कदम, बढ़ती उम्र का अहसास. तब मन कचोटता रहा. मन उन्हें इस तरह से नहीं देखना चाहता. उनका जिक्र भर तो वही पुरानी छवि सामने आती है. वही मन में रहनी भी चाहिए. वही राजेश खन्ना जो हर चीज नजाकत से करते थे, जिन्होंने डिंपल कपाड़िया से शादी का इजहार करने के लिए चांदनी रात चुनी थी, समुद्र की लहरों के सामने मन की बात कही थी.

उनके अभिनय ने लोगों को रोमांस करना सिखाया. उनकी मोहक अदायगी, अभिनेत्रियों को रिझाने की कोशिश, चंचल आँखे और डांस करने की स्टाइल सब कुछ अलग था. वे संवेदनशील प्रेम के प्रतीक बने. पर जिंदगी उनके पहेली ही बनी रही. शौहरत की बुलंदी भी देखी और जिंदगी का तन्हा पल भी झेला. न जाने क्यों जिंदगी शब्द उन पर फिल्माएं गीतों में भी कई बार आया,  जिंदगी कैसी है पहेली,   जिंदगी का सफर है, ये कैसा सफरजिंदगी इक सफर है सुहाना. गीत ही नहींफिल्म आनंद में उनका चर्चित डॉयलाग भी  जिंदगी के दर्शन पर ही था.  बाबु मोशाय  जिंदगी  और मौत ऊपर वाले के हाथ में हैजहापनाह.. उसे न तो आप बदल सकते हैं ना मैं. . हम सब रंगमंच की कठपुतलियां हैं.

जब इन शब्दों को लिख रहा हूं, तो यह बात मायूस कर रही हैं कि अब वे नहीं रहे. मुंबई में लोग उन्हें आखिरी विदाई देने के लिए उमड़ पड़े हैं. उन्होंने दूसरों के लिए जिंदगी के सुरीले सपने 
चुने और इस जिंदगी के दूर चले गए.
________________________
वेद उनियाल की  राजनीति, पत्रकारिता, खेल, गीत- संगीत,  नृत्य और फिल्मों से जुडी चर्चित हस्तिओं पर सुन मेरे बन्धु शीर्षक से एक किताब जल्दी ही प्रकाशित होने वाली है.    

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक
अमर उजाला से जुड़े  हैं.
ई पता :   vedvilas@gmail.com 

10/Post a Comment/Comments

आप अपनी प्रतिक्रिया devarun72@gmail.com पर सीधे भी भेज सकते हैं.

  1. बेहतरीन आलेख....
    काका के जीवन के कई नए पहलुओं का पता चला...
    उनयाल जी को धन्यवाद...

    जवाब देंहटाएं
  2. Vimal Uniyal25/7/12, 6:39 am

    Uniyal Saheb..Aap badhai ke patr hai...aapne superstar ko behad kareeb se jana pehchana...Unki smartness,unke komal hridy ke kirdaar.unki khaas ada subke dil me apna ghar bana leti thi...Ek tanha shaam ko chanaky puri me meri bhi unse ek yaadgar mulakat hui...sirf wo aur me...ek achha kalakar zarur achhe dil wala hota hai...Dimpal ke badalte mizaj ne unke dil ko buri tareh tod diya tha...shayad isliye bhi unhone sharab ka sahara kuchh zyada lena shuru kar diya tha...Wo buri tareh tanhai ke andhere me jeene lage the...Teena munim ke marige proposal ko unhne thukra diya tha....wo dusri shadi ke khilaf the...haan us shaam unhone mujhe dil se dus di thi...mene unse is andaz me baat ki jaise unhe laga wo aaine ke samne khade hon...apne dialogue or style ko dekh sunkar wo jor jor se hansne lage...behad khush hue...He offered one peg to me...Really he was 1st & last superstar of Hindi film industry...SOULFUL SALUTE TO KAKA.....

    जवाब देंहटाएं
  3. Prabodh Jhingan ·25/7/12, 6:40 am

    Many a times an actor doing a role cannot truly get out of it and starts living a part of the role.In that sense he is not a good actor but a human being certainly.

    जवाब देंहटाएं
  4. Shyam Bihari Shyamal25/7/12, 6:41 am

    लोकप्रिय कलाकार की अभिनय-यात्रा का गौरतलब आकलन... आभार..

    जवाब देंहटाएं
  5. Dariye Achho25/7/12, 8:53 am

    आनंद को मैं श्रेष्ठतम फिल्मों में गिनता हूँ. पर ये कहना कि राजेश महान अभिनेता या महान इंसान थे, ज़्यादती है. उनके निजी जीवन पर टिप्पणी करना उचित नहीं. पर जो प्रत्यक्ष दीखता है मात्र अदाकारी है. ख्यातियाँ कृत्रिम हुआ करती हैं. अभिनय और अदाकारी में भेद नहीं करना चाहतीं. और अगर आलोचक ही आपके पाले में हो, तो कहने क्या? जिस अमरत्व का वर्णन हो रहा है, वो दरअसल लेखक और निर्देशक की कैमराडरी है जिसका कि वो विश्वसनीय चेहरा बन गए थे

    जवाब देंहटाएं
  6. अमर-प्रेम और आनंद के अभिनय संसार का सफ़र ..

    जवाब देंहटाएं
  7. lekh achchha hai. aapaki kitaab kab aa rahi hai?
    barnwalpramodkumar@gmail.com

    जवाब देंहटाएं
  8. धन्यवाद। प्रमोदजी किताब पूरी लिख दी है। प्रुभ भी पढ़ लिया गया है। बस आखिरी औपचारिकताएं हैं। आपको जरूर सूचित करूंगा।

    जवाब देंहटाएं
  9. apne kai ase baten batai jo nahi maloom the. badhai

    जवाब देंहटाएं
  10. आप के नपे-तुले लफ़्ज़ों में एक अनूठा आकर्षण है। पाठक को अपने साथ लेकर चलने की कला के आप धनी हैं वेद जी।राजेश खन्ना के विविध आयाम मुख़्तलिफ़ ज़ावियों से आप ने बख़ूबी दिखाए हैं।आलेख बेहद दिलचस्प है।

    जवाब देंहटाएं

टिप्पणी पोस्ट करें

आप अपनी प्रतिक्रिया devarun72@gmail.com पर सीधे भी भेज सकते हैं.