सहजि सहजि गुन रमैं : गीत चतुर्वेदी

Posted by arun dev on जनवरी 04, 2012




                                                            (pic. by neelesh sen)



गीत चतुर्वेदी
२७ नवम्बर १९७७, मुंबई.
कवि, कथाकार, अनुवादक और पत्रकार
अंग्रेजी दैनिक इन्डियन एक्सप्रेस द्वारा भारत के वर्ष २०११ के १० श्रेष्ठ रचनाकारों मे से एक.

आलाप में गिरह (कविता संग्रह) राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,२०१०
सावंत आंटी की लड़कियां ( कहानी संग्रह), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, २०१०
पिंक स्लिप डैडी (कहानी संग्रह), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, २०१०
चिली के जंगलों से (नेरूदा के संस्मरणों व लेखों का अनुवाद), संवाद प्रकाशन, मेरठ
चार्ली चैपलिन की जीवनी,संवाद प्रकाशन, मेरठ

लोर्का, नेरूदा, यानिस रित्सोस, एडम ज़गायेव्स्की, अदूनिस, तुर्की युवा कवि आकग्यून आकोवा और इराक़ी कवयित्री दून्या मिख़ाइल आदि की कविताओं के अनुवाद
इनके अलावा मराठी से हिंदी में भी कई अनुवाद

मदर इंडिया कविता के लिए वर्ष 2007 का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार

सावंत आंटी की लड़कियां, सौ किलो का सांप, साहिब है रंगरेज़, गोमूत्र, सिमसिम और पिंक स्लिप डैडी आदि लंबी कहानियां पहल, नया ज्ञानोदय, तद्भव, प्रगतिशील वसुधा और अकार में प्रकाशित
छह से ज़्यादा भाषाओं में कविताएं अनूदित.

सिनेमा, संगीत और विश्व कविता में गहरी दिलचस्पी
सम्प्रति : दैनिक भास्कर, भोपाल में बतौर संपादक (मैग्ज़ीन्स) कार्यरत
ई पता : geetchaturvedi@gmail.com
___________________



from Krzysztof Kieślowski film




गीत की कविताएँ काव्यत्व से भरी हैंअर्थ के एकार्थी रास्ते पर इनके चिह्न शायद स्पष्ट न हों. अर्थान्तर के चौराहे पर खड़ी ये अपनी उजली रौशनी हर दिशा में फेंकती हैं. बने बनाए रास्ते पर ये न चलती हैं न अपना कोई निश्चित पता  छोडती हैं. बदलते चित्रों के दृश्यपट से श्लोक की तरह वाक्यांश चमकते हैं जो दूर तक पीछा करते हैं. आज जब कलाओं पर सब कुछ साफ-साफ और स्पष्ट कहने का उपयोगितावादी दृष्टिकोण हावी होता जा रहा हैगीत दुर्गम और असहज होने का साहस रखते हैं. ये कविताएँ हिंदी के समकालीन मुहावरे और अब तक के अर्जित सौंदर्यबोध में नहीं अटती हैं. गीत चतुर्वेदी हिंदी कविता के अगले सराय हैं. प्रस्तुत हैं उनकी पांच नई कविताएँ 

चंपा  के  फूल 

(दो अजीब और अविश्वसनीय चीज़ों को जोडऩे का काम
करते हैं उम्मीद और स्वप्न 
बुनियाद में बैठा भ्रम विश्वास का सहोदर है
उस कु़रबत का आलिंगन 
जो तमाम दूरियों से भी ताउम्र निराश नहीं होती)
                  *

कहा था, कांच हूं, पार देख लोगे तुम मेरे 
मेरी पीठ पर क़लई लगाकर ख़ुद को भी देखोगे बहुत सच्चा 
जिस दिन टूटूंगा, गहरे चुभूंगा, किरचों को बुहारने को ये उम्र भी कम लगेगी 
तुमसे प्रेम करना हमेशा अपने भ्रम से खिलवाड़ करना रहा 

स्वप्न में हुए एक सुंदर प्रणय को उचक कर छू लेना चाहता हूं
लेकिन चंपा मेरी उचक से परे खिलती है
मैं उसकी छांव में बैठा उसके झरने की प्रतीक्षा करता हूं

एक अविश्वसनीय सुगंध 
उम्मीद की शक्ल में मेरे सपने में आती है 
मुझे देखो, मैं एक आदमक़द इंतज़ार हूं

मैं सुबह की उस किरण को सांत्वना देता हूं
जो तमाम हरियाली पर गिरकर भी कोई फूल न खिला सकी
चंपा के फूलों की पंखुडिय़ां सहलाता हूं 
उनकी सुगंध से ख़ुद को भरता तुम्हारे कमरे के कृष्ण से पूछता हूं 
चंपा के फूल पर कभी कोई भंवरा क्यों नहीं बैठता

दो पहाडिय़ों को सिर्फ़ पुल ही नहीं जोड़ते, खाई भी जोड़ती है



चंपा के फूल - 2

गिटार को गुमान में रख दो कहीं  
तो भी एकाध तार बज उठता है उसका 
तुम वैसे ही बजी थी हौले से 
जब उस चबूतरे पर बिठाया था तुम्‍हें 

तुम उस कंपन की तरह थी जिसने पहले अपनी आवाज़ खोई कि अपनी कांप 
स्थिरता एक अदृश्‍य कंपन है खाई एक उल्‍टा पहाड़ 
दुख यानी बेरौनक़ सुख और सुख यानी महराबदार दुखों के बीच उगती-बीतती 
उस पेड़ के नीचे सूखी पत्तियों बेनाम घासों गुमनाम टहनियों का अस्‍त-व्‍यस्‍त व्‍याकरण था 
अपने नियमों से टूटकर अलग हुआ 
रीत गई अभिनेत्रियों की तरह तुम तिनका तोड़ रही थीं 

चंपा राधा का रूप होती है भंवरे कृष्‍ण के शिष्‍य 
इसलिए नहीं भटकते भंवरे चंपा पर कि 
गुरु के साथ छल होगा 
जबकि चंपा का फूल अब भी कृष्‍ण की प्रतीक्षा कर रहा 

मुझे तुम पर झरना था 
छूने की इच्‍छा करना भी तुम्‍हें छूना ही है 
पैरों से तुमने पत्तियां बुहारीं 
पत्तियों के बीच ख़ुद को बुहारा 

मैं सुगंधों का ज्ञानी हूं 
प्रेम से बड़ा कोई तर्क नहीं मेरे पास 

फूल प्रेम में डूबी प्रतीक्षारत स्त्रियों की तरह हैं 
उनकी मादकता उनकी निजता है 
भीनापन कभी सार्वजनीन नहीं होता 

तुम मुझे चूमना चाहती थीं 
इच्‍छा की चंपा झरी थी तुम्‍हारे बाएं 
जाते हुए तुमने फूल को हाथ में थाम रखा था 
जाते हुए तुम फूल के हाथों में थमी थी 

चंपा प्रतीक्षा की सुगंधित संज्ञा है 

मैं कृष्‍ण से छल ना कर पाया. 



आषाढ़ पानी का घूंट है

तुम्‍हारी परछाईं पर गिरती रहीं बारिश की बूंदें 
मेरी देह बजती रही जैसे तुम्‍हारे मकान की टीन 
अडोल है मन की बीन 

झरती बूंदों का घूंघट था तुम्‍हारे और मेरे बीच 
तुम्‍हारा निचला होंठ पल-भर को थरथराया था 

तुमने पेड़ पर निशान बनाया 
फिर ठीक वहीं एक चोट दाग़ी 
प्रेम में निशानचियों का हुनर पैबस्‍त था 

तुमने कहा प्रेम करना अभ्‍यास है 
मैंने सारी शिकायतें अरब सागर में बहा दीं

धरती को हिचकी आती है 
जल से भरा लोटा है आकाश 
वह एक-एक कर सारे नाम लेती है 
मुझे भूल जाती है 
मैं इतना पास था कि कोई यक़ीन ही नहीं कर सकता 
जो इतना पास हो वह भी याद कर सकता है 

स्‍वांग किसी अंग का नाम नहीं 

आषाढ़ पानी का घूंट है 
छाती में उगा ठसका है पूस.



प्रहसन

जब भी जल गिरता है
खिड़की के पल्‍ले मेरा स्‍पर्श पाते हैं

मैं सारी यात्राओं का नामकरण विराम करता हूं 

मैं हर सुबह उठकर मन को खोदता हूं 
उपेक्षा के पौधे क्‍यारी में उगते हैं 

मैं अपने इंजन से कभी यह नहीं कहता 
जब तुम शंटिंग करते हो 
धक्‍का लगने से मैं अपनी जगह से हिल जाता हूं

प्रेमियों और पतियों और पिताओं ने नफ़रत की मुझसे 
उनकी स्त्रियों ने उनसे नज़रें चुराईं
अंत में सभी के हंसने की आवाज़ आई
जीवन एक प्रहसन है
चलो, यह भी अब ख़त्‍म हुआ

सतह पर काई नहीं
बेतरतीब तैरता मौन है मेरा 
आंसू आंख की मुस्‍कान हैं 



नीली अनुगूंज

हर ओट का इस्‍तेमाल छिपने के लिए किया 
यह देह भी महज़ छिपने की एक जगह है 
खिड़कियों ने दीवारों में रहना छोड़ दिया है 
आलमारी में किताबें शरणार्थियों की तरह हैं 

तुमने सांपों को मारे डर के मारा 
तुम्‍हारा भय निर्दोषों को भयभीत करता है

तुम्‍हारे हाथ पर उभरी नीली नसें
तुमसे टकराकर ना लौट पाईं आसमान की आवाज़ें हैं
तुम नीली अनुगूंजों से बुने गए हो.