सहजि सहजि गुन रमैं : अनामिका



















अनामिका
१७ अगस्त १९६१, मुजफ्फरपुर(बिहार)
दिल्ली विश्वविद्यालय से अँग्रेजी में एम.ए., पी.एचडी.
कविता-संग्रह : गलत पते की चिट्ठी, बीजाक्षर, अनुष्टुप, समय के शहर में, खुरदुरी हथेलियाँ, दूब धान
आलोचना : पोस्टएलियट पोएट्री ,स्त्रीत्व का मानचित्र , तिरियाचरित्रम; उत्तरकांडमन मांजने की जरूरत, पानी जो पत्थर पीता है.  
एक ठो शहर : एक गो लड़की (शहरगाथा), प्रतिनायक (कहानी संग्रह)अवांतर कथापर कौन सुनेगा, दस द्वारे का पिंजरा, तिनका तिनके पास (उपन्यास)
अनुवाद : नागमंडल (गिरीश कनार्ड ), रिल्के की कविताएँ , एफ्रो -इंग्लिश पोएम्स , अटलांट के आर-पार (समकालीन अंग्रेजी कविता), कहती हैं औरतें ( विश्व साहित्य की स्त्रीवादी कविताएँ )
सम्मान : भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, राष्ट्रभाषा परिषद् पुरस्कारगिरिजाकुमार माथुर पुरस्कार, ऋतुराज सम्मान और साहित्यकार सम्मान
सम्प्रति:  अँग्रेजी विभाग, सत्यवती कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय
ई पता : anamikapoetry@gmail.com



वरिष्ठ कवयित्री अनामिका हिंदी कविता में चेतस और संवेदित काव्य-संस्कृति के लिए जानी जाती हैं. उनकी कविताएँ मध्यवर्गीय स्त्री की पीड़ित उपस्थिति और आक्रमक तेवर से आगे जाती है, और सभ्यागत विडम्बना में स्त्री और पुरुष के आपसी विपर्यय पर अपना ध्यान रखती हैं. उनकी कविताएँ मासूम और मानवीय मूल्यों के क्षरण से विचलित हैं. उनका संसार बहिनापा का एक व्यापक वृत्त बनाता है.
शब्द सम्पदा खासी नई और सृजनात्मक है. स्त्री अनुभव को व्यक्त करने के लिए वह प्रदत्त शब्द संरचना को बदलती हैं. स्त्री – जीवन से जुड़े अनेक शब्द अपने सन्दर्भों के साथ आते हैं.उनकी कुछ नई कविताएँ प्रस्तुत हैं. 


  प्रेम के लिए फांसी (ऑन ऑनर किलिंग)

मीरारानी तुम तो फिर भी खुशकिस्मत थीं ,
तुम्हे जहर का प्याला जिसने भी भेजा,
वह भाई तुम्हारा नहीं था,

भाई भी भेज रहे हैं इन दिनों
जहर के प्याले
!

कान्हा जी जहर से बचा भी लें,
कहर से बचायेंगे कैसे
!

दिल टूटने की दवा
मियाँ लुकमान अली के पास भी तो नहीं होती
!

भाई ने जो भेजा होता
प्याला जहर का,
तुम भी मीराबाई डंके की चोट पर
हंसकर कैसे ज़ाहिर करतीं कि
साथ तुम्हारे हुआ क्या
!

"राणा जी ने भेजा विष का प्याला
"
कह पाना फिर भी आसान था,

"भैया ने भेजा
"- ये कहते हुए
जीभ कटती
!

कि याद आते वे झूले जो उसने झुलाए थे
बचपन में,
स्मृतियाँ कशमकश मचातीं;
ठगे से खड़े रहते
राह रोककर

सामा
-चकवा और बजरी-गोधन के सब गीत :
"राजा भैया चल ले अहेरिया,
रानी बहिनी देली आसीस हो न,
भैया के सिर सोहे पगड़ी,
भौजी के सिर सेंदुर हो न
..."

हंसकर तुम यही सोचतीं
-
भैया को इस बार
मेरा ही आखेट करने की सूझी ?
स्मृतियाँ उसके लिए क्या नहीं थीं ?

स्नेह, सम्पदा, धीरज
-सहिष्णुता
क्यों मेरे ही हिस्से आई,

क्यों बाबा ने
ये उसके नाम नहीं लिखीं?


नमक

नमक दुःख है धरती का और उसका स्वाद भी
!
पृथ्वी का तीन भाग नमकीन पानी है
और आदमी का दिल नमक का पहाड़
कमज़ोर है दिल नमक का
कितनी जल्दी पसीज जाता है
!
गड़ जाता है शर्म से
जब फेंकी जाती हैं थालियाँ
दाल में नमक कम या ज़रा तेज़ होने पर
!

वो जो खड़े हैं न
-
सरकारी दफ्तर
-
शाही नमकदान हैं

बड़ी नफासत से छिड़क देते हैं हरदम
हमारे जले पर नमक
!

जिनके चेहरे पर नमक है
पूछिए उन औरतों से
-
कितना भारी पड़ता है उनको
उनके चेहरे का नमक
!

जिन्हें नमक की कीमत करनी होती है अदा
-
उन नमकहलालों से
रंज रखता है महासागर
!

दुनिया में होने न दीं उन्होंने क्रांतियाँ,
रहम खा गए दुश्मनों पर
!

गाँधी जी जानते थे नमक की कीमत
और अमरूदों वाली मुनिया भी
!

दुनिया में कुछ और रहे
--रहे
रहेगा नमक
-
ईश्वर के आंसू और आदमी का पसीना
-
ये ही वो नमक है जिससे
थिराई रहेगी ये दुनिया
. 


अनब्याही औरतें 

"माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की, माई री
!"
जब भी सुनती हूँ मैं गीत,
आपका मीरा बाई,
सोच में पड़ जाती हूँ, वो क्या था
जो माँ से भी आपको कहते नहीं बनता था,

हालांकि संबोधन गीतों का
अकसर वह होती थीं
!

वर्किंग विमेन्स हॉस्टल में पिछवाड़े का ढाबा
!
दस बरस का छोटू प्यालियाँ धोता
-चमकाता
क्या सोचकर अपने उस खटारा टेप पर
बार
-बार ये ही वाला गीत आपका बजाता है !

लक्षण तो हैं उसमें
क्या वह भी मनमोहन पुरुष बनेगा,
किसी नन्ही
-सी मीरा का मनचीता.
अड़ियल नहीं, ज़रा मीठा !

वर्किंग विमेन्स हॉस्टल की हम सब औरतें
ढूँढती ही रह गईं कोई ऐसा
जिन्हें देख मन में जगे प्रेम का हौसला
!

लोग मिले
- पर कैसे-कैसे -
ज्ञानी नहीं, पंडिताऊ,
वफ़ादार नहीं, दुमहिलाऊ,
साहसी नहीं, केवल झगड़ालू,
दृढ़ प्रतिज्ञ कहाँ,
सिर्फ जिद्दी,
प्रभावी नहीं,
 सिर्फ हावी,
दोस्त नहीं,
 मालिक,
सामजिक नहीं, सिर्फ एकांत भीरु
धार्मिक नहीं,
 केवल कट्टर


कटकटाकर हरदम पड़ते रहे वे
अपने प्रतिपक्षियों पर
-
प्रतिपक्षी जो आखिर पक्षी ही थे,
उनसे ही थे
.
उनके नुचे हुए पंख
और चोंच घायल
!

ऐसों से क्या खाकर हम करते हैं प्यार
!
सो अपनी वरमाला
अपनी ही चोटी में गूंथी
और कहा खुद से
-
"एकोहऽम बहुस्याम
"

वो देखो वो
-
प्याले धोता नन्हा घनश्याम
!
आत्मा की कोख भी एक होती है, है न
!
तो धारण करते हैं
इस नयी सृष्टि की हम कल्पना

जहाँ ज्ञान संज्ञान भी हुआ करे,
साहस सद्भावना
!


पूर्णग्रहण

पूर्णग्रहण काल था ये !
बरसों की बिछड़ी हुई दो वृद्ध बहनें
-
चाँद और धरती
-
आलिंगनबद्ध खड़ी थीं
-
निश्चल
!

ग्रहण नहाने आई थीं औरतें
सरयू के तट पर
गठरी उनके दुखों की
उनकी गोद में पड़ी थी
!

वृद्धा बहनों के इस महामिलन पर
उनके मन में थी सुगबुगाहट,
उलटी हथेली से पोंछती हुई आंसू
एक ने कहा दूसरी से
-

"चरखे दोनों को
दहेज़ में मिले थे
!
धरती की संततियों को एक अनंत चीर चाहिए
!

तंगई बहुत है यहाँ, है न
!
सो धरती में चरखे रुकने का नाम ही नहीं लेते
!

हाँ, चाँद की बुढ़िया तो है निपूती,
किसके लिए चलाये भला चरखा,
क्या करे अपने इस टूटे कपास का ?

कबी
-कभी नैहर आती है
तो कुछ
-कुछ बुन लाती है.

इतने बरस बीते,
जस
-की-तस है चाँद की बुढ़िया !
देखो तो क्या कह रही है वह
धरती की ठुड्डी उठाकर
-
कितनी सुंदर तुम हुआ करती थीं दीदी,
रह गई हो अब तो
झुर्रियों की पोटली
!

यह बात मेरे भी दिल में लगी,
मैंने भी धरती की ठुड्डी उठाई
और उसे गौर से देखा
! डूब गई थीं उसकी आँखें !
चूस लिया था हमने उसको तो पूरा ही
!
काँप रही थी वह धीरे
-धीरे! कितना बुखार था उसे !

इतने में दौड़ता हुआ आया मेरा बहन
-बेटा,
उसके हाथों में भूगोल की किताब थी,

उसने कहा
- मौसी,
टीचर कहती हैं,
नारंगी है पृथ्वी
!

मैंने मुंह पर पानी छ्पकाकर कहा
-
नारंगी जैसी लगती है वह,
लेकिन नारंगी नहीं है
-

कि एक
-एक फांक चूसकर
दूर फेंक दी जाए सीठी
!"


विस्फोट

                  तड़ी पार शब्दों में
बनते हैं गीत,
इसलिए पुकार के लिए अच्छे हैं
चिड़िया ने चिड़े से कहा
-
विस्फोट के ऐन एक मिनिट पहले
.

विस्फोट के ऐन एक मिनिट पहले
किसी ने वादा किया था
-
जिन्दगी का पहला वादा
-
घास की सादगी और हृदय की पूरी सच्चाई से
.

खायी थीं साथ
-साथ जीने-मरने की कसमें !

विस्फोट के ऐन एक मिनिट पहले
किसी ने चूमा था नवजात का माथा
!

कोई खूंखार पत्नी की नज़रें मिलाकर
बैठा था बीमार माँ के सिरहाने,

कोई कटखने बाप से छुपाकर
लाई थी पिटे हुए बच्चों का खाना
विस्फोट के ऐन एक मिनिट पहले
.

किसी को नौकरी मिली थी
सदियों के इंतज़ार के बाद
विस्फोट के ऐन एक मिनिट पहले
.

अभी
-अभी कोई सत्यकाम
जीता था सर्वोच्च न्यायालय से
लोकहित का कोई मुकद्दमा
तीस बरस में अनुपम धीरज के बाद
!

घिस गई थी निब
-कलम भी,
कलम जो किताबें लिख सकती थीं,
लगातार लिखती रही थीं रिट
-पिटीशन.

घिस गए थे जूतों के तल्ले
धंस गए थे गाल
!

किला फतह करके वह निकला ही था कचहरी से
दोस्तों को बतायेगा
-
जीत गए थे सारे सत्यमेव
- जयते
पहला ही नंबर घुमाया था
विस्फोट के ऐन एक मिनिट पहले
.

अहिंसा परमो धर्म
: गाती थी बिल्ली
अस्सी चूहे खाकर हज को जाती
.

अहिंसा परमो धर्म
:
बगुला कहता था मछली से,
परमाणु बम कहता था नागासाकी से
विस्फोट के ऐन एक मिनिट पहले
!

क्या ईश्वर है अहिंसा?
डुगडुगी बजती रहती है
बस उसके नाम की
पर वह दिखाई नहीं देती
!

मंदिर के ऊंचे कंगूरे ने
मस्जिद की गुम्बद से पूछा
सहम के
विस्फोट के ऐन एक मिनिट पहले
.

                   खुद क्या मैं कम ऐसी-वैसी हूँ?
मेरा सत्यानाश हो,
मैं ही कीकर हूँ,चिड़िया,नदी,और पर्वत,
बिच्छू और मंजरी
-समेत
एक धरती हूँ पूरी
-की-पूरी,

मैं ही हूँ धरती की जिद्दी धमक
-
'क्यों
-कैसे-'हाँ-ना' से पूरी हुई रस्सी!
और मुई रस्सी के बारे में कौन नहीं जानता
-
रस्सी जो जल भी गई तो
बलखाना नहीं छोडती
!
 
कुछ तो

कुछ तो हो !
कोई पत्ता तो कहीं डोले
कोई तो बात होनी चाहिए अब जिन्दगी में
बोलने मैं समझने
- जैसी कोई बात ,
चलने में पहुँचने
- जैसी
करने में हो जाने
- जैसी कोई तरंग

या मौला, क्या हो रहा है यह
ओंठ चल रहे हैं लगातार
शब्द से अर्थ खेलते हैं कुट्टी
-कुट्टी
पर बात कहीं भी नहीं पहुँच पाती
.

जो देखो वो है सवार
कोई किसी के कंधे पर
कोई ऐन आपके ही सिर
सब हैं सवार
सब जा रहे हैं कहीं न कहीं
कहीं बिना पहुंचे हुए
!

जैसे कि ज़ार निकोलाई ने
ज़ारी किया हो कोई फरमान
.

जो भी किसान दे नहीं पाए हैं लगान
जाएँ वहां न जाने कहाँ
लायें उसे न जाने किसे
.

क्या लाने निकले थे घर से हम भूल गए
कुट्टी
-कुट्टी खेलते से  मिले हमको
मिट्टी से पेटेंटिड बीज
!
वहीँ कहीं मिट्टी में
मिट्टी
-मिट्टी से हुए सब अरमान

होरियों ने गोदान के पहले
कर दिया आत्मदान
आत्महत्या एक हत्या ही थी
धारावाहिक
!
सुदूर पश्चिम से चल रहे थे अगिन बाण
:
ईश्वर
-से अदृश्य
हर जगह है ट्रैफिक जैम
सड़कों से टूट गया है
अपने सारे ठिकानों का वास्ता
.

सदियों से बिलकुल खराब पड़े
घर के बुज़ुर्ग लैंडलाइन की तरह
हम भी दे देते हैं गलत
-सलत सिग्नल

कोई भी नंबर लगाए
कहीं दूर से
तो आते हैं हमसे
सर्वदा ही व्यस्त होने  के
कातर और झूठे संदेशे
!

काहे की व्यस्तता
!
कुछ तो नहीं होता
पर रिसीवर ऑफ हो
या कि टूट गया हो बिज़ी कनेक्शन
सार्वजानिक बक्से से
तो ऐसा होता है, है न
-
लगातार आते हैं व्यस्त होने के गलत सिग्नल

कुछ तो हो
!
कोई पत्ता तो कहीं डोले
!
कोई तो बात होनी चाहिए जिन्दगी में अब
!
बोलने में समझने
- जैसे कोई बात!
चलने में पहुँचने
- जैसी
करने में कुछ हो जाने
-जैसी तरंग!

_________________________________
पेंटिग : ANAND-PANCHAL
इन कविताएँ को अनामिका जी से लेने और टंकित करके समालोचन तक भेजने में अपर्णा मनोज, लीना मल्होत्रा राव. सईद अयूब का सहयोग है

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  1. अच्छी,मार्मिक कवितायें !! अनामिका जी को बधाई !

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  2. अनामिका जी को पढ़ना / सुनना अपने में खुद ही एक कविता है - अभूतपूर्व सी कविता !

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  3. अनामिका की कविताओं में उनका देशज मुहावरा और लोकगीतों की बयानगी अलग तरह का असर पैदा करती है। मानवीय रिश्‍तों में आए बदलाव और स्‍त्री जीवन की विडंबनाओं को वे जिस आत्‍मीय लहजे में उभारती हैं, यऐसी कविताएं दूर तक पीछा करती हैं।

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  4. अनामिका जी को पढ़ना -सुनना सच ही एक कविता है . उनकी कविताओं में लोक जीवन शहर के साथ ताल-मेल बैठाता रच-बस गया है . गरज कि वहां दादी-नानी मिल जायेंगी , चरखा होगा .. गाँव की नदी होगी..स्मृतियों के कशमकश में आपको बचपन भी मिल जाएगा ..कुट्टी-कुट्टी खेलता. एक बड़ी होती लड़की होगी,,उसकी पीर होगी पर अपने अलग ही मुहावरे में संघर्ष करती .
    अरुण का आभार अनामिका जी की इन कविताओं के लिए .
    समालोचन में कविताओं के साथ चित्र भी बोलते हैं ... ऑनर किलिंग कविता के साथ लगे चित्र की फिरकियाँ ..

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  5. अनामिका हिंदी कविता में अपना खास ठिकाना बना चुकी हैं. ये कविताएं उनकी पहचान के अनुरूप हैं, विषय, मुहावरे और ट्रीटमेंट, तीनों के लिहाज़ से. मीरा बाई के बहाने आज के यथार्थ को उन्होंने बड़े कौशल से उकेरा है. खाप-कुसंस्कृति पर तो पहली कुछ पंक्तियों में ही वह एक विशिष्ट माहौल निर्मित कर देती हैं. सभी कविताएं मन को छू लेने वाली हैं. उन्हें बधाई.

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  6. अच्छी कविताएँ. समालोचन का आभार!

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  7. शहर की मध्यमवर्गीय स्त्री की पीड़ा हो या गाँव की दुखियारी गरीब स्त्री की व्यथा ..... उन्हें सहज और आत्मीय रूप से अनामिका जी अपनी कविता में उकेर देतीं हैं ...बहुत ही हृदयस्पर्शी और मार्मिक अभिव्यक्ति !!!

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  8. अनामिका जी की कविताएं मुझे बेहद प्रिय हैं। उनकी कविताओं में ठेठ देसज बिंब और शब्‍द इतनी सहजता से चले आते हैं कि हमारी लोक-चेतस मानसिकता का अंग बन जाते हैं और आधुनिकता के साथ परंपरा का ऐसा सुंदर समन्‍वय होता है कि बहुधा चकित करती है उनकी कविताएं। यहां भी मीरा और लोकगीतों की श्रेष्‍ठ परंपरा से वे आज के यथार्थ को पूरी शिद्दत से रच रही हैं। इन कविताओं के लिए आभार।

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  9. namak dukh hai dharti ka aur uska swad bhi........bemisaal

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  10. sarita sharma13/5/12, 3:09 pm

    अनामिकाजी ने औरत की राजमर्रा की जिंदगी से बिम्ब उठाकर उन्हें 'साधारण वस्तुओं की असाधारण ताकत' बना कर कविताओं में ढाल दिया है.जिन बातों के लिए औरत को हेय माना जाया है,यहाँ उन्हीं से सशक्त विमर्श उभरा है.

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  11. पहली बार पढ़ी अनामिका जी की कविताएं.....मुरीद हो गयी हूँ उनकी.....वाह वाह वाह....शुक्रिया अरुण जी और आपकी टीम का भी बहुत बहुत शुक्रिया अनामिका जी को पढ़वाने के लिए.....

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  12. अनामिका जी की कविताएँ एक अलग लोक में ले जाती हैं.. कई बार मैं उनके विषयों की विविधता और उनके गहन अध्ययन को लेकर हतप्रभ रह जाती हूँ..अंग्रेजी साहित्य तो उनका विषय रहा है और हिंदी में वह लिखती हैं.. देशज बिम्ब, लोक कथाएं, लोक गीत , मिथक, और उनकी कविताओं को समृद्ध करते हैं..उनकी कविताएँ मुझे बेहद पसंद हैं और मैं इन्हें कई कई बार पढ़ चुकी हूँ.. हार्दिक आभार अरुण जी.. मेंहनत तो अपर्णा जी ने ही कि है लेकिन वह क्रेडिट को भी बाँट लेती हैं.. ये तो उनकी सदाशयता ही है..

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  13. अनामिका जी की रचनायें उनकी दूरदृष्टि को दर्शाती हैं।

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  14. Anamika Ji Ki Kavitein Pdhwane K Liye Shukriya Arun Ji. Bahut Achchi Kavitaein.

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  15. Anju Sharma14/5/12, 6:21 pm

    इनमें से कुछ कवितायेँ उनसे सुनी हैं और कुछ पढ़ी हैं, हर बार जादू सर चढ़के बोलता है....अनामिका जी के पास मानो खजाने से भरा एक पिटारा है, जब भी खोलती हैं कविता कुछ और अलंकृत हो जाती है, एक करिश्माई व्यक्तित्व की करिश्माई अभिव्यक्ति.......शुक्रिया अरुण जी, समालोचन

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  16. Rashmi Bhardwaj14/5/12, 9:13 pm

    जी की कवितायें जादू बुनती हैं , कहीं मिट्टी की गंध से पगी, तो कहीं देश काल की सीमाओं को तोड़ती कुछ नए आयाम छूती , बेहद ताज़ा बिम्ब जिनसे गुजरना मन में भी अनोखी ताजगी भर देता है ..... उनके अद्भुत रचना संसार में जब भी उतरती हूँ , कुछ नए चमकीले मोती मिल जाते हैं हर बार ... बहुत आभार आपका इतनी सुंदर रचनाएँ पढ़वाने के लिए ....

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  17. अनामिका जी को जब भी पढ़ता हूँ, उनसे अपनी पहली मुलाक़ात याद आ जाती है. जे.एन.यू. में सन २००० में एक छोटी सी काव्य गोष्ठी में भाग लेने आयीं थीं. मैंने उनकी बहुत सारी कविताएँ पहले से पढ़ रखी थीं और उनके बारे में काफी कुछ सुन रखा था. इसलिए मन में बहुत उत्सुकता थी उनको देखने और सुनने की. मिलने की भी एक दबी दबी सी इच्छा थी पर दबी दबी सी...क्योंकि डर था कि कहाँ इतनी बड़ी कवयित्री और कहाँ हम जैसे छात्र. परन्तु गोष्ठी के समापन के उपरान्त अनामिका जी जिस स्नेह से हम लोगों से मिलीं, उसने उनकी कविताओं (जिन्हें हमने थोड़ी देर पहले सुना था, 'चुटपुटिया बटन' इत्यादि) के प्रभाव को कई गुना बढ़ा दिया.

    समालोचन में प्रकाशित उनकी कविताओं में से कुछ को उनके मुख से सुनने का अवसर मिला है. अनामिका जी को पढ़ा जाए या सुना जाए, दोनों ही स्थितियों में उनकी कविताएँ हमको, हमारे वर्तमान से बहाकर कहीं दूर ले जाती हैं जहाँ 'अनब्याही औरतें' रहती हैं, जहाँ 'प्रेम के लिए फाँसी' मिलती है, जहाँ एक 'पूर्ण ग्रहण' होता है और 'नमक' की बातचीत होती है, जहाँ एक 'विस्फोट' के बाद भी 'कुछ तो...' बचता है. कोई कह सकता है कि ये सब तो हमारा वर्तमान है, किंतु दिल्ली के एक फ्लैट में बैठकर जब मैं यह सब लिख रहा हूँ, यह मेरा वर्तमान नहीं है. मैं अनामिका जी की कविताओं जैसी रचनाओं से ही वहाँ पहुँच सकता हूँ. अनामिका जी की कविताएँ, उनका प्रेरक और स्नेहिल व्यक्तित्व, और उनके कविता पाठ का ढ़ंग, उनकी रचनाओं में आए ताज़ा-टटके देशज-विदेशज विंब, रचनाओं की भाषा और शैली, उनका विस्तृत अध्ययन आदि आदि, उन्हें हिंदी के बेहतरीन कवियों में से एक में शामिल करते हैं और ऐसे बेहतरीन कवि की कुछ ताज़ा कविताएँ पढ़वाने के लिए समालोचन और अरुण भाई का बहतु बहुत आभार. समालोचन एक बेहतरीन आनलाइन पत्रिका बन चुकी है. अब यह लगातार तरक्की करती रहे, यही शुभकामनाएँ हैं.

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  18. मनमोहन सरल15/5/12, 6:55 pm

    samalochan ka ank sahsa khul gaya, anamika ji ki kavitayen ek sans
    men padh dalin unhe aur aapko badhai. mitra rakesh shreemal ke upanyas
    ke 4 ansh bhi padhe, dheerendra hi nahin kai mitron ka antarang jikr
    hai usmen, any bhi smay nikaal kar pdhoonga.

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  19. अनामिका जी की कविताएं जब भी पढ़ी हमेशा अपनी ही बात सी महसूस हुई। उनकी कविताओं मे घर से, अपने समाज से जुड़ी सभी आमो-खास भावनाओं के प्रतीकात्मक बिम्ब होते हैं। उनकी अभिव्यंजना बहुत सशक्त होती है। अनामिका एक बड़ी कवयित्री का नाम भर नहीं है, स्वयं एक कविता है। उन्हे पढ़ना, उन्हे सुनना मुझे बेहद प्रिय हैं। अरुण देव जी ने सदैव अच्छा साहित्य उपलब्ध करवाने का प्रयास किया है। समालोचन का हार्दिक आभार।

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  20. अनाम13/8/12, 4:10 pm

    आदरणीय अनामिका जी को पढना..सुनना,सौभाग्य है .आपकी रचनाएँ बेहद गहन हैं साथ ही बेहद सरल भी ....

    सादर

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  21. अनामिका जी को पढ़ना सुखद लगा ,हार्दिक आभार

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  22. अनामिका जी ! आपको पढ़ना सुखकर लगा . नमक और पूर्ण ग्रहण ने तो बार-बार पढ़ने के लिए उकसाया. भावों से परिपूर्ण ,प्रेरक,बिम्बों का कमाल,सरल और सशक्त और कितना कहूँ ?
    मन को बहुत भाया .बधाई . --गोपाल सिंह गुंजन

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  23. कुछ नया पढा काफी समय बाद ......आभार

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  24. अनामिका मैम की कविताएँ की अभिव्यक्ति से स्वयं को जुड़ा महसूस करती हूँ| आपकी कविताएँ जितनी बार पढ़ती हूँ, उतनी बार आप से बहनापा लगता है| क्योंकि आप जिस परिवेश की पृष्ठभूमि को केंद्र में लेकर रचनाएँ लिखती हैं, उसी परिवेश से मैं भी हूँ| जहाँ आज भी स्त्री होने से पहले आप किसी परिवार की इज्जत, मान-मर्यादा हैं| स्वयं से पहले केवल बेटी, पत्नी और माँ की ही भूमिका आपको सौंपी गई है जो परिवार और समाज द्वारा दी गई हैं| किंतु आज इस परिवेश की स्त्रियाँ, बेटियां समाज में अपने अस्तित्व के लिए कदम से कदम बढ़ा रहीं हैं| आपकी रचनाएँ प्रेरणास्रोत्र है|जो नित नए ज्ञान प्रदान करती है|

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