कथा - गाथा : विपिन चौधरी

Posted by arun dev on नवंबर 12, 2011













विपिन चौधरी ::
कहानीकार, कवयित्री
जन्म - २ अप्रैल १९७६, भिवानी (हरियाणा)जिले के खरकड़ी- माखवान गाँव में 
शिक्षा बी. एससी., ऍम..(लोक प्रकाशन) 

दो कविता संग्रह व कुछ कहानियाँ व लेख विभिन्न पत्रिकाओं और नेट पत्रिकाओं में प्रकाशित.
रेडियो के लिये नियमित तौर पर लेखन

सम्प्रति- मानव अधिकारों को समर्पित स्वयं सेवी संस्था का संचालन
ई पता : vipin.choudhary7@gmail.com


विपिन ने इस कहानी में युवा स्त्री की आकंक्षा, उसके संघर्ष और उसके कच्चे मन पर प्रभाव कुप्रभाव को देखा है. मध्यवर्गीय परिवार की सत्ता की विडम्बना और अवसरवादिता का एक कथात्मक रूपांतरण.

  ऑक्टोपस    



















लडकी त बताह भ गेल छय
माँ मेरी लगातार की बकछक से परेशान हो, आखिर में बोल ही पडी.
पिताजी सप्ताह भर के लि टूर पर भुवनेश्वर गए हुए थे. माँ को ही अपने दिल्ली प्रवास, अपने आफिस और अपनी अज़ीज रूनझुन दीदी से जुडे अड्गम-बडगम किस्से कहानियाँ सुनाने के लिये कमर कस ली मैनें.
माँ इस समय रसोई मे चली गयी है नाश्ता तैयार करने, तो मैं भी माँ का पल्लू थामे रसोईघर की शेल्फ पर जा बैठी.
यह कोई जगह है बैठने की, सामने डायनिंग पर बैठो. माँ ने कुछ- कुछ फरमानी आदेश को अपनी भारी आवाज में घोलते हुये कहा.
ना, वहां से मेरी बाते साफ़ नहीं सुनाई देंगी तुम्हे, मैं तो यहीं बैठूगी तुम्हारे पास.
इस बार माँ ने कोई जवाब नहीं दिया. उनका पूरा ध्यान पूरियां तलने मे लगा था.

माँ के  तेज़ तर्रार स्वभाव के कारण मैं अक्सर अपनी मस्त-मौला हरकते उनके सामने करने से झिझकती रही हूँ और अब २6 साल की उम्र में तो मेरा बचपना उन्हें मूर्खता से भरा मसखरापन लगने लगा है. वैसे  बचपन से ही मुझे पिता की लाडली बिटिया का खिताब दिया जा चुका हैं. माँ और पिताजी के मिजाज़ में जमीन-आसमान जितना अंतर रहा है. माँ जितनी मुहफट, पिताजी उतने ही शांत और मैं उसी धीर-गंभीर, शांत शर्मीले पिता की सरचढी बेटी. जब भी पिताजी आस-पास होते तो मैं चहकती तितली बनी रहती और माँ के सख्त अनुशासन के पिटारे में आते ही, मैं डिबिया सी बंद हो जाती.
इस सिलसिले की उम्र काफी पुरानी रही है. पर न जाने क्यों आज माँ वह पहले वाला झागदार गुस्सा नहीं दिखा रही. शायद इस बार मैं पूरे एक साल बाद अपने घर आई हूँ इसीलिये या शायद इस बीच माँ का हिटलरी अनुशासान कुछ ढीला पड़ गया है.

अब घर में छोटा भाई संजू ही तो रह गया है और  उस पर तो माँ का प्यार बिन मौसम बरसात की तरह बरसता है. राजीव भैया भी कुछ महीने पहले विदेश चले गए और इधर मेरी भी दिल्ली में नौकरी लग गयी. बिछडे सभी बारी-बारी वाली स्थिति बन गयी थी घर में पिछले कुछ अर्सा पहले.

बचपन मे जब हम तीनों बहन-भाईयों की घनघोर पानीपती लडाईयाँ होती, तब हम लगभग-लगभग एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते. आपसी गुथम गुथा में मेरे लम्बे तराशे हुए नाखून कब छोटे सजू के गले, चेहरे और हाथों पर लग जाते पता ही नहीं चलता. वह चिल्ला चिल्ला कर माँ को आवाज लगता. वहां मौजूद उषा मौसी हमेशा कहा करती अरे बच्चों इतना मत लड़ो जब एक दूसरे से दूर हो जाओगे तो याद करोगे बचपन के इन अनमोल दिनों को.

सचमुच, वे अनमोल दिन उडते पक्षी अपने साथ ले गए और कहीं दूर दराज की सुनसान बस्तियों में छोड़ आये. आज रह रह कर उषा मौसी की वो बात बार- बार याद आ रही हैं.


दूरी, गुजरे दिनों को बहुत नज़दीक ले आती है. विदेश गए राजीव भाई की याद आज इस वाक्य को पत्थर की तरह पुख्ता कर रही है. लिविंग रूम में पुराने फ्रेम मे लगी हम तीनों बहन-भाईयों की खिलखिलाती तस्वीर देख कर मन देर तक ना छटने वाली गहरी उदासी मे डूबता चला गया.
पहले सारे दिन एक जैसे ही रंग में रंगें लगते थे. अब घर से दूर होने पर इन दिनों के पेट में ऐसे वट पडने लगे है कि हर नया  दिन नये रंग की कामना करता है. कई बार तो अपने उन पुराने जीए हुये दिनों को पहचानना तक मुश्किल हो जाता है जो कभी हमारे कंधे के ऊपर से गुजरे थे और आज नितांत अजनबी रूप धर आमने सामने है. इस हाल में इन दिनों की पड़ताल मुश्किल हो गयी ह और इस बार तो मुझे अपने ही घर को चिन्हित करना कठिन लगा था . पूरे घर के चारों कोने का जैसे काया-पलट ही हो गया है.

यह वो घर नहीं था जिसे मैं पिछले साल छोड़ कर गयी थी.
सीमेंट का ग्रे फ्रर्स, मार्बल के खूबसूरत चैंधयाते सफ़ेद आँगन मे तब्दील हो गया है. पुरानी रसोई की जगह मोड्यूलर रसोई अपनी कमर कस कर खडी नज़र आ रही है. पुराने स्नानघर का विदेशी संस्करण मेरे सामने  है  और पीछे वाले छोट बगीचे की जगह तीन बडे-बडे कमरे बनवा दिये गए हैं. और सब तो अच्छा लगा था पर घर के पीछे का नज़ारा देखते ही मैं सन्न से रह गयी कहाँ  गायब हो गए मेरे सारे पेड़-पौधे ? मेरी रात की रानी, चंपा, चमेली और गुलमोहर का लहलहाता हुआ वह हरियाला अलमस्त पेड़. जिस बगीचे में देर रात तक टहलते हुए, ”ठंडी हवाएं लहरा के आये“  गुनगुनाया करती थी और मन ही मन अपने ही ख्यालों में शरमाया करती . मेहँदी  के पत्तों को पीस कर रात को सोते हुए अपने हाथों पर दादी से महेंदी लगवाती और जब नन्हा संजू बेर के पेड़ को झकझोर कर सारे बेर नीचे गिरा देता था तो मैं उन्हें अपने फ्राक में समेट लिया करती थी.

पर अब उन धुंधली यादों को मेरी स्मृतियों को छोडकर बाकी के पूरे बगीचे का सफाया हो चुका हैं.
माय गुड नेस यह क्याआँगन  पर नज़र पड़ते ही  मेरे भीतर रुलाई की दर्दभरी फुहार फूट पडी.
बेटा कल को तेरे राजीव भाईया की शादी होगी, घर मे मेहमान आयेंगे, नई भाभी आयेगी. घर में कुछ और कमरे तो चाहियें न, परसों पापा ने मेरे चेहरे के उडे-उडे रंग को देखकर कहाँ. पापा का यह सहज और पारम्परिक उतर मुझें जरा भी अच्छा नहीं लगा. वे जानते थे कि मुझे अपने छोटे से बाग़ से कितना लगाव था. फ़ोन पर भी अपने घर के इन पौधों की खोज- खबर लेना मेरी आदत में शुमार हो गया था.

पत्झर के झरते पत्तों का हिसाब किताब और बसंत में नये फूल-पत्तों की जनगणना का पूरा लेखा जोखा मुझें अपने घर से कोसों दूर रह कर भी मैं अपने छोटे से बगीचें के बारे में मालूमात रहता.
पीछे आँगन में कपडे सुखाने आई माँ को पिताजी और मेरी बात का इलम हो गया था  शायद, तभी वह बोली, अब तो तू दिल्ली रहने लगी है. तेरे इन पौधों की देखभाल कौन करता. जब अपना अलग घर बनायेगी तो इससे भी बड़ा बागीचा बना लेना. पर माँ की यह दिवास्वप्नी तसल्ली बिना सुकून दिए खाली चली गयी.
एकबारगी मुझे लगा मेरा बगीचा भी संसार भर की तरह साफ़ हो गया है.
मन बहुत उदास रहा उस दिन.

बेटा, अबकी बार जल्दी आना घर तेरे भैया भी राखी को आ रहे हैं
अरे वाह, यह तो बहुत अच्छी खबर है. अच्छा माँ, यदि भैया अमेरिका से किसी लिंडा-विंडा को तुम्हारी बहू बना कर ले आया तो ?
अरी शुभ-शुभ बोल, कहते कहते माँ का चेहरा किसी अनजान भय से ग्रसित हो, कठोर हो गया
अचानक बात का सिरा मेरी ओर करते हुए माँ ने कहा तेरी रूनझुन दीदी शादी कब कर रही है.
लगता नहीं की दीदी कभी शादी करेगी भी.
क्यों भला, माँ और दादी दोनों अचरज भरे स्वरों में बोली.
उनसे शादी करने वाला लड़का भी तो उन्हीं की टक्कर का होना चाहियें.
हूँ माँ उचटती सी आवाज में बोली.
जिस तरह माँ मेरी शादी को लेकर चिंतित रहती है उससे मुझे कोफ़्त होने लगती है. पिताजी की बात दूसरी है, वो तो हमेशा से ही कूल-कूल रहें हैं. दादी का भी ठीक माँ जैसा ही फलसफा है.उनकी भी हर बात का अंतिम सिरा शादी पर ही आकर  ख़त्म होता है.
तीन दिन बाद पिताजी जब दौरे से लौटेंगे तब तक तो मैं दिल्ली वापिस लौट चुकी होंगी.
फ़ोन पर तो मैं सबको दीदी के बारे मे बताती आयी हूँ पर आमने-सामने बताने का मज़ा ही कुछ और है. पर मैं महसूस कर रही हूँ की माँ को मेरी बातों में तनिक भी बजा नहीं आ रहा था उल्टा वह  बडबडाने लगी है.
उफ़ आप लोगों से तो बात करना ही मुहाल है. मैं समझती हूँ माँ की परेशानी माँ, विशुद्ध घरेलू महिला है जो बकौल ममता कालियाँ पाव भर कददु से रायता बनानेके हुनर में माहिर हैं. नाते-रिश्तेदारों के बीच अपनी  पाक-कला और सुघङता की तारीफ सुनना उसे बेहद प्रिय है. इसके अतिरिक्त उसकी सबसे बडी दिक्कत तो यही है कि वह मुझे उस पारंपरिक साँचें में नहीं ढाल सकी, जिस में एक लडकी को ढाल दिया जाता है. यही कारण है की मैं अपने चचेरी, ममेरी, फूफेरी बहनों में अलग खडी नजर आती हूँ. माँ की लाख हिदायतों के बावजूद मैं ज़ोर ज़ोर से बोलती हूँ, फूहडता से हंसती हूँ, और घरेलू काम कामों में कभी कोई रूचि नहीं लेती, मुझें तो ठीक से सुई भी पकडनी नहीं आती और ना ही माँ की तरह  पाक-कला में निपुणता हासिल की है मैनें. इसके पीछे कुछ मेरी अरूचि और कुछ पिताजी का वरदहस्त शामिल रहा है , जब भी माँ सिलाई-कढाई के लिये ताना मार यह कहती, तेरे ससुराल वालें क्या कहेंगे कि इसकी माँ ने कुछ नहीं सिखाया तो
पिताजी मेरी साईड ले कर कहते

मेरी बेटी पढ-लिख कर मोटी तनख्वाह वाली नौकरी करेगी या सुई-धागें, चुल्हें चैक में अपनी आँखें फोडेगी‘. मेरी तो पौ बारह हो जाती पिताजी की शह पा कर. माँ अपनी बडी-बडी आँखों से अंगारे बरसाती, हम दोनों को देखती हुई रसोई का रूख करती.

आज, माँ मेरे रुनझुन दी के पुराण से आजि़ज आ चुकी है. कुछ भी नहीं जानती माँ. यह भी नहीं कि दीदी, मेरे भीतर घर ओक्टोपस की तरह घर कर चुकी है. कुछ भी हो  अब तक  मेरे संपर्क मे आये सभी लोगों मे से सिर्फ और सिर्फ दीदी ही ऐसी है जो मेरे लिये मायावी शक्ति बन कर उभरी है. दिल्ली से घर आते समय मैं रेलगाडी में भी पूरे वक्त बस दीदी की यादों में ही डूबती- उतरती रही.

कमाल का व्यक्तितव है दीदी का, पाँच फुट छह इंच का कद, छरहरा खूबसूरत शरीर, चश्में के पीछे से झाँकतीं गंभीर आँखें और हमेशा चिंतन-मनन करती चेहरे की महीन रेखाये. कुल मिला कर दीदी का तिलिस्म मेरे भीतर के किसी गहनतम इलाके में घर कर चुका है.

बिहार के मधुबनी जिले के कोईलख जैसे छोटे से गाँव मे जन्मी और पटना से एम बी ए कर, मै निम्मी  दिल्ली की किसी अच्छी कंपनी मे नौकरी की आस में दिल्ली पहुंची थी.

मुझ छुईमुई सी लडकी ने जैसे इस चलते फिरते महानगर के जरिये समूची दुनिया का  वतर्मान अपनी आँखों से बिना  किसी बाईस्कोप के  देख  लिया हो. बाद मे दीदी के परिपक्व साथ ने कई ढकी छुपी चीजों का खुलासा भी कर दिया था जिन से मैं अब तक अनजान थी. जो भी मैं जानना चाहती उन सारे प्रश्नों और जिज्ञासाओं का जवाब दीदी के पास होता.

रूनझुन दीदी, कपूरथला के सम्रद्ध परिवार की इकलौती बेटी थी नाज़ों से पली-बढ़ी.  जिसकी इक ही फरमाईश पर वह चीज़ तुरंत हाजि़र हो जाती. नौकरशाह पिताप्रिंसिपल माँ, बडे भाई पुलिस ऑफिसर इन तीनों की रूआबी ठसक का समीक्षण था दीदी के कड़क स्वाभाव में.

दीदी जरुरत से ज्यादा जिद्दी थी इस बात को मैंने कई बार  नोट भी किया था. उनके इस जिद्दीपन को उनकी ही एक मोहक अदा मानने लगी थी मैं. उनकी कही बात अंगद के पाँव की तरह अडिग होती जो अपनी जगह से टस से मस नहीं होती.  चंडीगढ़ से मॉस कॉम कर दिल्ली कैरियर बनाने आयी थी दीदी. शुरूआती दौर में थोडा बहुत हाथ-पाँव मारनें के बाद पिछले पाँच सालों में उन्होनें अपनें पाँव मजबूती से इस मैदान  में जमा लिये थे. अच्छी खासी तनख्वाह पाती दीदी और खूब ठाठ से  अपनी जीवन जीती, दुनियादारी की सभी परेशानियों से मुक्त होकर. उनके व्यकितत्व की आंच से आस पास के सभी लोग कुम्भलाये रहते.

मंडी हाऊस के वर्किंग वुमेन होस्टल से पिछले साल ही उन्होनें मयूर विहार के नये फैल्ट में शिफ्ट किया था, उन्हीं दिनो मेरी और दीदी की कॉमन सहेली के ज़रिये
हमारी मुलाकात हुई जो बाद में प्रगाढ दोस्ती में तबदील हो गई. अब हररोज़ हमारी टेलिफोन पर छोटी -बड़ी बातें होती, एक दिन भी ऐसा नहीं गुज़रता जब हमारे कानों ने एक दूसरे की आवाज़ ना सुनी हो. जिस पी,जी होस्टल में मैं रहती वहाँ की लडकियों को मेरी और दीदी की दोस्ती एक अजूबा लगती.  एक  तो  रुनझुन दीदी  और मेरी उम्र  में लगभग दस साल का फासला था और हमारे सामाजिक परिवेश मे भारी असमानता,
 क्हाँ नौकरी की तलाश मे मारी-मारी फिरती मैं और कहाँ एक प्रतिष्ठित  मिडिया हाऊस में ऊँचे पद पर आसीन दीदी. रुनझुन दीदी को लेकर मेरे हॉस्टल की लडकियाँ मज़ाक करते हुए  कहती,
निम्मी  अपनी गर्ल फ्रेंड से हमें कब मिलवा रही है.  पर मै हमेशा की तरह उन लड़कियों के हंसी मजाज़ को नज़रअंदाज कर दिया करती

अनिमेष से अपने प्रेम  की बात का खुलासा सिर्फ दीदी  के आगे ही किया था मैने. अपने होस्टल की लडकियों से कोई मन की बात शेयर करने का कोई मतलब नहीं था. अजीब घमचक्कर थी ये लड़कियां भी, आज़ादी का मतलब इनके लिए बिना किसी रोक टोक के जीना था जो इनके घर परिवेश में  कभी संभव नहीं होता. पहले परिवार वालो की पाबन्दी, फिर आने वाले भविष्य मे लगाई जाने वाली तमाम पबंदियों के बीच जीवन के इस छोटे से टुकडे को ये अपनी पसंद से जी लेना चाहती थी ये सभी . इनकी मानसिक बुनावट तो समझना कम से कम मेरे लिये तो टेडी खीर ही साबित हुआ था.  मोडर्न लड़कियों का  सिगरेट, शराब पीना और शाम को लम्बा टीका लगा कर मंदिर  जाना शुरूआती दौर में मुझे बेहद  अटपटा लगा था, पर मेरे सामने यही सच था. पारम्परिकता और आधुनिकता के बीच इन कन्याओं का अपना स्वाधीन था जिस के बीच कम से कम मैं तो नितांत अजनबी ही थीं. जिन लडकों के साथ ये लडकियाँ हर शाम घूमा करती उनके साथ भी इनकी कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई पडती. इन्हें अक्सर यह कहते सुना जाता कि
माँ-बाप किसी मालदार और हैडसम लडके को हमारे लिये ढूंढ लायेगें तो हम इसे छोड देगें. यह तो बस टाईम पास है. रिश्तों के प्रति   गंभीर  मुझ जैसी लडकी के लिये यह बेहद अचरज वाला मामला था.  यहीं होस्टल के माहौल में रहते हुये समाज और लडकियों के बारें में स्थापित कई पुरानी सोच और मान्यताओं को बदलते हुए देखा मैनें.

इसी से चिपके रहने को कोई इरादा नहीं है हमारा, वे लगभग उदघोष करते हुये कहती. कई लडकियों के साथ तो हर शाम उसी होटल में किसी नये लडके के साथ डिनर कर रही होती. हैव फन इनका मूल-मंत्र था  पर सब लड़कियां इस ढर्रें पर चलने वाली नहीं थी कुछ एक तो सामान्य से अधिक परम्परागत, कुछ हद तक अन्धविश्वासी भी थी जिनसे बात करते हुए भी दस बार सोचना पडता की कहीं कोई शब्द या मेरी हरकत से इन्हें किसी अपशगुन का भान न लगने लगे .
घर के बंद माहौल से महानगर के खुले माहौल में आना और बिना किसी टोक-टाक के स्वछन्द रहना इन सब को बेहद भाता यहाँ तक कि बार-त्योहार में भी इनका मन अपने गाँव घर जाने का नहीं करता क्योंकि घर की वही मनाही और पाबंदियाँ इन्हें अपने पाँव में ज़जीर की तरह लगने लगी थी अब.

आधुनिक जीवन के सारे नये फंडे इनकें पास थे और सिर्फ ब्वाय फैंड का ना होना ही इनके लिये पिछडेपन का चिन्ह था. शादी, फैश्न, मूवी के अलावा इन लडकियों के पास कोई  चौथा विषय नहीं था.
मेरी अभिरूचि बहुत-कुछ दीदी से मिलती जुलती थी. जब मैं दीदी के बारें में उन सब को बताती तो वे मुझ पर ही छींटाकशीं करती, भई हमें तेरी दीदी की तरह साधू-संत नहीं बनाना है, इस छोटी सी जिन्दगी मे हमें ऐश करनी हैं. मुझ पर इन लडकियों  की बातें नागवार गुज़रती. तब लगता कि बस दीदी ही हैं जिनसे  मेरी विचारधारा  मिलती है. जल्दी से किसी से बात ना करना, अपने में ही सिमटे रहना और सबसे बडा शौक जो हम दोनों को था, वह था चित्रकारी, रंगमंच, संगीत और किताबों का. दीदी के साथ दिल्ली के सभी पुस्तकालयों के चक्कर लगाती मैं इस नये-नये माहौल का आनंद उठा रही थी.

जब इक दिन दीदी ने अपनें फलैट में आने का प्रस्ताव रखा तो मैं भीतर ही भीतर  तो खुश हुई कि अब  दीदी का पूरा सान्निध्य मिलेगा पर मैं जानती थी माँ जरूर इस विषय में आना-कानी करेगी. ऐसा हुआ भी, माँ ने काफी विरोध किया और उसी मुद्दे  पर किया जिस का मुझें अंदेशा था.
यह लडकी क्या नाम है इसका झुनमुन जुन्गुन, नाम भी पता नहीं क्या क्या रख लेते है लोगपता नहीं कौन से ठौर-ठिकानई से आई है, पैतिस साल की लडकी और कुँवारी ? माँ के हलक से यह बात नीचें ही नहीं उतरती थी, इसके घरवालों के आँखों पर पट्टी बंधी है क्या उनहें दिखाई नहीं देता कि उनकी लडकी की शादी की उमर निकली जा रही है, पूरी उम्र, अकेली कैसी रहेगी यह, इस जालिम दुनिया-ज़हान में. माँ के पीछे-पीछे दादी भी माँ के सुर में सुर मिलाती.
‘’अकेली लडकी को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता हमारे समाज में’’
.पिता हमेशा की तरह अपना अलग नज़रिया रखते. उनका इस पर एक ही वाक्य होता
लडकी समझदार है, अपना भला-बुरा सब जानती है और सबसे बडी बात है कि अपनें पाँवों पर खडी है.

सचमुच, दीदी का प्रखर व्यक्तित्व मुझे ही नही, सबको एक सम्मोहन में बाँध लेता है.  दिन-रात किताबों और अपनें प्रोजेक्ट में ढूबी रहने वाले दीदी के पास मज़ाल है कि कोई सिरफिरा फटक तक जाये. शादी के बारे में दीदी के विचार पारंपरिक लडकियों की तरह नहीं थे और  पारंम्परिक मैरीज के तो वह सख्त खिलाफ थी. दीदी के परिवार वालों ने कभी उन्हें शादी के लिये मजबूर नहीं किया था. और उनकी किसी विचारधारा का कभी विरोध नहीं किया. हर चीज़ में दीदी के फसलौ को तवज़ीह दी, जिसमें पढाई, नौकरी और शादी ना करने का अटल फैसला भी शामिल था.इस पर केवल मैं ही नहीं, सभी अपने घर परिवार वालो की रुढिगत मानसिकता को याद करते हुए दीदी से रश्क किया करते. मैं भी अकसर उस घडी का खयाल कर डर जाती, जिस घडी मैं अनिमेष से अपने प्रेम की बात अपने घर वालों को बताऊँगी.

ढेरों बातचीत के दौरान भी हमारे खिलखिलानें के मौके कम ही आते. अक्सर दीदी बेहद गंभीर रहा करती, जिससे खुद ब खुद एक घेरा उनके अभेद घेरा उनकें आस पास बना रहता. कभी-कभी मन करता कि दीदी के मौन घेरे में सेध लगा कर उनकें मन की बारीक भावनाओं के बारे मे पूँछू. पर लाख चाहनें पर भी कभी ऐसा करने का साहस ना जुटा सकी थी मैं.

नारी विमर्श  पर दीदी की अच्छी पकड थी. डी एन ए, फ्रटलाईन से लेकर हिन्दू सहित कई राष्ट्रीय अखबारों में  दीदी के लेख नियमित तौर पर  छपते और लगभग हर दूसरे तीसरे  महीने  दीदी की किसी राष्ट्रीय  और अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में भागीदारी होती. कभी वह मुझे भी अपने साथ भी ले जाती. तब उन लोगों को नजदीक से देखना और उनसे बात करना, जिन्हें अब तक मैं केवल टेलिविज़न और अखबारों में ही देखती आई थी, अच्छा लगता. फ़ोन पर चहक-चहक कर पिताजी को इस सब की जानकारी देते वक्त, मेरी खुशी का पारावार न रहता.

कभी-कभी मेरे मन में भी दीदी की तरह ही एंकाकी और अध्यनशील जीवन जीनें का ख्याल आता, मन होता की अनिमेष से जीवन भर केवल स्नेहिल दोस्ती रहे पर जिस पारिवारिक माहौल में मेरी परवरिश हुई थी  वहाँ ऐसा होना कतई सम्भव नहीं था, यह सिर्फ  खामख्याली ही थी. शादी, ससुराल मेरे जीवन का अकाटय सत्य था.  सब ठीक चल रहा था बल्कि उम्मीद से कहीं ज्यादा अच्छा. मैं ऊँची उडान के पंखो पर सवार थी की अचानक से मेरी ऊँची उड़ान पर किसी की काली नज़र लग गयी. यह नजर किसी और की नहीं थी बल्कि  मेरे घर वालो की ही थी, जिन्हे अपनी लडकी को किसी खूंटे पर मजबूती से बंधना ही था.

कहर कुछ इस तरह टूटा कि एक दिन सुबह-सवेरे ही पिताजी ने फ़ोन पर अपने आने की इतला देते हुए कहा,
 निम्मी बेटा मैं दिल्ली आ रहा हूँ तेरी शादी के लिये एक लडका ठीक किया है हमने. वह दिल्ली मे एक बड़ी फर्म में अच्छे पद पर है.
सुनते ही मैं जैसे पहाड़ से नीचें गिरी. पापा इस तरह अचानक यह फरमान सुना देंगें मुझे यह यकीन नहीं हो रहा था जब्कि पापा अब तक स्वयं ही यह कहते आये थे कि शादी के मसले पर पहले मेरी राज़ामंदी होगी और अब कह रहे हैं मैनें एक लडका से तुम्हारा रिश्ता पक्का करने का सोच लिया है. घोर अन्याय है यह, शाम को जब दीदी आई तब हम दोनों ने घरवालो के साथ-साथ समूची सामाजिक व्यवस्था को जम कर कोसा. अब क्या हो, दीदी कल एक वर्कशाप के लिये दोपहर को इलाहबाद जा रही है और पिताजी कल शाम को मेरे पास दिल्ली आ रहे है दो- तीन दिन यहीं दिल्ली में रुकेंगें.

कोई फैसला जल्द ही करना था मुझे. मैंने मन पक्का कर, पिताजी को अनिमेष के बारे में बताने का फैसला किया. बेचारा अनिमेष, जिस दिन उसे पिताजी की बात बताई उन दिन उसका जन्मदिन थावह पहले तो हिचकियाँ ले ले कर देर तक रोया, उस दिन  न ही उसने खाना खाया न ही सो पाया बस फोन का रिसिवर पकडे पकडे रोता रहा और मुझे ढाँढस बंधाता रहा. इधर मेरी भी हिचकियाँ पूरे उफान पर थी. अनिमेष, जिसके साथ म अपने भावी जीवन के सपनें देखने का जोखिम उठाने का सोच चुक्की थी,  बेहद गरीब परिवार का होनहार लडका था. वह हमारी दूर की रिश्तेदारी से भी जुडा हुआ था. और हमारे घर वालों से अनिमेष  की  पारिवारिक स्थिति छुपी नहीं थी.


पिछले पाँच साल से हम दोनों दो पँछियों की तरह अपना एक घोंसला बनाना चाह रहे थे. जिसके लिये शादी ही अगला पडाव होता और इसके लिये हम दोनों कोई मुक्मिल मुकाम तलाश रहे थे. पर इसके लिये अनिमेष पहले अपनें पैरों पर खडा होना चाहता था. जिस मुफलिसी  में अनिमेष कलक्ता में रह कर आई.ए.एस. की तैयारी में दिन-रात लगा रहता था यह बात मुझे  उससे और भी मजबूती से बाँध देती थी. पिछले दिनों ही उसने मुझे बताया की उसे जेब खर्च के लिये घर से सिर्फ एक हज़ार रूपये मिलते है और उसके पिताजी  भी हररोज़ नौकरी का दबाव बनाये रखते है. बार-बार एक ही बात कहते है कि सिर्फ इस साल का वक्त है यदि इस बार भी पास नहीं हुये तो गाँव आ कर दूसरो के खेतों में मजदूरी करना. मैं आगे से एक पैसा भा नहीं देने वाला हूँ तुझें.

सोचता हूँ पड़ोस के बच्चों को टयूशन पढ़ा कर कुछ पैसे बना लूँ. अनिमेंष चिंता के स्वर में कहता.
टयूशन पढाओगे तो अपने पढनें का समय कब निकालोगें,
मैं व्यग्र हो कहती.
समय किसका सगा हो सका है, जो मेरा होता. वह समय भी आया  जिस घडी  पिताजी दिल्ली आये और मैंनें अपने भीतर उठे तुफान को शांत कर पिताजी का सामना किया, वे मेरे होस्टल के पास ही एक गेस्ट हाऊस में रूके . डरते डरते  मैनें अनिमेष के बारे में पिताजी को बतानें के साहस करते हुये धीरे से अपना मुँह खोला और बिना रूके कहती चली गई. पिताजी मेरी बात अंत तक चुपचाप सुनते रहे. मैंने नजरे झुकाए हुये पिताजी के चेहरे को गौर से देखा. पिताजी के माथे पर पहली बार हल्की त्योरियां देखी, मैनें. कुछ पलों के बाद, चश्मा उतार कर नीचें रखते हुए वे बोले
 ‘मैं जानता हूँ कि तुम्हारी मम्मी इस रिश्ते के लिऐ बिलकुल तैयार नहीं होगी. फिर कुछ अंतराल के बाद   सधी आवाज़ में   बोले
तुम  अभी नादान हो धीरे-धीरे ही इन प्यार मोहब्बत की  चीज़ों से बाहर आया जाता है, होता है इस उम्र में यह सब. जिन्दगी का धरातल बहुत ढोस है उस पर मजबूती से एक एक कदम करना होता है. तुम अभी सपनों की दुनिया में ही जी रही हो तुम‘.
एक पल को लग रहा कि मेरे सामने कोई फि़ल्मी पिता बैठा है.

पिताजी, मैं इतनी तो समझदार हूँ ही की सपने और हकीकत में अंतर न समझ सकु. मैं कोई सोलह- सत्रह साल की मासूम लडकी तो नहीं हूँ. इस पर पिताजी ने दुसरा दाँव खेलते हुऐ बोला, सोच लो अनिमेष पता नहीं कब नौकरी लगेगा, यदि उससे शादी करोगी तो तुम्हें गाँव में रहना पडेगा ढोर-डंगरो को हाँकना होगा चूल्हा फूंकना होगा. उसके पूरे परिवार को मैं अच्छी तरह जानता हूँ. कोई पढा-लिखा नहीं है वहाँ, तुम उस परिवेश में नहीं रह पाओगी. शादी के लिये तुम्हारी यह उम्र  बिलकुल उचित  है इसके बाद जब कुछ और  साल निकल जायेंगे तो एक लडकी की सामान्य जिंदगी से तुम कई साल पीछे चली जाओगी. फिर तुम्हे अफ़सोस होगा. नहीं पापा मुझे गाँव में नहीं रहना पडेना
इस साल अनिमेष जरूर आईएस मेन में निकल जायेगा.

मुझें कुछ वक्त दीजिये पापा.
मम्मी को अभी कुछ मत बतायेगा इस बारें में, प्लीज पापा. ढेर सारी मिन्नतें करते हुये ऐसा लगा जैसे मुझ पर पापा की नन्ही बेटी का पुराना रूप लोैट आया है. पर पापा तो उसी फिल्मी पिता का रूप धरे ही बैठे रहे. आज किसी दूसरे ही इन्सान का आभास दे रहे हैं पापा मुझे.
उन्होनें मेरी बातों का कोई ज्वाब नहीं दिया, चुपचाप खडे रहे. जाने से पहले बस इतना ही कहा.
देख लो तुम्हारी अपनी जिंन्दगी है यह, बाद में कोई अफ़सोस न करना.
उनकें वापिस लौट जाने पर मुझें कुछ सुकून मिला. पिता का कहे गये आखिरी वाक्य का सिरा मुझे अपनें सपनों के साथ जुड़ता सा लगा.

पापा के सामने सारी बातें साफ कर देने से जैसे एक बडा भारी तूफान शांत हो गया था. पापा मुझें अच्छी तरह से समझते हैं, मेरी खुशियों पर वे अपनी इच्छाओं का मुल्लमा नहीं चढा सकते इसी उम्मीद को अपने साथ पा कर मैनें सुकून की सांस ली. दीदी भी तब तक इलाहबाद से लौट आयी थी, मैनें उन्हें सारा किस्सा सुनाया.
आश्चर्य, दीदी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं कीं. मैं दीदी से कुछ सुनना चाहती थी पर मैनें पाया कि दीदी से हर मसले पर ढेरों बातें होती चाहे वह हुसैन के बार में हो, बराक उबामा के जीतने के बारें में हो या देश विदेश की राजनीति के उथल पुथल  के बारें मे, हम दोनों बढ-चढ कर अपनी बात एक दूसरे के आगे रखते, पर न जानें क्यों

अनिमेष का जिक्र आते ही दीदी तटस्थ हो जाती. कभी-कभी मुझें लगता की दीदी नहीं चाहती कि मैं कभी प्रेम-मोहब्बत-शादी के झंझट में पडू, हाँ, शायद यही सच भी था. दीदी के सारे के सारे लेख तो शादी की इस पारंपरिक व्यवस्था पर प्रश्न -चिन्ह लगाते प्रतीत  होते थे. जब भारत कानून ने लिव-इन सम्बंधों पर स्वीकृति दे दी थी, तब हमारी इस विषय को लेकर काफि बहस हुई थी. शादी की सनातन व्यवस्था और स्त्री पुरूषो के नये बनते-बिगडते सम्बंधों की परिभाषा पर हम बातें करते. हमारा मानसिक स्तर काफि हद तक मिलता और यह सब मेरे घोर पढाकू होने की वज़ह से था कि मैं दीदी से इतने तर्क- वितर्क  कर पाती  थी.
उन दिनों मै आतम्विश्वास से लबरेज हो चली थी मेरा संकोची स्वभाव भी खुलने लगा था.  दीदी मुझे अपने साथ नामी-गिरामी लोगों की पार्टीयों में ले जाती जहाँ मीडिया, लेखक, आदि लोगों से  मुलाकात होती. इसी तरह मेरा सोशल सर्किल भी बडा होता गया, दीदी का प्रोत्साहन  पा मेरी कलम भी चलने लगी. कुछ सामाजिक लेख भी पत्र पत्रिकाओं मे छपे और सच में दीदी का साथ ना होता तो अनिमेष से विवाह  की बात पर मेरे घर का जो वातावरण उन दिनों बन गया था उसके चलते जीवन जीना दुश्वार हो जाता. इन सबके बावजूद दीदी अब एक अबूझ पहली बनती चली जा रही थी.
इधर पिता को कोईलख गए हुए एक दिन ही बिता था कि मानो मेरे घर मे प्रलय आ गया. हुआ यह कि मेरे मना करने के बावजुद पिताजी ने माँ को अनिमेष के बारे में सब बता दिया तब माँ एकदम से ज्वालामुखी बन कर मुझ पर आग उगलनें लगी.
तुमनें इतने साल पढाई के नाम पर हमें धोखा दिया.फोन का नम्बर बदल दो ताकि उस लडके से बातचीत बिलकुल बंद हो जाये.अपनी सहेलियों से बात मत करो वे तुम्हारा दिमाग खराब कर रही हैं.अलग कमरा ले रहो ताकि तुम्हारी उस दीदी से तुम्हारा साथ छुट जाए, उसके रंग ढंग और तौर तरीके तो मुझें पहले से ही पसंद नहीं थे. यह प्यार मोहबत की पोल पट्टी उसी ने तुम्हें सिखाई होगीं.
दीदी का नाम सुनते ही मैं एकदम से भड़क जाती. इन सबके बीच दीदी क्हाँ से आ गई. माँ, तुम भी कहाँ की बात को कहाँ ले आती हो. क्या मेरी शादी मेरी मर्जी से नहीं होनी चाहिये ?

नही, बच्चों की शादी उनके माँ बाप ही तय करते है.
अजीब तानाशाही है ?
उस दिन भरे गुस्से से मैनें फ़ोन काट दिया.
दिन बेहद भारी हो चले थे. इतने भारी की उनका बोझ ढोते-ढोते मेरे चेहरे पर
हरदम एक अजीब सी धकान मुझ पर तारी रहने लगी. कार्यक्रमों से लौट कर दीदी के प्रखर व्याख्यान, प्रवीन- शाकिर की गज़लें, ईबने इशा की नज़में कुछ भी मन को सुकून  देती  दिखाई नहीं पडती.
उधर माँ की हजारों हिदायतें, कडवी दवाई का काम करती.
इस बीच अचानक से बुरे मौसम ने करवट बदली और अच्छा वक्त सधे कदमों से
सीधें चलते चलते मेरे जीवन में प्रवेश कर गया.

अनिमेष का आई ए एस क्लियर हो गया, काफी अच्छे नंबरों से वह की सफल विद्यार्थियों की सूची में आ गया. इस बात की धमक सारे नाते रिश्तेदारों तक जा पहँुची तब मेरे घर वालों के भी कान खडे हो गये. सच तो यह था कि अब जो पद अनिमेष को मिलेगा उस तक पिताजी की पहुँच नहीं थी. पैसे के जोर पर अपनी ऐडी कितनी भी ऊँचीं कर ले वे पर अनिमेष के पद की कालर तक भी नहीं पहुँच सकते थे वे. इस बदली हुई स्थिति तक पहुँच कर पूरा का पूरा सामाजिक गणित आसानी से हल हो गया जो इतने दिनों से मेरे दामन के नज़दीक बूरी तरह से उलझा हुआ था.

इक भोर, माँ का रस घुला फोन आया.
मेरी गुडि़या रानी, जहाँ तू चाहेगी वहीं तेरी शादी होगी.
तेरे पिता आज ही अनिमेष के यहाँ जा रहे हैं.
मुझें यह भी माँ का नया प्रपंच लगा, लगा कि माँ कोई नया ज़ाल ना बिछा रही हो मुझें घर बुलाने के लिये .

अपने छोटे भाई संजू  से माँ के इस अक्समात ह्रदय परिवर्तन की पुष्टी की तो पता चला कि कल अनिमेष के दूर के मामा का हमारे घर आना हुआ, बातों ही बातों में उन्होनें अनिमेष की आई. ए. एस. में पास होनें की खबर भी दे डाली. यह सुन कर माँ की तो आँखे ही फैल गयी, आज तक हमारे तो क्या दूर दूर तक गाँव में कोई आई ए एस नहीं बना था. बस तभी माँ का भी मन पलटा, माँ ने अनिमेष से मेरी  शादी की प्रस्ताव रखा और जैसा की संम्भव था. अनिमेंष के परिवार वालों ने यह प्रस्ताव खुशी-खुशी स्वीकार कर  लिया. और  उसी वक्त मेरे हिस्से में दुख के आँसुओं का भंडार खत्म हो गया और  उसके बदले खुशियों की हजारों- हजार रंग बिरंगी पंखुडियों मेरे नज़दीक सिमट आई.

मैं बेहद खुश थी, अपनी खुशी में समस्त ब्रमांड को शामिल कर लेना चाहती थी और दीदी, दीदी तो मेरी खुशियों में शामिल होने वाली पहली प्राणी थी, पर दीदी थी क्हाँ? वह तो हमेशा की तरह अपने  नये सम्मेलन की तैयारी में सिर झुकाये, जुटी हुई थी.  उनका जॉब प्रोफाइल उनके लिये सबसे ऊपर था. कभी- कभी मैं उनके बारे में नये सिरे से सोचने को विवश हो जाती. क्या समाज में अपना रूतबा का ही सबसे उपर है आपसी प्रेम और मोह के मेल मुलाकाती रिश्तें कुछ भी नहीं ?

दीदी अपने परिवार वालों से भी नपी तुली बातें ही करती, वार-त्योहार सब दिल्ली में ही मनाती. शायद दुनियादारी के मशीनी तौर तरीको को दीदी ने अपने जीवन मे पूरी तरह से ढाल लिया था. तभी वह पूरी तरह से प्रक्टिकल इन्सान बन सकी थी. पिछले एक साल से जब से मैं उन्कें साथ रह रही हूँ. उनकें सभी काम काज की गवाह रही हूँ मैं. न जाने क्यों मैं दीदी की प्रैक्टिकल ऐप्रोच से चिढने लगी हूँ. उनके स्वभाव में जिस खुश्की को देख रही हू  आजकल मैं, वह मेरी लिये अजनबी सी है. इधर एक प्रश्न बार बार सामने आ कर परेशान करने लगा है कि क्यो दीदी सभी  से अपना एक निजी कोना हमेशा क्यों दबाये रखती है, यहाँ  तक की मुझसे भी.

इधर घर जा कर मुझें सब चीज़ें जमानी थी शादी की भारी भरकम तैयारी करनी थी. तय हुआ की मैं अपनी नौकरी जारी रखूंगी जब तक अनिमेष भी अपनी ट्रेनिंग पूरी कर लेगा. घर से शादी की खरीददारी की धकान ले कर मैं वापिस दिल्ली आयी, दीदी को शादी की तारीख बतायी पर उनकें चहरें पर बुझी सी हँसी उभरी और तुरंत ही वापिस लौट गयी. जब तक कि  वह बनावटी हँसी मुझ तक पहुँचती, दीदी एकदम सपाट आवाज में बोली, शादी नहीं अटैंड कर सकुँगीं मैं निम्मी. 21 को मुझे स्वीडन जाना है एक असाईनमेंट है वहां. कल शाम की फलाईट है पच्चीस को वापिस लौटूंगी वहाँ से.
तो दीदी ने साफ मना कर दिया मेरी खुशी में शरीक होने के लिये.
मैं दो अटैचीकेस  में अपना समान भर कर दीदी के फलैट से टैक्सी ले,  अमर कालोनी अपनी कुलीग सुरूचि के घर चली गई.
दो दिन सुरुचि  के घर पर ही रुकने का कार्यक्रम था. अगले महीनें उसका देहरादून ट्रान्सफर होना था. फिर पता नहीं कब हमारी अगली मुलाकात होगी. और सुरुचि अपने भाई की शादी के चलते वह मेरी शादी मे भी नहीं आ पायेगी.

दो दिन बाद जब सुरुचि अपनी कार से मुझे स्टेशन छोडने जा रही थी तब वहां से गुज़रते हुये मैनें रुनझुन दीदी के फलैट की तरफ झाँका तो देखा, बालकनी समेत, तीनों कमरों की लाईटें जगमगा रही है. तो क्या आज दीदी घर में ही हैं और मुझें स्वीडन जाने का झुठा बहाना बना कर चलता किया.

ओह, दीदी हर बार नए रूप मे क्यों आती हैं? दीदी का असली चेहरा कौन सा है, उनके इतने करीब होने की बाद भी एक अनदेखा कोना ऐसा क्यों है जहाँ किसी  के लिये भी पहुँच पाना असंभव है. दीदी का व्यक्तितव  मुझें अचानक से अथाह काली रहस्यमयी गुफा सा लगने लगा. फिर कुछ सोचते हुए मैंने एक गहरी लम्बी  साँस ली और अपना सिर कार की पीठ से सटा लिया.

दीदी के व्यक्तित्व के जिस ओक्टोपस ने मुझे लम्बें अर्से से जकड रखा था, उसकी पकड आज मुझें बिलकुल ढीली पडती मालूम हुई.

तभी कार के शीशे में मुझे अपना चेहरा दिखाई दिया, जहाँ मेरे समांतर एक और चेहरा भी दिखाई दे रहा था जिसकी शक्ल दीदी के चेहरे से मिलती जुलती थी. जाहिर था इस चेहरे का असर खतम होने में अभी मुझे काफी वक्त लगेगा.

उत्तर कथा

वक्त दिन-दहाङे  अपनी सरपट चाल से भागता चला गया. जाते-जाते कुछ मेरे पास छोड गया, वो  यादें जब मैंने दीदी की छत्र-छाया में अपना महानगरीय जीवन शुरू किया था. कभी उन्ही यादों के झुरमुट् में कटी पतंग सी रुनझुन दीदी नज़र आती. तो कभी टेबल लैम्प की तेज रोशनी में अध्यन मनन करती दीदी. पर दीदी की अंतिम बेरुखी सबसे घनी हो फ़ैल जाती तब मुँह में एक कसैला सा स्वाद घुल जाता. कई बार रुनझुन दीदी की याद आने पर भी कभी उनसे मिलने को मन नहीं हुआ.
जबकि ये एक असंभवटता का पता देती थी सी बात का पता देती थी कि किसी की याद आने पर भी उससे मिलने का मन कतई न करे. पर मै साक्षात् इस बात की गवाह थी की दीदी की याद के साथ ऐसा ही बर्ताव हुआ था.

यह एक देव योग ही था कि प्रेम का देवता एक बार मुझ पर मेहरबान हुआ तो होता ही चला गया. हजारो की संख्या में कीमती मोती मेरे दामन में पनाह मांगने कतारबद्ध हो गए.
इस नए शहर अहमदाबाद में हमने अपना नया डेरा जमा लिया. मैने एक विज्ञापन कम्पनी मे नौकरी कर ली और अनिमेष यही कमिशनर हो गए.
धीरे-धीरे हम दोनों की गृहस्ती जमने लगी. नया शहर, नया दफ्तर और नई नवेली सहेली वंदना राठौर. सच वंदना से कुछ ही दिनों में मेरी खूब घनी दोस्ती हो गयी. अनिमेष जब अपने गाँव या सरकारी टूर पर जाते तो हम दोनों एक साथ ही रहती. उसका भरा-पूरा संयुक्त परिवार था जहाँ जा कर मुझे अपने घर जैसा घना सकून मिलता.

किसी फुर्सत के एक दिन, वंदना के दूसरे मंजिल पर बने आरामदेह और विशाल कमरे में बैठ हम दोनों अपने बीते दिनों की मिजाज़ पुर्सी कर रहे थे कि एक हैरत अंगेज बात पता चली जिसे सुन मैं लगभग थर्राह उठी थी.
मेरे सामने बैठी वंदना भी मेरा ही गुज़रा इतिहास दोहरा रही थी. एक अरसा पहले मेरी ही तरह कभी वंदना भी रुनझुन दीदी की मुरीद हुआ करती थी और मेरी तरह दीदी उसके नजदीक एक तिलिस्मी घेरा लगा कर सामने आती थी.
इस बार भी रुनझुन दीदी नहीं चाहती थी की वंदना शादी करें. पर दीदी ये बात कभी प्रकट में उजागर नहीं करती थी. उस विद्वान मगर चालक दीदी ने पर्दे के पीछे से वार किया था.

जब भी वंदना के घर शादी के लिए कोई लड़का देखने आता. दीदी एक फर्जी प्रेम पत्र उस लड़के के घर भेज देती जिस में वंदना से उसके प्रेम के किस्सों का झूठा जिक्र किया होता और इस तरह वंदना के रिश्ते की बात बनते-बनते बिगङ जाती. इस तरह एक- एक करने पूरे बारह रिश्ते उल्टे पाँव लौट गए. वंदना अपने घर वालों की उदास और अथाह चिंतित दशा देखकर बेहद परेशान हो गयी.
जब कहीं से इस लड़के वालो के घर में एक गुमनामी चिठ्ठी आने का भेद खुला. तो फिर कुछ भी छुपा न रह सका.
भेद खुला तो ऐसी आवाज़ के शोर के साथ खुला कि वंदना समेत सबके होश उड़ गए.
पता चला की ये खत कोई और नहीं, रुनझुन दीदी लिखा करती थी. वही होशयार और तिलस्मी दीदी, जो तेजस्विता की प्रतिमूर्ती बनी सामने आती थी.
इस राज़ के खुलासे को सुन वंदना के शरीर पर मानो नुकीले कांटे उग आये. उसने दीदी को तीखी फटकार लगाने के साथ ही दीदी का घर उसी वक्त छोड दिया.
कितनी मुश्किल से उस दीदी नाम के झंझावात से बाहर निकली मै.
निम्मी, तुम नहीं जानती. वंदना ठहरे हुए स्वर में बोली.

मै जानती हूँ, एक आस्था का धराशाही होना दुःख का सबब तो बनता ही है. पर अंत भला तो सब भला. मैने एक ठंडी सांस को छोड़ते हुएसांत्वना के लहज़े में कहा.
दीदी को लेकर मैं सोचती इस कदर अटूट विश्वास कोई कैसे तोड़ सकता है, पर तोङा था सिर्फ़ मेरा नहीं वंदना का भी और उस दीदी ने तोङा था जिस की सरपरस्ती में वह माँ के आँचल जितना सुकून पाती थी.
वंदना की तो उस चिठ्ठी प्रसंग के कारण इतनी बदनामी हुई जिसने शहर बदलने के बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ा, और हाल घडी तक वह अनब्याही ही है. अब वंदना के लिए विवाहः का नाम मात्र ही पीड़ा देता है.
वह भी तो रुनझुन दीदी के इसी छुपे हुए छल का शिकार बनते-बनते रह गयी थी. उसका  कारण यही था कि उसका और अनिमेष का प्रेम इतना प्रगाढ़ था कि रुनझुन दीदी चाहते हुए भी कोई खुराफात नहीं कर सकती थी.
आज भी मुझे ठीक से याद है वह दिन जब दीदी के फ़्लैट की रोशनी ने उसके मन में अँधियारा भर दिया था. आज  दीदी के छल-प्रपंच की कहानी वंदना की जुबानी सुन वह एक बार फिर हिल गयी मैं.और तो और वंदना के पास और भी था सुनाने को कि  रुनझुन दीदी अब इस अधेड़ उम्र में अपनी शादी के लिए हाथ पैर मार रही है और सुना है एकऊँचे ओहदे वाला विधुर पर आजकल काफी मेहरबान भी है.

यह सुन मैं सोच में डूब गयी हूँ की दीदी के उस स्त्री विमर्श की दशा और दिशा का क्या होगा. जिस स्त्री विमर्श की झड़ी से  दीदी अपनी जवानी के दिनों में पुरुषों पर वार करती थी अपने आप को पुरुष के ऊपर ले जाने की उमंग में डूबी रहती थी वे हरदम.
सच है, हम कितनी भी वैज्ञानिक तरक्की कर लें पर इंसान को समझ पाना आज  भी इतना आसान नहीं है और इंसानी फितरत के ढेरों सिरों को मिला पाना भी मुमकिन नहीं
उफ़, पांच साल पहले के उस बेरुखी वाले दिन के बाद भी दीदी कभी कभार मेरे साथ हो लेती थी पर आज के बाद दीदी की उस ऑक्टोपसी याद का कोई सकारात्मक चिन्ह भी अवशेष बन कर रह सकेगा मेरे दिलो-दिमाग पर, इस पर आज मुझे भारी संदेह हो चला है.