देस - वीराना : पूर्वोत्तर भारत

Posted by arun dev on जून 16, 2011



भारत में राष्ट्रवाद के उदय की एक धारा इस पर खासी आलोचनात्मक थी. प्रेमचंद ने इसे आधुनिक युग का कोढ़ माना है. राष्ट्र के परिक्षेत्र के बाहर शत्रुतापूर्ण अन्य की शाश्वत उपस्थिति से ही अंध राष्ट्रवाद को खुराक मिलता है. इस तरह का राष्ट्रवाद खुद परिक्षेत्र के अन्दर भी कुछ काल्पनिक अन्यों का निर्माण करता है.

पूर्वोत्तर भारत, राष्ट्र के अंदर एक ऐसा ही समस्यामूलक अन्य है. वह भारत के साथ रहते हुए भी पराया सा दिखता है. अनुवादक आलोचक गोपाल प्रधान वर्षों सिलचर रहे हैं, उनका आलेख भारत से पूर्वोत्तर पर गहरी  ज़िम्मेदारी के साथ लिखा गया है.



पूर्वोत्तर भारत और भार
गोपाल प्रधान 

गर्मी की छुट्टी में दिल्ली जाने पर पता चला कि मणिपुर या असम आंदोलन जैसी कोई घटना न होने के कारण उत्तर पूर्व वस्तुतः दिल्ली के लिए मौजूद ही नहीं था. इसका अहसास यात्रा से पहले ही शुरू हो चुका था. आकाशीय परिवर्तनों पर कुछ इस तरह ध्यान केन्द्रित हो गया है कि जमीन का संसर्ग छूट चला है. रेल में आरक्षण कराना था. पता चला टेलीफ़ोन विभाग में हड़ताल के कारण सिलचर का आरक्षण केन्द्र कम्प्यूटरों का संपर्क कट जाने से बन्द पड़ा है. मयंक राय को बम्बई में रहने के कारण नकदी लेकर चलने की आदत नहीं रह गयी थी. सोचा था क्रेडिट कार्ड से काम चल जायेगा. इम्फाल और सिलचर में वे यू टी आई अथवा आई सी आई सी आई बैंक की शाखायें खोजते रह गये. उनका रिलायंस फ़ोन असम में घुसने के बाद काम करना बन्द कर चुका था. आल इंडिया रोमिंग लेकिन उत्तर पूर्व आल इंडिया में कहाँ ! आकाशीय संचार में एकतरफ़ा प्रवाह का जैसा अहसास उत्तर पूर्व में आकर होता है वैसा शायद मनोरंजन उद्योग में अमेरिका और भारत के संबंधों में भी न होता हो.

एकतरफ़ा सूचना प्रवाह का यह गणित सिर्फ़ इतने से ही पूरा नहीं होता कि जिसे राष्ट्रीय कहा जाता है वहाँ से उत्तर पूर्व बेदखल है. दूसरी सच्चाई यह है कि जो राष्ट्र में है वह भी उत्तर पूर्व को प्रभावित करता है और शक्ल देता है. खास तौर पर उदारीकरण के बाद जिस तरह उत्तर पूर्व ने शेष देश की नकल की है उसका अध्ययन रोचक होगा. कभी कभी कमजोर सेवक मालिक के इशारों को कुछ ज्यादा ही मुस्तैदी से लागू करते हैं तकि इसी बहाने उस पर मालिक की विशेष अनुकंपा बनी रहे. अभी बाकी राज्यों में सार्वजनिक सड़क परिवहन के निजीकरण की सुनवाई भी नहीं थी तभी असम ने इसका निजीकरण कर दिया. इसके कारण जो होता है उसका मजा मुझे गर्मियों के बाद दिल्ली से लौटते हुए मिला. रेल से निकलकर पलटन बाजार की ओर स्टेशन से बाहर आते ही एक दलाल ने पकड़ लिया. उसने एक ऐसी एजेंसी का टिकट मुझे दिलवाया जिसकी कोई बस नहीं चलती. जिस बस का नंबर उसने दिया उसके कंडक्टर ने बताया कि टिकट फ़र्जी है लेकिन सीट पर तो नहीं, केबिन में बिठाकर ले चलूंगा. मेरे ही जैसे आठ और यात्री ड्राइवर के पीछे लगी काठ की लम्बी सीट पर बैठकर आए. दिन की यात्रा के कारण पहले न देखी गई चीजें भी देखते हुए आया.

जगह जगह कोयला ढेर का ढेर रखा हुआ था. समझ में नहीं आया यहाँ इतना कोयला कहाँ से आ रहा है . लोगों ने बताया पहाड़ में चट्टानों के नीचे दबे पेड़ समय बीत जाने पर कोयला बन जाते हैं. एक जगह लकड़ी की थूनी लगाकर पहाड़ को अंदर गहराई तक खोद दिया गया था. पत्थर ज्यादातर चूना पत्थर था. बाद में पता चला डायनामाइट लगाकर चूना पत्थर का उत्खनन होता है और सीमेंट के एक दो कारखाने भी रास्ते में बन गये हैं . ऐसा अस्थिर भूगोल और इतना सारा उत्खनन और वह भी शुद्ध रूप से निजी क्षेत्र में ! इसीलिए तो भू स्खलन की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं. इस उत्खनन से पहाड़ तो नंगे हो ही रहे हैं, यहाँ के प्राकृतिक गुफाजाल पर भी खतरा बढ़ रहा है. डायनामाइट और उत्खनन के शोरगुल के कारण हाथी जंगलों को छोड़कर भाग रहे हैं. हाथियों के इस अभयारण्य को छोड़कर भगदत्त और कहीं का कैसे हो सकता था ! जंगलों से बेदखल हाथी चाय बागानों और रिहायशी इलाकों में आकर उत्पात मचाते हैं. अवैध व्यापार न सिर्फ़ लकड़ी का होता है बल्कि हाथी दांत का सबसे अधिक होता है. संसारचंद दिल्ली में बैठे रहे, उनके नाम का जैन मीडिया से गायब हो गया और उनके लिए हजारों वीरप्पन हाथियों की जान लेते रहे. हरेक प्रदेश में हाथियों की संख्या में गिरावट आई है.

वापस सिलचर आकर अखबारों में देखा कि वेश्यावृत्ति में शामिल दलाल शिलांग और सिलचर में काफ़ी पकड़े जा रहे हैं. दर्याफ़्त करने पर पता चला कि असम और उत्तर पूर्व की लड़कियों को बम्बई, दिल्ली जैसे महानगरों में ले जाने का बहुत ही संगठित धंधा यहाँ होता है. इसी धंधे का एक कारुणिक पहलू प्रोफ़ेसर सजल नाग ने बताया. हरियाणा और राजस्थान में बालिका भ्रूण हत्या के कारण औरतों की आबादी घटती जा रही है. फलतः विवाह के लिए लड़कियों की आपूर्ति दलालों के जरिए यहाँ से होती है. जिंदगी भर बच्चा पैदा करती ये औरतें उन इलाकों की भाषा समझे बगैर घरों में कैद रहती हैं. देश भर में उदारीकरण ने ऐसा दबाव बनाया है कि उसके लिए एक ही उदाहरण काफ़ी होगा. गौहाटी से अंग्रेजी में टेलीग्राफ़ नाम का अखबार छपता है. उसका एक पृष्ठ प्रतिदिन 'नेशन' को समर्पित होता है जिसमें उत्तर पूर्व के बाहर के प्रांतों की खबरें छपती हैं. एक दिन उस पृष्ठ पर जो समाचार थे उनमें से एक गुजरात के बारे में था. गुजरात की सरकार के किसी मंत्री की राय थी कि शराब की बिक्री पर रोक होने के कारण गुजरात में पर्यटन उद्योग का विकास नहीं हो पा रहा. आंध्र के विकास पर भी रोक इसीलिए लगी हुई है कि हैदराबाद में दुकानें कानूनन रात साढ़े 8 बजे बंद हो जाती हैं इसलिए नाइट लाइफ़ जन्म नहीं ले पा रही है. बंबई में कर्नाटक से आई महिलाओं का दबदबा वेश्यावृत्ति से खत्म हो रहा है और उन्हें बंगाली महिलाओं की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. केरल में सबसे अधिक बिक्री एक वेश्या की आत्मकथा की हो रही है. सारा भारत 'आस्था' फ़िल्म की कथा भूमि बनने की ओर चल पड़ा है. जब 'विश्व सुंदरियों' और 'ब्रह्मांड सुंदरियों' के क्षेत्र में भारत भी उदारीकरण के साथ महाशक्ति बना तब शायद इस दबाव की गहराई का अंदाजा न रहा होगा. पहले भी पांडवों के लिए पांचाली के अतिरिक्त अन्य पत्नियाँ उत्तर पूर्व में ही मिली थीं आज पुनः कुरुक्षेत्र के उसी मैदान में उनका आखेट हो रहा है.बहरहाल उदारीकरण के ताजा असरात को छोड़ भी दें तो 'राष्ट्रीय एकता' की दीर्घकालीन योजना अरसे से इस इलाके में लागू की जा रही है. इस मामले में शिक्षा और धर्म पर विचार करना उपयोगी होगा क्योंकि सामाजिक एकीकरण के ये दोनों प्रमुख अस्त्र हैं.

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में केंद्रीय विश्वविद्यालय जो हैं सो तो हैं ही एक विचित्र किस्म के विश्वविद्यालय का नाम यहाँ आने से पहले भी सुना था- सिक्किम मनिपाल विश्वविद्यालय. सिक्किम तो फिर भी एक प्रांत का नाम है जिसे अब उत्तर पूर्व में ही शामिल कर लिया गया है पर मनिपाल के बारे में तब पता चला जब मनिपाल के एक सज्जन से मुलाकात हुई. यह कर्नाटक में एक जगह है. वहीं स्थित यह विश्वविद्यालय निजी क्षेत्र का संभवतः पहला विश्वविद्यालय है. जब सिक्किम नया प्रांत बना तो वहाँ कोई विश्वविद्यालय नहीं था इसलिए मनिपाल विश्वविद्यालय ने यहाँ एक केंद्र खोला. कायदे से इसका नाम मनिपाल सिक्किम विश्वविद्यालय होना चाहिए पर उत्तर पूर्व के इस सबसे मशहूर विश्वविद्यालय को उत्तर पूर्व की गंध देने के लिए नाम में सिक्किम पहले लिखा जाता है. प्रसिद्धि एक दुर्घटना है क्योंकि अन्य अनुदान प्राप्त विश्वविद्यालय इससे सस्ते हैं पर तकनीकी शिक्षा और शिक्षा के जरिए 'काल गर्ल' की भी नौकरी हासिल कर लेने का बोलबाला हो तो निजी विश्वविद्यालय ही फलेंगे फूलेंगे. अन्य विश्वविद्यालय भी दुर्घटना का शिकार हो चुके हैं. कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना आजादी के आंदोलन के दौर में हुई, कुछ नेहरूवादी सोच की छाया में बने, कुछ उदारीकरण पूर्व कांग्रेसी शासन की इनायत थे पर उत्तर पूर्व के अधिकांश केंद्रीय विश्वविद्यालय तब स्थापित हुए जब राज्य शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे कल्याणकारी क्षेत्रों से कदम खींच रहा था. ये किसी स्थानीय सामाजिक पहल के परिणाम भी नहीं थे. इसलिए इनकी जड़ें समाज में तो नहीं ही हैं ऊपर से उदारीकरण के माहौल में रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रम संचालित करने और स्ववित्तपोषी होने का उपदेश भी ग्रहण कर रहे हैं. फल यह है कि विचित्र किस्म के काम यहाँ हो रहे हैं. खबर तो यह भी है कि 'नैक' ने जो थ्री स्टार, फ़ाइव स्टार वगैरह के मानदंड तय किए हैं उनकी सार्थकता सिद्ध करने के लिए आलीशान होटलों में सबसे सुलभ माल भी कृपा प्राप्त करने के लिए इन विशेषज्ञों को उपलब्ध कराया जाता है.

इस स्थिति का दोष यहाँ के विद्यार्थियों को नहीं दिया जा सकता. विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल नहीं हैं. यू जी सी ने आदर्श पाठ्यक्रम बनाए हैं जिनमें 40% ही परिवर्तन की इजाजत है. इलाके में कोई उद्योग नहीं. सरकारी विभागों में नियुक्तियों पर अरसे से प्रतिबंध है. फलतः मेघालय में बेरोजगार कुल आबादी में 50% से अधिक हो गये हैं. बेरोजगारी के कारण युवकों में सबसे लोकप्रिय खेल कैरम है जो अद्भुत रूप से यहाँ इनडोर की बजाय आउटडोर गेम है. गौहाटी, शिलांग, सिलचर, इंफ़ाल- कहीं भी सड़क के किनारे नीचे से खंभा लगाकर कैरम बोर्ड खड़ा कर दिया जाता है. हमेशा आप कुछ लोगों को कैरम खेलते देख सकते हैं. भारत की दरिद्रता ने जैसे क्रिकेट में ही गौरव प्राप्त करने का अवसर दिया है वैसे ही सिलचर का एक लड़का आजकल सा. रे. गा. मा. में पहुँचा है तो उसे वोट दिलाने के लिए चुनाव प्रचार की तरह प्रचार चल रहा है. थोड़ा सा भी आत्मगौरव जहाँ हासिल हो उसे पाने के लिए लोग पागल रहते हैं.

खेलों की इस भूमिका से एक करुण कथा जुड़ी हुई है. मेघालय में खासी लोगों का पारंपरिक खेल तीर धनुष से निशाना लगाना है. इसे मेघालय राज्य ने लाटरी में बदल दिया है. कुछेक क्लब एक दिन मैदान में एकत्र होकर किसी चीज पर तीर से निशाना लगाते हैं. जितने तीर निशाने पर लगते हैं उनकी संख्या पर मटके की तरह दाँव लगता है और नंबर लग जाने पर एक का अस्सी वापस मिलते हैं.

हरेक राज्य ने अपनी लाटरी घोषित की हुई है. लाटरी के घोटालों में हरेक राज्य सरकार कभी न कभी फँसती रहती है त्रिपुरा समेत. त्रिपुरा की कहानी राज्य में मूल निवासियों के अल्पसंख्यक होते जाने की कहानी है. जनगणना शुरू हुई थी तो उनकी आबादी कुल जनसंख्या का 70% थी अब निरंतर घटते घटते 30% रह गयी है. माकपा ने वहाँ शुरुआत तो मूल निवासियों से की थी लेकिन बंगालियों की संख्या बढ़ते जाने से वहाँ भी यह बंगाली पार्टी ही बन गयी है. फलतः जनजातियों में आतंकवादी संगठनों को पाँव पसारने का मौका मिल गया है.
उत्तर पूर्व से निकलने की एक कोशिश असफल हो चुकी थी इसलिए इस बार कुछ ठहरकर सिलचर को देखने का मौका मिला. विश्वविद्यालय का जीवन तो खैर परीक्षाओं, नए सत्र में प्रवेश इत्यादि के कारण जल्दी ही बीत चला पर शहर में बंगाली जन की बहुतायत से दुर्गापूजा में उनका उत्साह देखने को मिला. जहाँ कहीं बंगाली बहुमत है वहाँ दुर्गापूजा सामूहिक वसूली का अच्छा मौका उपलब्ध कराती है. यहाँ भी आप पैसे दिए बगैर सुरक्षित नहीं. लेकिन यह बँटवारे की बदौलत सिलहट से भागकर आए लोगों की जमात है जो सिलहट से अपनी अस्मिता जोड़कर थोड़ी अलग पहचान जताने की चेष्टा करती है. इस प्रसंग में बंगाल के इतिहास को देखना थोड़ा जरूरी है. जब बंगाल के पारंपरिक केंद्र ढाका और मुर्शिदाबाद उजड़े और कलकत्ता नया केंद्र बना तो वहाँ बसने वालों की पहली खेप अनुपस्थित जमींदारों की थी जो थे हिंदू लेकिन आज के बांगलादेश में उनकी जमींदारियों में काम करने वाले मुसलमान थे. आज के बांगलादेश में तब हिंदू जमींदारों की बहुतायत होने से बांगलादेश की तत्कालीन संस्कृति में प्रचुर हिंदू प्रभाव था. बँटवारे से पहले ही बल्कि 1905 के प्रथम बंग भंग से ही एक मानसिक विभाजन मौजूद था. इसीलिए बँटवारे का दर्द बांगला साहित्य में उतना नहीं मिलता जितना हिंदी में. मूल से भागे हुए इन लोगों में सांप्रदायिक घृणा भी पर्याप्त है. सिलचर में किसी मुसलमान को घर मिलना आज भी बहुत बड़ी मुसीबत है. सांस्कृतिक मूर्तियों में सचिन देव बर्मन इसी सिलहट की पैदाइश थे. रवींद्रनाथ के घर सभी संस्कारों में काव्यबद्ध निमंत्रण देने की प्रथा भी उनके पूर्वी बंगाल के मूल से आई होगी क्योंकि जब मैं यहाँ एक विवाह समारोह में गया तो भोजन से पहले मीनू आया जो भोजन का चंदोबद्ध विवरण था.

बँटवारे ने बंगाल को तो बाँटा ही उत्तर पूर्व के भी प्रमुख राज्यों को छिन्न भिन्न कर दिया. इसी के कारण त्रिपुरा पहुँचना आज भी टेढ़ी खीर है. गौहाटी से सिलचर आने वाली सड़क से ही सिलचर से थोड़ा पहले बदरपुर से रास्ता त्रिपुरा के लिए है. ट्रेन से भी इसी बदरपुर से धर्मनगर तक आप जा सकते हैं. उसके आगे अगरतला तक के लिए कोई और सवारी. मेघालय के खासी और जयंतिया लोगों की खेती की जमीनें बांगलादेश सीमा के भीतर हैं. जयंतिया लोगों की पारंपरिक राजधानी जयंतियापुर बांगलादेश में है. त्रिपुरा की पुरानी रियासत का भी एक बड़ा भाग बांग्लादेश में ही है. ऐसे में सीमा पर कँटीले तार लगाने का उत्साह ! विभाजन के समय असम के नेताओं को भय था कि अगर सिलहट के लोग भारत में आने के पक्ष में मतदान कर देंगे तो असम में मुस्लिम बहुमत हो जाएगा. जब ऐसा नहीं हुआ तो वे प्रसन्न हुए. छोटा सा हिस्सा बराक घाटी का मिला जो पलायित शरणार्थियों से भरा हुआ है.

यहीं मुसलमानों की समस्या पर भी विचार करना लाजिमी है. लक्षद्वीप और कश्मीर के बाद असम सर्वाधिक मुस्लिम आबादी के प्रतिशत वाला प्रांत है. इसे लेकर यहाँ काफ़ी राजनीति होती रहती है. मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा तो वे लोग हैं जो मुगल सेना के साथ आए थे और लौटकर नहीं जा सके . इनके साथ कुछ ऐसी रवायतें जुड़ी हैं जो बाकी कहीं भी मुसलमानों में नहीं पाई जातीं. मसलन इन्होंने स्थानीय महिलाओं से बगैर धर्मांतरण कराए निकाह पढ़ाए . मणिपुर में भी मुसलमानों की अच्छी खासी आबादी इसी प्रक्रिया में बनी है. दूसरी बात यह कि इस समस्या के बारे में बात करते हुए हम मान लेते हैं कि भारत सदा से ऐसे ही था. आजादी से पहले आज के बांगलादेश और भारत के अन्य हिस्सों से भाँति भाँति के लोग आकर इस इलाके में बसते रहे. इस तरह यह अलग अलग मानव समूहों की मिली जुली बस्ती की तरह बन गया है . इन सबने इस इलाके को समृद्ध बनाने में मदद की है.

धर्म के मामले में चाहे हिंदू हों, चाहे मुसलमान या ईसाई सबको उनकी मूल धारा से अलग करके देखना ही उचित होगा क्योंकि धर्मांतरण के बावजूद जनजातीय प्रभावों ने उन्हें विशेष पहचान दी है. मिजोरम, नागालैंड और मेघालय ईसाई बहुल हैं. साथ ही ये राज्य सरकारी तौर पर अंग्रेजी भाषी हैं. बात भाषा की नहीं है. एक सज्जन बता रहे थे कि किसान से कहा जाता है पाँच एम. एल, दवा डालो. पाँच एम. एल. उसके बोध में नहीं है. स्थानीय महौल से पूरी तरह विच्छिन्न भाषा से संवाद इन्हें शिक्षा से दूर न करे तो क्या करे ! इनकी अपनी बोलियों को न तो अंग्रेजों ने प्रोत्साहन दिया न स्वतंत्र भारत की सरकार ने. अंग्रेजों ने तो इन्हें आजादी के आंदोलन से दूर रखने के लिए सचेत रूप से अंग्रेजी और इसाइयत दी लेकिन बाद में भी सरकार ने सहानुभूतिपूर्वक कुछ नहीं किया. सो प्राचीन परंपराओं के साथ यहाँ की जनजातियों ने संगठित धर्म अपनाए और इस तनाव को आप लगातार देख सकते हैं. मेघालय की तीनों जनजातियाँ मातृवंशात्मक हैं पर इसाइयत की मान्यताएं इससे मेल नहीं खातीं. अरुणाचल प्रदेश तो बाकायदे सरकारी तौर पर प्रकृतिपूजक लोगों की बहुतायत वाला प्रदेश है. वहाँ दोनो पाउलो की पूजा होती है. वह शायद एकमात्र ऐसा प्रदेश है जिसकी कोई राजकीय भाषा नहीं.

क्या हल है इस 'उत्तर पूर्व' नामक समस्या का ? सबसे पहली बात तोयह कि बहुमतवादी लोकतंत्र में 500 से अधिक सांसदों की संसद में यहाँ के लोग अपना निर्णायक प्रतिनिधित्व नहीं देखते. सो उसमें कोई भी खास रुचि नहीं लेता. स्थानीय स्वशासन की संस्थायें भी दलाल राजनीतिक वर्ग के कब्जे में हैं. सैनिक समाधान कोई समाधान नहीं है यह तय है. बांगलादेश, चीन और बर्मा से दोस्ताना रिश्तों के बगैर इस समस्या का एक पहलू हल होने से रहा. स्वशासन के संबंध में भी नये प्रयोग करने होंगे. अन्यथा महज भूभागीय एकता की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है समूचे देश को. रोज रोज की हिंसा से समूचे देश की संवदनाएं भोंथरी हो रही हैं. काले कानूनों के लिए तर्क के बतौर इस इलाके का उपयोग भी बंद होना चाहिए.