अमूर्त कला: मनोज कचंगल

क्या मूर्ति का निषेध अमूर्तन है ? ‘निर्गुण’ विचार और साहित्य के विषय तो रहे ही हीं.

कला में स्थूल विषय तो न हो पर सौन्दर्य हो, ऐसा ख़ासकर शास्त्रीय गायन और चित्रकला के क्षेत्र में हम देखते और अनुभव करते हैं.

चित्रकार मनोज कचंगल अमूर्त शैली के चित्रकार हैं. उनका यह आलेख इस विषय पर उनके शोध-लेखन का हिस्सा है. वे अमूर्तन की खोज़ में भारतीय साहित्य में गहरे उतरते हैं.

साथ में उनके कुछ चित्र भी दिए जा रहें हैं.    

  


अमूर्त कला                                                                  
मनोज कचंगल

 

 

(१)

समकालीन अमूर्त कला मेरे विचार से उस यथार्थ का यथार्थ है जिसका हम अंतः करण से अनुभव करते हैं, हम वास्तविकता को खोजते हैं, चित्रित करते हैं और फिर हम उसमें वास्तविकता देख भी सकते हैं.

वह कला जिसमें हमें अनजाने, अपरिचित, अज्ञात रूपाकारों में कुछ महसूस हो या आभास हो उसे ही अमूर्त-कला कहते हैं. अमूर्त कला मन में गुंफित उन भाव-आवेगों और संवेदनाओं की जीवंत प्रतिक्रिया है जिन्हें हम वस्तुनिष्ठ कला (व्यक्ति-बोधक, प्रकृति-बोधक, वस्तु-बोधक) और अलंकरण कला में अभिव्यक्त करने में पूर्णत्व प्राप्त नहीं कर पाते तथा उन भावावेगों के चरमोत्कर्ष में कहीं न कहीं कुछ कमी महसूस करते हैं. वास्तव में अमूर्त कला एक ऐसी प्रतिक्रिया है जहाँ हम अपने भावों के चरमोत्कर्ष के लिए सभी तरह के उन्मुक्त रूपों, रंगों और रेखाओं आदि के स्वछन्द प्रयोग के साथ कला परंपरा या अनुशासन के सामान्य-शिष्टाचार को भेदते हुए एक नवीन कलाकृति का सृजन करते हैं तथा नवीन स्वप्रतिष्ठित रूपाकारों का स्वागत करते हैं. यहाँ वस्तुनिष्ठ कला (व्यक्ति-बोधक, प्रकृति-बोधक, वस्तु-बोधक) और अलंकरण कला से भिन्न एक नवीन प्राकृत सृजन होता है जो मन के अंतस में पल रहीं संवेदनाओं का ही दर्पण या प्रतिबिम्ब होता है. हम हमारी कल्पनाओं अथवा भावनाओं की स्वछन्द पर प्रतीकात्मक उड़ान भरते हैं जिसके रूपा कार कहीं न कहीं वास्तविकता से कुछ अलग अतिशयोक्ति पूर्वक भी हो सकते हैं पर कला का भावपक्ष परम सत्य और यथार्थ ही होता है.

कला के अन्य प्रकारों की तरह अमूर्त कला भी किसी विषय, सौंदर्य या सन्देश आदि की मुहताज नहीं होती, पर यह सूक्ष्म भावनात्मक आवेगों के सत्यता का बखान अवश्य करती है, इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं है की अमूर्त कलाकृति में विषय, सौंदर्य या सन्देश नहीं हो सकता, पर सप्रयास इनकी अनिवार्यता आवश्यक नहीं होती.

कई बार अलंकरण-कला को अमूर्त कला समझने का भ्रम होता है इसलिए यह समझना भी आवश्यक है कि अमूर्त-कला और अलंकरण कला दोनों अपनी-अपनी अलग-अलग विशेषताओं वाले अलग प्रकार हैं. जहाँ अलंकरण कला में किसी विशेष रूपाकार की एक शिष्ट लय संगत पुनरावृत्ति होती है तथा जिसमें दृश्य सौंदर्य एक प्रधान तत्व के रूप में मौजूद रहता है तथा यह इसका अनिवार्य तत्व है, वहीं अमूर्त कला में भावनात्मक आवेग के चरमोत्कर्ष से नवीन स्वप्रतिष्ठित और सांकेतिक रूपाकार सृजन होते हैं.

अमूर्तकला सृजन, परम सृजन है जो की भावनात्मक रूप से पूर्णतः विशुद्ध कला है, जिसमें कलाकार सभी तरह के भौतिक रूपाकारों से परे अनायास ही अज्ञात और आध्यात्मिक रूपाकारों की तरफ बढ़ता है. कलाओं के यह भेद सिर्फ हमारी ज्ञानेन्द्रियों तक ही होते हैं  मूलतः तो सभी कलायें समान ही हैं. फ्रांसीसी कवि, लेखक और उत्कृष्ट कला-समालोचक गिलौम अपोलिनेयर ने अमूर्त कला को इस रूप में परिभाषित किया है;

"नए संरचनाओं को चित्रित करने की कला जो कि दृश्य क्षेत्र से उधार नहीं ली गई है, लेकिन पूरी तरह से कलाकार द्वारा बनाई गई, यह एक शुद्ध कला है."

आमतौर पर अमूर्त कला का सम्बन्ध हम उस कलाकृति से जोड़ देते हैं जिसमें हमें कोई जानी-पहचानी वस्तुनिष्ठ कला (व्यक्ति-बोधक, वास्तु-बोधक, दृश्य-बोधक) या अलंकरण कृति दिखाई नहीं देती, पर यह पूरी तरह से तर्क संगत नहीं लगता क्योंकि कोई कुछ भी सृजन करे वह दिखाई तो देता ही है, और उसका कोई न कोई रूप भी होता है. जबकि अमूर्त का सही अर्थ है जिसका कोई मूर्त रूप न हो. यहाँ मूर्त का तात्पर्य किसी वस्तुनिष्ठ कला (व्यक्ति-बोधक, वास्तु-बोधक, दृश्य-बोधक) या अलंकरण कृति मूर्ति या चित्र से नहीं है, बल्कि किसी भी सादृश्य रूप मात्र से है जो दृश्य हो बस. पर कोई भी दृश्य कला कभी भी अदृश्य तो नहीं हो सकती फिर अमूर्त कैसे हो सकती है

अमूर्त तो सिर्फ कल्पना हो सकती है, कोई भाव, कोई विचार, आशा, निराशा आदि अमूर्त होते हैं क्योंकि ये दिखाई नहीं देते. यहाँ तक मेरा अनुभव है दृश्य-कलाओं में कोई कला अमूर्त नहीं होती वह आभासी अवश्य होती है, क्योंकि जैसे ही हम वस्तुनिष्ठ कला (व्यक्ति-बोधक, वास्तु-बोधक, दृश्य-बोधक) या अलंकरण कृति चित्रों के अलावा स्व: प्रतिष्ठित अनजाने रूपाकारों के चित्रों को देखते हैं या उनके संपर्क में आते हैं तो उनमें हमें कुछ न कुछ आभास अवश्य होता है. उन अनजाने रूपों में कोई भाव हो सकता है, कोई रस हो सकता है, कोई विचार भी हो सकता है या फिर हमारे मन का कोई चेतन-अवचेतन सम्बन्ध हो सकता है. यहाँ चेतन-अवचेतन सम्बन्ध लिखना उचित ही लगता है क्योंकि किसी भी कलाकृति का जन्म बिना किसी भावनात्मक या मानसिक चेतन-अवचेतन कारण के नहीं हो सकता. बिना वजह कुछ भी घटित नहीं होता और बिना प्रयोगों के कोई आविष्कार नहीं होता. आविष्कार चाहे वह विज्ञान का हो या कला का, या फिर कला के किसी दिव्य स्वरूप (रूपाकार) का.

स्वरूप का अपना सौंदर्य ही उसकी संपूर्णता हो सकती है. उसके बहु विषयक अर्थ भी निकाले जा सकते हैं और नहीं भी. जैसे कि साकार या निराकार ब्रह्म. सृष्टि में व्याप्त असीमित ऊर्जा ही उसका कारण होता है. "ऊर्जा" अत्यंत व्यापक शब्द है जो मेरे अनुभव से अपने आप में सर्वस्व समेटे हुए है और यह जिसे हम "कला" कहकर परिभाषित करते हैं उसका अभिन्न घटक है, फिर वह चाहे मूर्त आकर हों या अमूर्त. भले ही कला का अपना सौंदर्य हो पर उसमें सौंदर्य तत्व अनिवार्य नहीं होता, क्योंकि कला सम्पूर्णता या उससे भी परे है और सपूर्णता में सौंदर्य ही हो यह आवश्यक नहीं. कला में सौंदर्य की परिभाषा के विपरीत वीभत्सता भी हो सकती है, पर वह जो भी हो उसे ही कला का सौंदर्य कहना उचित है क्योंकि वह अपनी दृश्याभिव्यक्ति को और संवेदनशील बनाता है, तथा कला में हम नव-रसों (शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत और शांत रस) की अनुभूति कर सकते हैं. 

कोई भी कला कभी भी सौंदर्य या शब्दों की मोहताज नहीं होती, उसका अपना ही सौंदर्य होता है, उसकी अपनी ही शक्ति होती है, उसकी अपनी ही भाषा होती है जो कि वैश्विक-भाषा होती है. इसका अर्थ यह भी नहीं कि किसी भी कला की शाब्दिक व्याख्या करना अनुचित हो, क्योंकि कला और शब्द एक दूसरे के पूरक होते हुए भी अपने निजी अस्तित्व में हैं, दोनों का अपना महत्व है दोनों एक दूसरे के सहायक भी होते हैं, जबकि कला शब्दों से भी आगे एक गूढ़ अभिव्यक्ति है. कला कोई वस्तु-विशेष नहीं है पर कलात्मक-वस्तु का निर्माण किया जा सकता है, हो सकता है उस वास्तु की आवश्यकता कलात्मक हो, और हो सकता है उस कलात्मक वस्तु की आवश्यकता सौंदर्य हो. सौंदर्य हमारी आवश्यकता अवश्य हो सकती है जिसे हम किसी भी कलाकृति में अपने ढंग से ढूंढे. इसीलिए समझ पाया हूँ कि सौंदर्य बेहद निजी तत्व है और कला सार्वभौमिक सत्य.

सौंदर्य का संबंध ज्ञानेन्द्रयों से होता है और कला का भावेंद्रयों से. बुद्धि के लिए ज्ञान और आत्मा के लिए भाव ही महत्वपूर्ण होता है. इसलिये कहा जाता है कला-भाषा विश्व-भाषा है और कला-विद्या परम विद्या. क्योंकि कला आत्माभिव्यक्ति का सशक्त साधन है. जो हम शायद दूसरी किसी भी भाषा में अभिव्यक्त नहीं कर सकते वह कला-भाषा में संभव है. अभिव्यक्ति जो भी हो, जैसी भी हो मात्र भाव-सम्प्रेषण ही उसका सौंदर्य होता है और होना भी चाहिए, तथा यही उसका महत्त्वपूर्ण गुण-धर्म और कला-सन्देश होता है.

एक कलाकृति कभी भी मौन नहीं होती, हम मौन हो सकते है क्योंकि हमें बोलने या मौन रहने की स्वतंत्रता है पर कला को नहीं, साहित्य और कविता को भी नहीं. कला, साहित्य और कविता अपना कुछ न कुछ सम्प्रेषण अवश्य करते हैं क्योंकि यही इनका मूल गुणधर्म भी है. कलाकर्म-बोध और कलाविद्या-ज्ञान दोनों एक होते हुए भी अपना अलग-अलग अस्तित्व रखते हैं, जैसे कि कलाकर्म का ज्ञान कलाकारों या कला-कर्मियों को होता है, जिस कारण वो अनेक परिचित-अपरचित रूपाकारों को जन्म देते हैं व अपना कला सृजन करते हैं, जिस कलाकार का अंतःकरण कला-तत्व ज्ञान से तृप्त हो वह अच्छे रूपाकारों को जन्म दे सकता है, तथा कला-बोध आम मनुष्यों का गुण होता है, चाहे वह विशिष्ट रूप से उन्हें पता हो या नहीं, पर वह इसी खास गुण के कारण ही किसी भी कलाकृति के सामने खड़े रहकर उसे देखने को मजबूर हो जाते हैं और उसका आस्वादन करते हैं.

कला-समालोचक इसलिए खास हो जाते हैं क्योंकि वह कला का वैशिष्ट्य समझते हैं. सृजन शक्ति पूर्ण-रूपेण अन्तः प्रेरणा का ही कारण होती है, बिना अन्तः प्रेरणा के कलाकर्म असंभव है. एक अन्य रूप में कहूं तो परमाणु का जो महत्व इस सृष्टि निर्माण में है वही कलाकृति निर्माण में एक सूक्ष्म से सूक्ष्म बिंदु का. इसीलिए जब कोई कलाकार कुछ भी सृजन करता है वह कुछ न कुछ अवश्य होता ही है, उसका कोई न कोई अर्थ अवश्य होता है अब यह तो हमारे समझने पर निर्भर करता है या हमारे देखने के तरीके पर.


(2)

कला का सम्बन्ध बुद्धि से नहीं भाव से होता है, या कह सकते हैं कला बुद्धि से परे भाव संगत होती है. जब हम स्थिर बुद्धि से किसी कलाकृति के सानिध्य में आते हैं तो मूर्त-अमूर्त का भेद नहीं रहता. जिसे कला में भाव देखना आ जाता हैं उसे कोई कला अमूर्त नहीं होती, उसकी दृष्टि में मूर्त-अमूर्त का भेद ख़त्म हो जाता है, भाव के बिना कोई भी कला मृत प्रायः होती है, भाव सम्प्रेषण ही कला का आधारभूत सिद्धांत है.

कला हमारे सूनेपन को भरती है वह सदैव हमारे एक अच्छे मित्र की तरह हमसे संवाद करती है. इस संवाद के लिए हमारे नेत्र सिर्फ रास्ते भर हैं. इस दृश्य भाषा में नासमझी जैसी तो कोई बात होती ही नहीं है. हमारी इन्द्रियां उस विशिष्ट रूपाकार का बोध करातीं हैं और भाव उससे आंतरिक सम्बन्ध जोड़ता है वो भी बिना किसी राग-द्वेष के. अगर हम गहनता से सोचें तो यह सब किसी दिव्य चमत्कार या आश्चर्य से कम नहीं है. किसी भी कला में सबसे महत्वपूर्ण तत्व उसका भाव विन्यास ही होता है, भाव ही किसी भी कला की आत्मा होती है और रूपाकार उसका शरीर, फिर चाहे वह वस्तुनिष्ठ कला (व्यक्ति-बोधक, वास्तु-बोधक, दृश्य-बोधक), अलंकरणाकृति या फिर अमूर्त (भासिक) हो.

वर्तमान में "आभासीय-कला" के सन्दर्भ में "अमूर्त-कला" शब्द का प्रचलन है और यह "अमूर्त-कला" शब्द ही स्थापित भी हो चुका है, इसीलिए आभासीय कलाकृतियों को आजकल अमूर्त कलाकृतियां कहा जाता है, यह अपनी जगह ठीक है. मेरे इस लेख का उद्देश्य "अमूर्त-कला" शब्द को हटाना या ख़ारिज करना नहीं है तथा न ही किसी भी तरह के विवाद को जन्म देना है; बस इसके हिस्से में आने वाली कला-शैली का सही रूप में व्याख्यान करना भर है. ज्योंही हम अमूर्त-कला को आभासीय-कला के रूप में समझते हैं तो उन अपरचित रूपाकारों को परिभाषित करना, समझना या उनकी भाव रूपी आत्मा से मेल अत्यंत सहज और सारगर्भित हो जाता है. हमारा उस विशेष कलाकृति से सहज ही सम्बन्ध स्थापित हो जाता है जिसमें अपरिचित स्वप्रतिष्ठित रूपाकार चित्रित हों. किसी भी कलाकृति से सहज सम्बन्ध स्थापित होना ही उस कलाकृति की सफलता मानी जाती है.

सभ्यता-अध्ययन से ज्ञात होता है कि जैसे-जैसे मानव विकास आगे बढ़ता गया, उसकी सभी कड़ियों को जोड़ने वाली कला ही थी. इसीलिए पाषाण औजारों से लेकर निश्छल, सरल भित्तिचित्र हमें उस दौर की कहानी बड़े ही रोचक ढंग से सुनते हैं, वहीं कला की नैसर्गिक ढंग से विकास यात्रा भी समझाते हैं. वह समझाते हैं कला हमारी जरूरत तब भी थी, अब भी है और आगे भी सदैव रहेगी. सभ्यता के प्रारंभिक दौर से ही अनजाने रूपा कारों का प्रचलन किसी न किसी रूप में सहज ही होता रहा है. पहले की सभ्यताओं-संस्कृतियों की अधिकतर कलाएं- गुफाओं, चट्टानों, शिलालेखों, मिट्टी के बर्तनों, वस्त्रों, आदि पर उकेरीं गयीं, जो अत्यंत सरल, सहज, प्रतीकात्मक, रेखागणितीय और रैखिक रूपों में पायीं गयीं. सबसे पहले इनका प्रयोग एक दूसरे को सन्देश प्रदान करने के लिए किया जाता था, धीरे-धीरे इनका प्रयोग सजावटी उद्देश्य के लिए होने लगा था. इससे यह बात जाहिर होती है कि अमूर्त कला आदि काल से ही सहज प्रचलन में थी, पर उसकी अमूर्त कला के रूप में विशेष पहचान भर नहीं थी. पूर्व काल से ही किसी न किसी वस्तु से कोई न कोई सांकेतिक आभास होता ही रहा है, यही सांकेतिक आभास ही आगे जाकर सभी तरह की भाषाओं का कारण बना, तथा उस समय के उन अपरिचित रूपाकारों को नयी संज्ञायें भी मिलती गयीं, उनका नामकरण भी होता गया. उस समय के उन रूपाकारों में अलग-अलग तरह से चित्रित रेखाएं ज्यादा महत्वपूर्ण थीं, रेखाओं से रेखागणतीय आकर की आकृतियों में बने सांकेतिक चित्र ही संवाद थे.

यह समझने के लिए हम मध्य प्रदेश में प्रागैतिहासिक कालीन भीमबेटका की गुफाओं का भ्रमण कर सकते हैं. मानव सभ्यता के विकास के चरणों में हम हड़प्पाकालीन सभ्यता, (सिंधुघाटी की सभ्यता, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा और राखीगढ़ी) तथा फिर वैदिक कालीन सभ्यताओं से लेकर राजशाही युगांत तक की सभी सभ्यताओं की वस्तुओं, भवनों और मुद्राओं पर हमें चित्रांकन मिलता है जो भासिक ही है या अमूर्त ही है. यानी यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी की प्रागैतिहासिक काल (आदिम युग) से लेकर वर्तमान तक कला की उपयोगिता रहीं है, इसे नकारा नहीं जा सकता. बल्कि सभ्यताओं के विकास में इसके योगदान को देखा जा सकता है. वेद इस सृष्टि के सबसे प्राचीन और पवित्र ग्रंथ हैं, वेदों में भी कलाओं से सम्बंधित वर्णन विभिन्न रूप में मिलता है. जहां से मानव विकास की कहानी शुरू होती है अमूर्त-कला की जीवन यात्रा वहीं से प्रारम्भ होती है. "शिवलिंग" इसका अनोखा और अद्वितीय उदाहरण है.  



(3)

भारतीय संस्कृति, सभ्यता और समाज तो अमूर्तन को सहज भाव में मानव सभ्यता के प्रारंभिक दौर से अनवरत जी रहा है अपनी नित्य की जीवन शैली में, वो भी इसे विशिष्ट रूप से बिना जाने, बिना समझे. हम अमूर्तन को सहजता से जी रहे हैं वो भी वास्तविक रूप में उसे बिना जाने, बिना समझे, बिना परिभाषित किये. वह कला ही है जिससे हमें सभ्यताओं के अध्ययन और उनकी जीवन-शैली को समझने में सहायता मिली है. यहाँ यह बताने का उद्देश्य बस यह है कि आभासीय कला या अमूर्त कला कोई अचानक से प्रकट होने वाला अजूबा नहीं है, यह हमारी सभ्यता के प्रारम्भ से वर्तमान तक अनवरत चलने वाली मानवीय भावनात्मक अभिव्यक्ति  और परंपरा है. यहाँ यह ध्यान देने की बात है की हमारी शुरुआत आभासीय कला से हुई जिसे आजकल हम अमूर्त-कला कहते हैं, और अब जैसे ही अमूर्त कला की बात आ जाती है तो हम विचलित से हो जाते हैं हमारे मस्तिष्क पर अनायास ही जोर-डालने लगते हैं, अमूर्त कलाकृतियों को सहजता से देखने, समझने और संवाद स्थापित करने की बजाय हम उन्हें अजूबा समझ बैठते हैं. जबकि अमूर्त कला तो बहुत ही सरल, सहज और हृदयस्पर्शी होती है. 

शायद हमारा ध्यान अमूर्तन के दृश्यकला स्वरूप तरफ पहले न गया हो पर अमूर्तन की परिकल्पना तो ईश्वरीय रूप में वैदिक-काल से वर्तमान तक सतत ज्यों कि त्यों है. सभी प्राचीन ग्रंथों में वर्णन है कि परमेश्वर निराकार है, अमूर्त है वह आभासी है, उसे देखा नहीं जा सकता पर आभास किया जा सकता है, महसूस किया जा सकता है. जिस प्रकार एक आभास होने वाली परिकल्पना कला के रूप में मूर्त होकर मूर्त और अमूर्त का भेद ख़त्म कर देती है, भले ही वह कला भी आभासी (अमूर्त) हो; उसी प्रकार परम-ब्रह्म परमात्मा परमेश्वर ईश्वर कोई अवतार धारण कर मूर्त या साकार ब्रह्म (सगुण ब्रह्म) हो जाता है इसमें कोई संदेह नहीं है. भले ही वह अवतार किसी प्राणी या जीवात्मा के रूप में हो या किसी कलाकृति के रूप में, वह  ईश्वर ही होता है. जो भी सादृश्य है वह मूर्त ही होता है भले ही हम अपनी सुविधा के लिए उसे मूर्त-वस्तुनिष्ठ (व्यक्ति-बोधक, वस्तु-बोधक, दृश्य-बोधक) अमूर्त (भासिक) आदि श्रेणियों में विभाजित कर दें. यह भी कहा जा सकता है कि आज हम जिस तरह की बौद्धिक परिपक्वता के स्तर पर हैं उसमें आभासीय या अमूर्त भाषा का ही सबसे ज्यादा योगदान रहा है. क्योंकि अगर हम एक-दूसरे को और तथ्यों को समझ न पाते तो मानव सभ्यता का यहाँ तक विकास शायद सम्भव ही न होता, या फिर कहें कि तथ्यों को समझते हुए भी अभिव्यक्त न कर पाते तो भी हमारा विकास सम्भव नहीं था.

मुझे पूर्ण विश्वास है सबसे पहली अभिव्यक्ति "आभासी" भाषा में ही रही होगी, क्योंकि सभी उन्नत कलाएं और भाषाएं हमारे निरन्तर विकास का परिणाम ही हैं, यह सब एकदम से प्रकट नहीं हुईं. सभी उन्नत कलाओं की जननी आभासीय कला है, तथा सभी उन्नत कलाओं का अनंत या परमतत्व भी आभासीय तत्व ही है. आभासीय कला या अमूर्त कला अत्यंत सूक्ष्म से सूक्ष्म संवेदना को भी व्यक्त कर सकती है, आभासीय कला ही कलाओं का चरम है, परम है, और धर्म है. यहाँ ऐसा बिलकुल न समझा जाये कि आभासीय कला सांकेतिक-कला या प्रतीकात्मक-कला होती है. सांकेतिकता या प्रतीकात्मकता तो सभी कलाओं में होती है चाहे कोई कला मूर्त (व्यक्ति-बोधक, वस्तु बोधक, दृश्य-बोधक), अमूर्त (आभासीय) या फिर कविता, साहित्य, संगीत, नृत्य और अभिनय ही क्यों न हो. वास्तव में सांकेतिकता कलाओं का गुण-धर्म है तथा यह कलाओं की समृद्धि और उसकी भावाभिव्यक्ति की पहचान है. हमारी सभी लोक कलाएं अत्यंत उन्नत, समृद्ध, सांकेतिक और प्रतीकात्मक कलाएं हैं, ये सभी किसी विशेष प्रयोजन, परंपरा और संस्कृति की पहचान हैं; ये सभी प्राकृत हैं. इन लोक-कलाओं के रूपाकार सहज, स्वप्रतिष्ठित और समृद्ध हैं, तथा इनका उद्भव भी अमूर्त आकारों से ही हुआ होगा. चूंकि इन लोक-कलाओं को पूरा का पूरा एक विशेष क्षेत्र रचता है, इसीलिए यह एक क्षेत्र विशेष की कलाएं कहलातीं हैं, और उस क्षेत्र विशेष के कारण ही इनका नामकरण संभव हुआ. हमारे लोक-जीवन को जोड़े रखने के लिए इन सभी लोक-कलाओं का विशेष योगदान है. अब सबाल यह उठता है कि क्या कलाओं में सांकेतिकता अनिवार्य है?

तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, पर फिर भी सभी कलाओं में यह तत्त्व तो मौजूद होता ही है, बस हमारे देखने और समझने का फर्क होता है. जब हम किसी परिचित मुद्दे के संकेत की बात करते हैं तो यह हम शीघ्र ही कह सकते हैं की फलां कलाकृति ऐसा सन्देश देती है, और जब यह अपरिचित मुद्दा हो तो हम उस सन्देश को उस कलाकृति में विलीन हुआ समझते हैं, पर संकेत तो अवश्य होता है, हो सकता है यह किसी मुद्दा विशेष का न होकर अध्यात्म या फिर भौतिक जीवन के रंगमंच का हो. कलाकृति में रस, भाव, कला-तत्व, गुण-धर्म, रूप भेद, संयोजन, सौंदर्य, अभिव्यंजन और संकेत तो होते ही हैं, इसीलिए तो सभी कलाओं को दिव्य कहा जाता है. मुझे लगता है संसार कि हरेक वस्तु बिना कला के शून्य है, संसार की हरेक वस्तु में कला विद्यमान है, क्योंकि इसका सम्बन्ध हमारी आत्मा से होता है; इसीलिए जन्म लेने के बाद छोटा शिशु भी विशेष आकर और विशेष रंग के खिलौने की तरफ ही आकर्षित होता है. यह बात अलग है की अगल-अलग शिशु का यह अलग-अलग खिलौना हो सकता है. बस यह छोटा सा उदाहरण ही मानव जीवन में कला का सम्बन्ध, महत्व और आवश्यकता बताने के लिए काफी है. भर्तृहरि ने अपने नीति शतक में साहित्य, संगीत तथा कला का महत्व बताते हुए इनसे विहीन मनुष्य को पशु तुल्य माना है.

"साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनःl 

तृणं न खादन्नपि जीवमानस्तद्भागधेयं परमं पशूनाम्॥"

(अर्थात जो मनुष्य साहित्य, संगीत, कला, से वंचित होता है वह बिना पूंछ तथा बिना सींगों वाले साक्षात् पशु के समान है. वह बिना घास खाए जीवित रहता है यह पशुओं के लिए निःसंदेह सौभाग्य की बात है.)

"कविता के बिना काम नहीं चल सकता, पर मैं यह नहीं जनता की उसका काम क्या है."

अपनी इस महत्वपूर्ण टिप्पणी में "ज्याँ-कॉक्टो" ने हमारे जीवन में कला के महत्व को बहुत सुन्दर तथा भावनात्मक तरीके से व्यक्त किया है. हमारे आस-पास के जीवन से संतुलन स्थापित करने वाला साधन कला ही है.

डॉ जगदीश गुप्त ने भी कला का मर्म बताते हुए लिखा है "कला का मर्म है निगूढ़ होते हुए भी संवेदना में घुल जाना."

अनेक भारतीय और विदेशी कला-मनीषियों ने अपने-अपने अनुभव से कला को परिभाषित किया है, पर कला शब्द इतना व्यापक है कि विभिन्न विद्वानों की परिभाषाएँ केवल कला के एक विशेष पक्ष को छूकर रह जाती हैं. कला की कोई एक परिभाषा अभी तक निश्चित नहीं हो पायी, यद्यपि इसकी हजारों परिभाषाएँ बनायीं गयी है. भारतीय परम्परा के अनुसार कला उन सारी क्रियाओं को कहते हैं जिनमें कौशल अपेक्षित हो या कौशल का प्रयोग किया गया हो, तथा भाव प्रधान हो. हमारे प्राचीन ग्रंथों में अधिकतर दृश्य-कलाओं या ललित कलाओं को रस व आनंद प्रदान करने वाला मानवीय सृजन तथा सौंदर्य साधना की अनूठी आकर्षण शक्ति माना गया है. कला एक प्रकार का कृत्रिम निर्माण है जिसमें शारीरिक और मानसिक कौशल का प्रयोग किया जाता है, तथा जिसमें भाव सम्प्रेषण ही उसका महत्वपूर्ण घटक होता है. 

भारतीय मनीषियों में प्रमुख पाणिनी, मार्कण्डेय, वेदव्यास, भरतमुनि, वात्स्यायन, शुक्र उशनस, भर्तृहरि, राजाभोज, अभिनवगुप्त, पंडित क्षेमराज, वाचस्पति गैरोला, रविंद्रनाथ ठाकुर, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, बलदेव उपाध्याय, पंडित भोलानाथ तिवारी आदि प्रमुख है. विदेशी कला-मनीषियों ने भी कला में कौशल को ही महत्त्वपूर्ण माना है. विदेशी कला मनीषियों में प्लेटो, क्रोचे, टालस्टाय, रस्किन,ज्यां कोक्टो, मोन्द्रियाँ, अंर्स्ट फिशर, हैरल्ड रोजेनबर्ग आदि प्रमुख है.

सभ्यता की पहली और सबसे प्राचीनतम पुस्तकें ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद तथा अनेक प्राचीन ग्रथों उपवेद, शास्त्र, पुराण जैसे विष्णुधर्मोत्तर पुराण, भविष्यपुराण, ब्रह्मपुराण, विश्वकर्मा शिल्प, विश्वकर्मा प्रकाश, रामायण, महाभारत, मानसार शिल्पशास्त्र, नाट्यशास्त्र, कामसूत्र, शुक्रनीति, अष्टाध्यायी, शिवस्वरूप विमर्शिनी, शांखायन ब्राह्मण, षडर्विश ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण, तैत्तरीय, आरण्यक, ललितविस्तर, कलाविलास, प्रबंधकोश, कल्पसूत्र, कालिकापुराण, भगवतीसूत्र, जातकमाला, औपपातिक सूत्र, चित्रसूत्र, समरांगण सूत्रधार, शिल्परत्नम्, शिल्पकलादर्शनम्, चित्रकर्मशास्त्र, अभिलषितार्थ चिन्तामणि, चित्रलक्षणम् से लेकर अभी तक के अनेक ग्रथों में कला-विषयक उदहारण,  कला का प्राण है रसात्मकता, रस अथवा आनन्द अथवा आस्वाद्य हमें स्थूल से चेतन सत्ता तक एकरूप कर देता है. मानवीय संबन्धों और स्थितियों की विविध भावलीलाओं और उसके माध्यम से चेतना को कला उजागार करती है. अतः चेतना का मूल ‘रस’ है. वही आस्वाद्य एवं आनन्द है, जिसे कला उद्घाटित करती है. प्राचीन भारतीय कलाओं में एक ओर वैज्ञानिक तथा तकनीकी आधार पाया जाता है तो दूसरी ओर सदैव रस एवं भाव का प्राण-तत्व. 

कला दिव्य है तो भव्य भी, कला शाश्वत है तो सत्य भी, कला शक्ति है तो भक्ति भी, कला रस है तो रास भी, कला भाव है तो विचार भी, कला ध्यान है तो अध्यात्म भी, कला आसक्ति है तो पराशक्ति भी, कला अलौकिक है तो लौकिक भी, कला सौंदर्य है तो माधुर्य भी, कला जड़ है तो चेतन भी, कला सरल है तो अविरल भी, कला सूक्ष्म है तो स्थूल भी, कला प्रतीक है तो सटीक भी, कला बिम्ब है तो प्रतिविम्ब भी, कला ही 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' है. वात्स्यायन ने अपने विश्वप्रसिद्ध ग्रन्थ कामसूत्र में चित्रकला के छह अंगों का वर्णन किया है, 

"रूपभेदाः प्रमाणानि भावलावण्ययोजनम्. सादृश्यं वर्णिकाभङ्ग इति चित्रं षडङ्गकम्॥"

(अर्थात रूपभेद, प्रमाण, भाव, लावण्य, सादृश्य और वर्णिकाभङ्ग आदि चित्रकला के छः अङ्ग हैं.)  




 

(4)

मेरा मानना है कि “कला-तंत्र" से कोई कृति महत्वपूर्ण बन जाती है. कला-तंत्र क्या है? सृष्टि में निहित अनेक परा-ऊर्जाओं को एक कलाकृति में प्रतिष्ठित करने की कला को ही कला-तंत्र कहते हैं. फिर चाहे वह कलाकृति मूर्त (व्यक्तिबोधक, दृश्य या प्रकृतिबोधक, वस्तुबोधक) या फिर अमूर्त (आभासी) ही हो.

कला-तंत्र रूपा कारों और परा-ऊर्जाओं का सही संयोजन है. हमारे यहाँ तंत्र-विज्ञान में रेखागणतीय आकारों का प्रयोग सर्वाधिक हुआ है. रेखागणतीय भिन्न-भिन्न आकारों से विशेष प्रभाव पैदा करने वाले संयोजनों को हमारे साधक ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने निरन्तर शोध द्वारा आविष्कार किया. इन्हीं सधे हुए आविष्कारों से हमें तंत्र/यंत्र-विज्ञान मिल. तंत्र-विज्ञान में रेखाओं और आकारों की दैवीय शक्ति देखी जा सकती है, यहाँ अलग-अलग रूपाकारों में अंतरिक्ष (स्पेस) विभाजन होता है, जो उस यन्त्र को अनेक ब्रह्मांडीय या परा-ऊर्जाओं के साथ जोड़ता है, तथा उसे ब्रह्मांडीय या परा-ऊर्जाओं से समृद्ध करता है. ये सभी यन्त्र वास्तव में रेखागणतीय रेखाचित्र या संयोजन ही है पर सधे  हुए परिष्कृत .  किसी भी व्यवस्थित विधि या कार्यप्रणाली को तंत्र कहते हैं, तंत्र या यन्त्र का अभिप्राय गूढ़ या रहस्य भी है. यदि हम हमारे प्राचीन और पौराणिक ग्रंथों का अध्यन करें तो उनमें अनेक तंत्रों/यंत्रों का वर्णन मिलता है जो कि चित्र और शिल्प दोनों ही प्रकार में है.

इस तंत्र-विज्ञान का विधिवत बौद्धिक अध्यन करके आप अपनी कलाकृतियों में बेहद ऊर्जावान अंतरिक्ष (स्पेस) विभाजन (संयोजन-निर्माण) तो कर ही सकते हैं, जो कि एक सफल कलाकृति की आवश्यकता भी होती है.  तंत्र-विज्ञान से आप अपनी कलाकृति में ऊर्जा-संतुलन निश्चित ही सीख सकते हैं.  यही ऊर्जा-संतुलन किसी भी कलाकृति को समृद्ध और प्रसिद्ध बनती है.  वैसे भी कला में रेखागणतीय आकारों का प्रयोग आदिमकाल से ही होता आया है.  

अनेक समकालीन भारतीय कलाकारों ने अपनी कला में तंत्र-विज्ञान का बेहद सधा हुआ प्रयोग और पंच-तत्वों का अभूतपूर्व संतुलन करके महान वैश्विक सफलता प्राप्त की है. हो सकता है उन्होंने तंत्र-विज्ञान का प्रयोग अनायास ही किया हो, या फिर हो सकता है कि वो तंत्र-शास्त्र या तंत्र-विज्ञान के गूढ़ रहस्य को समझते हों, तथा पंच-तत्वों की शक्ति और उसके संतुलन से भली भांति परिचित हों, जो भी हो पर उनकी कलाकृतियां तंत्र-संगत हैं. ऐसे भारतीय कलाकारों में वासुदेव एस गायतोंडे, वीरेन डे, सैयद हैदर रज़ा, जगदीश स्वामीनाथन, गुलाम रसूल संतोष, प्रफुल्ला मोहन्ती, सचिदा नागदेव, शोभा बरूटा, शंकर पलसिकर, प्रभाकर बर्वे, ओमप्रकाश शर्मा, प्रभाकर कोल्टे, सोहन कादरी, अनीस कपूर आदि प्रमुख हैं. जैमिनी रॉय और मक़बूल फ़िदा हुसैन की कला लोक-कला और तंत्र-कला दोनों से ही प्रभावित लगती है. हमारी सभी लोक कलाओं पर तो तंत्र-कला का प्रभाव प्रारम्भ से ही देखने को मिलता है, भारत की कोई भी लोक-कला इससे अछूती नहीं है. ठीक इसी प्रकार तंत्र-कला परंपरा ने समकालीन भारतीय कला और कलाकारों पर भी अमिट अद्वितीय प्रभाव डाला है.

 


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हमारा शरीर पांच मूलभूत तत्वों से बना है, जिन्हें हम पंच-महाभूत भी कहते हैं.  गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरितमानस में लिखा भी है,

“क्षिति जल पावक गगन समीरा l   पंच रचित अति अधम शरीरा ll  "

(अर्थात पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु – इन पंचतत्वों से यह शरीर नश्वर रचा गया है.)

इसी बात कि पुष्टि यजुर्वेद, ब्रह्म पुराण, स्कंद पुराण, मनुस्मृति, पातंजलि योग, वेदान्त सूत्र, प्रश्नोपनिषद्, वाल्मीकि रामायण, महाभारत आदि में भी मिलती है.  इन्हीं पंचतत्व को ब्रह्मांड में व्याप्त लौकिक एवं अलौकिक वस्तुओं का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कारण और परिणति माना गया है.

एक अच्छे कलाकार को चाहिए कि वह जैसे भी संभव हो अपनी कला में पंचतत्वों का संतुलन करना सीखे. इसके लिए उसे जहाँ से जो भी ज्ञान मिले अवश्य प्राप्त करना चाहिए. कला-महाविद्यालयों और कला-विश्वविद्यालयों में हमारा कला विषयक अध्ययन का क्षेत्र चयनित या संकुचित है.

चित्र या मूर्ति अपना अलग-अलग प्रभाव छोड़ते हैं जैसी उनमें ऊर्जा निहित होती है. जब कोई कलाकृति अनायास ही प्राकृत ऊर्जा संगत सूत्रों-सिद्धांतों से बन जाती है तो वह महान हो जाती है, तथा जो नहीं बन पाती वो रह जाती है. यही कारण है कि किसी कलाकार की कोई कलाकृति बहुत प्रसिद्धि प्राप्त कर लेती है और कोई नहीं कर पाती. जब कलाकार की साधना पक्की हो जाती है तो उसकी कलाकृतियां स्वाभाविक रूप से ब्रह्मांडीय-ऊर्जा-संगत बनने लगतीं है. वास्तव में ऐसे कलाकार सिद्धहस्त तथा मूर्धन्य हो जाते हैं.  जब हम किसी भी कलाकृति के सामने जाते हैं तो उससे हमें कुछ स्पंदन महसूस होता है, यह वही स्पंदन हैं जो हमारे जीवन को प्रभावित करता है. यह सकारात्मक, नकारात्मक या अकरात्मक कुछ भी हो सकता है, तथा यही प्रभाव जहाँ भी वह कलाकृति प्रतिष्ठित होती है वहां पड़ता है

 


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अमूर्त-कला मूर्त-कला से ज्यादा प्राकृतिक होती है क्योंकि अमूर्त-कला में रेखाएं हों, रंग हों, आकर हों या फिर कोई मूर्ति-शिल्प हो ज्यादा सहज और प्राकृतिक होते हैं. जबकि मूर्त-कला में कहीं न कहीं हम सीमाओं में बंधे होते हैं चाहे वह प्रत्यक्ष हों या परोक्ष. जबकि दोनों में कला-तत्व, रस, भाव, संयोजन आदि समान ही होते हैं, तथा दोनों ही शैलियों का अपना अनूठा महत्व है, दोनों ही समान हैं.

मैं लगातार पिछले २४ वर्षों से अमूर्त (आभासी) कला में कार्य कर रहा हूँ. इस दौरान मैं अनेक कलाकृतियों का माध्यम बना. यहाँ मैं अपने आप को माध्यम भर इसलिए कहा रहा हूँ क्योंकि दिव्य कला बनती नहीं और न ही बनाई जा सकती वह तो प्रकट होती है. तथा कलासाधक/ कलाकार सिर्फ माध्यम से ज्यादा कुछ नहीं होता. वहां उसका सारा का सारा कला सम्बन्धी तकनीकी ज्ञान धरा का धरा रह जाता है. भावनाओं से ही हृदय में स्पंदन होता है, फिर अंकुरण होता है और कलाकार के हृदय में अंकुरित प्रस्फुटित कला आवेग स्वतः अनेक नूतन कलाकृतियों को जन्म दे जाता है. कभी यह आवेग उसके हृदय में उठ रहीं भावनात्मक हिलोरों का परिणाम होता है तो कभी उसके मस्तिष्क में चल रहे किसी विचार का परिणाम होता है, तो कभी उसके मन और मस्तिष्क के विचारिक द्वन्द की परणिति. चूंकि किसी भी कलाकार के लिए कलाकर्म एक बेहद निजी वजह या प्रसंग है, इसलिए कलाकार स्वयं ही अपनी कला का सृजक और प्रथम द्रष्टा होता है, अस्तु वह स्वयं ही उसकी कलाकृति का सही आकलन भी कर सकता है, तथा अपनी कला को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ और समझा सकता है. उसकी कलाकृति की उत्कृष्टता या कमजोरी भी वह स्वयं सही से भांप या माप सकता है.  

श्रीविष्णुधर्मोत्तर पुराण के तैंतालीसवे अध्याय में चित्रकला को सभी कलाओं में प्रधान कला बताई गई है.

"कलानां प्रवरं चित्रं धर्मकामार्थ मोक्षदं.

मङ्गल्यं प्रथमं चैतदृहे यत्र प्रतिष्ठितं॥" ३८/४३,

"यथा सुमेरुः प्रवरो नगानां यथाण्डजानां गरुड़ः प्रधानः.

यथा नराणां प्रवरः क्षितीशस्तथा कलानामिह चित्रकल्पः॥" ३९/४३,

(अर्थात कलाओं में चित्रकला है यह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष प्रदान करने वाली है, जिस घर में चित्र प्रतिष्ठित होते हैं वहां मङ्गल ही होता है. जिस तरह पर्वतों में सुमेरु प्रधान है, पक्षियों में गरुड़ प्रधान है, मनुष्यों में राजा प्रधान होता है वैसे ही कलाओं में चित्रकला प्रधान है.)

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मनोज कचंगल का जन्म शाढ़ौरा जिला गुना मध्यप्रदेश में ५ जुलाई १९७९ को एक मध्यवर्गीय कृषक परिवार में हुआ. मनोज ने शासकीय ललित कला संस्थान, इंदौर से चित्रकला में  वर्ष २००३ में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की.

मनोज को वर्ष २००१ में  मध्य-प्रदेश कला परिषद द्वारा "रज़ा-पुरस्कार" से सम्मानित किया गया. इनके चित्रों की अभी तक ३४ एकल व अनेक सामूहिक प्रदर्शनियां देश की कई सुप्रसिद्ध कला दीर्घाओं में लग चुकी हैं.

मनोज के कलाकर्म पर वरिष्ठ इतिहासकार और कला-समीक्षक श्रीमती रत्नोत्तमा सेनगुप्ता के संपादन में भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली द्वारा वर्ष २००८ में एक पुस्तक "डोर्स ऑफ़ परसेप्शन आर्ट ऑफ़ मनोज कचंगल" का प्रकाशन किया गया तथा श्री प्रवेश भारद्वाज के निर्देशन में एक डॉक्युमेंट्री फिल्म भी बनाई जा चुकी है. मनोज के चित्र भारत सहित विदेशों के कई कला-संग्राहकों ने संग्रह किये हैं.

सम्प्रति मनोज ग्रेटर नोएडा में रहकर अपना कलाकर्म कर रहे हैं.

manojkachangal@gmail.com

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  1. महमूद अहमद3/3/21, 11:49 am

    Wonderful Art works nice statements ��������������

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  2. Rakesh mishra4/3/21, 12:38 pm

    अमूर्तन कला के सामान्य शिष्टाचार का अतिक्रमण हैं ,, बहुत अच्छी परिभाषा लगी ,, बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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