उषा प्रियंवदा की स्त्रियाँ : प्रेमकुमार मणि


 

‘वापसी’ जैसी कालजयी कहानियों के अलावा ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’, ‘रुकोगी नहीं राधिका’, ‘शेषयात्रा, ‘अंतर्वंशी’,‘भया कबीर उदास’, ‘नदी’, 'अल्पविराम' आदि उपन्यासों की लेखिका उषा प्रियंवदा ने बीते २४ दिसंबर को अपने जीवन के नब्बे वर्ष पूरे किये. जिस तरह की उनपर चर्चा होनी चाहिए थी नहीं हुई, कायदे से तो उनपर एकाग्र कई आयोजन भी होने चाहिए थे. उम्मीद है कोरोना-संक्रमण खत्म होने पर अकादमियां इसी दिशा में कुछ कार्य करेंगी.

लेखक आलोचक प्रेमकुमार मणि ने उषा प्रियंवदा की विशिष्टता को विस्तार से रेखांकित करते हुए विशेष रूप से उनके तीन उपन्यासों- ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’, ‘रुकोगी नहीं राधिका’ और ‘शेषयात्रा की मुख्य स्त्री पात्रों पर आधारित यह आलेख लिखा है.

उषा जी के शतायु होने की कामना के साथ यह आलेख प्रस्तुत है.   

 

उषा प्रियंवदा की स्त्रियाँ                                 
प्रेमकुमार मणि

 




षा प्रियंवदा हिंदी कथा साहित्य की एक महत्वपूर्ण, लेकिन मेरे जानते कुछ-कुछ उपेक्षित-सी,लेखिका हैं. उन पर बहुत दिनों से लिखने की मेरी इच्छा थी. इस वर्ष यानी 2020 की 24 दिसम्बर को उनका जन्मदिन आया, जो इन अर्थों में खास था कि वह अपने जीवन के नब्बे वर्ष पूरा कर रही थीं, तब मेरे मन में एक बार फिर उनका लेखन कई रूपों में घुमड़ा, और तय किया, उन पर कुछ लिखना जरूरी है.

मुझे स्मरण होता है, जब मैंने उनकी कहानी 'वापसी' पढ़ी थी, तभी से उनका जादू मेरे मन पर था. वह कहानी हिंदी की उन कहानियों में है, जिस पर कोई भी भाषा थोड़ा गुमान कर सकती है.

दुनिया भर में परिवार मनुष्य जाति की सब से पुरानी संस्था है. दुनिया भर में भिन्न-भिन्न  तरीके से वह  टूट-बिखर रहा है. अल्वेर कामू के उपन्यास 'अजनबी' (द स्ट्रेंजर) और कामिल खोसे सेला के उपन्यास 'पास्कल दुआर्ते का परिवार' (ला फॅमिला पास्कल दुआर्ते) में हम परिवारों का विघटन देखते हैं. लेकिन; वापसी कहानी का पिता गजाधर प्रसाद ठेठ हिन्दुस्तानी अंदाज में इस विघटन को महसूस कर रहा है. अपने रिटायरमेंट के बाद वह उस घर में लौटता है,जिसे जिंदगी की गाढ़ी कमाई से उसने सृजित किया है. वह इस घर का मुखिया है. इस घर में उसकी धर्मपत्नी है, बेटे-बेटी हैं, बहू है. लेकिन गजाधर स्वयं को इस घर के लिए अप्रासंगिक महसूस कर रहा है. घर वालों के लिए ही वह फालतू आदमी हो चुका है. परेशान गजाधर अपने पुराने विभाग से पत्राचार करता है और उसे सेवा विस्तार मिल जाता है. उसने घर में यह सूचना दी,तब घर में आश्वस्ति घिर आती है. तय तारीख को जब वह घर से विदा होता है, तब पूरा घर ख़ुशी से भर जाता है. इस ख़ुशी में सब शामिल हैं, उसकी पत्नी तक.

उसका बहिर्गमन, जो एक अर्थ में उसकी वापसी है, घर को आश्वस्त करती है. यह है परिवार- भारतीय संस्कृति का सबसे विश्वसनीय आधार. परिवारों का विघटन हमारे प्राचीन महाकाव्य  रामायण और महाभारत में भी है. लेकिन इस पूंजीवादी आधुनिक युग का परिवार कितने पोपले आधार पर आ चुका है, इसका पता हमें इस कहानी से मिलता है. समकालीन यथार्थ का एक नया और विश्वसनीय रूप उभर कर कहानी बन जाती है और जिस यथार्थ को हम प्रतिदिन अपने इर्दगिर्द देखते रहे हैं वही हमें अजनबी की तरह चौंका जाता है,अचंभित कर जाता है. ऐसा प्रतीत होता है, हमने कोई नया सत्य देख लिया है. यही तो लेखक करता है. वह हमारे भीतर छुपे सत्य को बस इंगित करता है और युग द्रष्टा बन जाता है. जाने कब से सेब धरती पर गिर रहे थे. लेकिन न्यूटन ने बतलाया कि वह धरती पर ही क्यों, किस कारण गिरता है? आकाश की ओर क्यों नहीं चला जाता? न्यूटन को हमने वैज्ञानिक कहा. इसलिए कि उसने हमें एक विशिष्ट बात बताई. एक नए सत्य को उद्घाटित किया. उषा प्रियंवदा ने हजारों गजाधरों में से एक की पीड़ा को हमारे सामने रखा और हमें समकालीन परिवार का वास्तविक चेहरा दिखने लगा. युग का सत्य दिखने लगा. 

उषा प्रियंवदा ने मुख्य रूप से शहरी जीवन को देखा-परखा और चित्रित किया है. वह 1930 में कानपुर के एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मीं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए., पीएच.डी. किया. कुछ समय तक इलाहाबाद में अध्यापन के बाद उन्होंने  दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में तीन वर्षों तक अध्यापन किया और फिर फुलब्राइट स्कॉलरशिप पर अमेरिका चली गईं. अंततः वहीं प्रोफ़ेसर बन गईं और एक अमेरिकन से ही विवाह भी कर लिया. वह उसी दुनिया में बस गईं.

भारत से विदेश बहुत लोग जाते हैं. वहीं बस जाने वालों की भी बड़ी तादाद है. लेकिन इनमें  पुरुष अधिक होते हैं. स्त्रियां तो प्रायः उनकी पत्नी रूप में जाती रही हैं. लेखिका, खास कर हिंदी जबान की, तो उस ज़माने में शायद ही कोई हो. उषा वहां अकेली जाती  हैं और वहीं बसने का निर्णय भी स्वयं ही करती हैं. खास बात यह कि वह लिखना जारी रखती हैं. वह भी हिन्दी  में. इसे जिद ही कहा जाएगा. उनके जीवन के इस विवरण में हमें  उनका एक व्यक्तित्व भी मिलता है, जो उनके लेखन में भी हर जगह मिलता है. उनकी स्त्रियां बात-बात में टेसुए बहाने वाली नहीं हैं. आँचल में दूध और आँखों में पानी लेकर चलने वाली स्त्रियां तो उनके यहाँ बिल्कुल नहीं है. उन्मुक्त यौनाकांक्षा के फलसफे लिखने वाली स्त्रियां भी उनके यहां नहीं हैं. उषा के साहित्य में चुनौतियाँ स्वीकारने वाली, उस से जूझने वाली स्त्रियां हैं. इन सब स्त्रियों को उन्होंने अपने इर्दगिर्द देखा है. उन्हें अपनी सोच से उन्होंने प्रगल्भ किया है. उन्हें अपना जुझारू व्यक्तित्व दिया है. इस व्यक्तित्व को उषा ने खुद विकसित किया है. 

उषा जब हिंदुस्तान में ही थी, तब कम जुझारू नहीं थीं. प्राप्त जानकारी के अनुसार जब वह गोद में ही थीं कि उनके पिता का निधन हो गया. माँ थीं प्रियंवदा  देवी. अपने यौवन  में ही विधवा हो गई स्त्री के प्रति हिंदुस्तानी समाज कितना असंवेदनशील हो सकता है, इसे उषा ने माँ को झेलते बचपन से देखा है. वह जैसे ही कुछ निर्णय लेने की स्थिति में आती हैं अपना  नाम-संस्कार करती हैं. युवा उषा सक्सेना ने अपने नाम से कुलनाम सक्सेना हटाया और माँ का नाम प्रियंवदा जोड़ लिया. वह उषा सक्सेना से उषा प्रियंवदा हो गईं. यह उनका पहला मौन-विद्रोह था.

कोई स्त्री पिता और पति का कुलनाम क्यों जोड़े ? माँ का नाम क्यों नहीं जोड़े ? उषा ने जोड़ा. दुनिया बदलने का अपना-अपना तरीका होता है. एक तरीका यह भी था. देखने में यह छोटी-सी बात लगती है, लेकिन नहीं, इसके पीछे एक दृष्टिकोण है. यही दृष्टिकोण उषा के लेखन का वैचारिक आधार बनता है. 

आप स्मरण कीजिए 1950 के दशक का. हमारे साहित्य में क्या हो रहा था ? यही वह समय था जब हिंदी कथा साहित्य में  नई कहानी आंदोलन चल रहा था. लोकतंत्र विविध रूपों में हमारे साहित्य का हिस्सा हुआ जा रहा था. अपने इतिहास, अपनी पौराणिकता और परंपरा के विश्लेषण किए जा रहे थे. उनकी मीमांसा हो रही थी. समाज के सभी तबकों को एक नए नजरिए से देखा जाने लगा था. लेकिन रूढ़िवादियों का जोर था, सब कुछ बदल जाए, स्त्रियों को पारम्परिक रूप में ही रखा जाना चाहिए. वह जो बदल गईं, सब कुछ बदल जाएगा. यही कारण था कि हिन्दू कोड बिल पर जब संसद में बहस उठी, तब तमाम रूढ़िवादी ताकतें एकजुट हो गईं. डॉ. आम्बेडकर के अनुसार जवाहरलाल नेहरू अपने वायदे से मुकर गए. तत्कालीन कानून मंत्री डॉ. आम्बेडकर को पीछे हटना पड़ा और क्षुब्ध होकर उन्होंने केंद्रीय मंत्री परिषद से इस्तीफा कर दिया.

युवा उषा जी ने निश्चय ही इस पूरे पुरुष-प्रपंच को देखा-समझा था. वह पुरुष प्रधान समाज की इस चालाकी को समझ रहीं थीं. अपने सम्पूर्ण साहित्य में उन्होंने इस पुरुष-चातुर्य अथवा मिथ्याचार को ही ध्वस्त करने की कोशिश की है. उनका लेखन शिकायती मनोविज्ञान से परिचालित नहीं है. वह पुरुष-दरबार में कोई इस्तगासा पेश नहीं करतीं. अपने पात्रों को लेकर एक दुनिया गढ़ती हैं. उनका साहित्य किसी खास तबके को सम्बोधित नहीं है. वह स्त्री मन का एक अजूबा-सा लोक साहित्य-फलक पर उभारती हैं. उनकी स्त्रियां दृढ़-संकल्प वाली और परिस्थियों से जूझने वाली हैं. स्त्रियों का दुःख चूकि अधिक है, अतएव उनका संघर्ष भी अधिक है, उसके पेचों-खम भी अधिक हैं. लेकिन उषा इन सबको एक संतुलन देती हैं. उनका लेखन न अग्निवर्षी है, न सुस्त. वह बस साहित्य रचती हैं ,और उसे पढ़ कर ही समझा जा सकता है.  

उषा जी का लेखन विपुल है. वह पिछले सात दशक से लिख रही हैं. मैं नहीं जानता हिंदी साहित्य, खास कर आलोचना-साहित्य में, में उनकी उपेक्षा क्यों हुई. लेकिन यह तो सच है कि उन्हें अपने समकालीन लेखकों की तरह वह सम्मान नहीं मिल सका, जिसकी वह हकदार थीं. यह जरूरी नहीं कि उपेक्षा जान-बूझ कर ही हुई हो. यह भी संभव है, पारम्परिक पाठक समाज को वह बहुत कुछ अबूझ और फालतू-जैसी लगी हों. हिंदी का पाठक समाज वाह्य आवरण का परिवर्तन पसंद करता रहा है, मौलिक परिवर्तन की चर्चा भर से उसे परेशानी होने लगती है. आप नई भाषा और मुहावरे गढ़ रहे हैं, प्रकृत हो रहे हैं, नयी जानकारियां दे रहे हैं, तब तो बहुत खूब. लेकिन जैसे ही आप उनके जमे-जमाए विचारों को कोई चुनौती देते हैं, वह बिफर उठते हैं.

यशपाल को हिंदी समाज ने बहुत पहले किनारे लगा दिया और निर्मल वर्मा को माथे पर बैठा लिया, आखिर कोई कारण तो था? जब हम इन कारणों की खोज करेंगे, उषा जी की उपेक्षा के कारणों को भी समझ जाएंगे. हालांकि,  स्वतंत्र रूप से उनकी कहानियों और उपन्यासों के पाठक खूब मिले. जब उनकी कहानी 'वापसी' प्रकाशित हुई तो इसकी खूब चर्चा हुई. इसने हमारे सोच के आधारभूत तत्वों को कुछ तोडा.

उनके कहानी-संग्रह 'जिंदगी और गुलाब के फूल', 'फिर वसंत आया' और 'एक कोई दूसरा' ने भी पाठकों को प्रभावित किया था. 1961 और 1966 में आए उनके दो उपन्यासों क्रमशः 'पचपन खम्बे लाल दीवारें' और 'रुकोगी नहीं राधिका' ने अपने ही अंदाज़ में हमारे कथाजगत में  हस्तक्षेप किया. फिर आया 1984  में  'शेष यात्रा'  उपन्यास. सोलह साल की चुप्पी के बाद सन 2000  से 2013 के बीच 'अंतरवंशी', 'भया कबीर उदास' और 'नदी' शीर्षक तीन उपन्यास आए. बावजूद इन सब के अन्य अनेक लेखिकाओं की तरह वह अपेक्षित चर्चा में नहीं आ सकीं. शायद इसका एक कारण उनका प्रवासी हो जाना भी रहा हो. चेहरा देख कर चर्चा करने वाले हिंदी भाषी साहित्य समाज ने स्वाभाविक रूप से उनकी नोटिस लेनी बंद कर दी. दूसरा कारण संभवतः इस पूरे दौर को मार्क्सवादी घटाटोप से आक्रांत होना भी रहा. उषा जी ने अपने साहित्य में किसी वाद का परचम नहीं फहराया था, यहां तक कि साहित्यिक आंदोलनों की भी उपेक्षा की थी. वह किसी साहित्यिक घराने से नहीं जुड़ीं और इसका खामियाजा उन्हें शायद भुगतना पड़ा. लेकिन आज हम उनके लिखे का जब मूल्यांकन करते हैं, तब स्वाभाविक है कि हम सभी प्रकार के आवेग से असम्पृक्त हों. 

उषा जी ने जब लिखना आरम्भ किया था तब हमारा मुल्क राजनीतिक तौर पर  नेहरूवादी दौर में था. उपनिवेशवाद से मुक्ति मिल गई थी, लेकिन देश मजहब के आधार पर बँट गया था. जिस व्यक्ति के नेतृत्व में देश ने राष्ट्रीय संघर्ष किया था, उसे मजहबी नफरत की आग में शहीद होना पड़ा था. भारत की मुश्किलें कई स्तरों पर थी. आज़ाद भारत का नया संविधान  लागू हो गया था और 1952 में पहला आमचुनाव भी संपन्न हो गया था. इक्कीस साल और उसके ऊपर के सभी स्त्री-पुरुष, बालिगों को मताधिकार मिला था. पंचवर्षीय योजनाएं शुरू हुईं और भारत निर्माण का काम जोर-शोर से आरम्भ हुआ था. हिंदी अब राज भाषा थी और राष्ट्र भाषा भी. स्वाभाविक था, उस के साहित्य की ओर पूरी दुनिया का ध्यान आकृष्ट होता. लेकिन हिंदी के कुछ मठाधीशों  को अपने उत्तरदायित्व का बोध कम, साहित्य से अपने निहित स्वार्थों को जोड़ने का बोध अधिक था. हिंदी साहित्य का आत्मसंघर्ष एक अनूठे अंदाज़ में चल रहा था. कई प्रवृत्तियां आपस में गुत्थमगुत्था हो रही थीं. अल्हड आधुनिकता का भी जोर था और घनघोर पुरातन का भी. मार्क्सवादी प्रवृत्तियां भी मुखर हो रही थीं और राष्ट्रीयता के नाम पर देसी रूढ़िवाद भी सिर उठा रहा था. 

दुनिया भर के साहित्य पर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जो भय, कुंठा, अकेलापन और ऊब की  प्रवृत्तियां हावी हुई थीं उसकी नकल  हमारे भारतीय साहित्य में भी की गई. लेकिन भारतीय समाज में हासिए के लोगों की पीड़ा कुछ भिन्न रूप में थी. स्त्रियां, गाँवों में बसने वाले मेहनतकश तबकों के दलित और पिछड़े लोग,किसान-मजूर-दस्तकार. ये सब थे वे लोग जिन्हें साहित्य में अपनी गाथा सुनानी थी. हिंदी कविता में अलग ढंग से कोशिशें हो रही थीं. लेकिन कथा साहित्य में रेणु ने विशुद्ध देसी अंदाज़ में इनकी गाथा सुनाई. कुछ इसी रूप में शहरी मध्य वर्ग की स्त्रियों को उषा प्रियंवदा ने साहित्य में उभारा. उनके यहाँ 'लाल पान की बेगम' जैसी कहानियां और लछमिन कोठारिन जैसे पात्र नहीं हैं. ग्रामीण महिलाओं या जीवन को उषा जी ने छुवा नहीं है. उनसे उनका कोई संपर्क नहीं था. अनदेखे या दूर से देखे जीवन पर लिखना अपराध ही होता है. उन्होंने अनदेखे संसार को मेरे जानते बिलकुल नहीं लिया है. लेकिन शहरी मध्यवर्ग, जिसे उषाजी ने भरपूर जिया था, की विसंगतियों को बखूबी चित्रित किया है.

कोई भी लेखक अपने समय और समाज की विसंगतियों और मिथ्याचार को ही चित्रित करता है. यही उसका धर्म है. जो लेखक इस धर्म का जितनी गंभीरता से अनुपालन करता है, वह उतना ही बड़ा लेखक हो जाता है. बेशक, उषाजी ने अपने लेखक धर्म का गंभीरता से पालन किया है और यही उन्हें विशिष्ट और ख़ास बनाता है.

 


 

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इस लेख में हमने  उषा जी के औपन्यासिक अवदान पर चर्चा केंद्रित करना तय किया है. यह इसलिए कि मेरा मानना है एक कहानी की तुलना में कोई  उपन्यास समकालीन और लेखकीय सत्य के बड़े फलक को पाठकों के समक्ष रखता है. कोई लेखक अपनी समग्रता में अपने उपन्यास साहित्य में ही खुलता है. हालाँकि लेखक के कला-कौशल की परख कहानी में होती है. 'वापसी' पर चर्चा के साथ हम ने उनकी कहानी पर थोड़ी बात कर ली है.  

उनके उपन्यासों की संख्या छह है. लेकिन हम यहां आरंभिक तीन पर ही बात करेंगे. यह इसलिए भी कि मेरी दृष्टि से उन्हें जो कहना था, अपने आरंभिक तीन उपन्यासों में कह चुकी हैं. उनका पहला उपन्यास 'पचपन खम्भे लाल दीवारें' 1961 में आया. यह निम्न-मध्यवर्गीय परिवार से संबद्ध सुषमा नाम की एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो अपने ही अंदाज में आत्मसंघर्ष कर रही है. शहरी मध्यवर्गीय परिवारों में स्त्री की नियति विवाह,पति,परिवार,बच्चों और पहनावे-दिखावे तक सिमटी होती थी.

स्त्री-जीवन का मतलब ही होता है घर-गृहस्थी. लेकिन सुषमा इससे अलग है. वह अपने परिवार की बड़ी बेटी है. पिता कई वर्षों तक सरकारी नौकरी की परेशानियां झेलते अब पक्षाघात के शिकार हो खाट पकडे हुए हैं. घर में माँ को सब संभालना है, जिनके पास अपने पति की मामूली पेंशन के अलावे कोई अन्य आर्थिक आधार नहीं है. तीन लड़कियों और दो लड़कों के परिवार की अपनी आर्थिक मुश्किलें हैं. सुषमा पर ही सब का भरोसा  है. अपनी मेधा और परिश्रम से उसने दिल्ली के एक कॉलेज में अध्यापक की जगह हासिल कर ली है. नौ वर्षों की सेवा के पश्चात वह गर्ल्स हॉस्टल की वार्डेन भी बन चुकी है. अनुशासित और विरल व्यक्तित्व की धनी सुषमा शर्मा का छात्रों और अध्यापकों के बीच एक खास सम्मान है. वार्डेन के रूप में उसे जो आवास मिला है, उसे वह इस ढंग से रखती है कि उनके दूसरे सहकर्मी उससे डाह करते हैं. अपनी धज और नक्श में वह आकर्षक है, लेकिन तैंतीस की इस उम्र तक अविवाहित और परिवार से भी अलग अकेली कामकाजी लड़की की अपनी मुश्किलें हैं. वह खुश और संतुष्ट दिखना चाहती है. लेकिन लोग सवाल पूछ-पूछ कर परेशान  करते हैं. परिवार की परेशानियों ने उसके माता-पिता को उसके विवाह पर सोचने के लिए अवसर ही नहीं दिया और कभी यह विचार आया भी तो इसलिए अनदेखी कर दी गई कि यदि सुषमा की कमाई के सहारे से परिवार वंचित हुआ, तब  क्या होगा ?

भारतीय समाज में लड़की का विवाह सामान्यता माता-पिता और समाज की जिम्मेदारी होती है. विवाह उनके द्वारा अर्रेंज किए जाते हैं. लड़की की उसमें  कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए. और फिर विवाह की उम्र निकल गई तो सब कुछ ख़त्म. बड़ी उम्र की लड़की को कोई घर की दुल्हन बनाना क्यों चाहेगा. इन स्थितियों में सुषमा विवाह के उम्र से बाहर हो चुकी है. उसके विवाह की अब घर में कोई चर्चा भी नहीं होती. उसकी छोटी बहनों के विवाह के लिए  आर्थिक आधार जुटाने की  जिम्मेदारी अब सुषमा पर है. भाइयों के पढाई-लिखाई की तो है ही.

ऐसी ही सुषमा के जीवन में आता है नील नाम का एक युवा, जो उससे उम्र में पांच वर्ष छोटा है, पर उसके प्रति चिर-आकर्षित भी. सुषमा भी आकर्षित होती है. लेकिन घर-परिवार से लेकर कॉलेज के सहकर्मियों, यहां तक की छात्राओं तक की उस पर ख़ुफ़िया नजर है. अपने मन के सवाल तो हैं ही कि क्या सचमुच वह नील की पत्नी बन सकती है ? प्रेमिका के रूप में रहना कुछ और है. पत्नी बनने के लिए नील के घर की स्वीकृति भी चाहिए. क्या उसके घर के लोग भी उसे वह आत्मीयता दे सकेंगे, जो नील देता है? और इन्हीं उलझनों के बीच उन दोनों में दूरी बनने लग जाती है. नील को अपनी नौकरी के सिलसिले में विदेश जाना है, वह सुषमा को साथ ले जाना चाहता है. लेकिन सुषमा अपनी अध्यापकी नहीं छोड़ना चाहती. उसे अपने बहन-भाई और माता-पिता का ध्यान है. छोटी बहन की शादी हो चुकी है. उसमें  उसने अपने कॉलेज से कर्ज लिया हुआ है. सब का उसे ख्याल है. दरअसल वह कॉलेज के पचपन खम्भों और लाल दीवारों के बीच बंध चुकी है, कैद हो चुकी है. स्थिति यह आ गई है कि नील विदेश जाने के पहले उसे कोई खबर भी नहीं करता और सुषमा भी उसे विदाई देने के लिए एयरपोर्ट जाने हेतु टैक्सी बुलाती है, लेकिन  लौटा देती है. इस ट्रेजेडी के साथ उपन्यास का पूर्ण-विराम होता है. 

उनका दूसरा उपन्यास 'रुकोगी नहीं राधिका' पहले उपन्यास के प्रकाशन के पांच साल के अंतराल पर आया. लेखिका इस बीच अमेरिका के प्रवास पर थीं,जहाँ उन्होंने पोस्ट डॉक्टरेट की उपाधि भी हासिल की और पहले इंडिआना और फिर विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी में अध्यापन किया. रुकोगी नहीं राधिका का लेखन कब हुआ, मुझे ठीक-ठीक पता नहीं है, लेकिन इतना तो तय है कि उषा जी ने अपने प्रवासी अनुभव का पूरा संसार यहाँ उद्घाटित किया है. 1940 में जन्मी,पांच फुट और तीन इंचों की लम्बाई और 105 पॉन्ड वजन वाली राधिका तीन साल के अमेरिका प्रवास के बाद अपने मुल्क भारत लौटी है. वह अविवाहित है. पिता, जो बाबूजी नहीं डैडी हैं, रईस हैं. अंग्रेजी अख़बार के पत्रकार और विधुर. राधिका की माँ उसके बचपन में ही गुजर चुकी थीं. बड़ा भाई विनय, जिन्हें वह बड़दा कहती है, अपने ससुराल में रह कर ससुर के बिजनेस संभालता है. मातृहीना राधिका के लिए परिवार का अर्थ सिर्फ उसके डैडी हैं, जिनसे उसका गहरा लगाव है. उसके शहर में एक अमेरिकन पत्रकार डैनियल पीटरसन, जो शिकागो के एक अख़बार का भारत में संवाददाता है, आता है और उसका परिचय राधिका से भी होता है. अपने मुख्य उत्तरदायित्व के अतिरिक्त वह पर्यटकों के लिए 'भारत-दर्शन' जैसी कोई किताब की तैयारी कर रहा है. उस पुस्तक के लिए सामग्री जुटाने के क्रम में राधिका उससे जुड़ती है, कुछ आविष्ट होती है फिर उसी के उकसावे पर फाइन आर्ट के अध्ययन के लिए अमेरिका चली जाती है. इस बीच उसे पता चलता है कि उसकी सहेली विद्या ने उसके डैडी से विवाह कर लिया है और कानूनी-सामाजिक स्तर पर उसकी माँ बन गई है. डैनियल से राधिका भी जल्दी ही ऊब जाती है. तीन वर्षों में भारत भले बहुत नहीं बदले,लेकिन उसका परिवार बहुत बदल चुका है. जब वह दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरी थी, तब विद्या ने उसकी आगवानी के लिए अपने एक रिश्तेदार अक्षय को भेजा था, जिसने उसे एयरपोर्ट से लेकर उसे रात की रेलगाड़ी में उसके गृह शहर जाने के लिए बैठा दिया था. 

राधिका का अपने डैडी या मामा के घर में मन नहीं लगता और वह सब जगह घूम कर दिल्ली लौट जाती है. वहां अकस्मात उसकी मुलाकात एकबार फिर उस अक्षय से होती है, जो उसकी आगवानी में विद्या का प्रतिनिधि बन कर आया था. राधिका अपने परिवार और फिर दिल्ली में अपनी जगह तलाशने की कोशिश करती है. वह करे तो क्या करे ? न तो वह अब अपने देश को समझ पा रही है, न ही यह देश उसे समझ पा रहा है. उसका पुराना साथी मनीश, जिस से अमेरिका में जान-पहचान हुई थी, उससे मिलता है और दोनों कुछ करीब आते हैं. वह एक बार फिर उधेड़बुन में पड़ती है कि इस मनीश का क्या करना है. उसे न वह स्वीकार कर पा रही, न ही रिजेक्ट. इस बीच अपने किस्म की अवसाद से जूझती उसकी पूर्व सहेली और अब माँ विद्या ने नींद की अधिक गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली और उसके पिता फिर अकेले हो गए. राधिका क्या करे, न करे की स्थिति में पेंडुलम की तरह डोल रही है. इन स्थितियों में वह कहाँ है ? उसे क्या करने चाहिए ? जैसे सवाल उसके मन में उठ रहे हैं.

उपन्यास के अवसान के वक़्त वह अपने पिता के पास है. विद्या की मृत्यु ने घर-परिवार को एक अजीब मोड़ पर ला दिया है. इस घटना के बाद इकट्ठे हुए घर के लोग, जैसे उसके बड़दा आदि अपने ठिकाने जाने की तैयारी में हैं. कल चले जाएंगे. पिता राधिका से अनुराग पूर्वक  पूछते हैं - "और तुम ?"  

"राधिका एक लम्बी सांस लेती है. पापा आगे झुक कर उसके कंधे पर हाथ रख देते हैं. उस स्पर्श से राधिका सहसा पिघल उठती है. नथुने हल्का-सा फैलते हैं, होंठ दांतों से कुचल उठते हैं. वह अपने को संयत करना चाह रही है." 

पूछती है- "और आप ?"  

पिता कहते हैं मैंने अपने बारे में कुछ सोचा नहीं है. लेकिन वह चाहते हैं राधिका उनके पास रहे, पहले की तरह. राधिका के लिए यह निर्णायक घड़ी है. अब वह 'पचपन खम्भे लाल दीवारें'  की सुषमा की तरह अनिर्णय में नहीं जी सकती, उसे अपने नील को खोना नहीं है. वह सीधे फैसला सुनाती है- "नहीं पापा, मैं जाना चाहती हूँ. मनीश... मेरे एक बंधु.." बात बीच में छोड़ कर वह रुक जाती है और पिता कुछ और हताश महसूस करने लगे हैं. वह कुशन की टेक लगाकर बैठ जाते हैं. इसी के साथ उपन्यास ख़त्म हो जाता है.

तीसरा उपन्यास 'शेष यात्रा' 1984 में आया, दूसरे से अठारह साल बाद. यह अनु नामक ऐसी लड़की की कहानी है, जो माता -पिता विहीन है और मामाओं के घर पली-बढ़ी-पढ़ी है. अनु सुन्दर है,मगर जानती है उसकी किस्मत बहुत छोटी है. वह हमेशा अपने में सिमटी होती है. अभी वह पढ़ ही रही है कि उसी शहर का प्रवासी डॉक्टर प्रवीण, जो शादी करने के उद्देश्य से ही भारत आया हुआ है, उसे पसंद करता है और झट-पट विवाह हो जाता है. प्रवीण का परिवार और अनु के मामा  घर के लोग भी विस्मित हैं. अनु की किस्मत के उदाहरण दिए जा रहे हैं. अपने पति प्रवीण के साथ अनु अमेरिका चली जाती है, जो उसके लिए हर तरह से एक नई दुनिया है. पति के पास सुख के सारे सरंजाम हैं. बंगला, गाडी,गहने-कपडे सब. इन सब के ऊपर है एक ऐसी समृद्ध सोसायटी ,जिसे समझने,सँभालने में अनु को वक़्त लगता है. हमेशा एक दूसरे के घर दावत दिए जाते हैं. प्रवासी भारतीयों का अपना संसार है, जिसकी आधुनिकता, रूढ़िवादिता और डायस्पोरा सोच का एक अलग चरित्र है. अनु उसमें जल्दी ही खो गई है. कहीं- न-कहीं अपने भाग्य पर उसे थोड़ा गुमान भी है. ऐसी ही जिंदगी में एक रोज अचानक उसे पति का अन्य रूप मिलता है. उसका पति प्रवीण दिलफेंक प्रवृत्ति का है और उसके किस्से प्रवासी भारतीयों के लिए आम है. प्रवीण एक रोज तलाक की अर्जी देता है. चार-साढ़े चार साल में अनु इतनी नहीं बदल गई थी कि इसे स्वाभाविक रूप से स्वीकार ले. वह असहज होती है. उसे पागलखाने भेजा जाता है. यह सब उसके तलाक के आधार बनते हैं. लेकिन इसी सब के बीच एक नई अनु का जन्म होता है. वह दृढ-प्रतिज्ञ होती है. एक बार फिर से पढ़ने का संकल्प लेती है और उसे पूरा भी करती है. दस साल के भीतर वह एक डॉक्टर है. 

एक अस्पताल में उसे काम भी मिल जाता है और वह उस अनुसन्धान टीम में शामिल है जिसके शोध को नोबल पुरस्कार हेतु संस्तुति की गई है. वह अपनी सहेली दिव्या के भाई दीपांकर से पुनर्विवाह करती है, जो स्वयं प्रवासी है. जब उसकी जिंदगी दूसरी दफा व्यवस्थित हुई तो प्रवीण उससे प्रयत्नपूर्वक  मिलता है. अनु का विकास और प्रवीण का पतन साथ-साथ होता है. बीमार और बदहाल प्रवीण को देख अनु दुखी होती है, लेकिन भावनाओं के लिए उसके पास अब कोई जगह नहीं है. जीवन के अपार कष्ट और बिखराव के बीच से एक ऐसी अनु तप-निखर कर निकली है, जो यथार्थ की दुनिया में जीना चाहती है, भावनाओं की दुनिया में नहीं. आज वह अपने पैरो पर खड़ी है. उसकी अपनी आर्थिक सत्ता है और स्वतंत्र व्यक्तित्व भी. ऐसी ही स्त्री अपने को सुखी समझ सकती है,जो अनु अब है.

तीनों उपन्यास आकार में छोटे हैं, सवा सौ-डेढ़ सौ पृष्ठों के. इन्हें एक-एक बैठकी में पढ़ा जा सकता है. लेकिन जब हम तीनों को एक साथ रख कर देखते हैं, तब इनमें एक रैखिक विकास मिलता है. 'पचपन खम्भे लाल दीवारें' की सुषमा, 'रुकोगी नहीं राधिका' की राधिका और 'शेषयात्रा' की अनु के बीच एक अंतर-संबंध दिखता है. तीनों ही नायिका प्रधान उपन्यास है और उपन्यास के डिटेल भी स्त्री के इर्दगिर्द ही घूमते हैं. तीनों नायिकाएं पढ़ी-लिखी हैं और अपने समाज से अधिक अपने परिवार से जूझ रही हैं. अनु माता-पिता दोनों के बिना है. राधिका के पिता हैं,लेकिन माँ नहीं है और सुषमा के माता-पिता हैं,लेकिन उनके होने का उसके लिए कोई अर्थ नहीं है. सुषमा, राधिका और अनु का क्रमिक विकास यह है कि सुषमा अपने जीवन,खास कर विवाह के मामले में कोई निर्णय नहीं ले पाती. अंत तक उधेड़बुन में पड़ी रहती है, राधिका इस संबंध में ठोस-निर्मम फैसले लेती है और पिता के घर रुकने के प्रस्ताव को ठुकरा कर अपने मित्र मनीश की ओर बढ़ जाती है, और अनु तो सब कुछ बिखर जाने पर भी केवल और केवल अपने मजबूत संकल्प से अपना पुनर्निर्माण करती है. उसके सहयोग के लिए न उसका परिवार है और न ही कोई समाज. दोस्त दिव्या के अतिरिक्त मानसिक सम्बल देने वाला भी कोई नहीं है.

तीनों उपन्यासों के इन तीन स्त्री पात्रों पर सूक्ष्मता से विचार करेंगे तो पाएंगे कि किसी को परिवार नामक संस्था का वाजिब समर्थन नहीं है. यह परिवार जिस अर्थ में अपने पुत्रों का संरक्षण देता है, पुत्रियों का नहीं देता. चाहे कारण जो हो, यथार्थ यही है कि यह संभव नहीं हो पाता. यूँ भी लड़कियां पाल--पोस कर विवाह के तथाकथित मांगलिक अनुष्ठान के साथ किसी अन्य घर में धकेल दी जाती हैं. एक भारतीय स्त्री का यही भाग्य है. वह जन्म से ही पराए धन की तरह पिता परिवार में पलती-पुसती है. उसकी रोटी की थोड़ी चिंता जरूर की जाती है,लेकिन भावनाओं की तो बिलकुल नहीं. 



३ 

उषा जी इन स्त्री पात्रों के इर्दगिर्द के कथा-वितान द्वारा सीता और गीता वाले भारतीय समाज में आखिर क्या कहना चाहती हैं. स्त्रियों को केंद्र में रख कर जैनेन्द्र कुमार ने भी बहुत लिखा है. 'परख', 'सुनीता', 'त्यागपत्र' और 'सुखदा'  के कट्टो, सुनीता, मृणाल और सुखदा जैसे पात्रों ने स्त्री के नए रूप से हिंदी -संसार का परिचय कराया, या  फिर फणीश्वरनाथ  रेणु ने ग्रामीण जीवन से लछमिन कोठारिन या ताज़मनी जैसे पात्र लाए. लेकिन उषा प्रियंवदा के स्त्री पात्र इन सब से तनिक भिन्न किस्म के हैं. इन सब का आदर्श से अधिक यथार्थ से जुड़ाव परिलक्षित होता है. उनकी दिलचस्पी बौद्धिक विमर्श उपस्थित करने में नहीं है. वे सब की सब आधुनिक सामाजिक जीवन में अपनी स्थिति तय करने के लिए पुख्ता संघर्ष करती हैं. पुरुषों से उनकी अधिक शिकायत भी नहीं है. हाँ,वे सब गहराई से इंगित जरूर करती हैं कि कुछ करना है तो स्त्रियों को ही. उनके लिए कोई दूसरा संघर्ष नहीं कर सकता. और यदि करता भी है तो उसके ख़ास अर्थ नहीं होते. सुषमा , राधिका या अनु अपनी ज्ञानात्मक प्रतिभा के बल पर ही समाज में स्थान बना सकी हैं. इसलिए लेखिका का इशारा है कि ज्ञानसत्ता के बल पर ही स्त्रियों की मुक्ति संभव है. उन्हें जितना जल्द हो सके पुरुषों की आर्थिक गुलामी से मुक्त  हो जाना चाहिए. क्योंकि आर्थिक परतंत्रता के होते न बराबरी के अधिकार हासिल हो सकते हैं और न ही मित्र- भाव विकसित हो सकता है.

भारतीय साहित्य में स्त्री अपनी समग्रता में पहली दफा बंगला लेखक शरतचंद्र के उपन्यासों में आती है. उनके  स्त्री पात्रों ने हिंदी भाषी समाज को भी खूब प्रभावित किया. ध्यान से देखें तो शरत बाबू की समस्या भी वही थी, जो उषा प्रियंवदा की है. उनके पात्र परिवार के चौखटे में कैद हैं. उनके प्रसिद्ध उपन्यास  'देवदास' के पात्रों की विडंबना क्या है ? देवदास और पारो परिवार की मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर पाते. नतीजा यह आता  है कि वे दोनों तो तबाह होते ही हैं, उनका परिवार भी होता है और आज तक पाठक समूह रो-रो कर तबाह हो रहा है. शरत बाबू के आखिरी  उपन्यास 'शेषप्रश्न' की कमल अपने परिवार से मुक्त  है. वह उनके अन्य उपन्यासों की नायिकाओं  की तुलना में अधिक सुखी है और पाठकों  को भी रुलाने  से अधिक सोचने के लिए प्रेरित करती है. उषा जी की सुषमा की तुलना में राधिका और अनु अधिक प्रगल्भ दिखती है और वह सचमुच हमें सोचने के लिए भी प्रेरित करती हैं.

प्रवासी जीवन के प्रभावों को स्त्री जीवन में देखना उषा जी के कथा साहित्य की दूसरी खासियत है. ज्ञात भारतीय इतिहास में पंडिता रमाबाई सरस्वती संभवतः पहली स्त्री थीं, जिन्होंने अकेले पहली दफा यूरोप-अमेरिका की यात्रा की थी. यह उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध की घटना है. संस्कृत की विदुषी पंडिता रमाबाई सरस्वती (1858-1922) ने उस प्रवास में विदेशी जीवन में नारी मुक्ति आंदोलनों के पदचाप को सुना था. वहां की भी स्त्रियां बहुत आज़ाद नहीं थीं, लेकिन भारतीय स्त्रियों के मुकाबले बेहतर स्थिति में जरूर थीं. कम से कम सतीप्रथा के नाम  पर उन्हें जीवित धधकती चिता में झोंका तो नहीं जा रहा था. रमाबाई को भ्रमवश यह सब  ईसाइयत का प्रभाव अनुभव हुआ. वह यह देखने में असमर्थ रहीं कि ईसाइयत से भी वहाँ की मुक्तिकामी स्त्रियां वैसे ही संघर्ष कर रही थीं, जैसे भारत में मनुवादी सोच से सावित्रीबाई फुले कर रही थी, लेकिन रमाबाई के संघर्ष से लगभग एक सदी पश्चात उषा प्रियंवदा ने जिस प्रवासीपने के प्रभाव को भारतीय स्त्री जीवन पर देखा वह पूर्णतः सामाजिक और इहलौकिक  है.

एक भारतीय पुरुष की तरह ही एक स्त्री भी यूरोपीय जीवन मूल्यों से प्रभावित होती है, न केवल पहनावे और भाषा में बदलाव होता है, बल्कि उसकी सोच प्रभावित होती है और यह सब मिल जुल कर उनके जीवन के दूसरे क्रिया-कलापों को भी  प्रभावित  करता है. खास बात यह है कि उषा जी अपने साहित्य में कहीं से किसी विचारधारा को थोपने की कोशिश नहीं करतीं. उनके लिए मनुष्य जीवन ही प्रमुख होता हैजो उनके समक्ष स्त्री जीवन के रूप में होता हैऔर उनका सारा जोर उसके संधान पर ही होता है. इसलिए हम देखते हैं कि उनके पात्र आगे-आगे चलते प्रतीत होते हैं. लेखिका पीछे-पीछे चलती अनुभव होती हैं. यही उनकी विशिष्टता है.

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प्रेमकुमार मणि
मोब. 9431662211

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  1. सत्यदेव त्रिपाठी4/1/21, 11:03 am

    कभी मैंने गोवा में रहते हुए अपनी साहित्यिक संस्था 'साहित्य संवाद' के लिए उषाजी के उपन्यासों पर गोष्ठी की थी। तब तीन ही उपन्यास थे उनके। फिर उसी से प्रेरित होकर एक बच्ची ने मेरे अंतर्गत इन्हीं तीनो पर एम फिल की उपाधि के लिए शोध किया था। तीनो पर लिखा भी मैंने। बाद में अंतरवंशी (र आधा नहीं हो रहा) आया, तो पढ़ा और लिखा भी। आगे फिर नहीं हो पाया, लेकिन अपने इसी लगाव के चलते मणिजी का लेख इस उम्मीद से एक सांस में पढ़ गया कि अब ढाई-तीन दशकों बाद इन कृतियों के विमर्श पर बात आगे बढ़ी होगी। लेकिन निराशा हुई।विमर्श आया ही नहीं। तीनो उपन्यास एक स्त्री के क्रमिक विकास हैं। विकास के सामाजिक परिप्रेक्ष्यों के सांकेतिक विश्लेषण एवं जड़ताओं को तोड़ने के सुसंगठित व क्रमबद्ध प्रयत्न एवं उससे उपजे सुख-दुख हैं। राधिका और विद्या की मनोवैज्ञानिकताओं के द्वंद-अवसाद-पूरकता में जिंदगी नष्ट भी होती है आगे भी बढ़ती है। मनीश के अतिरेकों का संतुलन और अथ से संघर्ष करने के बाद आत्मनिर्भर व सेटिल होने पर भी जिससे दमित-त्यक्त हुई थी तीसरे उपन्यास की नायिका, उसी की देखभाल करने जाने के संदर्भों के संकेतों...आदि में इतना कुछ है कि अब आज उनके बहुकोणीय विश्लेषण खुलने लगे हैं। उषाजी को जो कहना था, पहले तीनो में ही कह दिया...कहने को भी मैं अन्तरवंशी के हवाले से कह सकता हूँ कि सरलीकरण ही नहीं, उनसे भिड़ने से बचना भी है।
    हाँ, यह जरूर है कि उनकी उम्र का एक पड़ाव तय हुआ है, उसे अवसर बनाकर उनकी चर्चा हो गयी। इस अनुष्ठान के लिए 'समालोचन' व लेखक को साधुवाद....

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    1. प्रिय त्रिपाठी जी , आपने एक सांस में लेख पढ़ लिया ,यही मेरे लिए पर्याप्त है . आप उषा जी के साहित्य में इतने गहरे उतर चुके हैं कि स्वाभाविक है इस लेख में आपको विमर्श के स्तर पर कुछ खास नहीं लगा . मैं आपका लेख पढ़ने के लिए उत्सुक हूँ . मैंने तो बस अपनी बात रखी है . लेख को अकादमिक ऊंचाई देने का कोई प्रयास नहीं किया है . मेरा उद्देश्य तो नई पीढ़ी को उषा जी के लेखन के प्रति जिज्ञासु बनाना था . आपने उनके प्रथम तीन उपन्यासों में एक क्रमिक विकास देखा है ,उसे मैंने रेखांकित किया है . आदर के साथ .

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    2. सत्यदेव त्रिपाठी4/1/21, 9:04 pm


      बंधु, लेख की सॉफ्ट कॉपी नहीं है। जिस पत्रिका में छपा था, याद नहीं। मेरी किताब 'हिंदी उपन्यास : समकालीन विमर्श' में शामिल होने के बाद पत्रिका वाला भी ध्यान से ओझल हो गया। पता भेजें, तो किताब से ज़ेरॉक्स कराके सुलभ करा सकता हूँ...

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  2. सुंदर लेख , लेखक और समालोचन को बधाई

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  3. अनुराधा सिंह4/1/21, 3:33 pm

    एक बहुप्रतीक्षित आलेख। ऐसे ही आलेख यह सिद्ध करते हैं कि पाठकों के हृदय में जगह बना लेने वाला रचनाकार बहुत लंबे, एक पूरे जीवन जैसे समय के लिए भी उपेक्षित रहते हुए भी सदा के लिए उपेक्षित नहीं रह सकता। अकादमिक आलोचनाएँ उसकी उपेक्षा करें तो भी वह अपनी रचनाओं के दम पर श्रेष्ठ माना ही जाता है। उषा प्रियंवदा जी के लेखन की उस समय के राजनैतिक, साहित्यिक व सामाजिक परिप्रेक्ष्य में बहुत अच्छी पड़ताल की गई है। साथ में यह नज़ीर भी प्रस्तुत की गई है कि आलोचनाएँ इस श्रम व ईमानदारी से लिखी जायें तभी सार्थक होती हैं।

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  4. Swapnil Srivastava4/1/21, 3:35 pm

    एक बहुप्रतीक्षित आलेख। ऐसे ही आलेख यह सिद्ध करते हैं कि पाठकों के हृदय में जगह बना लेने वाला रचनाकार बहुत लंबे, एक पूरे जीवन जैसे समय के लिए भी उपेक्षित रहते हुए भी सदा के लिए उपेक्षित नहीं रह सकता। अकादमिक आलोचनाएँ उसकी उपेक्षा करें तो भी वह अपनी रचनाओं के दम पर श्रेष्ठ माना ही जाता है। उषा प्रियंवदा जी के लेखन की उस समय के राजनैतिक, साहित्यिक व सामाजिक परिप्रेक्ष्य में बहुत अच्छी पड़ताल की गई है। साथ में यह नज़ीर भी प्रस्तुत की गई है कि आलोचनाएँ इस श्रम व ईमानदारी से लिखी जायें तभी सार्थक होती हैं।

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  5. राजाराम भादू4/1/21, 5:43 pm

    उषा जी के आत्मसंघर्ष को उनकी लेखकीय अन्तर्दृष्टि के विकास से जोडकर मणि जी ने एक अहम पक्ष उद्घाटित किया है। उनके तीनों उपन्यासों को विकास- क्रम में रखकर समग्र मूल्यांकन महत्वपूर्ण है।

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  6. ऊषा जी पर बहुत दिनों बाद कुछ पढ़ा। पुराना पढ़ा हुआ सब याद आ गया। बहुत अच्छा आलेख जो इतनी एकाग्रता से पढ़ा गया कि कब समाप्त हुआ पता ही नही चला। समालोचन और प्रेम कुमार मणि जी का आभार।

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  7. उषा प्रियंवदा5/1/21, 9:44 am

    सुधा आलेख शेयर करने के लिये धन्यवाद और मणि जी को भी आभार.सारे पाठक/पाठिका गण को मुझे इतने अपनेपन से याद रखने के लिये भी.मुझे अपने पर कुछ भी पढ़ कर अचम्भा होता है क्योंकि लिखते समय मेरे मन में केवल अभिव्यक्ति करना ही रहता है,आलोचक की द्रष्टि नहीं.सभी अपने अपने जीवन अनुभवों और जीवन दर्शन के साथ पढ़ते हैंऔर यदि किसी को कुछ याद रह जाता है तो यह मेरा सौभाग्य है.प्रयत्न कर रही हूँ कि लिखती रहूं.��������

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  8. उषा प्रियवंदा के साहित्य पर,मणि जी का सरल सारगर्भित आलेख अत्यंत पठनीय है।उषा जी के पात्रों व नारी चरित्रों की पड़ताल, ऊहापोह​, व उद्यमिता का विमर्श विना किसी वैचारिक आग्रह के करके उन्होंने लेखिका के रचनाकर्म का
    ईमानदार विश्लेषण किया है,साधुवाद।

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