भाष्य : सेवादार (देवी प्रसाद मिश्र) : सदाशिव श्रोत्रिय

Posted by arun dev on मई 02, 2018

(गूगल से साभार)

समालोचन के स्तम्भ ‘भाष्य’ के अंतर्गत किसी एक कविता पर व्याख्याता अपने आप को केन्द्रित रखता है और तरह-तरह से उसके मन्तव्य और काव्य-सौन्दर्य को उद्घाटित करता है. सदाशिव श्रोत्रिय को आपने विष्णु खरे, अलोक धन्वा (पतंग), दूधनाथ सिंह (कृष्णकान्त की खोज में दिल्ली-यात्रा ) और राजेश जोशी (बिजली सुधारने वाले) के सन्दर्भ में यहीं पढ़ा है.

आज हिंदी के महत्वपूर्ण कवि देवी प्रसाद मिश्र की कविता ‘सेवादार’ पर उनका यह आलेख प्रस्तुत है. ‘सेवादार’ एन.जी.ओ. संस्कृति पर हिंदी में लिखी शायद अकेली समर्थ कविता है. देवी प्रसाद की अपनी अर्जित शैलीगत वक्रोक्ति ने इस कविता को और मारक बना दिया है. 



सेवादार / देवी प्रसाद मिश्र
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इस लड़की ने जो कार में बैठी थी
सेवा का व्रत उठा रखा था शुरू से ही उसमें सेवा
का भाव था जिसे देखते हुए माता पिता ने उसे
दिल्ली युनिवर्सिटी से सोशल वर्क में एमए करवा दिया
जबकि उसने एमफ़िल इस विषय पर किया कि हरियाणा में
लड़कियां कम क्यों हो रही हैं

संजीवनी सूरी कार में बैठी थी
और उसके सर उसे छोड़ने आये थे
मीटिंग के बाद काफ़ी देर हो गई थी इसलिये

जीके टू में एक घर के सामने कार रुकी तो
सर ने कहा कि अभी १० लाख के पैकेज पर
काम शुरू करो बाद में देख लेंगे संजीवनी ने कहा
सर वैसे तो ठीक है लेकिन थोड़ा कम है सर ने हंसते
हुए कहा कि थोड़ा कम तो हमेशा रहना चाहिए 

संजीवनी ने कहा कि सर घर के अन्दर आइये
मम्मी से मिलिये l पापा के जाने के बाद
शी इज़ डेड अलोन l सर ने कहा ओह l
बट कीप इट द नेक्स्ट टाइम l संजीवनी ने कहा कि
सर आप अन्दर नहीं आ रहे तो मेरे कुत्ते से
ज़रूर मिल लीजिये l शी इज़ जर्मन शेपर्ड l प्लीज़ सर l
सर ने कहा कि वे ज़रूर किसी दिन आएंगे l फिर उन्होंने संजीवनी को याद
दिलाया कि वह खरिआर  - हाउ टेरिबल द प्रननसिएशन इज़ खरिआर ज़िले
के दस गांवों की स्त्रियों की महीने की औसत
मज़दूरी पर रिपोर्ट तैयार कर ले संजीवनी ने आह भर कर कहा कि
सर एक औरत को औसत महीने में तेरह रुपये मिलते हैं
एक दिन में चालीस पैसे
सर ने कहा कि हम क्या कर सकते हैं रिपोर्ट ही
दे सकते हैं और जब तक वो नहीं दी जाती
वर्ल्ड बैंक से अगले छियासठ लाख रिलीज़ नहीं होने वाले

कर दूंगी सर कर दूंगी कहते  हुए संजीवनी कुत्ते से लिपट गयी
और सर चले गये सिली गर्ल, यू आर सच अ रैविशिंग स्टफ़ जैसी कोई बात
कहते हुए जो अगर सुन ली जाती
तो संजीवनी सूरी क्यों है इतनी दूरी जैसी घोर स्त्री विरोधी बात कहने के लिये
स्त्रियों के लिये काम करने वाली उनकी संस्था को मिलने वाली सालाना तीन
करोड़ की यूरोपीय ग्रांट बंद हो जाती.








सेवादार
सदाशिव श्रोत्रिय




क समर्थ कवि अपनी अतिरिक्त संवेदनशीलता की बदौलत अपने समय की युगचेतना (zeitgeist) को अपने काव्य में अधिक प्रभावी रूप से अभिव्यक्त करने में समर्थ होता है. अपनी रचनात्मक प्रतिभा से वह बहुत से दृश्यों, घटनाओं, संवादों आदि में से  उन चीज़ों को छांटने-चुनने में  समर्थ होता है जो थोड़े में  ही बहुत कह जाए. हमारे समय के  कवि देवी प्रसाद मिश्र में हमारी  युगचेतना को अभिव्यक्त करने की इस सामर्थ्य को मैं भरपूर देखता हूँ. आज के झूठ और चालाकी भरे समय में वास्तविकता को पहचानने और उसके संबंध में प्रभावी ढंग से अपनी बात कहने के लिए जिस “विट” (wit) की आवश्यकता होती है उसकी भी  मुझे इस कवि में कोई कमी नज़र आती. उनके इस गुण को कोई भी वह पाठक बड़ी आसानी से देख सकता है जिसने उनकी “ब्लू लाइन” शीर्षक कविता पढ़ी है.


मेरी मान्यता है युगचेतना की  काव्यात्मक अभिव्यक्ति की यह सामर्थ्य किसी कवि को सचेतन प्रयत्न से नहीं हासिल होती.  श्रेष्ठ  कविता की रचना पर किसी कवि का उतना ही नियंत्रण संभव है जितना किसी अनूठा  स्वप्न देखने वाले का उसके स्वप्न पर हो सकता है. अन्तःप्रेरणा के किसी अनाहूत क्षण में वह अपने मन में संचित विभिन्न अनुभवों का उपयोग करते हुए कुछ ऐसा कह जाता है जो पाठकों – श्रोताओं को उसकी मौलिकता और  नवीनता से चकित कर देता है.


देवी प्रसाद मिश्र की एक विशेषता मुझे यह लगती है कि काव्य-रचना के किसी उर्वर काल में उनका ध्यान किसी विशिष्ट विषय पर केन्द्रित रहता है और तब वे उस विषय से सम्बंधित कई  रचनाएँ अपने पाठकों को एक साथ  देने की स्थिति में होते  हैं. 2010 में जब असद ज़ैदी ने अपनी पत्रिका जलसा के पहले अंक का प्रकाशन किया तब मिश्रजी के मन में हमारे शैक्षणिक और  अकादमिक क्षेत्रों  में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर  कई बातें आ रही होंगी. शायद यही कारण रहा होगा कि जलसा के इस अंक में इस तरह के  भ्रष्टाचार से सम्बंधित उनकी चार-पांच कविताएँ शामिल  हैं.


राजनेताओं  ने अपनी अनावश्यक दखलंदाजी़ से  शिक्षा की जो दुर्दशा की  उसका वर्णन देवी प्रसाद मिश्र जलसा के इस अंक के पृष्ठ 95 पर प्रकाशित  कविता “हमारे पूर्वज सीरीज़ में सबसे पहले प्रभाकर शुक्ल” में इस अंदाज़ में करते हैं :


प्रभाकर शुक्ल को प्रधानमंत्री होना चाहिये था  - ग़नीमत है कि उन्होंने प्रतापगढ़ की एक तहसील में एक स्कूल का प्रिंसिपल रह कर उम्र गुज़ार दी लेकिन उन्होंने स्कूल का उतना ही कबाड़ा किया जितना किसी भी प्रधानमंत्री ने इस देश का किया है उनकी पत्नी ने और ख़बर पक्की है कि उनकी बेटियों ने भी चपरासियों से पैर दबवाये टीचरों से सब्ज़ी मंगवाई और तबला सर से जहां तहां तेल लगवाया सर में भी लगवाया.

भुवनेश्वर दत्त जिनके ज़िले में कई स्कूल थे से कहकर  उनकी नियुक्ति हुई थी – क्वालिफिकेशन यह थी कि वैद जी के बेटे थे, मामखोर सुकुल थे और दो थर्ड क्लास यमए – हिंदी और एजुकेशन में.


इसी सीरीज़ की एक अन्य कविता “हमारे पूर्वज सीरीज़ में राम समुझ मिश्र” में वे कहते हैं :

राम समुझ मिश्र मामूली आदमी नहीं थे – पीसी रेन के अंग्रेज़ी व्याकरण से अंग्रेज़ी सीखी थी और कहते थे कि उच्चारण रंदवू है रेंडेज़वस  वगैरह नहीं. गांधी के नेतृत्व में आज़ादी की लड़ाई लड़ी,विधायक हुए –धोती कुरता पहनते थे, सारस की तरह चलते थे, और जितने थे उससे कम चालाक नहीं लगते थे .........लखनऊ से इलाहाबाद जाते हुए लालगंज में उनके नाम का स्कूल है. ठीक से न भी देखिये तो वह चीनी मिल की तरह लगता है. स्कूल को उन्होंने तेल मिल की तरह चलाया. मतलब कि गन्ना पेरो , सरसों या आदमी एक ही बात है.


हम देख सकते हैं  कि “शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है” जैसी किसी  गद्यात्मक अभिव्यक्ति का प्रभाव किसी पाठक के मन-मस्तिष्क पर कभी उतना गहरा नहीं हो सकता जितना देवी प्रसाद जी  की इस  काव्यात्मक अभिव्यक्ति  का होता है.
 

शिक्षा–तंत्र में नौकरी के लिए  पैसे के खुले और नंगे खेल का वर्णन वे इसी सीरीज़  की एक अन्य कविता  “हमारे समकालीन सीरीज़ में कल्लू मामा” में करते हैं :


[कल्लू मामा ] ने हाल में प्राइमरी के अध्यापक के तौर पर ढिंगवस नाम की जगह के स्कूल में नियुक्ति प्राप्त की है – इसके लिए जूनियर इंजीनियर पिता ने दो लाख दिये. हफ़्ते में कल्लू दो तीन बार स्कूल जाते हैं पढ़ाते तब भी नहीं हैं . बच्चों की मांएं कहती हैं कि इन हरामखोर टीचरों के लम लम कीड़े पड़ेंगे.


पर जो दूर की कौड़ी देवी प्रसाद जी अकादमिक हल्कों में  एन.जी.ओज़ के माध्यम से किए जा रहे करोड़ों रुपये के अपव्यय, उनकी निरर्थकता और उनके असली मक़सद के सम्बन्ध में  उनकी इसी काल की उनकी रचना “सेवादार” (पृष्ठ 95) के माध्यम से लाते हैं उसका सचमुच कोई मुकाबला नहीं.


इस कविता को पढ़ना और इसके माध्यम से हमारे यहाँ काम कर रहे कई ग़ैर सरकारी संगठनों के वास्तविक क्रिया-कलापों  के बारे में जानना किसी भी पाठक के लिए एक रोमांचक और आल्हादकारी अनुभव होगा. वस्तुतः इस कविता की सफलता इस रोमांच और आल्हाद में ही निहित है.


हम देख सकते हैं कि इस कविता के केंद्र में संजीवनी सूरी नाम की उच्च मध्यवर्गीय परिवार की एक आकर्षक युवती  है जिसके पिता की मृत्यु हो चुकी है और जो किसी NGO के लिए समाजशास्त्र के किसी विद्वान् के मार्गदर्शन  में किसी प्रोजेक्ट पर काम कर रही है. इस NGO को किसी यूरोपीय देश से तीन करोड़ रुपये का  सालाना अनुदान मिलता है और इसका घोषित उद्देश्य नारी-कल्याण है.


कविता का पहला बंद इस बात की पोल खोल देता है कि यह शोधार्थी युवती अपने वर्तमान शोध कार्य के लिए वास्तव में कितनी शैक्षिक अर्हता रखती है :



इस लड़की ने जो कार में बैठी थी
सेवा का व्रत उठा रखा था शुरू से ही उसमें सेवा
का भाव था जिसे देखते हुए माता पिता ने उसे
दिल्ली युनिवर्सिटी से सोशल वर्क में एमए करवा दिया
जबकि उसने एमफ़िल इस विषय पर किया कि हरियाणा में
लड़कियां कम क्यों हो रही हैं


अपने बच्चों को किसी उपलब्ध मौके का फायदा दिलाने के लिए उनकी तारीफ़ में माँ – बाप आजकल जिस तरह की कोई भी बात  कहने को तैयार रहते हैं इसे कविता की दूसरी और तीसरी पंक्ति पढ़ कर समझा जा सकता है. पढ़े हुए विषय और किए जाने वाले काम के बीच कोई  स्पष्ट सम्बन्ध हो यह  भी आजकल आवश्यक नहीं ; इस बात को  यह कविता यहाँ एक बार फिर  अपने ढंग से प्रकट कर देती है.


कविता में जिस रात्रि का वर्णन है उसमें संजीवनी सूरी  काफ़ी देर से घर पहुँची है. कवि जिस ढंग से इस विलम्ब का कारण बताता है वह पाठक के सामने यह स्पष्ट  कर देता  है कि इसका वास्तविक कारण शायद  मीटिंग के बाद इस शिष्या और उसके गुरुजी का लम्बे समय तक साथ  रहा है जिससे उसके घर वाले या तो बेखबर हैं या वे जानबूझ कर इसके बारे में अनजान बने रहना चाहते हैं क्योंकि  उनके ज़्यादा खोज –खबर करने का मतलब शोध-कार्य की बदौलत इस लड़की को मिलने वाले पैसे से हाथ धो बैठना है जो न तो यह लड़की खुद चाहती है और न ही उसके घर वाले . उनकी ख्वाहिश इस समय यह है कि भरम फ़िलहाल दोनों तरफ़ से बना रहे ताकि मोटी आय  का यह जरिया लड़की के हाथ से निकल न जाए.


समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में भी पैसे की भूमिका ही आज के मध्यवर्गीय समाज में सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहती है इसे संजीवनी और उसके “सर” के बीच होने वाली सौदेबाज़ी की भाषा साफ़  कर  देती है :


जीके टू में एक घर के सामने कार रुकी तो
सर ने कहा कि अभी १० लाख के पैकेज पर
काम शुरू करो बाद में देख लेंगे संजीवनी ने कहा
सर वैसे तो ठीक है लेकिन थोड़ा कम है सर ने हंसते
हुए कहा कि थोड़ा कम तो हमेशा रहना चाहिए   


स्त्री-कल्याण के घोषित उद्देश्य से हाथ में लिए गए इस प्रोजेक्ट के लिए काम करने वालों की कितनी सहानुभूति और कितना लगाव उन ग्रामीण  स्त्रियों के प्रति है जिनके लिए वे काम कर रहे हैं  इसे इस कविता के तीसरे पदबंद की निम्नांकित अंतिम पंक्तियाँ भलीभांति प्रकट कर देती हैं:
                                                   
फिर उन्होंने संजीवनी को याद
दिलाया कि वह खरिआर  - हाउ टेरिबल द प्रननसिएशन इज़ – खरिआर ज़िले
के दस गांवों की स्त्रियों की महीने की औसत
मज़दूरी पर रिपोर्ट तैयार कर ले संजीवनी ने आह भर कर कहा कि
सर एक औरत को औसत महीने में तेरह रुपये मिलते हैं –
एक दिन में चालीस पैसे
सर ने कहा कि हम क्या कर सकते हैं रिपोर्ट ही
दे सकते हैं और जब तक वो नहीं दी जाती
वर्ल्ड बैंक से अगले छियासठ लाख रिलीज़ नहीं होने वाले



पर सेवादारी के इस खेल की असलियत को देवी प्रसाद इस कविता की अंतिम पंक्तियों में जिस तरह खोलते हैं वह  सचमुच अनूठा है. संजीवनी अंततः  अपने सर से जो कहती है वह इस बात को प्रकट करने के लिए पर्याप्त है कि उसे भी अब इस बात का पूरी तरह अनुमान हो  गया है कि उसके सर असल में उससे चाहते क्या हैं. उसका नाटकीय ढंग से कुत्ते के गले में लिपटते हुए  “कर दूंगी सर कर दूंगी” कहना इस बात को स्पष्ट कर देता है कि पैसे और पवित्रता के बीच सौदेबाज़ी के इस खेल में संजीवनी ने 10 लाख के सालाना पैकेज के लिए अपने आप को समर्पण के लिए तैयार कर लिया है. विडम्बना यह है कि वर्तमान परिस्थितियों में  अपने  मध्यवर्गीय परिवार की बाहर टीमटाम को बचाए  रखने के लिए शायद उसके पास इसके अलावा कोई विकल्प  नहीं  बचा  है.





कविता की अंतिम पंक्तियों में कवि  पाठक की निगाह में यह बात ला देता है कि वर्तमान नौकरी के लिए इस लड़की की वास्तविक अर्हता केवल उसका शारीरिक आकर्षण और उसके विद्वान् निदेशक की उसके युवा सौन्दर्य में गहरी रुचि  है ; साथ ही वह उसे इस बात का भी ज्ञान करवा देता है कि विदेशी पैसे की मदद से हमारे यहाँ जो अनेक ग़ैर सरकारी संस्थाएं काम कर रहीं हैं वे वस्तुतः किन लोगों के कल्याण के लिए और किस तरह काम कर रही हैं – कि उनके घोषित उद्देश्यों और उनके वास्तविक क्रिया-कलापों के बीच कितनी गहरी दरार है :  


और सर चले गये सिली गर्ल, यू आर सच अ रैविशिंग स्टफ़ जैसी कोई बात
कहते हुए जो अगर सुन ली जाती
तो संजीवनी सूरी क्यों है इतनी दूरी जैसी घोर स्त्री विरोधी बात कहने के लिये
स्त्रियों के लिये काम करने वाली उनकी संस्था को मिलने वाली सालाना तीन
करोड़ की यूरोपीय ग्रांट बंद हो जाती.


यह रचना हमारे समय की उस विडम्बनापूर्ण स्थिति को भी बखूबी उजागर करती है जिसमें नारी-कल्याण के लिए काम करने का दावा करने वाली एक संस्था अंततः एक पुरुष द्वारा  किसी ज़रूरतमंद नारी के शोषण और उत्पीड़न का कारण बन जाती है.
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