पाकीज़ा के प्रतीक: जितेन्द्र विसारिया



फ़िल्म पाकीज़ा हिंदी सिनेमा के संवेदनशील अंकन, भावप्रवण अभिनय और कलात्मक दृश्य-विधान का उत्कर्ष है, इसमें किसी महाकाव्य जैसी गहराई है. पतनशील सामन्ती संस्कृति के मुहाने पर खड़ी नृत्य, संगीत की इस दुनिया के बीच स्त्री की विडम्बनाओं की जैसे यह निकली हुई आह हो. कमाल अमरोही ने इस फ़िल्म में बहुत से प्रतीकों का इस्तेमाल किया है जिसके कारण या आज भी उतनी ही मार्मिक और प्रभावशाली बनी हुई है. इन प्रतीकों को खोल रहें हैं जितेद्र विसारिया. 



पाकीज़ा के प्रतीक                                                               
जितेन्द्र विसारिया



 

1972 में आई फिल्म पाकीज़ा में ऐसा क्या है कि इसे बार-बार देखा जाता है. यह कमाल अमरोही की संकल्पना, पटकथा, निर्देशन और निर्माण तो था ही, इसमें एक से बढ़कर एक दिग्गज जुड़े हुए थे- जोसेफ़ विस्र्चिंग की अद्भुत सिनेमेटोग्राफ़ी, गौरी शंकर और लच्छू महाराज की कोरियोग्राफ़ी, मज़रूह सुल्तानपुरी, कैफ़ी आज़मी, कैफ़ भोपाली के गीत गुलाम मुहम्मद और नौसाद साहब का संगीत, लता, रफ़ी, वाणी जयराम, परवीन सुल्ताना, शोभा गुर्टू, राजकुमारी और नसीम बानो के गाए गीत. इस फ़िल्म की गज़ले और ठुमरियों जैसे अब भी सदाएँ देती हैं.

पर्दे पर त्रासदी को जीने वाली मीना कुमारी, अशोक कुमार, नटा सार्वभौम उर्फ़ अभिनय सम्राट राजकुमार, अपने ज़माने की कद्दावर चरित्र अभिनेत्री वीना उर्फ़ तज़ौर सुल्ताना, नादिरा, कमल कपूर और डी.के सप्रू का जीवंत अभिनय,मीनाजी की ड्रेस डिजाइनिंग, लखनवी तहज़ीब और संवादों की काव्यात्मकता. कुल मिलाकर इस मूवी को एक क्लासिक फ़िल्म का दर्ज़ा देते हैं. पर अफ़सोस कि जिस फ़िल्म के लिए मीना कुमारी को सदियों याद रखा जाएगा, उसकी रिलीज के वक़्त वे बेहद बीमार पड़ी और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा.

कहानी बहुत हटकर नहीं है. इस फिल्म का यूँ तो देश-काल पता नहीं है, लेकिन दिल्ली-लखनऊ का उजड़ता नवाबी दौर था वह. संभवतः गदर के बाद-जब देश में ट्रेन चल चुकी थी, पर बिजली नहीं आई थी. इसी दौर में एक रूपजीवा साहिबजान की दर्द भरी किन्तु सुखांत प्रेमकथा है पाकीज़ा. कोठे और घर में से किसी एक को भी अपनी मर्ज़ी से न चुन पाने की शाश्वत मज़बूरी. तवायफ़ से दुल्हन बनने के दुस्साहस स्वरूप उसकी पिछली पीढ़ी अपना जीवन गर्क़ कर चुकी है. संयोग से साहिबजान भी उसी रास्ते पर है. प्रेम उसे अपनाना चाहता है, पर उसके वेश्या होने की बदनामी हर जगह उसके पैर में बेड़ी डाले खड़ी है. विद्रोह, पलायन, संयोग, फ़िर पलायन और फ़िर विद्रोह की कड़ी में कोठेवाली साहिबजान की डोली आश्वस्ति के साथ कोठे से घर की ओर उठ जाती है कि भले ही वो एक वेश्या पुत्री है. भले ही उसका लालन-पालन कब्रिस्तान और कोठे पर हुआ. पर सबसे बड़ी बात यह कि वह अपना ही खून है!

फिल्म यदि यहीं आकर समाप्त हो जाती तो यह एक सामान्य बात होती. किन्तु फिल्म जहाँ समाप्त होती है, वहाँ वह अपने पीछे एक अमिट प्रश्न छोड़ जाती है, कि चलो ठीक है वह आपका रक्त-संबंध था, सो अंततः आप उसे कोठे से भी ब्याहकर ले गए? पर हमारा क्या? हम जो कोठे पर ही पैदा हुईं, वहीं पली-बढ़ीं. नहीं पता हमारी रंगों में किस का लहू दौड़ रहा है. हर ढलती शाम के बाद उनकी माँ के पास आने वाला नामालूम वो कौन शख़्स था, जो उसका पिता है. क्या कभी साहिबज़ान की तरह कोई उसे भी कोठे से ब्याहकर अपने घर की जीनत बनाएगा? या हम जैसी नर्गिसें हमेशा ही अपनी बेनूरी पर रोती रहेंगी?


जिन्होंने फिल्म ‘पाकीज़ा’ देखी है और उसके अंत में साहिबज़ान की डोली उठने के ठीक बाद, कोठे की छत पर खंभे को पकड़कर बड़ी हसरत भरी निगाह से डोली को जाते हुए निहारती ‘एक लड़की’ को नहीं देखा, तो सच जानिए आपने पाकीज़ा का कुछ नहीं देखा. पूरी फिल्म का असली मर्म वहीं है. फिल्मी इतिहासकार बताते हैं कि जब फिल्म पाकीज़ा की शूटिंग समाप्त हुई और एडिटिंग के लिए गई, तो एडीटर डी.एन पाई ने उस दृश्य को अनावश्यक और फिल्म को बेवज़ह लम्बा करता हिस्सा मान कट कर दिया था. जब यह बात कमाल अमरोही को पता चली, तो उन दोनों में काफी बहस हुई. बाद में वह दृश्य फिल्म में फिर जोड़ा गया. कमाल साहब का दावा था कि असली पाकीज़ा तो यही है. डी.एन पाई ने वह सीन जोड़ते हुए कमाल साहब से पूछा था- ‘आपको लगता है कि कोई ये समझ पाएगा कि छज्जे वाली लड़की ही असल पाक़ीजा है?’ इसके ज़वाब में कमाल साहब ने कहा था- ‘अगर एक आदमी भी ये समझने में कामयाब रहा, तो उनका फिल्म बनाना सफल हो जाएगा.’

इसके आगे का किस्सा यह भी है कि किस तरह इस घटना के एक साल बाद एक आदमी ने कमाल अमरोही साहब को ख़त लिखकर बताया कि उसे छत पर खड़ी लड़की की तस्वीर चाहिए, जिसे देखकर महसूस हुआ कि वही असली पाक़ीजा है. कमाल साहब इस बात से बेहद खुश हुए और उन्होंने डी.एन पाई को बुलवाया और कहा कि ये पढ़ो. यह वही आदमी है, जिसने मेरी फिल्म देखी है. इसके बाद कमाल साहब ने उस इंसान को एक ख़त लिखा और कहा कि अगर वह देश में कहीं भी इस फिल्म को देखना चाहे, तो वह मुफ़्त में देख सकता है!


क्या ‘पाक़ीजा’ सामाजिक बंदिशों में जकड़ी तवायफ़ों की अधूरी हसरतों की दास्तान भर है?  क्या यह मनुष्य की आदिम अभिलाषाओं, स्वतंत्रता, समानता और निश्चल प्रेम पाने को फिर-फिर की जाने वाली कोशिशों का नाम नहीं है?

नर्गिस को पता है कि वह एक तवायफ़ है, वह तब भी शहाबुद्दीन के घर में एक आबरूपसंद औरत बनकर रहना चाहती हैं. नर्गिस; नवाबजान की छोटी बहन. जिसकी दिलरुबा आवाज़ और जिसके घुँघरुओं की झंकार ने धूम मचा रखी है. कितने दिल हैं जो इसकी ठोकरों में तड़पते रहते हैं, और यह उन पर लापरवाही से नाचती रहती है. हाँ, मग़र ये कौन है? जिसके आते ही नर्गिस अपने इस नापाक़ माहौल में मुरझाकर रह जाती है. इसकी रूह फ़रियाद करने लगती है.

नर्गिस : 'सहाब! मुझे यहाँ से ले जाओ?' और सहाब! की आँखों में तड़पता हुआ इश्क उसे यक़ीन दिलाने लगता है.

शहाबुद्दीन: ‘

हाँ नर्गिस! इन बदनाम महफ़िलों में पिघलती हुई शमा को मैं यहाँ पिघलने नहीं दूँगा? एक रात मैं आऊँगा और तुझे इस दोज़ख से निकाल ले जाऊँगा.’

 

साहिबजान जो कि नर्गिस की बेटी है और उसके सामने उसकी माँ का मुहब्बत में चोट खाया दर्दनाक असफलताओं से भरा अतीत है. समझाने वालों ने उसे समझा भी दिया है कि तेरे ख़ूबसूरत पैर देखकर उन्हें जिसने धरती पर न उतारने की सलाह दी है, उसने तेरे पैरों में उस वक़्त बँधे हुए घुँघरू और उन घुँघरुओं से लिपटी बदनामी नहीं देखी.

बिब्बन: 

‘साहिबजान! यह पैग़ाम तेरे लिए नहीं है...’

साहिबजान: 

‘क्या? नहीं-नहीं यह मेरे लिए ही है, इसे मैंने अपने पाँव में रखा हुआ पाया था.’

बिब्बन: 

‘हां , लेकिन उस वक़्त तेरे पांव में घुँघरू बँधे नहीं होंगे... अगर घुँघरू बँधे होते तो कोई कैसे कहता कि इन्हें ज़मीन पर मत रखना, मैले हो जाएंगें...! यह पैग़ाम तो है लेकिन भटक गया है.’

बावज़ूद इसके साहिबजान हर रात तीन बजे अपने घर के पास से गुज़रने वाली उस ट्रेन की सीटी की आवाज़ सुन अपने को रोक नहीं पाती और दौड़ पड़ती है उसे देखने. उसी प्रकार फिल्म का नायक सलीम यह जानता है कि उसके इज़्ज़तदार नवाब खानदान की हवेली के प्रत्येक सदस्य को हर एक साँस के बाद दूसरी सांस लेने के लिए, उसके दादा जानी की इजाज़त लेनी पड़ती है. वह तब भी एक अनजान लड़की को घर ले आता है.

सलीम अहमद खान: ‘मैं भूल ही गया था कि इस घर के इंसानों को हर एक साँस के बाद, दूसरी साँस लेने के लिए आपकी इजा़जत लेनी पड़ती है. आपकी औलाद ख़ुदा की बनाई ज़मीन पर नहींआपकी हथेली पर रेंगती है.’

इतना ही नहीं, उस उजड़ती नवाबी के बीच उठ खड़ा हुआ एक नया पूँजी-सम्पन्न वर्ग जो, अभी नया-नया अमीर बना है. सामाजिक हैसियत भी उसकी ज़मीदार और नवाबों जैसी नहीं है. न उसमें नवाबों जैसा उठने-बैठने का सलीका व तमीज़.

गौहर जान: ‘अरे! ठेकेदार साहब! वहाँ कहाँ बैठ रहे हैं. इधर तशरीफ़ लाइये?’

ठेकेदार: ‘हें-हें बस जी! बंदे औक़ात में ही ठीक हैं.

वह भी अपनी सीमा लाँघकर भरे मुज़रे बड़ी बेशऊरी के साथ मुहरों से भरी थैली रक्स करती साहिबजान के आगे फेंकता है, यह बात अलग है कि ठेकेदर अपनी इस बेअदबी पर पुराने किब्र-ओ-गुरूर से भरे नवाब द्वारा चलाई गई पिस्टल से अपने हाथ पर गोली खाता है.

पाकीज़ा पर बहुत लिखा गया पर इस दृष्टि से शायद ही लिखा गया हो कि उजड़ती नवाबी और पनपते नवपूँजीवाद के बीच तवायफ़ों के कोठे किस तरह तबाह हुए. पाक़ीजा में एक ज़िक्र नवाब हशमतशाह की प्रेयसी तवायफ़ गौहरज़ान का भी है. नवाब गुज़र चुके हैं और गौहरज़ान गले-गले तक कर्ज़ के अंबार में डूबी हुई है. नवाब शाहाबुद्दीन कहीं साहिबजान को अपने साथ न ले जाएँ, इसलिए उसकी खाला नवाबजान उसे रातों-रात वहाँ से अपनी एक अन्य बहन के पास लखनऊ ले जाती है. जहाँ वह नवाब हशमत शाह द्वारा कभी गौहरज़ान को बख्शीश में दिया गुलाबी महल ख़रीद लेती हैं.

इतना ही नहीं जब तक शाहाबुद्दीन का ख़तरा टल नहीं जाता, साहिबज़ान उस महल में गौहर जान की भानजी बनकर रहती है. ठेकेदार के दर्शन भी हम उसी महल में करते हैं, जब साहिबज़ान वहाँ पहली बार राजस्थान की मांड गायन शैली में, ‘ठाड़े रहियो ओ! बाँके यार रे’ मुज़रा करने के लिए उपस्थित होती है. ठेकेदार के हाथों में मोहरों की थैली है, पर वह मुज़रे में आए नवाबों और ज़मींदारों के बराबर कालीन और मसनद पर न बैठ, अपने तौलिए या गमछे अंतिम छोर पर दरवाजे के पास ज़मीन झाड़कर बैठ जाता है.

आगे हम देखते हैं कि एक नाटकीय घटनाक्रम के बाद नवाब परिदृश्य से बाहर हो जाते हैं. शेष बचता है नवपूँजीवाद का प्रतिनिधित्व करता ठेकेदार. फिल्मकार ने अपने कुलीन मुस्लिम संस्कारों के प्रभाव के चलते, यह बात भरपूर तरीके से दिखाने की कोशिश की है कि बढ़ी हुई आमदनी के साथ तमीज़ और तहज़ीब भी आ जाए, यह जरूरी तो नहीं? कुछ एक घटनाक्रम के बाद जब एकमुश्त रक़म चुकाकर ठेकेदार एक रात साहिबजान के कक्ष में दाखि़ल होता है. हालांकि उस वक़्त ठेकेदार की बोली में मुलायमियत तो है पर हुलिया रईसी न होकर बिल्कुल गँवारों जैसा है. अब भला नज़ाकत और नफासत पसन्द साहिबजान भला उसे पसन्द करे भी तो कैसे? वैसे यह फिल्म में बतौर सीधे-सीधे तो नहीं कहा गया, पर ठीक फिल्मकार भी तो यही कहना चाह रहा है.

पाक़ीजा में साहिबजान और ठेकेदार के बीच की उस जोराजोरी को कमाल अमरोही ने बड़े ही रहस्य-रोमांच के साथ बुना है. यदि आपको प्रतीकों की ज़रा भी समझ नहीं और प्रेम की गूढ़ता पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं, तो वह दृश्य एक हॉरर मूवी के सीन से कम नहीं लगेगा.

कोई पहर रात का समय. साहिबजान का कक्ष. कक्ष में स्वर्ण तीलियों से निर्मित एक पिंजरा और उसमें कैद मैना. मैना की रखवाली करता एक सर्प. बाद उसके किसी शिकारी की भाँति दबे पाँव ठेकेदार का साहिबजान के कक्ष में प्रवेश. साहिबजान का घबड़ाकर जागना. उठना, भागना. उस भागने और पकड़ने के बीच ठेकेदार के सिर की चोट से आंगन के पेड़ की टहनी पर लटके पिंजरे का गिरना. पिंजरे के गिरने के साथ ही पिंजरे से लिपटे सर्प का भी गिरना और ठेकेदार के सामने फन काढ़कर खड़ा हो जाना. सर्प के भय से ठेकेदार का भागना. भागने की हड़बड़ाहट में साहिबजान के कमरे में रखे क्रॉकरी के एक खूबसूरत टब का टूटना. टब के टूटते फ़र्श पर फैले पानी के साथ दो रंगीन मछलियों का गिरकर तड़पना. अंत में संभवतः सर्प के डसने से बदहवास ठेकेदार का साहिबजान के बाथटब में गिरजाना. साहिबजान के वहाँ से निकल भागने के साथ यह अद्भुत दृश्य समाप्त हो जाता है. पाक़ीजा इसलिए भी श्रेष्ठ फिल्म है कि इसमें गज़ब की प्रतीक योजना है. 

जिन्होंने पाक़ीजा थोड़े गौर से देखी होगी, तो देखा होगा कि जब कब्रिस्तान में नर्गिस की मौत हो जाती है और उसे खोजती उसकी बहन नवाबजान जब तक क़ब्रिस्तान पहुँचती हैं, तब तक वहाँ नर्गिस का इंतकाल हो जाता है. नबावजान क़ब्रिस्तान के एक मजदूर के सहयोग से नर्गिस को वहीं दफ़ना देती हैं. नवाबजान जब क़ब्रिस्तान में नर्गिस को सुपुर्द-ए-ख़ाक कर रही होती है, तब वहीं क़ब्र के पीछे धुँए के मानिंद एक पीली आँधी या बवंडर उठता दिखाई देता है. ठीक उसके बाद जब नवाबजान अपनी बहन नर्गिस को दफ़नाकर और उसकी नवजात बेटी साहिबजान को लेकर तांगे में बैठकर क़ब्रिस्तान का दरवाज़ा पार कर रही होतीं हैं, तब वह बवंडर आंधी का सा रूप ले पीछा करता तांगे के साथ हो लेता है. ऐसा लगता है कि वह बवंडर नहीं मुहब्बत का तूफ़ान था, जो नर्गिस के मरने के साथ मरा नहीं. वह उसकी बेटी साहिबजान के रूप में जिंदा है और आगे अपने और भी रंग दिखाने वाला है.

अब आते हैं साँप पर. साँप किंवदंतियों में ही नहीं, साहित्यिक रचनाओं यथा- रवीन्द्र नाथ टैगौर की कहानी ‘द ट्रस्ट प्रॉपर्टी’; मनोज कुमार पाण्डेय की कहानी ‘खजाना’ हो या इस नाचीज़ की कहानी ‘अन्तर-द्वंद्व’ में लोक विश्वास में गहरे तक पैठे, सर्प के धन संरक्षक का मिथक उपस्थित है. इस्लामिक मिथ में तो यहां तक माना गया है कि हजरत इब्राहिम द्वारा काबे के समीप चढ़ावे के लिए खोदे गए एक गड्डे में रहने वाले अल्लाह के भेजे एक सर्प ने उनके बाद काबे की पाँच सौ साल तक रक्षा की थी! ख़ैर जो भी हो, पाक़ीजा में पूरे समय उस स्वर्ण तीलियों से निर्मित पिंजरे में बंद मैना के आसपास, बतौर संरक्षक एक सर्प लगातार दिखाई पड़ता रहता है. पानीपत का नवाब जब तोहफ़े में साहिबजान के लिए मैना सहित यह पिंजरा भेजता है, तो साहिबजान की एक मौसेरी छोटी बहन बिब्बन उस समय चहकते हुए आकर बोलती भी है-

अजी यह चिड़िया नहीं, हमारी बड़ी आपा हैं?’

बड़ी आपा यानी साहिबजान. इस रूप में मैना का प्रतीक तो साहिबजान में पर्यवसित हो जाता है, पर साँप के रूप में मैना का संरक्षक कौन है. यदि हम मानकर चलें कि जैसा पुराने किस्से-कहानियों में रूप को भी ख़जाना माना गया है, तो रूप का संरक्षक प्रेम हुआ. इस रूप में पाक़ीजा में जो सर्प का प्रतीक है वह प्रेम है, जो मैना जैसी मासूम और रूपवान साहिबजान की आठों पहर रक्षा करता है.

फिल्म अर्धांश के बाद हम देखते भी हैं कि जैसे ही ठेकेदार मीना के कक्ष में प्रवेश करता है और घबराई मीना बाहर की ओर दौड़ती है, तो सबसे पहली प्रक्रिया जो होती है, उस साँप का साहिबजान की रक्षा में पिंजरे से गिरकर ठेकेदार के आड़े आ जाना! और भयभीत व बदहवास ठेकेदार का आगे अपनी मौत मारा जाना! इसके अतिरिक्त जब साहिबजान अपने तवायफ़ होने के चलते और अपने प्रेमी सलीम को जमानेभर की रुसवाई से बचाने की ख़ातिर, उससे ऐन वक़्त पर निक़ाह करने से इनकार कर वापस कोठे पर लौट आती है. साहिबजान उस वक़्त जब कोठे के बाहर बैठी होती हैं, उसी के साथ एक कटी-फटी पतंग भी अपनी डोर से टूटकर पास के पेड़ पर आ अटकती है. उस पतंग और साहिबजान में भी ग़ज़ब की समानता है, जिसे फिल्म में स्वयं साहिबजान ही बयान कर देती है :

साहिबजान: ‘हां, फिर मेरी आवारा लाश अपने इस गुलाबी मक़बरे में दफ़न होने के लिए लौट आई है!’

बिब्बन : ‘कैसी लाश?’

सहिब जान: 

‘हाँ बिब्बन! हर तवायफ़ एक लाश है. मैं भी एक लाश हूँ और तू भी. हमारा यह बाजार एक क़ब्रिस्तान है. ऐसी औरतों का, जिनकी रूहें मर जाती हैं और ज़िस्म जिंदा रहते हैं. यह हमारे बाला खाने, कोठे हमारे मक़बरे है, जिनमें हम मुर्दा औरतों के ज़िंदा ज़नाजे सजाकर रख दिए जाते हैं. हमारी क़ब्रें पाटी नहीं जातीं, खुली छोड़ दी जाती हैं, ताकि...’

बिब्बन : (मुँह पर हाथ रखते हुए) ‘चुप... चुप हो जा...’

साहिबजान: ‘मैं ऐसी ही खुली हुई क़ब्र की एक बेसब्र लाश हूँ, जिसे बार-बार जिंदगी बरग़ला कर भगा ले जाती है, लेकिन अब मैं अपनी इस आवारग़ी और ज़िदगी की इस धोख़ेबाज़ी से बेज़ार हो गई हूँ, थक गई हूँ.’

बिब्बन : ‘साहिबा! यह हुआ क्या? क्या उसने तुझे ठुकरा दिया?’

साहिबजान : ‘नहीं, मैं उन्हें छोड़ आई. मैं उन्हें एक घिनौना घाव देकर उनके दिल की ज़न्नत से निकल आई.’

बिब्बन:‘क्यूँ?’

साहिबजान : 

‘मैं डर गई. उसकी ज़मीन न जाने कैसी थी? जहाँ-जहाँ मैं पाँव रखती थी, वो वहीं-वहीं से धँस जाती थी. देख न बिब्बन! वो पतंग कितनी मिलती-जुलती है मुझसे! मेरी ही तरह कटी हुई!! ना मुराद कमबख़्त!’


पाकीज़ा ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी की मुख्य भूमिका के साथ एक बड़ी स्त्री प्रधान फ़िल्म है इस फ़िल्म के मुख्य दो चरित्र नर्गिस और साहिबजान हैं. पर्दे पर दोनों ही क़िरदार मीना जी ने ही अदाकिए हैं और वे निश्चय ही मीना कुमारी की पारम्परिक दुःखी और असहाय स्त्री की छवि के अनुकूल बैठते हैं.

किन्तु उसी में साहिबजान की मौसी ‘नवाबजान’ (वीना) और उनकी बहन की छोटी लड़की ‘जद्दन’ का चरित्र भी है, जो तवायफ़ संस्कृति में स्त्री की मजबूत और विद्रोही छवि की व्याख्या करते हैं. नवाबजान अकेली हैं और अकेले ही बड़ी दमदारी से सफलतापूर्वक अपने कोठे का संचालन करती हैं कि कोई बदमाश पहलवान भी उनकी मर्ज़ी के बग़ैर उस पर क़दम नहीं रख सकता :

नवाब जान : “उत्तर जा इस कोठे से…ये धौंस किसी और पर जमाना, मुझे नहीं जानता, मेरा भी नाम नव्वाब जान है, अगर फिर कभी इस कोठे पर क़दम रक्खा तो टाँगे तुड़वा दूँगी.”

नवाबजान खुदमुख्तार तो हैं ही वे विद्रोही भी हैं. उनका यह विद्रोह किसी को शारीरिक चोट तो नहीं पर कटु व्यंग्य और तानों के साथ है कि वह किसी भी अपराधबोध से भरे व्यक्ति का सीना छलनी कर दे:

नवाबजान : ‘अच्छा! तो आप शहाबुद्दीन हैं? हमारे बहनोई...(व्यंग्य के साथ हँसते हुए) कहिए फ़िर कैसे आना हुआ? अब किस गुनहगार की तलाश है आपको?…अब किस तवायफ़ को दोज़ख की आग से बचाने परहेज़गारी का कफ़न लेकर आए हैं आप?

शाहबुद्दीन : ‘नर्गिस ने मरते वक़्त मुझे एक ख़त लिखा था, जो मुझे आज सत्रह साल बाद मिला, उसमें मेरी बेटी का ज़िक्र है…मुझे मालूम हुआ है है वो यहाँ है…’

नवाबजान : ‘तो आप उसे देखने आए हैं?’

शाहबुद्दीन : ‘नहीं मैं उसे ले जाने आया हूँ.’

नवाबजान : ‘अच्छा तो उसे लेने आए हैं आप? …किसी क़ब्रिस्तान ने अब इसके जनाज़े की फ़रमाइश की होगी आपसे…अच्छी बात है…आपकी बेटी है, मैं कैसे मना कर सकती हूँ…लेकिन इस वक़्त तो वो मुज़रे के लिए बैठ चुकी है…और फ़िर खुलेआम इस बदनाम बाज़ार से बेटी को ले जाना यूँ भी आपकी ग़ैरत के ख़िलाफ़ है…कल सुबह आइयेगा.’इन संवादों में चरित्र अभिनेत्री वीना जी ने जैसे जान ही डाल दी हो, उनका कुछ ख़ास शब्दों पर लाघव देकर बोलना अपूर्व है. …वहीं उनकी बहन की बेटी बिब्बन नई-नई तवायफ़ बनी है, पर वह भी अपने किसी प्रेमी की हर चाही-अनचाही ज़्यादती सहने को बिल्कुल तैयार नहीं है:

जद्दन : “मैंने भी कहलवा दिया कि मैं कोई घरवाली नहीं, जो कोने में मुँह दे-देकर रोऊँगी…बाबा! मैं क्यों अपनी जान को रोग लगाने लगी…भाई दस दफ़ा इस दहलीज़ पर नाक रगड़नी हो, तो आओ; वरना बैठो अपनी जुड़वा के पास...’

पाकीज़ा पर कितना कुछ कहा गया है और कितना कुछ कहा जा सकता है. उसके एक-एक फ्रेम पर एक-एक सीन पर कितना ही कुछ लिखा और कहा जाए, कम ही जान पड़ेगा. कितने ही किस्से और किंवदंतियां बाद में पाकीज़ा और मीना जी को लेकर लिखी और कही गईं कि उन सबको जोड़ने बैठूँ तो एक थीसिस की सामग्री इकट्ठी हो जाए. पाक़ीजा की शूटिंग और मीनाजी से जुड़ा एक वाक़या चंबल क्षेत्र से भी जुड़ा हुआ है.

पाक़ीजा में जो जंगल वाला हिस्सा है, उसका एक बड़ा हिस्सा तो बालमुरी वाटर फॉल्स, शिवना समुद्रा वाटर फाल्स और रंगाथिट्टू बर्ड सेंचुरी कर्नाटक में फिल्माया गया था, किन्तु इसका कुछ हिस्सा मध्यप्रदेश में ग्वालियर से सटे शिवपुरी जिले में स्थित, माधव नैशनल पार्क वाले जंगल में भी कहीं फिल्माया गया था. मुंम्बई-आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग पर ग्वालियर और शिवपुरी के बीच पड़ने वाला यह बेहड़ीला इलाका, कभी शेर-चीतों से भरा रहता था. इतिहास में दर्ज़ है कि आगरा से मालवा आधमखान का विद्रोह दबाने जाते समय, अकबर ने इस इलाके में ही एक खूँख़्वार चीतनी का शिकार किया था. अकबर के ही नवरत्नों में से एक अबुल फ़जल की हत्या करने के बाद चंबल के पहले बाग़ी कहलाने वाले सलीम जहांगीर के मित्र, राजा वीरसिंह बुन्देला को भी बहुत दिनों तक शिवपुरी की इसी डांग में भटकना पड़ा था.

1970-72 के बहुत बाद तक भी इस इलाके से अधिकांश स्थानीय सवारी वाहन दिन में ही गुज़रते थे. बकौल विनोद मेहता- ‘आउटडोर शूटिंग पर कमाल अमरोही अक़्सर दो कारों पर जाया करते थे. एक बार कोटा से दिल्ली जाते समय मध्यप्रदेश में शिवपुरी के आगे उनकी कारों का पैट्रोल ख़त्म हो गया. किसी से पता चला कि सुबह-सुबह इसी रास्ते से एक बस गुजरती है और उसी बस से पेट्रोल मंगवाया जा सकता है. कोई रास्ता नहीं था. कमाल अमरोही ने तय किया कि वहीं बीच रास्ते सड़क पर रात गुजारी जाएगी और सबसे कह दिया कि आप अपनी गाड़ी के शीशे चढ़ा लें. अमरोही जी को शायद ये नहीं पता था कि वे देश के गिने-चुने बीहड़-जंगलों में से एक में कहीं हैं. अभी कुछ ही घंटे गुजरे होंगे कि रात दो बजे के आसपास कोई दस-बारह लोगों ने दोनों गाड़ियों को घेर लिया. सभी हथियारों से लैस थे. गाड़ी के अंदर सवार सभी लोगों के हाथ-पाँव फूल गए. ये गाड़ियाँ एक गेट के अंदर ले जाई गईं. वहाँ सभी को उतरने के लिए कहा गया. अमरोही जी ने मना कर दिया कि वे लोग गाड़ी से नहीं उतरेंगे. जिसको मिलना है, वहीं उनसे मिलने आए. डकैतों ने उनसे कहा कि ये गाड़ियाँ अब थाने जाएंगी. पर अमरोही सहाब नहीं माने. उनको मालूम था उतरने का मतलब क्या हो सकता है. चारों ओर घनघोर जंगल और गाड़ी में बला की खूबसूरत मीना जी. अमरोही साहब को उनकी चिंता हो रही थी.

नए शिकार के बारे में इन डाकुओं ने अपने सरगना को खबर की. इनके सरदार को बुलाया गया. थोड़ी देर बाद झक सफेद सिल्क का पायजामा और कमीज़ पहने हुए एक शख़्स उनके पास आया. उसने पूछा, आप कौन हैं? अमरोही साहब ने ज़वाब दिया, ‘मैं कमाल हूं और इस इलाके में शूटिंग कर रहा हूँ. हमारी कार का पेट्रोल ख़त्म हो गया है. उसको लगा कि वो रायफ़ल शूटिंग की बात कर रहे हैं. लेकिन जब उसे बताया गया कि ये फिल्म शूटिंग है और दूसरी कार में मीना कुमारी भी बैठी हैं. इधर यह कड़ी पूछताछ हो ही रही थी कि तभी उधर किसी ने दूसरी गाड़ी में झाँका और दूसरे साथी के कान में आकर बोला कि इसमें मीना जी ही हैं. वे अँधेरे की वजह से दूर से दिख नहीं रही थीं. जब दोनों ओर से इस बात की पुष्टि हुई, तो उस शख़्स के हाव-भाव बदल गए. वह इससे पहले कमाल अमरोही की ‘महल’ और मीना जी की अब तक रिलीज़ हुई अधिकांश लोकप्रिय फिल्में देख चुका था और मीना जी का बड़ा प्रशंसक था.

फिर क्या था उस गिरोह के सरदार ने आदेश दिया कि इस काफिले को लूटा तो नहीं जाएगा, पर आज यह काफिला आगे भी नहीं जाएगा. ऐसा सुनकर डरी-सहमी मीना कुमारी को गुस्सा आ गया. वह गुस्से में काँप रही थीं, पर इन डाकुओं को खुली चुनौती भी दे रही थीं. बाकी के लोगों की स्थिति का भी अंदाजा लगाया ही जा सकता है. पर डाकुओं के सरदार ने स्पष्ट कर दिया कि आज किसी हालत में इन्हें जाने नहीं दिया जाएगा. कुछ देर में लोगों की तेज चलती साँसें थमने लगीं, जब उन्हें एहसास हुआ कि वह सरगना उन्हें धमकी नहीं दे रहा है. डरा नहीं रहा है. उसने इस पूरी टीम से कहा कि आप सबको हमारी अड्डे पर चलना होगा और हमें खातिरदारी का मौका देना होगा. ‘आज आप लोग हमारे मेहमान होंगे और कल आप लोगों की गाड़ी में पेट्रोल भरवा दिया जाएगा.’

उस रात सारे मेहमानों के लिए कई व्यंजन बनवाए गए. खूब आवभगत की गई. मीना कुमारी गाड़ी में ही बैठी रहीं और वहीं उनको खाने-पीने का सामान भेजा जाता रहा. उनके सोने की व्यवस्था की गई. अगली सुबह विदाई के वक्त, डकैतों का वह उस्ताद हाथ में खंजर लिए हुए उस गाड़ी के पास गया, जिसमें मीना जी बैठी हुई थीं. सभी लोग डर गए कि क्या पता डाकुओं का सरदार क्या करने जा रहा है. कुछ देर के लिए तो जैसे सबकी साँसें ही थम गईं. उसने खिड़की से वह खंजर मीना कुमार को दिया और बोला कि आपको मेरी बाँह पर अपना नाम लिखना होगा. मीना कुमारी के लिए ऑटोग्राफ देना कोई बड़ी बात नहीं थी. पर ऐसा ऑटोग्राफ? उन्होंने इसका विरोध किया पर डाकुओं के सरगना ने इनकी बात नहीं मानी. हारकर मीना कुमारी को खंजर से भी ऑटोग्राफ देना पड़ा. ऐसा करते हुए मीना जी लगभग बेहोश सी हो गईं, लेकिन उस डाकू ने उफ्फ तक नहीं की! इसके बाद बड़ी शान-ओ-शौकत से सबकी विदाई की गई.

वहाँ से निकलने के बाद जब यह टीम ग्वालियर पहुँची तो पता चला कि जिसकी बाँह पर मीना कुमारी ने ऑटोग्राफ दिया, वह उस क्षेत्र का खूँखार डाकू अमृतलाल 'किरार' था. बागी और विद्रोह की ज़मीन चम्बल में अपहरण और फिरौती का घृणित सिलसिला शुरू करने का श्रेय तब का क्लेवर फ़ॉक्स कहे जाने वाले अमृतलाल को जाता है.

कमाल अमरोही जो मीना कुमारी के पति भी थे, ने बाद में एक साक्षात्कार में बताया था कि बहुत दिनों बाद जब अमृतलाल के मारे जाने की खबर अखबारों में प्रकाशित हुई थी, तब उसमें यह भी दर्ज़ था कि डाकू की बाँह पर ‘मीना’ उकेरा हुआ है.

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जितेन्द्र विसारिया
मोबाइल : 9893375309
ई-मेल : jitendra.visariya@gmail.com

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  1. धनन्जय सिंह25/1/21, 2:47 pm

    आपने बहुत शानदार लिखा है। बीहड़ जंगल का प्रसंग अद्भुत है। लेख के लिए बधाई आपको।

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  2. बहुत अच्छा आलेख। पाकीज़ा पर एक मुकम्मल बात। इसी विषय पर बाद में मुज़फ्फर अली उमराव जान बनाते हैं। चूंकि वे पैरेलल सिनेमा की धारा से आते हैं तो उमराव जान का समाज एक खास वक़्त और भौगोलिक दायरे में बंधा हुआ है। वहीं कमाल अमरोही का पूरा ध्यान कहानी कहने पर है शायद। तो वे देश-काल की सीमाओं को तोड़ देते हैं। शायद यह आत्ममुग्धता रही हो कि उनका यह सिनेमा कालजयी होगा और वे किसी कालखंड में इसे नहीं बांधेंगे।
    हालांकि बेनेगल, सथ्यू की राह के राही होने के बावजूद एक खास तरह की आत्ममुग्धता मुज़फ्फर अली के सिनेमा में भी मिलती है। हमको लगता है कि वे न्यूयॉर्क की गलियों में भी एक लखनऊ ढूंढ ही लेंगे। वे कहीं भी सिनेमा बनाएं, थोड़ा-बहुत लखनऊ ले ही आएंगे। बम्बई के जुहू में जो उनका घर है, उसमें घुसते ही बम्बई बाहर छूट जाता है...

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  3. पाकीज़ा पर बड़ा खोजपूर्ण आलेख है।
    पठनीय और गंभीर।

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  4. बहुत ही सारगर्भित आलेख। पठनीय सामग्री।लेखन पर अच्छी खासी मेहनत की गई है।

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