यशोदा देवी: उपनिवेश और आयुर्वेदिक चिकित्सा: सौरव कुमार राय


उपनिवेश के विरुद्ध भारत का संघर्ष ‘नवजागरण’ की जब शक्ल ले रहा था तब उसकी एक लड़ाई चिकित्सा के क्षेत्र में भी लड़ी जा रही थी. इसे ‘आयुर्वेदिक राष्ट्रवाद’ भी कह सकते हैं. यह पुनरुत्थान अनेक रूपों में प्रकट हुआ. पाश्चात्य चिकित्सकीय ढांचे का उपयोग कर आयुर्वेद अपने को बदल रहा था. इस विषय पर कार्य करने वाले विद्वान डैविड आर्नोल्ड की मानें तो– आयुर्वेद के मूल संस्कृत ग्रंथों का संस्कृत से अंग्रेजी में अनुवाद ने इस आंदोलन को शास्त्रीय वैधता प्रदान की और उसे विशाल समुदाय तक पहुंचाया वहीं प्रभावकारी सांस्थानिक ढांचों में से एक का अनुसरण करते हुए आयुर्वेद ने औषधालयों की स्थापना करते हुए अपनी जड़े मजबूत की. पहला आयुर्वेदिक औषधालय १८७८ में कविराज चंद्र किशोर सेन ने कलकत्ते में खोला था उसके बीस साल बाद तेलुगु वैद्य पंडित डी. गोपालाचारलू ने मद्रास में प्रथम औषधालय की स्थापना की. मुद्रण तकनीक का प्रयोग करते हुए आयुर्वेदिक चिकित्सा लगातार  लोकप्रिय हो रहा थी. (Science, Technology and Medicine in Colonial India)

ज़ाहिर है यह अखिल भारतीय फेनामेना था. हिंदी क्षेत्र इससे कैसे अछूते रह सकते थे. विशेष बात यह है कि इस क्षेत्र में महिला यशोदा देवी ने महत्वपूर्ण कार्य किया. उन्होंने प्रयाग में जहाँ ‘स्त्री-औषधालय’ की स्थापना की वहीं उनकी इस विषय पर लिखी १०८ किताबें बताई जाती हैं. 

यशोदा देवी पर यह शोध आलेख सौरव कुमार राय ने लिखा है. अभी इसपर और कार्य की जरूरत है. बहरहाल इस दिशा में ध्यान खींचने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया जाना चाहिए.

    


यशोदा देवी
उपनिवेश और आयुर्वेदिक चिकित्सा
सौरव कुमार राय

 

हिंदी नवजागरण एवं स्त्री पत्रकारिता के संदर्भ में चर्चा करते हुए 'समालोचन' पर अपने हालिया प्रकाशित लेख में गरिमा श्रीवास्तव लिखती हैं कि पुस्तकालयों और अभिलेखागारों में बिखरे हुए पुराने पत्र और पत्रिकाएँ किसी उद्धारक की राह तकते-तकते दम तोड़ रहे हैं. जिन लोगों ने वाराणसी स्थित नागरी प्रचारिणी सभा की हालिया अवस्था देखी है, वे गरिमा श्रीवास्तव की इस बात से पूरी तरह इत्तिफ़ाक़ रखते होंगे. जैसा कि भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में फेलो रह चुके रमाशंकर सिंह कहते हैं 'हिंदी पट्टी अपने विद्वानों का इंतजार कर रही है' जो इसकी आंचल में बेतरतीब तरीके से बिखरे हुए इतिहास की इस थाती को सहेज व समेट सकें. इतिहास की गर्द में समायी एक ऐसी ही किरदार हैं यशोदा देवी.


उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध एवं बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति से संबंधित पुस्तिकाओं, पत्रिकाओं, संदर्भ-ग्रंथों एवं सम्मेलनों की एक लंबी श्रृंखला देखने मिलती है. इसका मूल उद्देश्य भारत में पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति (अथवा ऐलोपैथी) के बढ़ते प्रभुत्व के विरुद्ध स्वदेशी चिकित्सा पद्धति के रूप में आयुर्वेद को पुनर्जीवित एवं पुनः स्थापित करना था. नए उभरते सुधारवादी एवं राष्ट्रवादी अभिजात्य वर्ग का यह मानना था कि यदि हम निकट भविष्य में सरकार एवं राज्य सत्ता की कमान अपने हाथों में लेना चाहते हैं तो हमें हर उस चीज का, जिससे जनता का सीधा सरोकार है, स्वदेशीकरण करना होगा. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की इस विचारधारा का एक महत्वपूर्ण अंग चिकित्सकीय राष्ट्रवाद भी था जो भारत में स्वदेशी चिकित्सा प्रणालियों के प्रति सन्नद्ध था. चिकित्सकीय राष्ट्रवाद की इसी अवधारणा के अंतर्गत आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति एक 'विशुद्ध' 'स्वदेशी' चिकित्सा प्रणाली के प्रमुख दावेदार के रूप में उभरी.




औपनिवेशिक शासन के अधीन तत्कालीन संयुक्त प्रांत (आज का उत्तर प्रदेश) आयुर्वेद के इस समकालीन उभार का एक प्रमुख केंद्र था. यह गौरतलब है कि संयुक्त प्रांत के अलग-अलग हिस्सों से तकरीबन 30 आयुर्वेदिक पत्र-पत्रिकाएँ इस दौर में प्रकाशित हो रही थीं जिनमें से कुछ प्रमुख थीं-

धन्वन्तरि,
वैद्य सम्मलेन पत्रिका,
सुधानिधि,
अनुभूत योगमाला,
आयुर्वेद प्रचारक,
वैद्य,
राकेश,
आयुर्वेद केसरी, इत्यादि.


जगन्नाथ शर्मा, किशोरी दत्त शास्त्री, शांडिल्य द्विवेदी, रूपेन्द्रनाथ शास्त्री, जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल, गणनाथ सेन, शंकर दाजी पदे, आदि इस आंदोलन के केंद्र में थे. इन सब के बीच जिस एक शख्सियत को लगभग भुला सा दिया गया है वे हैं इलाहाबाद की महिला वैद्य यशोदा देवी. हालाँकि, हाल के वर्षों में चारु गुप्ता ने अपने आलेख 'प्रोक्रिएशन एंड प्लेजर: राइटिंग्स ऑफ़ ए वुमन आयुर्वेदिक प्रैक्टिशनर इन कोलोनिअल नॉर्थ इंडिया' (2005) तथा रशेल बर्गर ने अपनी किताब आयुर्वेद मेड मॉडर्न: पॉलिटिकल हिस्ट्रीज ऑफ़ इंडिजेनस मेडिसिन इन नॉर्थ इंडिया, 1900-1955 (2013) में यशोदा देवी के कार्यों एवं लेखन पर शोधपरक चर्चा की है, हिंदी पट्टी के ज्यादातर लेखक व शोधकर्ता नवजागरणकालीन इतिहास के इस महत्वपूर्ण किरदार से अनभिज्ञ ही हैं. प्रस्तुत लेख का मुख्य उद्देश्य यशोदा देवी को इतिहास की इस गर्द से निकालकर हिंदी के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना है जिससे उनपर शोध के नए द्वार खुल सकें.


उपलब्ध स्रोतों के अनुसार यशोदा देवी ने वैद्यक शास्त्र की शिक्षा अपने वैद्य पिता से हासिल की थी. उन्होंने अपना ध्यान व ऊर्जा विशेष तौर से स्त्रियों का इलाज करने पर लगाया. इसके लिए नेपाल की एक महिला डॉक्टर सत्यभामा बाई को वो अपना आदर्श मानती थीं. यशोदा देवी ने इलाहाबाद में न सिर्फ 'स्त्री औषधालय' की स्थापना की, वरन स्त्री शिक्षा पुस्तकालय की भी शुरुआत की. वे महिला व बाल स्वास्थ्य पर केंद्रित पत्रिकाओं 'स्त्री चिकित्सक', ‘कन्या सर्वस्व’ एवं ‘स्त्रीधर्म शिक्षक’ की संपादिका भी थीं. इसके साथ-साथ उन्होंने स्त्री-स्वास्थ्य व दिनचर्या से संबंधित तमाम पुस्तक-पुस्तिकाएँ भी लिखीं. यशोदा देवी का लेखन वैद्यक होने के साथ-साथ नवजागरणकालीन स्त्री पत्रकारिता के उस विधा का द्योतक था जिसे 'आचरण' या 'कंडक्ट' पत्रिकाओं की श्रेणी में रखा जाता है जिनकी मूल चिंता स्त्रियों का आचरण-सुधार और उन्हें आदर्श गृहिणी बनाना था.     


दरअसल यशोदा देवी का यह मानना था कि स्त्रियों के अधिकांश रोगों का कारण मुख्यतः उनके गृहस्थ अथवा वैवाहिक जीवन से जुड़ा हुआ होता है. इसी कारणवश यदि हम यशोदा देवी द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की सूची पर गौर करें तो हम यह पाते हैं कि इसका एक बड़ा हिस्सा उपदेशात्मक पुस्तकों का था. उदाहरण के तौर पर, महिला व बाल स्वास्थ्य के अलावा, यशोदा देवी ने सुघड़ गृहिणी, पति-भक्ति की शक्ति, नारी धर्म शास्त्र, सच्चा पति प्रेम, गृहिणी कर्तव्य शास्त्र आरोग्यशास्त्र अथवा पाकशास्त्र, नारी नीति शिक्षा, आदि जैसी उपदेशात्मक पुस्तकें भी प्रकाशित किया. ये पुस्तकें स्त्रियों के सुखद गृहस्थ जीवन से संबंधित रहस्यों को उजागर करने का दावा करती थीं. वास्तव में, यशोदा देवी स्वयं को सिर्फ स्त्री रोग विशेषज्ञ न मानकर 'स्त्रीधर्म शिक्षक' मानती थीं जो कि तत्कालीन आयुर्वेदिक संवाद में सामाजिक एवं वैद्यक सरोकारों के मिलन का अप्रतिम नमूना था.   

शिशु रक्षा विधान अर्थात बाल रोग चिकित्सा (1912)

(‘नारी कर्तव्य ग्रंथावली’ सीरीज के अंतर्गत यशोदा देवी द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक)


स्त्रियों के आचरण-सुधार संबंधी चिंता यशोदा देवी की लेखनी में स्पष्ट तौर पर दिखती है. उदाहरण के तौर पर अपनी एक किताब दम्पति आरोग्यता जीवनशास्त्र (1927) में आम पाठकों विशेष तौर पर शिक्षित स्त्रियों के पढ़ने की विकृत आदतों के बारे में अफ़सोस व्यक्त करते हुए यशोदा देवी लिखती हैं कि माघ मेले जैसे पवित्र अवसर पर भी ऐसे पुस्तक स्टालों पर भीड़ लगी रहती है जहाँ 'गंदे' उपन्यास तथा कविताओं आदि की बिक्री होती है. यशोदा देवी के अनुसार साक्षर महिलाओं को तो अलबेला गवैया, ग़ज़ल संग्रह, आदि जैसे 'सतही' एवं 'गंदे' साहित्य से कुछ इस कदर लगाव था कि यदि उनके ट्रंकों की जांच की जाये तो एक-दो ऐसे साहित्य निकल ही आएंगे. वे आगे लिखती हैं कि स्त्रियों द्वारा इस तरह के 'गंदे' साहित्य की मांग संबंधी अनेकों पत्र उन्हें रोजाना मिलते हैं.


यशोदा देवी द्वारा लिखे गए पाकशास्त्रों का भी मूल उद्देश्य एक 'सुघड़ गृहिणी' का निर्माण था. रशेल बर्गर के अनुसार यशोदा देवी ने अपनी लेखनी के माध्यम से रसोई के कार्यों को भी वैज्ञानिकता की परिधि के अंदर ला दिया था. साथ ही अपने द्वारा लिखित पाक कला पुस्तकों को 'शास्त्र' की संज्ञा दे यशोदा देवी ने इन्हें एक 'कालातीत ज्ञान' का भी स्वरूप प्रदान करने में सफलता हासिल की.

ब्रह्मचर्य की महिमा का उल्लेख करता एक पद

स्रोत: यशोदा देवी, दम्पति आरोग्यता जीवनशास्त्र अर्थात रतिशास्त्र संततिशास्त्र (1927)

 

एनअदर रीजन: साइंस एंड इमेजिनेशन ऑफ़ मॉडर्न इंडिया (1999) के लेखक ज्ञान प्रकाश के अनुसार यशोदा देवी द्वारा लिखे गए ऐसे उपदेशात्मक आचरण ग्रंथ हिन्दू स्त्रियों की मध्यमवर्गीय संकल्पना की तुष्टि करते थे जिसका मूल उद्देश्य गृहस्थ जीवन के ‘वैज्ञानिक प्रबंधन’ के माध्यम से एक सशक्त हिन्दू राष्ट्र का निर्माण था. साथ ही यशोदा देवी ने अपने लेखन में जिस प्रकार से पुरुषों के संदर्भ में 'ब्रह्मचर्य' तथा 'वीर्य रक्षा' पर विशेष बल दिया है, वह भी कहीं-न-कहीं सशक्त हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के प्रति सन्नद्ध तत्कालीन मध्यमवर्गीय प्रवचन से न सिर्फ प्रभावित दिखता है, बल्कि उसे वैधता भी प्रदान करता है.


हालाँकि, यशोदा देवी के लेखन के उपरोक्त मध्यमवर्गीय सुधारवादी उपदेशात्मक लहजे के बावजूद, स्त्री स्वास्थ्य के क्षेत्र में यशोदा देवी के योगदान को कम करके आंकना भूल होगी. यह गौरतलब है कि आयुर्वेद का क्षेत्र मूलतः पुरुष प्रधान रहा है. ऐसे में एक महिला वैद्य का होना अपने आप में क्रांतिकारी घटना थी. महिलाओं के बीच यशोदा देवी की प्रसिद्धि का आलम कुछ यह था कि उन तक पत्र सिर्फ 'देवी, इलाहाबाद' के नाम पर पहुँच जाते थे. यह अफसोस की बात है कि साधारण महिलाओं द्वारा उनको लिखे गए ये पत्र उपलब्ध नहीं हैं, अन्यथा ये उस दौर की स्त्रियों की स्वास्थ्य एवं गृहस्थ जीवन संबंधी चिंताओं पर प्रकाश डालने के महत्वपूर्ण स्रोत हो सकते थे.



एक महिला किसी महिला वैद्य के समक्ष जिस प्रकार से निस्संकोच हो अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्या बता सकती थी, वैसा पुरुष वैद्य के समक्ष संभव न था. साथ ही 'महिला यौन सुख', 'असहमति से सेक्स', आदि वर्जित विषयों को जिस प्रकार से यशोदा देवी ने अपने लेखों में शामिल किया वह काबिल-ए-तारीफ़ है. यशोदा देवी ने अपने लेखन में महिलाओं की इच्छा के विरुद्ध उनसे यौन संबंध स्थापित करने का पुरजोर विरोध किया. 

वे लिखती हैं कि ऐसे पति जो महिलाओं की सहमति का ख्याल नहीं रखते, वे पशुओं से भी बदतर हैं. वास्तव में, जैसा कि चारु गुप्ता ने तर्क दिया है यशोदा देवी का प्रवचन विभिन्न स्तरों पर अस्पष्ट और खंडित है जिसे कई बार किसी एक श्रेणी में रख पाना मुश्किल हो जाता है. एक तरफ तो वे स्थापित लिंग भेद को पुष्ट करती हैं, वहीं दूसरी तरफ वे उनपर बड़ी ही सूक्ष्मता से सवाल भी खड़ी करती हैं.

बहरहाल, यशोदा देवी द्वारा लिखित तमाम पुस्तकें नागरी प्रचारिणी सभा पुस्तकालय (वाराणसी), कार्माइकल पुस्तकालय (वाराणसी) तथा हिंदी साहित्य सम्मेलन पुस्तकालय (इलाहाबाद) में पड़ी-पड़ी हिंदी पट्टी के विद्वानों की राह देख रही हैं.



यशोदा देवी द्वारा लिखित पुस्तकों की सूची:

     नारी-नीति शिक्षा (1910)
     सच्चा पति प्रेम (1910)
     गर्भ रक्षा विधान (1911)
     आदर्श हिन्दू विधवा (1912)
     घर का वैद्य (1912)
     महिला जीवन सर्वस्व (1912)
     शिशु रक्षा विधान अर्थात बाल रोग चिकित्सा: प्रथम भाग (1912)
     संतान पालन (1913)
     प्राण वल्लभ: पुरुषत्व विकास (1923)
     आदर्श पति-पत्नी और संतति सुधार (1924)
     गृहिणी कर्तव्य शास्त्र आरोग्यशास्त्र अथवा पाकशास्त्र (1924)
     जीवन शास्त्र (इलाहाबाद, 1924)
     नारी संगीत रत्नमाला (1924)
     कन्या कर्तव्य (1925)
     पति भक्ति की शक्ति अर्थात पति की मर्यादा (1925)
     पति प्रेम पत्रिका अर्थात पति-पत्नी का पत्र व्यवहार (1925)
     नारी स्वास्थ्य रक्षा: आरोग्य विधान अर्थात स्त्री रोग चिकित्सा (1926)
     पतिव्रत धर्म माला (1926)
     दम्पति आरोग्यता जीवनशास्त्र अर्थात रतिशास्त्र संततिशास्त्र (1927)
     आरोग्य विधान विद्यार्थी जीवन (1929)
     वैद्यक रत्न संग्रह अर्थात देवी अनुभव प्रकाश (1930)
     नारी धर्मशास्त्र गृह प्रबंध शिक्षा (1931)
     आदर्श बालिका-भाई बहन (1932)
     दाम्पत्य प्रेम और रतिक्रिया का गुप्त रहस्य (1933)
     नारी शरीर विज्ञान स्त्री चिकित्सा सागर: सम्भोग विज्ञान (1938)


यशोदा देवी द्वारा संपादित पत्रिकाएँ
     स्त्री चिकित्सक (1913-38)
     कन्या सर्वस्व (1913-36)
     स्त्रीधर्म शिक्षक (1923-31)
 

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सौरव कुमार राय

वरिष्ठ शोध सहायक

नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय, नयी दिल्ली

ईमेल: skrai.india@gmail.com /मोबाइल: 9717659097

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  1. शुभनीत कौशिक18/11/20, 10:08 am

    बढ़िया लेख। आयुर्वेद, चिकित्सा और विज्ञान आदि विषयों में उन्नीसवीं बीसवीं सदी में हो रही हलचलों को और ध्यान से देखने की जरूरत है। सौरव भाई को बधाई।

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    1. कोरोना जनित वैश्विक महामारी ने इस तरफ सहज ही ध्यान आकर्षित किया है शुभनीत भाई।

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  2. आनंद बहादुर18/11/20, 10:22 am

    जरूरी आलेख। चिकित्सा का क्षेत्र आर्थिक रूप से इतना महत्वपूर्ण होने के चलते हमेशा साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, पूंजीवाद, नवउपनिवेशवाद, कार्पोरेट लोकतंत्र आदि का अखाड़ा रहा है, और उसके ऐसा बने रहने का खतरा है।

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  3. बहुत अच्छा ज्ञानवर्धक लेख। यदि उस समय यशोदा देवी को लिखे पत्र भी मिल जाते तो उस समय सामान्य स्त्री स्वास्थ्य की स्थिति पर भी प्रकाश पड़ता ।मध्य वर्गीय स्त्री उस समय किस तरह का साहित्य पढ़ने को उत्सुक रहती थी इसका संकेत तो लेख में मिलता है पर यह पर्याप्त नहीं है। फिर भी पूरा लेख संग्रहणीय है ।लेखक और संपादक दोनों को बधाई ।--हरिमोहन शर्मा

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  4. शोध-पत्र की भूमिका की तरह यह लेख भविष्य में किताब बन कर आ सकती है। बहुत बधाई लेखक को

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  5. Ambarish Tripathi18/11/20, 5:24 pm

    यशोदा देवी के महत्वपूर्ण अवदानों को परखने की खिड़की खोलने वाला यह लेख है। साधुवाद

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  6. Prabhat Kumar18/11/20, 5:25 pm

    ' आयुर्वेदिक राष्ट्रवाद' और भारतीय पुनरुत्थान के एक कम चर्चित पहलू से परिचय कराने के लिए धन्यवाद।

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  7. Vinod Tiwari18/11/20, 5:26 pm

    बहुत ही महत्व का लेख है । बधाई ।

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  8. Karmendu Shishir18/11/20, 5:26 pm

    बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं आपलोग!आप सबने नवजागरण को विस्तार दिया है!

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  9. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19.11.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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  10. राजाराम भादू18/11/20, 9:42 pm

    एक विशिष्ट विषय पर महत्वपूर्ण शोध। सौरभ को बधाई। धन्वतरि पत्रिका हमारे घर भी आती थी। जयपुर भी आयुर्वेद का एक बड़ा और प्रतिष्ठित केन्द्र रहा है। आयुर्वेद चिकित्सा में महिलाओं की आमद अभी हाल की घटना है। दीर्घकाल तक इस क्षेत्र में महिलाएं महज अपवाद रही हैं। ऐसे में यशोदा देवी एक मूल्यवान संदर्भ हैं।

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  11. मूल्यवान लेख। यशोदा देवी पर केंद्रित और भी लेख हैं क्या? उनकी जीवनी बहुत महत्वपूर्ण होगी।

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    उत्तर
    1. आशुतोष जी, यशोदा देवी पर अंग्रेजी में कुछ लोगों ने लिखा है। उनका reference लेख में दिया गया है।

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  12. मूल्यवान प्रस्तुति, बेहद दिलचस्प जानकारी, हिंदुस्तानी पट्टी के जिस पक्ष को सौरभ जी ने रखा है। वह नवजागरण पर किये जाने वाले बयान पर गौरतलब है ।

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  13. ज्ञान वर्धक लेख शानदार तथ्यों का साक्षात्कार।
    अप्रतिम।

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  14. Gopal Pradhan20/11/20, 7:15 am

    सवेरे ही देख गया था । आपने उनके सिलसिले में जो ग्रे ज़ोन बताया है उसे और देखना होगा । उस जमाने के लोगों को समझने में सरल ढांचा मददगार नहीं होता ।

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  15. Rajaram Bhadu20/11/20, 7:15 am

    एक विशिष्ट विषय पर महत्वपूर्ण शोध। सौरभ को बधाई। धन्वतरि पत्रिका हमारे घर भी आती थी। जयपुर भी आयुर्वेद का एक बड़ा और प्रतिष्ठित केन्द्र रहा है। आयुर्वेद चिकित्सा में महिलाओं की आमद अभी हाल की घटना है। दीर्घकाल तक इस क्षेत्र में महिलाएं महज अपवाद रही हैं। ऐसे में यशोदा देवी एक मूल्यवान संदर्भ हैं।

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  16. सारा विवरण मनन करने योग्य है । मेरी दृष्टि में आयुर्वेद का अहित आयुर्वेदाचार्यों ने किया था । वे अपने ज्ञान को अपनी पीढ़ी को बताने में संकोच करते थे । जहाँ तक वीर्य संरक्षण की बात है; समालोचना ने इसे हिंदू राष्ट्र की स्थापना से जोड़ दिया है । यह पूर्वाग्रह है । किसी भी पंथ, धर्म और जाति में संतति निर्माण के लिए वीर्यवान होना आवश्यक है । सभी किशोरावस्था के बच्चों की प्रकृति एक जैसी नहीं होती । उनके लिए यशोदा देवी के लेखन को मैं उचित मानता हूँ । यह भी सत्य है कि एक महिला रोगी महिला चिकित्सक के सामने खुले मन से अपनी बात कह सकती है । आपातकाल में मुझे भी केंद्रीय कारागार में बंदी बनाकर रखा गया था । इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल में हुए ज़ुल्मों पर एक आयोग बिठाया गया । मेरा नाम हरिदेव लिखकर दिल्ली से चिट्ठियाँ आती थीं । और ये पत्र डाकखाने के ज़रिए मुझे मिल जाते थे । तब मेरी आयु केवल बीस वर्ष की थी ।
    BAMS डॉक्टर रोगियों पर अत्याचार कर रहे हैं । उन्हें एलोपैथी के मूल तत्व मालूम नहीं हैं । इसके बावजूद वे रोगियों को अंग्रेज़ी दवाइयाँ अपनी ओर से देते हैं । इन रोगियों में बच्चों से लेकर वृद्ध शामिल हैं । BAMS डॉक्टर सभी रोगियों को steroid देते हैं जो गुर्दों, फेफड़ों और घुटनों के लिए घातक होते हैं ।
    कथित बाबा रामदेव व्यापारी हैं । उनके मुक़ाबले उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण आयुर्वेदिक गुणों से युक्त पौधों और जड़ों का पूरा ज्ञान है ।

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