तिब्बत : भुचुंग डी सोनम की कविताएँ : अनुवाद - अनुराधा सिंह










भुचुंग डी सोनम तिब्बत के महत्वपूर्ण कवि हैं, निर्वासन की उनकी कविताओं ने विश्व में प्रतिष्ठा प्राप्त की है. हिंदी में उन्हें प्रस्तुत कर रहीं हैं अनुराधा सिंह, कविताओं का अनुवाद किया है और टिप्पणी भी लिखी है. तिब्बत के निर्वासित कवियों पर अनुराधा की किताब भी जल्दी ही आने वाली है.

इन कविताओं को देखते हुए कविता की ताकत का एहसास होता है. वास्तव में इन्हें नुकीले तीरों से लिखा गया है. निर्वासन की पीड़ा और विडम्बना को पढ़ते हुए यह एहसास घना होता जाता है कि जबरन अपनी जमीन से बेदखल कर दिए जाने का क्या दर्द होता है.


अनुराधा सिंह हिंदी की जितनी अच्छी कवयित्री हैं उतनी ही समर्थ अनुवादक भी. इन अनुवादों को पढ़ते हुए ऐसा नहीं लगता कि ये अनूदित हैं. 

प्रस्तुत है.



न्यूयार्क में तिब्बत : भुचुंग डी सोनम
अनुराधा सिंह




तिब्बत दुनिया के जनतांत्रिक नक़्शे पर फ़ैल गयी स्याही है, सूख चुकी अपने ही संताप से, हुई और स्याह, और अबूझ.  




उनका देश अब दुनिया के नक़्शे पर कहीं नहीं. चीन ने तिब्बत पर भौगोलिक कब्ज़ा जमाने के साथ वहाँ की एतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सम्पदा को भी नष्ट किया है. लेकिन यह त्रासदी घटने के साथ ही यह एक और असंभव घटना घटी कि तिब्बत अपनी भौगोलिक सीमाओं से बाहर सारी दुनिया में फ़ैल गया. अपनी तिब्बती नागरिकता को बचाये रखने के लिए असंख्य तिब्बती, चीन के अनाधिकृत कब्ज़े में अपना नाम और पहचान खोते जा रहे तिब्बत से बाहर निकल गए. उन्होंने चीन की नागरिकता स्वीकार करने की बजाय शरणार्थी होना स्वीकार किया. यही नहीं, भारत समेत दुनियाभर के जिन तमाम देशों की शरण उन्होंने ली वहाँ नागरिकता का प्रस्ताव दिए जाने पर भी नहीं स्वीकारा. उन्होंने जानबूझकर खुद को उन देशों के नागरिक अधिकारों से वंचित रखा ताकि तिब्बत सदैव उनके अपने राष्ट्र के रूप में जीवित रहे. 

तिब्बत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है. जो हमेशा जीवित रहते हैं. अपनी ज़मीन छीन लिए जाने के बाद भी.

निर्वासित तिब्बतियों की रचनात्मक अभिव्यक्ति के तौर पर कविता उनके साहित्य की प्रमुख विधा रही है. वैसे भी तिब्बती समुदाय के लिए कविता का महत्त्व हमेशा किसी भी अन्य विधा से कहीं बढ़कर रहा है. उनका अधिकांश धार्मिक साहित्य गद्य की बजाय पद्य में सृजित है. ये धार्मिक आदिग्रन्थ गीतों और भजनों के संकलन हैं.

निर्वासित तिब्बती कवियों में तीन पीढ़ियाँ स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती हैं. गेंदुन छुम्बे, चोग्यम द्रन्ग्पा रिन्पोचे और धोंदुप ग्याल पहली पीढ़ी के कवि थे. उन्होंने मातृभूमि की कीर्ति और निर्वासन की यंत्रणा को अपनी रचनाओं की विषयवस्तु बनाया. उनकी कविता की भावभूमि अतीत की मनोरम स्मृतियों से उर्वर रही. दूसरी पीढ़ी के के. धोंदुप, लासांग सेरिंग आदि का नज़रिया कुछ अलग हो गया. जल्द से जल्द तिब्बत लौट जाने का वह स्वप्न जो वे निर्वासन के पहले दिन से संजोए थे अब फीका पड़ने लगा था. उन्होंने धीरे धीरे निर्वासन के कठोर यथार्थ के साथ समझौता करना शुरू कर दिया था. तीसरी पीढ़ी में तेनज़ीं सुन्डू, सेरिंग वांगमो धोम्पा, भुचुंग डी सोनम जैसे युवा कवि अब तिब्बत को एक आंशिक सत्य की तरह ही पहचानते हैं जो उनके पूर्वजों के स्वानुभूत सत्य से बिल्कुल अलग है.

ये कवि अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से प्रेरणा तो लेते हैं किन्तु अपने भावों का उद्घाटन अपनी अलहदा मुखर और सशक्त शैली में करते हैं. वापसी के सुखद स्वप्न से मोहभंग और निर्वासन की त्रासदी का यथार्थ इन कवियों की कविताओं में मूल विषय के रूप में उपस्थित रहता है.
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तिब्बत
भुचुंग डी सोनम की कविताएँ                  
अनुवाद : अनुराधा सिंह




कब हुआ था मेरा जन्म ?

माँ कब हुआ था मेरा जन्म?
उस साल जब नदी सूख गयी थी
कब हुआ था वैसा ?
उस साल जब फसल बर्बाद हुई  थी
हम रहे थे भूखे कई-कई दिन
और भयाकुल थे कि तुम बचोगे नहीं
क्या यही था वह वर्ष जब हम आये थे एक नये घर में?
हाँ, यही था वह वर्ष जब उन्होंने हमारे घर को हथिया  लिया था
बाँट दिया था उसे देशभक्त पार्टी सदस्यों के बीच.
और हम निर्वासित कर दिये गये थे गौशाला में जहां जन्मे थे तुम
कौन सा था वह साल माँ?
वही जब उन्होंने बौद्ध विहारों को नष्ट कर दिया था
पिघला दी थीं ताँबे की तमाम मूर्तियां बन्दूक के छर्रे बनाने के लिए
और तुम पैदा हुए थे जब आकाश धूल से आच्छादित था
मां, क्या यही था वह साल जब दादा हमसे दूर चले गए थे ?
हाँ, वही साल कि जब तुम्हारे दादा को बंदी बना  लिया था उन्होंने
मल साफ़ करते थे वे वहाँ
और खेतों में कीड़ों को मारते थे
तुम जन्मे और घर में कोई मर्द नहीं था
माँ, क्या मैं जन्मा था उस साल जब दीवारें गिराई गयीं थीं ?
हाँ, वही था यह साल जब उन्होंने प्रार्थना घर को नेस्तानाबूद कर दिया था
खपच्चियाँ उड़ा दीं थीं छत की धन्नियों की, भित्तिचित्र मटमैले कर दिए थे
तुम जन्मे जब पूरब दिशा से एक वहशी हवा बह रही थी
कौन सा था वह साल माँ ?
वही जब उन्होंने जला दिया था धर्म ग्रंथों को
गाँव के चौराहों पर
और अपने दल की तारीफ में गाये थे क्रांति गीत
तुम पैदा हुए थे और घास के तिनकों ने उगना बंद कर दिया था
माँ, क्या यही था वह साल जब तुमने गाना बंद कर दिया था?
हाँ, यही था वह साल जब वे पड़ोसन को ले गये थे
डाल दिया था श्रम शिविर में
क्योंकि नहर खोदते समय वह गुनगुना रही थी एक लोकगीत
तुम जन्मे जब लोग एक एक कर गायब होते जा रहे थे
कब हुआ था यह ?
उसी साल था जब उन्होंने दीवारों पर
बड़ा सा लाल नारा लिख दिया  था-
‘जो सर बाहर निकले, कुचल दिए जायेंगे’
तुम पैदा हुए थे
जब सूर्य आकाश से तिरोहित हो गया था
कब  माँ?
उसी  साल  जब तुम्हारे पिता.....तुम्हारे पिता......




उन्हें हड़प लो

आपकी प्लेट में रखा बटर चिकन
कल तक वह मुर्गी था
जिसके चूज़े अंडों से निकले नहीं अभी
आप स्वादिष्ट भोजन का आनंद लीजिये

पिछली गर्मियों मैंने जिस ऊँट की सवारी की थी
वह अब चमड़े का एक बैग बन चुका है
सजा है एक आधुनिक शोरूम में
कुबड़ा होना भी एक श्राप है

उस पर बहुत फबता है मस्कारा
पर उसकी आँखों तक आने से पहले
वह कितने ही चूहों की आँखें फोड़ चुका होता है
चूहे अब बिल्लियों से अधिक मस्कारे से डरते हैं

बुद्ध की प्राचीन मूर्ति की नक़ल
उसके आलीशान स्नानगृह में खड़ी है
जनमानस की सामूहिक आस्था का प्रतीक
अब रोज़ उसे मूतते हुए घूरता है

वह दहाड़ता हुआ गर्वीला बाघ
जो बड़ी शान से बंगाल के जंगलों में
चहलकदमी किया करता था
अब तुम्हारी पोशाक का बॉर्डर है
लेकिन
उसे पहन कर भी तुम
बस एक भीगा हुआ कुत्ता दिखते हो.



फासले से गीत
(वेज़र के लिए)

मेरी देह इस तपते हुए कमरे में फँसी है
छत से आती रौशनी मुझे चौंधिया रही है
चमड़ा मढ़ा सोफा मुझे आमंत्रित करता है
कि अपनी पीठ सीधी कर लूँ ज़रा
लेकिन मेरा ह्रदय भाग-भाग जाता है
गाँव के साथ बहती नदी की ओर
हवा के साथ रह-रह कर डोलते
चमड़े के पट्टों से बने पुल की ओर
धूल से भरे उस अहाते की ओर
जहाँ माँ खेत में काम करते हुए मुझे
एक चट्टान से बाँध दिया करती थी

यहाँ के सिलेटी घर मुझे घूरते हैं
ट्रेन में ठन्डे, चिड़चिड़े, थके हुए, अकेले, खोये-खोये लोग
अपने जीवन का कोई अन्य संस्करण चाह रहे हैं
मेरा मन दौड़ कर स्कॉर्पियन पहाड़ी के साथ बसे
उस गाँव में पहुँच जाता है
जहाँ विलो के वृक्ष सीटियाँ बजाते है
जहाँ एक दिन
मैंने एक किसान की झोपड़ी में आग लगा दी थी

मैं, अब हवा में उड़ता सिंहपर्णी का एक रेशा हूँ
अपनी सुनाओ, मेरे बाग़ी दोस्त !
जानता हूँ कि मेरी ही तरह तुम भी
एक उन्मादी शहर के
अगम्य कोने में फँस गये हो
क्या तारों के पीताभ प्रकाश में
तुम्हारा सोफा भी तुम्हें आमंत्रित करता है?
या दीवार पर लगी एक आँख तुम्हारी माँसपेशियों की एक-एक फड़क
पर नज़र रखती है ?
मैं जानता हूँ कि तुम्हारा ह्रदय भी दौड़-दौड़कर
उसी पहाड़ी घर में जा पहुँचता है
जहाँ नीलवर्ण आकाश के नीचे
प्रखर तारे तुम्हें देखते थे.

फ़ासले से भी यही गाता हूँ-
तुम और मैं, केसर के धनुष से छूटे हुए
तीर के दो टुकड़े हैं
तुम और मैं, यारलुंग नदी के सींचे हुए जौ
की दो बालियाँ हैं

हर दिन जब मैं इन्टरनेट खोलता हूँ
मेरा दिल धडकता है
कि कहीं मुझे तुम्हारे लापता होने की खबर न मिले
जैसे डोमा किअब
अपनी किताब ‘हिमालायाज़ ऑन फायर’ के
किताबों के कुनबे में जन्म लेने से पहले ही
कैदख़ाने की कोठरी में ग़ुम हो गये
जैसे ‘जाम्यांग की’ एक शाम
ख़बर लिखने के साथ ही
अदृश्य हो गयीं
जैसे वह ओपेरा मास्टर जो
अपने क्रन्तिगीत के हवाओं में बहने से पहले ही
अँधेरे का बंदी बना लिया गया
जैसे बारखोर की वह वृद्ध स्त्री
जो अपने प्रार्थना चक्र के साथ लापता हो गयी

फ़ासले से भी मैं गाता हूँ-
तुम और मैं उसी पात्र के दो टुकड़े हैं
जिसमें मिलारेपा अपनी बिच्छू बूटी उबालते थे
हम दोनों उस हपुषा वृक्ष के दो पत्ते हैं
जो महकता है अम्नी माचें की पहाड़ियों में

यहाँ निर्वासन में
मेरी झुर्रियाँ और गहरा रही हैं
पेड़ों पर पतझड़ उतरा है
तुम उसी शहर में अपनी कलम को और धार दोगे
जहाँ तुम्हारा हर शब्द नापा जाता है
हर साँस पर नज़र रखी जाती है
हर कदम का पीछा किया जाता है
फिर भी तुम्हारी कलम उन्हीं गाथाओं के साथ नृत्य करती रहती है
जो मुझ तक किसी और भाषा में पहुँचती हैं

फ़ासले से मैं गाता हूँ–
तुम और मैं, उस कविता से विखंडित दो शब्द हैं
जिसे गेंदुं छुम्बे ने कैदखाने की कोठरी में लिखा था
तुम और मैं युरुपों की तलवार
की दो खपच्चियाँ हैं
जिसने अप्रैल की उस रात्रि को वेध दिया था

एक दिन तुम और मैं ल्हासा के
एक गंदले होटल में
एक कटोरा थुकपा खायेंगे
एक दिन हम दोनों दो हिम सिंह होंगे
और नेनचें तांक्ला के
पहाड़ों में विचरेंगे.

(वेज़र एक तिब्बती कवि, लेखक, ब्लॉगर व लोकप्रसिद्ध बुद्धिजीवी हैं. चीनी शासन ने उनके लेखन से क्षुब्ध होकर ल्हासा में किये जाने वाले उनके सम्पादकीय कार्य से उन्हें निष्काषित कर दिया गया था. वे अब बेजिंग में रहती हैं, जो उनकी जन्मभूमि तिब्बत से उनका बलात् निर्वासन है.)





निर्वासन

घर से दूर
अपने छत्तीसवें किराये के कमरे में
मैं एक फँसी हुई मधुमक्खी
और तीन टांगों वाली मकड़ी के साथ रहता हूँ
मकड़ी दीवार पर रेंगती है
मैं फर्श पर
मधुमक्खी खिड़की बजाती है
मैं मेज़
अक्सर हम अपने अपने एकाकीपन की
राशि बाँटते हुए एक दूसरे को घूरते हैं
वे दीवारों को बीट और जालों से
रंग देती हैं
मैं उन्हें अलग-अलग नाम दे देता हूँ
मसलन जाल, व्यूह, फंदा,
पंख, भुनभुनाहट, फड़फड़ाहट

दूर घर से
मेरे मिनट घंटों के समान हैं
मकड़ी जिस खिड़की से छत तक की यात्रा करती है
मधुमक्खी जिस खिड़की से कूड़ेदान तक उड़ती है
घूरता हूँ उसी खिड़की से बाहर
नहीं बोल सकता हममें से कोई दूसरे की भाषा

मैं चाहता हूँ
काश! मेरे चुप होने से पहले
बहरे हो जाओ तुम.

समालोचन का यह लोगो विश्वप्रसिद्ध
चित्रकार और सिरेमिक कलाकार सीरज सक्सेना ने तैयार किया है.




एक गीत

मेरे सारे पल तुमसे बावस्ता हैं
फिर भी एकाकी हूँ
तुम्हारी प्रतिछाया को धूम्र सा लपेटे
जैसे तरुवर के नीचे उगा एक सिंहपर्णी

मेरा मानस तुम्हारे विचारों से संतृप्त
और ह्रदय अब तक रीता
जैसे तुम्हारी घोड़ियों के झुण्ड से छूटा हुआ
एक खुरविहीन गर्दभ

तुम निष्कलंक दूरस्थ चन्द्रमा
मैं
तुम्हारे नूर में नहाई अगली लहर की
प्रतीक्षा में लीन
तट पर पड़ा रोड़ा

मैं एक पतित पर्ण से अधिक कुछ नहीं
या हपुषा वृक्ष में अटका हुआ एक पंख भर
लेकिन घेरे रखता हूँ तब तक तुम्हारी पुतली को
जब तक नक्षत्र चन्द्रमा से अधिक कांतिवान नहीं हो जाते

तुम्हारी गर्माहट पाने के लिए
मैं गिद्ध सी उड़ान भरता हूँ
और मेरे गौरैय्या से पंख
मुझे मेरे कमरे के निर्जन कोने तक ही ले जा पाते हैं

मैं अपने लैपटॉप के धूमिल स्क्रीन को
अनवरत घूर रहा हूँ
कि शायद उस शीतल बयार का गीत लिख सकूं
जो आप्लावित हो तुम्हारी
मोहक सुगन्धि से.



कहीं ज़्यादा

कौन जाने ?
वे जो सोचते हैं कैसे सोचते हैं
कैसे तय करते हैं
कि किस हड्डी से प्रेम करना है
किसका तिरस्कार
किसके सामने दुम हिलानी है
कहाँ लटकानी है जीभ

यदि तुम एक कुत्ता होते
तो किस पर भौंकते?



अब वह बोस्टन में है

डेविड स्क्वायर टी- स्टेशन पर
निकास द्वार और
लकड़ी की लम्बी बेंच के बीच 
वह बुनती रहती है दस्ताने, बच्चों के दस्ताने,
मफलर और मंकी कैप
फिर उन्हें एक डोरी और ज़मीन पर फैला देती है
सामने बिछी रहती है एक चौरस चादर

मुस्कुराती है आते-जातों को देखकर
इतना अधिक कि जीभ निकाल लेती है
और फिर लपेटकर रख लेती है मुंह में 
वह अंग्रेजी में दस तक गिन लेती है
गुड और थैंक यू बोलना भी जानती है
उसकी नातिन उसकी शिक्षक है

एक पहाड़ की तरह बैठी है वह ज़मीन पर
सलाइयों के बीच चलती लड़ाई
को उसके हाथ नियंत्रित किये रहते हैं
माथे पर धनुषाकार झुर्रियाँ हैं
और जो आँखों के किनारे से निकलती हैं
वे अस्त होते सूर्य की किरणों सी हैं

कभी-कभी वह अचानक बुनना बंद कर देती है
सीने पर हाथ जोड़
“हे येशी नोर्बू, परम पूजनीय
कर्मों की झंझा में उडती हुई मैं यहाँ
गोरों की इस भूमि पर आ गिरी हूँ
इस धरती पर ऐसे पड़ी हूँ जैसे
२५ साल और परायी धरती पर पड़ी रही

तेनजिन गेत्सो की अभिलाषा पूरी कर दो
मुझे वापस अपने घर भेज दो हे प्रभो!
ताकि चैन से मर सकूं,”

कभी वह काठमांडू में बौद्धनाथ स्तूप
के चारों ओर बनी सड़क पर बैठी थी
बेचते हुए सम्पा, चूरा और चाय बिस्कुट
जूझते हुए धुएँ और धूल से

वही थी धर्मशाला में भी
बैठी मंदिर के द्वार के पास एक स्टूल पर
लगाये रेहड़ी लाफिंग नूडल्स, मोमो और आलू खस्ता की
गिनते हुए हर शाम कुछ मैले कुचैले नोटों को 

उसके बाद दिल्ली में कनाट प्लेस की
फुटपाथ पर भी थी वही
बेचती स्वेटर, जैकेट और टीशर्ट
अपनी जपमाला से जूझती मच्छरों से

वही अब बोस्टन में है
मुख्य द्वार और बेंच के बीच
सप्ताह में सात दिन
बुनती दस्ताने, मंकी कैप, बच्चों के दस्ताने

“मैं इस सफ़र से थकी नहीं 
पर यह इंतजार बहुत लम्बा है.”

और तभी एस्केलेटर से
उतरता है
अपने घर लौटने वाले लोगों का झुण्ड.




लाल ललाट
(तेनज़ीं सुन्डू के लिए)

वे मुझसे पूछते हैं, उसका खून इतना गर्म क्यों है?
मैं उन्हें बताता हूँ –
जब लाल बंदूकें हमारी शांत पहाड़ियों में गरजी थीं
तुम अनाथ हो गए थे
तुम्हें पर्वतों ने भी अकेला छोड़ दिया था जब
हमारे काठ के कटोरे पलट दिए गये थे

तुम्हारा रक्त समय के ज्वार से टकराता है
खौलता मेरा रक्त भी है
लेकिन यह मेरे ललाट को लाल नहीं करता
मेरी भावनाओं को उन्मादित नहीं करता

मेरे भीतर भी दौड़ रहा है वही खून
जो पहाड़ी पवन के गीत गाते हुए
महान योद्धाओं के साथ कदमताल करते हुए
दौड़ता है तुम्हारे भीतर
हम दोनों के रक्त पर एक ही बर्फ़ के
फ़ाहों के चिन्ह अंकित हैं

वे तुम्हारे लिए पूछते हैं
उसका स्वर ऐसा तीव्र क्यों है
और मैं कहता हूँ-
हमारे नीले आकाश से लहराते गिरते
बमों ने
तुम्हारे गीत चुरा लिए हैं
ढहती छतों के नीचे से आती हमारी माँओं की चीत्कार ने
तुम्हारा सब स्वर माधुर्य
भंग कर दिया है
घड़ी तुम्हारे समय के विरुद्ध चल रही है
मेरा स्वर भी तीव्र होता है
पर यह मेरे ललाट को लाल नहीं करता
जबकि
पर्वतीय देवताओं का आव्हान करने के लिए
योद्धाओं की शौर्य गाथा सुनाने के लिए
तुम जैसा हो सकने के लिए
पुकारती है मुझे भी वही आवाज़
जो तुम्हें पुकारती है.

(तेनज़ीं सुन्डू एक क्रन्तिकारी कवि हैं जिन्होंने अपने मस्तक पर एक लाल रंग का पट्टा इस प्रण के साथ बांधा है कि वे साम्यवादी चीन के ग़ैरवाजिब कब्ज़े से तिब्बत की मुक्ति तक इसे नहीं खोलेंगे.) 







शाम सात की सैर
माल्डन शहर, बोस्टन, अमेरिका

ऑबर्न मार्ग पर
जहाँ मैं रहता हूँ
छत्तीस कार और दो लोग थे
एक जवान काली लड़की, सलीके से सजी- धजी
अपने रूप-रंग को ठीक से समझती हुई
मुझे पर एक सरसरी निगाह डालती है.
एक सोलह साल का लड़का
मेरे नज़दीक से गुज़र गया है
मुझे एक मुस्कराहट की तलाश थी
पार्किंग में खड़ी कारों ने मुझे घूरा 
अमरीका बहुत पैसेवाला और अकेला है.

ट्रेमोंट स्ट्रीट, जिससे होकर रोज़ स्कूल जाता हूँ
वहाँ भी पचपन कारें और दो आदमी हैं
एक शानदार भारी सफ़ेद औरत
नीली जींस और हरी टीशर्ट में अपने गमलों से
मुरझाये पत्ते तोड़ रही है
दस कदम आगे एक विशालकाय गोरा आदमी
मेरे बगल से जॉगिंग करता गुज़रा है 
मुझे एक मुस्कराहट की तलाश थी
उसने मुझे बड़ी गहराई से संदेही दृष्टि से निरखा
मैं दुबला हूँ मेरी त्वचा पीली है
माउंट वर्नन स्ट्रीट पर
मैं अपनी बस का इंतज़ार करता हूँ
चालीस कारें छह लोग और एक कुत्ता 
दो जोड़े सीढ़ियों पर बतिया रहे हैं
एक जोड़ा एक तिब्बती कुत्ते को साथ लिए
हाथ में हाथ डाले टहल रहा है

औरत ने अपना मोबाइल फोन झटका
मुझे एक मुस्कुराहट की तलाश थी 
‘हाय जेन, फोटो ईमेल से भेज दो !’
अमरीका स्क्रीनों के बीच बसता है

सड़क के पार लाल बत्ती के पास
एकमंजिला मकान सल्फर रौशनी के नीचे
किसी धनाढ्य के महल सा दीखता हुआ 
जिसकी पार्किंग मेरी रद्दी की टोकरी की तरह कारों से भरी है
बाहर बोर्ड पर लिखा है
‘वेयर श्मशान गृह’
मैं अपने किराये के कमरे की और मुड़ चला हूँ
मृत्यु में सब बराबर होकर पृथ्वी की ओर लौट आते हैं.

 



द्रापची एकांत कारावास में एक हजारवाँ दिन

तुम बस मुझे बाहर घसीट लाओ
मैं तुम्हारे सारे आरोप स्वीकार कर लूँगा
और अपराध-स्वीकरणपत्र पर हस्ताक्षर भी कर दूँगा
नहीं. मुझ पर बलप्रयोग की दरकार नहीं
मैं देह से टूटा हुआ ही हूँ.
फिर भी चाहो तो निस्संकोच मुझ पर
नयी कराटे- किक का अभ्यास कर सकते हो
मैं एक जीवनरहित घन हूँ.

इस ठंडी कोठरी में मुझे गर्मी लगती है
सन्नाटे में आवाज़ें सुनाई देती हैं
मेरा यह नष्ट जीवन विखंडित छवियों की
बौछार से आक्रांत है
मेरी रक्तरंजित नाक
कब की जलबुझ चुकी अगरबत्ती की
सुगंध को सूँघ रही है
उसके नीले धुएँ के छल्ले
अब भी मेरी उलझी हुई सोच में तैर रहे हैं
मुझे बिजली के झटके खाने की लत लग चुकी है
अपनी बिजली की छड़ से मुझे कोंचो न
तुम्हारी आवाज़ में आज डंक क्यों नहीं है
अपना कंठ साफ़ करो, अपना चेहरा लाल करो
अपनी गर्दन की नसें तान लो, नाक सिकोड़ लो
और फिर मैं तुम्हारी ज़ोरदार चिल्लाहट सुनना चाहता हूँ
मेरे पेट में भर ताक़त मारो
मुझे उल्टा टांग दो
इस सबसे मैं जोश से भर जाता हूँ
और अपने ध्येय पर ध्यान केन्द्रित रख पाता हूँ
मुझे बुद्ध और स्पष्ट दिख रहे हैं
तुम्हारे कंधे पर जड़े लाल सितारे धुंधले हो रहे हैं
तूफ़ानी दर्रे पर एक हिम सिंह
बुरी तरह छटपटा रहा है
यह भ्रम है, भ्रांति है या कल्पना है
मुझे इस अँधेरे से बाहर खींच निकालो
मैं अपराध- स्वीकरणपत्र पर सही कर दूँगा
मुझमें कुछ शेष नहीं
सिवाय उस सच के जो मेरे दिमाग में नज़रबंद है

(द्राप्ची, ल्हासा में चीनी शासन के अधीन वह कुप्रसिद्ध कारावास है जहाँ तिब्बती राजनैतिक बंदियों के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया जाता है)



विषैले बाण निषिद्ध हैं
(सोशल- मीडिया को समर्पित)

अपना परिचय देता हूँ-  मैं हूँ एक पायदान, कुत्ते का एक बाल, एक कंटीला तार.
मैं दरअसल ‘तुम’ हूँ. हाँ, ‘तुम’, आसक्त दृष्टि से कम्प्यूटर स्क्रीन को घूरता हुआ
एक फेसबुकिया, ट्विटर अनुगामी, ‘लाइक’ आकांक्षी, वज्र मंदबुद्धि.
कुएँ का सब पानी चुक गया है.
यह बौद्धिक मृत्यु मुबारक हो.

कुंठा एक कचरे की थैली में बेतरह ठुंसी, सीढ़ियों से लुढ़कती आती है
और एन तुम्हारे दरवाज़े पर फट जाती है.
ख़ुशी एक साफ़ नदी में बहती हुई विष्ठा है

काश! तुम वह काला बिंदु होते जो एक युद्ध की लम्बी गाथा को पूर्णविराम दे सकता.
विराम.
तुम एक अर्धविराम या डैश तो हो सकते हो लेकिन
वे इस मामले को पूर्णविराम देना नहीं चाहते.
यह काला बिंदु अब मृत्यु की अन्तिमता ही हो सकता है.

मैं एक चमचा, चाटुकार, ख़ुशामदी, हूँ अस्थिरबुद्धि
मैं कंप्यूटर पर बैठा एक ‘लाइक- क्लिक’ से प्रसन्न होने वाला
गिरोह सरगना का चेला
मेरे हाथ बड़े हैं लेकिन मेरा दिमाग गड़बड़ तारों वाला डाँवाडोल और शिथिल
इलेक्ट्रिक पक्षी भर है.
दिए गये आदेशों को मानना मेरा धर्म है.
कोई व्यावहारिक विकल्प दिए बिना आलोचनाओं को वायरल कर फेंकते जाना
सिस्टम में बग होने की निशानी है जो एक मक्खी भी हो सकता है.
ये आरोप. ये गुलेलों के निशाने. यह घबराहट .
यदि स्पष्टता की शर्त का आरम्भ इस अव्यवस्था से है
तो आगे के सारे रास्ते शर्तिया नर्क की ओर जायेंगे

एक बूढी औरत ज़ी ज़िम्पिंग को शी- चैंग- फैंग यानी ‘ख़राब शराब को फेंक दो’ कहती है 
दिल में दर्द, पैर- दर्द, उँगली में दर्द, शिश्न में दर्द, आदमी के लिए कोई उम्मीद बाक़ी नहीं. मैं बजाय आदमी के एक झड़ा हुआ पत्ता होना पसंद करूँगा .
मैं कोई योद्धा नहीं, सिर्फ अपना रास्ता साफ़ करना जानता हूँ.
मेरे दादा ने कहा था कि शब्द जब तक तुम्हारे मुँह में रहें आसान होते हैं
हाथ में आते ही कठिन हो जाते हैं .
मैं सोचता हूँ कि वे तभी तक आसान होते हैं जब तक हमारे सपनों में रहते हैं.

यदि मेरा दिमाग भी मेरी नाक की तरह बहता
तो रुमालों से बने असंख्य कालीन हवा में तैरते रहते
जिन पर बलगम से कहानियाँ लिखी होतीं .

लिखने के लिए जितना कुछ है उतने शब्द नहीं.

हर क्रांति अपने घर में कप तोड़ने के साथ शुरू होती है
यह सोफासेट बाहर करके यहाँ लकड़ी की चारपाई डाल दो
मोटापा क्रन्तिकारी विचारों का नाश कर देता है

उम्मीद जो है सो है, मात्र चार अक्षरों का एक शब्द.
मैं जो हूँ सो हूँ, एक आम आदमी.
मैं और उम्मीद, लंगड़ाते हुए दो दोस्त.

एक बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति सोशल मीडिया पर
लोकतान्त्रिक बहस करते युवाओं को मानसिक रूप से पंगु, 
आत्मदयाग्रस्त, नाटकीय, आत्महंता और अवसादी कहता है.
लगता है कि वह कभी ठंडी ज़मीन पर नहीं बैठा.
मैं एक तिब्बती हूँ, मैं शब्दबाणों का उपहास करना जानता हूँ .

मैंने स्वयं को कब से नहीं देखा, यदि तुम मुझे कहीं पाओ
तो किराये के इस दिमाग का रास्ता दिखा देना.

सिंहपर्णी के सूखे तने पर बैठी हुई मक्खी. वातमय दिवस, सूर्यास्त.
मैं जल में सिर के बल कूदता हूँ

मैंने अपना ह्रदय दो ढेलों के लिए बेच दिया था 
एक को समुद्र में फेंक दिया
दूसरे को अपने तकिये के नीचे दबा लिया
तबसे मेरे सपने ठिठुर रहे हैं.

मैं पर्वतीय दर्रे तक अपनी आवाज़ का पीछा करता हूँ
वहाँ अब गीतों के वाण नहीं
सिर्फ वायुअश्व के रुदन की छाया है

सोमवार क्या शानदार दिन है!
मैं काम में भूल जाता हूँ कि अपने एकांत में
मैं भौंकता हुआ
एक बेसहारा श्वान हूँ
घड़ी मुझे पागल होने से बचाती है.
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भुचुंग डी सोनम

निर्वासन, अलगाव के पंगु कर देने वाले दुःख में मिश्रित आश्वासन की फिसलती रेत है.”
भुचुंग डी. सोनम

समकालीन तिब्बती कविता के सबसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में से एक भुचुंग डी सोनम का जन्म १९७२ में तिब्बत में हुआ था. देश से निर्वासन के बाद वे धर्मशाला, भारत में तिब्बती बच्चों के स्कूल में पढ़े. आगे की पढाई उन्होंने सेंट ज़ेवियर्स, अहमदाबाद और फिर अमरीका में पूरी की. उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं, कॉनफ्लिक्ट ऑफ़ डुएलिटी, सांग्स फ्रॉम अ डिस्टेंस, सांग्स ऑफ़ द ऐरो, याक हॉर्न्स : नोट्स ऑन कंटेम्परेरी तिबेतन राइटिंग, म्यूज़िक, फिल्म एंड पॉलिटिक्स, डैन्डेलियन्स ऑफ़ तिबेत, म्यूज़ेज़ इन एक्ज़ाइल: एन एन्थोलॉजी ऑफ़ तिबेतन पोएट्री, बर्निंग द सन’स ब्रेड: न्यू पोएट्री फ्रॉम तिबेत (नई तिब्बती कविता का संचयन और अंग्रेजी अनुवाद). वे ‘तिबेतराइट्स’ नामक एक महत्वपूर्ण साइट के संस्थापक सदस्य हैं. सोनम अपने क्षेत्र के श्रेष्ठ आलोचकों और अनुवादकों में शुमार होते हैं और तिब्बती व अंग्रेज़ी दोनों भाषाओँ में एक जैसी दक्षता से लिखते हैं. 

‘इन दिनों वे न्यूयार्क के निवासी हैं
उनका स्थायी पता चोरी हो गया है.’
रैंगसें (आज़ादी)

घर वापसी की कोशिश है. यह अपना नेता बाहर से नहीं चुनती, बल्कि यह विश्वास करती है कि हम अपना नेतृत्व खुद कर सकते हैं. रैंगसें उन सब क्रियाकलापों का नाम है जो हम अपने तिब्बत के लिए रोजाना करते हैं- अपनी आज़ादी के लिए किये गए सब सामूहिक कृत्य और उत्साही इच्छाएँ. रैंगसें का अर्थ है हार न मानना- वस्तुतः कभी हार न मानना; अपनी लड़ाई को हमेशा, किसी भी वक़्त, किसी भी जगह ले जा सकना और ज़ारी रखना, इसका अर्थ यह जानना भी है कि सत्य है और जीत उसकी ही होती है.

व्यापक और अखिल चेतना है. जो एक कवि के लिए उसके शब्द हैं, एक किसान के लिए उसकी भूमि, एक चरवाहे के लिए उसकी झोपड़ी, एक कारखाना मज़दूर के लिए उसके औज़ार, एक निर्वासित के लिए उसकी वे नदियाँ, पहाड़, उसका घर जिन्हें वह बहुत पहले छोड़ आया है, एक ख़ानाबदोश के लिए घास के मैदान पर उसका वह तम्बू जहाँ बैठकर वह मक्खन मथ सकता है, गीत गा सकता है, किसी भी विकराल आतंकपूर्ण छाया के बिना.

विदेशी भूमि पर एक लम्बा इंतज़ार है. एक लड़ाई जो कतई आसान नहीं, यह जेल की एक संकरी कोठरी में यातनादायक वर्ष हैं, चिलचिलाती धूप में बीच सड़क पर एक मोटे पुलिसमैन की लाठी से पिटना है. यह स्वेच्छा से अपना सब कुछ दाँव पर लगाकर भी आत्मिक संतुष्टि पाना है. 

रैंगसें (आज़ादी) का अर्थ आसपास की छतों से देखते कैमरा की चिंता के बगैर बारखोर (ल्हासा) में जौ की बीयर पी सकना है.

यह एक उम्मीद है कि एक दिन मेरी देह को एक अंतिम चढ़ावे की तरह गहरे नीले आसमान से उतरते गिद्धों के हवाले कर दिया जायेगा.
अनुराधा सिंह
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  1. तिब्बत चीन में होते हुए भी चीन से अलग और विशष्ट है।
    इन कविताओं में तिब्बती लोगों का सामूहिक अवचेतन पूरी शिद्दत से अभिव्यक्त हुआ है।
    इसके लिए कवयित्री और अनुवादक के साथ ही अरुण जी को साधुवाद।

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  2. प्रिय अरुण, तृप्तिदायक, मानवीय, आत्मीय, कविताओं की प्रस्तुति के लिए धन्यवाद। अनुराधा सिंह के प्रभावी चयन और अनुवाद के लिए उन्हें भी बधाई, धन्यवाद।
    वाह!

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  3. और,
    अनुराधा जी की संक्षिप्त भूमिका भी ध्यातव्य है।

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  4. दया शंकर शरण18/5/20, 3:46 pm

    निर्वासन को भोगना और उसे भोगते हुए देखना , कुछ वैसा हीं होता है जैसा कोई दूर से किसी आदमी को आग से जलते-तड़पते देखकर उस पीड़ा का थोड़ा-सा अंश खुद भी अनुभव करने लगे । जबकि उस भयानक और असह्य पीड़ा का वास्तविक एहसास सिर्फ भोक्ता को हीं हो सकता है । हालाँकि संवेदना के धरातल पर उसे देखना और महसूसना भी कोई कम तकलीफ़देह नहीं होता । अपने दुःख को साझा करती निर्वासन की पृष्ठभूमि पर लिखी गई ये कविताएँ किसी भी भावक को गहरे आहत कर सकती हैं, उन्हें भी जो स्वयं भुक्तभोगी नहीं रहे हैं । सबसे पहले तो अरूण देव जी को इनके चयन के लिए और अनुराधा जी को इतने बढ़िया अनुवाद के लिए और अंत में कवि को इतनी भावपूर्ण कविताओं के लिए साधुवाद ! मुझे बहादुर शाह जफर का वो शेर याद आ रहा है जिसमें उनका दर्द बयां है..कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ्न के लिए..दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में । बतौर गालिब जो आँख से ना टपके वो लहू क्या है । इसी ब्लॉग पर फिलिस्तीन के कवि-नजवान दरवीश की कविताएँ भी पढ़ी थी जिसकी दो पंक्तियां अभी भी याद है..मेरा कोई देश नहीं जहाँ वापस जाऊँ..और कोई देश नहीं जहाँ से खदेड़ा जाऊँ..

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  5. तिब्बती शरणार्थियों की व्यथा को व्यक्त करती सशक्त रचनाएँ !

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  6. Vijay Kumar18/5/20, 7:27 pm

    अनुराधा जी बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया है आपने। तिब्बत की कविता की ओर किसी का ध्यान भी नही जाता। अनुवाद भी बहुत सुंदर हैं।

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  7. Leeladhar Mandloi18/5/20, 7:28 pm

    वस्तुतः ये कविताएं मात्र विस्थापन की त्रासद कविताओं से आगे की भीतर की
    दोहरी त्रासदी की कविताएं हैं।वे विस्थापित जो किसी देश में जाकर बस गये हैं किसी रूप में
    वहां के नागरिक हो गये हैं,वे अस्मिता के स्वैच्छिक संकट से गुज़र रहे हैं।एक
    देश का राजनीतिक और सांस्कृतिक अर्थों में खो जाना और दूसरे में आकांक्षित अस्मिता के लोप की उससे
    बड़ी त्रासदी।
    इसकी अनुवादक में चेतना कुछ नये
    आयाम भाव के स्तर पर उजागर कर
    पाएगी, ऐसा विनम्र मत है।

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  8. रंजना मिश्र18/5/20, 9:01 pm

    ये कविताएँ इतनी बेधक और मार्मिक हैं कि एक साथ सारी कविताएँ पढ़ना मुश्किल हो जाता है। चीन ने किस तरह cultural rebolution के नाम पर तिब्बत की मूल संस्कृति, जीवन और अस्तित्व पर आघात किया है कविताओं में स्पष्ट है। गहन यंत्रणा और छटपटाहट से भरी कविताएँ। अनुवाद बढ़िया है, मूल पढ़ने की इच्छा जाग गई। कवि,अनुवादक और समालोचन को बधाई।

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  9. राष्ट्रीयताएँ बगैर नक़्शे के भी सदियों तक जीवित रहती हैं - स्मृतियों में ,पीढ़ी दर पीढ़ी। इनके अनेक प्रशस्त उदाहरण हमारे सामने है - फिलिस्तीन सबसे बढ़ चढ़ कर ..... मुझे लगता है महमूद दरवेश जैसा शानदार कवि अपने विस्थापन की निर्मिति है और अरबी कविता का एक देदीप्यमान सितारा भी जो सदियों तक फिलिस्तीन विमर्श बन कर निरभ्र आकाश में चमकता रहेगा भले ही दुनिया के नक़्शे पर फिलिस्तीन नाम के किसी मुल्क का नामो निशान नहीं। तिब्बत भी उसी तरह की  वैचारिक और भावात्मक निर्मिति है जिसमें अपने घर लौटने वाले लोगों के  झुण्ड में शामिल हो पाने की तड़प है। भुचुंग डी सोनम जैसे युवा और बेचैन कवियों ने इस स्वप्न को अपने खून पसीने से सींचा है - पर दुनिया की राजनैतिक सच्चाई "गिद्ध सी उड़ान भरने वाले" कवि के दिमाग पर हथौड़े मार मार कर याद  दिलाती रहती है कि "उसके पंख महज गौरैय्या के पंख" हैं।  यह स्पष्ट कर दूँ कि मैंने उन्हें अनुराधा सिंह के अनुवादों की मार्फ़त ही जनवरी 2018 में जाना(सन्दर्भ, "नया ज्ञानोदय" का विश्व कविता विशेषांक)... यहाँ प्रस्तुत कवितायेँ बुरी तरह बेचैन करने वाले स्मृतिलेख हैं जो गैर मुल्कों में अपनी पहचान के साथ अपने होने के मायने तलाशते बिम्बों और भावों से  अंग्रेजी की बुनाई मशीन पर आड़े तिरछे बुने गए हैं: "वह बुनती रहती है दस्ताने, बच्चों के दस्ताने,मफलर और मंकी कैप......" पर उसने हार नहीं मानती है न ही मानेगी भले ही अगले सात जनम यूँ ही उसी दुनिया के विभिन्न हिस्सों में सड़क पर बैठे बैठे लड़ाई में विजय की बाट जोहनी पड़े :" एक पहाड़ की तरह बैठी है वह ज़मीन पर/ सलाइयों के बीच चलती लड़ाई / को उसके हाथ नियंत्रित किये रहते हैं।"
    लम्बे समय तक चेतना पर आघात करती रहने वाली  गहरी मानवीय करुणा और जिजीविषा से ओतप्रोत इन कविताओं का चयन और रससिद्ध अनुवाद करने के लिए अनुराधा सिंह को बधाई और हम तक उन्हें पहुँचाने के लिए समालोचन का आभार !!                                                        --- यादवेन्द्र 

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  10. शिव किशोर तिवारी19/5/20, 10:49 pm

    कवि सोनम का नाम पहले नहीं सुना, न मूल कविताएं पढ़ी हैं । केवल अनुवाद की भित्ति पर कुछ कहता हूँ ।
    1, कब हुआ था मेरा जन्म
    यह कविता एक माँ-बेटे के संवाद के रूप में है। अनुवाद में कविता प्रभाव जगाती है। साम्राज्यवादी आक्रमण के आतंकपूर्ण वातावरण को अनेक बिम्बों के माध्यम से कुशलतापूर्वक सम्प्रेषित किया गया है। पिता के बारे में पूरा बताने के पहले कविता समाप्त हो जाती है। याने वे या तो मारे गये या उनका कोई पता न मिला। परंतु तांबे की मूर्तियां गलाकर गोली बनेगी, छर्रे नहीं । ' जब सूर्य आकाश से तिरोहित हो गया' अत्युक्तिपूर्ण है जो कविता से मेल नहीं खाता। मूल से एक बार और मिलाकर देख लेना चाहिए ।
    2. उन्हें हड़प लो
    यह कविता औरों से अलग है और उपभोक्ता संस्कृति का चरित्र स्पष्ट करती है। अनुवाद में कविता अच्छी लग रही है।बटर चिकन मूल में भी हो तो ठीक है वरना तिब्बती कविता में अजीब लग सकता है।
    3. फासले से गीत
    यह शीर्षक सुनने में अच्छा नहीं लगता। मतलब सम्भवतः ' दूर से गाया हुआ गीत' या दूर का गान है। अनुवाद में बिम्ब स्पष्ट हैं । केवल माँ का बच्चे को चट्टान से बांधकर काम करना हिंदी में अजीब लग रहा है। एक पंक्ति में 'सिंहपर्णी का रेशा' आया है जो अस्पष्ट है। यह पौधा सुना नहीं लगता। बांग्ला में dandelion का शाब्दिक अनुवाद सिंहदंती देखा है। पर उसका भी रेशा क्यों? थोड़ी रिसर्च चाहिए ।
    4. निर्वाचन
    यह कविता अनुवाद में स्पष्ट नहीं हो रही है। मक्खी कहाँ फँसी है। कमरे में या मकड़ी के जाल में । वह किस कूड़ेदान तक जाती है ? कमरे के अंदर के या बाहर? मकड़ी सीलिंग पर जाती है या रूफ़ पर? कहानी साफ़ नहीं होती। एक बार रिवाइज़ करना चाहिए ।
    5. एक गीत
    यह जन्मभूमि के प्रति ललक की कविता लग रही है जिसका स्वर प्रेम कविता-जैसा है। अनुवाद भावपुष्ट है। केवल 'पुतली के चारों ओर घेर' बनाना स्पष्ट नहीं है। चूंकि सितारों और चांद की बात भी साथ लगी है, इसलिए लगता है कि अन्तरिक्ष का कोई बिम्ब होगा जिसका अनुवाद चूक गया।
    6. अब वह बोस्टन में
    बड़ी प्यारी कविता है। और कैसा मर्मभेदी अन्त! अनुवाद ख़ूब है।
    7.लाल ललाट- कोई टिप्पणी नहीं
    8. द्राप्ची ...
    सुंदर कविता है। केवल एक पंक्ति समझ में नहीं आई - 'मैं जीवनरहित घन हूँ'' ।

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  11. Nice poems
    https://koshishmerikalamki.blogspot.com/2020/05/blog-post_75.html

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  12. कवितायेँ झकझोरने वाली हैं. अनुवादक का चयन वाकई अच्छा लगा. निर्वासित होना एक निरंतर रहने वाला दुःख है, जिसका शायद ही कोई अंत हो.

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  13. सुन्दर कविताएँ

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