कहानीकार फणीश्वरनाथ रेणु : प्रेमकुमार मणि



फणीश्वरनाथ रेणु के जन्म शताब्दी वर्ष के सिलसिले में समालोचन प्रेमकुमार मणि का रेणु की कहानियों पर आधारित यह आलेख प्रस्तुत कर रहा है. रेणु की कहानियां ग्रामीण कामगार और कलाकार दोनों की उत्तर औपनिवेशिक नियति को राजनीतिक चेतना और मानवीय करुणा के साथ बुनती हैं. अगर कबीर कहानियाँ लिखते तो शायद उनका स्वरूप कुछ ऐसा ही होता.
   

प्रेमकुमार मणि सिद्धहस्त लेखक हैं. यह आलेख कहानीकार रेणु को सबल ढंग से प्रत्यक्ष करता है.


कहानीकार फणीश्वरनाथ रेणु                    
प्रेमकुमार मणि





रेणु का कहानीकार रूप उनके उपन्यासकार रूप से महत्व में कुछ अधिक ही है. हिंदी कहानियों में प्रेमचंद के बाद ग्रामीण छवियाँ कम मिलने लगी थीं. साहित्य में जो आधुनिक प्रवृत्तियाँ उभर रही थीं, उनके लिए नगरीय मध्यवर्ग का परिवेश अधिक उपयुक्त है, ऐसा लेखकों का मानना था. जैनेन्द्र कुमार, यशपाल, अज्ञेय जैसे लेखकों ने ग्रामीण पृष्ठभूमि से स्वयं को लगभग अलग ही रखा हुआ था. आज़ादी  के बाद साहित्य में जो युवा स्वर उभर रहे थे उनका भी यही हाल था. नयी कहानी आंदोलन तो पूरे तौर पर मध्यवर्ग का साहित्यान्दोलन था, जिसकी जड़ें नगरीय जीवन में थीं. ग्रामीण परिवेश-पृष्ठभूमि के साथ कोई समर्थ हिंदी लेखक कहानी क्षेत्र में उन दिनों  नहीं था. ऐसे में ही रेणु अपने ठेठ ग्रामीण परिवेश और पूरे आंचलिक वितान के साथ हिंदी कहानी के परिदृश्य पर उभरते हैं और अपनी रचनात्मकता से एक हलचल पैदा कर देते हैं. 

गाँव हिंदी कहानी के केंद्र में एक बार फिर आता है और हम कह सकते हैं कि पहले की अपेक्षा अधिक ताकत और विश्वसनीयता से अपनी पहचान स्थापित करता है. कहा जा सकता है कि प्रेमचंद के बाद गाँव अपनी समग्रता में रेणु की कहानियों में ही स्थान पाता है. हिंदी कहानी को सबसे अधिक विश्वसनीय ग्रामीण पात्र रेणु ने ही दिए हैं. उनके पात्र हमें अपनी उस आंचलिक दुनिया में खींच ले जाते हैं, जो भारतीय गाँवों का प्रतिनिधित्व करते हैं. वे  अपने दिल की बात अपनी पूरी रागात्मकता से प्रस्तुत करते  हैं. उनकी कोशिश हमें अपने परिवेश में शामिल-समाहित कर लेने की होती है.  इसलिए उनकी कहानियाँ एक कज्जल-विश्वसनीयता के घेरे में हमें बाँध लेती हैं. रेणु जब  अपनी दुनिया के चित्र उकेर रहे होते हैं, तब इतने तन्मय हो जाते हैं कि उनके शब्द, चित्र और चेतना मिलकर एकाकार हो जाते हैं. हिंदी कहानी की किसी प्रचलित धारा अथवा आंदोलन से घोषित रूप में वह कभी नहीं जुड़ते. न ही कलावादी खेमे से, न ही प्रगतिशील कहे जाने वाले मार्क्सवादी खेमे से. अपनी जगह वह खुद बनाते हैं. लेकिन यह जरूर है कि उनकी कहानियाँ हमे भारत के उस  जीवन से जोड़ती हैं, जो हाशिये पर हैं. बिना किसी नारेबाजी अथवा बड़बोलेपन के उनकी कहानियाँ हमें भारत की मिहनतक़श जनता की धड़कनों के  करीब ले जाती हैं. 

आश्चर्य होता है कि जीवन की इतनी विविध छवियाँ उनने किस तरह  आत्मसात कीं. लोक जीवन के राग-अनुरागों, उनकी समझ, उनकी संवेदना और विवेक को उन्होंने अपने अंदाज़ में पकड़ने की कोशिश की है. परिवेश तो जितना रेणु की कहानियों में जीवन्त हुआ है, उतना अन्य किसी हिंदी कहानीकार में नहीं. पात्र और परिवेश के किसी द्वैत की निर्मिति वह नहीं करते ; बल्कि दोनों का अद्वैत गढ़ते हैं. यही रेणु की खूबी है. इस रूप में ही वह अनूठे-अप्रतिम हैं. हिंदी साहित्य को ‘तीसरी कसम अर्थात मारे गए गुलफाम’, ‘रसप्रिया’, ‘ठेस’. ‘आत्मसाक्षी’, ‘लाल पान की बेगम’ जैसी अविस्मरणीय कहानियाँ रेणु ने दी हैं. यदि उन्होंने और कुछ न लिख कर केवल ‘तीसरी कसम’  भी लिखा होता, तब भी गुलेरीजी की तरह वह हिंदी कथा जगत में अमर होते. 

  
हम रेणु की कहानियों के विविध पक्षों पर यहाँ विचार करना चाहेंगे. लेकिन सबसे पहले उनकी कहानियों के विकास-क्रम को समझना चाहेंगे. संख्या के हिसाब से उनने कुल जमा तिरसठ (63) कहानियाँ हिंदी-साहित्य को दी हैं. उनकी पहली कहानी ‘बट-बाबा’ 27 अगस्त 1944 के कोलकाता (तब कलकत्ता)  के साप्ताहिक ‘विश्वमित्र’ में प्रकाशित हुई. और अंतिम कहानी ‘अगिनखोर’ नयी दिल्ली से प्रकाशित ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के 5-12 नवंबर 1972 के अंक में. वय के हिसाब से, अपनी पहली कहानी के प्रकाशित होने के समय, रेणु तेईस वर्ष के थे और अंतिम  कहानी के प्रकाशित होने के समय 51 वर्ष के. इस तरह 28 वर्षों के लेखन-काल  में 63 कहानियाँ संख्या के हिसाब से बहुत अधिक नहीं कही जाएँगी.

यदि उनकी कहानियों के विकास-क्रम की और सूक्ष्म जाँच करेंगे तब इस निष्कर्ष पर आएँगे कि 1944 से 1953 तक उनके कहानी-लेखन का अप्रेंटिसशिप अथवा आरंभिक दौर ही है. इस बीच उनकी पंद्रह कहानियाँ आती हैं. लेकिन इन सब से किसी भी कहानी को, उनने अपने होते, अपने संकलन में नहीं लिया तो यही कहा जायेगा कि इन्हें स्वयं लेखक ने उल्लेखनीय नहीं  समझा. इस मामले में मैं रेणु के साथ होना चाहूँगा. 1944 से 1953 तक की उनकी कहानियों को केवल संख्या के ख्याल से ही हम रेणु की कहानी स्वीकार करते हैं. फिर यह उनके लेखकीय विकास को समझने में सहायक होता है. लेकिन 1955 में इलाहाबाद से धर्मवीर भारती के संपादन में निकलने वाले ‘निकष’ में उनकी कहानी ‘रसप्रिया’ छपती है और यह उनके कहानीकार के नए अंदाज़ को प्रस्तुत करती है. 1956 में श्रीपत राय के संपादन में प्रकाशित होने वाली ‘कहानी’ पत्रिका में ‘लाल पान की बेगम’ प्रकाशित होती है और उससे अगले वर्ष पटना से नर्मदेश्वर प्रसाद के संपादन में प्रकाशित होने वाली अपरम्परा’ में उनकी कहानी ‘तीसरी कसम अर्थात मारे गए गुलफाम’ नाम से प्रकाशित होती है. 1959 में उनका पहला कहानी संकलन ‘ठुमरी’ शीर्षक से प्रकाशित होता है, जिसमें उनकी नौ कहानियाँ होती हैं. ये हैं– रसप्रिया, तीसरी कसम, लाल पान की बेगम, पंचलाइट, सिरपंचमी का सगुन, तीर्थोदक, तीन बिंदिया, ठेस और नित्यलीला.

कहा जाना चाहिए कि 1955 से 1959 तक की अवधि उनकी कहानियों का स्वर्ण या सुनहला-काल है. हम कह सकते है कि उनका यह काल थोड़े उतार के साथ कुछ आगे तक चला. 1966 में उनका दूसरा संकलन ‘आदिम रात्रि की महक’ प्रकाशित हुआ. इस बीच ‘संवदिया’, ‘एक आदिम रात्रि की महक’, ‘आत्मसाक्षी’, ‘जलवा’ जैसी कहानियाँ उन्होंने लिखीं. ‘आत्मसाक्षी’ कहानी अलग-अलग कारणों से अज्ञेय और हिंदी-साहित्य के जर्मन अध्येता लोठार लुटसे को बहुत पसंद थी. इसी बीच रेणु की एक कहानी ‘तीसरी कसम’ पर फिल्म बनी और रेणु कुछ समय के लिए फ़िल्मी-प्राणी हो गए. कहानियाँ 1972 तक लिखीं और वे प्रकाशित भी हुईं, लेकिन रसप्रिया, तीसरी कसम, ठेस, पंचलाइट, लाल पान की बेगम या आत्मसाक्षी जैसी उल्लेखनीय कहानी वह नहीं लिख सके. 1966-67 के सूखे और 1975 में पटना नगर में आयी भीषण बाढ़ पर उनके रिपोर्ताज किसी कहानी से कम मोहक नहीं हैं, लेकिन उन्हें कहानी कहना शायद ज्यादती होगी.

रेणु जिस ज़माने में थे, उसमें हिंदी की अनेक लब्धप्रतिष्ठ पत्रिकाएँ थीं. धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, ज्ञानोदय, कल्पना, कहानी, माया, नयी कहानियाँ और सारिका जैसी पत्रिकाएँ उन दिनों समादृत थीं. रेणु इन सब में प्रकाशित हुए हैं. धर्मयुग में उनकी पाँच और सारिका में चार कहानियाँ प्रकाशित हुईं. ‘आत्मसाक्षी’ माया पत्रिका में छपी थीकल्पना, ज्ञानोदय, नयी कहानियाँ, कहानी, साप्ताहिक हिंदुस्तान में भी उनकी कहानियाँ प्रकाशित हुईं. जनता, समाज, राष्ट्र-सन्देश, अवंतिका, योगी और स्थापना जैसी पत्रिकाओं में भी वह छपते थे. लेकिन संख्या के हिसाब से उनकी कहानियाँ सबसे अधिक जिन दो पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं वे हैं– ‘विश्वमित्र  और ‘ज्योत्स्ना’. उनके आरंभिक दौर की लगभग दस कहानियाँ विश्वमित्र में ही छपीं. इसी तरह 1962 से 1972 तक  पटना से शिवेंद्र नारायण के संपादन में निकलने वाली ‘ज्योत्स्ना’ में उनकी कुल सत्रह कहानियाँ प्रकाशित हुईं.

सब मिला कर हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि उनके कथा-लेखन के तीन पड़ाव या चरण हैं. एक पड़ाव 1953 तक आता है. 1954 में अपने पहले ही उपन्यास ‘मैला आँचल’ के प्रकाशन से उन्हें जो प्रसिद्धि मिलती है, उससे उनमें एक लेखकीय जिम्मेदारी का बोध आता है. इसके बाद वह बहुत संभल कर लिखते हैं. यही कारण है, 1955 में प्रकाशित ‘रसप्रिया’ के बाद उन्होंने एक से एक अनेक अविस्मरणीय कहानियाँ लिखीं. उनका तीसरा पड़ाव 1966 में आरम्भ होता है. ‘तीसरी कसम’ फिल्म की प्रसिद्धि ने पहले से ही ख्यातनाम रेणु को एक  किंवदंती-पुरुष बना दिया. उनका लिखा अब कुछ भी छप सकता था. उनके लिखे के प्रकाशन से पत्रिकाओं की मर्यादा बढ़ जाती थी. इस कारण शायद बहुत नहीं चाहते हुए या फिर जैसा कि फ्रीलांस लेखक करते हैं, नियमित पारिश्रमिक के लिए भी रेणु ने अधिक लिखा होगा. 

ऐसा अधिकांश  लेखक करते हैं. इसका बड़ा उदहारण प्रेमचंद हैंया रूसी  लेखक चेखब. रेणु की इस तरह की  कहानियों में भी एक  आकर्षण है. जैसे कि ज्योत्स्ना में ही फ़रवरी 1965 में छपी एक कहानी ‘आज़ाद परिंदे’ गरीब परिवारों के आवारा हो रहे बच्चों की एक विश्वसनीय दास्ताँ बयाँ करती है. ऐसे बच्चों पर इतने विश्वसनीय रूप से हिंदी में कोई दूसरी कहानी नहीं है. ‘भित्ति चित्र की मयूरी’ भी एक ऐसी ही कहानी है, जिसमें लेखक ने अपनी ही एक कहानी ‘ठेस’ के पात्र सिरचन को फुलमत्ती और उसकी माँ के रूप में ला खड़ा किया है. लेकिन इस बीच रेणु ने ‘अगिनखोर’ जैसी कहानियाँ भी लिखी, जिसका कोई औचित्य समझ में नहीं आता. मुझे नहीं मालूम इसके लिए लेखक ने अन्यत्र कुछ लिखा है या नहीं. जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कुछ कहानियाँ उन्होंने किसी न किसी दबाव में लिखी होंगी.



(दो)
रेणु कहानियाँ लिखते नहीं, बुनते हैं, जैसे कबीर चादर बुनते थे और उसी तर्ज पर अपनी कविता भी. कबीर ने चादर बुनने की प्रक्रिया अपने एक पद में बतलायी है. ठोंक-ठोंक के बीनी चदरिया. वह चादर ठोंक-ठोंक कर बुनते हैं, ढीले-ढाले ढंग से नहीं. उनकी बुनावट का यह कसाव ही उनकी कला और कविता  का उत्कर्ष  है. मजाल नहीं कि एक शब्द या एक सूत का बेज़ा इस्तेमाल हो जाय. इस मायने में रेणु के आदर्श कबीर ही हैं. वह भी ठोंक-ठोंक कर अपनी कहानियाँ रचते हैं. शब्दों के महत्व अपनी जगह सुरक्षित हैं, लेकिन उनकी कहानियाँ पढ़ते समय शब्द अदृश्य होने लगते हैं और पाठक  के मन में परिवेश मूर्तमान हो  उभरने लगते हैं, जिसमें राग भी है, अनुराग भी. गीतात्मकता उनके उपन्यासों में भी है, लेकिन उसका सर्वांग रूप उनकी कहानियों में ही उभरता है. उपन्यासों में गीतात्मकता को पूरी तरह  सुरक्षित रखना उसके धज अथवा कैनवास के कारण मुश्किल भी था. कहानियों में इसे सुरक्षित रखना रेणु के लिए संभव था. इसमें वह सफल भी दिखते हैं. 

‘रसप्रिया’ उनकी ऐसी कहानी है जिसमें पँचकौड़ी मिरदंगिया के बहाने ग्रामीण जीवन में चल रहे, अनवरत रोमांस और उसकी परिणति को पूरे सौष्ठव के साथ वह रखते हैं. यह अद्भुत प्रेमकथा है. अधिकांश प्रेम कथाओं जैसी ट्रेजेडी से कुछ अलग इस कथा की ट्रेजेडी हमें समाज के आर्थिक-सामाजिक अंतर्संघर्ष और उसमें कलाकार की नियति पर सोचने के लिए विवश भी करती है. इस कहानी के रचनाकाल का ध्यान कीजिए– 1955. दुनिया की राजनीति में शीतयुद्ध की महामारी है. दुनिया भर के लेखक इससे अपने अंदाज़ में निबट रहे हैं. लेकिन राजनीतिक तौर पर अन्य अधिकांश लेखकों से सचेत रेणु उन मनुष्य समूह की नियति को देखने की कोशिश कर रहे होते हैं जो चुपचाप अपने समय का इतिहास लिख रहे होते हैं. मोहना की माँ और पँचकौड़ी मिरदंगिया आपको चाहे जितने निरीह दिखें, वे भी अपने समय को अनेकानेक  संकेतों से सम्बोधित कर रहे होते हैं. उनके पास भी बहुत कुछ है कहने के लिए. 

रेणु ऐसे ही मूक रहे पात्रों के कथावाचक हैं.  रेणु यह नहीं मानते कि ग्रामीण सर्वहारा के जीवन में आर्थिक दुःख के सिवा और कुछ होता ही नहीं. वह यह भी कहना चाहते हैं कि उनका आर्थिक-सामाजिक दैन्य उनके जीवन को कई स्तरों पर विरूप कर देता है. उनका कुछ भी सुरक्षित नहीं रह जाता. उनका जीवन-राग मुश्किल में होता है. लेकिन चाहे जो हो, ये मिहनतक़श लोग जो आमतौर पर हमारे सामाजिक जीवन के हाशिये पर होते हैं, राग-अनुराग से विरत नहीं हो सकते. वह अपनी धड़कनों को खोना नहीं चाहते. उनका महत्व समझते हैं. 

रेणु की अन्य कई कहानियों जैसे ‘पंचलाइट’, ‘तीसरी कसम’. ‘अच्छे लोग’ या फिर आखिरी  दौर  की कहानी ‘भित्तिचित्र की मयूरी’ में भी रागात्मकता के विविध रूपों को आप देख सकते हैं. पंचलाइट के गोधन और मुनरी, तीसरी कसम का हिरामन, ‘अच्छे लोग’ के उजागिर और बिरौलीवाली या ‘भित्तिचित्र की मयूरी’ की फुलपतिया सब एक ही पीड़ा या रस में डूबे हुए पात्र हैं. इस  बीच रेणु कृष्ण की पौराणिकता को लेकर भी एक बहुत खूब कहानी बुनते हैं ‘नित्यलीला’. इस कहानी की चर्चा कम ही हुई है. उनके प्रथम कहानी संकलन ‘ठुमरी’ में यह संकलित है. कृष्ण-लीला के एक ऐसे अभिराम दृश्य को रेणु गढ़ते है, जो कृष्ण की प्रचलित पौराणिकता में शायद नहीं है, लेकिन अपनी बुनावट और कथा में वह इतनी सरस और गीतात्मक है जिसे पढ़ कर ही जाना जा सकता है. पौराणिकता को नए अंदाज़ में कहने का एक प्रचलन हमारे साहित्य में तेजी से उभरा है. लेकिन पौराणिकता का इस्तेमाल अपनी कथा रचना में हम कैसे करें, यह कोई रेणु से सीखे.

रेणु राजस्थानी लेखक विजयदान देथा की तरह लोककथाओं का पुनर्पाठ-पुनर्प्रस्तुति या पुनर्लेखन नहीं करते. मेरी जानकारी में उनकी कोई ऐसी कहानी नहीं है, जो किसी प्रचलित कथा की  पुनर्प्रस्तुति हो, तीसरी कसम भी नहीं. हाँ, लोक जीवन के प्रचलित लोक गीतों, मुहावरों, अन्य जनश्रुतियों और सबसे बढ़ कर उनके राग-अनुराग का इस्तेमाल अपनी कथा बुनने में वह अवश्य करते हैं. रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम’ और देथा की कहानी ‘दुविधा’ में कुछ-कुछ साम्य है, लेकिन अपनी बुनावट में दोनों बिलकुल अलग हैं. देथा ने एक प्रचलित राजस्थानी लोककथा को एक आधुनिक कहानी का रूप दिया है ; लेकिन रेणु की ‘तीसरी कसम’ उनकी अपनी है, उसकी कथा-वस्तु को रेणु ने स्वयं गढ़ा-बुना है. वह उनकी मौलिक रचना है. हाँ, इसमें महुआ घटवारिन जैसी लोक- कथा या कई गीतों के खूबसूरत इस्तेमाल उन्होंने अपनी बुनावट में जरूर किये हैं. 


यह है लोकतत्वों के इस्तेमाल की कला. इसे रेणु पूरी दक्षता से करते हैं. उनकी यही दक्षता कला का स्वरूप ग्रहण कर लेती है, फिर इसकी नकल किसी के लिए भी मुश्किल हो जाती है. फ़िल्मकार शैलेन्द्र ने 'तीसरी कसम' कहानी पर फिल्म बनाई, जो कई कारणों से चर्चित भी हुई. लेकिन उस फिल्म को देखने और कहानी को पढ़ने के अनुभव पृथक होते हैं. कहानी के लालित्य को फिल्म में हम अनुभव नहीं करते. कहानी-पाठ का जो प्रभाव एक संवेदनशील मन पर होता है, उसे फिल्म संभव नहीं कर पाती. रेणु की कहानियों की यह विशेषता ही कही जाएगी कि उसके रूपांतर से उसकी प्रभान्विति बिखर जाती है. खास कर जिस वातावरण को वह जो शब्दरूप देते हैं, उसका दृश्यांकन कतई संभव नहीं है. आलोचक डॉ सुरेंद्र चौधरी ने उनके इस महत्व को समझा था. सीधे उन्हें ही उद्धृत करना चाहूंगा-

'रेणु अपनी कहानियों में वातावरण को बड़ी सावधानी से, पर अत्यंत सहजता के साथ संयोजित करते हैं. रंग-रेखाओं में उभारते हैं. उनका व्यक्त-अव्यक्त अर्थ हर दबाव के साथ प्रकट होता है. वातावरण की सघनता नई कहानियों में अपना विशिष्ट महत्व रखती है. प्रायः रेणु के समकालीन लेखकों ने वातावरण को कलात्मक-संश्लिष्टता दी है, उसे कहानी के बाहरी तत्व से भिन्न अंतरंग बनाया है. लेकिन रेणु में उसकी छविमयता और सघनता की अपनी विशेषताएं हैं. यही कारण है कि रेणु को अक्सर आंचलिक कह कर इस पूरे आंदोलन के बदलावों से अलग भी रखने के प्रयास हुए हैं. इस बहस में पड़े बगैर कि रेणु वातावरण से ही आंचलिक रोमांसों के कहानीकार हैं या नहीं, मैं यहां सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि अन्य लेखकों की तुलना में रेणु का 'वातावरण' अपेक्षाकृत अधिक संवेद्य, सहज और स्पर्शयुक्त है. प्रतीक स्थितियों और अन्यपदेश के प्रयोग के बिना भी उनकी कहानियों के वातावरण को पहचाना जा सकता है. अपने वातावरण को कथा के 'रूपक' के लिए प्रयोग में लाने  के उदाहरण इन कहानियों में कम ही मिलेंगे..... रेणु की कहानियों का वातावरण रहस्यहीन और प्रत्यक्ष होता है. जहाँ प्रत्यक्ष की छायाएं रहती भी हैं, वहां उन्हें मानव-स्वभाव के साथ एक कर लेना रेणु को आता है. इस प्रकार रेणु की कहानियों का परिचित वातावरण भी हमें थकाता नहीं है, बार -बार नए कार्यकलापों, निष्कर्षों और परिणामों से जुड़ा होकर हमें ताज़ादम बनाता है.'
(फणीश्वरनाथ रेणु : सुरेंद्र चौधरी, विनिबंध, साहित्य अकादमी, पृष्ठ 35-36)

रेणु की सबसे  लम्बी और चर्चित कहानी 'तीसरी कसम अर्थात मारे गए गुलफाम' है. विधुर गाड़ीवान हिरामन की इस  कथा का आरम्भ ही होता है 'हिरामन गाड़ीवान की पीठ में गुदगुदी  लगती है ….' से. गाड़ीवान  के जीवन में गुदगुदी कैसी ! लेकिन रेणु के गाड़ीवान में यह गुदगुदी ही उसकी आत्मा है. और इसके इर्द-गिर्द है उसका पूरा स्वरूप जिसमें उसके दोस्त-यार, उसकी भौजाई, उसके प्यारे बैल और उसके समय का सारा क्लेश है. महुआ घटवारिन की व्यथा है, सौदागर है. उसका स्व-रूप  कैसा है ? रेणु की जुबान में ही देखिये - 

"चालीस का हट्टा-कट्टा, काला-कलूटा, देहाती नौजवान अपनी गाडी और अपने बैलों के सिवाय दुनिया की किसी और बात में विशेष दिलचस्पी नहीं लेता. घर में बड़ा भाई है, खेती करता है. बाल-बच्चेवाला आदमी है. हिरामन भाई से बढ़कर भाभी की इज़्ज़त करता है. भाभी से डरता भी है. हिरामन की भी शादी हुई थी, बचपन में ही गौने के पहले ही दुल्हिन मर गयी. हिरामन को अपनी दुल्हिन का चेहरा याद नहीं. दूसरी शादी

दूसरी शादी न करने के अनेक कारण हैं. भाभी  की जिद्द, कुमारी लड़की से ही हिरामन की शादी करवाएगी. कुमारी का मतलब हुआ पांच-सात साल की लड़की. कौन मानता है सरधा-कानून ?कोई लड़की वाला दोब्याहू को अपनी गरज में पड़ने पर  ही दे सकता है. भाभी उसकी तीन-सत्त कर के बैठी है, सो बैठी है. भाभी के आगे भैया की भी नहीं चलती !... हिरामन  ने तय कर लिया है, शादी नहीं करेगा. कौन बलाय मोल लेने जाय ! ब्याह करके फिर गाड़ीवानी क्या करेगा कोई ! और सब कुछ छूट जाय,गाड़ीवानी नहीं छोड़ सकता हिरामन."
तो तीसरी कसम का नायक हिरामन ऐसा है. काला-कलूटा, चालीस साल का  देहाती नौजवान. भारतीय काव्यशास्त्र ने नायक के लिए जो धीरललित, धीरोदात्त, धीरप्रशांत और धीरोद्धत के प्रतिमान बनाये हैं, उसमें हिरामन भला कहाँ प्रवेश पाने योग्य है ? लेकिन समाजवादी रेणु उसे खड़ा करते हैं.  साहित्य में नए व्याकरण भी खड़े करने हैं उन्हें. उनका हिरामन हीराबाई द्वारा परख लिया गया है.

"हीराबाई ने परख लिया, हिरामन सचमुच हीरा है." रेणु को हिरामन के व्यक्तित्व ही नहीं, उसके समाज और उसकी सोच की भी परवाह है. हिरामन आम से कुछ अलग है, खास किस्म का इंसान. भाभी से बहुत डरता है, लिहाज करता है. विधुर हिरामन की दूसरी शादी न होने के भी कारण हैं.  'भाभी की जिद्द, कुमारी लड़की से ही हिरामन  की शादी करवाएगी' गाँव के लोगों को भी शारदा-कानून की जानकारी है, भले ही वे उसकी अवहेलना  कर जाते हैं. और इन सबके बीच हिरामन तय करता है वह शादी नहीं करेगा. वह सब कुछ छोड़ सकता है गाड़ीवानी नहीं छोड़ सकता.

रेणु को समझना प्रगतिवादियों के लिए मुश्किल रहा. इसके कारण थे. प्रगतिवादियों का किताबी अध्ययन उन्हें जिस मार्क्सवादी समझ के नजदीक ला सका, वह यह तय करने में असमर्थ था कि श्रमिक अपने कारोबार से वैसा ही प्रेम करता है, जैसा कलाकार अपनी कला से या कवि अपनी कविता से. श्रम करना भार नहीं है, वह जीवन का गीत है, जिसके बिना श्रमिक नहीं रह सकता. हिरामन सबकुछ छोड़ सकता है किन्तु गाड़ीवानी नहीं छोड़ सकता. जैसे कबीर ने बुनकरी और रैदास ने अपनी मोचीगीरी नहीं छोड़ी थी. हिंदी साहित्यालोचकों ने कभी इस बिंदु पर विचार करने की कोशिश नहीं की कि कबीर और रैदास की कविताओं में जो उल्लास है, वह तुलसी की कविताओं में क्यों नहीं है ? कबीर या रैदास की कविताओं में हाहाकार कम है, जीवन का उल्लास अधिक है. इसके उलट तुलसी की कविताओं में उल्लास कम, हाहाकार अधिक है. इसका  कारण संभवतः तुलसी का शारीरिक श्रम से दूर होना और दूसरों के श्रम पर जीने वाला होना है. तुलसी दूसरों के श्रम पर जीने-खाने वाले सामाजिक समूह से हैं. कबीर और रैदास स्वयं श्रमिक रचनाकार हैं.  

रेणु की कहानियों में अन्य प्रगतिवादी लेखकों के मुकाबले जीवन की हाय-हाय कम है और उल्लास कहीं अधिक है तो इसका एकमात्र कारण यह है कि उनके पात्र ही नहीं स्वयं लेखक रेणु भी ठेठ किसान पृष्ठभूमि से आते हैं. खेती से उनका दिल जुड़ा हुआ था. धान की रोपाई और कटाई के वक़्त वह सब कुछ छोड़ कर गाँव पहुँच आते थे और खेतों में भी उतर जाते थे. वही समझ सकते थे कि हिरामन के लिए गाड़ीवानी कितना मायने रखता है. गाड़ी हांकते हुए ही हीराबाई को वह महुआ घटवारिन की गीतात्मक कथा सुनाता  है, जैसे कृष्ण अर्जुन को गीता सुना रहे थे. रेणु को समझना प्रगतिवादियों के लिए इसीलिए मुश्किल रहा कि उन्हें साहित्य के पारम्परिक ढांचों में रख कर परखना किसी केलिए भी संभव नहीं होता.


(तीन)
ठेठ प्रगतिवादी तबियत के आलोचकों को रेणु-साहित्य शायद इसलिए भी नहीं भाया  कि रेणु ने सपाट मार्क्सवादी समझ की कोई परवाह नहीं की, किन्तु जैसा कि इटालियन मार्क्सवादी चिंतक अंटोनिओ ग्राम्शी  ने सांस्कृतिक वर्चस्व की चुनौतियों का अनुमान किया था, रेणु ने भी बिना  ग्राम्शी  के लेखन से परिचित हुए इस पर अपने तरीकों से विमर्श किया. रेणु का लेखन इसे बिना कोई वैचारिक  बैनर लगाए रेखांकित करता है.  रेणु ने  सांस्कृतिक वर्चस्व की चुनौतियों को न केवल गंभीरता से समझा, बल्कि उनका मुकाबला भी किया था. ऐसा मुकाबला प्रेमचंद ने भी किया था. लेकिन रेणु  प्रेमचंद से एक कदम आगे आते हैं. यह शायद इसलिए कि प्रेमचंद के मुकाबले के रेणु के समय सामाजिक-राजनीतिक स्थितियां अधिक साफ़ थीं. रेणु जब युवा ही थे. देश को औपनिवेशिक गुलामी से आज़ादी मिल गयी थी. राष्ट्रीय आंदोलन के सिमट जाने से दूसरे प्रश्न अधिक स्पष्टता से उभर आये थे, रेणु का वर्णित लोक बहुत सीधा-सादा नहीं है, बहुत कुछ राजनीतिक भी है. यह ठीक है कि वह अनपढ़ है, किन्तु जीवन की पेंचीदगियों को समझने में अक्षम और अपनी अस्मिता के प्रति लापरवाह कदापि नहीं है. जनतांत्रिक समाज में उसे केवल वोट करने का अधिकार मिला है, लेकिन उसे इस बात की प्रतीति हो गयी है कि पुरोहितों, ज़मींदारों और महाजनों का जमाना कानूनन जा चुका है. अपनी बहुआयामी अस्मिता की परवाह उन्हें भी खूब है.  

जीवन में रोटी का अपना महत्व है, इसे वे समझते हैं, लेकिन वही सब  कुछ नहीं है.  किसी प्रगतिवादी कहानीकार की तुलना में उनकी कहानियों में सर्वहारा जनमन की धड़कन हम अधिक विश्वसनीयता से सुन सकते हैं. 'ठेस' कहानी का सिरचन कलाकार है. रेणु के शब्दों में

'जाति का कारीगर'. थोड़ा मुंहजोर है, लेकिन कामचोर नहीं. मोथी और पटेर जैसे घासों से एक से एक खूबसूरत शीतलपाटी, पटेर और आसनी बनाता है. उसकी कलाकारी मशहूर है. लेकिन इस लोक-शिल्पी की भी इज़्ज़त है, आत्मसम्मान है. उसे दौलत नहीं चाहिए. प्रेम से सुस्वादु भोजन मिल जाय और पान का बीड़ा ; फिर तो उसके शिल्प का कमाल कोई देख ले. मानू के घर अपमानित  सिरचन अपनी छुरी-हंसिया लेकर उठ जाता है. नहीं होगा उससे काम. लेकिन मानू के पान के बीड़े को वह कैसे भूल सकता है. विदा होते समय स्टेशन पर वह सारी फरमाइशें पहुंचा जाता है– 'सब चीज है दीदी ! शीतलपाटी, चिक और एक जोड़ी आसनी, कुश की.

मानू मोहर छाप वाली धोती का दाम देने लगती है, सिरचन जीभ को दाँत से काट कर दोनों हाथ जोड़ लेता है. उसे इनाम नहीं चाहिए. मानू बहन को वह उदास नहीं कर सकता. उसकी चाची ने उसे अपमानित किया है, उसने नहीं. और ऐसे में मानू क्यों नहीं फूट-फूट कर रोने लगे ! कुछ ऐसा ही हाल 'संवदिया' के हरगोबिन का है. रेणु के सर्वहारा पात्र आर्थिक स्तर पर भले निर्धन  हों, सांस्कृतिक स्तर पर अत्यंत संपन्न हैं. प्रेमचंद के घीसू-माधव यदि रेणु के यहाँ नहीं मिलते तो इसके कारण हैं.

'लाल पान की बेगम' की बिरजू की माँ कितनी छोटी-सी इच्छा पालती है. उसे बस अपनी बैलगाड़ी पर बैठ कर नाच देखने जाना है. उसका शौहर आने वाला है. आया नहीं है. इंतज़ार में वह चिड़चिड़ा हो रही है. जंगी की पतोहू के 'लाल पान की  बेगम ' का  कटाक्ष झेलती बिरजू की माँ का तन मन जुड़ा जाता है, जब उसका शौहर गाडी लिए आ जाता है. उदार बनी बिरजू की माँ जंगी की पतोहू (बहू) को भी गाडी पर निमंत्रित कर बैठाती है. यही तो जीवन है. भूलो और आगे बढ़ो. अपने दोनों बच्चों बिरजू और चम्पिया के संग वह  जंगी की पतोहू के साथ गीत गाना चाहती है. रेणु का चित्रण देखिये- 

'बिरजू को गोद में लेकर बैठी उसकी माँ की इच्छा हुई कि वह भी साथ-साथ गीत गाये. बिरजू की माँ ने जंगी की पतोहू की ओर देखा, धीरे-धीरे गुनगुना रही है वह भी. कितनी प्यारी पतोहू है ! गौने की साड़ी से एक खास  किस्म की गंध निकलती है. ठीक ही तो कहा  है उसने ! बिरजू की माँ बेगम है, लाल पान की बेगम. यह तो कोई बुरी बात नहीं है. हाँ, वह सचमुच लाल पान की बेगम है.'

 
'ठुमरी' में जितनी कहानियां संकलित हैं, उनमें रेणु लोक-रंग और जनजीवन में अधिक निमग्न दिखते हैं. उनके पास इतना कुछ कहने  के लिए है कि आश्चर्य होता है. रेणु ने इतना  कुछ कहाँ देखा, जिया और संजोया. 'तीसरी कसम' में गाड़ीवानों की ज़िंदगी को उनने जितनी आत्मीयता से उकेरा है, उसे देख कर आश्चर्य होता है, यह सब लेखक के अनुभव में आया कैसे? वही रेणु जब सिरचन और फुलपत्ती या हरगोबिन की कहानी सुनाते हैं तब हम दांतो तले ऊँगली दबाते हैं. लेकिन आश्चर्य कई  गुना बढ़ जाता है, जब लेखक रेणु राजनीतिक मिथ्याचारों की बखिया उधेड़ने लगते हैं. मैंने पहले ही लिखा है कि 1955 से 1960, उनके लेखन  का उत्कर्ष-काल है. इस बीच उनके राजनीतिक सरोकार हाइबरनेशन अथवा शीतनिष्क्रियता में चले गए थे. लेकिन ये प्रश्न उन्हें लगातार परेशान भी करते रहे. उनके लेखन में भी ये सवाल खूब मिलते हैं. सब जानते हैं रेणु लेखक होने के पूर्व एक राजनीतिक कार्यकर्त्ता थे. वह उस बिहार से थे, जहाँ 1934 में ही कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन हो चुका था और जहाँ का  समाजवादी आंदोलन मजबूत स्थिति में था. युवा रेणु इस आंदोलन के हिस्सा रहे थे. उन्होंने पड़ोसी मुल्क नेपाल में भी क्रांति  की धजा फैलानी चाही थी, हालांकि आरम्भ से ही रेणु राजनीतिक तिकड़म-धंधों के विरूद्ध रहे. राजनीतिक दल में कार्यकर्ताओं, जो एक समय वह स्वयं थे, की अस्मिता के लिए वह आजीवन चिंतित रहे. 

हिंदी लेखकों में राजनीतिक दिलचस्पी और सक्रियता रखने वाले यशपाल और राहुल जी भी रहे, लेकिन रेणु ने जिस तरह  राजनीति को समझा था दूसरा कोई नहीं समझ सका. आज़ाद भारत के समाज में राजनीतिक कार्यकर्त्ता एक नया वर्ग  था, बहुत कुछ औद्योगिक मजदूर वर्ग की तरह. इसे समझने के लिए कोई लेखक नहीं था. रेणु ने इसे अपना विषय  बनाया था. 1945 में लिखी उनकी एक कहानी है 'पार्टी का भूत'. इस कहानी में एक राजनीतिक कार्यकर्त्ता जाने कितने तरह के सवालों से जूझ रहा होता है. लेकिन राजनीतिक कार्यकर्त्ता के दर्द को 1965 में लिखी गयी एक कहानी 'आत्मसाक्षी' में जिस तरह रखते हैं वह किसी को भी अतिरिक्त रूप से संवेदित कर जाती है. 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का दो भागों में विभाजन हो जाता है. इसमें कम्युनिस्ट पार्टी का एक आम कार्यकर्त्ता गनपत अपने को इतना अकेला और असहाय पाता है कि पूरी राजनीति से ही उसका मोहभंग हो जाता है. 'उसको पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया है.वह पार्टी ऑफिस में ही रहता भी है, क्योंकि उसका कोई घर-बार नहीं है. पार्टी ऑफिस को उसने खुद खड़ा किया है. लेकिन अब उसे खाली करने के लिए कहा गया  है. 

पिछले तीस-पैंतीस  वर्षों से पार्टी के लिए डफली बजा-बजा कर भीख मांगने वाला और प्रचार करने वाला गनपत अचानक यह महसूस करता है कि वह गलत रास्ते पर था. 

"परिवार, जाति, धर्म, समाज और हर अन्याय-अत्याचार से हमेशा लड़नेवाला लड़ाकू गनपत आज अखाड़े में हारे हुए पहलवान की तरह पड़ा हुआ है. सभी उसकी पीठ पर एक लात लगा कर, गाली देकर चले जाते हैं...पैंतीस साल तक साधु-संन्यासियों की तरह लँगोटबंद रहकर जीभ-मुँह और मन में लगाम लगा कर, उसने पब्लिक का काम किया. किसी का एक तिनका न चुराया, न पार्टीका एक पैसा गोलमाल किया. माँ-बाप, भाई-बहन, गाँव-समाज और परबतिया से भी बढ़ कर पार्टी और पार्टी के झंडे को प्यार किया. सब बे-का-र..! गनपत को लगता है कि चाँद-सूरज में भी दरार पड़ गयी है. दुनिया की हर चीज दो भागों में बँटी हुई-सी लगती है. हर आदमी के दो टुकड़े, दो मुखड़े और दरका हुआ दिल !..जिन बातों को आजतक पूंजीपतियों और साम्राज्यवादियों की और जंगबाज़ों की बात समझ कर अनसुनी कर देता  था, आज वे ही बातें बार-बार याद आती हैं.." 

उसके भीतर से सवाल फूटते हैं- 

"गनपत, तुम्हारे लीडर लोग, यानी तुम्हारी पार्टी, जाति और धर्म को अफीम कहती है. मगर तुम्हारे लीडर लोग अपने बच्चे-बच्चियों की  शादी किसी दूसरी जाति में क्यों नहीं करते ? लड़के की शादी में कॉमरेड रामलगन सरमा ने पचीस हज़ार रुपये तिलक में गिनवा लिया. तुम्हारे लीडरों के बच्चे दार्जिलिंग और देहरादून में पढ़ते हैं. तुम्हारे सेक्रेटरी  की बीवी कांग्रेसी-मिनिस्टर होने के लिए जाति की गुटबंदी करती है. तुम्हारे…"

गनपत का मोहभंग एक पूरे राजनीतिक ढाँचे-से मोहभंग है, जिसे दलीय-जनतंत्र कहा जाता है. हर दल में लीडर पुरोहित, सामंत या पूंजीपति की तरह निरंकुश हो गया है. कार्यकर्ताओं की स्थिति सर्वहारा मज़दूरों से भी बदतर हो चुकी है. रेणु स्वयं इस स्थिति में वर्षों रहे, ऐसा अनुमान किया जा सकता है. 'आत्मसाक्षीके बाद उन्होंने कोई महत्वपूर्ण कहानी नहीं लिखी, हालांकि उनकी कई कहानियां उसके बाद भी प्रकाशित हुईं. राजनीतिक रूप से भी रेणु इस बीच शिथिल रहे. लेकिन इस बार उनका सचमुच हाइबरनेशन था. 1974 में बिहार में थके-हारे और कभी उनके आदर्श रहे समाजवादी जयप्रकाश नारायण ने जब सम्पूर्ण-क्रांति का आह्वान किया, तब रेणु मानो उसका इंतज़ार ही कर रहे थे. दलविहीन जनतंत्र की सैद्धांतिकी रेणु को निश्चित ही अपने करीब लगी होगी. इसकी पृष्ठभूमि उनके मन में लम्बे समय से विकसित हो रही थी. यह अलग बात है कि जेपी आंदोलन की विफलता और उसके मिथ्याचार को लेकर वह चुप नहीं रहते. उस आंदोलन के घोर दक्षिणपंथी रुझानों पर भी उनकी नजर होती ही होती.

पूरे राजनीतिक उपक्रम में विचारों का संकट एक अलग प्रसंग है. इस पर राजनीतिक दार्शनिकों को चिंता करनी होती  है. लेकिन कार्यकर्ताओं की तकलीफों और दलों में उभर रहे पाखंडों पर तो लेखक को नजर रखनी ही होगी. हिंदी में यह काम बहुत कम लेखकों ने किया है. इसलिए रेणु अधिक महत्वपूर्ण दिखते हैं.

रेणु अपनी कहानियों द्वारा हमारी चेतना का एक नया आयाम विकसित करते हैं. उनका  साहित्यिक नजरिया हिंदी साहित्य के सामान्य नजरिये से तनिक भिन्न है. उस पर बंगला साहित्य-संस्कृति के प्रभाव को अनदेखा  नहीं किया जा सकता. लेकिन ध्यान देने की बात है कि शरतचंद्र और रवीन्द्रनाथ दोनों महार्घ साहित्याचार्यों  को वह एक साथ आत्मसात किये प्रतीत होते हैं. रवीन्द्र ने जब पहली दफा ही यूरोप की यात्रा की थी तब महसूस किया था कि वहां औद्योगिक क्रांति ने सरंजाम चाहे जितने विकसित किये हों, उसने मनुष्य के सुकून को हर लिया है. इसके मुकाबले उनके बंगाल में गरीबी चाहे जैसी हो बाउल गीत भी हैं. रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने साहित्य में मनुष्य के इस राग  को बचाये  रखने  की कोशिश की. रेणु ने निःसंदेह  इस परंपरा  को अपने तरीके  से आगे बढ़ाने की कोशिश की. इसी तरह प्रेमचंद से उन्होंने मिहनतक़श तबके से जुड़ने  की परंपरा को आत्मसात किया. यही  कारण है  कि  आर्थिक और सामाजिक रूप से उत्पीड़ित और शोषित तबके की जितनी छवियाँ रेणु की कहानियों में मूर्तमान हुई हैं, उतनी शायद ही किसी दूसरे हिंदी लेखक की कहानियों में हुई हैं. वह इंगित करते हैं गाँव-कस्बों और धूल में पड़े ये अनमोल अपरूप ही भविष्य के भारत के असली नायक होंगे. हिरामन, पँचकौड़ी, हरगोबिन, सिरचन आदि ही नए भारत और उसके जनतंत्र का इतिहास रचेंगे. 

रेणु के पात्र न तो गंवार हैं, न ही अबोध. वे पूरी तरह सचेष्ट हैं. सामाजिक-आर्थिक बदलावों पर उनकी नजर है. सामाजिक गतिकी को रेणु सूक्ष्मता से समझते-बूझते हैं. उनका जन, उनके पात्र असहाय और रहम के पात्र नहीं हैं. रेणु अपने पात्रों से एकात्म हैं, वह उसके लिए तनिक भी बाहरी नहीं  हैं. यही रेणु की विशेषता है. उनकी कहानियों पर विमर्श करते हुए, हमें इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए.
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प्रेमकुमार मणि 
9431662211

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  1. सत्यदेव त्रिपाठी30/5/20, 10:29 am

    मणि जी,
    प्रगतिवादियों के लिए रेणु को समझना मुश्किल इसलिए नहीं रहा कि उनका ज्ञान किताबी रहा...बल्कि इसलिए कि विश्व में मार्क्सवाद चाहे जितना समझ वाला दर्शन-चिंतन रहा हो, अपने देश के (अधिकांश) मार्क्सवादी कभी इतने समझदार नहीं हुए कि 'आत्मसाक्षी' लिखने वाले को स्वीकार पायें। यह 'सब ते कठिन जाति अपमाना' वाला नाक़ाबिले बर्दाश्त मामला है।
    ऐसे मुद्दों को उस तरह आपने भी नहीं लिया - 'भित्ति चित्र की मयूरी' जैसी कहानी की आज की ज्वलंत प्रासंगिकता की तरफ संकेत तक न कर सके। अमूमन किसी कहानी के खास मर्म की तरफ दृष्टिपात न कर सके, जो नया और मानीखेज़ हो।
    उदादरण के लिए कुंवारी लड़की से देवर की शादी की ज़िद के सामाजिक निहितार्थ की तरफ नज़र न गयी। वह भाभी का प्रेम-इज्जत भर नहीं - बेखुदी बेसबब नहीं गालिब...!! इसी तरह देथा जी से तुलना... दोनो दो चीजें हैं। देथा लोक को प्रकाशित करते हैं, रेणु उद्घाटित करते हैं। वे लोक कथाकार हैं, ये ग्राम कथाकार हैं। दोनो की कला 'को बड़ छोट कहत अपराधू' है।
    फ़िल्म से कहानी का रस पाना भी आत्म मोह या बेजा मांग है। वह अपना रस देती है। और ठीक से फ़िल्म देखने के बाद जो गहरे उदास न हो जाये - रस बिसेस पावा तिन नाहीं...। बासुदा-शैलेन्द्र-रेणु की तिकड़ी ने कहानी नहीं बनाई है, कहानी पर फ़िल्म बनाई है। उसके मर्मों को खोलने के लिए नये पात्र भी सिरजे हैं, नये दृश्य भी बनाये हैं। पाठक ही नहीं, दर्शक के लिए भी कहानी खुलकर 'निर्गुन ब्रह्म सगुन भये जैसा' की तरह खिल गयी है...
    सभी कहानियों में ऐसे अनन्त भाव व अतल गहराइयां हैं - थहाते जाना है...
    बहरहाल, इस रस्मी मौके पर याद कराने के लिए छापक-लेखक को बधाई तो बनती है...

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  2. अनुराधा गुप्ता30/5/20, 10:32 am

    रेणु पर हाल फिलहाल पढ़े लेखों में एक अलग दृष्टि से सम्पन्न बेहतरीन लेख। हालांकि प्रेमकुमार जी की एक दो बातों से असहमति है मेरी। एक ..सुरजन जैसे स्वाभिमानी, अपने काम की इज़्ज़त और अहमियत की ठसक रखने वाले कामगार पात्र में 'स्व' की चेतना को सांस्कृतिक उत्कर्ष समझना..और पुनः कफ़न के पात्रों माधो और बुधिया को सिरजने के प्रेमचंद के उद्देश्य को नकारात्मक रूप में लेना। ये मेरी समझ है। उनसे विस्तार में बात हो तो शायद चीजें और स्पष्ट हो पातीं। फिलहाल Premkumar Mani जी को और अरुण जी को हार्दिक बधाई ..सुबह -सुबह इससे अच्छी दिमागी ख़ुराक क्या होगी! शुक्रिया।

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  3. रवि रंजन30/5/20, 5:40 pm

    बगैर सिद्धांत बघारे प्रेमकुमार माणि जी ने रेणु की कहानियों के मूल पाठ को केंद्र में रखकर जैसा विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत किया है,वह एकाध अपवाद को छोड़कर शायद अकादमिक जगत के महानुभावों के वश का नहीं है।
    इस आलेख की सबसे बड़ी खूबी यह है कि माणि जी का विश्लेषक एक ही साथ अकादमिक और गैर अकादमिक,दोनों तरह के पाठकों को सम्बोधित कर रहा है।
    यहां इस बात का प्रमाण भी मिलता है कि मार्क्स, एंगेल्स, लुकाच, ग्राम्शी, लोहिया,अम्बेडकर आदि का नामोल्लेख किये बिना भी अच्छी आलोचना संभव है।
    प्रायः रचनाकार दूसरे रचनाकारों पर बहुत कम लिखते रहे हैं और जब लिखते हैं तो क्या होता है,इसे दिनकर और मुक्तिबोध के कामायनी-विवेचन तथा निर्मल वर्मा के रेणु विषयक व्याख्यान/ लेख से गुजरते हुए महसूस किया जा सकता है।
    इस आलेख में भी विजयदान देथा और रेणु की तुलना शायद ज़रूरी नहीं थी।
    बहरहाल, रेणु शताब्दी वर्ष में Premkumar Mani जी से रेणु जी के उपन्यासों पर भी एक आलेख की गुजारिश है और उम्मीद है कि Arun Dev उनसे यह रचनात्मक काम करवा लेंगे।

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  4. 'ज्यों-ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जल होये'। जैसे-जैसे वक़्त गुज़रता जाएगा और रेणु को हम जितनी बार पढ़ते जाएँगे उनका वैचारिक और सांस्कारिक साहित्य अपने पंचलैटी प्रकाश के उतने प्रकार प्रकीर्ण करते जाएगा और हम एक सर्वथा नवीन-तत्व-बोध से आलोकित होते जाएँगे। बहुत सुंदर प्रयास रेणु को समझने की। बहुत दूर तक सहमत हूँ आपसे, विशेषकर रेणु और पारम्परिक प्रगतिवाद के परस्पर संबंध पर आपकी विवेचना का। बहुत आभार।

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  5. पंकज चौधरी31/5/20, 9:00 am

    मणि जी अपने इस आलेख में पुराने और असली फॉर्म में अवतरित हुए हैं। रेणु जैसे रचनाकारों का मूल्‍यांकन मार्क्‍सवादी या समाजवादी आलोचना पद्धति से नहीं हो सकता। इसको मणि जी ने रेणु की कहानियों के अंशों को कोट करके दिखा भी दिया है1 रेणु जन-गण-मन के असली चितेरे हैं। ग्राम्‍य जीवन के आरोह-अवरोह, उत्‍कर्ष-अपकर्ष, राग-विराग को समग्रता में हमारे सामने रखते हैं रेणु। ‘’तीसरी कसम’’ का हीरामन तत्‍कालीन भारत के गांवों के युवाओं का प्रतिनिधित्‍व करता है। हीरामन जैसा सीधा, सच्‍चा, सरल और सुलभ कैरेक्‍टर को गढ़ना या बुनना कोई मामूली बात नहीं है। वह सब कुछ छोड़ सकता है लेकिन गाड़ीवानी नहीं छोड़ सकता। हीरामन और उसके सर्जक रेणु की यही असाधारणता है। मणि जी ने सही लक्ष्‍य किया है कि कबीर जिस तरह से कपड़ा और कविता बुनते थे, रेणु भी उसी तरह से कहानियां बुनते थे। सबसे महत्‍वपूर्ण बात तो यह कि रेणु की कहानियों का अंडरटोन कास्‍ट आइडेन्टिटी की भी है। भला यह आइडेन्टिटी मार्क्‍सवादी आलोचना पद्धति को क्‍योंकर सुहाएगा? बहरहाल, रेणु की कहानियों को समझने के लिए यह आलेख उल्‍लेखनीय साबित हो सकता है।

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  6. यतीश कुमार31/5/20, 9:02 am

    रेणु कहानियाँ लिखते नहीं, बुनते हैं, जैसे कबीर चादर बुनते थे

    मणि जी का यह लेख विस्तृत और इतना सारगर्भित है कि इसे बार बार पढ़ने की जरूरत है जैसे रेणु को पढ़ने की।
    मैला आँचक पर जब 13 कविताएँ लिख रहा था तब मैं पूरी तरह इनकी लेखनी के गिरफ्त में था
    इस लेख में मणि जी ने लगभग सारी कहानियों को समेटने का सफल प्रयास किया है।साधुवाद आप दोनों को

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  7. शिव किशोर तिवारी31/5/20, 10:15 am

    दो-चार दिन से रेणु की चर्चा हो रही है।इस व्याज से मैं भी दो लाइन लिखता हूँ । रेणु आंचलिक कथा को बांग्ला से लाये। प्रेमचंद के बाद हिन्दी कथा-साहित्य से गांव लुप्त हो गये और रेणु ने उसका उद्धार किया वगैरह बेकार की बातें हैं । रेणु के साहित्यिक गुरु थे सतीनाथ भादुड़ी (1906-65)। उनका आंचलिक उपन्यास 'ढोंढ़ाईचरित मानस' 1949 और1951 में दो खंडों में प्रकाशित हुआ। इसकी पृष्ठभूमि भी मिथिलांचल ही था। इनके पहले बांग्ला में आंचलिक उपन्यास ताराशंकर वंद्योपाध्याय लिख चुके थे - गणदेवता (1943) और पंचग्राम (1944)। इसके भी पहले युवा माणिक वंद्योपाध्याय ने बांग्ला का अमर आंचलिक उपन्यास 'पद्मा नदी का माझी' लिख दिया था (1936) जिसके सभी कथोपकथन एक स्थानीय बोली में हैं । 1956 में (मैला आँचल के बाद) अद्वैत मल्लवर्मन का उपन्यास 'तितास एक नदी का नाम है' आया जिसके सारे कथोपकथन भी बांग्लादेश की एक बोली में हैं । 1951 में ताराशंकर का सर्वश्रेष्ठ आंचलिक उपन्यास ' हँसुली बांक की उपकथा' आ गया था। रेणु का गुणसूत्र इधर से मिलायें, प्रेमचंद से नहीं ।

    रेणु में बंगालीपना बहुत है जिसके नुकसान हैं। प्रेमचंद बुद्धिमान थे। वे शरत् चन्द्र की ऊंची लिखाई को स्वीकार करके भी बोले कि हम धूल-मिट्टी में ही ठीक हैं । रेणु में वह डिस्क्रिमिनेशन नहीं था। बावनदास की मृत्यु के बाद उपन्यास को खींचते जाना इसी का परिणाम है। लगभग पूरा 'परती- परिकथा उपन्यास इस रोग से ग्रस्त है। अधिकतर कहानियां भी।

    ईमानदारी से कहूँ तो मेरी नज़र में रेणु ने दो स्तरीय कृतियाँ लिखीं :
    उपन्यास: मैला आँचल
    कहानी: लाल पान की बेगम

    पर ये दोनों विश्वस्तरीय हैं ।
    (देर रात को लिख रहा हूँ, इसलिए संदर्भ नहीं दे पाया। तारीखें विकिपीडिया से ली हैं । कौन जाने उनमें भी भूल हो)।

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  8. मनोज रूपड़ा1/6/20, 9:38 am

    मणि जी का यह लेख बहुत उम्दा है. यह उतनी ही शिद्दत से लिखा गया है, जितनी शिद्दत से रेणु अपनी कहानी बुनते थे .

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  9. प्रेमकुमार मणि जी का यह लेख सिर्फ रेणु की कहानियों को बारम्बार पढने के लिए प्रेरित नहीं करता बल्कि अकादमिक बोझिलता के बगैर किसी रचनाकार की मनोसामाजिकी के विश्लेषण के सरल ढंग की ओर इशारा करता है .कहते हैं सबसे कठिन होता है जटिल जीवनानुभवों को सरल भाषा में लिख देना ,रेणु की जटिल सरलता के लिए ऐसे ही शोधालेख की ज़रूरत थी .हम सब जीवन की ऊपरी सतह पर ही जीते रह जाते हैं ,डुबकी लगाकर विशिष्ट जीवनानुभवों को पकड़ पाने की क्षमता ही कहाँ बच रही है ,क्षमता हो भी तो समय नहीं है ,और समय हो भी तो भाषिक बाज़ीगरी और देसी -विदेशी सन्दर्भ देने की लालसा रचना के अंतस्तल को स्पर्श कराने ही नहीं देती .अक्सर रचना -आधारित लेख दिल -दिमाग के ऊपर से निकल जाते हैं .मणि जी का लेख ज्ञान -परंपरा से बोझिल किये बगैर आम पाठक से लेकर अतिबौद्धिक को उनकी रचनाओं के निकट ले आता है ,प्रेरित करता है कि बार -बार पढ़ी हुई कहानियों को फिर पढ़े ,कई नज़रियों से -यहीं पर आलोचक की सफलता है कि वह पाठक को उसके 'कम्फर्ट ज़ोन' से बाहर लाकर दिमाग में खलिश पैदा कर अकेला छोड़ देता है रचना के साथ .अरुण देव जी को साधुवाद और प्रेमकुमार मणि जी से बहुत सी अपेक्षाओं के साथ -सादर

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  10. Rashmi Rawat23/6/20, 4:31 pm

    बहुत बढ़िया लेख।
    रेणु जी के साहित्य को सिलसिलेवार और व्यापक ढंग से समझने में परिप्रेक्ष्य बनता है। बाकी गागर में सागर भरने वाले, जीवन के बहुविध रूप को रंग, गंध, ध्वनि, ...में साकार करने वाले रेणु जी की एक एक रचना को लंबे लेख की दरकार है इसलिए समूचे कहानी साहित्य पर बात करते हुए गहराई में जाना और उन परतों को खोल पाना संभव भी नहीं था। हां गहरी डुबकी मारने में सहायता और प्रेरणा जरूर मिलती है। और ये भी बड़ी बात है

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