चन्द्रकान्ता (सन्तति) का तिलिस्म : अनुत्तरित प्रश्न : प्रचण्ड प्रवीर

Posted by arun dev on फ़रवरी 04, 2020












देवकीनन्दन खत्री द्वारा रचित उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ हिंदी में अब एक क्लैसिक की हैसियत रखता है. आलोचना ने जिसे शुरू में तिलस्मी कहकर उपेक्षित किया उसी ने बाद में इसके साम्राज्यवाद विरोधी चरित्र की भी खोज़ की.

गम्भीर विवेचक-आलोचक वागीश शुक्ल की कृति ‘‘चन्द्रकान्ता (सन्तति) का तिलिस्म’ इस कड़ी में नवीनतम और प्रौढ़ हस्तक्षेप है. वागीश शुक्ल फ़ारसी साहित्य के भी विद्वान अध्येता हैं. उन्होंने फ़ारसी और उर्दू दास्तानों से भी इसकी तुलना की है.

रज़ा फाउन्डेशन ने इसे राजकमल के सहयोग से प्रकाशित किया है. हिंदी के अनूठे कथाकार-अनुवादक प्रचण्ड प्रवीर की यह समीक्षा ख़ास तौर पर समालोचन के पाठकों के लिए यहाँ प्रस्तुत है.   




        
चन्द्रकान्ता (सन्तति) का तिलिस्म: अनुत्तरित प्रश्न                       
प्रचण्ड प्रवीर

(वागीश शुक्ल)


ह-रह कर मेरे मन में कुछ अनुत्तरित प्रश्न गूँजते रहते हैं. कई प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं और कई नए प्रश्न खड़े होते रहते हैं. प्रश्नों के अन्तहीन सिलसिले में दो प्रश्न इस तरह से हैं:

पहला: क्या आजादी से पहले भारत में रंगीन कपड़े बहुत मंहगे हुआ करते थे? प्रश्न का सन्दर्भ है गाँधी जी के समय के तस्वीर, और आज से सौ साल पहले के भारत की तस्वीरें, जब कपड़ा ही महँगा हुआ करता था. खादी का आन्दोलन आत्मनिर्भरता का प्रतीक था और पण्डित नेहरू ने गाँधी जी को स्वदेशी तथा खादी के बारे में कहा कि वे इसे गम्भीरता से नहीं लेते. समय बदलने के समय खादी अप्रासंगिक तो हो ही गया है और अब बिना मशीन के सूत कातना बेमानी-सी बात ही नज़र आती है. रंगरेज शब्द जो बहुत सी गीतों में है, जिसने गुलाबी रंग दीना दुपट्टा मेरा, उस रंगरेज की अब हैसियत क्या हस्ती भी नहीं रही. राजस्थान में जहाँ लोग सदियों से लाल-पीले कपड़े पहनते आ रहे हैं, वहाँ क्या स्थिति रही होगी? अगर रंगीन कपड़े हर समय उपलब्ध थी तो क्या गाँधी जी के अनुयायियों को रंगीन कपड़ों से चिढ़ थी, या श्वेत श्याम तस्वीरें होने के कारण सभी कुछ काला-सफेद दिखता है? सौ साल पहले की बात कौन ठीक-ठीक बता सकता है?

दूसरा: खजुराहो के मन्दिरों में जहाँ विष्णु के मंदिर, शिव के मंदिर, यहाँ तक के जैन मन्दिर आदि भी एक ही तरीके से बने हुए हैं. वहाँ के मन्दिर निर्माण की शास्त्रीय विधि के अनुसार – अर्द्धमण्डप, मण्डप, महामण्डप और गर्भगृह जिस तरह सारे उपासना स्थलों के लिए थे, अगर वह परम्परा अक्षुण्ण रहती तो क्या वे मूर्तिकार सर्वसमन्वयी भाव से प्रेरित हो कर मस्जिद भी उसी तरह बनाते जिसमें गर्भगृह में शून्य होता किन्तु उसके ऊपर गुम्बद न हो कर पिरामिड जैसा ही आकार होता. क्या वह इस्लाम में स्वीकार कर लिया जाता? क्यों अथवा क्यों नहीं?

इन दो प्रश्नों के उत्तरों की खोज तो चलती रहेगी. इसी तरह फिलहाल मूर्धन्य और विलक्षण विद्वान तथा आलोचक श्री वागीश शुक्ल की आलोचनात्मक रचना 'चन्द्रकान्ता (सन्तति) का तिलिस्म कई प्रश्नों का उत्तर देती है तो साथ ही कई नये प्रश्न खड़े करती है.
हिन्दी साहित्य के इतिहास में बाबू देवकी नन्दन खत्री विरचित चन्द्रकान्ता, चन्द्रकान्ता सन्तति और भूतनाथ के दास्तानों को उपेक्षित किया जा सकता है किन्तु नकारा नहीं जा सकता. सन् १८८८ में चन्द्रकान्ता के छपने के सिलसिले के साथ १८९४ से १९०५ तक चन्द्रकान्ता सन्तति का मासिक पत्रिका में नियमित छपना चालू रहा. सन्तति पर उस समय प्रकाशित एक टिप्पणी इस तरह है:


चन्द्रकान्ता-सन्तति का दूसरा भाग इस विषय पर हिन्दी में रची जा रही एक महान् कथाकृति की वर्तमान कड़ी है. इस भाषा में यह अपने तरह की अकेली रचना है और लोग इसे बहुत पढ़ते तथा पसन्द करते हैं. जब यह पूरी हो जायेगी तब यह उर्दू कथा-साहित्य की दो महाकाय कृतियों: बोस्तान+ए+ख़याल और दास्तान+ए+अमीरहम़जा– से मुक़ाबिला करेगी. इस (चन्द्रकान्ता-सन्तति) की यह विशेषता है कि इसमें वे अश्लीलताएँ नहीं हैं जो इसके प्रतिद्वन्द्वी प्रकाशनों (दास्तान+ए+अमीरहमज़ा और बोस्तान+ए+ख़्याल) में हैं.
(पृष्ठ १३, चन्द्रकान्ता (सन्तति) का तिलिस्म)
 
बाबू देवकीनन्दन खत्री दिवंगत होने से पहले भूतनाथ के शुरुआती भाग लिख चुके थे, जिसे उनके पुत्र ‘दुर्गाप्रसाद खत्री’ ने पूरा किया. प्रेमचंद की जीवनी पढ़ते समय हम यह सीख कर बड़े हुए कि उनसे पहले साहित्य में केवल जादू-टोना और तिलिस्म था. प्रेमचंद ने बारह वर्ष की आयु में ही दास्तान+ए+अमीरहमज़ा की पाँचवी जिल्द ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ पढ़ लिए थे, जिसे कि हिन्दुस्तान में ही लिखा गया था. आज वैसे भी कोई-कोई ही चन्द्रकान्ता पढ़ता है. अभिजात्य और पढ़े लिखों में हिन्दी पढ़ना-पढ़ाना पहले ही की तरह गौण है, इस हिसाब से यह प्रश्न भी बना रह जाता है कि हिन्दी साहित्य भी संस्कृत साहित्य भी अमरीकी विश्वविद्यालयों की शोध का विषय मात्र बन कर रह जाएगा? वे ही हमें बताएँगे कि कौन-सा साहित्य कितना ‘धार्मिक’, ‘अभिजात्य’ और ‘पठनीय’ है? मुझे इसमें ज़रा भी आश्चर्य न होगा कि देवदत्त पटनायक या अमीष त्रिपाठी, या फिर सलमान रश्दी ही चन्द्रकान्ता का अंग्रेजी पुनर्व्याख्यान लिख दें और वह ५०० करोड़ की बजट की हॉलीवुड फिल्म बन कर आएगी, फिर भारत के लोग चन्द्रकान्ता अंग्रेजी में पढ़ने लगेंगे, किन्तु उनकी सोच का पैमाना वही होगा जो कि पाश्चात्य विमर्श निकला पूर्वाग्रह होगा.
 
वागीश शुक्ल की आलोचना की किताबें: छन्द छन्द पर कुङ्कुम : निराला की राम की शक्ति पूजा (प्रभात प्रकाशन, २००२), साहित्य समालोचन पर विचारात्मक निबन्ध संग्रह – शहंशाह के कपड़े कहाँ हैं (वाणी प्रकाशन, २००६) और चन्द्रकान्ता (सन्तति) का तिलिस्म (राजकमल प्रकाशन, २०१९) – हिन्दी आलोचना के लिए अविस्मरणीय प्रतिमान हैं.
      
इसके अतिरिक्त वागीश शुक्ल के लेख समग्रता से पढ़े जाने चाहिए. 'शकुन्तला पर रोमिला थापर' नाम से उनका अंग्रेजी निबन्ध रोमिला थापर की चालाकियों भरी प्रस्थापनाओं का खण्डन ऐसा है जिसका प्रतिखण्डन या इसके बाद रोमिला थापर का मण्डन करने की चेष्टा कहीं दिखायी नहीं पड़ती. जहाँ तक मेरी जानकारी है कि रोमिला थापर ने इस पर कभी कोई वक्तव्य दिया भी नहीं, और दे भी नहीं सकतीं. परन्तु हिन्दी के दलित विमर्श में रोमिला थापर की स्थापनाओं को लिया जाता है, क्योंकि यह पूर्वाग्रहों का समर्थन करते हैं. 

(https://groups.google.com/forum/#!topic/samskrita/T8T3OofH3Fg, https://www.dailypioneer.com/2015/sunday-edition/revisiting-abhijnanasakuntalam.html)
 
चन्द्रकान्ता, चन्द्रकान्ता सन्तति, भूतनाथ– हिन्दी साहित्य का ऐसा मुकाम है जिस को अनदेखा कर के चलने में सुविधा मानी जाने लगी है. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, जिनका योगदान मध्यगुगीन काव्यों को हिन्दी तक लाना माना जाना चाहिए, उन्होंने चन्द्रकान्ता को साहित्य की कोटि से बाहर रखा. आधुनिक हिन्दी की वामपंथी मूल्यों वाले राजेन्द्र यादव ने चन्द्रकान्ता की भूमिका का शीर्षक – 'दयनीय महानता की दिलचस्प दास्तान' रखा. वे लिखते हैं :

...आज हमारे पास न तो इस समीक्षा की समझ का मानकीकरण है, न मुहावरे... शायद औजार तो हैं ही नहीं! हम या तो काव्यशास्त्र के औजारों से काम चला रहे हैं, या दर्शन-शास्त्र की बारीकियों में घुस जाते हैं. मानवीय अस्तित्व और नियति को समझने के लिए हर शास्त्र या ज्ञान अनिवार्य है, लेकिन हर विधा का अपना एक मुहावरा होता है और वह पूरे परिपेक्ष्य के विचार, पुनर्विचार से ही उभरकर आता है – दार्शनिक प्रतिपत्तियाँ, राजनैतिक स्थितियाँ या समाजशास्त्रीय सूक्तियाँ समझ को धार और शक्ति दे सकती हैं, खुद साहित्य का स्थानापन्न नहीं हो सकती. (पृष्ठ दो, चन्द्रकान्ता, राजकमल पेपरबैक्स)

रस-सिद्धान्त में यह फिट नहीं होती थी और साहित्यिक उन्नासिक (स्नॉब) वर्ग ऐय्यारी-तिलिस्मी और घटाटोप घटना-प्रधान शुद्ध मनोरंजनाग्रही उपन्यास को अपनी चिन्ता के लिए अछूत समझता था. (पृष्ठ तीन, चन्द्रकान्ता, राजकमल पेपरबैक्स)
     
इन टिप्पणियों में यह चलताऊ विचार आसानी से पकड़ में नहीं जाते हैं, कि साहित्य में जीवन होना चाहिए. यहाँ जीवन का अर्थ 'रोजमर्रा के अनुभव', 'व्यक्तिगत अनुभव' या राजनैतिक पार्टी के द्वारा चलाए गए एजेंडे का समानुभव होने चाहिए, ऐसा न हुआ साहित्य तो केवल विचार है. रोमिला थापर की शकुन्तला, जैसा कि हम वागीश शुक्ल के बृहद लेख में देखते हैं, एक गैरजिम्मेदार अंग्रेजी अनुवाद के बेईमानी भरी प्रस्थापनाएँ हैं. ऐसा ही कुछ राजेन्द्र यादव की भूमिका में भी मिलता है, जिसमें दास्तान-ए-अमीर-हमज़ा और बोस्तान-ए-ख़याल का जिक़्र उतना भर ही है जितने अपना एजेंडा फिट किया जा सके.
     
इसी तरह रस सिद्धान्त में अंगी रस की अवधारणा परिस्फुटित न होने से काव्य समालोचना में रस सिद्धान्त के फिट न होने का सवाल उसके अन्यथा समझने से ही होता है. मैं समझता हूँ कि रस सिद्धान्त की दोयम दर्ज की व्याख्या जो डॉ. नगेन्द्र ने अपनी पुस्तक (रस-सिद्धान्त –  १९६४) में की है, जिस ले कर विचारक दया कृष्ण ने अपने लेख (Rasa: The Bane of Indian Aesthetics, Contrary Thinking: Selected Essays of Daya Krishna, Oxford University Press, 2011) जो आपत्तियाँ उठायीं हैं वह सब चलताऊ हैं और अन्यथा ही हैं. हिन्दी के ऐसे बड़े व्याख्याताओं के कच्चे कामों ने साहित्य और समालोचना को बहुत क्षति पहुँचायी है.
 
प्रस्तुत पुस्तक के पहले अध्याय में वागीश जी स्पष्ट करते हैं वे चन्द्रकान्ता विमर्श में स्वर्गीय राजेन्द्र यादव, प्रो. प्रदीप सक्सेना, फ़्रांचेस्का ओर्सिनी, आर्थर डडने, एलिसन बुश, दीक्षा गजभिये आदि के विचारों की कड़ी में प्रशंसक होने के नाते कुछ जोड़ना चाहते हैं.
        
मैं इस किताब को राजेन्द्र यादव की प्रतिस्थापनाओं के सुविचारित उत्तरों की तरह देखना पसंद करता हूँ. वे प्रतिस्थापनाएँ कुछ इस तरह से हैं:
      
. ‘केओस’, मूल्यों का जैसे घपला.... इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि उस समय का आदमी चन्द्रकान्ता के कथ्य की तरह बिना अपनी जमीन ओर जीवन-पद्धति छोड़े हुए ही आधुनिक सुख-सुविधाएँ पा लेना चाहता हो– (पृष्ठ दो, चन्द्रकान्ता, राजकमल पेपरबैक्स)
 
. बड़ी किताबों के घोषित लक्ष्य आज बहुत अजीब, निर्विशिष्ट और हास्यास्पद लगते हैं. केवल एक अपवाद है और वह है कार्ल मार्क्स; उसे पता था कि वह अपनी किताब से दुनिया के नक्शे को कहाँ और किस आधारभूत स्तर पर बदलने जा रहा है. (पृष्ठ तीन, वही)
 
३. चन्द्रकान्ता अपनी पराजय का इक़बाली-बयान ही नहीं, बल्कि सामन्ती शौर्य की घनघोर असफलता के बाद बौद्धिक चातुर्य की दिशा में एक अचेतन प्रयोग है... यानी भौतिक सामर्थ्य की व्यर्थता के बाद बौद्धिक श्रेष्ठता साबित करने का एक काल्पनिक और कमजोर प्रयास... (पृष्ठ नौ, वही)
 
४. चन्द्रकान्ता के नायकों के उद्देश्य बहुत ही भौतिक और सांसारिक हैं. यानी तिलिस्मों के भीतर दबी, सुरक्षित अकूत-अथाह दौलत को प्राप्त करना – दोस्त और दुश्मन इसी से तय होते हैं और इसी मूल कथानक में तिलिस्म में चकाचौंध कर डालने वाले करिश्में ऐयारों की दाँतों तले उँगली दबाने वाली साँस रोक हैरत-अंगेज़ कारगुज़ारियाँ हैं. (पृष्ठ दस, वही)

५. सारे कथानक में सबसे प्रमुख और निर्णायक तत्त्व है लालच... इसलिए यहाँ इस सूत्र को पहचानना बहुत मुश्किल नहीं है कि क्यों यह इकहरी परम्परागत दृष्टि सारे उपन्यास में इस सिरे से उस सिरे तक छायी रही. धन-दौलत के लिए ही ये सारे छल-छन्द, मार-धाड़, रातों की भाग-दौड़ या नृशंसताएँ और हत्याएँ हुई हैं. (पृष्ठ बीस, वही)
 
६. बहरहाल, दरबार की नाराजगी और घाटे की असफलता के इसी उत्साहहीन मानसिक माहौल में 'चन्द्रकान्ता' का जन्म हुआ. (बाबू देवकीनन्दन खत्री के व्यक्तिगत जीवन के संदर्भ में) (पृष्ठ बीस, वही)
 
७. संशय, उत्सुकता, चमत्कार, गति यही कुछ तत्त्व चन्द्रकान्ता की रीढ़ हैं. (पृष्ठ सत्ताईस)
 
८. अपने मूल में चन्द्रकान्ता भयानक राष्ट्रीय हीन-भावना से उद्भूत रचना है. (पृष्ठ तीस)
 
९. तिलिस्म के अस्तित्व या कल्पना के पीछे देवकीनन्दन खत्री का अपना तर्क है. ....यह होशियारी भी बरती कि एक ही चाबी या किताब से सारा तिलिस्म न खुले और एक विशेष भाग तक ले जा कर वह तरीका बेकार हो जाये. (पृष्ठ इकत्तीस)
      
१०.  (दीवार-क़हक़हा के सम्बन्ध में ....) बचाव, प्रतिरक्षा और बे-असर इस तिलिस्मी चक्कर से – जो विदेशी टेक्नोलॉजी का भारतीय प्रत्यारोपण मात्र है – बेदाग निकलने की क्रिया; क्या मेरी स्थापनाओं का समर्थन नहीं करती? (पृष्ठ उन्तालीस)
      
११. 'चन्द्रकान्ता' का उद्देश्य चाहे जैसी दिलचस्प मनोरंजक कहानी सुनाना रहा हो और उसके कथानक चाहे जितने कपोल कल्पित हों या उसे तथाकथित ऐतिहासिकता का जामा पहनाया गया हो – उसमें कही भी तत्कालीन राजनैतिक स्थिति सीधे-सीधे क्यों नहीं आती? कथा में साक्षात् किसी भी विदेशी सत्ता का न होना आकस्मिक है या सुविचारित? ...यह सब कहीं-न-कहीं अंग्रेजी शासन और उसके खिलाफ सांस्कृतिक या राजनैतिक प्रतिरोध के रूपक बनकर आये हैं. (पृष्ठ उन्तालीस)
 
१२. चन्द्रकान्ता अपनी स्वायत्तता की स्थापना और किसी भी विदेशी सत्ता के सचेत और निरन्तर नकार की स्वप्नाकांक्षा-भरी कहानी लगती है. (पृष्ठ इकतालीस)
 
मैं समझता हूँ कि वागीश शुक्ल की आलोचना राजेन्द्र यादव और अन्य अध्येताओं के सतही अध्ययन और पूर्वाग्रही निष्कर्षों का खण्डन है. वे राजेन्द्र यादव के साथ-साथ श्रीयुत शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी जैसे मूर्धन्य अध्येताओं की मासूमियत पर नज़र डालते हैं. इस सन्दर्भ में दास्तान+ए+अमीरहमज़ा की पड़ताल करते हुए ‘क्या उर्दू दास्तान साहित्य है?’ – लेख में वे लिखते हैं :
 
यह आश्चर्य और चिन्ता का विषय है कि अमर ऐयार हमज़ा में बख़्तक को ज़िन्दा उबालकर उसका गोश्त नौशीरवाँ और उसके दरबारियों को खिला देता है और हमारे आधुनिक समीक्षक इसे अमर ऐयार की 'शरारतों' में गिनते हैं....यह विशेष खेदजनक है कि श्री शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी जैसे मूर्धन्य अध्येता ने चाणक्य की कूटनीति से अमर ऐयार के अमानुषिक कृत्य को तुलनीय माना है. मुझे इस आलोचकीय धाँधली की कोई व्याख्या इसके अलावा समझ में नहीं आती कि किसी तरह एक ऐसा हम्माम तैयार किया जाय जिसमें अमर ऐयार की बेहूदगियों को ढकेलकर यह कहा जा सके कि इसमें हम सब नंगे ही तो हैं." 
(पृष्ठ ७४-७५, चन्द्रकान्ता सन्तति का तिलिस्म).
 
इसके अलावा वागीश जी ने सश्रम कुछ अनुच्छेदों का तुलनात्मक वर्णन किया है जिससे यह स्थापित करते हैं कि यह साहित्यिक रचना  दास्तान+ए+अमीरहमज़ा और तिलिस्म+ए+होशरुबा के बरअक्स ही लिखी गयी है. हालांकि वह उर्दू दास्तानों में मौज़ूद अश्लीलता से कहीं दूर थी. उस अश्लीलता का भी संक्षेप में वर्णन किया गया है जिसे मैं उद्धृत करना आवश्यक नहीं समझता.
(देवकीनंदन खत्री)

मैं समझता हूँ कि अगर किसी भी आदमी को कुछ भी लगातार निरर्थक भी बोलने या करने को छोड़ दिया जाय तो वह शुरुआती उड़ान भरने के बाद अपनी ज़मीन पर उतर आता है. अगर वह लेखक हो तो ‘प्रूस्त’ और ‘ज्वायस’ का प्रलाप तक हो जाएगा. इसी तरह शेक्सपीयर के नाटक से ले कर डॉन किशोते के आख्यान,  दोस्तोव्यस्की के उपन्यासों में जुआरियों, वेश्याओं से ले कर मिर्गी पीड़ित नायक, प्रेमचंद के मातृविहीन नायक और जे. के. रॉलिंग के हैरी पॉटर के जादू में व्यक्तिगत अनुभव, राजनैतिक, सामाजिक व दार्शनिक दृष्टि निकते आते हैं चाहे वह कितना सचेत क्यों न हो.

देवकी बाबू के लेखन में यह राजनैतिक चेतना सुस्पष्ट थी, जिसे प्राय: अनदेखा कर दिया जाता है:
 
खत्री जी ने जिस समय लिखना प्रारम्भ किया, हिन्दी एक राजनीतिक लड़ाई लड़ रही थी जिसका सिर्फ़ एक छोर उस मोरचे से जुड़ता था जिस पर उसे १९०० ईसवी में अदालती कामकाज में देवनागरी अक्षरों में लिखी जाने वाली हिन्दी को मान्यता मिलने के रूप में जीत मिली. हिन्दी में लिखना-बोलना आज भी जोख़िम से ख़ाली नहीं अगर आप यह नहीं साबित करते रहते कि आप अंग्रेज़ी में दक्ष हैं किन्तु जब की हम बात कर रहे हैं तब कार्यालय, न्यायालय और विद्यालय की निचली सीढ़ी पर भी चढ़ने के लिए वह अधिकृत नहीं थी और उसे जो टाट-पट्टी आज बैठने को मिल जाती है वह भी नसीब नहीं थी. (पृष्ठ १८, च० स० क० ति०)

इसी तरह हिन्दी को लोकप्रिय बनाने के ध्येय में वे पारम्परिक सांस्कृतिक सृजनात्मक मानक चुनते हैं. इस तरह वे तिलिस्म की परम्परा को लेते तो हैं, पर दास्तानगोई की अश्लीलता और जादू-टोने को उतार फेंकेते हैं. इस तरह चन्द्रकान्ता की आधुनिक मानकों पर मानववादी आलोचना लंगड़ी है. वह इस बात को नहीं देखती कि तिलिस्मी आख्यान किस तरह से उतर कर आती है. इसके लिए राजेन्द्र यादव की आलोचना सचेत तो है, किन्तु संवेदनशील नहीं है. इस क्रम में यह भी उद्धृत करना ठीक होगा :

हमज़ा का अँग्रेज़ी में अनुवाद आ चुका है और होशरुबा का अँग्रेज़ी अनुवाद छप रहा है किन्तु मैं नहीं समझता कि इन दोनों में किसी का देवनागरी में रूपान्तरण कभी भी सम्भव है – होंगी हिन्दी और उर्दू दो सगी बहनें किन्तु यदि वे दो भाषाएँ मानी जाती हैं तो ऐसा उचित और सकारण है. ज़टली (जाफ़र जटल्ली (१६५८-१७१३) – शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी का लेख देखें –http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00fwp/srf/srf_zatalli_2008.pdf) 

और चिरकीन (शेख बाकर अली चिरकीन -१७९७-१८३२) का काव्य संग्रह, रेख़ती साहित्य और हज़्व साहित्य का बहुलांश, हिन्दी में नहीं छप सकता किन्तु उर्दू में वे 'मुख्य-धारा' से बाहर के ग्रन्थ नहीं माने जाते. (पृष्ठ २८, च० स० क० ति०)
      
कहा जाता है कि चिरकीन मौलिक ग़ज़लें लिखते थे. लेकिन उनकी ग़ज़लें चुरा का दूसरे अपने नाम से पढ़ने लगे. उल्टे किसी ने उन पर ही नकल की तोहमत लगा दी, जिससे वह गुस्से में ऐसे बिफरे कि मल-मूत्र की दुनिया में ही ‘रस’ ढूँढने लगे, सफल भी हुए. और यह आस्वादन किसी परम्परा में सम्मानित भी हुआ. हिन्दी के एक अति महत्त्वाकांक्षी कवि ने हाल में ऐसी कविता भी लिखी, किन्तु वे भी शब्दों के रोज-मर्रा के प्रायोगिक आरूप से बच कर ‘गुदा’ तक ही पहुँच सके. तमाम लिप्साओं के बावजूद ऐसे कवि इससे आगे न बढ़ सकते हैं क्योंकि हिन्दी परम्परा आड़े आती है. आशा है ऐसी रचनाएँ उर्दू में  मुकाम पाएँगी और उसका तर्जुमा आने वाले जश्न-ए-रेख्ता में पढ़ा भी जाएगा.

बहरहाल, उर्दू दास्तानों का तिलिस्म की व्युत्पत्ति करते समय हम मध्ययुगीन सभ्यताओं में तिलिस्म के प्रयुक्त अर्थ तक इस तरह पहुँचते हैं.

इस प्रकार तिलिस्म का मुख्य अर्थ हुआ एक ऐसा जादुई घेरा जिसे मान्त्रिक शक्ति से 'बाँधा' जाता था और जिसका 'तोड़ना' असाधारण मान्त्रिक शक्तियों पर ही निर्भर था. (पृष्ठ ४३)

इस तिलिस्म के बहाने उर्दू दास्तान गढ़े गए. लेकिन अब खाली दिमाग को भी कुछ न कुछ लिखना हो, अंतत: वह अपने मूल लिप्सा (युक्ति रहित संवेदन) या मूल्य (युक्ति से कुछ परे अभीष्ट निर्णय) के विपरीत और सुदूर आयामों में ही झूलेगा. मध्ययुगीन इस्लामिक सभ्यता का लक्ष्य अपने धर्म का विस्तार मात्र था. इसलिए उर्दू दास्तानों ने 'मुसलमान-बनाम-कुफ़्फ़ार' की युद्ध कथा में खुद को प्रस्तुत किया है. इसके नायक ‘लश्कर+ए+इस्लाम’ के मुजाहिद हैं, और दुश्मन कुफ़्फ़ार, जो इस्लाम पूर्व अरबी मूर्तिपूजक हों या ईरान के अग्निपूजक या भारतीय सनातनी. लेकिन तिलिस्म+ए+होशरुबा में यह स्पष्ट रूप से हिन्दू हैं जिनका बलात्कार किया जाता है और इस्लाम के नाम पर जायज़ भी ठहराया जाता है.
 
कुफ़्फ़ार का यह अपमान दास्तानों में तरह-तरह से किया गया है. इन दास्तान में अपनी सारी जादुई ताक़त के बावुजूद, कुफ़्फ़ार कहीं मलमूत्र में लथेड़े जाते हैं तो कहीं समलैंगिक रतिकर्म और अगम्यागमन में लिप्त दिखाये जाते हैं. इन दास्तानों में कुफ़्फ़ार की लड़कियाँ असाधारण कामुकता के साथ लश्कर+ए+इस्लाम के जवानों से पेश आती दिखायी जाती हैं. (पृष्ठ ६६)
 
हालांकि यह सब को भुला कर देखने की सुविधा हमारे आलोचकों में है, इसलिए वह ऐसी बातें देख कर भी चन्द्रकान्ता में उसकी शालीन और शिष्ट प्रतिक्रिया नहीं देख पाने की सुविधा उठाते हैं. इसी तरह चन्द्रकान्ता के तिलिस्म में मुख्य और निर्णायक तत्त्व वह लालच देख पाते हैं. वह पाठ को पढ़ने से यह पता चलता है कि लालच न केवल कुछ बदमाशों का है, बल्कि उनके ‘सामंती मूल्यों’ का भी है. जबकि चन्द्रकान्ता पढ़ने वाला मामूली पाठक भी जानता है कि यह सच नहीं है.
 
वास्तविकता यह है कि न केवल दौलत अपितु स्वयं तिलिस्म ही नायकों के लिए गौण है, वीरेन्द्र सिंह तिलिस्म इसलिए तोड़ते हैं कि चन्द्रकान्ता उसमें कै़द है, और इन्द्रजीत सिंह तथा आनन्द सिंह इसलिए कि वे ख़ुद ही इसमें क़ैद हो गये हैं. दौलत उन्हें मिलती है, इसलिए कि वे सही वारिस हैं, इसलिए भी कि उन्हें तिलिस्म तोड़ने पर ही यह दौलत तो मिलती किन्तु इसका कोई भौतिक और उपभोगपरक महत्त्व अगर है भी तो वह महाराज सुरेन्द्र सिंह से कहे गये इन्द्रदेव के इस कथन से निरस्त हो जाता है – "सच तो यों है कि जितनी दौलत यहाँ हैं, उसके रखने का ठिकाना भी यहीं हो सकता है."  यह दौलत तिलिस्म से बाहर ले जा कर खाने-उड़ाने में ख़र्च करने के लिए बनी ही नहीं है, यह समृद्धि है, देश का अर्थ-बल जो योग्य राजा के हाथों में ही अपना अस्तित्व प्रकट करता है.

यह एक आश्चर्यजनक संयोग है कि खत्री जी जब तिलिस्म का आर्थिक तर्क प्रस्तुत करते हैं तब वे अनजाने ही सही, उसके मूल यूनानी शब्द 'तेलेस्मा' के अर्थ तक पहुँचते हैं: दौलत महज एक धरोहर है, एक थाती तो तिलिस्म द्वारा सुरक्षित रखी जाती है और सही मालिक तक पहुँचती है. वह सही मालिक अपने शारीरिक बल के साथ-साथ अपने नैतिक बल से भी पहचाना जाता है, प्रजापालन, न्यायप्रियता, सुशासन आदि उसमें होने ही चाहिए. (पृष्ठ ४७)
     
इसके बाद भी राजेन्द्र यादव चन्द्रकान्ता (सन्तति) आदि को मूल्यों का घपला कहते हैं. किसी का किसी के प्रति मिल जाना और विश्वासघात की घटनाएँ. जबकि ऐयारों का प्रमुख गुण स्वामीभक्ति रहा. जो भी विश्वासघात है, उसके कथानक में कारण छुपे हुए हैं. इसी तरह बाबू देवकीनन्दन खत्री योग्यता के लिए विक्रमादित्य के खजाने से ले कर ज्योतिष तक सहारा लेते हैं, जो कि आख्यान परम्परा की सांस्कृतिक या सृजनात्मक धरोहर है. वागीश शुक्ल बाबू देवकीनन्दन खत्री की निष्ठा भारत के गौरवशाली अतीत में ढूँढते हैं जिसे राजेन्द्र यादव दयनीय मानते हैं. दयनीय क्यों हैं? क्योंकि हम तो पिट गये हैं! एक बार जो पिट गया वो तो पिट ही गया. और जिसने किसी भी तरह पीट दिया वही हीरो है. इसलिए सारी पाश्चात्य उपलब्धि भौतिक ज्ञान की नहीं, गणित की नहीं, ज्ञान के क्षेत्र की नहीं, अपितु ‘पाश्चात्य सभ्यता’ की उपलब्धि समझी जाती है, भले ही उसकी जड़े कहीं से भी पोषित हों. यह गया हुआ गौरव एक (सांस्कृतिक) तिलिस्म के नीचे दबा हुआ ख़जाना ही है. यह वह भारत है जो कभी 'सोने की चिड़िया' था और जिसकी तिलिस्मी इमारत को अनाधिकारियों ने कुछ समय के लिए चाहे अपने क़ब्ज़े में ले रखा हो, उसके भीतरी दरजों की उन्हें कोई ख़बर नहीं है. (पृष्ठ ४९)
 
रस सिद्धांत अपने मूल में नाटकों से जुड़ा हुआ है. हमें यह मालूम होना चाहिए कि मध्ययुगीन ईसाइयों में और इस्लाम में नाटक खेला जाना कुफ्र माना जाता रहा है. योरोप में पुनर्जागरण के बाद ही नाटकों को पुनर्जीवन और सम्मति मिली, जो पहले वैसी नहीं थी. मैं जानना चाहता हूँ कि मुगलों के दरबार में या उससे पहले लोदी वंश, गुलाम वंश आदि किसी भी इस्लामिक शासन में कोई नाटक कभी खेला गया हो, या किसी मुसलमानी राजा से उसकी सम्मति प्राप्त हो, इसका कोई प्रमाण है?
 
संस्कृत नाटकों में एक प्रकार का नाटक 'भाण' कहलाता है जिसकी यह ख़ूबी है कि इसमें एक ही अभिनेता होता है और उसे नाटक ख़ुद ही करना होता है, किसी दूसरे पात्र का भी संवाद वह "क्या कह रहे हो/रही हो?" से शुरू करके आगे बढ़ाता है. ज़ाहिर है उसे अनेक लोगों की बोली की ही नहीं बात की भी विश्वसनीय अनुकृति उतारनी पड़ती है, साथ ही हाट-बाज़ार, मन्दिर मेला, युद्ध  और राजदरबार, सब अपने अकेले दम पर दिखाना होता है और मजमा इकट्ठा करके उसे बाँधे रखना पड़ता है. मुझे इसमे सन्देह नहीं है कि जिसे हम आज 'भाँड़' कहते हैं, वह इसी 'भाण' से निकला है और ईरान की 'नक़्क़ाली' कला इसी नाटकीय प्रस्तुति से निकली है. इसी 'नक़्क़ाली' से 'दास्तान-गोई' का जन्म हुआ है.... (पृष्ठ ७७)
 
लेकिन दास्तानगोई का मूल संस्कृत नाटक में है, यह हम नहीं जानते हैं. राजेन्द्र यादव की स्थापनाओं का जवाब बड़ा सीधा-सा ही है. देवकी बाबू अँग्रेजों के खिलाफ़ नहीं, सांस्कृतिक मूल्यों के पुनरुत्थान के लिए लिख रहे थे.
 
खत्री जी को उस समय के और हिन्दू लेखकों की तरह ही हिन्दू जाति के उत्थान के लिए ही लिखना था. यह संकल्प इतने से ही प्रकट था कि वे उर्दू में नहीं, हिन्दी में लिख रहे थे. उनके सामने यह विकल्प अवश्य था कि वे अपना उपन्यास 'ऐतिहासिक' बनाते और हिन्दू नायक तथा मुसलमान प्रतिनायक चुनते किन्तु यह उनकी विवेकी बुद्धि का परिचायक है कि उन्होंने यह सरल विकल्प नहीं चुना. और इसलिए जब उन्होंने अपने उपन्यास के लिए दो सर्वथा कल्पित 'मध्यकालीन' राजपूत राजाओं का द्वन्द्व पृष्ठभूमि के रूप में लिया तो उसमें कोई धार्मिक धार देने की सम्भावना भी समाप्त कर दी. यह एक बड़ी सोच का सबूत है अगर हम इसका ध्यान रखें कि उसी समय लिखी जा रही उर्दू दास्तानों का रुख़ हिन्दुओं के प्रति क्या था. (पृष्ठ ८१)

खत्री जी हिन्दू-मुसलमान की अदलाबदली के द्वारा उर्दू दास्तानों की पूरी नक़ल कर ही नहीं सकते थे क्योंके देवों और दैत्यों की लड़ाई में भी सनातन भारतीय पौराणिक वर्णन-परिपाटी उनकी आराधाना और उपासना के आधार पर कोई भेद नहीं करती-रावण उन्हीं वेदों का विद्वान् है जिन वेदों के विद्वान राम के गुरु वसिष्ठ हैं. हिन्दू धर्म ने अपनी सनातन सार्वत्रिकता और सार्वजनीनता को कभी छोड़ा ही नहीं इसलिए उसमें वैसी चाभियाँ ही विकसित नहीं हो सकीं जो हर बन्द दरवाज़ा खोल सकें.

यह शिल्प की सूक्ष्मता है. इसे आलोचकों को हिन्दूवादी आख्यान कहने की सुविधा तो है, किन्तु उनमें इस विवेचना ‘सत्यपरक’ कहने और स्वीकार करने का साहस न हो.
वागीश शुक्ल बड़ी सूक्ष्मता से यह स्थापित करना चाहते हैं कि सम्भवत: बाबू देवकी नन्दन खत्री चन्द्रकान्ता का कालखण्ड महमूद ग़जनवी का समय रखना चाहते थे, जिसे पहली बार इस्लाम का हमला होता है और सोमनाथ का मन्दिर तोड़ दिया जाता है. लेकिन खत्री जी की कल्पना की उड़ान मध्यकालीन भारतीय काव्यों से प्रेरणा पाती थीं, क्योंकि उन्हें ग्यारहवीं सदी तक पहुँच नहीं थी, जैसे कि तिलिस्म+ए+होशरुबा लखनऊ की तहजीब से जुदा नहीं है.
 
"न अँग्रेज़ हैं न मुग़ल, न गुप्त हैं न मौर्य. कोई केन्द्रीय सत्ता नहीं है और ये सभी राजा अपने कुछ कोसों में सिमटे राज्यों और कुछ हज़ारों में सिमटी फ़ौजों के साथ परम निरंकुश हैं– वे न केवल अपनी प्रजा को मृत्युदण्ड तथा देसनिकाला देने का अनिर्बाध अधिकार रखते हैं अपितु आपस में अनिर्बाध रूप से लड़ाई छेड़ सकते हैं और उसमें जीतने पर विजेता विजित का राज्य अपने अधिकार में ले सकता है.....ये ठेठ ठकुरई ठसक के सरोकार हैं जो आल्ह-ऊदल जैसे लोक-काव्यों से ले कर पृथ्वीराज रासो और पदमावत जैसे महा-काव्यों में हमें दीखते हैं." 
(पृष्ठ ९३)
 
बाबू देवकीनन्दन खत्री का लेखन युक्तिसंगत, नवजागरण की राह पर वैज्ञानिक था ही, किन्तु उन्होंने कटुता और अश्लीलता का दामन नहीं थामा. सारे प्रश्नों के बाद भी यह प्रश्न जो अनुत्तरित रह जाता है कि आखिर इन उपन्यासों में वह कौन सी चुम्बकीय शक्ति है, जो पाठक को एकदम से जकड़ लेती है. क्या सन् २०२० में कोई बारह-चौदह साल का लड़का भी इससे उतना ही प्रभावित हो सकता है जितने हम, हमारे पिता, पितामह और प्रमितामह हुए थे?
       
आलोचना की भारतीय परम्परा और मौलिक चिन्तन का सत्यपरक दृष्टान्त हमें वागीश जी नयी पुस्तक में मिलता है. यह करीब चार-पाँच साल पहले लिखी जा चुकी थी. किन्तु हिन्दी में जिम्मेदार और विचारशील प्रकाशनों के अभाव के कारण पाठकों को अब उपलब्ध हुयी है. आशा है कि इसे गम्भीरता से लिया जाएगा और शब्दों की व्युत्पत्ति तथा ऐतिहासिक विकास के साथ, बहुआयामी चिन्तनों को समावेशित करते हुए हिन्दी की आलोचना परम्परा समृद्ध हो सकेगी.
(पुस्तक:https://www.amazon.in/Chandrakanta-Santati-Tilism-Raza-Pustak/dp/9388933850/)
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