कथा-गाथा : साठ साल बाद बैल की वापसी : बटरोही

Posted by arun dev on अगस्त 13, 2019



साहित्य और सत्य के बीच कल्पना है, साहित्य को सार्वभौम बनाती हुई. कल्पना से यथार्थ और यथार्थ से जादुई होती कथा की दुनिया जटिल समय को अंकित करती चल रही है. कथा में वर्तमान, इतिहास, पौराणिक-जातीय आख्यान, सबाल्टर्न, नृ विज्ञान, आदि अब सब घुल मिल रहें हैं. 

राजनीतिक कथा की संरचना जटिल होती है, इसे कोई कथा-अनुभवी और अध्येता ही बुन सकता है. हिंदी के वरिष्ठ कथाकार बटरोही की इधर की कहानियों में यह प्रवत्ति रेखांकित की जा सकती है. उनकी नयी कहानी ‘साठ साल बाद बैल की वापसी’ इसी तरह की कथा कहती है.

आपके लिए ख़ास तौर पर यह कहानी.    




23 मई 2019
साठ साल बाद बैल की वापसी             
बटरोही




“बिस्मिल्ला ही गलत हो गई...”
वह अजीब-सा, गड्ड-मड्ड और लम्बा सपना था जिसका मैं ठीक से वर्णन नहीं सकता, मगर इतना अच्छी तरह याद है कि जिस वक़्त मेरी नींद खुली थी, मेरे मुँह से यही शब्द निकले थे.
वृहस्पतिवार, 23 मई, 2019 की सुबह साढ़े पांच बजे अपने बेडरूम में सोये हुए मेरे मुँह से गुस्से में, झटके के साथ यह वाक्य निकला था. मैं पसीने-पसीने था और समझ नहीं पा रहा था कि यह मुझे अचानक क्या हुआ? यह शब्द तो मैं कभी इस्तेमाल ही नहीं करता.
पत्नी मुझे झकझोर रही थीं, “कोई सपना देखा?”
मैं सपने को याद करने की कोशिश करने लगा, मगर सपने का इस वाक्य के साथ कोई सम्बन्ध नहीं बैठा सका.
“सुबह उठकर कभी भगवान का नाम तो लेते नहीं, आज ये मुसलमानों की जैसी पूजा क्या करने लग गए?”
हल्का-हल्का याद आया, दिन की शुरुआत या अभिवादन में मैं ऐसे शब्द कभी नहीं बोलता: न ‘ऐ मौला’ कहता, न ‘हे राम’!
अलबत्ता, कल रात सोने से पहले मैंने आने वाले दिन के ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए आज को पूरी शिद्दत से याद किया. ऐसा भी नहीं था कि मुझे उस वक़्त भारतीय राजनीति के ‘मोदी-2’ का पूर्वाभास हो चुका था. राजनीतिक मामलों में मैं घोर अनाड़ी रहा हूँ, अमूमन मेरी राजनीतिक भविष्यवाणियाँ गलत साबित होती हैं. बावजूद इसके, मेरे लिए यह जबरदस्त पहेली थी कि मेरा वह सपना क्या था, जिसका उपसंहार ‘बिस्मिल्लाह’ के रूप में हुआ था.
मैं सपना याद करने लगा.

सपने में मैं गुमदेश के अपने पैतृक गाँव में था, जिसे करीब साठ साल पहले मैं छोड़ चुका था. जाहिर है, इस बीच गाँव का भूगोल भी पूरी तरह बदल गया रहा होगा, जिसकी भौतिक उपस्थिति की मेरे पास कोई स्मृति नहीं थी. दस-बारह साल की उम्र में उस गाँव को छोड़ चुका था, इसलिए आज के अपने गाँव के बारे में कयास भी नहीं लगा सकता था!... जरूर आज भी वह सुन्दर होगा, आकर्षक, हरा-भरा, रहस्यमय बनैली वनस्पतियों, पहाड़ों, नदियों, जल-स्रोतों और पत्थर-छाई छतों वाले मकानों वाला वैसा ही स्वप्निल पहाड़ी गाँव!... मगर कयास तो एक स्थिर आयाम है, उसे सच तो नहीं कहा जा सकता.  

जब हम छोटे थे, हमारे घर की खिडकियों से सुदूर हिमालय की अर्ध-चंद्राकार पर्वत-श्रृंखलाएं और उनके बीच बसा हुआ पहाड़ों की कुलदेवी नंदा का भरा-पूरा परिवार हमारी सुरक्षा के लिए हमेशा मुस्तैद रहता था... हजारों वर्षों से यह परिवार हम पहाड़-वासियों की उपस्थिति का साक्षी था... घूंघट में बैठी नंदा (‘नंदा घुंटी’, 6309 मी.), माँ नंदा के पति महाकाल शिव के बाएं हाथ में विराजमान ‘त्रिशूल’ (7045 मी.), नंदा देवी के पांच चूल्हे (‘पंचाचूली’ 6334 मी.), देवी नंदा का बिछौना (‘नंदाखाट’ 6611 मी.), माँ नंदा (7817 मी.), पूर्वी नंदा (7434 मी.), देवी नंदा का दुर्ग (‘नंदा कोट’, (6861 मी.) और नंदा देवी का खजाना (‘नंदा भनार’, 7000 मी.). यह हमारी सांस्कृतिक संपत्ति थी, जो मेरे मन से कभी अलग नहीं हुई.

गुमदेश का पुराना गाँव ‘बिशुंग’ उत्तराखंड की प्राचीन राजधानी चम्पावत और नंदादेवी शिखर के ठीक मध्य में घने जंगलों के बीच की घाटी में बसा हुआ सुन्दर इलाका था, जिसके बारे में हमारे इलाके के प्रसिद्ध इतिहासकार पंडित बद्री दत्त पांडे ने अपनी किताब ‘कुमाऊँ का इतिहास’ में लिखा है:

“देश (मैदान) से दो क्षत्रिय वीर काली कुमाऊँ में आए. राजा उस समय कुटौलगढ़ के किले में थे. उनकी रानी गर्भवती थी. बच्चा अवधि से ज्यादा पेट में रह गया. रानी कष्ट पाने लगी. राजा ने पंडितों से पूछा, तो उन्होंने मौजा भेटा के सांप का दोष बताया, जो एक विशाल शिला के नीचे था. पंडितों ने कहा, जब वह सांप मारा जाएगा, तब राजा के संतान पैदा होगी.
“राजा ने राजसभा में कहा कि ऐसा वीर कौन है जो उस सांप को मार राजा का काम सिद्ध करे? यह बात देश से आये दो क्षत्रिय भाइयों ने सुनी. उन्होंने कहा, यदि वे इस काम को करेंगे, तो क्या पुरस्कार मिलेगा? राजा ने कहा कि सांप को मारने पर राज्य का पद मिलेगा. तब बड़े भाई ने गदा मारकर शिला तोड़ डाली. किस्सा ही है, ‘शिला फोड़कर फर्त्याल नाम पाया’. छोटे भाई ने कटार से सांप मारा, इसलिए ‘मारा-मारा’ कहने के कारण ‘मारा’ या ‘महरा’ नाम पाया.”

संभव है, इसे आप मिथक-कथा समझकर कपोल-कल्पना समझें, मगर पूर्व-भारतीय क्रिकेट कप्तान, मानद लेफ्टिनेंट-कर्नल महेंद्र सिंह धौनी को तो काल्पनिक पात्र नहीं मानेंगे; न उनके द्वारा मैच खेलते हुए पहने गए ‘बलिदान’ ग्लब्ज को, जो पिछले दिनों सियासी हलकों में खासे चर्चित हुए. धौनी के पुरखे इसी बिशुंग के मूल निवासी थे, जिनके बारे में हमारे समकालीन इतिहासकार डॉ. राम सिंह ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘राग-भाग : काली-कुमाऊँ’ में लिखा है:

“धौनी लोगों की एक ‘भाग’ (आत्म-स्वीकृति) के अनुसार ये लोग सबसे पहले कहीं बाहर से आकर आज के पिथौरागढ़-टनकपुर मार्ग पर के ‘धौन’ नामक गाँव में बसे. उनके पूर्वज दो भाई थे. दोनों भाई राजा के पास आते-जाते रहते थे. एक दिन एक ‘मौन’ (मधुमक्खी) का झुण्ड उड़ रहा था, बड़े भाई ने राजा से कहा, यह मेरा है. राजा को इस पर आश्चर्य हुआ और उसने कहा, यह कैसे हो सकता है? बड़े भाई ने एक ‘मौन’ के पैर में धागा बांध दिया. सायंकाल वह ‘मौन’ उसके पास आ गया. राजा को वह दिखाया गया. राजा उसकी सच्चाई पर प्रसन्न हुआ. तब से छोटा भाई ‘धौन’ में रहने के कारण धौनी और बड़ा भाई ‘मौनी’ कहे जाने लगे.
“धौनी लोगों की एक पुरखिन ‘भागा धौन्यानी’ के नाम से कुमाऊँ की लोकगाथाओं में खूब चर्चित रही है. उसके वीरतापूर्ण कृत्यों और शारीरिक बल से सम्बंधित गाथाओं को धान इत्यादि फसलों की गुड़ाई के समय ‘गुडोळ’ गीत में किसानों को उत्साहित करने के लिए गाया जाता है. धौन के वर्तमान बस-अड्डे के पास चार-पांच कुंतल भारी ग्रेनाईट की एक चपटी और आयताकार शिला पत्थरों के एक चबूतरे पर स्थापित है. इस पर प्रायः घसियारिनें अपनी दराती घिसकर उनकी धार तेज किया करती हैं. इसे ‘भागा धौन्यानी को उध्युनो’ (भागा धौन्यानी की दराती की धार तेज करने का पत्थर) कहा जाता है. कहते हैं कि वह इतनी शक्तिशाली थी कि इतने भारी ‘उध्यूने’ को, जो उसके लिए एक मामूली पत्थर का टुकड़ा-मात्र  था, अपनी घाघरी (लहंगे) के फेटे में लपेटकर घास काटने जाया करती थी.”


(एक)
23 मई की सुबह के सपने में मैं अपने पैतृक गाँव में था और पिछली पूरी रात वहाँ अपने पूर्वजों से भैंट करता रहा. वहाँ अलग-अलग कटे हुए बिम्बों की तरह देश भर में चुनावी यात्रा कर रहे तमाम राजनेताओं के साथ मैं गंभीर विमर्श करता रहा. उनमें यूपी के योगी उर्फ़ अजय सिंह बिष्ट थे, केदारनाथ के शिखर पर तपस्या में लीन वाराणसी के गंगा भक्त सांसद नमो मोदी थे, अमेठी के कुमार राहुल थे, बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा थे, कोलकाता की ममता दीदी थीं, मध्य प्रदेश की चुलबुली साध्वी प्रज्ञा ठाकुर थीं... और भी अनेक-अनेक लोग थे, जिनके बारे में हम सब जानते हैं. सभी लोग राजनीति के धुरंधर थे, भारतीय संसद का हिस्सा बनने के लिए चुनाव लड़ रहे थे. और अपनी-अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थे. इसीलिए तो वातानुकूलित कमरों में रहने वाले हमारे भाग्य-विधाता उस दिन मई के महीने की लू झेल रहे थे. 

मेरे सपने में दिखाई देने वाले तमाम बिम्बों के बीच एक निराला बिम्ब और था, मेरे बचपन के प्यारे दोस्त ‘मोहनिया बहौड़िये’ का. बता दूँ, ‘बहौड़िया’ हमारे इलाके में किशोर उम्र के नर-बछड़े को कहते हैं, जिसे अभी बैल नहीं बनाया गया है, हालाँकि उसके जीवन में यह मौका कभी भी आ सकता है. इसलिए बधियाकरण की अपनी नियति से बेखबर बहौड़िया इस उम्र में ज्यादा ही चंचल और मस्त हो जाता है. मेरी और मोहनियां बहौड़िये की दोस्ती इन्हीं दिनों की है.

सपनों के पीछे कोई तर्क तो होते नहीं. सपने में मैंने जो घटना देखी, वह 6 अप्रैल, 1980 की थी, जो संयोग से वही तारीख थी जिस दिन भारतीय राजनीति में बीजेपी नामक एक ऐतिहासिक राजनीतिक पार्टी की स्थापना हुई थी और जिसे भविष्य की भारतीय राजनीति में बड़ा परिवर्तन लाना था. उन्हीं दिनों इसी राजनीतिक दल के एक भक्त ने संसार के प्रख्यात भविष्य-वक्ता नास्त्रदामस का उद्धरण सार्वजनिक किया था कि संसार के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित एक देश के पश्चिमी अंचल में एक अपराजेय प्रतिभा का जन्म होगा, जो एकाएक दुनिया के रंगमंच में इस तरह छा जाएगा कि लोग सारे पुराने समीकरण भूल जायेंगे... मेरी कहानी का सम्बन्ध उस महान प्रतिभा के साथ नहीं, अपने दोस्त मोहनिया बहौड़िया के साथ है जिसने इसी दिन अपने जीवन का नया अवतार ग्रहण किया. कहानी का सम्बन्ध किसी राजनीतिक दल के साथ भी नहीं है; हो भी नहीं सकता क्योंकि राजनीति की मुझे जरा भी समझ नहीं है... मेरी भविष्यवाणियाँ हमेशा फ्लॉप होती हैं.

हाँ, यह तारीख मेरे मोहनिया बहौड़िये के लिए सबसे खास थी, क्योंकि इसी दिन मेरी और उसकी दोस्ती पक्की हुई थी और उस दिन मैं और वह दोनों मिलकर खूब रोये थे. कुछ ऐसा हुआ कि मैं और मोहनिया उसके बाद जब भी मिले, रोते हुए ही मिले. यहाँ तक कि 23 मई की रात को भी, जब वह मेरे बचपन के गाँव बिशुंग में मुझसे दुबारा मिला, उसी तरह दहाड़ मार-मार कर रो रहा था. मैं भी रो रहा था, मगर मेरा रुदन अलग तरह का था, और उसका अलग. मैं समझ रहा था कि उसकी रुलाई एक बैल की आवाज़ होगी क्योंकि तब वह बहौड़िया तो रहा नहीं, पक्का बैल बन चुका होगा. मैं उस आवाज़ को सुनकर हैरान रह गया क्योंकि वह बहौड़िये की ही आवाज़ थी. उसकी अस्पष्ट आवाज के शब्द मैं नहीं पकड़ पा रहा था, ठीक उसी तरह जैसे 23 मई, 2019 की सुबह साढ़े पांच बजे मैं अपनी ही आवाज ‘बिस्मिल्ला...’ को नहीं सुन पा रहा था... उसी वक़्त मेरा  सपना टूट गया था, मैं पूरी रात देखे गए घटनाक्रम को सिरे से भूल गया था. सुबह अपनी चारपाई पर सोये हुए ही मैंने रात भर देखे गए सिलसिले को आपस में जोड़ने की कोशिश की... कुछ घटनाएँ टुकड़ों में याद भी आती रहीं, मगर सिलसिला कभी जुड़ नहीं पाया.



(दो)
जिस साल भारत में नए दल का जन्म हुआ, उसी साल हिंदी के दो प्रकांड विद्वान-प्राध्यापक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से प्रोफ़ेसर नामवर सिंह और उज्जैन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर राममूर्ति त्रिपाठी कुमाऊँ विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग का रीडर चुनने के लिए नैनीताल पधारे थे. दोनों ही जगह लिए गए निर्णय विवादास्पद बने. चयन समिति ने मुझे चुन तो लिया, हालाँकि मामला लम्बे समय तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय के विचाराधीन रहा.

मेरी हालत उस दिन मोहनिया बहौड़िये की थी. उस दिन मैं न बछड़ा (प्रवक्ता) था और न बैल (प्रोफ़ेसर)! भारत भर के हिंदी प्राध्यापक मुझ पर व्यंग्य कर रहे थे, ‘तुम्हारा तो इस पद पर चयन होना ही है बन्धु, क्योंकि एक ठाकुर चयन समिति का अध्यक्ष बनकर आया है.’

एक बुद्धिजीवी होने के नाते मैं अपने समीकरण तय कर सकता था, मगर बेचारा मोहनिया बहौड़िया! उसे क्या मालूम था कि बधियाकरण के नाम पर उसकी चंचलता तो छीन ली जाएगी, मगर गौ-वंश संरक्षण की आकर्षक छाया के बावजूद उसे एक दिन दर-दर बेसहारा भटकने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.



(तीन)
मोहनिया के साथ मेरी दोस्ती की शुरुआत का सिलसिला भी कम दहशत भरा नहीं था. मैं उस दिन अपने गाँव तो नहीं जा पाया था, मगर रिश्ते के मेरे एक चाचा ने मुझे मोहनिया के बहौड़िया से बैल बनने के उपलक्ष्य में होने वाले आयोजन का न्योता भेजा था. उन्होंने लिखा कि गाँव के पढ़े-लिखे लोगों में अकेले तुम ही तो हो, इसलिए यह काम निभा जाना. मोहनिया के लिए तुम्हारा आशीर्वाद उसे ताकत देगा और वह भविष्य में पक्के पुट्ठों वाला स्वामिभक्त बैल बन सकेगा. हमेशा की तरह इस बार भी मैं गाँव नहीं जा पाया, अलबत्ता चाचा ने मुझे उस आयोजन का आँखों देखा हाल विस्तार से भेज दिया था.

यह आयोजन एक बालक के नामकरण संस्कार से कम आकर्षक नहीं था. गांव के ही शिल्पकार परिवार के एक अधेड़ दलित लछिया को संस्कार का आयोजन करना था. उसे इसका पुश्तैनी अनुभव था, इसलिए सारी व्यवस्था उसी के निर्देशन पर चल रही थी. सारी सामग्री गाँव की एक चाची ने अपने पत्थर-बिछे आँगन में ओखल के पास सजाकर रख दी थी जिसके बाद वह अन्दर के कमरे में कैद हो गयी थी. इस कर्मकांड को देखना औरतों-बच्चों के लिए मना था, इसलिए सभी बिना बताये घटना-स्थल से दूर चले गए थे अलबत्ता कुछ शरारती बच्चे दरवाजों के छेद से सारे घटनाक्रम को आँखों में कैद करने के लिए बेहद उतावले दिखाई दे रहे थे.

अधेड़ लछिया ने सारी सामग्री पर अपनी अनुभवी आँखें डालीं और सारी चीजें तरतीबवार मौजूद पाकर संतोष की साँस ली. चाची को भी वर्षों का अनुभव था, इसलिए कोई कमी होना संभव ही नहीं था.

सबसे पहले लछिया ने मोहनिया के माथे पर तिलक लगाया, जिसे वह अपनी भाषा में ‘पिठ्याँ’ कहता था. फिर अपनी देहाती भाषा में ही मंत्र पढ़ते हुए पहले मोहनिया के माथे पर फूल छिडके और उसके बाद पूरे शरीर में ताज़ा पानी और अक्षत. मोहनिया के शरीर में जबरदस्त सिहरन हुई हालाँकि इस बारे में किसी ने नहीं सोचा कि यह सिहरन रोमांच की थी, भय की या आनंद की.

ओखल के पास मोहनिया के लिए पूरी, हलवा, बड़े और दूसरे पकवान सजाकर रखे गए थे, जो उसे इस कर्मकांड से पहले खिलाए जाने थे. गाँव के चार ताकतवर पुरुष मोहनिया को घेरे हुए खड़े थे और पूरी मुस्तैदी के साथ पुरोहित दलित लछिया के निर्देशों का इंतजार कर रहे थे.
कर्मकांड का जरूरी हिस्सा अभी बाकी था.

लगभग उसी तरह, जिस तरह संस्कार के वक़्त पुरोहित वैदिक मंत्रोच्चार के साथ जातक की समृद्धि और मंगल की कामना करता है, लछिया ने वैदिक पुरोहितों की अपेक्षा कहीं अधिक भाव-प्रवणता के साथ अपनी भाषा में मोहनिया के भविष्य की मंगल कामना के गीत गाये. उन गीतों के आशय को कमरे के अन्दर कैद चाचियाँ खूब समझती थीं, मोहनिया भी समझता था; मगर जानवर की भाषा तो आदमी नहीं समझ सकता है न! मोहनिया उस सारे आयोजन को अपनी फटी आँखों से निहार रहा था.

अब बारी थी मुख्य कार्यक्रम की. यह सारा उपक्रम बहुत तेजी से, बिजली की गति से होना था, इसलिए लछिया समेत सारे पुरुष एकदम तन कर खड़े हो गए. लछिया ने आँखों-ही-आँखों में इशारा किया तो चारों पुरुषों ने मोहनिया की एक-एक टांग पकड़कर उन्हें एक मोटी रस्सी से बांध दिया. इसके तत्काल बाद लछिया ने बगल में रक्खे सिलबट्टे की तरह के समतल पत्थर को मोहनिया के लेटे हुए अंडकोशों के नीचे रक्खा और उसी तेजी के साथ अपनी मजबूत कलाईयों से भारी गोल पत्थर से अनेक बार अंडकोशों पर प्रहार किया; इस तरह कि मानो वह सिल पर बिछी हुई अदरक कूट रहा हो.

इसके साथ ही मोहनिया की विशाल गर्जना, उसकी चीख चारों दिशाओं में फ़ैल गयी थी; मानो पृथ्वी ठहर गयी थी और चारों ओर सिर्फ और सिर्फ मोहनिया की करुण चीत्कार जीवित थी. सब कुछ सूर्य के ब्लैक होल में डूब गया था. चारों ओर शून्य छा गया था.

यह सब मोहनिया और उसके मालिक-परिवार के कल्याण के लिए हो रहा था, मगर मैं तो चाचा के द्वारा भेजे गए उस विवरण को पढ़ ही नहीं पा रहा था. मोहनिया की सारी पीड़ा मेरी बन गई थी, और यही वह क्षण था जब मेरी चेतना मोहनिया की सबसे अन्तरंग दोस्त बन गई थी.


(चार)
सपने के बिम्ब धीरे-धीरे मेरी चेतना में स्पष्ट हो रहे थे. इसी के साथ ही सारे चेहरे भी गड्ड-मड्ड होते हुए एक-दूसरे में प्रत्यावर्तित होते चले जाते थे. मैं उन्हें पहचानने और परिभाषित करने की कोशिश कर रहा था, मगर ज्यों ही वे पकड़ में आते, उसी क्षण मुझ पर अवसाद का जबरदस्त दौरा पड़ता और मैं सब कुछ भूल बैठता था. चारों ओर का शोर कभी शब्दहीन शून्य बन जाता था जो दूसरे ही पल भाषाविहीन शब्द की शक्ल ले लेता. शब्द को पकड़ने की कोशिश करता तो भाषा गायब हो जाती थी. भाषा के पीछे भागता तो शब्दों की बहुमंजिली इमारतें रास्ता रोककर खड़ी हो जाती थीं. मैं खुद का परिचय ही भूल बैठा था.

तेईस मई, 2019 को मैं दिन भर टीवी से चिपका रहकर नए भारत के प्रारूप की एक-एक डिटेल को मन पर बसा लेना चाहता था, मगर यह शायद नियति को मंजूर नहीं था. सपने के हैंग-ओवर से कुछ हद तक निबटा ही था कि साढ़े छह बजे एक दोस्त ने फोन पर याद दिलाया कि मुझे दिल्ली से आ रहे चार दोस्तों के साथ अपने भौतिक विज्ञानी गुरू स्वर्गीय डॉ. देवीदत्त पन्त की जन्म शतवार्षिकी के सिलसिले में उनके गाँव बेरीनाग जाना है. भारत के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता सर सीवी रमण के शिष्य पन्त जी का मेरी जिंदगी में अविस्मरणीय  योगदान रहा है, मेरे लिए मना कर पाना संभव नहीं था, इसलिए एक घंटे के भीतर ही मैं ढाई सौ किलोमीटर की उस पहाड़ी यात्रा के लिए चल पड़ा था. चुनाव परिणाम जानने की जिज्ञासा अलबत्ता पहले की तरह मन में थी, मगर तभी ख्याल आया कि मोबाइल-फोन के जरिए पल-पल की जानकारी तो मिलती ही रहती है. शुरुआती एक घंटे के रुझानों से कौतूहल भी लगभग धूमिल पड़ता चला गया, इसी अनुपात में रात का सपना भी चेतना से हटता चला गया. मैंने भी यथास्थिति के साथ समझौता करने में अपनी भलाई समझी. जब सारा संसार उस चुनाव परिणाम से फूल कर कुप्पा हुआ जा रहा हो, मेरी अकेली असहमति से क्या फर्क पड़ना था.
हालाँकि फर्क पड़ा, और जल्दी ही पड़ा.

नैनीताल से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर सोमेश्वर के पास पहुंचे ही थे, सूचना मिली, उत्तराखंड की पाँचों सीटें बीजेपी ने जीत ली हैं और जिस सांसद-प्रत्याशी को मैंने वोट दिया था, वो चुनाव हार गए हैं. समूचा भारतीय मीडिया एक स्वर में सत्ताधारी दल का पक्षधर बन गया था. बाईस और तेईस मई की अर्धरात्रि में पूरे देश ने गुपचुप तरीके से मानो एक नया संकल्प ले लिया था. असहमति और विवाद की कोई संभावना कहीं नहीं बची थी. पूरे देश का सोच एक सपाट सीधी रेखा में बुना जा चुका था. ऐसा लगा, राजनीति एक बना-बनाया वैज्ञानिक फार्मूला है, जिसका कोई दूसरा वैकल्पिक उत्तर नहीं होता. सचमुच यह भारत का नया प्रस्थान था, जिसमें एक देश, एक राष्ट्र और एक-सी सोच में ढले सब लोग सिर्फ अपने राष्ट्र के लिए काम करेंगे. संविधान की धारा 370 ख़त्म होगी, भारत अपने धुर अतीत की तरह आदर्श सपनों का मखमली राष्ट्र होगा.

गड़बड़ तब हुई जब तीसरे दिन हमने तय किया कि पुरखों के इलाके गुमदेश के अपने गाँव बिशुंग का दर्शन करते चलें. साठ साल से गाँव को देखा नहीं था, बुढ़ापे में नौस्तेल्जिया ऊँची उछाल मारता ही है, लगा, ज्ञान की ज्योति प्रदान करने वाले पुरखे प्रोफ़ेसर पंत की स्मृति के साथ ही अपने वास्तविक पुरखों की धरती की मिट्टी का स्पर्श भी कर आएँ. बिशुंग के पास से गुजरते हुए धौनी-मौनी भाइयों के किस्से और महेंद्र सिंह धौनी के ‘बलिदान-ग्लब्स’ पर चली चर्चा याद आ गयी. गाँव के पास पहुँचते ही बाकी तो कुछ नहीं मिला, अलबत्ता बगल के ही एक उजाड़ गाँव में मेरी मुलाकात थके-मांदे बदहवास मोहनिया बहौड़िया से हो गयी.

मैं चौंका! मोहनिया को तो मेरे गाँव का दलित लछिया बैल बना चुका था, मेरे चारों भाई-चाचा इस बात के गवाह थे. मेरी चाची ने उसके बधियाकरण से जुड़ा सारा सामान सिलसिलेवार सजाकर लछिया को अपने हाथों से दिया था. औरतों-बच्चों का इस दृश्य को देखना मना है, इसलिए वे सभी अन्दर के कमरे में कैद हो गए थे. उनके छिपते ही लछिया ने मोहनिया के अंडकोष को सिलबट्टे पर उसी तरह से कूटा था, जैसे ओखल पर औरतें अनाज कूटती हैं...

पहाड़ी औरतों को जिसने ओखल कूटते देखा है, जानता है कि कितनी आत्मीय लय और गति के साथ वो ओखल पर चोट करती हैं. आमने-सामने खड़ी दो औरतें मानो शास्त्रीय संगीत की किसी प्रतिस्पर्धा में हिस्सा ले रही हों!  

इसके बाद इस बात की गुंजाइश भला कहाँ बचती है कि मोहनिया बहौड़िया बना रहे. ये तो शिलंग की भागा धौन्यान का जैसा अविश्वसनीय किस्सा हो गया. क्या आज के ज़माने में भी धौनी-मौनी भाइयों के जैसे किस्से संभव हैं? मन हुआ कि रमण महर्षि के शिष्य प्रोफ़ेसर पंत जी से पूछूं कि क्या आज भी इस तरह के अजूबे संभव हैं? मगर हम दो दिन पहले ही तो उनका जन्म शताब्दी वर्ष मनाकर लौटे हैं. अब कहाँ खोजें उन्हें!

मेरी आँखों के आगे अजीब नजारा था. गुमदेश के सारे बैल गहरी करुणा भरी दहाड़ के साथ चारों दिशाओं में दौड़ रहे थे. वर्षों से बहौड़ियों का संस्कार नहीं हुआ था, इसलिए कोई बहौड़िया बैल नहीं बन पाया था. अब वे न बहौड़िए थे, न सांड और न बैल. वे पूरी तरह अनुपयोगी हो चुके थे. उनको खिलाने के लिए कहीं चारा नहीं बचा था, और वे सारे इलाके के खेतों में आवारा पशुओं की तरह फसलें नष्ट कर रहे थे. वहां अब सिर्फ बहौड़िए नहीं थे, उनकी बूढ़ी माएँ गौ-माता, नील गाएं, लाल-गुलाबी चेहरों वाले बन्दर, सभी एक-दूसरे की परवाह किये बिना भटक रहे थे.

गौ-वंश के संरक्षण के लिए नई संसद विधेयक पारित करने जा रही थी जिसमें उन्हें खुला छोड़ने पर सख्त दंड का प्रावधान करने का प्रस्ताव था. गायों-बैलों और बहौड़ियों के द्वारा किये गए उत्पात की सजा जब आदमियों को मिलने लगी तो लोग अपने पुश्तैनी घर वीरान छोड़कर मैदानों की ओर भाग रहे थे. गौवंश को आतंकवादी तो घोषित नहीं किया जा सकता था; धारा 370 को हटा भी दें, सवाल तो तब भी बना रहेगा कि कौन यहाँ का मूल निवासी है और कौन प्रवासी? कौन लौटेगा और कौन दण्डित होगा?...      

जीन और डीएनए के क्रम को क्या कोई अपने हिसाब से संयोजित कर सकता है? बहौड़ियों को बैल बनाने के लिए दलित लछिया के कर्मकांड के सिवा और कोई रास्ता नहीं है? बन भी गए बैल, तो वे कहाँ रहेंगे, क्या खायेंगे? बहौड़ियों की नई नस्ल का क्या होगा?...

इस जिज्ञासा के बारे में सोचते हुए मुझे एकदम साफ याद आ गया कि हाँ, मैंने सपना देखने के दौरान ही गुस्से में बिस्मिल्ला कहा था.


मुझे यह भी याद आ गया कि सुबह उठकर मैं कभी किसी देवता का नाम नहीं लेता, न ‘मेरे मौला’ कहता, न ‘हे राम’. मैंने सोचा था, ‘श्री गणेश’ कहने में तो जुबान लपटती है, ‘बिस्मिल्लाह’ कहना उसकी अपेक्षा आसान तो है ही.
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बटरोही
जन्म : 25  अप्रैल, 1946  अल्मोड़ा (उत्तराखंड) का एक गाँव

पहली कहानी 1960 के दशक के आखिरी वर्षों में प्रकाशित
हाल में अपने शहर के बहाने एक समूची सभ्यता के उपनिवेश बन जाने की त्रासदी पर केन्द्रित आत्मकथात्मक उपन्यास 'गर्भगृह में नैनीताल' प्रकाशित

अब तक चार कहानी संग्रहपांच उपन्यास. तीन आलोचना पुस्तकें और कुछ बच्चों के लिए किताबें प्रकाशित.

पता 
बटरोही, माउंट रोज, अपर माल, तल्लीताल, नैनीताल – 263002 (उत्तराखंड)
मोबाइल : 9412084322 मेल batrohi@gmail.com