मेघ-दूत : लाटरी : शर्ली जैक्सन : अनुवाद : शिव किशोर तिवारी


अमरीकी कथा-साहित्य में Shirley Jackson की कहानी ‘The Lottery’ कुछ सबसे विवादास्पद कहानियों में से एक मानी जाती है. इस कहानी के छपते ही शर्ली रातों रात प्रसिद्ध हो गयीं थीं.

भीड़ के मनोविज्ञान को शर्ली ने अचूक ढंग से व्यक्त किया है. आज जब भारत में भीड़तंत्र उन्मादी रूप अख्तियार कर चुका है इस कहानी को पढ़ते हुए भीड़ के मनोविकार को समझा जा सकता है.

समालोचन के पाठकों के लिए इस कहानी का अनुवाद ख़ास तौर पर शिव किशोर तिवारी ने किया है, जो खुद अनुवाद को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं और समालोचन को भी बारबार सचेत करते रहते हैं.



“शर्ली जैक्सन (1916-1965) की कहानी ´द लॉटरी´´(1948) अत्यंत प्रसिद्ध है. हॉरर कथा से लेकर सामाजिक-नृतात्विक रूपक-कथा तक के रूपों में इसका विश्लेषण हो चुका है. कुछ लखकों ने इसके पात्रों के नामो में प्रतीकात्मक अर्थ-संकेतों की खोज की है. यहां तक कि एक शोधकर्ता ने इस कहानी को इस्लाम से भी जोड़ा है (Islam in Shirley Jackson’s The Lottery : Nayef Ali Al-Joulan).”

 शिव किशोर तिवारी





लाटरी
शर्ली जैक्सन

अनुवाद : शिव किशोर तिवारी





27 जून की उस सुबह आसमान साफ़ था और धूप खिली थी; परवान चढ़ी गरमी के मौसम की ताज़ा ऊष्मा में ख़ूब सारे फूल खिले थे और घास चटक हरी हो रही थी. कोई दस बजे गाँववाले पोस्ट आफ़िस और बैंक के बीच स्थित खुली जगह में इकट्ठे होने लगे. कुछ गांवों में जिनकी आबादी ज़्यादा थी लाटरी दो दिन चलती थी और 26 जून को शुरू करनी पड़ती थी; लेकिन इस गांव की आबादी केवल तीन सौ के आसपास थी, इसलिए लाटरी का पूरा कार्यक्रम दो घंटे से कम में संपन्न हो जाता था. दस बजे शुरू करके भी कार्यक्रम दोपहर के भोजन, जो दिन का मुख्य भोजन था, के पहले ख़तम हो जाता था.

शर्ली जैक्सन



पहले बच्चे जमा हुए जैसा आम है. स्कूल में हाल ही में गर्मियों की छुट्टियां शुरू हुई थीं तो अभी तक ज़्यादातर बच्चे अपनी आज़ादी के बारे मे पुर-इत्मीनान नहीं हुए थे– थोड़ी देर तक वे शांतिपूर्वक जुटते रहे और अब भी क्लास की, टीचर की, किताबों की, स्कूल में पड़ी डांटों की चर्चा करते रहे. थोड़ी देर के बाद ही उनका शोरगुल और खेलना-कूदना शुरू हो सका. बॉबी मार्टिन ने आते ही अपनी जेबों में पत्थर भर लिये, दूसरे बच्चों ने उसका अनुसरण करते हुए सबसे चिकने, सबसे गोल पत्थरों को चुनना शुरू कर दिया. बॉबी, हैरी जोंस और डिकी डिलाक्वा – गांववालों के उच्चारण  के मुताबिक़ डिलाक्रॉय – ने मैदान के एक कोने में ढेर सारे पत्थर जमा कर दिये, फिर दूसरे लड़कों  के हमलों से उनकी हिफाजत  करने में जुट गए. लड़कियां एक ओर को आपस में बतियाती खड़ी हो गईं. कोई कभी सिर मोड़कर पीछे लड़कों की ओर देख लेती. बहुत छोटे बच्चे धूल में लोट रहे थे या अपने बड़े भाई या बहन की उंगली पकड़े खड़े थे.


थोड़ी देर में मर्द इकट्ठे होने लगे, अपने बच्चों को तकते और बुवाई, बरसात, ट्रैक्टरों तथा टैक्सों की बातें करते. कोने में जमा पत्थरों के ढेर से दूर वे एक साथ खड़े हो गए. वे मज़ाक करते हुए भी अपनी आवाज़ें धीमी रख रहे थे और खुलकर हंसने के बजाय मुसकरा भर रहे थे. मर्दों के कुछ बाद रंग उड़े घरवाले कपड़े और स्वेटर पहने औरतें आईं. एक दूसरे का अभिवादन करती, छोटी-मोटी गप्पें साझा करती वे अपने-अपने पतियों की और बढ़ीं. जल्दी ही औरतें अपने पतियों के पास खड़ी होकर अपने बच्चों को पुकारने लगीं. चार-पांच बार पुकारना पड़ा, तब कहीं बच्चे अनिच्छा से आये. बॉबी मार्टिन अपनी मां के पकड़ने को बढ़े हाथों के नीचे से निकलकर हँसते हुए फिर से पत्थरों के ढेर की और भागा. पिता ने सख़्ती से ऊँची आवाज़ में पुकारा तो बॉबी ने तत्काल आकर पिता और सबसे बड़े भाई के बीच अपनी जगह ली.



मैदान में आयोजित होने वाले सामूहिक नृत्य, किशोर क्लब और हैलोवीन के उत्सवों की तरह लाटरी का संचालन भी मि. समर्स करते थे, सामाजिक कामों में लगाने के लिए उनके पास समय और ऊर्जा थी. वे गोल चेहरे के, मस्त आदमी थे. कोयले का व्यापार करते थे. उनसे लोगों को सहानुभूति थी क्योंकि उनके कोई संतान नहीं थी और उनकी बीवी बदज़बान थी. जब वे मैदान में पहुंचे तब उनके हाथ में चिरपरिचित काला बक्सा था. देखकर गांववालों के बीच कुछ देर तक मंद स्वर में बातें चलीं; फिर अभिवादन में हाथ हिलाकर उन्होंने घोषणा की, “आज देर हो गई दोस्तो”. पोस्टमास्टर मि.ग्रेव्ज़ पीछे-पीछे एक तिपाई लिए आये जिसे मैदान के बीचोबीच रखकर काला बक्सा उसके ऊपर रखा गया. गांववाले तिपाई से दूरी बनाकर उसके और अपने बीच जगह छोड़कर खड़े हुए. जब मि. समर्स ने कहा, “मर्द लोगों में से कोई मेरी मदद करना चाहेंगे ? तब सबमें हिचकिचाहट दिखी, फिर दो आदमी, मि. मार्टिन और उनका बड़ा बेटा बैक्सटर, आगे आये और जब तक मि.समर्स बक्से के अंदर रखी पर्चियों को हिला-हिलाकर मिलाते रहे तब तक दोनों ने बक्से को पकड़कर रखा.



लाटरी के मूल साज़ो-सामान कभी के ग़ायब हो चुके थे, तिपाई पर रखा काला बक्सा तब से इस्तेमाल हो रहा है जब गांव के सबसे बूढ़े व्यक्ति वार्नर बुज़ुर्गवार का जन्म नहीं हुआ था. मि. समर्स ने कई बार गांववालों से नया बक्सा बनवाने की बात की है, लेकिन कोई परंपरा तोड़ना नहीं चाहता, इतनी भी जो बक्से के मारफ़त बची है– कहते हैं कि यह बक्सा बनाने में इसके पहले वाले बक्से के कुछ हिस्से इस्तेमाल हुए थे, उस बक्से के जो तब बना था जब इस गांव को बसानेवाले पहले निवासी यहां आये थे. हर साल लाटरी ख़त्म होने के बाद मि. समर्स नये बक्से की बात उठाते और हर साल बिना किसी कार्रवाई के मामला टल जाता. काला बक्सा साल-दर-साल और बदरंग होता रहा : इस समय वह पूरा काला नहीं था बल्कि एक और से बुरी तरह टूट चुका था जिससे लकड़ी का असली रंग दिखने लगा था. कहीं-कहीं बक्सा बदरंग और दाग़दार था.




मि.मार्टिन और उनके बड़े बेटे बैक्सटर ने काले बक्से को तब तक पकड़कर रखा जब तक मि. समर्स ने अपने हाथ से पर्चियों को अच्छी तरह मिला नहीं लिया. चूंकि बहुत सी रस्में अब तक छोड़ी या भूली जा चुकी थीं, इसलिए पीढ़ियों तक प्रचलित काठ के टुकड़ों की जगह काग़ज़ के टुकड़ों का प्रयोग मि. समर्स स्वीकृत करा पाये. उनका तर्क था कि काठ के टुकड़े तब के लिए ठीक थे जब गांव छोटा-सा था पर अब जब कि उसकी आबादी तीन सौ पार कर गई है और आगे और बढ़ने की उम्मीद है, कोई ऐसी चीज़ इस्तेमाल करनी पड़ेगी जो काले बक्से में समा सके. लाटरी की पिछली रात मि समर्स और मि ग्रेव्ज़ काग़ज़ की पर्चियां तैयार करते थे और उन्हें बक्से में भरते थे. फिर बक्सा मि समर्स की कोयला कंपनी के सेफ़ में बंद कर दिया जाता था. जब अगली सुबह मि समर्स को बक्से को मैदान में ले जाना होता था तभी सेफ़ खुलता था. साल के बाक़ी दिन बक्सा कभी यहां कभी वहां रखा रहता था – एक साल वह मि ग्रेव्स के कोठारे में रखा रहा, दूसरे साल पोस्ट ऑफ़िस के फ़र्श पर, और एक साल मार्टिन किराना दूकान के शेल्फ़ पर पड़ा रहा.



मि समर्स लाटरी की शुरू,आत की घोषणा करें इसके पहले बहुतेरे झमेले थे. तमाम सूचियां बनानी थीं – कुटुंबों के मुखिया, हर कुटुंब के प्रत्येक परिवार का मुखिया, हर परिवार के सदस्यों के नाम. पोस्टमास्टर को मि समर्स को लाटरी अधिकारी की औपचारिक शपथ दिलानी थी; कुछ लोगों को याद आया कि एक ज़माने में लाटरी अधिकारी को कुछ बोलना पड़ता था – हर साल महज़ रस्मी तौर पर वे मंत्रवत् पंक्तियाँ सपाट स्वर में जल्दी-जल्दी दुहराई जाती थीं. कुछ लोगों का ख़्याल था कि उन्हें पढ़ते या गाते समय लाटरी अधिकारी को किसी ख़ास सही तरीक़े से खड़ा होना होता था, दूसरों का कहना था कि लाटरी अधिकारी को लोगों के बीच चक्कर लगाना पड़ता था, लेकिन बरसों पहले यह रिवाज़ ख़तम हो गया था. एक रस्मी अभिवादन भी होता था. यह रस्म भी बदल गई थी, अब इतना ही काफी था कि अधिकारी को हर पर्ची निकालने आये व्यक्ति को संबोधित करना होता था. इन सब कामों में मि समर्स बड़े निपुण थे. नीली जींस और साफ़ सफ़ेद कमीज़ पहने, एक हाथ हलके से काले बक्से पर रखे वे बड़े पक्के और ख़ास लग रहे थे. इस समय वे मि ग्रेव्ज़ और मार्टिन दम्पति के साथ किसी लंबे वर्तालाप में मग्न थे.



मि समर्स अंतत: बातचीत से हटकर जन-समुदाय से मुख़ातिब हुए ; तभी मिसेज़ हचिंसन द्रुत गति से मैदान की और आती दिखीं.जल्दबाज़ी में उनका स्वेटर कंधे पर पड़ा रह गया था. आकर पिछली क़तार में खड़ी हो गईं. मिसेज़ डिलाक्वा उनकी बग़ल में थीं. “मैं तो भूल ही गई थी” वे बोलीं और दोनों महिलाएँ ज़रा सा हंसीं. “सोचा मियां पिछवाड़े लकड़ियां जमा कर रहे होंगे. फिर खिड़की से बाहर देखा तो बच्चे भी नहीं ! तब जाके याद आया कि आज तो सत्ताईस है, भागती आई”. वे एप्रन पर हाथ पोछने लगीं. मिसेज़ डिलाक्वा ने कहा, “वक़्त पर ही पहुंची हैं. आगेवाले अभी गपशप में मशग़ूल हैं”.



मिसेज हचिंसन ने गरदन लंबी करके भीड़ का जायज़ा लिया तो उनके पति और बच्चे एकदम आगे की तरफ़ खड़े दिखाई दिये. उन्होंने मिसेज़ डिलाक्वा की बांह हलके से थपथपाकर ‘विदा’ का इशारा किया और भीड़ में रास्ता बनाने लगीं. लोगों ने ख़ुशी-ख़ुशी रास्ता दिया: दो-तीन लोगों ने आवाज़ बस इतनी ऊंची करके कि सभी को सुनाई पड़े  “ये देखो तुम्हारी घरनी आ गई हचिंसन” और “बिल, वो पहुंच गईं आख़िर” कहा. 


मिसेज़ हचिंसन अपने पति की बग़ल में पहुंच गईं और मि समर्स ने, जो इस बीच इंतज़ार कर रहे थे, ख़ुशमिज़ाज लहज़े में कहा, “मुझे लगा तुम्हारे बग़ैर ही काम चलाना पड़ेगा, टेसी”. मिसेज़ हचिंसन ने हंसते हुए कहा, बरतन अनधुले छोड़ आती तो तुम्हें अच्छा लगता, जो ? नहीं न !” भीड़ में एक मंद हास फैल गया और मिसेज़ हचिंसन को रास्ता देने वाले खिसककर अपनी जगहों पर वापस आ गए.


“चलिए, अब शुरू करें मेरे ख़्याल से,” मि समर्स ने गंभीर स्वर में कहा, जल्दी ख़त्म करके अपने-अपने काम में लगें. कोई ऐसा है जो मौजूद नहीं ?”
“डनबार, डनबार”, कई लोग बोले.
मि समर्स ने अपनी सूची देखी. “क्लाइड डनबार ?”, उन्होंने कहा, “टांग टूटी है नउनकी पर्ची कौन निकालेगा ?”
“मेरे ख़्याल से मैं निकालूंगी”, एक महिला ने कहा.


“पति का पर्चा पत्नी निकाल सकती है” , मि समर्स ने कहा, “जेनी, तुम्हारा कोई लड़का है जो यह काम कर सके?” उत्तर मि समर्स और गांव के और सभी को भली भांति मालूम था पर यह प्रश्न औपचारिक ढंग से पूछना लाटरी अधिकारी का कर्तव्य था. मि समर्स ने भद्र भाव से उत्तर की प्रतीक्षा की.


“होरेस तो मुश्किल से सोलह बरस का हुआ” मिसेज़ डनबार ने खेदपूर्वक कहा, “ मैं समझती हूं अपने मियां की पर्ची इस साल मुझे ही निकालनी पड़ेगी.


“ठीक है”, मि समर्स ने कहा और अपनी सूची में कुछ दर्ज किया. फिर उन्होंने पूछा, “वाट्सन परिवार का लड़का इस बार पर्ची निकालेगा?”


एक लंबे क़द के लड़के ने हाथ उठाया. “ हाज़िर ! मैं अपने और अपनी मां के लिए पर्ची निकालूंगा. घबराहट में उसने कई बार पलकें झपकाईं. भीड़ में से इस तरह की आवाज़ें आने लगीं जैसे “शाबास जैक!”, “ ख़ुशी की बात है कि तुम्हारी मां को लाटरी खेलने के लिए एक पुरुष का सहारा हो गया”, तो वह शरीर के ऊपरी हिस्से को झुकाकर अदृश्य होने की कोशिश करने लगा.


“अच्छा, लगता है सभी आ चुके हैं. बुज़ुर्ग वार्नर आ पाये?”, मि समर्स ने कहा. एक आवाज़ आई, “हाज़िर !” मि समर्स ने गरदन स्वीकार के रूप में नवाई.


सहसा भीड़ में सन्नाटा छा गया. मि समर्स ने लिस्ट की ओर देखते हुए खँखारकर गला साफ़ किया. “सब तैयार ?”, उन्होंने कहा, “ मैं लिस्ट से नाम पढ़ूंगा – सबसे पहले कुटुंबों के मुखियों के–  हर आदमी अपनी पर्ची निकालकर ले जाय. जब तक सबके हाथ में पर्ची न आ जाय तब तक कोई अपनी पर्ची न खोले. कोई शक?”.


लोग यह सब इतनी बार कर चुके थे कि उन्होंने उपर्युक्त निर्देशों को ज़्यादा कान नहीं दिया. अधिकतर लोग बार-बार अपने ओठों पर जीभ फिरा रहे थे और न कुछ बोल रहे थे न किसी तरफ़ देख रहे थे. मि समर्स ने एक हाथ ऊपर उठाकर पुकारा, “एडम्स”. एक आदमी भीड़ में से निकलकर आगे आया. “हलो, स्टीव!”, मि समर्स ने कहा. जवाब आया, “हलो जो!” दोनो जन एक दूसरे को देखकर भावशून्य, कुछ नर्वस सी हंसी हंसे. मि. एडम्स ने काले बक्से में हाथ डालकर एक पर्ची निकाली. मुड़े काग़ज़ के टुकडे को एक कोने से मज़बूती से पकड़े अपनी जगह को वापस आये और अपने कुटुंब से कुछ दूर खड़े हो गये,. काग़ज़ की ओर एक बार भी नहीं देखा.


“एलेन”, मि समर्स ने पुकारा, “ऐंडरसन...बेंथम”.
“लगता है आजकल दो लाटरियों के बीच कोई फ़ासला ही नहीं होता.“, पीछे की क़तार में खड़ी मिसेज़ डिलाक्वा ने मिसेज़ ग्रेव्ज़ से कहा.


“लगता है पिछली लाटरी गये हफ़्ते ही हुई थी.“
“समय सचमुच बड़ी तेज़ी से बीतता है.“ मिसेज़ ग्रेव्ज़ ने कहा.
“क्लार्क...डिलाक्रॉय”
“मेरे मियां वो चले”, मिसेज़ डिलाक्वा ने कहा और इसके बाद सांस रोककर अपने पति का जाना देखती रहीं.


“डनबार”, मि समर्स ने कहा; मिसेज़ डनबार धीर पदों से बक्से की और चलीं. भीड़ से किसी महिला ने आवाज़ लगाई, “शाबास जेनी !” ; दूसरी ने कहा, “वो रही.“


अगला नंबर हमारा है”, मिसेज़ ग्रेव्ज़ ने कहा. वह मि. ग्रेव्ज़ को देखने लगीं, जो बक्से की बग़ल से सामने आये, संजीदगी से मि समर्स का अभिवादन किया और बक्से से एक पर्ची निकाली. अब तक भीड़ में काफी मर्दों के पास पर्चियां आ गई थीं. अपने बड़े हाथों में इन पर्चियों को उलटते-पलटते वे नर्वस दिख रहे थे. मिसेज़ डनबार और उनके दो बेटे साथ खड़े थे और पर्ची मिसेज़ डनबार के हाथ में थी.


“हार्बर्ट... हचिंसन”
“पहुंचो जल्दी,बिल” , मिसेज़ हचिंसन ने कहा और उनके पास खड़े लोग हंसने लगे.
“जोंस”.
“सुना है”, मि एडम्स ने अपनी बग़ल में खड़े वार्नर बुज़ुर्गवार से कहा, “कि उत्तर वाले गांव में लोग लाटरी बंद करने के बारे में सोच रहे हैं”.


बुज़ुर्गवार फुफकारे, “पागल गधे हैं सब के सब. नये ज़माने वालों की बातें सुनो तो लगता है उन्हें पसंद ही नहीं आता कुछ. कुछ ठीक नहीं, कहने लगें कि वापस गुफाओं में रहने चलते हैं ! कोई काम न करो, वैसे रहके देखो कुछ दिन. कहावत थी कि ‘जून में लाटरी, अनाज भर बखरी’. अब लगता है जल्द ही हम जंगली अनाज और ओक के फल की खिचड़ी खाने लगेंगे. लाटरी हमेशा रही है”. फिर तुनुकमिज़ाज सुर में बोले, “यही क्या कम है कि वो सामने समर्स छोरा सबके साथ हा हा- ही ही कर रहा है !”



“बहुत जगहों पर तो लाटरी ख़तम ही हो चुकी है”, मिसेज़ एडम्स ने कहा.
“उससे मुसीबत आयेगी, और कुछ नहीं”, बुढ़ऊ ने पूरे विश्वास से कहा, “गधों का  लौंडापना है सब”.
“मार्टिन”, बॉबी ने पिता को आगे जाते देखा, “ओवरडाइक, पर्सी”.
“जल्दी करें भाई”, मिसेज़ डनबार ने बड़े बेटे से कहा, “जल्दी ख़तम करें.“
“ख़तम हो आया है”, बेटा बोला.
“तो तैयार रहो, दौड़के जाके पापा को बताना होगा.“


मि समर्स ने अपना नाम पुकारा और विधिवत् सामने आकर पर्ची निकाली, फिर पुकारा , “वार्नर”.
बूढ़ा भीड़ में जगह बनाते हुए निकलने लगा.“सतहत्तर साल लाटरी में आते हो गए, वह बोला, “यह सतहत्तरवीं बार है”.

“ज़नीनी”

उसके बाद एक लंबा विराम, लोगों सांस रोक खड़े, फिर मि समर्स ने अपना पर्चे वाला हाथ उठाया, “ठीक है भाइयो”. थोड़ी देर तक किसी ने हरकत नहीं की, फिर सारी पर्चियां एक साथ खुल गईं. सहसा सभी औरतें एक साथ बोलने लगीं – “कौन है? किसका निकला ? वाट्सन ? डनबार? थोड़ी देर में एक ही आवाज़ चारों ओर से – “हचिंसन परिवार को मिला. बिल को. बिल हचिसन की पर्ची निकली.“
“अपने पिता को बता आओ”, मिसेज़ डनबार ने बेटे को कहा.


लोग हचिंसन परिवार को ढूंढ़कर देखने आये. बिल हचिंसन चुपचाप अपने हाथ की पर्ची पर नज़र गड़ाये खड़ा था. अचानक मिसेज़ हचिंसन मि समर्स की ओर रुख़ करके चिल्लाईं, “आपने इन्हें अपनी मर्ज़ी की पर्ची लेने का समय नहीं दिया. मैंने देखा. अन्याय है ये”!  
“खेल की तरह लो, टेसी”, मिसेज़ डेलाक्वा ने ऊँची आवाज़ में कहा;  मिसेज़ ग्रेव्ज़ बोलीं, “हम सभी ने एक-सा चांस लिया”.
“चुप करो, टेसी !” , बिल हचिंसन ने कहा.
“चलो, काफी जल्दी काम हुआ लोगो! “, मि समर्स ने कहा, “ थोड़ी और जल्दी करें ताकि पूरा काम समय से ख़तम हो जाय”. उन्होंने दूसरी लिस्ट देखी और बोले, “बिल, आपने हचिंसन कुटुंब की और से पर्ची निकाली. इस कुटुंब में कोई और परिवार है” ?


“डॉन और ईवा हैं न! उनको भी चांस लेने को कहो” !  
“लड़कियां अपने पति के परिवार के साथ पर्ची निकालती हैं, टेसी” , मि समर्स ने नरम लहज़े में कहा, “सबको पता है, तुम्हें भी”.
“अन्याय है ये ”, टेसी ने कहा.
“ना, नहीं ‘जो’, हचिंसन ने अफसोस के साथ कहा, “मेरी बेटी अपने पति के परिवार में गिनी जाएगी, यही उचित भी है. और कोई परिवार है नहीं, बच्चे हैं केवल”.


मि समर्स ने कहा, “तो जहां तक कुटुंब के लिए पर्चा निकालने की बात है आप निकालने वाले हुए. और परिवार के लिए भी आप ही, सही?”
“सही”, बिल हचिंसन ने कहा.
“कितने बच्चे, बिल”? मि समर्स ने पूछा.
“तीन - बिल जूनियर, नैंसी, सबसे छोटा डेव. और मैं तथा टेसी.
“ठीक है. आपने चारों के टिकट वापस ले लिए, हैरी”? मि ग्रेव्ज़ ने स्वीकृति जताई और पर्चियां दिखाईं. “तो बिल की पर्ची भी ले लें और पांचों पर्चियों को बक्से में डाल दें.
“मेरे विचार से शुरू दुबारा करना चाहिए आपको” , मिसेज़ हचिंसन ने यथासंभव संयमित ढंग से कहा, “ बेइंसाफ़ी हुई है. आपने इन्हें पर्ची चुनने का समय नहीं दिया, सबने देखा”.
मि ग्रेव्ज़ ने पांचों पर्चियां बक्से में डाल दीं. बाक़ी सारे काग़ज़ ज़मीन पर डाल दिये जहां से हवा उनको उड़ाकर ले जाने लगी.


“मेरी बात सुनो”, मिसेज़ हचिंसन अपने चारों और खड़े लोगों से कह रही थीं.
“तैयार”? मि समर्स ने पूछा तो बिल ने अपनी पत्नी और बच्चों को नज़र घुमाकर देखा और स्वीकार में गरदन झुकाई. “याद रहे, पर्ची निकालकर, बिना उसे खोले दूसरों के पर्ची निकालने का इंतज़ार करें. हैरी, तुम सबसे छोटे डेव की मदद करना. “मि समर्स ने बच्चे, डेव, का हाथ पकड़ा तो वह ख़ुशी-ख़ुशी आ गया. मि समर्स ने कहा, “बक्से से एक पर्ची निकाल लो डेव”. डेव ने बक्से में हाथ डाला और हँसने लगा. “बस एक पर्चा लेना है” उन्होंने डेव से कहा और हैरी ग्रेव्ज़ ने बच्चे का हाथ पकड़ पर्ची ले ली. डेव उनके पास ही खड़े होकर विस्मयपूर्वक उनकी तरफ देखता रहा.


“इसके बाद नैंसी”, मि समर्स ने कहा. नैंसी की उम्र बारह थी, उसकी स्कूली दोस्त उत्कंठित हो लंबी सांसें भर रही थीं : इस बीच नैंसी  अपनी स्कर्ट का घेरा लहराते नज़ाकत से अपनी पर्ची निकाल लाई. “बिल जूनियर” – बिली का चेहरा लाल हो गया और अपने पांव बड़े लगने लगे. पर्ची निकालते हए बक्सा ही गिरा दिया लगभग.  “टेसी” मि समर्स ने पुकारा. वह हिचकिचाई, चारों और ललकारती नज़रों से देखा और अपने ओठों को सख़्ती से बंद करके बक्से के पास पहुंच गई. एक पर्ची खींचकर निकाली और पीठ पीछे छिपा ली.


“बिल” – मि समर्स ने कहा. बिल हचिंसन ने बक्से में हाथ डलकर एकमात्र पर्ची को ढूंढ़कर निकाला.


भीड़ में सन्नाटा था. एक लड़की फुसफुसाईं, “नैंसी न हो तो अच्छा हो” और उसकी फुसफुसाहट भीड़ के बाहरी छोर तक पहुंच गई.


“पहले जैसी नहीं रही लाटरी”, वार्नर बूढ़ा चटक आवाज़ में बोला, “लोग ही पहले जैसे नहीं रहे”.

“ठीक है, पर्चियां खोलो”, मि समर्स ने कहा, “ हैरी, बच्चे की पर्ची खोलें”.


मि ग्रेव्ज़ ने पर्चा खोलकर हाथ उठाकर सबको दिखाया. पर्ची कोरी थी यह देखकर भीड़ ने समवेत राहत की सांस ली. नैंसी और बिल जूनियर ने अपनी पर्चियां एक साथ खोलीं. उनके चेहरे ख़ुशी से दमकने लगे और वे पर्चों को सर के ऊपर उठाकर सबको दिखाते हुए हंसने लगे.


“टेसी” – मि समर्स ने पुकारा थोड़ी तक कुछ न हुआ तो उन्होंने बिल की ओर देखा. बिल ने अपनी पर्ची खोलकर दिखा दी. वह कोरी थी.


“टेसी है. “मि समर्स की आवाज़ फुसफुसाहट के रूप में निकली. “बिल, उनकी पर्ची दिखाओ.“


बिल हचिंसन अपनी पत्नी की तरफ़ बढ़ा. पर्ची बिल ने उसके हाथ से ज़बर्दस्ती छीन ली. उस पर एक काला निशान था. निशान पिछली रात मि समर्स ने अपने आफ़िस की मोटी पेंसिल से बनाया था. बिल हचिंसन से पर्ची उठाकर सबको दिखाई. भीड़ में हलचल हुई.


“चलो लोगो”, मि समर्स ने कहा, “ख़तम करें अब”.
हालांकि गांव वाले कर्मकांड भूल चुके थे और मूल काले बक्से को भी खो चुके थे, परंतु पत्थरों का इस्तेमाल उन्हें अब भी याद था. लड़कों ने पत्थरों की जो ढेरी बनाई थी वह तैयार थी ही, ज़मीन पर हवा में उड़ते काग़ज़ के टुकड़ों के बीच बहुत से पत्थर पड़े थे. मिसेज़ डिलाक्वा ने इतना बड़ा पत्थर चुना जिसको उठाने के लिए दोनों हाथों का इस्तेमाल करना पड़ा. मिसेज़ डनबार की और मुड़कर वे बोलीं ,”चलो, जल्दी करो.


मिसेज़ डनबार के हाथ में दो छोटे पत्थर थे. इतने में ही वे बेदम हो चुकी थीं. वे बोलीं, “दौड़ना मेरे बस का नहीं है. आप आगे बढ़ें. मैं पीछे-पीछे पहुंचती हूं.“

बच्चों के हाथ में पहले से पत्थर थे. किसी ने हचिंसन के सबसे छोटे बेटे के हथ में कुछ कंकड़ रख दिये.

टेसी हचिंसन अब एक खुली जगह के मध्य में थी. वह अपना हाथ चरम हताशा की मुद्रा में फैलाए हुए थी. गांववाले उसके क़रीब आने लगे. “यह अन्याय है” उसने कहा. एक पत्थर उसकी कनपटी पर लगा. वार्नर बूढ़ा कह रहा था, “चलो, आगे बढ़ो सब लोग”. स्टीव एडम्स भीड़ में आगे था, उसकी बग़ल में मिसेज़ ग्रेव्ज़.

“ये अन्याय है, ग़लत है” ! टेसी हचिंसन चीख़ी.
फिर भीड़ उस पर टूट पड़ी.
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शिव किशोर तिवारी
tewarisk@yahoo.com 


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  1. कितना अजीब है उस समय लिखी गयी कहानी में आज का माहौल दिखता है। ईमानदारी पूर्वक किए गए अनुवाद के लिये तिवारी जी को साधुवाद और उनके साथ समालोचन का भी शुक्रिया यह कहानी हम तक पहुँचाने के लिए ।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (29-07-2018) को "चाँद पीले से लाल होना चाह रहा है" (चर्चा अंक-3047) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. जैसा दीखता है, वैसा होता नहीं। बर्बरताएँ मनुष्य के खेलों का हिस्सा बनी रही हैं। हम जंगली हैं और सभ्य भी। कमोबेश मनुष्य के सारे इतिहास में ऐसा ही अंतर्विरोध रहा है। 1948 के मेल्यू में रची कहानी आज भी कितनी सटीक और प्रासंगिक है।

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  4. kahani dahshat paida kar rahi--apne desh men to eisa hardin ho raha--anuwad bhi bahu shandar he--badhai

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  5. हे भगवान ! ये क्या किया शिवकिशोर जी ! साहित्य का सुकून तक लोगों से छीन लिया । अब कोई जाए तो कहां जाए ! ऐसा अन्याय तो न करते इसे पढ़वाकर ।

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  6. कृपया भूमिका हटा दें या बाद में दें कहानी के क्लाइमेक्स के बारे में पता चल जाता है।

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  7. यह कहानी भीतर तक विचलित करती है।काफी देर तक आप सुन्न रह जाते हैं।अनुवाद बहुत अच्छा है।

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  8. मैंने मूल कहानी तो नहीं पढ़ी लेकिन अनुवाद पढ़ कर लगा कि मूल कहानी का प्रभाव शायद ही इससे अधिक पड़ सके।आदरणीय तिवारी जी का शब्द-सामर्थ्य असाधारण है।कहानी बहुत अच्छी है।भीड़ के क्षणिक आवेश और उसके पागलपन को हम रोज रोज देखते हैं-यह हालत आगे भी नहीं बदलेगी।

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  9. कहानी के विषय में जितना कुछ कहा गया है उस पर मैं कुछ नहीं कहना चाहता | कहानी किविवेचना में बहुत कुछ कहा जा सकता है | फिर भी हेमिंग्वे, जैक लंडन आदि की कई कहानियां इससे ज्यादा असर पैदा करती हैं | आज के भारतीय सन्दर्भ से इसे जोड़ कर देखना भी इस कहानी के मूल उद्देश्य में आरोपण जीसस लगता है | शायद मैं बादशाह की वह पोषक नहीं देख प् रहा | लेकिन तिवारी जी का अनुवाद अवश्य अत्यंत सफल है और कहानी की आत्मा को जीवंत बना देता है | मैं तो कहानी से अधिक उसके अनुवाद को ही अधिक अंक देना चाहूंगा | तिवारीजी कोम्बहुत व्बधाई इतने सुन्दर अनुवाद के लिए, जिसे अनुवाद कहने का मन भी नहीं होता |

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  10. टिप्पणी में बहुत मिस् टाइपिंग हो जाती है | करेक्शन का भी प्रावधान होना चाहिए|

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  11. कहानी का क्लाइमैक्स चौंकाता है हिंसा का मनोवैज्ञानिक पक्ष कई रूपों में उद्घाटित होता है अनुवाद बेहतरीन है

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  12. कहानी का क्लाइमैक्स चौंकाता है हिंसा का मनोवैज्ञानिक पक्ष कई रूपों में उद्घाटित होता है अनुवाद बेहतरीन है

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  13. प्रतीकात्मक रूप से लिखी ग ई यह कहानी आदिवासी समाज की क्रूर परम्परा का आख्यान है, भीड़ की वहशत का मनोविज्ञान बेशक है,लेकिन इसका वर्तमान संदर्भ में हमारे समाज से साम्य दर्शाना, वैचारिक हठ की अति है।

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