स्त्री -चेतना : (२) : शिवरानी देवी : प्रेमचंद का विलोम : रोहिणी अग्रवाल

Posted by arun dev on मई 14, 2018









लेखिका शिवरानी देवी ' प्रेमचंद : घर में ' के लिए जानी जाती हैं, वह एक समर्थ कथाकार भी थीं. 'नारी हृदय' उनका कहानी संग्रह है. बाल विधवा शिवरानी देवी का विवाह 1905 में प्रेमचंद से हुआ था, वह स्वाधीनता संघर्ष में भी सक्रिय रहीं, उन्हें 1930 में 2 महीने का कारावास भोगना पड़ा था.

शिवरानी देवी स्त्री- अधिकारों के प्रति सचेत थीं. प्रेमचंद का कद  इतना बड़ा है कि हम कथाकार शिवरानी देवी को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं. देखना तो यह भी चाहिए कि प्रेमचंद की समझ (स्त्री-चेतना)में शिवरानी देवी के होने से क्या कोई फर्क पड़ा था ?

आलोचक रोहिणी अग्रवाल के स्तम्भ ‘स्त्री-चेतना’ में आपने लेखिका ‘अज्ञात हिन्दू महिला’ के विषय में पढ़ा है, आज प्रस्तुत है – ‘शिवरानी देवी :  प्रेमचंद का विलोम’





शिवरानी  देवी :  प्रेमचंद   का  विलोम                             

रोहिणी अग्रवाल

(''स्त्री में स्त्रीत्व ही नहीं, बल्कि मातृत्व भी होना चाहिए''  बनाम ''अगर आप मेरी बीवी होते तो मैं बताती कि स्त्रिायों के साथ कैसे रहना चाहिए'') 






'प्रेमचंद: घर में'  तथा 'नारी हृदय' कहानी संग्रह की कुछेक कहानियों के आधार पर यदि शिवरानी देवी का मूल्यांकन किया जाए तो वे बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों की पहली लेखिका हैं जो अभिमानपूर्वक स्वयं को 'उद्दण्ड' कहती हैं और पति उन्हें 'योद्धा' स्त्री. जिस दबंग निर्भीकता से वे पति के भीतर बैठे सामंती पुरुष की ख़बर लेती हैं, उससे पुस्तक के भूमिकाकार बनारसीदास चतुर्वेदी ख़ासे भयभीत हैं. हालांकि पतिपरायणा पत्नी की भूमिका में स्वयं शिवरानी देवी भी जहां-तहां दो फांकों में विभाजित अपने व्यक्तित्व की झलक देती चलती हैं, लेकिन बनारसीदास चतुर्वेदी खिसियायी मुद्रा में ऐसे श्रद्धाविगलित भावुक समर्पणों को रेखांकित कर उनकी तेजी और ताप पर लीपापोती करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते.

मसलन शिवरानी देवी में
''विचार करने का और उन विचारों को प्रकट करने का साहस पहले से ही मौजूद रहा है. इस पुस्तक में यद्यपि जगह-जगह पर उनकी पतिभक्ति के उदाहरण विद्यमान हैं तथापि प्रेमचंद जी से मतभेद होने की भी कई मिसालें उन्होंने दी हैं और उनके कारण स्वयं उनका और पुस्तक का भी गौरव बहुत बढ़ गया है''  तथा
''इन वार्तालापों से जहां प्रेमचंद जी का सहृदयतापूर्ण रूप प्रकट होता है, वहां शिवरानी जी का अपना अक्खड़पन भी कम आकर्षक नहीं. . . . शिवरानी जी प्रेमचंद जी की पूरक थीं, उनकी कोरमकोर छाया या प्रतिबिंब नहीं.''  

इन लीपापेतियों का मूल लक्ष्य  प्रेमचंद को उस 'गुनाह' के लिए क्लीन चिट दे देना है जिसका जिक्र अमूमन 'सती' स्त्रियां किसी और से नहीं करतीं. वे लिखते हैं –

''इस ग्रंथ में लेखिका ने अपनी सहज स्वाभाविकता के साथ प्रेमचंद की त्रुटियों का उल्लेख कर दिया है. प्रेमचंद जी की एक उपपत्नी या रखैल का जिक्र ऐसे प्रसंग में किया गया है कि कोई भी सहृदय पाठक प्रेमचंद जी को अपराधी नहीं कह सकता और न उन पर जज बन कर बैठ सकता है. अपनी अंतिम बीमारी के दिनों में वे मानो अपनी सती-साध्वी पत्नी से क्षमायाचना कर रहे थे.''

आश्चर्य है कि बेहद आक्रामक ढंग से आत्माभिव्यक्ति करने वाली शिवरानी देवी ने संस्मरणात्मक पुस्तक या कहानियों में पति/पुरुष की इस 'करनी' की भर्त्सना क्यों नहीं की?

शिवरानी देवी का दुर्भाग्य रहा कि प्रतिष्ठित लेखक की पत्नी होने के कारण वे लेखिका के रूप में  अलग पहचान और स्वतंत्र व्यक्तित्व अर्जित नहीं कर पाईं. बल्कि इस हद तक वे पुरुष-द्वेष का शिकार रहीं कि ईर्ष्यालु लोगों द्वारा प्रेमचंद को उनकी कहानियों के रचयिता के रूप में  प्रचारित किया जाता रहा. प्रेमचंद भले ही इस अभियोग का खंडन करते रहें -

''मेरे जैसा शांतिप्रिय स्वभाव वाला आदमी इस प्रकार के अक्खड़पन से भरे जोरदार स्त्री जाति सम्बन्धी प्लाटों की कल्पना भी नहीं कर सकता''.

 शिवरानी देवी कंधे उचका कर हर तरह के लोकापवाद की धज्जियां उड़ाती रही हैं. हां, इतना भर प्रयास अवश्य रहा कि कोई भी कहानी पति के अनुकरण पर न जा रही हो. शिवरानी देवी का लेखन आत्मकथात्मक नहीं है. अपने युग की ज्वलंत समस्याओं से जूझते हुए वे दहेज प्रथा, अनमेल विवाह, सौतेली मां की क्रूरता, स्त्री के दायित्वों, हिंदू-मुस्लिम दंगों और देशप्रेम को कहानियों का कथ्य बनाती रही हैं, लेकिन बारीक जांच करने पर स्त्री मुद्दों को लेकर लिखी गई कहानियों में निजी जीवन के अनुभव की टीस या कड़वाहट अवश्य झलकती है. प्रेमचंद के साथ उन्होंने एक लम्बा मधुर दाम्पत्य जीवन जिया है. वे स्वयं स्वीकार करती हैं कि वे प्रेमचंद के घर की मालकिन न होकर 'उनके हृदय की मालकिन थीं' (पृ. 145), लेकिन वैवाहिक जीवन के प्रारंभिक आठ वर्षों के अजनबीपन में वस्तुपरक ढंग से पति के पुरुष-चरित्र में उन्होंने जिन दुर्बलताओं को देखा, उन्हें स्त्री-जीवन को अभिशप्त करने वाली बुराई के रूप में अपनी कहानियों में चित्रित किया है.

वे सबसे ज्यादा आहत हैं पति के झूठ से जिसने एक साथ दो स्त्रियों को बरबाद किया. पहली स्त्री वे स्वयं हैं जिनसे पहली पत्नी की मृत्यु की झूठी बात कह कर ब्याह रचाया गया, दूसरी स्त्री उनकी पहली पत्नी है जिसे इसलिए छोड़ा गया कि वह निर्लज्ज है, बदसूरत तथा कर्कशा है. उस बदनसीब स्त्री की 'मिट्टी पलीद' कर दिए जाने की 'कुरेदन' से व्यथित शिवरानी देवी सखीभाव विस्तार करते हुए पति से उन्हें लिवा लाने को कहती हैं; पति के इस कथन - 'जिसको इंसान समझे कि जीवित है, वही जीवित है, जिसे समझे मर गया, वह मर गया' - पर फटकार लगाने से भी नहीं चूकतीं; और पति के इंकार करने पर उनकी पूर्व-पत्नी को घर की बड़ी मालकिन के रूप में चले आने का निमंत्रण भरा पत्र भी लिखती हैं. रूप-लोलुप पुरुष-प्रवृत्ति को वे जीवन भर क्षमा नहीं कर पाईं. जब-तब प्रेमचंद को आड़े हाथों लेती रही हैं 

''आप दावे के साथ कह सकते हैं कि आपका अपना चरित्र अच्छा था? खामोश . . . मैं बदसूरत होती तो आप मुझे भी छोड़ देते? अगर मेरा बस होता तो मैं सब जगह ढिंढोरा पिटवाती कि कोई भी तुम्हारे साथ शादी न करे.'' (पृ. 8)

या फिर 'नारी हृदय', 'सौत', 'वरयात्रा' आदि कहानियों में उनकी भ्रमर-वृत्ति पर व्यंग्य करती रही हैं. 'वरयात्रा' कहानी की पहली पंक्ति ही इसका प्रमाण है - ''आज रामनाथ अपनी पंद्रह साल की ब्याही हुई स्त्री से मुंह मोड़ कर दूसरा ब्याह करने की तैयारी कर रहे हैं.'' (नारी हृदय, पृ. 73)  पिता के घर विधवाओं का सा जीवन काटती रही रामनाथ की पहली पत्नी रामेश्वरी का कसूर यही है कि वह अभिमानिनी है, न दबना जानती है और न पुरुष की गुलामी करने को अपनी खुशनसीबी. समानता और बंधुत्व का अहसास हो तो वह सब कुछ कर दे लेकिन 'वह स्त्री है और पति उसका भरण-पोषण करता है' जैसी कृतज्ञताओं को गले में ढोल की तरह लटका कर लिथड़ती रहे? , वह अपमान से तिलमिला जाती है. इसी रामेश्वरी को उसकी 'औकात' बताने रामनाथ चुपके से ब्याह रचा रहे हैं, उसका ठीक विलोम- अनपढ़, सुशील, दब्बू पत्नी घर ला कर.

पढ़ी-लिखी पत्नी से मन भर गया है; और फिर मन में पलता मासूम विश्वास है कि अनपढ़ बहू खूब चाकरी करेगी, अदब मानेगी, घर के काम-धंधे में जी लगाएगी. यानी चारों तरफ सुख की बरसात! रामेश्वरी को कोई खबर नहीं, न ही उसके परिजनों को. ठीक बारात वाले दिन रहस्योद्घाटन होता है जब अधेड़ दूल्हे मियां मौर सजा कर दुल्हन को लिवाने जा रहे हैं. शिवरानी की विशेषता है कि निजी जीवन की कड़वाहटें कुंठा या घृणा बन कर उनके मन में विकार पैदा नहीं करतीं, बल्कि वे स्त्री जाति की नियति, पुरुष-प्रवृत्ति की पहचान और समाजशास्त्रीय व्यवस्था की तटस्थ पड़ताल का सबब बन जाती हैं. इसलिए जब वे कहती हैं कि
''मैं स्वयं तकलीफ सहने को तैयार हूं, पर स्त्री जाति की तकलीफ मैं नहीं देख सकती''

तब अपनी संवेदना का विस्तार कर वे निजी टीस और असहमति को आक्रोश और विद्रोह सरीखे रचनात्मक औजारों में ढाल लेती हैं. 'वरयात्रा' में रामनाथ की गुपचुप बारात-यात्रा के विवरण के पीछे उनके हृदय में गर्व और व्यंग्य से सनी कसैली स्मृति है अपने विवाह की कि विधवा से विवाह करके ''आप (प्रेमचंद) समाज का बंधन तोड़ना चाहते थे. यहां तक कि आपने अपने घरवालों को भी खबर नहीं दी.'' (पृ. 11) साथ ही हृदय को छलनी कर रही है उस अभागिनी की मनोवेदना जो सौत के आगमन पर रो-पीट कर या कोस कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त ही नहीं कर पा रही है.

शिवरानी इस अत्याचार को मूक भाव से सहने को तैयार नहीं. वे निरपराध पत्नी की मूक वेदना में हृदय का हाहाकार पिरो कर समकालीनों से शाबासी नहीं लेना चाहतीं बल्कि प्रवाह के प्रतिकूल बहते हुए उसे अग्निपिंड में तब्दील कर देती हैं. अन्याय को चुपचाप सह लिया तो अन्याय का प्रतिकार कहां? , वह आत्महत्या करके अपराधी की राह को निष्कंटक क्यों बनाए? इसलिए स्त्रियों को प्रिय प्रतीत होने वाला प्राण त्यागने का नुस्खा रामेश्वरी को जरा भी नहीं भाता. मरना ही है तो शहादत क्यों नहीं - समाज के सामने उदाहरण रचती मौत का वरण! ''तुम नवेली बहू के साथ जिंदगी की बहार नहीं उड़ा सकते. अगर मैं रो-रो कर जिंदगी के दिन पूरे कर रही हूं तो तुम्हें भी यों ही जलते रहना पड़ेगा.'' (पृ. 73)


दूल्हे को लेकर गंतव्य तक जाने को तैयार मोटर के ऐन सामने खड़े होकर वह पति की निर्लज्जता को ललकारती है - या तो ब्याह का नाटक छोड़ दो या कुचल कर चलते बनो. दूल्हे मियां पुरुष और दूल्हा होने के दूने अभिमान में भर कर मोटर को स्पीड से रामेश्वरी की ओर दौड़ाते हैं. विश्वास है कमजोर औरतजात जान बचाने के लिए एक ओर हट जाएगी. लेकिन लेखिका की मानसिक-वैचारिक दृढ़ता से सिरजी यह स्त्री सिर पर कफन बांध कर आई है. उसकी जीवन-लीला मौत के मातम के साथ समाप्त नहीं होती, पुरुष समाज की क्रूरता और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ चेतना और स्त्री सक्रियता की पहलकदमी के साथ नए युग का आह्वान करती है.

शिवरानी देवी की नायिकाएं युगीन सत्य को प्रतिबिंबित करते हुए पीड़िता और पुरुष-प्रताड़िता हैं, लेकिन युगीन सत्य का अतिक्रमण कर वे अपने लिए नई राहों का संधान करने का सामर्थ्य भी रखती हैं.

'करनी का फल' कहानी में लम्पट युवक को उसकी करतूतों का फल चखाती तेज-तर्रार युवती हो या 'साहस' कहानी में ऐन विवाह-मंडप के बीच वृद्ध वर महाशय की खोपड़ी पर जूते बरसाती वधू - शिवरानी की नायिकाएं प्रतिकूल परिस्थितियों के समक्ष घुटने नहीं टेकतीं. शिवरानी के अपने व्यक्तित्व में लिजलिजापन या द्वंद्वग्रस्तता नहीं. वहां है गत्यात्मक ऊर्जा, वैचारिक स्पष्टता, ईमानदारी, निर्भीकता और अपने को दूर तक साफ-साफ देख पाने की पारदर्शिता. ''मैंने जीवन में कभी डरना नहीं सीखा. अपने से मैं किसी को छेडूंगी नहीं, मगर जो मुझे छेड़ेगा, उससे डर कर कहीं भागूंगी भी नहीं.'' (प्रेमचंद घर में, पृ. 52) .

शिवरानी अपने युग की दबी-सिकुड़ी स्त्री छवि (जो पुरुष रचनाकारों की रचनाओं के माध्यम से आज के पाठक के मस्तिष्क में आकार ग्रहण करती है) को परे फेंकती हैं. वे जिस स्त्री-छवि को गढ़ती हैं, उसमें शराब पीकर आधी रात को घर लौटे पति की प्रतीक्षा में पलक-पांवड़े बिछाती पत्नी की कातरता नहीं है, खनकती आवाज में अपने को सुधारने का आदेश देती सलाह है - ''मैं इन आदतों के फेर में पड़ने वाली नहीं हूं. मैं उसी दिन आपसे कह चुकी हूं.'' यह स्त्री ताउम्र समझौते करते-करते अपने वजूद को गलाती नहीं, अरुचि और असहमति का स्पष्ट ऐलान कर समझौते करने की दिशा और सीमा बताती है - ''मैं अपनी रुचि के प्रतिकूल आदमियों के साथ रह ही नहीं सकती.'' (पृ. 73) सांस-सांस में नैतिक और मानसिक स्वतंत्रता जीती यह स्त्री जानती है कि ''जरूरतों का गुलाम होना ठीक नहीं'' (पृ. 64), इसलिए स्वतंत्र निर्णय लेने में जरा भी देरी नहीं लगाती. प्रेस लगाने के मामले में प्रेमचंद आंख मूंद कर पार्टनर की शर्तों पर सहमति की मुहर लगा देना चाहते हैं, लेकिन शिवरानी देवी स्याह-सफेद, शर्तें-कायदे सब कुछ बारीकी से जान लेना चाहती हैं. 


पति के विरोध के आगे मिमियाने का तो सवाल ही नहीं  बल्कि गृहस्थी के खर्चों से पाई-पाई जोड़ कर जमा की गई बचत की पूंजी देने से साफ इंकार कर देती हैं - ''ये रुपए आपके नहीं, आप अपने रुपए दीजिए. (मेरे) रुपए मेरी ही शर्त पर जाएंगे.'' (पृ. 46) जाहिर है यह स्त्री पति के भ्रू-संकेत पर गहने तो क्या सर्वस्व न्योछावर करती रूढ़ स्त्री-छवि को पटकनी देती है. तद्युगीन समाजसुधारकों, नेताओं और लेखकों ने जिस मातृत्व को झुनझना बना कर स्त्री के हाथ में थमा दिया कि आंचल में दूध और आंख में पानी भर कर वह संतान को सेती-खिलाती रहे, उस रूढ़ मातृ छवि को शिवरानी देवी सिरे से खारिज कर देती हैं.

वे भारतीय परंपराओं की विरोधी नहीं, लेकिन 'आंख खोल कर चलने' के 'दोष' के कारण जर्जर परंपरा को पूरी ताकत के साथ अस्वीकार करती हैं. वे मां हैं, और मां का दायित्व संतान को जन्म देकर उसका शारीरिक विकास करना और उसकी हर जायज-नाजायज इच्छा के आगे घुटने टेकना नहीं है, बल्कि उसे नैतिक-मानसिक-बौद्धिक रूप से एक ज़िम्मेदार नागरिक बनाना है. साधना की इस कठिन डगर पर कड़ा अनुशासन तो है ही, पुचकार के साथ भरपूर फटकार भी है. नहीं है तो ताउम्र बेटे को गोद में बैठा कर अंधी ममता लुटाने की मानसिक रुग्णता. 

पति का विलोम बन कर शिवरानी बच्चों को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं, अपने को खाद की तरह गला डालना नहीं - ''बच्चे खुद अपनी ख्वाहिश अपने हाथ-पैरों से पूरी करेंगे. . . . अगर ये न वैसे बने तो मैं समझ लूंगी ये मेरे बच्चे हई नहीं हैं.'' (पृ. 72) पुरुष-पोषित रूढ़ मातृ छवि (जिसका चरमोत्कर्ष यशोदा-कृष्ण में दिखाई देता है) का तीखा नकार पहली बार हिंदी साहित्य में स्त्री रचनाकार द्वारा किया जाना निःसंदेह एक अद्भुत घटना है, और उतनी ही अद्भुत है इस गूंजती टंकार को अनसुना करतीं बहरी हरकतें. जाहिर है यहां वर्जीनिया वुल्फ की इस उक्ति का स्मरण हो आना अस्वाभाविक नहीं कि यदि यथार्थ जगत में अपनी गति-मति से जीती वास्तविक स्त्री विद्यमान न होती तो पुरुष-रचित साहित्य में स्त्रीद्वेष से सनी अथवा निरर्थक महिमामंडन से संवरी स्त्री छवि देख स्त्रियों के बारे में निर्मूल धारणाएं ही बनी रहतीं. तब अपने समकालीनों की तुलना में यशपाल ज्यादा ईमानदार और प्रखर जान पड़ते हैं जब डंके की चोट पर अपनी असफलता का ऐलान करते वे कहते हैं कि ''पुरुष कभी स्त्री के दृष्टिकोण से समस्या को नहीं देख सकता.'' लेकिन दुर्भाग्यवश किसी दुरभिसंधि के अधीन शिवरानी देवी और यशपाल सहित हर उस आवाज को आज तक अनसुना कर दिया जाता रहा है जो स्त्री की मनुष्यता को सही परिप्रेक्ष्य और स्वर देने का प्रयास करती है.

'योद्धा' शिवरानी का लेखकीय व्यक्तित्व पति की लेखकीय मिशनबद्धता के अनुकरण पर आकार ग्रहण करता है, लेकिन फैलने-फूटने के लिए अपनी ही दिशाएं स्वयं चुनता है. इसलिए उसमें उपदेश का बड़प्पन नहीं, जुझारु व्यक्ति की ऊर्जा और संकल्पदृढ़ता है. शिवरानी 'नारी हृदय, 'सौत', 'आंसू', 'बूढ़ी काकी', 'माता', 'हत्यारा', 'सच्ची सती' जैसी कहानियों में स्त्री की रूढ़ छवियों (दुष्ट सौतेली मां, पतिपरायणा पत्नी, बेबस गरीब मां, देश के लिए पुत्र की कुर्बानी देती राष्ट्रमाता) को स्टीरियोटाइप ढंग से पुष्ट करती चलती हैं, किंतु फिर भी उनकी संवेदना और अंतर्दृष्टि का संस्पर्श पा वे कहानियां किसी एक बिंदु पर विशिष्ट हो जाती हैं.

मसलन, सौतेली मां की नकारात्मक छवि प्रस्तुत करते-करते कहानी अचानक यह प्रश्न उठाने का आभास देने लगती है कि यदि स्त्री अंततः और मूलतः मां है तो सगी-सौतेली विशेषणों से उसकी मातृ छवि में अंतर क्यों आता है? तो क्या मातृ-छवि का आरोपण स्त्री को न जानने का अथवा अपनी अपूर्ण जानकारी को पूर्ण सत्य बना कर पोसने का दंभ मात्र है?

'विजय' कहानी में पतिपरायणा स्त्री-छवि जोर-शोर से उद्घोष करती है कि आत्मसमर्पण द्वारा ही स्त्री पुरुष पर राज कर सकती है (नारी हृदय, पृ. 56) , लेकिन बहुत गहरे जाकर तेजी से इस प्रश्न को सतह पर भी उभार लाती है कि 'आत्मसमर्पण' का अर्थ क्या है? व्यक्तित्वहीनता? चिर-दासीत्व की स्वीकृति? या सम्बन्धों में समानता की कोई नवीन संकल्पना? यदि आत्मसमर्पण का अर्थ युद्धक्षेत्र में पराजित योद्धा का मान-मर्दन है तो क्या इस पर सुमधुर दाम्पत्य सम्बन्ध की नींव रखी जा सकेगी?

शिवरानी देवी लेखन में प्रेमचंद का कंट्रास्ट रचती हैं. दहेज और अनमेल विवाह जैसी कुप्रथाओं के दुष्परिणामों को लेकर प्रेमचंद 'निर्मला' जैसा भावविगलित और करुण उपन्यास लिखते हैं तो शिवरानी देवी 'साहस' जैसी उद्बोधनात्मक एवं सक्रियता से भरपूर कहानी. यहां भी विवाह-योग्य कन्या को ब्याहने यानी 'पाप टालने' को आतुर मां है कि ''पड़ोसियों के ताने-मेहने कौन सुने?'' जवान बेटों के बाप पचपन वर्षीय वृद्ध से फूल सी कोमल बेटी को ब्याहने के प्रस्ताव और समृद्ध वर द्वारा ब्याह का खर्च उठाने को दी गई राशि स्वीकारने के अनिवार्य विकल्प (प्रलोभन?) पर शाइस्तगी भरी चुप्पी है कि ''किसी तरह इसकी भांवरे पड़ जाएं तो क्लेश कटे''.

बेटी के भविष्य के प्रति चिंता और मंगलकामना के बावजूद सौतेली मां-सी हृदयहीना यह मां अपनी हर प्रतिक्रिया के साथ व्यवस्था के दबाव और उत्पीड़क स्वरूप को दर्शा रही है. यहां उनकी नायिका वृद्धावस्था में विवाह करने को कामातुर पुरुष पर जूतियां बरसा कर परिवार और समाज के न्याय-विधान पर सवालिया निशान लगाती है तो दूसरी ओर अबला छवि से स्वयं को मुक्त कर जीवन-यथार्थ से जूझने के सामर्थ्य को मिसाल के रूप में रखती है. यह तेजस स्त्री-छवि ब्याही गुड़िया की भांति घर की चारदीवारी के भीतर कैद नहीं की जा सकती. इसे तो देश के चप्पे-चप्पे में घूम कर अपनी बहनों को स्वावलम्बन और स्वाभिमान का संदेश देना है. इस नौकरीपेशा अविवाहित स्त्री पर ही नए युग का महाभाष्य लिखने का गुरु भार है. 'निर्मला' की तरह यदि शिवरानी यहां सारी पीड़ा और अन्याय को आंसुओं के साथ बहा देतीं तो अमानवीयता असहनीय घुटन और घुटन जानलेवा सवाल बन कर कहानी के प्रभाव को सघन न करती.

कहानी-लेखन शिवरानी देवी के लिए आत्माभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं है; समाज के नवनिर्माण के महत् दायित्व का गंभीर निर्वहण है. इसलिए कहानी के अंत में वे अपनी हर विद्रोहिणी नायिका की पीठ ठोंकती हैं -
तुमने आर्यदेवियों का मुख उज्ज्वल कर दिया'' और पाठकों से उन्हें रोल मॉडल बना लेने का प्रच्छन्न अनुरोध भी करती हैं
''सारे शहर में रामप्यारी की प्रशंसा हो रही थी . . . वाह, कैसी दिलेर लड़की है. ऐसी ही देवियों से जाति का मुख उज्ज्वल होता है. . . . भोली भेड़-बकरियां जो अपना उद्धार स्वयं नहीं कर सकतीं, उनसे क्या आशा की जा सकती है?''

वस्तुतः ऐसी प्रेरणादायक कहानियां लिखना शिवरानी देवी का 'नशा' है. प्रेमचंद उन्हें लाख मना करते रहें कि साहित्य साधना के नाम पर वे क्यों अपना 'खून जला' रही हैं, लेकिन शिवरानी तो मानो खून जलाने को ही तैयार बैठी हैं. पति का उलाहना - ''पर तुम कहां बाज आओगी' - उन्हें रोक नहीं सकता. उसकी दो टूक काट उनके पास मौजूद है - ''बाज आते रहे हैं, कब तक बाज आते रहें.'' (प्रेमचंद घर में, पृ. 76)

दरअसल यही उद्धतता शिवरानी के व्यक्तित्व को मौलिकता, ऊर्जस्विता और निजता देती है जो 'वधू परीक्षा' और 'समझौता' कहानियों में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच जाती हैं. 'वधू परीक्षा' कहानी में शिवरानी मीठी चुटकियां ले-ले कर घर की औरतों की आड़ में दहेज के नाम पर बेटे की सौदेबाजी करते पुरुषों और सतीत्व के नाम पर पुरुषों को कामुक अदाओं से रिझाने की शिक्षा-दीक्षा लेतीं-देतीं लड़कियों  को फटकारने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़तीं. लेकिन यह उनका अभीष्ट नहीं है. वे तो नायिका निर्मला के साथ खड़ी होकर पहले विवाह संस्था को ही रिव्यू कर लेना चाहती हैं कि क्या विवाह की सारी गरज स्त्री को ही है? क्यों बगैर रुपए की थैली के वह वर के साथ तराजू पर रखी ही नहीं जा सकती? कि सदियों से स्त्री इस अपमान को सहती क्यों चली आ रही है? सिर्फ पेट भर रोटी खाने के लिए? लेकिन उसके लिए क्या वह खुद कमा नहीं सकती? क्या उसे खुद कमाना नहीं चाहिए? अकेली औरत यदि कमजोर है और उसे सदैव एक रक्षक की जरूरत है तो क्यों नहीं दस-पांच स्त्रियां मिल कर 'साथ रहतीं'?

विवाह संस्था का उन्मूलन नहीं तो उसके विकल्पों पर विचार तो किया ही जा सकता है न! यहां कथा नायिका निर्मला और वेश्याओं की नियति पर विचार कर-कर के क्रुद्ध और क्षुब्ध होती कथा लेखिका शिवरानी में गहरी समानता द्रष्टव्य है. शिवरानी 'प्रेमचंदः घर में’  लिखती हैं - ''ईश्वर ने पुरुषों को स्त्रियों  की जिम्मेदारी दी है. वे चाहे जो कर सकते हैं. मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आता कि परमात्मा स्त्रियों को जन्म क्यों देता है. दुनिया में आकर वे क्या सुख उठाती हैं . . . शायद पुरुषों के पैरों तले रौंदी जाने के लिए ही वे संसार में आती हैं और हमेशा उन्हीं सब की वे सेवा भी करती हैं. अगर मेरा वश होता तो मैं स्त्री मात्र को संसार से अलग कर देती. न रहता बांस, न बजती बांसुरी.'' (पृ. 136)

लेकिन कहानी में निर्मला और लेखिका दोनों के लिए फिलहाल ये सैद्धांतिक बातें 'हवाई' बातें हैं क्योंकि सिर पर लटकी है वधू-परीक्षा की तलवार. मानो वह हाट-बाजार में पड़ा सौदा-वस्तु है जिसे ग्राहक नाप-तोल कर जांचे और पसंद आने पर खरीद कर चलता बने. उसके स्त्रीत्व में क्या मनुष्यत्व का अंश मात्र भी नहीं? निर्मला सती होना अस्वीकार करती है. वह घूंघट खोल कर वर-पक्ष से नपा-तुला एक ही सवाल करती है कि क्या विवाह स्त्री और पुरुष दोनों ही की पसंद से होना चाहिए? यदि हां, तो ''मुझे इन महाशय से विवाह करना मंजूर नहीं'' क्योंकि जिस विवाह का आधार रूप है, वह रूप ही की तरह अस्थिर होगा. यह कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है कि अपने वक्त से आगे जाकर स्थितियों को नए आलोक में देखने का आग्रह करती है.

एक, ब्याह जैसे मामलों में स्त्री की स्वीकृति मानी हुई बात क्यों हो? दूसरे, पुरुष इस अहंकार को छोड़ दे कि विवाह करके वह कन्या का उद्धार करता है, बल्कि उसे समझना चाहिए कि कन्या विवाह करके पुरुष का उद्धार करती है. तीसरे, विवाह स्त्री के जीवन का अंतिम सत्य नहीं. आर्थिक स्वावलम्बन के जरिए वह बेहतर जीवन जीने का विकल्प अपनाने को तैयार बैठी है.

भावना और बौद्धिकता का संतुलित तालमेल शिवरानी की कहानियों में मास अपील पैदा करता है. उनकी अपनी स्वभावगत धीरता, जुझारु वृत्ति और दृष्टिगत उदारता किसी भी पूर्वग्रह या दुराग्रह में कैद नहीं होती वरन् तर्क-वितर्क के जरिए स्थितियों की पड़ताल करती चलती है. 'समझौता' कहानी में वे स्वतंत्र भारत में स्वराज्य की परिकल्पना से गद्गद् हैं. उन्हें विश्वास है कि स्त्री-पुरुष समानता का उनका स्वप्न अंततः स्वतंत्र भारत में पूर्ण हो जाएगा. सम्पत्ति, संतान, धर्म और देह पर स्त्री के अधिकार की कामना करती शिवरानी देवी आज के स्त्री विमर्श की जननी प्रतीत होती हैं, विशेषकर देह पर स्त्री-अधिकार की पैरवी के संदर्भ में. लेकिन जिस प्रकार आज का 'प्रगतिशील' पुरुष स्त्री विमर्श में देहमुक्ति के आग्रह को स्त्रीमुक्ति आंदोलन के स्खलन और नकारात्मक पाश्चात्य प्रभाव की दुहाई देकर खारिज करता है, उसी प्रकार तद्युगीन पुरुष भी पश्चिम की दुहाई देकर अपनी परिणीता/प्रबुद्ध स्त्री का मुंह बंद कर देना चाहता है - 


''तुम लोगों पर भी पच्छिम का जादू चल गया और तुम भी हकों के लिए लड़ने पर तैयार हो गईं. स्त्री का महत्व और बड़प्पन इसी बात में है कि वह माता है और माता का गुण है त्याग और उत्सर्ग. अगर स्त्री उस पद को त्याग कर पुरुषों के बराबर आना चाहती है तो शौक से आवे, लेकिन उसे बहुत जल्द मालूम हो जाएगा कि इन हकों को लेकर उसने महंगा सौदा किया है.'' (नारी हृदय, पृ. 151) या समानाधिकार के दावे के बरक्स दफ्तर में बराबर का काम करने का भय दिखाना चाहता है.

लेकिन शिवरानी की नायिका किसी भी शै से भयभीत होने वाली स्त्री नहीं. मुंहतोड़ जवाब उसके पास सदा तैयार है –

''स्त्रियां जितने त्याग से काम कर सकती हैं, पुरुष नहीं कर सकते; लेकिन तब बच्चे आप ही पैदा कीजिएगा और घर के सब काम-काज भी आपको करने पड़ेंगे.'' (पृ. 152)

यह स्त्री स्वतंत्र भारत में वेश्यावृत्ति का उन्मूलन  और बहुविवाह प्रथा को कानूनन निषिद्ध करवाने  के लिए कटिबद्ध है. 'आधी दुनिया' के लिए 'आधी जमीन और आधे आसमान' की पैरवी करती यह स्त्री नौकरियों में 'आधी जगहें' लेकर आर्थिक स्वाधीनता अर्जित करना चाहती है - 


''नौकरी करना आसान है या मुश्किल, इसके बारे में स्त्रियां आप लोगों की राय नहीं पूछने जातीं. वे यह जानती हैं कि बिना मुश्किल काम किए उनका यथार्थ आदर नहीं हो सकता. इसीलिए अब वह आसान काम छोड़ कर मुश्किल काम करेंगी. जब पुरुषों को घर के आसान काम करने का तजरबा हो जाएगा, तब उन्हें स्त्रियों की कदर मालूम होगी. अगर पुरुष मुश्किल काम कर सकता है तो स्त्री भी कर सकती है.'' (पृ. 158)

व्यंग्य नहीं, उलाहना नहीं, सहयोग की कातर पुकार नहीं, चुनौती के जवाब में चुनौती को स्वीकारने का हौसला, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प! सपनों को साकार करने के लिए इसके अतिरिक्त और चाहिए भी क्या?

लेकिन ठीक यहीं लेखिका की सर्जनात्मक स्वप्नशीलता का विलोम रचते हुए प्रेमचंद की गूंजती आवाज को अनसुना करना भी ठीक नहीं कि स्त्रियां ''नौकरियां करने लगी हैं, मगर मैं इसको अच्छा नहीं समझता. अब इसका नतीजा क्या हो रहा है? अब पुरुष और स्त्री दोनों नौकरियां करने लगे, तब इसके माने क्या हैं? रुपये ज्यादा आ जाएंगे. उसी का तो यह फल है कि बेकारी बढ़ रही है.'' (प्रेमचंद: घर में, पृ. 192)

उनकी दृष्टि में स्त्रियों की ''कमाई का सवाल अभी थोड़े दिनों से उठा है; नहीं तो पहले स्त्रियों की कमाई एक पैसा नहीं होती थी और स्त्रियां काफी दबदबे के साथ घर पर शासन करतीं थीं. तब क्या वह कमाई करती थी.'' अलबत्ता वे पुरुष के बड़प्पन को जरूर रेखांकित करना नहीं भूलते कि ''पुरुष खुद मजदूर बन सकता है, मगर अपने घर की स्त्री को मजदूरनी बनाना पसंद नहीं करता.'' उनकी लच्छेदार बातों को सुन कर शिवरानी उन पर अकसर कटाक्ष भी करती हैं कि ''खुशामद करना हो तो आपको बुला ले. स्त्रियों को तो इस तरह की बातों से और भी अभिमान हो जाएगा.'' (पृ. 125)

तो ऐसी थीं शिवरानी देवी - निर्भीकता और साफगोई की मिसाल! हिंदी आलोचना के हाशिए पर बैठ कर तंज कसती लेखिकाओं में एक!
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प्रोफेसर एवं अध्यक्ष
हिंदी विभाग
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालयरोहतकहरियाणा