भूपिंदरप्रीत की कविताएँ (पंजाबी)

Posted by arun dev on मई 12, 2018



कविताओं का अनुवाद ज़ोखिम से भरा मुश्किल काम है, एक ही कवि की एक ही कविता के दो अनुवादों में बड़ा अंतर भी कई बार दिख जाता है. अनुवाद एक तरह से अपनी भाषा में कवि को फिर से निर्मित करते हैं.   

हिंदी में अनूदित पंजाबी कविताओं की प्रस्तुति- क्रम में अपने गुरप्रीत और बिपनप्रीत की कविताएँ पढ़ी हैं, आज भूपिंदरप्रीत की अठारह कविताओं का अनुवाद आपके लिए प्रस्तुत है. भूपिंदरप्रीत पंजाबी के अग्रणी कवि हैं. इन कविताओं का अनुवाद पंजाबी कवि बिपनप्रीत और हिन्दी कवि रुस्तम द्वारा किया गया है.

इन कविताओं को पढ़ते हुए भूपिंदरप्रीत और पंजाबी कविता की परिपक्वता का पता चलता है.  




           भूपिंदरप्रीत की अठारह कविताएँ (पंजाबी)           
(अनुवाद : पंजाबी कवि बिपनप्रीत और हिन्दी कवि रुस्तम द्वारा)







छोटी सी बात
एक पीला पत्ता
कश्ती की तरह हिल रहा है
सूरज की
हल्की पीली रोशनी को
अपने अन्दर समेट रहा है
अभी-अभी बारिश थमी है
मेरी छत पर समुद्र है
और सूरज आज यहीं पर डूबेगा.




ख़ाली जगह
रोज़ अपने अन्दर मैं एक जगह  ख़ाली करता हूँ
फिर रखता हूँ वहाँ
पक्षियों के लिये दाना, अपने लिए शब्द, खुरदरी ज़मीन के लिए पत्ते
फिर उस भरी जगह में बची
ख़ाली जगह को देखता हूँ
ताकि
सब विसंगतियों के बावजूद जीवन जी सकूँ
मौत को
एक विराम चिन्ह बनाकर.



नैपकिन
महफ़िल में बैठा
तुम्हें एक नैपकिन पर लिख सकता हूँ ?
शोर बहुत तीखा है
तुम्हारी स्मृतियों को काटकर
कोई आवाज़
पार नहीं जा सकती

यहाँ हर जगह भरी हुई है

सिर्फ़ एक नैपकिन ख़ाली है
जिस पर मैंने तुम्हें लिख दिया है

जब भी बासी होने लगूँ
मक्खियाँ मुझ पर भिनभिनाने लगें

मुझे इस से ढक देना.
 



उत्सव
क्या बज रहा है घंटियों जैसा
मेरा कमरा कोई मन्दिर या गिरजाघर नहीं
बारिश नहीं हो रही
लेकिन होने की आहट
शीशे पर छलछला रही है
यह उस उम्मीद की तरह है
जो टूटकर भी
अपना प्रतिबिम्ब छोड़ जाती है
इस समय
अकेला होना ही मेरा उत्सव है
देख रहा हूँ हर वस्तु को
अकेली होते
हैरानी है
कि मैं अन्दर हूँ
और बाहर मिट्टी में से आ रही है
मेरे जज़्ब होने की आवाज़.




जनवरी
रोशनी
बेसुध पड़ी है बर्फ़ पर
निश्छल
अपनी पारदर्शिता को
शीत कणों की तासीर में पिघलाती
बादलों को देख
मृत्यु की तरह छटपटाती
हवा और काँच से मिलकर
देह में छुपे सात रंगों को बनाती
बेसुधी में कैसे टूटते हैं धरातल
बिन आवाज़
बर्फ़ को बताती
जनवरी की नग्न रोशनी.
          



सन्तुलन
अचानक मुझे लगा
वहाँ कोई है...पहाड़ी के पीछे
मैंने बहती हवा में पत्तों की सरसराहट सुनी
और देखने चल पड़ा
कौन है
मेरे सिवा
वहाँ ज़मीन पर सिगरेट के कुछ जले हुए टुकड़े पड़े थे
पवित्र किताब और अधजली तीली
टूटी हुई टहनी थोड़ी राख और ख़ाली पन्ना
कौन हो सकता है
इतना सन्तुलित
लेकिन वहाँ कोई नहीं था
सारा सामान एक स्टिल पेंटिंग की तरह पड़ा था
मैंने पूरे जंगल की खामोशी में झाँका
और चल पड़ा 'उसे' ढूँढने
स्टिल पेंटिंग में से गुज़रता हुआ.
  



छुपी रात का संगीत
यह घास में छुपी वह रात है
जिसने कई पहेलियाँ हल कर दी हैं

एक दरख़्त की टहनियाँ
वायलिन के धनु की तरह हिल रही हैं
एक गैरहाज़िर ऊँगली सब से श्रेष्ठ धुन निकाल रही है

इस रात जब कि
पौधे और कीड़े हवा का सन्तुलन तोड़ते जीवित हैं मिट्टी में
मेरे जैसा कोई
कामना और बेचैनी से भरा
बेजान सड़क को चूमता है
सन्नाटे में दस्तक देने के अन्दाज़ में हाथ उठाता है

तेज़ बौछार में से
पत्तों की आवाज़ सुर उठाती है
और रात भर जाती है
छिप-छिप कर कंपोज़ हो रहे नये गीत से.
 



कलाई घड़ी 
कलाई घड़ी
भला कितनी जगह घेरती है
सँभाल लो
माँ की आखिरी यह निशानी
समय के लम्बे अन्तराल में से निकलते
पिता ने कहा
और खामोश हो गया.




माँ बिन पिता
ख़ाली-ख़ाली आँखों से पिता देखता है
माँ बिन ख़ाली कमरा
कमरे के ख़ाली स्थान में दिखता है उसे
एक और स्थान
जहाँ माँ देखा करती थी
माँ वाले ख़ाली स्थान में देखने के लिए
देख रहा है पिता
वह माँ का चश्मा और सिलाइयां सम्भालता हुआ कहता है ---
मेरे कमरे में से उसकी तस्वीर उठा दो
कमरा भरा हुआ रहने दो
उसकी ख़ाली आँखों से.




मैं इतना जालसाज़ क्यों हूँ
माँ समुद्र थी

देखा पिता को एक दिन मैंने उसके
तट पर नहाते
पिता डूबे हुए थे
कमर तक पानी में
और माँ बार-बार उछाल रही थी
अपना समुद्र
उनकी तरफ़
जब पिता लहरों में नहीं फंसे
माँ एकदम समुद्र से
जाल में बदल गयी
उस दिन से जाना
मैं इतना जालसाज़
क्यों हूँ.
          



याददाश्त
एक दिन आसमान का नाम भूल जाऊँगा
यह भी न कह सकूँगा
नीला
हरे रंग में पड़ी पेंटिंग
धूप में पड़ी
परछाईं भूल जाऊँगा
पीले के अन्दर नीला
हरे के अन्दर वृक्ष
मैं अपनी शाखाओं को हिलाना भूल जाऊँगा
अन्तहीन सड़कों पर पागलों की तरह दौड़ना
सृष्टि को एक गड्ढा समझना
और खुद को इस में
कंचे की तरह फेंकना भूल जाऊँगा
ईश्वर   देह   बुद्धि   आत्मा  सब
निहत्था हो जाऊँगा
ख़ाली
कि तुम्हारे अन्दर से अपना आप उठाना भूल जाऊँगा.




रुस्तम 
तुम्हारे नीले बिम्ब
मेरी लाल धमनियों में फैल रहे हैं
वो मेज़ पर पड़ा घूंघरू
और समुद्र में बहता एक और समुद्र
वो आग में बदलती चट्टान
वो लाल दिन
और लाल शिराएँ
अपनी परछाईं से टूटती एक और
परछाईं
नीली रोशनी
काली पत्ती
इन बिम्बों में मैं
एक पर्वत की आवाज़ सुनता हूँ
जिस पर बैठा एक उदास कौवा
मेरी नींद में खलल डाल रहा है
और मेरी आत्मा काँप रही है .




मैं कोई और भेड़ हूँ
उस दिन मैंने
अपनी मृत्यु को एक चरवाहे की तरह
मुझे बचाते हुए देखा
क्या है यह मौत
पोटैशियम साइनाइड
फूल का कम्पन
गायब हो रहा धुआँ
या रात के सन्नाटे में गुम होती
हवा-घण्टियों की आवाज़
इसकी अटल रोशनी में
बहता है पानी
और अनन्त का सिरा तलाशता
मैं साँस लेता हूँ
लेकिन उस दिन तो चीज़ों को
तरतीब देने का समय ही ना मिला
वह आयी
और चरवाहे की छड़ी की तरह छूकर गुज़र गयी
जैसे छूना किसी और को था
और मैं कोई और भेड़ था .
 



मानसिक बोझ
इस तरह मैं
कुछ 'होने' से बच गया
अपने इर्द-गिर्द बुनी कहानी में से
खुद को एक
महत्वपूर्ण तथ्य की तरह
निकाल दिया
बस इतनी सी बात थी
कि आत्मा ने मेरा मानसिक बोझ
चींटी समझ
उठा लिया .




हाँ और ना के बीच
कुछ भी ना कहने तक
पहुँचने के लिए
मैं रोज़
कागज़ काले करता हूँ
कुछ भी ना होने तक
होने के लिए
रोज़ कुछ होता हूँ
हाँ और ना के बीच
मेरी हवा
काँपती है
कल इस तेज़ काँपती हवा ने
एक तितली को
मार दिया
उसकी आत्मा अब
जन्म लेने
और ना लेने के बीच
तड़प रही है .
     




अवचेतन
यह मेरा संसार है
यहाँ अनैतिकता
लाल चींटी की तरह
मिट्टी के भीतर चलती है
नैतिकता के फूल खिलते हैं
अनछुई डाल पर
कभी-कभी
पतझड़ का मौसम आता है
फूल झड़ते हैं
लाल चींटी
डंक मारती है .




छप-छप
कब के सोच रहे थे
कहाँ करें
समुद्र ख़ाली
भोर के वक्त
कायनात जब
अपने थैले में से
निकाल रही थी सूरज
मैंने उसके पानियों में
रख दी
अपनी छप-छप
उसने मेरी छप-छप में
ख़ाली कर दिया
समुद्र .
         




मगरमच्छ
देह
एक बहती नदी है
जिसमें है एक
ज़ख्म
मगरमच्छ की तरह
सुस्त
तट को खुरचता.
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भूपिंदरप्रीत (जन्म 1967):

पंजाबी के महत्वपूर्ण और अग्रणी कवि  भूपिंदरप्रीत  के छह कविता संग्रह प्रकाशित हैं. वे अमृतसर में रहते हैं.
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