मेघ - दूत : भाषा का कौतुक : लॉरा एस्क्विवेल (यादवेन्द्र)

Posted by arun dev on जून 16, 2017

















1950 में जन्मी लॉरा एस्क्विवेल मेक्सिको की बेहद लोकप्रिय और सम्मानित लेखिका हैं. "स्विफ़्ट ऐज डिज़ायर" उनका प्रसिद्ध उपन्यास है जो लैटिन अमेरिका में उपनिवेश स्थापित करने वाले स्पैनिश लोगों और स्थानीय इंडियन जनजातियों के बीच की संस्कृतियों की टकराहट को  रोचक ढंग से व्यक्त करता है. माया भाषा बोलने वाली सास और स्पैनिश भाषा बोलने वाली बहू के बीच खींच तान को दुभाषिये की भूमिका निभाने वाले मजाकिया स्वाभाव के युवक जुबिलो ने कैसे खेल खेल में समाप्त कर दिया, यह बताता है यह प्रसंग. सुंदर स्वाभाविक अनुवाद यादवेन्द्र जी ने किया है. 

लॉरा एस्क्विवेल  राजनीति  से भी जुड़ी हुई  हैं. वह कांग्रेस की निर्वाचित सदस्य हैं.


स्विफ़्ट ऐज डिज़ायर
भाषा का कौतुक                    
लॉरा एस्क्विवेल 
अनुवाद : यादवेन्द्र



ह  छुट्टी वाले दिन हँसता हुआ पैदा हुआ था- उस विशेष दिन पूरा परिवार उसके आसपास ही इकठ्ठा था. लोग बताते हैं कि टेबल के चारों ओर बैठे लोगों के बीच हँसी मज़ाक का दौर चल रहा था और एक लतीफ़ा सुनकर उसकी माँ को इतनी जोर की हँसी आयी कि उसका पानी निकल आया. शुरू में उसको लगा कि ठहाका इतना जोरदार था कि पेशाब निकल कर टाँगों के बीच से बाहर आ गया पर जल्दी ही माजरा समझ में आ गया- उसका बारहवाँ बच्चा पेट से बाहर निकलने को तैयार हो गया था. हँसते हँसते ही वह वहाँ से उठी और अपने कमरे में चली गयी. वह पहले ग्यारह बच्चों को जन्म दे चुकी थी सो इसबार कोई ज्यादा परेशानी नहीं हुई और न समय ही ज्यादा लगा. कुछ मिनटों में ही उसका बारहवाँ बच्चा उसके हाथों में था - वह भी रोता हुआ नहीं बल्कि हँसता हुआ. 

नहा धो कर दोना जेसुसा डाइनिंग रूम में वापस आयी , "देखो,  मेरे साथ कौन आया ?". उसने वहाँ इकठ्ठा सभी रिश्तेदारों को सुना कर कहा. हर कोई मुड़ कर उसको देखने लगा, उसकी बाँहों में एक छोटा सा पुलिंदा भी था. " मुझे इतनी जोर की हँसी आयी कि बच्चा पेट से बाहर निकल आया.", उसने कहा. 

यह सुनते ही सब लोग जोर से हँसे और खुश होकर उसको बधाई देने लगे. उसका पति लिब्रेडो ची ने अपनी बाँहें ऊपर उठा कर कहा : "(क्वे जुबिलो)  कितनी ख़ुशी की बात है !"

इसी समय उसका नाम तय हो गया- जुबिलो से बेहतर नाम और क्या हो सकता था. जुबिलो का मतलब खुशी, हँसी और जिंदादिली. यहाँ तक कि उम्र बढ़ने के बाद जब उसकी आँखों की रोशनी जाती रही तब भी उसने अपनी विनोदप्रियता नहीं छोड़ी. लगता है उसको हँसी मज़ाक करते रहने का विशेष वरदान मिला हुआ है - उसका यह गुण सिर्फ़ अपने तक सीमित नहीं था बल्कि जिनके साथ वह होता सबको हँसाता और खुश रखता. घर से बाहर जहाँ भी वह जाता अपने साथ हँसी ठहाकों का गट्ठर बाँध कर ले जाता. कितना भी गंभीर और ग़मगीन माहौल हो वह पल भर में सारा तनाव मिटा देता और लोगों के चेहरों पर मुस्कान ले आता- उसकी उपस्थिति भर से जादू हो जाता. 

उसके इस व्यवहार से दुनिया का सबसे निराशावादी इंसान भी जीवन के सकारात्मक पक्ष को देखने लगता. पर सारी कायनात में एक प्राणी ऐसा था जिसपर उसका जादू कभी कारगर नहीं हुआ - उसकी पत्नी, पर जैसे हर नियम में कुछ अपवाद होता है वैसे ही उसको भी अपवाद की श्रेणी में रखा जा सकता है. यहाँ तक कि उसकी दादी इतज़ेल ऑय भी जिन्होंने अपने बेटे के एक गोरी मेम से शादी करने के बाद खूब हाय तौबा मचाई थी, जुबिलो को देखते ही मुस्कुरा पड़ी थीं. उन्होंने उसको अपनी मातृभाषा माया भाषा में "मुस्कुराते हुए चेहरे वाला" कह कर सम्बोधित किया. 

जुबिलो के जन्म लेने से पहले तक दोना जेसुसा और दोना इतज़ेल के बीच सम्बन्ध बहुत ख़राब थे- जातीय शुद्धता इसका सबसे बड़ा मुद्दा था. जहाँ तक दोना इतज़ेल का सम्बन्ध था उनमें सौ फ़ीसदी शुद्ध माया रक्त प्रवाहित होता था और उसको माया रक्त का दोना जेसुसा के स्पैनिश रक्त के साथ किसी तरह का मिश्रण बिलकुल मंजूर नहीं था. सालों साल तक वह अपने बेटे के घर का रास्ता भूली रही. उसके पोते पोती बगैर दादी की देख रेख के जन्मे और पले. अपनी बहू को वह इतना हेठा समझती थी कि मिलना जुलना तो दूर दोनों के बीच दशकों तक दिखावे की बोलचाल भी नहीं रही- उसके पास बहाना था कि स्पैनिश भाषा तो उसको आती नहीं. नतीज़ा यह हुआ कि बहू दोना जेसुसा को ही थक हार कर माया भाषा सीखनी पड़ी जिस से सास बहू मिलें तो बोल बतिया सकें. पर एक के बाद एक बारह बच्चों की परवरिश ने उसको इतना वक्त ही नहीं दिया कि ढंग से कोई नयी भाषा सीख सके सो उन दोनों के बीच संवाद लगभग अनुपस्थित रहा. और जब हुआ भी तो बस कामचलाऊ या यूँ कहें कि टालू किस्म का.     

पर जुबिलो के इस धरती पर पैर रखते ही यह सारा मामला पलट गया. उसकी दादी दूर नहीं रह पायीं और पुराना गुस्‍सा थूककर बेटे के घर आना-जाना शुरू कर दिया- पहले के नाती पोतों के साथ उनका रवैया दशकों तक यह बना रहा कि बच्‍चे तुम्‍हारे हैं, इनसे मेरा क्‍या लेना देना. पर जुबिलो के मामले में दादी का दिल उसकी मुस्‍कुराहट के आगे पिघल गया और वे उसके आस-पास बने रहने को लालायित हो गयीं. उन्‍हें लगता था परिवार के लिए जुबिलो ईश्‍वर का वरदान है और परिवार के लोग ऐसे नादान हैं कि उनको मालूम नहीं इस वरदान के साथ क्‍या सलूक किया जाए. जुबिलो और उसके सबसे छोटे भाई के बीच कई सालों का फासला था और उसके बड़े भाइयों-बहनों में से कई ऐसे थे जिनके कई-कई बच्‍चे थे. इसलिए यह‍ तय था कि जुबिलो की परवरिश किसी इकलौते बच्‍चे की तरह होनी थी क्‍योंकि घर में उसके साथ खेलने वाले तमाम उसके भतीजे-भतीजी थे.

उसकी माँ कभी मॉं, कभी प‍त्‍नी, कभी दादी, कभी सास तो कभी बहू की भूमिका  में चकरघिन्‍नी की तरह घूमती रहती और जुबिलो को सँभालने का पूरा जिम्‍मा नौकरों-चाकरों का था. दादी ने आकर उसकी परवरिश अपने हाथों में ले ली और देखते-देखते वह उनका लाड़ला पोता बन गया. दिन का ज्‍यादा समय वे दोनों साथ रहते, घर से बाहर सैर को जाते,खेलते और बतियाते रहते. दादी उससे अपनी हर बात माया भाषा में कहतीं और इस तरह जुबिलो उस परिवार का पहला द्विभाषी बच्‍चा बन गया. देखते-देखते वह परिवार का अधिकारिक दुभाषिया बन गया, वह भी पॉंच साल की छोटी सी उम्र में. एक छोटे बच्‍चे के लिए यह बहुत पेचीदा मामला था क्‍योंकि उसकी मॉं दोना जेसुसा को माया भाषा नहीं आती थी, वे अपनी बात स्‍पेनिश में कहतीं . जुबिलो जब एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करता तो उसका ध्‍यान शब्‍दों के अलावा मॉं और दादी की आवाज की टोन, वोकल कॉर्ड के खिंचाव, उनके चेहरे के हाव-भाव इत्‍यादि पर भी रहता. उसका काम बहुत मुश्किल था पर जुबिलो को यह करने में बहुत मजा आता. 

यह अलग बात थी कि कई बार वह शाब्दिक अनुवाद से जानबूझकर अलग की राह पकड़ता. दोनों स्त्रियों की तू-तू, मैं-मैं में अपनी तरफ से एक दो कोमल शब्‍द डालकर वह यथासंभव बात को मुलायम बनाने की कोशिश करता. उसकी यह निर्दोष तरकीब धीरे-धीरे रंग लाने लगी और सास-बहू के बीच दूरियॉं  कम होने लगीं. बल्कि वे दोनों एक दूसरे को चाहने भी लगीं. अपना यह तजुर्बा कामयाब होते देख जुबिलो को धीरे-धीरे समझ आने लगा कि शब्‍दों में इतनी ताकत है कि वह चाहे तो लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ़ खडे़ कर दे या नज़दीक ले आए. अहम बात यह नहीं थी कि बोला क्‍या जा रहा है, बल्कि यह थी कि वैसा बोलने के पीछे मंशा  क्‍या है.

सुनने में यह बात भले ही  आसान लगे पर थी यह बहुत मुश्किल और जटिल. जुबिलो ने यह महसूस किया कि उसकी दादी जब किसी बात का अनुवाद कराना चाहती थीं तो दरअसल जिन शब्‍दों का वह प्रयोग करतीं वें उनकी मंशा से पूरी तरह मेल नहीं खाते..... उनके मुँह और कण्‍ठ के बीच का खिंचाव उनके शब्‍दों के अनुकूल नहीं होता. जुबिनो जैसे मासूम बच्‍चे के लिए भी यह समझना मुश्किल नहीं होता कि उसकी दादी कुछ शब्‍द बोलती हैं तो कुछ शब्‍द खा जाती हैं. यह सुनने में भले ही अटपटा लगे पर जुबिलो उन शब्‍दों को भी सुनने लगा था जो वास्‍तव में बोले ही न जाते. उसकी धीरे-धीरे यह धारणा पक्‍की होती गयी कि अनबोली आवाज दरअसल दादी की इच्‍छाओं का प्रतिनिधित्‍व करती थी, इसलिए बगैर ज्‍यादा दिमाग लगाए जुबिलो दादी की अस्‍पष्‍ट फुसफुसाहटों का आनन-फानन में अनुवाद कर दिया करता, सबको सुनाकर शब्‍द उन्‍होंने चाहे कुछ भी बोले हों. पर उसके मन में यह बात कभी नहीं आयी कि वह कोई शरारत या बेईमानी कर रहा है बल्कि अपने काम को वह बहुत गम्‍भीरता से लेता- उसका उद्देश्‍य यह था कि घर की इन दो महत्‍वपूर्ण और प्रिय औरतों के बीच की खाई पाट सके और इसके लिए कई बार वह जोर-जोर से ऐसे जादुई शब्‍द कहा करता जो उन दोनों में से किसी ने नहीं कहे होते. उसकी मॉं और दादी के बीच इतने तीखे मदभेद रहते कि उनमें से कोई एक जब कालाकहता तो उसका अभिप्राय सफे़दसे होता .      


उस नन्‍हीं सी जान को यह कभी नहीं समझ आया कि ये दोनों औरतें क्‍यों अपना जीवन लड़-लड़ कर हलकान किये रहती हैं- उनकी तू तू मैं मैं सिर्फ़ उन तक सीमित नहीं रहती बल्कि पूरे परिवार को अपने लपेटे में ले लेती. कोई दिन ऐसा न बीतता जिस दिन झगड़ा झॅंझट न हो. वे कोई न कोई बहाना लड़ने के लिए ढूँढ ही लेतीं. एक कहता कि स्‍पेनियर्ड बंदों की तुलना में इंडियन लोग आलसी और कामचोर होते हैं तो दूसरा फौरन इस तर्क के साथ तैयार हो जाता कि स्‍पेनियर्ड  के बदन से बदबू आती है, इंडियन के बदन से नहीं. उलाहनों और शिकायतों की दोनों के पास कोई कमी नहीं थी पर दोना जासुसा के रहन सहन और रीति-रिवाजो़ं को लेकर सास के  पास हर पल शिकायतों का पुलिंदा तैयार रहत. दोना इतजे़ल को हमेशा यह लगता कि बहू के चाल-चलन नाती पोतों के लिए सही नहीं थे. लम्‍बे समय तक उनकी अपने बेटे के घर की राह भूले रहने के पीछे यही वज़ह थी. बहू को अपने बाल बच्‍चों को स्‍पेनियर्ड शैली में पालना पोसना उन्‍हें कतई मंजूर नहीं था, सो उन्‍होंने उधर आना ही छोड़ दिया था.  पर जुबिलो उनका लाड़ला पोता था सो उसकी सांस्‍कृतिक पहचान को लेकर वे बड़ी संवेदनशील थीं, उसके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ उन्‍हें मंजूर नहीं थी. यह बात हमेशा उनके जहन में रहती इसीलिए वे जुबिलो को माया किस्‍से कहानियॉं सुनाती रहतीं और उन तमाम इंडियन लोकनायकों के संघर्षों के वृत्‍तांत भी सुनाती रहतीं जिन्‍होंने अपनी सांस्‍कृतिक अस्मिता को बचाने के लिए अपने बलिदान कर दिए.

इन संघर्षों में सबसे हाल का था कास्टस (Castes) का युद्ध जिसमें लगभग  पच्‍चीस हजार इंडियनों को प्राणों की आहुति देनी पड़ी. खास बात यह थी कि इस युद्ध में जुबिनो की दादी ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई थी. यह अलग बात है कि इंडियन लोग  लड़ाई हार गए पर परिवार को एक फा़यदा हुआ- दोना इतजे़ल के बेटे लिब्राडो को प्राकृतिक धागे के सबसे बड़े निर्यातक के यहॉं बड़े पद पर नियुक्ति मिल गई. जब उसका जीवन पटरी पर आ गया तो उसने एक स्‍पेनियर्ड स्‍त्री से शादी कर ली. स्‍पेनिश आक्रमणकारियों ने जिन इलाकों पर अपना नियंत्रण पहले बनाया वहॉं तो इंडियन और स्‍पेनियर्ड जातियों के बीच वैवाहिक संबंध बनने के मामले सामने आए और मिश्रित जाति की संतानें पैदा हुईं पर इस इलाके में ऐसी शादियॉं प्रचलित नहीं थीं. लिहाजा़ लिब्राडो की मिश्रित शादी चर्चा का विषय बन गई.

उपनिवेशी शासन के दौरान  आमतौर पर स्‍पेनियर्ड भूमिपति  थोड़ी देर को अपने फार्मों पर आते जो उन्‍हें उपनिवेशी शासकों ने दान में दिए थे और रात को अपने अपने बँगलों में लौट जाते. वहां  इंडियन मज़दूर रहा करते. मालिक अपने मज़दूरों और इंडियन समुदाय के साथ कोई सामाजिक मेलजोल नहीं रखते और जब उन्‍हें शादी करनी होती वे क्‍यूबा चले जाते जहॉं स्‍पेनियर्ड स्त्रियॉं उपलब्‍ध थीं. ‍इंडियन लड़कियों से हरगिज़ शादी न करते. इसलिये एक माया इंडियन नौजवान का स्‍पेनियर्ड स्‍त्री से शादी रचाना इस इलाके में बड़ी खबर बन गया था. दोना इतजे़ल के लिये तो यह खुशी मनाने या गर्व करने की कौन कहे बड़ी चिंता का कारण बन गया. उसके नाती पोतों में कोई भी ऐसा नहीं था जो माया भाषा बोलता हो. जुबिलो को छोड़कर. ये सभी बच्‍चे हॉट चॉकलेट पानी के बदले दूध डालकर पीना पसंद करते थे. किसी बाहरी के लिए रसोई में इन लड़ती झगड़ती स्त्रियों के संवाद सुनना बेहद विस्‍मयकारी था पर जुबिलो के लिए इसमें अचरज जैसा कुछ नहीं था, उसको दोनों को कही गई बातें  समझानी होती. जैसे ही यह गृह युद्ध शुरू होता जुबिलो बेहद चौकन्‍ना हो जाता. कहीं ऐसा न हो कि उसका ध्‍यान बँटे और बाकायदा खुले युद्ध की घोषणा हो जाये.  

एक दिन की बात है किचन में बहुत गर्मागर्म बहस छिड़ी हुई थी - एक दूसरे को आहत करने वाले वाण लगातार फेंके जा रहे थे - जुबिलो यह सब सुन कर अंदर अंदर बहुत उद्वेलित हो रहा था, ख़ास कर दादी जैसे जुमले उसकी माँ की ओर उछाल रही थीं वह बहुत पीड़ा पहुँचाने वाला था. झगड़ा हॉट चॉकलेट कैसे बनायीं जाती है इसको लेकर हो रहा था पर जुबिलो को बखूबी मालूम था असल झगड़ा इस मुद्दे पर था ही नहीं.  यह तो बस बहाना मात्र था. उसकी दादी जोर जोर से सबको सूना कर कह रही थीं : "देखो नीना, तुम्हें मालूम होना चाहिए कि हमारे पुरखों ने असाधारण आकार के पिरामिड बनाये, वेधशालाएँ और पवित्र मंदिर बनाये, तुम्हारे लोगों के जानने के सैकड़ों बरस पहले हमारे पुरखों को गणित और खगोलशास्त्र के बारे में सब कुछ मालूम था सो भूल कर भी मुझे कुछ समझाने सिखाने की कोशिश मत करना. और वह भी हॉट चॉकलेट बनाने के बारे में तो बिलकुल ही नहीं."

दोना जेसुसा की ज़ुबान बहुत तल्ख़ थी, वह भला सास की बात पर चुप कैसे रहती : "देखो आप मुझसे ज्यादा सयानी हो और आपके मन में बैठा हुआ है कि जो आपकी माया जाति का नहीं  वह भला श्रेष्ठ कैसे हो सकता है. पर मेरी यह बात भी कान खोल कर सुन लो, माया लोग हद दरजे के अलगाववादी होते हैं. झगड़ालू जो किसी के साथ मिलजुल कर नहीं रह सकते. मैं ऐसे नकचढ़ों के आठ बिलकुल नहीं रह सकती.  यदि  तुम्हें मुझसे इतनी चिढ़ और नफ़रत है तो क्यों आती हो मेरे घर, मत आया करो."

यह तू तू मैं मैं इस कदर बढ़ती चली गयी कि जुबिलो को अंदेशा होने लगा आज कहीं कुछ अप्रिय घट कर ही रहेगा- दोनों स्त्रियों में से कोई भी अपने कहे से एक कदम पीछे हटने को तैयार नहीं था और ज्वाला थी कि भड़कती जा रही थी. उसकी माँ ने जोर जोर से आवाज़ लगा कर जुबिलो को पुकारा : "देखो बेटे, अपनी दादी को समझा दो मेरे घर में आ कर मुझे कोई पट्टी पढ़ाने से परहेज करें  कि यह काम ऐसे मत करो. यह पकवान ऐसे मत बनाओ. इसकी इजाज़त मैं बिलकुल नहीं दूँगी. इस घर की मालकिन मैं हूँ और यहीं बैठ कर कोई मुझपर हुक्म चलाये यह बिलकुल नहीं होने वाला. कोई और हो तो एकबार को उसकी बात मान भी जाऊँ पर इस औरत की तो एक बात भी नहीं सुनूँगी." जुबिलो के पास माँ की बात न मानने का कोई बहाना नहीं था सो उसने माँ की बात का माया अनुवाद इन शब्दों में किया : "दादी, मेरी माँ का कहना है कि इस घर में किसी और का हुक्म नहीं चलेगा, सिवा आपके. आपकी बात और है.

ये शब्द सुनने थे कि दोना इतज़ेल के पूरे तेवर ही बदल गए. अपने इतने लम्बे जीवन में  उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि बहु ने इस घर में उनको यथोचित सम्मान दिया है. दूसरी तरफ़ दोना जेसुसा के अचरज की सीमा नहीं थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि सास ने उसकी इतनी कड़वी बात को इतनी तसल्ली से मुस्कुराते हुए  कैसे स्वीकार कर लिया. पर सास के बदले हुए तेवर को देखते हुए उसने भी सहज होकर सास के साथ बर्ताव करना शुरू कर दिया - शादी के बाद यह पहला मौका था जब उसे महसूस हुआ सास ने बड़े प्रेमपूर्वक बतौर घर की बहू उसे अपना लिया है. उधर जुबिलो इस बात से फूला नहीं समा रहा था की शब्दों के थोड़े से हेर फेर से घर में सुख शांति लौट आयी है जिसकी सबको सालों साल से ख्वाहिश थी. कितनी बड़ी बात थी कि दोनों स्त्रियों को यह लगने लगा था कि उनकी उपस्थिति और भूमिका को न सिर्फ़ स्वीकारा जा रहा है बल्कि पसंद भी किया जा रहा है. 

उस दिन के बाद से दोना इतज़ेल को पक्का भरोसा हो गया कि उनके हुक्म का एक एक अक्षर किचन में तामील हो रहा  है सो उन्होंने किसी बात में नुक्स निकालना छोड़ दिया- किसी तरह का हस्तक्षेप उनको अब बेवजह लगने लगा. दूसरी तरफ़ दोना जेसुसा को विश्वास हो गया कि सास ने किचन और घर पर उसका अधिपत्य स्वीकार कर लिया है सो उसका बर्ताव भी कोमल और प्रेमपूर्ण हो गया. पूरे परिवार में अमन चैन और ख़ुशी लौट आयी- इसका पूरा श्रेय नन्हें जुबिलो को जाता था- और यह अप्रत्याशित बदलाव देख कर जुबिलो भी बेहद खुश संतुष्ट था. अनजाने ही इस घटना से उसे पता चल गया कि शब्दों की  महत्ता क्या होती है.


यादवेन्द्र
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बिहार से स्कूली और इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद  1980 से लगातार रुड़की के केन्द्रीय भवन अनुसन्धान संस्थान में वैज्ञानिक.

रविवार,दिनमान,जनसत्ता, नवभारत टाइम्स,हिन्दुस्तान,अमर उजाला, प्रभात खबर इत्यादि में विज्ञान सहित विभिन्न विषयों पर प्रचुर लेखन.

विदेशी समाजों की कविता कहानियों के अंग्रेजी से किये अनुवाद नया ज्ञानोदय, हंस, कथादेश, वागर्थ, शुक्रवार, अहा जिंदगी जैसी पत्रिकाओं और अनुनाद, कबाड़खाना, लिखो यहाँ वहाँ, ख़्वाब का दर जैसे साहित्यिक ब्लॉगों में प्रकाशित.


मार्च 2017 के स्त्री साहित्य पर केन्द्रित  "कथादेश"  का अतिथि संपादन.  साहित्य के अलावा सैर सपाटा, सिनेमा और फ़ोटोग्राफ़ी  का शौक.
yapandey@gmail.com