मेघ -दूत : लव इन द टाइम ऑफ़ कोलेरा : अपर्णा मनोज

Posted by arun dev on फ़रवरी 07, 2017






















वसंतोत्सव के इस माह में प्रेम के विश्व प्रसिद्ध आख्यान ‘Love In the Time of Cholera’ के एक अंश का अनुवाद आपके लिए, अनुवाद अपर्णा मनोज ने किया है. 
अनुवाद सशक्त है, और इसमें इस  अंश की ही तरह भावप्रवण प्रवाह मिलता है.

इसी नाम से निर्देशक Mike Newell की एक फ़िल्म भी है  जिसमें नायिका फरमीना डाज़ा की   भूमिका  अभिनेत्री Giovanna Mezzogiorno ने निभाई है.


लव इन द टाइम ऑफ़ कोलेरा                                
अनुवाद अपर्णा मनोज


The words I about to express: They now have their own crowned goddess…
 Leandro Diaz


उसने कहा, 
“जब तुमने ख़त क़बूल किया है तो उसका ज़वाब न देना एक तरह से बदतहज़ीबी है.”


जैसे सारी उलझनें ख़त्म हो गयीं. फर्मीना डाज़ा ने खुद को बातार्तीब किया, विलम्ब के लिए माफ़ी मांगी और अहद दिया कि छुट्टियाँ ख़त्म होने से पहले वह उसे जवाब देगी. और उसने ऐसा ही किया. स्कूल के खुलने से तीन दिन पूर्व, फरवरी के अंतिम शुक्रवार को फूफ़ी एस्कोलास्टिका तारघर इस बात की जानकारी लेने गयीं कि पियेदरस द मोलेर में तार भेजने की कीमत क्या होगी, जबकि तारघर की सूची में इस नाम का कोई गाँव दर्ज नहीं था. वह ऐसे अनजान बनी रहीं जैसे उन्होंने फ्लोरेंटीना अरीज़ा को इससे पहले कभी नहीं  देखा था और उसे अपने काम में उलझाए रखा. किन्तु वहां से लौटने के पूर्व वह जानबूझ कर अपनी गोह-चर्म की ज़िल्दबंद प्रार्थना-पुस्तिका काउंटर पर छोड़ आयीं और यहीं इस पुस्तिका में लिनन के कागज़ वाला, सुनहरी गुलकारी वाला एक लिफ़ाफा महफूज़ था. फ्लोरेंटीना अरीज़ा ने बेसुध होकर, दीवानगी में बाकी बची सारी दोपहर गुलाब के फूल खाते तो कभी ख़त पढ़ते बिताई. हर हर्फ़ वह बार-बार पढ़ता और जितना वह पढ़ता उतने ही गुलाब खाता जाता. और आधी रात पड़ने तक वह कई बार चिट्ठी बांच चुका था और बहुत सारे गुलाब खा चुका था कि उसकी माँ को अंततः उसका सिर ऐसे पकड़ना पड़ा जैसे वह कोई बछड़ा हो और ज़बरदस्ती उसे अरंडी का तेल पिलाना पड़ा.

ये वह साल था जब उन्होंने खुद को तबाह करने वाली मुहब्बत के हवाले किया. दोनों में से कोई कुछ नहीं करता, सिवा इसके कि एक-दूसरे को सोचा किये, एक दूसरे के ख्वाब देखा किये और दोनों को ही खतों का इंतजार और उत्तर देने की एक-सी बेकरारी रहती. न ही उन्मादी वसंत के वक्तों में और न आने वाले साल में उन्हें ऐसा कोई मौका मिला कि वे एक –दूसरे से बात कर पाते. और तो और उस क्षण से जबकि पहली बार उनकी आँखें चार हुई थीं और आगे के पचास वर्षों तक जब वह बारम्बार अपना संकल्प दोहराता रहा था, उन्हें ऐसा कोई अवसर न मिला कि वे अकेले में साथ-संग बिताते या अपनी मुहब्बत पर बात करते. 

चुनांचे शुरू के तीन महीनों में ऐसा एक दिन भी नहीं गया जब उन्होंने एक –दूसरे को ख़त न लिखा हो. कुछ समय तक वे  एक दिन में दो –दो ख़त लिख लिया करते थे जब तक कि फूफी एस्कोलास्टिका उस धधकती आग की उत्कटता देखकर न डर गयी जिसे सुलगाने में उसका ही हाथ था.


उस पहली चिट्ठी के बाद, जिसे वह अपनी किस्मत से बदला लेने की आग के फलस्वरूप तारघर लेकर गयी थी; उसने उन दोनों को रोज़ाना ख़तो किताबत की इजाज़त दी, जो ऐसा था जैसे लापरवाही से गली में टकरा जाना, किन्तु उसमें इतनी हिम्मत न थी कि वह उन्हें मामूली सी, पलभर की बातचीत की छूट देती. फिर भी तीन महीनों के बाद वह सोच रही थी कि उसकी भतीजी अन्य लड़कियों जैसी किसी शर्मीली स्वैर कल्पना का शिकार नहीं है, जैसा उसे पहले-पहल लगा था. इस प्यार की आग ने कभी उसके जीवन को भी धमकाया था. सच्चाई तो यह थी कि उसके पास जीवन का अन्य कोई आसरा नहीं था और वह अपने भाई के रहमों-करम पर निर्भर थी. वह जानती थी कि भाई का निरंकुश स्वभाव इस विश्वासघात को कभी मुआफ़ नहीं कर सकेगा.  इसलिए जब अंतिम निर्णय की घड़ी आई तब उसमें ऐसी दिलेरी न थी कि वह अपनी भतीजी को उस कभी न भरने वाले दुःख के लिए उकसाती जिसको वह अपने यौवनकाल से मजबूरीवश पालती-पोसती रही थी और उसने केवल उस युक्ति तक ही उसे सीमित रखा जो नादानी का भरमभर होती.


रास्ता बहुत आसान था: फर्मीना डाज़ा घर से अकादमी जाते वक्त किन्हीं छुपी जगहों में अपने ख़त छोड़ दिया करती और उस ख़त में फ्लोरेंटीनो अरीज़ा के लिए यह इशारा रहता कि बदले में ज़वाब उसे कहाँ छोड़ना है. फ्लोरेंटीनो अरीज़ा भी यही करता. इस तरह बाकी बचे साल में एस्कोलास्टिका की रूह चर्च के बप्तिस्मा-कक्षों, पेड़ों के खोखल, और उस उजाड़ औपनिवेशिक गढ़ी की दरारों में स्थानांतरित हो गयी थी. कभी उनकी चिट्ठियां बरसात के पानी में नहाई होतीं, कभी कीचड़ में लिथड़ी होतीं, कभी तंगहालियों में फटी मिलतीं और कुछ अलग-अलग कारणों से खो जातीं पर वे हमेशा एक –दूसरे से संपर्क बनाये रखने का रास्ता ख़ोज लिया करते.


फ्लोरेंटीनो अरीज़ा रोज़ रात को लिखा करता था. चिट्ठियों पर चिट्ठियां. उसे खुद पर कोई रहम नहीं था. बिसाती की दूकान के पिछले कमरे में वह ताड़ के तेल की कुप्पी के विषाक्त धुंए को पीता रहता. और उसके ख़त तारतम्य खो बैठते, उनमें और अधिक उन्माद होता, खास तौर से जब पोपुलर लाइब्रेरी के अपने प्रिय कवियों का अनुसरण करने की वह कोशिश करता, जिनके वोल्यूम्स की संख्या अब तक अस्सी के करीब हो चुकी थी. उसकी माँ जो पूरे जोश के साथ पीड़ा का आनंद उठाने के लिए उसे प्रेरित करती रही थी, उसके स्वास्थ्य के लिए चिंताकुल थी.


“तुम अपने दिमाग को तार-तार कर लोगे,”

सुबह मुर्गे की बांग सुनकर वह अपने शयनकक्ष से चिल्लाकर कहती.
“कोई औरत इस सबके लायक नहीं.”

उसे याद नहीं पड़ता था कि कभी किसी ने बेलगाम प्रेम के आवेग में अपनी ऐसी हालत कर ली हो. लेकिन वह उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं देता था. मुहब्बत की इस शोरीदगी में वह बिना नींद पूरी किये और फैले-बिखरे बालों के साथ दफ्तर चला जाता ताकि वह पूर्वनिर्धारित गोपन जगह पर अपना ख़त रख सके और फर्मीना डाज़ा स्कूल जाते वक्त उसे ढूँढ़ सके. दूसरी तरफ़  वह अपने पिता की निगरानी और मठ-भक्तिनों की जासूसी के बीच जैसे-तैसे आधा पन्ना ही लिख पाती; कभी उसे गुसलखाने में खुद को देर तक बंद रखना पड़ता, कभी कक्षा में नोट्स लिखने का बहाना करना होता. लेकिन समय की कमी और पकड़े जाने का डर ही इसके कारण हों, ऐसा भी नहीं था. उसकी फ़ितरत कुछ ऐसी थी कि वह भावनात्मक जंजालों से बचा करती और जहाज़ की लॉग-बुक की तरह एकदम उपयोगितावादी उसके खत होते जिनमें रोजमर्रा के जीवन का खुलासाभर रहता. वास्तव में वे बहुत अन्यमनस्क भाव से लिखी गयी चिट्ठियां थीं, जो कोयलों को जिंदा तो रखना चाहती थीं पर अपने हाथ आग में नहीं डालना चाहती थीं, जबकि फ्लोरेंटीनो अरीज़ा पंक्ति-दर-पंक्ति खुद को जिंदा जला डालता था.

वह बेताब होकर अपने पागलपन की छूत उसे भी देना चाहता था –वह किसी लघु-चित्र रंगसाज़ के छंद पिन की नोक से कमीलिया की पत्तियों पर ऊँकेरकर उसे भेजता. वो नहीं थी बल्कि वही था ये लड़का जिसने अपनी ज़ुल्फ़ काटकर चिट्ठी के साथ भेजने की गुस्ताख़ी की थी, लेकिन उसे लौटकर वैसा जवाब कभी नहीं मिला जैसा उसने चाहा था कि बदले में फर्मीना डाज़ा की चोटी की एक पूरी लट उसे मिल जाती. आखिर में वह उसके मन को इतना ही द्रवित कर सका कि एक कदम थोड़ा बढ़कर उसने उसे शब्दकोशों में दबी सूखी नसों वाली पत्तियां, तितलियों के पंख, जादुई चिड़ियों के पर और उसके जन्मदिन पर उसे संत पीटर क्लेवर की पवित्र पोशाक का चौकोर टुकड़ा भेजा जो उन दिनों चोरी-छुपे ऊंची कीमत में बाज़ार में मिलता था और एक स्कूली लड़की के लिए उसे पाना आसान नहीं था. 

एक रात ऐसा हुआ कि फर्मीना डाज़ा बिना किसी पूर्व चेतावनी के हड़बड़ा कर उठ गई :


एकल वॉयलिन पर कोई प्रेमधुन उसे उठा रही थी. एक ही वाल्ट्ज़ बार-बार बज रही थी. जैसे ही उसे इस बात का अहसास हुआ कि हर बजने वाली धुन उन सूखी पत्तियों के लिए आभार है, जो उसने उसे अपने हेर्बेरियम से भेजी थीं, उन क्षणों के लिए आभार है जो उसने गणित की कक्षाओं से ख़त लिखने के लिए चुराए थे, परीक्षा की उन घड़ियों के लिए, जिनमें वह भय के पलों में भी विज्ञान से अधिक उसे ही सोच रही थी; वह भीतर तक काँप उठी. पर उसमें इस बात पर यकीन करने की हिम्मत न थी कि फ्लोरेंटीनो अरीज़ा ऐसी नादानी भी कर सकता है.


अगले दिन लोरेंज़ो डाज़ा नाश्ते के वक्त अपनी उत्सुकता रोक नहीं पाया- पहली बात तो यह थी कि आखिर एक ही धुन को बार-बार बजाने का प्रेम-धुनों में क्या अर्थ हो सकता है? दूसरे, बहुत ध्यान से सुनने के बाद भी वह यह नहीं समझ पाया था कि यह किस घर की तरफ इशारा कर रही थीं. बुआ एस्कोलास्टिका की धीर-गंभीर आवाज़ ने भतीजी के प्राण सोख लिए. उसने कहा कि शयन कक्ष के पर्दों से उसने देखा था कि वॉयलिन वादक बगीचे के उस पार खड़ा था. और बजने वाला हर टुकड़ा टूटे प्रेम का बयान करता था.


उस दिन के फ्लोरेंटीनो अरीज़ा के ख़त से यह बात पक्की हो गयी थी कि प्रेम धुन वही बजा रहा था और वॉल्ट्ज़ उसने ख़ास खुद रचा था- जिसे उसने अपने दिल में बसी फर्मीना डाज़ा का नाम दिया था –“ताजों वाली देवी.” उसने दुबारा फिर कभी उस धुन को पार्क में नहीं बजाया, बल्कि चाँद-रातों में उसने उन जगहों को चुना जहाँ से वह अपने कमरे में बिना डर के उसे सुन सकती थी. उसकी सबसे पसंदीदा जगह किसी गरीब की वह कब्र थी जो बेसाख्ता सूरज की धूप में उघड़ी रहती और दरिद्र पहाड़ी बरसात में भीगती रहती. जहाँ पेरू चिड़िया ऊंघा करती और संगीत किसी अलौकिक गूँज से भर जाता. बाद में वह हवाओं का रुख पहचानने लगा था, और उसे इस बात का इल्म हो चला था कि उसका तराना हवाओं के साथ जितनी दूर तक चाहे वह भेज सकता है.

उसी साल अगस्त के महीने में गृह युद्ध का खतरा मंडराने लगा, वैसा ही जैसे  कि कई विनाशक गृह युद्ध आधी सदी से देश ने झेले थे और सरकार ने मार्शल लॉ की मुनादी करवा दी थी. केरिबियन कोस्ट के साथ-साथ प्रांत में छह घंटे का कर्फ्यू लग गया. कुछ वारदातें पहले ही घट चुकी थीं और सैन्य टुकडियां किसी भी तरह के प्रतिशोधों को रोकने के लिए कटिबद्ध थी. फ्लोरेंटीनो अरीज़ा अपने में ही इतना उलझा था कि उसे दुनिया-जहाँ की कोई खबर न थी. और मिलिट्री गश्त ने उसे एक सुबह तब चौंका दिया जब उसे पता चला कि वह एक मृत व्यक्ति की पवित्रता अपनी प्रेमप्रवण उत्तेजक धुनों से भंग कर रहा है. कोई चमत्कार था कि वह समरी एक्ज़ीक्यूशन (अपराध घोषित होने पर तुरंत गोली मारना) से बच गया था जबकि उस पर आरोप था कि वह हाई पिच ‘जी’(G संगीत में नोटेशंस का बड़ा स्वरमान है) के ज़रिये मुखबिरी कर रहा था और अपने सन्देश लिब्रल्स के पोतों तक भेज रहा था जो पास लगे समन्दर में लूटमार कर रहे थे.

तीन रातों तक एडियों में बेड़ियाँ पहने वह एक स्थानीय चौकी की कोठरी में सोया. लेकिन जब वह मुक्त कर दिया गया तो उसे अपने बुढापे तक यही लगता रहा कि जैसे कारावास की इस अल्पता ने उसे छला था जबकि कई युद्ध उसकी स्मृतियों में उलझे हुए थे. वह अभी भी यह सोचा करता था कि नगर में या शायद पूरे देश में वह ऐसा अकेला व्यक्ति था जो प्रेम की खातिर ढाई किलो की बेड़ियों पैरों में घसीटता रहा था.

अभी उनके उन्मादभरे पत्र-व्यवहार की उम्र दो साल होने आई थी कि फ्लोरेंटीनो अरीज़ा ने एक ख़त में फर्मीना डाज़ा से अपनी शादी का औपचारिक प्रस्ताव एक पैराग्राफ में लिख डाला. पिछले छः महीनों तक उसने कई मौकों पर उसे सफ़ेद कमीलिया भेजे थे पर वह उन्हें अगले ख़त के साथ लौटा दिया करती थी ताकि उसे ऐसा कोई भुलावा न रहे कि वह उसे चिट्ठियां लिखने की आदी है पर बिना किसी गंभीर वचनबद्धता के. सच तो यह था कि कमीलिया के आदान-प्रदान को वह प्रेमियों का खेल मानती थी और उसे कभी नहीं लगा था कि वह इसे अपनी किस्मत का दोराहा मान ले. 
 
लेकिन जब उसे यह औपचारिक प्रस्ताव मिला तो उसने पहली बार मौत के शिकंजे से खुद को आहत पाया. घबराकर उसने बुआ एस्कोलास्टिका को बात बतायी. उसने बहुत साफगोई और साहस से अपनी राय दी जबकि वह जब खुद बीस की थी तब ऐसा साहस नहीं बटोर पायी थी और उसे अपनी किस्मत का फैसला करने के लिए मजबूर किया गया था.

“उसे ‘हाँ’ कह दो. उसने कहा. यदि तुम डर से मर भी रही होंगी, अगर तुम्हें बाद में उदास भी होना पड़े, तब भी...क्योंकि यदि तुमने ‘न’ कर दी तो तुम्हें उम्रभर पछताना पड़ेगा.”
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अपर्णा मनोज 
कविता, कथा, अनुवाद, शोध आदि
सभी प्रतिष्ठा प्राप्त पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित.
aparnashrey@gmail.com