सबद - भेद : अरुण कमल की काव्य-यात्रा : हरे प्रकाश उपाध्याय

Posted by arun dev on दिसंबर 05, 2016









वरिष्ठ कवि अरुण कमल के पांच कविता संग्रह  – ‘अपनी केवल धार’ (1980) ‘सबूत’(1989), नये इलाके में’(1996)‘पुतली  में संसार’(2004,‘मैं वो शंख महाशंख’ (2013). तथा  अंग्रेजी में समकालीन भारतीय कविता के अनुवादों की एक पुस्तक – ‘वायसेज़’. वियतनामी कवि ‘तो हू’ की कविताओं तथा टिप्पणियों की अनुवाद-पुस्तिका, साथ ही ‘मायकोव्स्की’ की आत्मकथा के अनुवाद एवं अनेक देशी-विदेशी कविताओं के अनुवाद, आदि प्रकाशित हैं.
साहित्य अकादेमी पुरस्कार, शमशेर सम्मान, भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरु अवार्ड, श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार, रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कारों से वह सम्मानित हैं.

उनकी कविता – यात्रा पर हरे प्रकाश का यह आलेख. हरे अच्छे उपन्यासकार और संपादक तो हैं हीं उनके अंदर साहित्य का एक सुगढ़ विवेचक भी मौजूद है.    

 जिसने सच-सच कह दी अपनी कहानी                                           

हरे प्रकाश उपाध्याय



रुण कमल हिंदी की कविता में तब दाखिल होते हैं, जब देश में आजादी से मोहभंग की निराशा, संशय और आशंका का कोहरा घना हो रहा होता है. अपने वक्त के बारे में कवि लिखता है- 
बोलना गुनाह
खाँसना गुनाह
आँगन में औरतों का हँसना गुनाह
छुरा भाँजते गुंडे छुट्टा घूम रहे हैं
और अपने ही घर के चौखट पर बैठा आदमी
मारा जा रहा है....

पर यही वह समय है जब अपनी पक्षधरता चुनने व उसे व्यक्त करने का भी तकाजा है. यह वह दौर है जहाँ सावधानी, सतर्कता के साथ निराशामय यथार्थ से टकराना पड़ता है. अपनी ताकत के लिए आत्मीयता के साथ अपने लोगों को पहचानना भी पड़ता है- 
एक ही तो हैं हमारे लक्ष्य
एक ही तो है हमारी मुक्ति
साथ-साथ मिलकर चलेंगे हम
जहाँ गिरोगे तुम
वहीं रहेंगे हम
जहाँ झुकोगे तुम
वहीं उठेंगे हम
लाओ मुझे दो अपने हाथ
चलो मेरे पाँव से चलो....
मगर यह काम आसान नहीं है, अपने होने के पर्दे में शत्रु बैठे हुए हैं खंजर लिए हुए-...
मैंने देखा साथियों को
हत्यारों की जै मनाते
मेरा घर नीलाम हुआ
और डाक बोलने आये अपने ही दोस्त....  

यहाँ फटाफट निष्कर्ष निकालना, सरपट चलते जाना और दो टूक निर्णय लेना खतरनाक हो सकता है, पर अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद एक संवेदनशील व्यक्ति चुप भी तो नहीं हो सकता. उसे अपनी और अपने लोगों की लड़ाई लड़नी होती है. अपनी ताकत को पहचानना पड़ता है. समय की विसंगतियों के रेशे-रेशे उघाड़कर देखना पड़ता है. यह उल्टा जमाना है-..

ऐसा जमाना आ गया है उल्टा
कि कोई तुम्हें रास्ता बतावे तो शक करो....

एक कवि के लिए यह वक्त खासा चुनौतीपूर्ण है. उसे आगे बढ़ना है और रास्ता खोजना है. पुराने खोजे हुए मार्ग अपर्याप्त हो चुके हैं. कहना नहीं होगा कि वक्त आगे और जटिल और व्यवस्था निरंतर और कुटिल होती जाती है. अरुण कमल की काव्य संवेदना पर विचार करने के लिए हमें दीन दुनिया और समय में लगातार आते गये इस बदलाव को भी समझना होगा. समस्याएं लगातार विकराल होती गयी हैं. संवेदनशील आदमी इस सबके बीच फतवेबाजी नहीं कर सकता, सरपट दौड़ते हुए, स्पष्ट निर्णय सुनाते हुए नहीं चल सकता. पर अमूर्त कलावाद का भी यह दौर नहीं है. अरुणकमल की रचना प्रक्रिया के समक्ष ये तमाम संकट आते हैं. इस बीच इन सबसे जूझते हुए यह कवि जैसे बनता और आगे बढ़ता है, इसे गहराई से समझना रोमांचक और झकझोरनेवाली प्रक्रिया है. अरुण कमल सपाट दावा करने वाले कवि नहीं हैं. वे जमीन से जुड़े हैं और जमीन के लोगों के कवि हैं, मगर वे इस बात को इस वाचाल तरीके से कहीं नहीं कहते. उनके लिए प्रतिबद्धता झंडे की तरह लहराने की चीज नहीं है, बल्कि उसे जीना ही उनका ध्येय है. वे अपने समय को पूरा समझने या एकमात्र सही व्याख्याता होने का दावा भी कभी नहीं करते. उन्हें जितना संशय इस संसार को लेकर है, जितना संदेह शत्रुओं पर है, उससे कम खुद पर नहीं है. वे बार-बार अपनी कविता में खुद को भी तौलते हैं- ...
झड़ना था तो खेत में झड़ता
दाई माई चुन लेतीं
झड़ना था तो राह में झड़ता
चिड़िया चुरगुन चुन लेतीं
अब तो खंखड़ हूँ मैं केवल
दाना था सो घुन खा बैठे....

पर बेहतरी की ललक और जिजीविषा भी उनके यहाँ कभी खत्म नहीं होती- ..
फूटने के बाद भी मिट्टी की सुराही
जाड़े में बोरसी बन जाती है
वैसे ही मैं भी तो काम आ सकता हूँ
अन्न उगा न सकूँ तो क्या
सूखते धान के पास बैठ कौआ तो हाँकूँगा.

अपनी सीमाओं की समझ, जिजीविषा, विनम्रता, कौतूहल, जिज्ञासा, आत्मसंशय और आत्मीयता ही अरुण के मूल काव्य मूल्य हैं. कमजोर, गरीब, हारे हुए, धूसर के प्रति अनुराग और ताकतवर, चमकते हुए, हावी होते व छाते हुए लोगों-ताकतों के प्रति धृष्टता-कठोरता इस कवि के काव्य के गुणसूत्र के पदार्थ हैं. वे हर चीज को बार-बार देखते हैं और जानने की कोशिश करते है. पर जो गरीब, वंचित, बेसहारा, निर्वासित और सताये हुए लोग हैं उनके शोक और करुणा से वे इतने आप्त हैं, उनसे अपना तादात्मय स्थापित किये हुए रहते हैं. उनसे संवाद और संपर्क कायम किये रहते हैं. उनकी पीड़ा और पक्ष सतत बताते रहते हैं.
एक ही दौर में अनेक कवि होते हैं. एक ही अनुभव से अलग-अलग प्रभाव भी पैदा होते हैं. अरुण कमल अपने दौर के एक अलग कवि हैं. वे अलग दिखने के लिए कविता नहीं लिखते. कविता में अलग से पहचाने जाने का सायास प्रयास वे नहीं करते. वे अपनी कविता से चौंकाने या मंत्र मुग्ध कर देने या मोहाविष्ट कर देने की कोशिश भी कभी नहीं करते. वे अपनी कविता में ज्ञान का बखान या प्रतिभा प्रदर्शन के प्रति सचेष्ट कवि नहीं हैं. इसीलिए वे अपनी पीढ़ी में अलग हैं. अरुण कमल के काव्य संस्कार और मिजाज-मंतव्य को समझने के लिए उनके हर संकलन के प्रारंभ में दी गयी तुलसीदास की ये पंक्तियां गौर करने लायक है-  
विनयपत्रिका दीन की बापु आप ही बाँचों
हिय हेरि तुलसी लिखी सो सुभाय सही करि
बहुरि पूँछिये पाँचों. 

अपनी कविता को वे दीन की विनयपत्रिका कहते हैं. जाहिर है इस कविता के लिए पांडित्य से अधिक संवेदना और सहृदयता की जरूरत पड़ती है. इसीलिये शिल्प के प्रति अरुण कमल के यहाँ कोई सावधानी, सजगता या प्रयोग नहीं है, पर साधारण आदमी के दिल की बात यहाँ से वहाँ तक भरी पड़ी है. इनके यहाँ बौद्धिक जटिलता नहीं है बल्कि संवेदनात्मक संश्लिष्टता है. इसीलिए शिल्प में सरल मालूम होती इनकी कविता भाव में उतनी ही जटिल है, जितना हमारा समय. अरुण की कविता में सारे संसार की बाते हैं, गली-मोहल्ले की आम घटनाओं से लेकर वैश्विक राजनीति तक, पर वैसे जैसे कि कोई उसे भोगकर अपना हाल कह रहा हो. उसे इस बात से मतलब नहीं कि उसका हाल आप पर क्या असर डाल रहा है. उसे इस बात की भी फिक्र नहीं कि उसके कहने का लहजा कैसा है. वह कहने के तरीके के प्रति सावधान नहीं है, बल्कि जो कह रहा है उसके प्रति सावधान है. वह ईमानदारी से जो महसूस कर रहा है, बता रहा है. एक घोषित वामपंथी होने के बावजूद कभी भी नकली जीत या विलाप अरुण की कविता में नहीं दिखाई पड़ता. जीवन से ऊपर आवरण की दार्शनिकता अरुण कमल की कविता में नहीं पायी जाती बल्कि यथार्थ और अनुभव से लिपटी हुई दार्शनिकता की कविताएं इनके यहाँ हैं. यह दार्शनिकता आप उनकी बिल्कुल शुरू की कविता उर्वर प्रदेश में देख सकते हैं और आगे जाकर पुतली में संसार संकलन में तो वह अत्यंत परिपक्व और पुष्ट हो गयी है. पुतली में संसार संकलन में अरुण के अंदाज की दार्शनिकता रेखांकित करने योग्य है. अर्थ का ऐसा विस्तार और भावों की ऐसी सघनता उनकी पीढ़ी में दुर्लभ है, बल्कि उनके बाद की पीढ़ी में तो और दुर्लभ है.

अरुण का पहला संकलन- अपनी केवल धार 1980 में प्रकाशित होता है, तब से लेकर सन 2013 तक उऩके इस समेत उनके पाँच कविता संकलन आये हैं- सबूत (1989)नये इलाके में (1996)पुतली में संसार (2004) और मैं वो शंख महाशंख (2013). इन संकलनो से आप गुजरें तो पाएंगे कि यथार्थ और अनुभव के प्रति कवि की परिपक्वता जितनी दृढ़ होती गयी है, उतनी ही दार्शनिकता का आकाश भी विस्तृत होता गया है. जो लोग इन कविताओं की सरलता देखते हैं, वे शायद धोखा खाते हैं. ये कविताएं सहज हैं मगर सरल नहीं है. दरअसल अरुणकमल की काव्य मुहावरा सरलीकृत है ही नहीं. तल पर जितनी सपाटता है, अंतस में उतनी ही गहराई हैं. दरअसल ये कविताएं पाठ में संपन्न हो जा जाने के बाद अर्थ में शुरू होती हैं. फौरी साक्षात्कार में इन कविताओं की अंतर्वस्तु को पकड़ना हाथी की पूँछ या सूड़ पकड़कर उस आधार पर ही हाथी को पूरा समझ लेने सरीखा भूल करना है. इन कविताओं को जानने के लिए अरुण कमल  जाना है शीर्षक कविता में जानने का जो तरीका अपनाते हैं, उसे अपनाना पाठक के लिए श्रेयस्कर है. जाना है कविता में एक फल को जानने का अनभुव बताते हुए वे कहते हैं- पहले भी देखा था यह फल. सूंघा था. चखा था बहुत बार. बचपन से ही.... पर इन सबके बावजूद यह जानना अपर्याप्त था. उस छोटे से फल का धरती आकाश तक जो संबंध फैला हुआ है, वह तो बहुत बाद में पता चलता है जब कवि उसे डाल पर पकते हुए देखता है. बिल्कुल यही हाल अरुण कमल की कविताओं का है. जब तक आप उनकी प्रकृति को, उसके मूल को नहीं समझ लेते तब तक उसके धरती आकाश तक के संबंध को भी नहीं जान सकते. खास जीवन प्रसंगों तक में महदूद रह जाने वाली कविताएं अरुण के यहाँ हैं, पर बहुत कम. अधिकांश कविताएं बहुत ही अर्थ संकोची हैं. जब तक आप उनसे आत्मीय या गाढ़ा रागात्मक संबंध नहीं बनाते, वे अपने आशय उजागर नहीं करतीं. अपनी मूर्तता के विन्यास में गहरा अमूर्तन लिये ये कविताएं अपना अर्थ किन्ही खास पंक्ति में नहीं रखतीं.

शीर्षकों से अर्थ लगा लेना तो अरुण की कविता के साथ भारी अन्याय है. वे बारिश पर कविता लिखते हुए मलहम तक जा पहुंचते हैं. पर न यहाँ बारिश से कविता का अर्थ खुलता है न मलहम से. कविता अपनी समग्रता में ही कोई आशय व्यक्त करती है.  बारिश शीर्षक कविता में प्रकृति, चाँद, तारे, आकाश के साथ गाँजे के धुएँ की स्मृति के साथ विस्मृति का भी आख्यान है और अंत में मलहम की गंध. अब आप सोचिए कि यह कैसी बारिश है. बारिश को जानने-समझने की तमाम पारंपरिक उपादान यहाँ अपर्याप्त हैं. आशय यह कि हर कविता जीवन के तमाम रंजोगम में ऐसी डूबी हुई कि एकांगी संवेदना व अनुभवों से बात पकड़ में ही नहीं आनेवाली. ये व्यंजानार्थ वाली कविताएं हैं. अर्थ के संधान में अभिधा यहाँ बहुत देर कर साथ नहीं देती.

अरुण कमल ने लंबी कविताएं नहीं लिखी हैं. पर हर कविता इतने भिन्न तरह के पदार्थों से बनी है कि असंगतियों पर से जरा सा ध्यान विचला कि अर्थ हाथ से छूटा. उनकी कविताएं काया में जितनी छोटी हैं, आत्मा उनकी उतनी ही विशाल है. ये ठोस कविताएं है. इनका रेशा-रेशा आपस में इतना गझिन गूंथा हुआ है कि इनके भीतर उतरने के लिए, इन्हें उधेड़ने और समझने के लिए आपके पास पर्याप्त धैर्य और सहृदयता चाहिये. हालांकि कुछ कविताएं व्यंग्य या चमकदार उक्तियों वाली भी इनके यहाँ हैं, पर बहुत नहीं है. अरुण कमल की एक बहुत प्रसिद्ध कविता है जो इनके पहले संकलन में ही है-धार. यह पूरी कविता एक कौंध के रूप में है बहुत चमकदार पंकितयों से बनी. पर ऐसी कविताएं इनके यहां कम हैं.

अरुण कमल पुतली में संसार के कवि हैं. वे एक साथ अनेक चीजों को देखते हैं. हर चीज में इतनी छवियाँ हैं कि उनका इकहरा मानी व्यर्थ है-यह बात अरुण की कविता पढ़कर समझी जा सकती है. वे मछली की आँख में अपना निशाना देखते हैं कि नहीं देखते- उनकी कविता में यह बात ही गौण है. वे तो मछली की आँख में देखते हुए यह देख रहे होते हैं कि मछली किसे देख रही है. और ऐसा वे सायास नहीं देख रहे हैं. उन्हें अपनी परंपरा मालूम है , लक्ष्य भी मालूम है---मुझे तो देखना था बस आँख का गोला. और मैं इतना अधिक सब कुछ क्यों देख रहा हूँ देव . लक्ष्य मालूम होते हुए भी कवि समूचे यथार्थ को अनदेखा कैसे कर देसमग्रता की अनदेखी न कर पाना ही अरुण के कवि की प्रकृति है, स्वभाव है. इस बात के सबूत हमें उनकी अधिकांश कविताओं में मिलते हैं. इसी वजह से अरुण कविता के नये इलाके में प्रवेश कर पाते हैं. वे उस मौसम में निकल पाते हैं जहाँ आकाश ढहा हुआ आ रहा है. इतनी आपाधापी है दुनिया में कि आप स्मृति से काम नहीं चला सकते. चीजें काफी तेजी से बदल रही हैं. अरुण इस सच्चाई का सामना करते हैं. इस संकट से उबरने का उपाय तलाशते हैं. इसी सबके बीच उन्हें अपनी सीमाओं का अहसास भी होता है. जो नये इलाके में निकलेगा ही नहीं, उसे भला कैसे पता चलेगा कि संकट कितने नये-नये हैं. अपने घर में सिमटकर कविता लिखनेवाले कवियों से आप उम्मीद नहीं कर सकते कि हर दरवाजा खटखटाने का उपाय वे सोच भी सकें. अरुणहर चीज पर से आवरण हटाकर देखने वाले कवि हैं इसलिए वे उस सबूत पर भरोसा नहीं करते जो हत्यारों और लूटेरों ने अपने पवित्र और निष्कलुष होने के लिए जुटा लिये हैं. वे इस षड्यंत्र के खिलाफ चुप्पी को तोड़ना चाहते हैं. क्योंकि वे जानते हैं कि 



...शक है उन पर जो निर्दोष हैं क्योंकि वे चुप हैं.
अरुण कमल ने गरीब और कमजोर आदमी की निरुपायता, उनके प्रति ताकतवरों की हिंसा, लोकतंत्र के पाखंड, सत्ता की दुरभिसंधियों, कर्मकांडों और भूख की यातना पर जैसी कविताएं लिखी हैं, वैसी कविताएं उनके समकालीनों के यहाँ बहुत कम हैं. लोकतंत्र के सारे स्तंभ किस तरह साधारण नागरिकों की तरह से मुँह मोड़े हुए, कैसे-कैसे हास्यास्पद पाखंड रचे जा रहे हैं, उसको कारगर तरीके से उन्होंने बेपर्द किया है. एक तरफ दुनिया में अमीरी का वैभव और उसके सामने ही मंदिरों में भीख माँगते बच्चे, भूख से बीच सड़क पर दम तोड़ता आदमी इन स्थितियों को सामने लाते हुए अरुण शांति और अहिंसा के विजय पर करारा व्यंग्य करते हैं. वे अपनी कविताओं में बारंबार यह दिखाते हैं कि गरीब आदमी का जीवन जीना, सांस लेना, पानी पीना, हँसना, बोलना सब किस तरह ताकतवरों की व्यवस्था को अखर रहा है. मजदूर अपनी छुट्टी से दो-एक दिन फाजिल अपने घर रुक गये हैं, उन्हें आशंका है कि वे या तो काम से निकाल दिये जाएंगे या उनकी मजदूरी काट ली जाएगी. इस व्यवस्था में बच्चों का हँसना-मुस्कराना भी गुनाह हो गया है. जहाँ भूख से मरते आदमी के बारे में कहा जा रहा है कि उसने शराब पी है. अखबार अमीरों की दरियादिली और अजीबोगरीब हास्यास्पद खबरें छाप रहे हैं, मगर बेगुनाह व कमजोर लोगों के साथ बरती जा रही सत्ता की क्रूरता की खबर को गोल कर दे रहे हैं. जनतंत्र की तीखी आलोचना हम यहाँ पाते हैं---- 
प्रजातंत्र का महामहोत्सव छप्पन विध पकवान
जिनके मुँह में कौर माँस का उनको मगही पान.  

इतना ही नहीं एक कविता में वे इसी विक्षोभ से भरकर उग्र व्यंग्य की अभिव्यक्ति करते हैं-
माँ बहनों की इज्जत लूटी जिन लोगों ने उनकी जय हो
खून बहाया मासूमों का जिन लोगों ने उनकी जय हो
दाँत गड़ाने को जो व्याकुल उन कुत्तों की जय हो जय हो
पैसा फेंकों पैसा, जल्दी-जल्दी फेंकों पैसा फेंको....

अरुण को पढ़ते हुए रघुवीर सहाय, मुक्तिबोध और नागार्जुन जैसे कवियों का ध्यान आता है. पर उनका दौर और मुहावरा अलग था. सरोकार की साम्यता देखने लायक है. अरुण को श्रम की संस्कृति में गहरा भरोसा है. वे लिखते हैं- 

गंदे कटे-पिटे हाथ
जख्म से फटे हुए हाथ
खुशबू रचते हैं हाथ. 

अरुण को भरोसा है कि ---
ग्रहण के बावजूद सूर्य ही रहा सूर्य
ग्रहण के बावजूद सूर्य ही होता है सूर्य. 

भले ईमानदारी, सच्चाई, मेहनत का छोर थामे जन को लांछित, उपेक्षित, अपमानित और प्रताड़ित किया जा रहा हो, मगर कभी न कभी इस ग्रहण से सूरज तो पार पाएगा ही और ग्रहण के बावजूद आखिर सूरज तो सूरज है.

समय के साथ स्थितियाँ भले जितनी प्रतिकूल होती गयी हों पर साधारण लोगों की ताकत के प्रति, उनके ईमान के प्रति अरुण का भरोसा डिगा नहीं है, वह और पुख्ता होता गया है.  मैं वो शंख महाशंख संकलन की एक कविता में वे सही ही पूछते हैं- 
जिसने सच-सच कह दी अपनी कहानी
उसे कैसे कहूँ कि इसे सजाकर लिखो
जिसके पास कुछ नहीं सिवा इस देह के
उसे कैसे कहूँ आज बाजार का दिन है
जो खो चुका है घर-परिवार
उसे कैसे कहूँ पानी उबाल कर पियो. 

भूमंडलीकरण और बाजारवाद ने साधारण मनुष्य को जितना निरुपाय , विवश, अकेला और निहत्था बनाया है, उसको लेकर इस संकलन में वे विस्तार से बताते हैं. नयी बनती दुनिया को प्रश्नांकित करते हैं.  एक तरफ राजनीति को छलनीति बनाकर दुनियाभर के सत्ता पर कब्जा जमाये लोग साधारण आदमी के वजूद से घृणित मजाक कर रहे हैं, वही उनका साथ धार्मिक पाखंडी भी खूब मजे से दे रहे हैं- चाहे वह 'अंत्येष्टि' का अवसर हो या 'शोभायात्रा' का, हर जगह इनका पाखंड उजागर है. धर्म, संस्कार और संस्कृति के नाम पर हास्यास्पद तरीके अपना कर जनता का शोषण करने वाले ऐसे पाखंडियों पर भी अरुण ने अपनी कविता में जबरदस्त प्रहार किया है. दरअसल पूंजी और सत्ता के संस्थानों पर कब्जा जमाये लोगों ने ही धार्मिक संस्थाओं पर भी अपने नाम की पट्टी लगवा ली है. इन सारे दुःखों का वृतांत रचते हुए अरुण कही लाउड या वाचाल नहीं होते. अपराधियों को बिना कोई रियायत दिये हुए पूरी गंभीरता और दृढ़ता से अपनी बात कहते हैं. और जन के साथ तादात्मय यह कि... 
सरकारी आंकड़ों में वह कहीं नहीं है
जब भी उनकी गिनती गलत होगी
जब भी वे हिसाब मिला नहीं पाएंगे
मैं हँसूँगा आंकड़ों के पीछे से गलियां देता
वो मैं हूँ मैं वो अंक महाशंख ...
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हरे प्रकाश उपाध्याय
संपादक
मंतव्य (साहित्यिक त्रैमासिक)
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