सहजि सहजि गुन रमैं : वीरू सोनकर

Posted by arun dev on दिसंबर 21, 2016

फोटो द्वारा Gordon Parks




























कला का अपने समय के यथार्थ से जटिल रिश्ता बनता है.
कविताएँ यथार्थ नहीं बनतीं वे कुछ ऐसा करती हैं कि यथार्थ और भी यथार्थ बन जाता है, वह और रौशन हो जाता और अनुभव के दायरे में आ जाता है.
  कलाओं से इकहरी सहजता की मांग नाजायज़ है, वे सदियों से अपने समय को लिखने की जद्दोजहद में मुब्तिला हैं, वे उसे लिखने के रोज़ नये पैतरें आज़माती हैं.

पिछली सदी को इतिहासकार एरिक हाब्सबाम ने ‘अतियों की सदी’ कहा, नई सदी तेज़ी से फैलते डिजिटल चित्रों और सूचनाओं की सदी है.
यह बड़े से बड़े सरोकारों के तेज़ी से हास्यास्पद होकर प्रतिक्रियावाद में बदल जाने की भी सदी है.
यहाँ स्याह से सफेद होता हर पल बेपर्दा है, इसलिए हर चीज अविश्वसनीय है, और एक मज़ाक है और यह एक उद्योग भी है.
यह आधुनिकता और उदारता के विलोम की भी सदी होने जा रही है.

ऐसे में नई सदी की हिंदी कविता का प्रयोजन और तासीर तो बदली ही है उसका ढांचा भी बदला है.
किसी कविता में किसी एक केन्द्रीय बिम्ब पर अब कवि नहीं टिकता.
वह तेज़ी से बदलते बिम्बों के बीच अपने समय का रूपक रखता चलता है, पर वह जहाँ भी है सटीक हुआ है.


वीरू सोनकर नई सदी के युवा कवि हैं. इन कविताओं में तुर्शी और तेज़ी है. अभी तो उनके सामने यह पूरी सदी पड़ी है. उम्मीद के साथ ये कविताएँ आपके लिए.




वीरू सोनकर की कविताएँ                                      



रंग

रंग वह नहीं
जो उड़ जाते हैं अपनी तय उम्र के बाद
या
दूसरे रंग के अतिक्रमण से
असमय मर जाते हैं

रंग प्रमाण है
कुछ भी होने या फिर कुछ नहीं होने के

तभी
बुढ़ापा, उम्र का एक रंग है
और चेहरे का गवाह है उदासी का एक रंग
सुख की मुग्ध आँखों का मुंद जाना भी
एक रंग है

जैसे,
नदी का रंग पानी है
और पृथ्वी का रंग सिर्फ जीवन
समुद्र के भरपेट होने का उत्सव-रंग उसकी त्वचा लहरें हैं

या कह सकते हो कि

भूख, अपने हर रंग में एक गर्म रोटी का चेहरा है
जिस पर कोई अन्य रंग नहीं चढ़ता.





जंगल एक आवाज है

जंगल गायब नहीं है
वह देर से बोलता है

अपने सन्नाटे की अलौकिक रहस्यमयता लिए
हमारे भीतर चीखता है
कहता है
मेरी प्रतिलिपि दूर तक बिखरी पड़ी है
तुम्हारे ड्राइंगरूम के बोनसाई से लेकर स्वीमिंगपूल की उस नकली पहाड़ी नदी तक

जंगल एक अमिट स्मृति है
सड़को पर छाई सुनसान रात उस बाघ की परछाई है
जो तुम्हारे शहर कभी नहीं आता

जंगल अचानक से हुए किसी हमले की एक खरोंच है
एक जरुरी सबक कि जंगल कोई औपचारिकता नहीं निभाता

जंगल एक बाहरी अभद्र नामकरण है

जंगल दिशा मैदान को गयी
एक बच्ची को अचानक से मिला एक पका बेलफल है
जंगल बूढ़े बाबा के शेर बन जाने की एक झूठी कहानी है
जंगल खटिया की बान सा सिया हुआ
एक घर है
जंगल वह है जो अपने ही रास्तो से फरार है
जंगल हर अनहोनी में बनी एक अनिवार्य अफवाह है

जंगल एक रंगबाज कर्फ्यू भी है
जो तय करता है रात को कौन निकलेगा और दिन में कौन

जंगल जो बारिश में एक चौमासा नदी है
तो चिलचिलाती धूप में बहुत देर से बुझने वाली एक प्यास भी

जंगल सब कुछ तो है पर विस्थापन कतई नहीं है

जंगल एक आवाज है
जो हमेशा कहती रहेगी
कि
तुम्हारा शहर एक लकड़बग्घा है
जो दरअसल जंगल से भाग निकला है.




संभावनाशील पागल

जब एक मुकम्मल देश लिखना कठिन हो रहा है
ऐसे समय में चाहता हूँ
हर आदमी एक शब्द हो जाये
हर शब्द एक आवाज,
हर चेहरा एक पन्ना,
और हर कविता हमारे इस समय का श्वेतपत्र

निगरानी से डरा हुआ हर आदमी चीख पड़े
बावजूद इसके कि
चीखना,
अब पागलपन की निशानी है
बावजूद इसके कि
सरकार के पागल होने से पहले यह पूरा देश पागल हो जाये
मैं वहां एक मुकम्मल देश की शक्ल देखता हूँ

चे के हमशक्लो की भीड़ में
जहाँ खुद का खो जाना एक आम सी बात हो
स्टालिन के भगोड़े जूते किसी प्रमाण की तरह संरक्षित हो
हिटलर की अंतिम गोली की कहानी हर पागल कहने में न डरे

एक ऐसा देश,
जहाँ कोई पागल ही न मिले
वह देश सबसे अच्छे नक़्शे के बाद भी
खुद पर एक सवाल है

और
यह मुझ पर भी एक सवाल है
कि क्या एक मुकम्मल देश लिखना वाकई कठिन है
या मेरा पागल हो जाना ?




नि:शब्द

मैंने कहा "दर्द"
संसार के सभी किन्नर, सभी शूद्र और वेश्याएँ रो पड़ी

मैंने शब्द वापस लिया और कहा "मृत्यु"
सभी बीमार, उम्रकैदी और वृद्ध मेरे पीछे हो लिए
मैंने शर्मिन्दा हो कर सर झुका लिया
फिर कहा "मुक्ति"
सभी नकाबपोश औरते, विकलांग और  कर्जदार मेरी ओर देखने लगे !

अब मैं ऊपर आसमान में देखता हूँ
और फिर से,
एक शब्द बुदबुदाता हूँ
"वक्त" !
कडकडाती बिजली से कुछ शब्द मुझ पर गिर पड़े
"मैं बस यही किसी को नहीं देता !"

मैं अब खुद के लिए कोई शब्द चाहता हूँ
कोई कुछ नहीं बोलता.



 जगह

उसने पानी को
पहली बार सामने आये किसी अजूबे सा देखा
उसमे घुलते रंग को देखा
और
देखी आग
छुआ, और कहा "ओह तो तुम मेरा छूटा हुआ हिस्सा थी"

पैरो के नीचे की भुरभुरी मिटटी को सूंघा,
तप्त सूर्य की तेज़ आँच के बाद भी वहाँ घास की एक कोंपल निकल आयी थी

उसने नदी में एक पत्थर उठा कर फेंका,
भंवर में बनी-बिगड़ी लहरें गिनी

फिर वह आकाश की ओर मुँह उठा कर शुक्राने में हँसा
गुजरती हवा के कान में कहा
सुनो,
मैं बिलकुल ठीक जगह पर हूँ! 

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वीरू सोनकर
9 जून 1977 (कानपुर)

स्नातक (क्राइस्ट चर्च कॉलेज कानपुर) बीएड ( डी ए वी कॉलेज कानपुर)
पत्र पत्रिकओं में कविताएँ कहानियाँ आदि प्रकाशित
veeru_sonker@yahoo.com