परख : रचना का सामाजिक पाठ (पंकज पराशर ) : जय कौशल

Posted by arun dev on नवंबर 20, 2016





समीक्षा दो लोग पढ़ते हैं – खुद समीक्षक और दूसरा वह लेखक; जिसकी (कृति) समीक्षा की गयी है. कभी-कभी संपादक या/और प्रूफ रीडर भी पढ़ लेते हैं.

हिंदी में समीक्षा निचले दर्जे की बौद्धिक सक्रियता समझी जाती है. ‘सीनियर’ आलोचक किसी कृति की समीक्षा लिखना अपनी तौहीन समझते हैं.

व्यवहारवादी, संपर्क-साधी और अंधभक्ति मानसिकता के कारण समीक्षा अब एक संदिग्ध उपक्रम है. जिसका अब सिर्फ इतना ही अर्थ रह गया है कि ‘मेरे किताब की समीक्षा फलां जगह आयी है.’

ऐसे में पंकज पराशर की आलोचनात्मक कृति ‘रचना का सामाजिक पाठ’ की जय कौशल की ‘समीक्षा’ पढ़ते हुए मैं मन ही मन भयभीत था.

पर यह समीक्षा ऐसी नहीं है. ‘मेरे महबूब में क्या नहीं क्या नहीं’ की मनोग्रन्थि से मुक्त यह एक विवेकसम्मत और पठनीय आलेख है. जहाँ जरूरत है वहां जय कौशल ने साफ शब्दों में अपनी असहमति व्यक्त की है. इस समीक्षा का भी स्वागत किया जाना चाहिए.




रचना का सामाजिक                                  
जय कौशल



हिन्दी की युवा रचनाशीलता और आलोचना में पंकज पराशर एक स्थापित नाम है. हिन्दी और मैथिली में कविता-लेखन से लेकर कहानी, अनुवाद, समीक्षा और आलोचना तक उनकी अनेक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. प्रस्तुत आलेख में उनकी साहित्य भंडार प्रकाशन, इलाहाबाद से 2015 में प्रकाशित पुस्तक ‘रचना का सामाजिक पाठ में संकलित लेखों की पड़ताल की गई है. यह पुस्तक पंकज द्वारा ‘तद्भव’, ‘बहुवचन’, ‘पहल’, ‘आलोचना’, ‘साखी’, ‘वर्तमान साहित्य’, ‘अनहद’, ‘लमही, ‘पाखी’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘समयांतर’ और शिक्षा विमर्श’ में प्रकाशित लेखों का संग्रह हैं. इसमें दो खण्ड हैं, जिनमें कुल मिलाकर सोलह लेख हैं.
   
पुस्तक का पहला लेख ‘कला और सौंदर्य के गैर रूपवादी कथाकार’ शीर्षक से शेखर जोशी की कहानियों का मूल्यांकन है. जिसमें उन्होने ‘नौरंगी बीमार है’, ‘आशीर्वचन’, ‘बदबू’, ‘उस्ताद’, ‘मेंटल’ जैसी कहानियों को अपनी आलोचना का आधार बनाया है. एक सजग आलोचक की तरह पंकज केवल शेखर की कहानियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे उनकी तुलना नागार्जुन और रेणु जैसे रचनाकारों के साथ करते हुए इन सबकी संवेदना का एका प्रकट कर देते हैं. उन्होंने ठीक लिखा है कि, किसी भी भाषा के बड़े और महान रचनाकारों को पढ़ते समय स्वाभाविक रूप से अनेक महान रचनाओं की याद आती है. कहानी को पढ़ते समय सिर्फ कहानी याद आए, यह कोई जरुरी नहीं; उस मानवीय संवेदना को संपोषित करने वाली संरचना की संवेदना से जुड़ने वाली कोई महान कविता याद आ जाए तो इसमें कोई हैरत की बात नहीं है. यथा, ‘कोसी का घटवार’ में गोसाईं के जीवन के निचाट अकेलेपन को भरने के लिए उन्होंने जिस तरह कुत्ते, बिल्ली को साथ रखकर देखा है और गोसाई के अस्थिर तथा चंचल मन का चित्रण किया है, उससे गुजरते हुए यकायक बाबा नागार्जुन की अमर कविता अकाल और उसके बाद’ की याद आती है. पंकज की टिप्पणी है कि,‘शेखर अपनी कहानियों में अभिजात्य और रूपवादी सौंदर्यबोध पर चोट करते हैं. वे बेहद मितव्यता से अपनी बात कहते हैं, चाहे वह गरीब हो, चाहे श्रमिक. हाशिए के समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी का एहसास उनकी कहानियों में साफ तौर पर मिलता है. उन्होंने साफ़ रेखांकित किया है कि, शेखर जोशी जैसा रचनाकार जो खुद मितभाषी है, उसके अपने मूल्यांकन के क्रम में स्वयं हिंदी आलोचना भी मितभाषी हो गई, जो ठीक नहीं हुआ.’ जाहिर है, इस आलेख से शेखर जोशी के रचनाकर्म के पुनर्मूल्यांकन की जरूरत महसूस होती है.

पितृसत्ता, स्त्री और समकालीन जीवन-यथार्थ’ शीर्षक से पुस्तक के दूसरे लेखमें अल्पना मिश्र की कहानी ‘स्याही में सुर्खाब के पंख’ को आधार बनाया गया है. यह पितृसत्ता की क्रूरता, कुलीनता की हिंसा और नृशंसता की कहानी है. पंकज ने इस कहानी की बहुत अच्छी समीक्षा की है, हालांकि मुझे निजी तौर पर इस लेख के शुरुआती साढ़े-तीन पृष्ठ रचना की समीक्षा के संदर्भ में बहुत जरूरी नहीं लगे. इनमें स्वानुभूति बनाम सहानुभूति की बहस पर बात की गई है. पंकज की इस पुस्तक से गुजरते हुए उनकी समीक्षा-दृष्टि के सुथरे पैमानों पर तो बहुत ढंग से ध्यान जाता ही है, लेकिन एक बात खटकती भी है, वह ये कि वह एक बात को सिद्ध करने के लिए तर्कों का अंबार लगा देते हैं, यहाँ तक कि संदर्भ के रूप में एक के बाद एक अनेक बड़े नामों और उनके कथनों को पेश करते चले जाते हैं, इससे मुद्दा थोड़ा बोझिल-सा लगने लगता है, जबकि उनकी बात दो या तीन उदाहरणो में ही स्पष्ट हो चुकती है. ख़ैर,

‘कहानी के स्त्री बनाम स्त्री की कहानी’ नामक लेख भी उनके पिछले लेख की तरह स्वानुभूति और सहानुभूति की बहस में स्त्री प्रश्न पर स्वानुभूति को प्राथमिकता देता दिखाई देता है. इसमें उन्होंने लवलीन की कहानी ‘चक्रवात’, जयश्री रॉय की एक रात’, कविता की ‘बावड़ी’, वंदना राग की ‘पति परमेश्वर, गीताश्री की गोरिल्ला प्यार’, इंदिरा दांगी की मैंने परियाँ देखी हैं’, के माध्यम से अपनी बात को स्पष्ट किया है. उनकी यह टिप्पणी काबिले-गौर है कि, स्त्री जीवन के समकालीन यथार्थ को अधिक प्रामाणिक और वास्तविक रूप में स्त्री कथाकारों की नजर से ही देखना मुमकिन है.’

‘भूमंडलीकृत भाषा में संवेदना की परिभाषा’ मे प्रियदर्शन की कहानी पेइंग गेस्ट’की समीक्षा की गई है. इसमें उन्होंने लिखा है, ‘भूमंडलीकरण ने हमारी भाषा को गहराई से प्रभावित किया है. हमारी संवेदना और सोच भूमंडलीकृत समय के मुताबिक अनुकूलित हो रही है, जिसे सामाजिक आदतों और सार्वजनिक व्यवहारों में आसानी से लक्षित किया जा सकता है.’ लेखक के अनुसार, भूमंडलीकृत सभ्यता में अंतरंगता अंततः संबंधों के दायरे का अतिक्रमण नहीं कर पाती. इस सभ्यता का सबसे बड़ा सच यह है कि मनुष्य की प्राथमिकताएं बदलती रहती हैं. इस बात को रांची से दिल्ली आकर मैसेज मैठानी के घर में बतौर पेइंग गेस्ट रह रही शालिनी के उदाहरण से समझा जा सकता है.

मिसेज मैठानी शालिनी को चाहे जितनी सुविधाएँ देती रही हों, बीमार पड़ने पर शालिनी की चाहे जितनी जितनी सेवा कर चुकी हों, उसके दोस्तों को आने-जाने और मस्ती करने की चाहे जितनी आजादी देती रही हों, लेकिन शालिनी के लिए वह सिर्फ ‘मिसेज मैठानी’ ही रहती हैं. उम्र के एक बड़े फासले के बावजूद शालिनी मिसेज मैठानी’ को चाची कह पाती है, न आंटी करने में सहजता महसूस करती है. वह एक कामकाजी संबोधन ‘मिसेज मैठानी’ का बना पाती है. शालिनी का यह वाक्य ‘आप मेरी मां बनने की कोशिश करें’ एक प्रतीक वाक्य जैसा है कि एक दूसरे की आजादी का सम्मान अंतरंगता और संबंधों को लेकर उदारता पूर्ण व्यवहार के बावजूद इसे संबंधों की गहराई और बेहद इसे जोड़ना संभव नहीं है. लेकिन इस बात का दूसरा पहलू भी है. प्रियदर्शन ने अपनी  कहानी में जिस ओर इशारा किया है, वह सच का एक रूप तो हो सकता है पर पूरा सच नहीं है. इसके उलट भी समाज में ढेरों उदाहरण मौजूद हैं. भरपूर भूमंडलीकरण और उत्तर आधुनिकता के बावजूद मनुष्य की संवेदना अभी भी इतनी यांत्रिक और पशुवत नहीं हुई है, जिसकी ओर प्रियदर्शन इशारा कर रहे हैं.


संजीव बख्शी के उपन्यास भूलन कांदा’ की समीक्षा बतौर ‘आदिवासी जीवन का यथार्थ और हिंदी उपन्यास’ शीर्षक से लिखे गए लेख के शुरुआती हिस्से में रचना और शोध कार्य के क्षेत्र और उनके आपसी अंतर्संबंधों पर बात की गई है. इस क्रम में पंकज ने स्पष्ट लिखा है कि, मानवीयता संवेदनशीलता और संस्कृति समीक्षा के बगैर कोई उपन्यास एक रचना असंभव है, जबकि तथ्य और सूचना विश्लेषण पर आधारित अध्ययन का काम इसके बिना भी चल सकता है. शायद रचना की प्रामाणिकता और स्वाभाविकता को लेकर हिंदी आलोचना में जिस तरह की/से बातें हुई हैं उसके कारण भी शायद उपन्यासकारों का रुझान तथ्यों पर आधारित उपन्यास लिखने की ओर हुआ है. दूसरी बात यह कि वर्षों से सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यक रूप से भी हाशिए पर रहे दलित और आदिवासी अब समकालीन राजनीति और साहित्यिक विमर्श की मुख्यधारा में शामिल हैं, इनको केंद्र में रखकर लिखी गई पुस्तकों की बाजार में एक मांग है, जिसके कारण दलितों और आदिवासियों को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखे जा रहे हैं इनमें वह लोग भी शोधाधारित उपन्यास लिख रहे हैं, जिन्हें आदिवासी जीवन का कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है कोई जानकारी और न उनके जीवन और संस्कृति से कोई परिचय. 

पंकज यहाँ शोध आधारित उपन्यास के क्रम में सहानुभूति या स्वानुभूति के सवाल से भी टकराने का प्रयास कर रहे हैं, हालांकि अब शोध आधारित रचना या मानवीय संवेदना पर आधारित रचना का प्रश्न ज्यादा मुखर होना चाहिए कि सहानुभूति बनाम स्वानुभूति का प्रश्न. पंकज मूलतः अपने विश्लेषण में यही कहना चाहते हैं. आदिवासी संदर्भों पर बात करते हुए उन्होंने लिखा है कि, ‘आदिवासियों का जीवन अधिक सहज छल-प्रपंच रहित और प्रकृति के साथ सहज सामंजस्यपूर्ण होता है. वे मुख्यधारा के कथित सभ्य समाज के शोषणचक्र में भी इसीलिए फँस जाते हैं कि इस समाज के तौर तरीके और काइयांपन से वे भोले लोग सर्वथा अनजान होते हैं लेकिन जब उन्हें अपने साथ हो रहे छल-प्रपंच का पता चलता है या उनके समाज के सामने कोई संकट आता है, तो उसका सामना सिर्फ एक पीड़ित व्यक्ति, नहीं बल्कि पूरा समाज मिल करके करता है. किसी व्यक्ति को अकेला छोड़ देना गैर-आदिवासी समाज की प्रवृत्ति है. इसी क्रम में आगे लिखा गया है, ‘सबसे अधिक समस्या आदिवासियों के जीवन में बाहरी हस्तक्षेप से बढ़ी है, जिसके कारण संघर्ष बढ़ा है.’ 

मेरे विचार से पंकज जी की उक्त सारी बातें उस जगह अच्छी तरह से लागू हो सकती हैं, जहां आदिवासी और गैर-आदिवासी समुदाय साथ-साथ/आस-पास रहते हैं या जहां उदारीकरण, निजीकरण, विकास और दबंगई के कारण भी आदिवासियों से गैर-आदिवासियों द्वारा उनके संसाधन छीने जा रहे हों. यानी जहां आदिवासी समुदाय कम संख्या में है और वे लोग अभी भी पढ़े लिखे नहीं है, यह तर्क वहां सही हो सकता है, जहां हम आदिवासियों को अभी भी आदिम रूप में ही देख, समझ, पा और स्वीकार रहे हैं. भूलन कांदा’ के परिप्रेक्ष्य में यह बात ठीक हो सकती है, पर आदिवासी मात्र पर इसे लागू नहीं किया जा सकता.

जरा एक नजर पूर्वोत्तर की ओर डालिए, वे राज्य, जो आदिवासी बहुल हैं, वे राज्य, जहां साथ-साथ/आस-पास गैर-आदिवासी नहीं बल्कि विभिन्न आदिवासी जनजातियां ही रहती हैं. जहां शिक्षा भी पहुंच रही है और सत्ता व राजनीति पर भी इन्हीं आदिवासियों का प्राधान्य; क्या पंकज जी की बात वहां लागू हो पाएगी! सच यह है कि पूर्वोत्तर में एक आदिवासी समुदाय ही दूसरे आदिवासी समुदाय से सत्ता और साधनों के लिए संघर्षरत है. यहाँ अगड़े आदिवासियों के मन में दूसरे पिछड़े आदिवासियों के प्रति वैसा ही भाव देखा जा सकता है, जैसा कि छत्तीसगढ़ में आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच है.

आफस्पा कानून तथा पड़ोसी राज्यों और देशों से घुसपैठ आदि को छोड़ दें तो यहां आदिवासियों की आपसी समस्याएं कम नहीं है. यहां शिक्षित हो गए और नौकरियों में गए आदिवासी पिछड़े अनपढ़ आदिवासियों को बेतरह कमतर समझते हैं. तो क्या अगड़े होने के कारण, बेवकूफ़ माने जाने की हद तक सीधे-सादे न रह जाने के कारण ये समुदाय आदिवासी नहीं कहलाए जाएंगे! नकार दीजिए न! अब चाहें तो लगे हाथ कह डालिए कि नफरत का यह संस्कार उन्हें पूंजीवादी स्थितियों और निजीकरण आदि से पनपी नई परिस्थितियों ने दिया है, पर एक मिनट रुकिए, पहले जरा सोचिए कि जो दुनिया इतनी सीधी-सादी, भोली और सहज थी, वह ऐसी क्योंकर हो गई कि अपने ही दूसरे आदिवासी समुदाय का गला घोंटने पर उतारू हो गई? तथाकथित सभ्यता का आवरण ओढ़े जाने से पूर्व जब कभी हम स्वयं जंगलों में रहते होंगे तो क्या हम भी ऐसे ही सीधे और भोले नहीं थे? फ़िर भोलेपन का तर्क सिर्फ़ आदिवासियों के साथ ही क्यों? हम इस बात पर स्यापा क्यों नहीं करते कि हमारे और सरकार द्वारा केवल निजी और सरकारी स्वार्थों की पूर्ति के लिए आदिवासियों का शोषण बंद किया जाना चाहिए बल्कि उन्हें नई परिस्थितियों के अनुसार उनके जीवन को समृद्ध करने की अच्छाई बुराई बताकर उन्हें जेनुइन ढंग से आगे बढ़ने में मदद करनी चाहिए न कि उन्हें दया का पात्र बना देना चाहिए!

‘भूलन कांदा’ का जिक्र करते हुए पंकज कहते हैं कि, ‘छत्तीसगढ़ के आदिवासी बेहद भोले और छल-प्रपंचों से दूर शांतिप्रिय जीवन में यकीन रखने वाले हैं, जिन्हें यह तक नहीं मालूम कि भारत कब गुलाम था, कब आजाद हुआ, पहले कौन शासक था और आज कौन शासक है.’ 

सवाल यह है कि आखिर इसमें गलती किसकी है कि आदिवासी मूर्खता की हद तक भोले व पिछड़े रह गए. इसमें हम तथाकथित अगड़ों की जिम्मेवारी कितनी है, इसकी भी पड़ताल की जानी चाहिए. बहरहाल, ‘भूलन कांदा’ उपन्यास की तारीफ में पंकज के तर्क से बखूबी सहमत हुआ जा सकता है कि, ‘यह एक ऐसा उपन्यास है, जो आदिवासी जीवन के बारे में कोई मायालोक नहीं रचता.’ उन्होंने उपन्यास का नैरेशन बहुत अच्छा किया है; आदिवासी प्रकृति पूजक हैं, सामूहिकता में बेहद यकीन रखते हैं, सुख-दुख में साथ रहते हैं, पर फ़िर कहें कि यह बात क्षेत्र विशेष के आदिवासी समुदाय विशेष पर लागू हो सकती है, सब पर नहीं. उपन्यास में देखें तो, जो सामूहिकता मुखिया के कहने पर सारे आदिवासी समुदाय की एक आवाज बन जाती है कि बच्चों की हत्या गंजहा द्वारा नहीं, भकला के हाथों हुई है, वह दूसरी बार जांच के समय क्यों सामने नहीं आ पाती! गंजहा को जेल में इतना मेहनती शांत देखकर जेलर को शक हो जाता है कि यह आदमी हत्यारा नहीं लगता. सो वह जांच बिठवाता है और वही आदिवासी समाज जो पहली बार में सामूहिकता के लिए जान देने को तत्पर था, दूसरी बार में टूट जाता है. जाहिर है, इसके कारणों की पड़ताल भी की जानी चाहिए. 

पंकज की आलोचना में ‘नेम ड्रॉपिंग’ काफ़ी देखी जा सकती है. यहाँ भी उन्होंने लिखा है कि, ‘नोबल पुरस्कार से सम्मानित अमरीकी उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे के कालजयी उपन्यास ‘द ओल्ड मैन एंड सी’ की तरह संजीव बख्शी का यह उपन्यास ‘भूलन कांदा’ भारी-भरकम उपन्यास नहीं है.’ यहाँ हेमिंग्वे की  तुलना किस अर्थ में की गई, स्पष्ट नहीं हो पाया. 

‘करुणा की चित्रलिपि में जीवन का गद्य’ नामक लेख महादेवी वर्मा के गद्य साहित्य पर केंद्रित है. इसमें पंकज ने ठीक रेखांकित किया है कि, ‘आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास के संशोधित संस्करण में महादेवी वर्मा के गद्य का जिक्र नहीं किया, जबकि 1940 में आए अपने इतिहास के संशोधित संस्करण में शुक्लजी ने लिखा है, ‘इस संस्करण में समसामायिक साहित्य का अब तक का आलोचनात्मक विवरण दे दिया गया है जिससे आज तक के साहित्य की गतिविधि का पूरा परिचय प्राप्त होगा, लेकिन उन्होंने महादेवी के गद्य का ज़िक्र नहीं किया. यही कारण है कि महादेवी की पहचान बड़े स्तर पर एक कवयित्री की ही बनकर रह गई जबकि उनका गद्य भी कम मार्के का नहीं है.’ 

पंकज ने अपने लेख में महादेवी के इस अचीन्हे गद्य पर बारीकी से विचार किया है. उनके अनुसार, ‘प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में गुलाम भारत के ग्रामीण और किसानों के जीवन यथार्थ का चित्रण जिस रूप में हुआ है, उसे अनुपमेय माना जाता है पर यदि हम महादेवी के ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएं’ और ‘पथ के साथी’ के संस्मरणों में चित्रित ग्रामीण स्त्रियों की पराधीनता की पीड़ा और तत्कालीन जीवन यथार्थ को देखें तो लगता है प्रेमचंद ने ग्रामीण स्त्रियों के जीवन यथार्थ का जैसा चित्रण किया है, वह एक पुरुष की दृष्टि से देखे हुए यथार्थ की महज ऊपरी परत है उनके कथा साहित्य में स्त्रियों का जीवन यथार्थ पुरुषों के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन यथार्थ का ही एक हिस्सा-सा है, जिसमें स्त्रियों के वैयक्तिक जीवन-यथार्थ, व्यक्तिगत दुख, आकांक्षा और उसकी छटपटाहटों को कम जगह मिली है.’ 

‘श्रृंखला की कड़ियां’ में महादेवी लिखती हैं, ‘नारी का मानसिक विकास पुरुषों के मानसिक विकास से भिन्न परंतु अधिक द्रुत, स्वभाव अधिक कोमल और प्रेम-घृणादि भाव