रंग - राग : एक उत्तल दर्पण पर आत्म चित्र : अशोक भौमिक

Posted by arun dev on अप्रैल 29, 2016








इटली  के मशहूर पेंटर Girolamo Francesco Maria Mazzola अपने शहर parma के नाम पर पर्मिजियनिनो के नाम  से जाने जाते हैं. उनके आत्म चित्र 'Self-portrait in a Convex Mirror' पर इसी शीर्षक से अमेरिका के कवि John Lawrence Ashbery ने एक लम्बी कविता लिखी है जिसे २० सदी का एक काव्यतामक करामात समझा जाता है इस कविता पर उन्हें Pulitzer Prize,the National Book Award, और the National Book Critics Circle Award भी मिले.

मशहूर चित्रकार और लेखक अशोक भौमिक ने चित्र और कविता की इस जुगलबंदी पर यह सहेजने लायक लेख  लिखा है जो ख़ास समालोचन के पाठकों के लिए है.


पर्मिजियनिनो का चित्र और जॉन एशबेरी की कविता                      
('सेल्फ पोर्ट्रेट इन अ कॉन्वेक्स मिरर' या 'एक उत्तल दर्पण पर आत्म चित्र')       


अशोक भौमिक



विश्व चित्रकला के बहुवर्णी इतिहास में कई ऐसे पढ़ाव देखने को मिलते हैं, जहाँ हम चित्रकार की रचनाशीलता को देख कर चमत्कृत होते हैं. अपने परिवेश को, किसी व्यक्ति या वस्तु को अपने चित्र में हू-ब-हू बना देना कलाकार की निपुणता को तो  निश्चय ही दिखती है, पर यह 'कला' नहीं हैं! 'रचनाशीलता' का अर्थ किसी वस्तु या व्यक्ति का, अपने चित्र में 'पुनर्रचना' या अनुकरण नहीं है.  पश्चिम के चित्रकारों ने कला में 'सृजन' की अनिवार्यता को बार-बार रेखांकित किया है. इस सन्दर्भ में फ्रांसेस्को मारिया माज़ोला, (जो इतिहास में पर्मिजियनिनो के नाम से ही ज्यादा जाने जाते है) का बनाया हुआ 'सेल्फ पोर्ट्रेट इन अ कन्वेक्स मिरर' या 'उत्तल दर्पण पर आत्म चित्र', निस्संदेह एक महत्वपूर्ण उदहारण है.

पर्मिजियनिनो का जन्म 11 जनवरी 1503 में हुआ था (केवल 37 वर्ष की आयु में उनका निधन 24 अगस्त 1540 में हुआ था). पर्मिजियनिनो द्वारा बनाये गए चित्रों में हमें बार-बार एक ऐसे चित्रकार को पाते हैं जो 'कला' को एक अलग नज़रिये से देखना-जानना चाहता था. पर्मिजियनिनो द्वारा बनाया गया 'उत्तल दर्पण पर आत्म चित्र' पर बात करने से पहले दो बातों को समझ लेना जरूरी होगा!

आधुनिक युग में दर्पण हमारे दैनन्दिन जीवन का एक ऐसा अभिन्न अंग है, जिसके बारे में हम ज्यादा ध्यान नहीं देते. घरों में प्रयोग होने वाला दर्पण, सपाट सतह वाला 'समतल' दर्पण होता है, जहाँ हम अपना चेहरा ठीक वैसा ही देख पाते है जैसा की हम हैं. पर इसके अलावा दो और तरह के दर्पणों से भी हममें से कई शायद परिचित हैं. पहला एक ऐसा दर्पण जिसका बीच का हिस्सा अंदर की ओर धँसा होता है, हम कोनकेव मिरर या अवतल दर्पण कहते हैं.  दूसरे प्रकार का दर्पण, जिसका बीच का हिस्सा उभरा हुआ होता है, उसे कॉन्वेक्स मिरर या उत्तल दर्पण कहते हैं. दर्पणों के इस भिन्नता के चलते, उन पर बनने वाला अक्स भी अलग अलग होता हैं.

यह तथ्य एक ओर वैज्ञानिक है तो दूसरी ओर यह कला के एक महत्वपूर्ण पक्ष की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कराता है. हम जो भी अपने आस पास देखते है या अनुभव करते हैं उसका अक्स हमारे दिलों दिमाग़ या ज़हन या ह्रदय या मानस पटल पर बनता है. कला के सृजन में हर कलाकार, एक ही विषय को अपने व्यक्तिगत और दूसरे कलाकारों से भिन्न तरीके से व्यक्त करता है. ऐसा क्यों करता है ? यह निस्संदेह एक जटिल प्रश्न है, पर्मिजियनिनो शायद इस चित्र के जरिये इस प्रश्न का एक उत्तर हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं. वास्तव में, जिस ज़हन या मानस पटल का उल्लेख यहाँ किया गया है, उसकी समानता सहज ही एक दर्पण से की जा सकती है, जो एक ही रूप का, दर्पण की भिन्नता के चलते दर्पण में भिन्न भिन्न बिम्ब या अक्स तैयार करता है. मनुष्य का 'मानस पटल', वह स्वयं अपने अनुभवों, सरोकारों और रुचियों, विचारधाराओं, प्राथमिकताओं आदि के अनुरूप तैयार करता है और इसीलिये कला कृतियों के पीछे सृजन के इस मनोविज्ञान की सबसे बड़ी भूमिका होती है.

पर्मिजियनिनो ने 'सेल्फ पोर्ट्रेट इन अ कॉन्वेक्स मिरर 'या' उत्तल दर्पण पर आत्म-चित्र' 1524 में बनाया था, यानि जब वे केवल इक्कीस वर्ष के थे !  इस मेधावी चित्रकार के बारे में तत्कालीन कला इतिहासकार जिओर्जिओ वसारी (1511-1574) ने लिखा था, "रोम में पर्मिजियनिनो को रफाएल (1483 -1520, सुप्रसिद्ध इतालवी चित्रकार) का अवतार माना जाता है ".

पर्मिजियनिनो का   'सेल्फ पोर्ट्रेट इन अ कॉन्वेक्स मिरर' या 'उत्तल दर्पण पर आत्म-चित्र' एक गोलाकार चित्र है जिसका व्यास 6.4 इंच है. इटली में नाई की दुकानों में प्रायः उत्तल दर्पण का प्रयोग होता था. पर्मिजियनिनो ने अपना आत्म चित्र ऐसे ही एक दर्पण में देख कर बनाया था. चित्र में कलाकार का दाहिना हाथ काफी बड़ा दिखाया गया है साथ ही खिड़की और खम्भे का आकार भी अलग हैं. यह विकृति या विरूपण उत्तल दर्पण के चलते हुआ है, यह समझने में कठिनाई नहीं होती.




इस चित्र पर अमरीकी कवि जॉन एशबेरी (जन्म:1928) ने इसी शीर्षक से एक अत्यन्त महत्वपूर्ण लम्बी कविता लिखी है, जिसमे वे इस चित्र को सामने रख कर कला, समाज, परिवेश और कलाकार के बीच के रिश्तों की पड़ताल करते हैं. कविता में अपनी बात को कहने के लिए उन्होंने इस चित्र और चित्रकार पर्मिजियनिनो पर इतालवी इतिहासकार वसारी के एक वाक्य को उद्धृत किया है, "जो तुम दर्पण में देखते हो उन सब को महान शिल्प के साथ नक़ल करना होगा". जॉन एशबेरी, वसारी के इस पंक्ति के साथ अपनी बात जोड़ते हुए कहते हैं –

" जो तुम दर्पण में देखते हो, उन सब को
महान शिल्प के साथ नक़ल करना होगा"
मुख्य रूप से उसका प्रतिबिम्ब, आत्म चित्र
जिसका प्रतिबिम्ब है, उसका आत्म चित्र
प्रतिबिम्ब का है, जिसे हटा लिया गया है.
दर्पण ने केवल वही चुना, जिसे उसने देखा था
और जो उसके काम के लिए पर्याप्त था ......

जॉन एशबेरी, अपनी कविता के एक और अंश में लिखते हैं -

..... आत्मा को वहीं बने रहना है जहाँ वह है,
बावजूद इसके कि चंचल है वह, खिड़की की कांच पर बारिश के बूँदों की आवाज़.
पतझर की आहें भरती पत्तियाँ, हवा के थपेड़ों को झेलती,
मुक्त होने की चाहत लिये, बाहर, पर इसे रुकना है
वहाँ, जहाँ वह है. इसे चलना ही है
कम से कम जितना संभव हो. वह जो यह आत्मचित्र कहता है .....


जॉन एशबेरी, अपनी कविता में कहीं भी अपना ध्यान इस चित्र से नहीं हटाते. यह चित्र एक गोलार्ध की सतह पर बना चित्र है और चित्र में एक कमरे के अंदर, एक उत्तल दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देखता स्वयं चित्रकार है. कमरे का भीतरी हिस्से में काँच की खिड़की और खम्भा दिख रहा है. अपनी बात कहने के लिए जॉन एशबेरी बार बार इस चित्र पर लौटते हैं. चित्र के आकार (आधे गोले की सतह पर) को ध्यान में रख कर वे अपने कविता में 'पृथ्वी के गोले से बाहर आने कोशिश करते हाथ 'की बात करते हैं. वे कमरे के अंदर घूमते शब्द और उनके अर्थ पर बात करते समय चित्र के कमरे के अंदर व्याप्त रौशन-अंधेरे स्पेस का सन्दर्भ लेते हैं.

एक फुसफुसाता शब्द कमरे में घूमता हुआ
रुकता हैं बिलकुल एक नए अर्थ पर.

यह वह सिद्धांत है जो एक कलाकृति को
कलाकार के इरादे से भिन्न बनाता है. वह प्रायः पाता है
कि  उससे वह ही छूट गया है, जिसे व्यक्त करने के उद्देश्य से
उसने रचना शुरू की थी......  

किसी कला कृति के रचना प्रक्रिया पर, इस चित्र को आधार बना कर, जॉन एशबेरी अत्यन्त सार्थक टिप्पणी करते हैं.

वे चित्र को 'समझने' के स्थान पर उसे अनुभव करने पर जोर देते हुए कहते है -

एक फुसफुसाते शब्द को नहीं समझा जा सकता
पर उसे महसूस किया जा सकता है  ......

इस कविता के एक और स्थान पर जॉन एशबेरी कहते हैं -

..... वह एक धुन है पर कोई शब्द नहीं है
शब्द केवल अनुमान (speculation) ही तो होते है
(लैटिन में दर्पण को स्पेकुलम कहते हैं)
वे जो माँग करते हैं,पर उन्हें संगीत का अर्थ नहीं मिलता,
हम केवल स्वप्नों की मुद्राएँ/भंगिमाएँ देखते हैं.....



चित्रकला से लेकर कविता, शास्त्रीय संगीत, मूर्तिकला आदि कलाओं के बारे में जॉन एशबेरी चर्चा तो करते हैं, पर 'कलाओं के अन्तर्सम्बन्ध' पर सतही अवधारणाओं से दूर रहते हुए, वे विभिन्न कला कर्म से जुड़े कलाकारों का उनके समय और परिवेश के साथ उनके रिश्ते पर ध्यान केंद्रित कर अपनी बात कहते हैं. उनकी कविता हमें जहाँ एक और मुक्तिबोध के लम्बी कविताओं के सर्पिल संरचना की याद दिलाता हैं, वहीं कला के बारे में उनके विचारों का रबीन्द्रनाथ ठाकुर के विचारों के बीच हमें अद्भुत साम्य दिखता है.
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अशोक भौमिक 
31 जुलाई 1953 (नागपुर) 
अशोक भौमिक देश के मशहूर चित्रकारों में से एक हैं. पिछले चार दशकों में अनेक एकल प्रदर्शनियाँ देश विदेश में लगीं और सराही गयी हैं.
इसके अलावा आईस-पाईस (कहानी संग्रह), बादल सरकार : व्यक्ति और रंगमंच (जीवनी), समकालीन भारतीय कला : हुसैन के बहाने (लेखों का संग्रह), मोनालिसा हंस रही थी (उपन्यास), शिप्रा एक नदी का नाम है (उपन्यास) और अकाल की कला और जैनुल आबेदिन  (जीवनी ) आदि कृतियाँ प्रकाशित हैं.
सामाजिक सरोकारों के कारण  अलग से भी जाने जाते हैं.  दिल्ली में रहते हैं.
bhowmick.ashok@googlemail.com