विष्णु खरे : दो बड़े लेखक : दो अमर कृतियाँ : दो बड़ी फ़िल्में

Posted by arun dev on मार्च 27, 2016







मार्च का महीना आते ही उच्च शिक्षण संस्थाओं में गोष्ठियों की भरमार हो जाती है. जैसे यह भी कोई काम हो जिसे वित्तीय सत्र के अंत तक निपटा लेना चाहिए. ज़ाहिर है इस ‘निपटान’ में घिसे पिटे विषय और आसानी से उपलब्ध तथाकथित विषय विशेषज्ञों की खूब आमद रहती है. प्रतिभागी भी नाश्ता चबाते हुए पहले सत्र में ही कथित सर्टिफिकेट हासिल कर चलते बनते हैं. और इस तरह तमाम राष्ट्रीय और अंतर्राष्टीय गोष्ठियों का काम तमाम हो जाता है.
जब विष्णु खरे को इसी तरह की ही किसी गोष्ठी में ‘सिनेमा और साहित्य’ पर आमंत्रित किया गया तब क्या हुआ?  साथ ही उम्बेर्तो एको और हार्पर ली की कृतियों पर बनी फिल्मों की भी चर्चा आप यहाँ पढेंगे.


दो बड़े लेखक : दो अमर कृतियाँ : दो बड़ी फ़िल्में                                   
विष्णु खरे 



हिंदी प्रदेश में आज जिन भी अभागे विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य कथित शैक्षणिक संस्थानों में मतिमंद हिंदी प्राध्यापकों द्वारा सिनेमा या फिल्म विषय पर औसतन जिस तरह बलात्कार किया जा रहा है, कूपमंडूक प्रतिक्रियावादी बना दिए विद्यार्थी जिन विषयों पर ‘’गंभीर’’ बहस कर रहे हैं, संगोष्ठियों में जिन टॉपिक्स पर डिस्कशन हो रहे हैं, उनमें एक अनिवार्य ‘क्लिशे किंग’, पिष्टपेषण-सिरमौर मसला होता है ‘सिनेमा और साहित्य’. मैं इतनी बार इस पर बोलने बुलाया जा चुका हूँ कि अब अंतिम बार आयोजकों, फैकल्टी और खुद अपने लिए गोएबेल्स की तरह एक देसी माउज़र खरीदने पर फ़ौजदारी विचार कर रहा हूँ.

ऐसे सेमिनारों में चूँकि मंच के दोनों तरफ की अधकचरी सामूहिक अक्ल और जानकारी वर्तमान हिंदी साहित्य के कुछ घिसे-पिटे नामों और कथा-कृतियों तक पहुँचते-पहुँचते टें बोल जाती है इसलिए कोई सवाल ही नहीं उठाता है कि आपकी मुराद किस तरह के साहित्य और सिनेमा से है? प्रेमचंद हमारे लिए एक ऑक्टोपस बना हुआ है. आधुनिक युवा और अधेड़ कथाकारों को तो छोड़ ही दें, जैनेंद्र, अमृतलाल नागर, वृन्दावनलाल वर्मा, निर्मल वर्मा, नरेश मेहता, ’रेणु’, यशपाल, रांगेय राघव आदि के साथ क्या हुआ ? हमारे नाटकों, काव्यों, आत्मकथाओं, जीवनियों पर तो क्या, कोई महान निदेशक चाहे तो टेलीफोन डायरेक्टरियों, अख़बारों-कैटेलॉगों  के विज्ञापनों और दीवार के पोस्टरों तक पर यादगार फिल्म बना सकता है. सिनेमा के लिए साहित्य वही नहीं है जो जिल्दों के बीच या काग़ज़ पर छपा हुआ है – उसके लिए पूरा ब्रह्माण्ड साहित्य है. क्या वर्तमान हिंदी प्राध्यापक, विद्यार्थी और करोड़ों हिन्दीभाषी पाठक इसे जानते भी हैं ?

जहाँ  दिल्ली वि.वि. के मीडियॉकर सुधीश पचौरी, गोपेश्वर सिंह, अपूर्वानंद आदि, जिनका नाम लिखते हुए भी अपने-आप पर लानत भेजने की इच्छा  होती है, और कॉलेजों में तिलचट्टों की तरह बिलबिलाते इनके झोला-उठाऊ अनुयायी, जो साहित्य की लुग्दी के दीमक हैं, अपने लुम्पेनीकरण पर आत्माभिनंदन कर रहे हैं, वहाँ यह कौन पूछे कि हिंदी और संस्कृत  सहित भारतीय साहित्य को आप कितना जानते हैं और अनंत विश्व साहित्य से आपने क्या पढ़ रखा है जो सिनेमा और साहित्य की दुहाई देते हैं ? साहित्य का अर्थ यदि आपके लिए उत्कृष्ट लेखन है तो ज़ाहिर है कि उस पर फिल्म बनानेवाले स्वयं बुद्धिजीवी निदेशक होंगे जो जटिल से जटिल कहानियों और विचारों पर कठिनतम कलात्मक शर्तों पर एक जिद्दी सिनेमा बनाएँगे. वह परवाह नहीं करेंगे की उन्हें दर्शक और पैसे मिलेंगे या नहीं. क्या हमारे पास ऐसे दर्शक, ऐसे निर्माता, ऐसे फिल्म-समीक्षक हैं ?

भारतीय, विशेषतः हिन्दू समाज, रोज़ उपभोक्ता वस्तुओं, विवाह, कथित तीज-त्यौहारों, अन्य कर्मकाण्डों-अंधविश्वासों और दयनीय फूहड़ मनोरंजन आदि पर खरबों रुपये लुटा रहा है, और इस प्रक्रिया में संस्कृत के श्लोक के अनुसार साहित्य-संगीत-कलाविहीन है और जिसे जगतगति नहीं व्यापती वैसा बिना पूँछ और सींग का मूढ़ जानवर बना हुआ कुदक्कड़े मार रहा है. हिन्दू पञ्चांग विश्वबाज़ारवाद, उपभोक्तावाद और पूँजीवाद का सबसे बड़ा हथियार बना हुआ है. अपनी आत्मरति और आत्माभिनंदन में हमारे सहित सारा हिन्दू समाज स्वयं दूरगामी अर्थों में आत्मद्रोही अर्थात् देशद्रोही कहाने योग्य है. निर्ममतम कटु सत्य तो यह है हमारे समाज और घरों में उत्कृष्ट पुस्तकों, फिल्मों, संगीत, नृत्य – सारी उत्कृष्ट संस्कृति – के लिए कोई स्थान नहीं है. हम आत्मनाश के एकतरफ़ा राजपथ पर अग्रसर हैं.

(दि नेम ऑफ़ द रोज़ फ़िल्म का एक दृश्य)
ऐसे में क्या आश्चर्य कि पिछले दिनों महान इतालवी लेखक-चिन्तक-लक्षणशास्त्री उम्बेर्तो एको और  अमेरिका की उपन्यासकार हार्पर ली की मृत्यु हिंदी और भारतीय सूचना-माध्यमों में लगभग अनदेखी-अचर्चित चली गई. स्वयं को सुसंस्कृत घोषित करनेवाले किसी भी देश में यह एक अक्षम्य बौद्धिक अपराध होता. उम्बेर्तो एको की क़रीब सारी कृतियाँ अंग्रेज़ी में उपलब्ध हैं और हार्पर ली का एकमात्र, किन्तु कालजयी, उपन्यास ‘टु किल ए मॉकिंगबर्ड’ पिछले पचास वर्षों में कभी-भी आउट-ऑफ़-प्रिंट, अनुपलब्ध नहीं रहा है. आजकल हमारे बगुला भगत छाप सफ़ेदपोशों को यह ख़ुशफ़हमी है कि वह लाजवाब अंग्रेज़ी जानने वाले अंतर्राष्ट्रीय बुद्धिजीवी हैं, लिहाज़ा वह एको और ली को अज्ञात कहने का दुस्साहस भी नहीं कर सकते.

इसलिए भी नहीं कर सकते कि इन दोनों की कृतियाँ न केवल करोड़ों की संख्या में बिकी हैं बल्कि एको के उपन्यास ‘दि नेम ऑफ़ द रोज़’ और ली के उपरोक्त उपन्यास पर उन्हीं शीर्षकों से फ़िल्में बन चुकी हैं. यानी ‘...रोज़’ और ‘...मॉकिंगबर्ड’ को करोड़ों दर्शक देख चुके हैं और क्योंकि वह दोनों अब ब्लू-रे डीवीडी पर भी उपलब्ध हैं इसलिए आज भी वह संसार में कहीं न कहीं देखी जा रही होंगी,विशेषतः एको और ली के देहांत के बाद तो और ज़्यादा. डिस्क और किताब, दोनों की बिक्री में भी उछाल आया होगा.

दोनों फ़िल्में भारत में लग चुकी हैं. ’मॉकिंगबर्ड’ को पढ़ने के बाद हम - मैं और मेरे  संभ्रमित-प्रभावित समानधर्मा सिनेकीट मित्रद्वय  हेमचन्द्र पहारे और जयप्रकाश चौकसे - ने उसका फ़िल्माव्रतार इंदौर के बाम्बीनो टॉकीज़  में 1962-63 में सौभाग्यवश ही देखा था,वर्ना शायद वह सिर्फ़ एक-दो दिन चली थी. पुस्तक पठनीय लेकिन रातों-रात विश्वविख्यात हो जाने के बावजूद सामान्य भारतीय पाठक के लिए गंभीर थी और देवानंद और सुरैया के आदर्श, विश्व-भर में युवा-ह्रदय-सम्राट सुदर्शन नायक ग्रेगरी पैक और एक रहस्यमय हत्याकांड के होते हुए भी उस पर फ़िल्म देशी दर्शकों के लिए अप्रत्याशित रूप से जटिल थी, जो यूँ भी ‘रोमन हॉलिडे’ और ‘द गन्स ऑफ़ नावारोने’ के अपने प्रिय नायक को एक अधेड़, चश्मुट, कस्बाई, कुर्सी तोड़ वकील एटिकस फ़िंच के रोल में देखने को तैयार नहीं थे. ’मॉकिंगबर्ड’ भारत में रिलीज़ ही पैक के बल पर हो पाई थी. जो अब भी उसे देखना चाहें उन्हें बिना बदमज़गी इतना ही बताया जा सकता है कि वह अमेरिका में काले-गोरे के अमानवीय नस्लवाद से एक ख़ूनी अदालती ड्रामा के ज़रिये दो-चार होती है.एक फिल्म यदि चर्म से सम्बंधित है तो दूसरी धर्म से.

(टु किल ए मॉकिंगबर्ड फ़िल्म का एक दृश्य)
हार्पर ली का यह एकमात्र उपन्यास मुश्किलों से प्रकाशित हो पाया था. उसे पुलित्सर और अन्य कई अमरीकी पुरस्कार मिले और बाद के ओबामा-सहित लगभग सभी प्रेसिडेंटों ने उसे सराहा और सम्मानित किया है. अब तो वह एक शाहकार है, इसलिए भी कि अमेरिका से रंगभेद गया नहीं है बल्कि पिछले दिनों उग्रतर हुआ है. फ़िल्म-संस्करण में ग्रेगरी पैक को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर मिला जबकि आज अधिकांश अश्वेत अभिनेता-अभिनेत्रियाँ खुलकर कह रहे हैं कि हॉलीवुड की फ़िल्मों और ऑस्कर सम्मानों में उनके साथ अन्याय होता है. यूँ ‘मॉकिंगबर्ड’ को कान का एक सम्मान भी दिया गया था.

एको का फिल्मोपन्यास हार्पर ली की कृति से भी कठिन है. वह 14वीं सदी के एक इतालवी पुरुष कैथलिक मठ के पुस्तकालय की लोमहर्षक कहानी है जिसमें पवित्र ग्रंथों के संन्यासी पाठकों की रहस्यमय हत्याएँ हो रही हैं. कौन सी पुस्तकें हैं यह ? यह कौन से पाठक हैं जो इन्हें प्राण देकर भी पढ़ रहे हैं और क्यों ? इनकी हत्या की योजनाएँ कौन कहाँ से क्यों बना रहा है ? इनकी धार्मिक राजनीति (रेलीगिओपोलिटीक  Religiopolitik) क्या है ? अंत में इस सब के आध्यात्मिक अर्थायाम क्या हैं ? बता दिया जाय कि इस उपन्यास और इस फिल्म से आज की कैथलिक चर्च खुश नहीं थी. हार्पर ली के उपन्यास और फिल्म पर भी अमेरिका के गोरे लिंचिंगप्रेमी नस्लवादी कू-क्लक्स-क्लानी तत्व आज तक मेहरबान और सहिष्णु नहीं हैं. सोचिए कि यदि ‘’मॉकिंगबर्ड...’’ में ग्रेगरी पैक सरीखा अधेड़ सुदर्शन नायक था तो ‘’...रोज़...’’ में मध्य-युग के धर्मगुरु-डिटेक्टिव-नायक  के रोल में  जेम्स बॉन्ड वाले अपने प्रौढ़ श्यान कॉनरी थे !

अगली दफ़ा जब हम सिनेमा और साहित्य से कोई महान प्रतिबद्ध कलात्मक माँग या डेढ़श्याणी शिकायत करें तो गरेबान में झाँक लें कि हम ख़ुद कितना विश्व-सिनेमा जानते-देखते-समझते हैं और प्रासंगिक भारतीय तथा विश्व साहित्य के दस हजारवें हिस्से के नाम, शीर्षक और सारांश भी जानते हैं या नहीं. बेशक अनुवाद की समस्याएँ हैं लेकिन जितने हुए हैं वह भी हमने जाने-पढ़े हैं क्या ? लेकिन यह बात भी है कि आज का हर हिंदी चिरकुट यह दावा करते हुए ही पैदा होता है कि वह किसी भी अंग्रेज़ी चीज़ को समझ और ट्रांसलेट कर सकता है. तब तो कोई समस्या ही नहीं है.
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(विष्णु खरे का कॉलम. नवभारत टाइम्स मुंबई में आज प्रकाशित, संपादक और लेखक के प्रति आभार के साथ.अविकल)
विष्णु खरे 
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