सबद भेद : कवि विजय कुमार : अच्युतानंद मिश्र

Posted by arun dev on नवंबर 11, 2015








कवि आलोचक विजय कुमार के तीन कविता संग्रह अदृश्य हो जाएँगी सुखी पत्तियां, चाहे जिस शक्ल से और रातपाली प्रकाशित हैं. आलोचना के क्षेत्र में भी उनका गम्भीर कार्य है.  

उनके कवि कर्म पर अच्युतानंद मिश्र का आलेख.  

विजय जी को जन्म दिन की बधाई और समालोचन परिवार की ओर से आप सभी को दी पा व ली की शुभकामनाएं  
                 






इस तरह, एक कविता लिखना चाहता था मैं                                 
अच्युतानंद मिश्र 



विता सामान्यीकरण भी करती है .परन्तु सामान्यीकरण की यह प्रक्रिया कविता में एक विशेष प्रकार का रूपाकार ग्रहण करती है. जीवन जगत में सामान्यीकरण की प्रक्रिया परिभाषाओं और परिकल्पनाओं के माध्यम से सम्पन्न होती है. कविता में ऐसा नहीं होता. परिभाषाएं एवं परिकल्पनाएं जहाँ सामान्य का विशेषीकरण करती हैं, वहीँ  कविता विशिष्ट से सामान्य की तरफ प्रस्थान करती है. कविता अन्य ज्ञान माध्यमों से इस अर्थ में भी भिन्न है कि वह इस प्रक्रिया में यानि चेतना निर्माण की प्रक्रिया में ज्ञान और संवेदना का संतुलन निर्मित करती है .भारतीय काव्यशास्त्र में सहृदय की परिकल्पना इसी संदर्भ की ओर इंगित करती है. कविता में सामान्यीकरण का एक अर्थ संदर्भ यह भी है कि वह इस तरह विशिष्ट यानि अपवादों की सत्ता संरचना का निषेध रचती है. यह कहना ज्यादा सार्थक होगा कि हर कविता अंततः एक प्रतिरोध रचती है .क्योंकि प्रतिरोध की संस्कृति ज्ञान और संवेदन की साझा संस्कृति है. इसी सन्दर्भ में जब हम विजय कुमार की कविताओं को देखते हैं तो पाते हैं कि वह हमारे इर्द गिर्द फैली विशिष्ट और आश्चर्यपूर्ण यथार्थ को सामान्य में बदलती हैं. हमारे समय का  सांस्कृतिक प्रतिरोध रचती है. 

विजय कुमार के अब तक तीन संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनका पहला संग्रह अदृश्य हो जाएँगी सुखी पत्तियां 1981 में प्रकाशित हुआ. चाहे जिस शक्ल से शीर्षक से उनका दूसरा संग्रह 90 के दशक के मध्य में  प्रकाशित हुआ. 2006 में उनका तीसरा संग्रह रातपाली प्रकाशित हुआ.

विजय कुमार के पिछले संग्रह रात-पाली की कवितायेँ अपने स्वरुप और शिल्प में हिंदी कविता में एक नया प्रस्थान बिंदु निर्मित करती है. उत्तर पूंजीवाद के सांस्कृतिक विघटन की प्रक्रिया को जिस शिद्दत और आवेग के साथ विजय कुमार रात-पाली में दर्ज़ करते हैं ,वह हिंदी कविता में मौजूद एकरूपता और दुहराव के समानांतर नये भावबोध को रचती है. नब्बे के दशक की कविता का मूल संकट ज्ञान और संवेदना के असंतुलन से निर्मित होता है. इन कविताओं में दो अलग छोड़ देखे जा सकते हैं .एक तरफ संवेदना का भावुक धरातल नज़र आता है -कई बार इस हद तक कि वह नई कविता का पुनुरोदय सा प्रतीत होने लगता है -तो दूसरी तरफ ज्ञान की बहु-आक्रामकता के दवाब के बीच कविता ही गायब होने लगती है. इस सबके साथ साथ दो और बिन्दुओं की तरफ ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा ,एक तो नब्बे के दशक की कविता आठवें दशक की कविता का विस्तार जैसा बनने की कोशिश बनकर रह जाती है तो दूसरी तरफ उससे अलग होने की कोशिश में वह बेहद अमूर्त भी हो जाती है .ऐसा नहीं है कि इस दौर के कवि को इन संकटों का पता नहीं है. बहुत सारे कवि इस संकट से वाकिफ थे, लेकिन रास्ता न खोज पाने की वजह से वे भिन्न -भिन्न तरह की काव्य विसंगातियों, सरलीकरणों एवं राजनीतिक मुहावरे को सीधे सीधे काव्यात्मक अभिव्यक्ति में तब्दील करने का प्रयत्न करने लगे. 

उदाहरण के तौर पर देखें तो  नब्बे के बाद हिंदी कविता में साम्प्रदायिकता का विषय महत्वपूर्ण हो उठता है. अचानक बहुत सारे कवि सामप्रदायिकता को मूल अंतर्विरोध की तरह प्रस्तुत करते हैं . निश्चित रूप से साम्प्रदायिकता एक महत्वपूर्ण और जरुरी विषय है लेकिन सिर्फ साम्प्रदायिकता को ही कविता में लाना एक तरह से उस पूरे सवाल को दरकिनार करना भी था जो आठवें दशक की कविता में मौजूद गतिहीनता से उपजी थी. नब्बे के दशक की कविता का एक संकट यह भी था कि बहुत सारे कवि नब्बे के दशक में आठवें दशक को ही दोहरा रहे थे . सिर्फ नब्बे ही क्यों यह बात बिलकुल आज की कविता तक पर लागु होती है. ऐसे में कविता में ठहरा हुआ समय नज़र आने लगता है .नब्बे के बाद से आज तक की कविता है उसके एक हिस्से में जो अतिरिक्त कलात्मक सजगता या भाषिक कौतुक है वह इसलिए भी है कि वस्तुगत स्थिरता या ठहराव ओझल हो सके . इस ठहराव को विजय कुमार प्रश्नांकित करते हैं . वे इस ठहराव से उत्त्पन विडम्बना बोध को कविता बनाते हैं –

पर जीवन इतना रूमानी नहीं है
हम चालीस पार के हो गये हैं
हम मुक्त नहीं हैं
भीतर से कुढ़ रहे हैं हम
हम एक वजनी पत्थर की तरह
समय की नदी में डूबते जा रहे हैं
हम सबके कमरों में महान लेखकों की थोड़ी- बहुत किताबें हैं
इन्हीं किताबों के पास विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स की गोलियां रखी हैं

इस कविता में मौजूद आत्मालोचन का स्वर एक सार्वजनिक स्पेस निर्मित करता है. ध्यान दे कि यहाँ हम को संबोधित किया गया है. हम यानि मध्यवर्ग. यह एक तरह से उस नायकत्व से अलगाव भी है, जहाँ आत्मलोचना को नितांत वैयक्तिक बनाने की कोशिश की जाती है. निकट के यथार्थ को रखने की कोशिश में या कहें अपने अनुभव को प्रमाणिक बनाने की कोशिश में यथार्थ का वैयक्तिकरण कर दिया जाता है. लेकिन इस पूरी वैयक्तिक प्रक्रिया में वर्गीय सामान्यीकरण (वर्ग स्वयम में एक सामान्यीकरण ही है) का निषेध अन्तर्निहित होता है. निकट के यथार्थ या प्रमाणिक यथार्थ लिखने की कोशिश में बारहा यथार्थ ही छूट जाता है. विजय कुमार अपनी कविताओं में निजता से बचते है. कहीं अगर कवि का मैं या निजी संसार आता भी है तो वह एक खास तरह की सामूहिकता के बोध के साथ . विजय कुमार के यहाँ मध्यवर्गीय आत्मालोचना का स्वर नवें दशक की कविता में अधिक विडम्बनाओं एवं व्यंग्य के साथ उभरता है.

उदारीकरण ने हमारे समाज के मूल ढांचे को बदलना शुरू किया. नब्बे के दशक तक इसका प्रभाव बहुत हद तक मध्यवर्ग तक सीमित प्रतीत होता था लेकिन नब्बे के अंतिम वर्षों में इसने समाज के निचली सतह को बुरी तरह तबाह कर दिया था. हाशिये पर जीने वालों की तादाद में अकल्पनीय बढ़ोत्तरी हुयी .क्रूरता का नया दौर शुरू हुआ. गुजरात के दंगे सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं थे कि वहां  हिंसा सत्ता वर्ग द्वारा परिचालित थी.  ऐसा तो प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तौर पर हर दंगे में होता ही है. महत्वपूर्ण वह क्रूरता थी, जिसके समक्ष मनुष्यता का ऐतिहासिक रूप से दैनीय चित्र हम देखते हैं. इस क्रूरता का अभ्यास स्थल यही निम्न वर्गीय जीवन था .फूको ने शहरी संस्कृति पर प्रश्न उठाते हुए यह पूछा है कि महानगरों की जो चरम आधुनिकता हैं ,चकाचौंध रौशनी है उसके समानांतर जो एक विशाल कूड़ाघर निर्मित हो रहा है, भिखमंगो, अफीमचियों, नशेड़ियों, वेश्याओं, यतीम बच्चो एड्स और यौन संक्रमण के बीमार मरीजों, परिवार द्वारा छोड़ दिए गए बूढों, कोढियों आदि का उसे हम किस वर्ग में रखेंगे.

70 के दशक में यह यूरोप और अमेरिका को ध्यान में रखकर कही गयी बात थी लेकिन 2000 के गिर्द यह प्रश्न हमारे समय समाज क लिए भी महत्वपूर्ण हो उठा. दिल्ली मुंबई कलकत्ता जैसे शहरों ने एक विशाल कूड़ाघर निर्मित कर लिया .अगर हम किसानों की आत्महत्या का प्रश्न भी इसमें जोड़ दें तो यह समझना कठिन न होगा कि यह प्रश्न शहर या गाँव से सम्बन्धित नहीं है , बल्कि इसने शहर और गाँव की बीसवीं सदी तक मौजूद परिकल्पना को बदल दिया. जिन आर्थिक राजनीतिक सामाजिक सम्बन्धों नें बीसवीं सदी में शहर और गाँव को परिभषित किया था अब बहुत हद तक वे सम्बन्ध बदल रहे थे. इस बदलाव के मूल में मनुष्य और मनुष्य के बीच हो रहे आदिम संबंधो के परिवर्तित होने की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी क्योंकि ऐसी क्रूरता इससे पहले हमारे समाज में मौजूद नहीं थी.

रात पाली की कविताओं को देखे तो उसमे बेहद संवेदनशीलता के साथ इन परिवर्तनों  की पड़ताल की गयी है.

फिर कोई लिखता है कविता
यह कविता
पुलिस थाने में इंसाफ की दुहाई नहीं
न इसमें दिनचर्या न धधकती आग
और न पोटलियों में बंधे विवरण
और न इस्तीफा है
xx xx xx xx xx xx
तो क्या ये तामम कवितायेँ
चाबियाँ हैं किन्हीं ओझल दरवाजों की
जो समय के बाहर खुलते हैं ?

आत्मा के किन घावों का निशान लिए
इंसानों की परछाइयां बैठी हुयी है भाषा में


यह कविता एक वक्तव्य भी है कि फिर कविता यानी आठवें दशक के बाद की कविता क्यों. यहाँ यह देखना महत्वपूर्ण है कि विजय कुमार की कविताओं में अपनी पिछली कविताओं की तुलना में एक नये मिजाज और नये बोध की कविता रात पली में नज़र आती है. इन कविताओं में डिटेल्स की भरमार है लेकिन ये कवितायेँ किसी पुरानी काव्य परिपाटी से निकलकर नहीं आती. ये शहर को देखने की हमारी अनुकूलित दृष्टि पर चोट करती हैं. रातपाली का संदर्भ यह भी है कि भागदौर और गति के चरम से निर्मित महानगर की रातें कैसी होती हैं. यानि गति और परिदृश्य ये दो तत्व हैं जो इन कविताओं में मूल बिंदु बनते हैं. रात के वक्त जो शहर का विशिष्ट परिदृश्य है. वह हमारे सामान्य बोध में दाखिल होता है. यहाँ  एक रूपांतरित होते मनुष्य की समय गाथा दर्ज होती है. लेकिन यहाँ मनुष्य संज्ञावाचक नहीं है मसलन यहाँ व्यक्तियों के नाम नहीं हैं. यहाँ इसलिए मनुष्य का संदर्भ एक समुदाय एक समाज एक परिदृश्य रचता है.


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अच्युतानंद मिश्र
27 फरवरी 1981 (बोकारो)
महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं में कवितायेँ एवं आलोचनात्मक गद्य प्रकाशित.
आंख में तिनका (कविता संग्रह२०१३)
नक्सलबाड़ी आंदोलन और हिंदी कविता (आलोचना)
देवता का बाण  (चिनुआ अचेबेARROW OF GOD) हार्पर कॉलिंस से प्रकाशित./ प्रेमचंद :समाज संस्कृति और राजनीति (संपादन)
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