मति का धीर : अवधनारायण मुदगल

Posted by arun dev on सितंबर 03, 2015










अवधनारायण मुदगल केवल सारिका के संपादक ही नहीं, एक उम्दा लेखक और बेहतरीन इंसान भी थे. खट्टे-मीठे अनुभवों को समेटे राजकुमार गौतम का स्मृति-लेख.


की गल है? .... मुदगल है!                                             

राजकुमार गौतम 





ल (17 जून, 2015) श्रीमती चित्रा मुदगल को फोन किया. अवधनारायण मुदगल को `दादा` और चित्राजी को भाभी सम्बोधित करते आए हैं हम. पिछले दिनों दादा का निधन हो गया. तब मैं सिंगापुर में था. फेसबुक पर खबरें आयीं. कुछ लोगों ने तुरत-फुरत में स्वयं की आत्मीयता को उनके साथ मिलाकर स्मरण किया. मुझे अफ़सोस रहा कि दादा के अंतिम दर्शन न हुए, और अन्यान्य उपस्थितियों में भी मौजूद नहीं रहा. इस अफ़सोस का ज़िक्र चित्राजी से किया. देखिये, मौक़ा लगा तो एक बार उनके घर जाऊंगा भी.

अवधनारायण मुदगल धीरे-धीरे समझ में आनेवाले व्यक्तित्व थे. संभवतः अक्टूबर, 1977 में मैं अपने एक मित्र के साथ मुंबई (तब की बंबई) गया था. आकर्षण का केंद्र मात्र `सारिका` का कार्यालय था जहां कुछ ही समय पहले रमेश बतरा और सुरेश उनियाल सम्पादकीय विभाग में नियुक्त होकर गए थे. अवधजी का नाम सम्पादकीय टीम में छपता था और यदा-कदा उनके द्वारा लिखी गयी सामग्री भी. सुदर्शन थे अवधजी. औसत से लम्बा कद, गौरवर्ण और उन दिनों, फ्रेंचकट दाढ़ी भी. `सारिका` में जाकर देखा तो रमेश और सुरेश को उनसे एकदम दोस्ती की मुद्रा में पाया. नहीं, पहले दिन यह सब मैं इसलिए नहीं देख पाया था कि अवधजी उस दिन दफ्तर नहीं आये थे. ऑफिस के बाद हम लोग उनके फ्लैट पर पहुंचे तो वहां ताला लगा पाया. टेलीफोन संपर्कों का तो वह समय था ही नहीं. रमेश बतरा ने एक पर्ची पर लिखा--`की गल है?`और उस पर्ची को ताले में अटका दिया. अगली दोपहर जब हम `सारिका` कार्यालय पहुंचे थे तो वही पर्ची सुरेश-रमेश की मेज़ पर आ-जा रही थी, जिसमे `की गल है?` के नीचे तुक जोड़ते हुए अवधजी ने लिखा था-- `मुदगल है!` सुरेश तब भी दाढ़ी रखते थे. सोचिये कि क्या दृश्य रहा होगा कि एक तरफ फोन पर सुरेश ठहाका लगाते और दो मेज़ पार, फोन पर ही अवध का प्रत्युत्तर भी ठहाका ही होता. क्या मस्ती और उन्माद था, मामू!

दिल्ली लायी जाकर `सारिका` कन्हैयालाल नंदनजी के हवाले हो गयी. 10, दरियागंज , नई दिल्ली में वह एक उपेक्षित-सा कोना था, जहां पहले-पहल यह स्टाफ बैठा करता था. आनंद प्रताप सिंह दुसरे नंबर पर थे. बाद में अवधजी नंबर दो बने. कुछ दिनों बाद जब बलराम ने `सारिका` में ज्वाइन किया तो मेरा ऑफिस में जाना-आना पर्याप्त हो गया. जगदीश चंद्रिकेश के एक कमरे के फ्लैट में मुदगल जी अन्य मित्रों के साथ रहते थे. चित्राजी का प्रथम कहानी -संग्रह `ज़हर ठहरा हुआ` पर चंद्रिकेशजी की संस्था `समग्र` द्वारा कनॉट प्लेस के राजस्थान सूचना केंद्र में विचार-गोष्ठी हुई, जिसमें पुस्तक पर आधारित एक आलेख मैंने भी पढ़ा था.

बाद के दिनों में आमने-सामने का निकट संपर्क `दादा` से तब बना जब वह स्वतंत्र रूप से सारिका के संपादक नियुक्त हुए. पुस्तक-समीक्षा आदि का जो भी प्रस्ताव मैं उनके पास लेकर जाता, वह तुरंत मंजूर कर लेते. कन्हैयालाल नंदन, हिमांशु जोशी और लक्ष्मीध मालवीय के साथ किये गए साक्षात्कारों का प्रकाशन, श्रीकान्त वर्मा के उपन्यास (शायद `साथ`) के सार- संक्षेप का प्रकाशन, अमृतलाल नागर साहित्य की सात संकलित एवं एक साथ प्रकाशित पुस्तकों पर एकाग्र समीक्षात्मक लेख आदि उनके कार्यकाल में किये गए मेरे उल्लेखनीय कार्य हैं. इसके अलावा बहुत-सा छिटपुट काम भी हम `सारिका` के लिए करते थे.

एक काम था- -बॉक्स मैटर तैयार करना. लेखकों के संस्मरणों और आत्मकथाओं-जीवनियों आदि से ऐसे अंश उठाना जो प्रायः व्यक्तित्व के वैपरीत्य को दर्शाते अथवा मार्मिक और रोचक होते और स्वतंत्र अर्थाशय के भी. तो वैसी सामग्री मैं जुटाता. यह सिलसिला नंदनजी के जमाने से  जारी था और दादा ने भी इसे न नहीं कहा था. एक दिन मैं उनके चैंबर मेँ वैसा ही मैटर दिखाने गया तो वह हाथ-के-हाथ पढ़ने ही बैठ गए. एक किसी बॉक्स-मैटर को पढ़कर उनकी हंसी छूटी तो थमे ही नहीं. किलकारी को दबाने के भरसक प्रयास में उस हंसी ने उनकी आँखों में आंसू ला दिए. वह बॉक्स-मैटर प्रेमचंद सम्बन्धी संस्मरण का था. कोई सज्जन प्रेमचंद से उलझ रहे थे कि एक जाहिल सड़क किनारे पेशाब करने लगे तो उससे कैसे निपटा जाए. प्रेमचंद ने कहा कि उसे समझाकर वहां से हटा देना चाहिए. यदि वह फिर भी नहीं माने तो? पूछा गया. तो फिर से उसे हटाना चाहिए; प्रेमचंद का जवाब था. सवाल फिर से आया कि यदि फिर भी वह करता ही जाए तो...? इस पर प्रेमचंद ने कहा कि अमां यार, उसने कोई मशक थोड़े ही बाँध रखी है कि करता ही जायेगा!... दादा उन दिनों सफारी सूट पहनते थे प्रायः जी भरकर हँसते थे. यूं मैंने उन्हें नाराज और क्रोधित होते भी देखा है और `दिस इज़ नॉट फिश मार्किट!` कहते हुए स्टाफ को खामोश करते हुए भी.

माननीय लक्ष्मीधर मालवीय का साक्षात्कार और उनकी नई कहानी `सारिका` में छपी थी. मालवीयजी दिल्ली में ही थे उन दिनों. मुझे लगा कि यदि उन रचनाओं का पारिश्रमिक उन्हें मिल जाए तो अच्छा रहे. सामान्यतः पेमेंट आने में दो-तीन माह का समय लगता था. मेरा कहना था कि मुदगलजी इस काम में जुट गए. लेखा विभाग को पत्र भेजा गया और फोन से भी पीछा किया गया. यह भुगतान टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की नई बिल्डिंग -- बहादुरशाह ज़फ़र मार्ग से होना था. उन्होंने चैन न लिया जब तक कि हम दोनों को नकद भुगतान करवा न दिया. दादा के सम्पादनकाल के दौरान ही `सारिका` ने भारतीय ज्ञानपीठ के साथ मिलकर, अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष के अवसर पर वरिष्ठ और युवा कथाकारों का एक संवाद कराया था. अमृतलाल नागर, इस्मत चुगताई और भी कई वरिष्ठ तथा प्रियंवद, संजीव आदि के साथ मुझे भी चुना गया था इस संवाद में भागीदारी के लिए. काफी सार्थक और सफल आयोजन रहा था. आयोजन पश्चात दादा हम सभी के साथ अशोक यात्री निवास (आज का रमादा होटल) के रूम में थे. एक भागीदार ने पूछा था कि होटल में कब तक रुका जा सकता है. दादा का जवाब था, कल दोपहर तक. `उसके बाद?` भागीदार शायद ज्यादा समय रुकना चाहते थे. `मेरा घर.` दादा का कहना था. यह उनका बड़प्पन नहीं, स्वभाव था.

ह्रदय की बाई-पास सर्जरी. गोविन्द मिश्र दिल्ली आए हुए थे. मैं उनके साथ था. पता लगा कि दादा आज ही हॉस्पिटल से लौटनेवाले हैं. समय था इसलिए हम मयूर विहार के लिए निकले. संयोग यह कि उनकी और हमारी कारें एक साथ पहुंची. घर में हम सब इकठ्ठा ही घुसे. बिटिया ने अगरबत्ती सुलगी अर्चना की थाली से स्वागत किया अवधजी का. बिस्तर पर लेटते-न-लेटते उन्होंने सुरेश उनियाल से `सारिका` के नये अंक के प्रकाशन की जानकारी प्राप्त करना शुरू कर दी. गोविंदजी से पूछा, `कोई अच्छी कहानी लिखी ?` `अभी तक?` गोविंदजी ने चुहल की. बोझिल और बीमार वातावरण क्षण भर में सूखे पत्ते की तरह हल्का हो गया.

 `सारिका` उनके कार्यकाल में जीवन-मरण के प्रश्नों और नियति से गुजरी. प्रसार-संख्या बढ़ाने के दबाव में उन्होंने विवादास्पद कुछेक अंक भी निकले, मगर `सारिका` की जान जाने से बच न सकी! उसके बाद कंपनी के साथ कानूनी आदि की प्रक्रिया में दादा उलझे रहे मगर सकारात्मक चीजें हाथ न आईं. `छाया मयूर` के प्रकाशन का सिलसिला हुआ मगर एक अंक के बाद वह योजना भी सिधार गई. फिर बीमारी ने ऐसा थामा दादा को कि साथ ही लेकर गयी. हालांकि 79 वर्ष (1936--2015) की आयु को अल्प तो नहीँ तो कहा जा सकता मगर फिर भी उनकी स्मृति सुरक्षित थी और पठन-पाठन की जिज्ञासा भी. शिमला, अलवर, हापुड़ आदि के कई कथा- आयोजनों में उनके साथ भरपूर समय गुजारा है. मुझे वह हमेशा अभिभावक और वरिष्ठ मित्र की एकमेक छवि में दिखते रहे. उनकी समग्र रचनाएं महेश दर्पण ने एकत्र कीं और किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित की हैं.

इस संकलन (दो खण्ड) पर रशियन सेंटर, दिल्ली में गोष्ठी होनी थी और चित्रा भाभी ने फोन पर मुझे कहा कि अवध चाहते हैं कि गोष्ठी का संचालन मैं करूं. संगोष्ठी कार्यदिवस में थी और मुझे ठीक-ठीक पता नहीं था कि मैं दफ़्तर से छूट पाऊंगा या नहीं! किताबों को एक बार देख लेने का समय भी शेष नहीँ था. मैंने भाभी को विवशता बताई. हालाँकि यह अलग बात है कि मैं उस आयोजन में जा सका. आज भी मुझे अफ़सोस है, दादा ने मेरी इतनी बातें मानी और मैं उस बार उनकी बात का मान नहीं रख पाया! चित्राजी को उनके उपन्यास `आंवा` पर व्यास सम्मान मिला तो उत्सव स्थल पर मुदगल जी परिवार के साथ चाय-नाश्ता ले रहे थे. मैंने पूछा, `दादा, आपको कोई पुरस्कार नहीं, और भाभी को यह सम्मान. कैसा लग रहा है?` `मुझे बहुत अच्छा लग रहा है.` दादा के उत्तर में गहनता, गंभीरता थी.

कल ऐसी ही बातें चित्रा भाभी के साथ होतीं रही फोन पर. शारीरिक सीमाओं के चलते, वर्षों से उनकी सेवा में रत भाभी किस कदर `खाली` हो गयी होंगी, इसका अंदाज़ा कोई भी लगा सकता है. जीवन के लगभग पांच दशक जिंदगी जीने और लेखक, साहित्यकार होने की जद्दोजहद में कैसे बीतते हैं, कोई इस युगल से पूछे. सीमाओं, दुर्बलताओं या अक्षमताओं से तो मानव जीवन में भला कौन बच सका है मगर मूर्धन्य और महान होने की वंचनाओं को झेलना भी क्या कोई आसान काम है? ताउम्र जिंदगी लोरी गाकर सुलाती रहे, ऐसा सौभाग्य तो भला किसे मिलता है, मगर एक सच्चा और खरा व्यक्तित्व जब वरेण्य होते-होते रह जाता है तो दुःख होना स्वाभाविक है.

दादा के पास वाग्जाल की वह सामर्थ्य न थी, जो आज चाहिए होती है. इसीलिए उनसे संबंधित व्यापक वृत्तांत शीघ्र ही अनुपलब्ध हो जानेवाले हैं. कुछ नामों या कार्यों की धूम , गौण हो जाया करती है-- वैसा ही इस मामले में हुआ है, होगा. पिछले दिनों अवधजी की मृत्योपरांत जो भी स्मिृतिलेख पढ़े, अधिकांश शोशा ही लगे. मृतक के बहाने अपने व्यक्तित्व की देखरेख और साहित्य में आश्रय तथा आश्रम पानेवालों की दौड़ रहा करती है. अभी भी वैसा ही हुआ है. अपने पचासों वर्ष के सहवास पर चित्राजी यदि यथार्थ रूप में लिख पावें तो बेहतर हो. यह उनके अपने लेखन का भी चरमफल हो सकता है. आखिरकार, साहित्यकार भी एक लोकसेवक ही होता है. समाज के लिए सतत सविनय अवज्ञा करनेवाला एक प्राणी. रचना के हुनर के साथ जीवन के हेलमेल के क्या समीकरण हैं, या हो सकते हैं-- इस पर अवधनारायण मुदगल के जीवन के बहाने बातें की जा सकती हैं. संपादक एक सम्बोधन मात्र है या कि पूरे साहित्य जगत का होनहार नक्शा, आइए अगले दिनों में मुदगलजी के बहाने इस बिंदु पर चर्चा करें.

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राजकुमार गौतम
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