विष्णु खरे : यह बाहु कुबेर, इंद्रजाल और कैमरे के बली हैं

Posted by arun dev on जुलाई 19, 2015












एस॰एस॰ राजामौली के निर्देशन में तेलगु भाषा में बनी 'बाहुबली' फिल्म को देश की अब तक की सबसे महंगी फिल्म बताया जा रहा है जिसमें दो भाइयों के बीच साम्राज्य पर शासन के लिए युद्ध की गाथा दिखायी गयी है. इसे हिन्दी, मलयाली, अंग्रेजी और फ्रेंच में डब किया गया है. अपार धन और तकनीक के इस्तेमाल के बावजूद क्या यह फ़िल्म वास्तव में ‘एपिक’ है ?

प्रख्यात आलोचक-कवि  विष्णु खरे का आलेख. 


यह बाहु कुबेर, इंद्रजाल और कैमरे के बली हैं             
विष्णु खरे 


र्वे गुणाः कांचनं आश्रयन्ते. अम्बानी की अट्टालिका कितनी भी भद्दी और हास्यास्पद क्यों न हो, उसकी तुलना ताजमहल से की जाएगी. अमीर ज़ादे-ज़ादियाँ भले ही बदशक्ल और कौआ-कंठ हों,उन्हें थर्ड पेज पर कामदेव और लता दीदी का अवतार सिद्ध किया जाएगा, फिल्मों में चांस मिलेगा. पैसे देकर कविता-गल्प,प्रकाशक,पत्रिकाएँ और आलोचक खरीदे जाएँगे. प्रोफ़ेसर,गाइड,एक्सपर्ट के बाज़ार-भाव चुकाओ, हिंदी में फ़स्क्लास एम.ए.पीएच.डी हो जाओ. किसी फिल्म में कुछ सौ करोड़ लगाओ, पहले तो सबकी घिग्घी बंद कर दो, फिर उनसे मुसाहिबी और गुलामी करवा लो. चर्चाधीन दिवंगत कवि मलयज के शब्दों को कुछ बदलें तो ‘’सब गिड़गिड़ा कर ताली बजा देते हैं’’.

राजमौलि की फिल्म मूलतः धनबली है यद्यपि हम हर शुक्रवार को देखते हैं कि कितने ही धनपिशाचों की फ़िल्में फ्लॉप होती हैं. दक्षिण भारतीय सिने-दर्शक तो अपने आराध्यों को लेकर आत्महत्या तक कर लेते हैं लेकिन ’बाहुबली’ जैसी दक्षिणी-तेलुगु फिल्म ने शायद ए.वी.एम. की ‘चंद्रलेखा’ के बाद पहली बार आंध्र के उत्तर में इतनी उत्कंठा, दीवानगी, रोब, आतंक और भयादोहन पैदा किए होंगे. आज माहौल ऐसा कर दिया गया है कि जिस तरह वर्तमान असली बाहुबलियों के बारे में कुछ-भी बोलना जोखिम-भरा है, वैसे ही इस सिनेमाई बाहुबली को लेकर है. इधर कुछ घटनाएँ भी ऐसी हुई हैं कि फिल्म-समीक्षक अपनी बात कहने से डरने लगे हैं हालांकि यह सच है कि कुछ अलग और बहादुर दिखने के लिए ज़बरदस्ती किसी भी चीज़ या व्यक्ति की निंदा भी नहीं करना चाहिए.

‘बाहुबली’ में ‘रामायण’, ’महाभारत’, ’भागवत’, ’प्राचीन बाइबिल’, यूनानी पुराकथाओं, ’टार्ज़न’, ’दि टैन कमान्डमैंट्स’, अंग्रेज़ी ’अवतार’ और अनेक ऐसी मिथकों और नई-पुरानी फिल्मों की प्रेरणाएँ सक्रिय हैं. जिस तरह पश्चिमी पॉप-संगीत में कई गानों से एक-एक पंक्ति लेकर medley नामक  चीज़ बनाई जाती है, ’बाहुबली’ भी एक पंचमेल नेत्रसुख बिरयानी है. यह सिर्फ देखने के लिए बनाई गई है. जिस तरह लोक कथा में मगर की पीठ पर बैठा संकटग्रस्त बन्दर कहता है कि वह अपना कलेजा घर में ही भूल आया है, वैसे ही इस फिल्म को देखते हुए आपको बार-बार कहते रहना पड़ता है कि हाँ, राजमौलि गारु, हम आपकी इस इतनी महँगी फिल्म के लिए अपना दिमाग़ डेरे पर ही छोड़ कर आए हैं.

जैसा कि आजकल अधिकांश ऐसी देसी-फ़िरंगी फिल्मों के साथ है, दस-बीस मिनट के बाद, जब यह साफ़ हो जाता है कि हीरो, उसके सहयोगी और मुरीद और उसकी माशूकाएं कौन हैं, और खलनायकों के पक्ष के भी, तो यह बिलकुल ज़रूरी नहीं रह जाता कि आप कहानी के ब्यौरों और विकास को याद रखने की ज़हमत उठाएँ. फिल्म को सिर्फ दो खेमों में बँटना चाहिए. ज़हन में सिर्फ यह रखें कि नामुमकिन-से-नामुमकिन चीज़ हो सकती है और आपको ढाई घंटे तक उन्हें ध्रुव-सत्य मानना है. कोई भी सवाल उठाया तो समझिए कि आप गए. जैसा सलमान खान की कला के साथ है, यहाँ भी आपको बालिश – मेंटली रिटार्डेड – होना होता है. (लेकिन यह न भूलें कि हाल में सलमान खान ने देश और सिने-जगत के अनेक प्रबुद्ध व्यक्तियों का साथ देते हुए पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट में सर्वोच्च पद पर एक नितांत अयोग्य और संदिग्ध हिन्दुत्ववादी अभिनेता की नियुक्ति की सही निंदा की है और मुझे हर्षित, चकित और क़ायल किया है.)

बहरहाल, ‘बाहुबली’ को लेकर  आप यह नहीं पूछ सकते कि यह किस युग की कहानी है जिसमें इक्का-दुक्का रथ हैं, उम्दा से उम्दा तलवारें, भाले, बरछे हैं, वास्तु-कला चार्ल्स कोरिआ, लचिंस (जिसे कुछ जाहिल ‘लुटियंस’ लिखते हैं) और ल कार्बूज़िए से अधिक विकसित है, ढलवाँ सोने की पचास फ़ुट ऊँची मूर्तियाँ बनती हैं, निहत्था साँड-युद्ध है, दो-तीन हाथियों को लोहे के पग-कवच पहनाए जाते हैं, घोड़ों का अकाल है, नावों का नाम नहीं है, पक्षी और जलपाखी नहीं है, नगरों में आम जनता नहीं दीखती, एक रानी है जो मुर्गों के लायक एक दड़बे में अहर्निश क़ैद है, निआग्रा से ऊँचे जलप्रपात के पास खड़े पात्र बूँदों और फुहारों से भीगते नहीं, पत्थर के गोलों से बंधी छोलदारी को फेक कर दुश्मन की फ़ौज को जलाया जाता है, गोलन हाइट्स से अरबी हथियार-व्यापारी एक तलवार बेचने आते हैं, हिन्दू देवी-देवताओं के नाम पर केवल शिव-लिंग और चंडी-काली की पूजा होती है, और नायक का दुस्साहस इतना है कि वह अपनी एवज़ी माँ की सुविधा के लिए उस करीब एक टन वज़न के इकलौते  शिव-लिंग को उखाड़ कर कहीं और स्थापित कर देता है. फिल्म की पार्श्वभूमि में शुद्ध संस्कृत श्लोकों और मूल शिव- तथा दुर्गा-स्तोत्रों का वाचन-गायन भी है.

जिस तरह ‘भाँग की पकौड़ी’ सरीखी  पोर्नोग्राफ़िक नंगी पुस्तकों में होता है कि हर उपलब्ध छिद्र एवं शिश्नाकार  से हर व्यक्ति हर तरह का अजाचारी सम्भोग करता है वैसे ही ऐसी फिल्मों की एक अलग पोर्नोग्राफी होती है – इनमें कभी-भी, किसी के भी साथ कुछ भी संभव-असंभव घट सकता है. इस पट-पोर्नोग्राफी को मदालसा स्त्रियों के मादक, अध उघरे सुख देत शरीर, ऐद्रिक फ़ोटोग्राफ़ी, स्पेशल इफ़ेक्ट्स का इंद्रजाल मिलकर बहुत सुन्दर बना डालते हैं. पोर्नोग्राफी में कोई इमोशन, कोई भावना नहीं होती. उसका लक्ष्य केवल आपके शरीर का यौनोपयोग है. ’’बाहुबली’’ भी आपमें कोई भी मानवीय भावनाएँ नही जगाती. उसका ध्येय और तक़ाज़ा एक ही है – आप उसे ‘’एन्जॉय’’ कर रहें हैं या नहीं. अन्यथा यह एक निरुद्देश्य,self-indulgent फिल्म है.

‘’बाहुबली’’ के उत्तरार्ध में एक लंबा, उलझाऊ फ़्लैशबैक भी है – फिल्म इतिहास का शायद अपने ढंग का पहला, जिसमें एक लम्बे, ऊटपटाँग, ’’सम्पूर्ण’’ युद्ध का अंकन है. उसमें लाखों सैनिक लड़-मर रहे हैं लेकिन पता नहीं कहाँ खड़े हुए राज-परिवार का हर सदस्य सारे ब्यौरे इस तरह देख रहा है जैसे वह संजय है और धृतराष्ट्र सिर्फ़ दर्शक है. राजमौलि को इसमें हर तरह की हिंसा दिखने का औचित्यपूर्ण T20 अवसर मिल सका है. चिअर-गर्ल्स की कमी अखरती है.

इसे लोग ‘महागाथात्मक’, ’महाकाव्यात्मक’ यानी अंग्रेजी में epic फिल्म कह रहे हैं. इंद्रजाल के इस सिने-युग में किसी भी ऐसी महँगी, किन्तु एस.एफ़. लैबोरेटरी में गढ़ी गई फिल्म को आप ‘ईपिक’ फिल्म कह सकते हैं. लेकिन महाकाव्य ‘महाभारत’ में मय दानव ने द्रौपदी के मनोरंजन हेतु दुर्योधन का मखौल उड़ाने के लिए मात्र एक उप-पर्व में आभासी भवन रचा था. मय संसार का पहला काल्पनिक स्पेशल इफेक्ट्स रचयिता और पंडित है. उसकी उस ‘’ऐतिहासिक’’ निर्मिति को भी ‘ईपिक’ नहीं कहा जा सकता. ’’बाहुबली’’ अभी ‘’को वाडिस’’ ’’दि टैन कमान्डमेंट्स’, ’’बिन हूर’’ ‘’दि ईजिप्शियन’’ और ‘’एंटनी एंड क्लेओपेट्रा’’ के स्तर का एपिक नहीं है और ‘’ईवान ह्रोज़्नी’’ से तो  बहुत दूर है.

लेकिन मैं इसकी सख्त सिफारिश करूँगा कि इस फिल्म को एक दफ़ा ज़रूर देखा जाए. एक स्तर तक यह मनोरंजक है. सिनेमा के विद्यार्थी को यह बताती है कि ऐसी फिल्मों के लिए अब इंद्रजाल की तकनीक कितने केन्द्रीय महत्व की हो चुकी है और बंगलूरु,पुणे,चेन्नै तथा हैदराबाद के समसामयिक युवा भारतीय ‘’मय दानव’’ अपने आदिपुरुष से देखते-ही-देखते कितना आगे निकल गए हैं. एम.एम.कीरवाणी के गीत तथा पार्श्वसंगीत बेहतरीन हैं. सेन्तिल है. अवढरदानी शिवजी नायक द्वारा अपने विस्थापित निरादर के बावजूद इससे अरबों का बिज़नेस करवाएँ. यह संसार में झंडे गाड़े. दक्षिणी फिल्मों में एक्टिंग जैसी और जितनी अच्छी होती है, उतनी है, हालाँकि ऐसी फिल्मों में एक्टिंग की पर्वाह कौन करता है और यूँ भी ‘डब्ड’ फिल्मों में अभिनय को अच्छा अभिनय नहीं माना जाता – उसे ऑस्कर नहीं मिलता.

‘’बाहुबली’’ के कुमार की फोटोग्राफी भी विश्व-स्तर की है. पीटर हाइन की मार-धाड़ अच्छी है लेकिन भारतीय नहीं लगती, ’किल बिल’ वगैरह की याद दिलाती एक दृश्य पर मुझे गहरी आपत्ति है, हर भारतीय को होना चाहिए और विदेशियों को तो होगी ही. जब कथित निम्न कुल और वर्ग का बताया गया वफ़ादार बुज़ुर्ग दास-योद्धा कट्टप्पा, जिसे इस फिल्म के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता सत्यराज ने जीवंत कर दिया है, बाहुबली को पहचान कर उसका ’चरण’ अपने सर पर कई क्षणों तक रखे रहता है तो यह मुझे हज़ारों वर्षों के अमानवीय मनुवादी दलित-शोषण,  और आत्म-सम्मानहीन भारतीय बहुमत  द्वारा आक्रामक इस्लाम तथा ईसाइयत के बाद आज तक के देशी शासक वर्ग की सैकड़ों वर्षों की गुलामी, को ‘पावन,विशाल-ह्रदय स्वामिभक्ति’ में बदलने जैसा लगा. राजमौलि को इस शर्मनाक सीन को पहली फ़ुर्सत में निकाल देना चाहिए
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(विष्णु खरे का कालम, नवभारत टाइम्स मुंबई में आज प्रकाशित, संपादक और लेखक के प्रति आभार के साथ.अविकल 
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