सहजि-सहजि गुन रमैं : पुष्पिता अवस्थी

Mother & Child"by B. Lucchesi.Italy


पुष्पिता अवस्थी अपनी तरल संवेदना और सघन अनुभूति के लिए जानी जाती हैं. उनकी प्रेम कविताओं का एक विस्तृत संसार है. ‘नवजात अश्वेत शिशु के जन्म पर’ कविता सीरिज में जहाँ वात्सल्य का एक नया सौन्दर्य – सुख और सांस्कृतिक- राजनीतिक मन्तव्य है वहीँ फुटबाल के मैच पर लिखी उनकी कविता- ‘आयक्स एरीना में’ वह स्पष्ट देख पाती हैं कि ‘खेल अब युद्ध और व्यवसाय में बदल गए हैं’. 

_____________

नवजात अश्वेत शिशु के जन्म पर
(एक)

बायीं बाँह की गोद में
अपने नवजात शिशु को लेकर
खुश है वह नवजात नीग्रो माँ .

अपनी ही देह का जादू
देख रही है - हथेलियों में
अपनी ही देह के
खिले फूल से
खेल रही है वह .

रह-रह कर सूँघती है
अपना ही जाया नवजात शिशु
जैसे वह हो कोई
उसकी देह-धरती का कोई अनोखा पुष्प
जीवित और जीवंत
उसके मृत्यु पर्यन्त
खिला रहेगा
बढ़ता और महकता रहेगा
अपनी माँ को खुश करने के लिए .


(दो)

वह चुप है
और
खुश है
शिशु को वायलिन की तरह
अपने वक्ष से लगाये
नव-जीवन की धड़कनों के संगीत को
सुनने में व्यस्त है
उसकी साँसों की लय को
गुन और बुन रही है
अपने जीवन की लय में

शिशु की मुँदी पलकों को
अपनी प्रसव-पीड़ित थकी नयन-दृष्टि से
खोलने में लीन
अपनी कजरारी आँखों से
नवजात शिशु के चेहरे पर
बुरी नज़र से बचाने वाले काले टीके को
लगाने में आत्मलीन है .

वह सुनती है सिर्फ
नवजात शिशु की धड़कनें
जिसमें जान लेना चाहती है
उसका सर्वस्व .

वह अपने देहांश को
निरख रही है
और परख रही है
उसका तीन घंटे पहले पैदा हुआ शिशु
कितना है उसकी ही तरह
और कितना है अपने गोरे पिता की तरह
क्या आँखों का रंग है नीला और केशों का रंग सुनहला
या उसकी ही तरह हैं काली आँखें और काले केश

जानती है वह
अश्वेत होने का दुःख
विश्व के विकसित और सुसंस्कृत समाज में भी
संभ्रांत होने के बावजूद
दास और कुली होने की परछाईं
घुली रहती है उसके आकर्षण और ईमानदार व्यक्तित्व में
धनाढ्य होने पर भी
उसका पिता भोगता रहा है यूरोप और अमेरिका में
अपने पुरखों के दास और कुली होने का दंश
स्वयं के सरकारी महकमें की सलाहकार होने पर भी
गोरों की नीली आँखों से
झेलती रही है खुद के दुरदुराने का दुःख .


(तीन)

शिशु को
अपने वक्ष से लगाये
याकि स्वयं उसके वक्ष से लगी हुई
वर्षों से बिछुड़ी
दुनिया के मायाजाल में भटकती
शिशु से पहले
बहुत कुछ या कि सब कुछ पाने की
अभिलाषा में
वह दौड़ती रही अब तक
और 'माँ' बनने से रही दूर
थक गई
तब 'माँ' बनी और जाना
बेकार हाँफती रही
तृष्णाओं की दौड़ में .

स्त्री का
वास्तविक हासिल
'माँ' बनना है
उसकी जायी सन्तान
उसे 'माँ' बनाती है
वह 'निज-स्त्रीत्व' में
महसूस करने लगती है
ममत्व की झील
और वात्सल्य का झरना
देखते-देखते
वह स्त्री से प्रकृति में
              बदल जाती है
और समझ पाती है
माँ और मातृभूमि होने का
अलभ्य-सुख .


(चार)

नवजात शिशु को
अपने वक्ष से लगाये
            लीन है नवजात नीग्रो माँ
प्रथम बार
अपने 'माँ' होने के सुख में
एकात्म और तल्लीन है

कभी
खिड़की से घुस आयी
बर्फानी उजली रोशनी में
निहारती है शिशु का ललछौंह गेहुँआ अश्वेत वर्ण
आनंद से चिहुँककर
मूँद लेती है प्रसव से भारी पलकें
और सोचती है
दासता से मुक्ति के अश्वेत-जाति के योद्धाओं का
यही था रंग
स्वतंत्रता की लड़ाई में रत
दक्षिण एशियाई देशों के नेताओं का
यही था रंग
गाँधी और नेल्सन मंडेला
जैसे अहिंसक दूतों का
यही है रंग
अपनी गोरी माँ
और पति के श्वेत वर्ण के बावजूद
जैसे उसने लिया है अपने पिता की तरह गेहुँआ अश्वेत वर्ण
                       धरती की माटी का रंग
                       उसी तरह उसके शिशु ने निभाई है
                       परंपरा गर्भ में ही

वैश्विक कानूनी हक़ों के बावजूद
गोरों की निगाह में हिकारत का दंश आज भी
नित घोलता है स्मृतियों में
दासता की काली स्याही
खेतों में गिरमिटिया और कन्ट्राकी की जगह
भवनों, अस्पतालों, स्टेशनों की सफाई में बतौर मजदूर
जुटे हैं आज भी
वह अफ्रीका हो या दक्षिण एशिया
या फिर कैरेबियाई देश
उनके अधिकारी होने पर भी
उन्हें देखा जाता है मात्र कर्मचारी .

वैज्ञानिक सदी के
सत्ताधारियों की कोशिशों
और अंतर्राष्ट्रीय मानव-अधिकारों के संगठनों के बावजूद
गौरे आज भी बने हुए हैं
                      सर्वश्रेष्ठ
जबकि मछेरों
और लुटेरे योद्धाओं से अधिक
नहीं रहे कभी कुछ
और मानसिकता से
आज भी है वैसे ही भूखे और भुक्कड़ .

शिशु जन्म-काल की कराह और चीखों से
सूज आये अपने करीयाये और पपड़ियाये ओठों से
चूम-चूम शिशु की पलकें
खोल देखती है
शिशु ने, पिता की नीली आँखों के बावजूद
लिया है अपनी माँ की ही आँखों का कजरारा वर्ण
कहीं अपनी नीग्रो माँ की तरह ही
उसकी आँखें भी न हो कजरौटा .

नव शिशु की माँ
हर्षित है कि
उसकी संतान के केशों का रंग है काला
उसके केशों की तरह ही .

पुख्ता होता है विश्वास
उसके गोरे पिता के बावजूद
               संतान की दृष्टि
               और अंतर्दृष्टि भी होगी
               वैसी ही मर्म भेदी
दुनिया के सच को
भाँपने वाली
अपने नाना और माँ की तरह .


(पाँच)

नवजात माँ
हुलसित है कि
शिशु की त्वचा का रंग भी है उसकी तरह
'माँ' और मातृभूमि सरीखा
शोख, दमकता हुआ मटियाला सुनहरा
जो गोरों के बीच दिखता है
अलग से चमकदार

उसके जाये शिशु में है
उसकी पिता पीढ़ी का ही प्रजाति द्योतक वर्ण
अपने खून और रंग से
समझेगा अपनी पीढ़ियों का संघर्ष
वह भी
जारी रखेगा दोयम दर्जे के नागरिक होने के
संघर्ष का शांति-युद्ध

बगैर 'माँ' के कहे-सिखाये
करेगा वही सब कुछ
जो चाहती रही हैं
उसकी माँ की पीढ़ियाँ
वर्षों से
मानसिक आजादी का सुख .

नवजात नीग्रो माँ
अपनी पहली संतान की
'माँ' बनकर खुश है
और
चुप है कि
नवजात शिशु के रूप में
उसने हृदय प्रतीक 'शांति-दूत' को जन्म दिया है
जो विश्व मानव-मन में रोपेगा शांति-बीज
और ख़त्म करेगा
श्वेत और अश्वेत मानव-जाति के बीच का
जानलेवा संघर्ष
जो उच्चपदस्थ होने के बावजूद
अश्वेतवर्णी मनुष्य
जीवन भर ढोता है दासता का इतिहास
                     अमिट काले धब्बे की तरह
वह अपने 'शिशु और सोच' से विहव्ल है कि
अपनी कोख की खदान से
                     खन निकाला है उसने
                     अमूल्य काला हीरा
                     मानव-देह रूप में . 



आयक्स एरीना में

5 मई 2013 से पहले
कभी नहीं, कोच फ्रान्क द बूर ने बजायी होंगी
इतनी सीटियाँ
शायद अपने जीवन में भी नहीं
और लड़कियों के लिए तो कभी नहीं

हालैंड देश के लिए
फ्राई दाख़
स्वतंत्रता दिवस 5 मई

जहाँ लोग
आपस में कह रहे थे
बीयर है स्वतंत्रता
तो कोई कहता संगीत है फ्राई हाइड

लेकिन

आयक्स एरीना में
फुटबॉल खिलाड़ी
5 मई को 5 गोल बनाकर
आयक्स क्लब देश का फुटबॉल चैम्पियन होकर
पाँचों उँगलियों की मुट्ठी तानकर
कोच फ्रान्क द बूर के साथ
'एक' होकर घोषणा कर रहे थे कि
फुटबॉल खेल है फ्राई हाइड
चैम्पियनशिप है फ्राई हाइड
सच्चेमन और सच्चेपन का खेल है फ्राई हाइड
खिला खुश जीवन है फ्राई हाइड
प्रेम है फ्राई हाइड

कोच फ्रान्क द बूर ने
5 मई 2013 को
आयक्स एरीना में
अपने जुड़वाँ भाई रोनाल्ड के नवसिखवे खिलाड़ियों को
वर्ष भर में किया दक्ष
और बना दिया देश का फुटबॉल चैम्पियन खिलाड़ी

जबकि
अपने एरीना घर में ही
ए जेड क्लब के कीपर एस्तबान को
लाल कॉर्ड मिलने पर
आग बबूला हो उठे थे
कोच खेट यान फरबेक
कूद पड़े थे अम्पायर और खिलाड़ियों के बीच
खेल को अपने हाथ में लेकर
खिलाड़ियों को इशारे से करते हैं मैदान बाहर
और अम्पायर से कहते हैं मैच इज ओवर
अट्ठावन मिनट में ख़त्म हो जाता है खेल
फिर भी
अपने खिलाड़ियों का हिम्मत और हौंसला बने हुए
चुप रहते हैं फ्रान्क द बूर

ऐसे ही
आयक्स टीम की
अपने ही एरीना में
दो-दो पैनाल्टी को अम्पायर ने
जानबूझकर नजर अंदाज़ कर दिया था
और बने हुए दो गोल को 
ऑफ साइड करार कर
छीन लिए थे आयक्स क्लब के सारे प्वाइंट

और उधर लिओन ने
बना डाले सात गोल
अम्पायर की पैनाल्टियों की कृपा से
आयक्स टीम 2012 की
यूरोपियन लीग चैम्पियनशिप की प्रतियोगिता से
देखते-देखते बाहर हो गयी थी
चालीस मिनट के भीतर

कहाँ से लाते हैं धैर्य
और कैसे बर्दाश्त करते हैं अन्याय
अपने खिलाड़ी बच्चों के साथ
जिन्हें पाल रहे हैं
रोनाल्ड और फ्रान्क द बूर जुड़वाँ भाई
अपने हुनर का खून पिला कर

मार्को और मारोवाइक ने
विश्व कप की लड़ाई में
ऐसे ही सहा था अन्याय

फुटबॉल खेल के मैदान में
अब सिर्फ बॉल नहीं है खेल के बीच
बल्कि खेल रहे हैं
अम्पायर और उसको खिलाने वाले संगठन
प्रभुत्व, सत्ता और धन का खेल
चाहे, इसके लिए करना पड़े
कोई भी भ्रष्टाचार या कुछ भी

फिर भी
अन्याय सहने के बावजूद
गहरे रात गये
मिलती होगी तसल्ली
यह सोचकर कि
योहान क्रॉउफ की
फुटबॉल खेल परंपरा को
आगे बढ़ा रहे हो तुम
अपने नवयुवा खिलाड़ियों के साथ

इस दुष्ट हुए समय में भी

जबकि
फुटबॉल खेल भी
युद्ध और व्यवसाय में
बदल गया है.  


तुम्हारे बिना

समय - नदी की तरह
बहता है मुझमें.

मैं नहाती हूँ भय की नदी में
जहाँ डसता है अकेलेपन का साँप
कई बार.

मन-माटी को बनाती हूँ पथरीला
तराश कर जिसे तुमने बनाया है मोहक

सुख की तिथियाँ
समाधिस्थ होती हैं
समय की माटी में

अपने मौन के भीतर
जीती हूँ तुम्हारा ईश्वरीय प्रेम
चुप्पी में होता है
तुम्हारा सलीकेदार अपनापन.

अकेले के अँधेरेपन में
तुम्हारा नाम ब्रह्मांड का एक अंग
देह की आकाश-गंगा में तैरकर
आँखें पार उतर जाना चाहती हैं
ठहरे हुए समय से मोक्ष के लिए.
__________________
'शब्द बनकर रहती हैं ऋतुएँ' (कथारूप, 1997), 'अक्षत' (राधाकृष्ण प्रकाशन, 2002), 'ईश्वराशीष' (राधाकृष्ण प्रकाशन, 2005), 'ह्रदय की हथेली' (राधाकृष्ण प्रकाशन, 2008)   'अंतर्ध्वनि' (मेधा बुक्स, 2009) काव्य संग्रह और अंग्रेजी अनुवाद सहित रेमाधव प्रकाशन से 'देववृक्ष' (अंग्रेजी अनुवाद सहित, रेमाधव प्रकाशन,2009).एम्सटर्डम स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ने डिक प्लक्कर और लोडविक ब्रंट द्धारा डच में किये उनकी कविताओं के अनुवाद का एक संग्रह वर्ष 2008 में प्रकाशित किया. नीदरलैंड के अमृत प्रकाशन से डच, अंग्रेजी और हिंदी में वर्ष 2010 में 'शैल प्रतिमाओं से' शीर्षक काव्य संग्रह प्रकाशित,पुष्पिता को अपनी कविताओं के पाठ के लिए जापान, मॉरिशस, अमेरिका, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, न्युजीलैंड सहित कई यूरोपियन और कैरिबियन देशों में आमंत्रित किया जा चुका है

Professor (Dr.) Pushpita Awasthi
Director - Hindi Universe Foundation
Winterkoning 28/1722 CB Zuid Scharwoude/NETHERLANDS
            0031 72 540 2005  / 0031 6 30 41 0778 

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  1. बहुत ही सुन्दर कवितायें, संबंधों की शाश्वत आराधना होती रहेगी मानवता की छाँव में।

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  2. अच्‍छी कविताऍं। पुष्पिता ने अपनी कविता का आयतन और अंत:करण विदेश में रह कर सुविस्तृत किया है। उनका एक नया कविता संग्रह तुम हो मुझमें अभी हाल ही राधाकृष्‍ण प्रकाशन से आया है। एक और संग्रह जो अपनी प्रकृति में वैश्‍विक और विश्‍व मानवता की दृष्‍टि से समावेशी है, शीघ्र ही किताबघर प्रकाशन से छप रहा है । शीर्षक है: ''शब्‍दों में रहती है वह''। इसका ब्‍लर्ब विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी ने लिखा है।

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  3. बेहद उम्दा कवितायें भावों को समग्रता से उँडेलती

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  4. पुष्पिता जी की अदभुत कविताये लिखी है .शिशु को वायलिन की तरह बक्ष से लगाये तथा खेल अब युद्ध और ब्यवसाय में बदल चुका है.ये लाजबाब अभिब्यतियां है.उन्होनें निरंतर विकास किया है.उनके कविता की किताब मेरे मित्र स्व. अनिल श्रीवास्तव ने प्राकाशित की थी .अनिल के यहां उनकी कविताये पढ कर लगा था कि वे आगे जाने वाली कवियित्री है .बात उन दिनो की है जब मैं मऊ जनपद में पदस्थापित था.मेरा बनारस आना जाना था .सारनाथ और अस्सी घाट न जाउं तो लगता था कि मैं बनारस गया ही नही.और फिर ग्यानेंद्र पति से न मिलूं.यह कहां सम्भव था .एक दिन किसी काम से बनारस रूकना हुआ.रात के 10 बजे थे.मैनें ग्यान जी को फोन किया .फोन पुषिता जी ने उठायाऔर कहा ज्यान अभी घर नही लौटे है.मैं उदास हो गया..फिर उन्होने कहा आप आ जाइये यह कवि का घर है.फिर हमारी बतकही बहुत देर तक चली.पुष्पिता जी में गजब आत्मीयता है.उनका लिखा हुआ कुछ भी पढता हूं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है.मेरी शुभकामनायें है वे दुनियां के किसी इलाके में रहे रचनारत और सुखी रहे.मुझे तो अरूण जी को भी बधाई देनी चाहिये जिन्होने पुष्पिता जी के महत्व को पहचाना ..

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  5. रंग भी किस तरह अलगाव का खेल खेलते रहे हैं कि कोई रंग दूसरे रंग की सार्वभौमिकता छीन लेगा
    कि कोई रंग अपनी दैविक सत्ता से आज भी किसी रंग को धमका रहा है
    इन दो रंगों के बीच बड़ी सजगता से पुष्पिता जी ने नवजात अश्वेत शिशु के 'जन्म' को पहचान दी है।
    अरुण आपने मदर एंड चाइल्ड की श्वेत -श्याम तस्वीर लगाई है वह भी अपने में कविता है।
    आप दोनों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

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