सहजि सहजि गुन रमैं : अनिरुद्ध उमट


Death-and-Life-gustav-klimt

अनिरुद्ध उमट की कुछ कविताएँ



(ये कविताए उन मित्रो के लिये जिन्हे मैने बहुत दुख दिया...जो अब मुझे सोने नही देते)




१. वह कोई चट्टान नही

वह कोई चट्टान नही
जमीन से हवा मे
लटकती

अपने चेहरे से
छिटकी

जीभ है शायद

उसकी सीली अँधेरी
छाया मे
अंतिम यात्रा के
उकेरे चित्र
मृतक ने

या उस दुनिया के

वह कोई चट्टान नही
हथेली है किसी की
करती छाया

सोया है
थक अभी
चित्रकार

छाती लगा इसे
सपने मे वह
रोयेगा
दहाड मार.


२.धब्बा

दूर तक जाओ तो
सभी घाव
रेत से घर बदलते

बहुत पास देखे तो

अपना आईना
चेहरा से
धब्बे मे बदल
होता चकनाचूर्.


३.क़ितना-कितना

मेरी देह पर कितने शाप
कितने अधूरे स्वप्नो लकी थिगलियाँ
कितने रूदन
कितने मरण की छाया

मुझे ईश्वर चाहता बहुत
उस पर की हर काली छाया
मुझमे जगह पाती
इसीलिये मेरी प्रार्थना मे देहराग
इसीलिये मौन मे मेरे
मृत मुसकान

ईश्वर के चेहरे पर की आभा
मेरी चाकरी का हुनर.




४.

दरवाजे से गुजरता
आदमी
गुजर गया

छाया मगर
दहलीज पर
मृत देह सी
जमी रही

रात आहिस्ता से
दरवाजा
छाया हो गया

दोनो आलिंगनबद्ध
सुबकने लगे
मुस्कुराते

काँपता रहा
चले गये का सूना धब्बा.






५..
आँगन मे बैठा आदमी
लेटा हुआ आँगन हो गया

उसकी नीद मे मृत्यु
बस गयी निर्वसना

मै आया
उसकी बगल मे लेट गया
नही बदली
करवट किसी ने
रात भर

सुबह लेटा आदमी उठा
और राख हो गया
उस राख मे मै
ठँडे अँगारे सा
धधकता-काँपता रहा.





.
लोटा डाला
जिसमें मटकी मे तुमने
प्यास ठीक वहाँ
जल नही

भार से जिसके
लोटा और मटकी
पृथ्वी पर
संतुलन खोने लगे.

दूर सूखे पेड पर से
एक कौव्वा आया
चौंच डालने लगा मटकी मे

पुकारा हो जैसे किसी ने
वह आकाश छोड
भीतर उतर गया.






७.
मेरी छाया
विलाप मे अपने
अदृश्य इतनी

जैसे देह मे मृत्यु

रात टपकता आँसू
लाल आँख से

हड्डियो के ढेर से कामना उठती
और गरदन नीची किये
फिरकी सी
घूमने लगती

तब पृथ्वी थम जाती.






.
कागज पर किसी की हथेली
जिस पर गिलहरी की भागती
साँसो का कारवाँ

लिखने से हर बार छूट छूट जाता
लिखा जाना था जो
अनिवार्यत:

किसी रात कागज पर हथेली नही
पाया जाता चाँद
ढूँढूता लुप्त होती इबारत.





९.
शफ्फाफ नीली आकाश मे
धँसा दिया
चेहरा

उधर भी था चेहरा एक
अन्तहीन प्रतीक्षा मे
उसने भी
देखा होगा तभी कोई
ऐसा ही आकाश

अब दोनो चेहरे
डूबते
धँसते
फफकने लगे.

१०.किस्से

एक औरत के मरने पर
रो रही
बाकी रह गई औरते

इस रोने से ऊबी उनकी बेटियाँ
हँस रही रंगीन किस्सो के
दुखांत पर

किस्से इतने पसर गये
उनमे न मृत्यु न दुख
बैठ
कर पा रहे थे
हिसाब किताब एक दूसरे से.




११.
रक्त कणो मे
आवाज वह
सन्ध्या के नीलेपन सी घुली.

बहुत तप्त...उफनती

आवाज मे मेरी
फूट रहा
नीला लहराता

सफेद पक्षियो की उडान मे
वह गान बन
सूक्ष्म होता
अक्षुण्ण हो गया

कोई छल था
ईश्वर को जो
उकसा रहा था धरती पर आने को




१२..
औचक पकडा गया

हवा मे
छूटे पँख सा
गूँगे कँठ मे
पुकार सा
धडकनो के टूटे
तार सा-

मेरी कैद रिहाई मे
घोल दी गयी

काल कोठरी मे
उजास सा
धकियाया गया
जहाँ घट्टी के पाट
गले मे ताबीज बन
बुदबुदाने लगे

मेरी सेहत मे एक कीडा

डरा रहा था

बर्फ बन

लापता हो रहा था
एक दोस्त बाहर मुलाकात के लिये.
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अनिरुद्ध उमट की कुछ कविताएँ यहाँ भी पढ़ी जा सकती हैं.

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  1. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज (सोमवार, १० जून, २०१३) के ब्लॉग बुलेटिन - दूरदर्शी पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

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  2. बहुत सुन्दर.बहुत बढ़िया लिखा है .शुभकामनायें आपको .

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  3. Manisha Kulshreshtha12/6/13, 7:25 am

    अनिरुद्ध कमाल के कवि। कलात्मकता में फड़फड़ाता जीवन कपोत और मृत्यु यहां उत्सव होती है!

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  4. Prem Chand Gandhi12/6/13, 7:26 am

    दुर्गम कवि हैं उमट...

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  5. अनाम12/6/13, 9:13 am

    Bahut badiya ! Anirudh Badhayiyan !

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  6. मृत्यु और अवसाद की गहन कविताएँ . मृत्यु जब कला के साथ खड़ी हो जाए तो उसके रास्ते जिजीविषा की तरफ हो लेते हैं ..गणेश पाइन की पेंटिंग्स याद आयीं साथ में .

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  7. गहन को गहनता की ओर ले जाते कवि ...अनिरुद्ध उमट ....! कम शब्दों में बहुत कुछ ....या सब कुछ कहती ...फिर भी कोई विचार कोई सोच दे जाती कवितायें ... ...कलम से उठा कर रंग कैनवास पर कलात्मक कृतिया रचने वाले कवि है ....अनिरुद्ध जी ...बहुत बधाई ....रचनाकार ओर समालोचन ...दोनों को ..हमारे लिए प्रस्तुत करने के लिए शुक्रिया

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  8. anirudhh ji ka gadya aur padya dono vishesh hain apna ek khas chehra liye.. unhe padhna pasand aata hai.

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  9. ये हमारी खुश नसीबी है की सम्मानीय अनिरुद्ध भाई साब का सानिध्य कभी कभार मिल जाता है और स्नेह तो सदा ही रहता है उनका हम पे . अनिरुद्ध जी की लेखनी का एक अपना अद्भुत अंदाज़ है . मन को स्पर्श करती कविताएँ ! साधुवाद
    सादर !

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  10. premshankar shukla18/6/13, 2:05 pm

    vahut vadia kavitan. pad kar kuch hasil hua.
    prem shankar shukla
    bharat bhavan bhopal

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  11. सुमन केशरी23/6/13, 8:06 pm

    अनिरुद्ध की इन कविताओं को सुनने का अवसर मिला था बीकानेर यात्रा के दौरान. Anirudh Umatकी कविताएं मृत्यु से संवाद करती...उन्हे पास बुलातीं...उनसे सघन नाता जोड़ती कविताएं है. ये कविताएं पाठक या श्रोता को वही नहीं रहने देतीं जो वह इन्हें सुनने या पढ़ने के पूर्व था. यो कविताएं दिल में गहरा सूराख कर देती हैं और यह प्रश्न पूछने को व्याकुल भी कि क्या जीवन में मृत्यु का राग एक सतत राग है या वह एक विस्मृत राग है, जिसे आना और गाना है...हमारे होने न होने के बीच...वह है और नहीं भी....वह उतनी ही प्रकट है, जितने हम और उतनी ही ओझल जितनी हमारी समृतियाँ...

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  12. बहुत बहुत बधाई अनिरुद्ध जी इन सुन्दर रचनाओं के लिए

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  13. बहुत थकेली कविताएं। मृत्‍यु से संवाद करना नकली है। ऐसी कविताएं कलापगी होती हैं इनसे कोई सामाजिक अर्थ प्राप्‍त नहीं होता। यानी साहित्‍य का लक्ष्‍य ही प्राप्‍त नहीं होता।

    कृष्‍णप्रताप सिंह

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  14. अनिरुद्ध की कवितायेँ अपनी भाषा की सहज गंभीरता व् वातानुकूलित भाव भाषा के अनुपम संगम की कवितायेँ है /इनमें जो भाव है वे अनुपमं नहीं हो सकते थे अगर भाषा वैसी नहीं होती और भाषा अगर भीतर से यु सहज प्रस्फुटित हुए है तो निश्चित भाषा ने भी भाव से एकाकार किया है /ये वो लय है --वाक लय जिस लय को अज्ञेयजी कविता का अनिवार्य हिस्सा मानते थे /कनिरुद्ध अच्छा लगा तुम्हारी कवितायेँ पढ़ जो मनकुण्ड के तल से आई है बाहिर .....सांस लेने और हमें नया काव्यानुभव देने में सफल हुई है बधाई !!!...राकेश मूथा

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