परिप्रेक्ष्य : मेहदी हसन




मेहदी हसन गज़ल की वो आवाज़ थे जिसमें  खुद गज़ल गुनगुना उठती थी. उनकी आवज़ के सहारे गज़ल ने खूब मकबूलियत हासिल की, वह ख़ास-ओ- आम की सदा बन गई.

पिछली रात यह आवाज़ बुझ गई. कथाकार, कवयित्री प्रत्यक्षा का यह आलेख मेहदी को याद  करता हुआ.





                                
मेहदी हसन
ये धुँआ सा कहाँ से उठता है                       

प्रत्यक्षा



जाड़ों के सर्द दिन थे. सुबह के धुँधलाये सर्दीले आलम में नींद के झुटपुटे में एक मखमली आवाज़ तिरती आतीसपने सी आँखों और चेहरे को दुलरा चली  जाती. हमें लगता नींद में जादूगरी होती है. मुन्दी आँखों से हम महसूस करते कोई आहट जो दिल को छूती चीरती , तितली के पँख सी मुलायम रेशमीजाने दिन में कितनी बार आस पास किसी पहचानी बिसरी साँस सी बजती. कोई न समझा दर्द जो जाने किस दिल के जाँ से उठता था. आवाज़ का नशीला धूँआ ही तो था जो ऊपर ऊपर अपनी मुरकियों और मुलायम तान में उठता जाता , इतना ऊपर कि साँस तक रुक जाये उस उठान पर , जब लगे कि अब बसफिर उसके ऊपर भी गोल चकरियाँ खाता उठता जाताऐसे उठता कि जिगर से कोई तार खींचता उठता होजैसे कोई जहाँ से उठता है

बाहर पत्ते धीमे धीमे गिरते. चीड़ के पेड़ों के बीच हवा सरसराती फुसफुसाती निकलती. सर ऊपर उठाये उनके पत्तों के बीच से नीला आसमान दिखता. कुहासे की उँगलियाँ सर्द गाल थपथपाती विलीन होतीं. शाम से फायर प्लेस में लकड़ियों के विशाल कुंदे दहकते . पुराने कम्बल सा रात मुँह दाबे ठिठुरता खामोश उतरता. बाहर ओसारे में लालटेन की पीली रौशनी के गिर्द फतिंगों का झुंड भनभनाता. काँपती ठंड में बाहर के खाली मैदानबेर और इमली के पेड के बीच चौकोर चबूतरे पर सन्नाटा भारी गिरता. दिन में धूप की खुशनुमा पीलेपन पर चबूतरा दूसरी दुनिया दिखाता. चटाई बिछाये दिन दिन भर धूप में लेटे किताबों और संगीत की संगत कैसी मीठी लगती. जैसे आँखे धूप में झपकाये मन में सुनहरी किरणें फैली हों. रात में वही चबूतरा अँधेरी दुनिया का रहस्य छिपाये बड़ी खिड़की के पार दिखताझुट्पुट स्याह कोहरे में. पीले चाँद के तले. छाती में मनों बोझ उठाये हम चुप तकते बिना जाने कि क्या टीस है.

रज़ाई में मुँह घुसायेगर्म हवा नाक से छोड़ते किसी गुनगुने संसार में महफूज़ हम सारी दुनिया से विलग होते. एक अजीब किस्म का अनजानापन हमें घेर लेता. हम जीवन से परे होते , शरीर की कैद से बाहर. हम अपनी आत्मा में विचरतेनदी नाले पहाड़ अंतरिक्ष. हमारी आँखों के भीतर दस दुनियायें होतीं , रंगीन और जीवंतचटक और विस्मयकारी. हम जितना गर्मी और अँधेरे में दुबके होते उतना उतना ही फैल से उड़ान में होते. सफेद बगूले पंछी . पर्वत के शिखर के पार. हमारा कोई घर नहीं होता पर हम लौटते बारबार अपने शरीर में और नाक से गर्म साँस लेतेगालों पर उसकी नर्मी महसूस करते बिना जाने किसी खुशी से भर उठते.

किसी आवाज़ की टेक पर हम लौट पड़ते बार बारउन चमकती फर्श के प्रतिबिम्ब परजलती हुई लकड़ी की लपटों के सम्मोहन मेंजाड़ों की उन भोली सुबहों में , जब पहली आँख किसी गाती आवाज़ के मखमल में लिपटी सपनों से भरी खुलती. हम नहीं जानते थे कि इन बोलों के मायने क्या हैं. लेकिन इतना जानते थे कि कोई बड़ी मीठी बात है उस आवाज़ में जिन्हें हम मेंहदी कहते थे.

हँसते हैं उसके गिरियाये बेइख़्तियार पर
भूले हैं बात कह के कोई  राज़दां से हम

एक उमर में उनको सुनना मोहब्बत की रेशम गोलाईयों से रुबरू होना थाकि इश्क़ की इंतिहा और क्या होगीकि कोई ऐसे गाये तो मोहब्बत पर विश्वास कैसे न हो. कहीं पढ़ा था बरसोंपढ़ा था भी  कि नहीं कि मेंहदी कहते हैं किसी खातून को देखकर गज़ल गा दें तो वो उनके मोहब्बत में पड़े बिना न रहे. सच ही तो था. उनकी आवाज़ जादू थी उनकी आँखें जादू थी. किसी के होने भर का जादू था. चाँद रात के नशीले नीले मद्धिम मुलायम सुरों की भीनी बरसात थीरेगिस्तान के अछोर रेत का विस्तार था , उसकी दहक थी , रात की सर्दी में आग की तपन थीनींद में सपने की हल्की छुअन थी . उनकी आवाज़ अक़ीदत थी , अपने में लीन और अपने से परे. उनकी आवाज़ मोहब्बत थी.

गज़ब किया तेरे वादे पे एतबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया 

आज छाती पर उन स्मृतियों का भार है. मैं उस आवाज़ को ही सिर्फ नहीं याद करती. उस समय को भी याद करती हूँ जब उनकी आवाज़ मेरी याद में उससे भी कहीं ज़्यादा मीठी है घुलीमिली हैमेरी याद की मिठास से बढ़कर उनकी आवाज़ जिसमें गज़ब की सलाहीयत हैउसमें वही गर्मी और नर्मी हैएक ताप हैमृदुलता है. उसमें पूरा संसार हैगुनगुना शफ्फाक , खुशी देने वाला . अब जब वो किसी और जहान में  है तब भी और ज़्यादा. अब वो और भी हमारे साथ हैं उसी मीठे तरन्नुम में जहाँ सब मीठा धुँआ सा है जिसके नशे से बाहर हम कभी नहीं निकलेकभी निकलना ही नहीं चाहा क्योंकि उनकी आवाज़ की संगत में होना मोहब्बत के मीठे कुँये के पानी में तर ब तर होना रहा.

आपके नाम से ताबिन्दा है  उनवां-ए- हयात
वरना कुछ बात नहीं थी मेरे अफ़साने में

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प्रत्यक्षा
कहानीकारकवयित्रीपेंटर
पावरग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (गुड़गाँव)में मुख्य प्रबंधक वित्त.
ई-पता : pratyaksha@gmail.com

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  1. अनाम14/6/12, 7:58 pm

    यह तो मेहदी हसन में निर्मल वर्मा का कॉकटेल लग रहा है . ऐसा लग रहा है जैसे इस सबकॉन्टीनेंट के सबसे महबूब गायक को कोई योरप में बैठ कर सुन रहा है . पब में दारू पीते हुए .

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  2. जो मीठी मखमली आवाज किसी इन्‍सान के वजूद में घुलमिलकर उसके अहसास का हिस्‍सा बन जाए, जिसमें अपनी जिन्‍दगी और उसका पसन्‍दीदा कलाम सांस लेता सुनाई दे, वह आवाज मौन होकर भीतर और मुखर हो उठती है, कुछ ऐसा असर छोड़ गई है ग़ज़ल-गायकी के अनूठे फनकार मेंहदी हसन की कभी न खो सकने वाली वह गहन-गंभीर मीठी आवाज, जिसे उस नायाब कलाकार ने अपनी रवायत और बरसों के रियाज बेमिसाल बना दिया, उसकी गायकी का वह महीन अंदाज, उसके आरोह-अवरोह में गूंजती वे मुरकियां वे तानें कोई कैसे बिसार दे यों ही, जब तक ये अकूत दौलत हमारे पास है, मेंहदी हसन हमारे विरासत और तहजीब का हिस्‍सा बने रहेंगे। प्रत्‍यक्षा अपनी अफसाना-निगारी का नायाब तरीका अपनाते हुए बेहद खूबसूरत अल्‍फाज में मौसिकी के इस महाऩ कलाकार को याद करके जो इज्‍जत-अफ़ज़ाई की है, वह वाकई काबिले तारीफ है।

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  3. पढ़ते पढ़ते शब्दों में डूब गया..

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  4. प्रत्यक्षा .. कैसा सम्मोहक लिखा है, जैसे बाँहे गाहे पास ही खड़ा है.. जैसे अब होंठ हिलेंगे और गुलों में रंग भर जाएगा.. चीड़ के पत्तों से सरसराकर निकल जायेगी ये अमर आवाज़..श्रद्धांजलि ऊना के फनकार को.. वह जो साइकिल बनाते-बनाते ध्रुपद पकड़ता था... मोटर की कालिख में नहाया गुनगुनाया करता था..

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  5. kitne saleeke se likha hai.. shabdo kee khoobsoorti aur marm me kho gai..

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  6. ‎"हर आन बढ़ता ही जाता है रफ़्तागान का हुजूम
    हवा ने देख लिए मेरे सब चरागो को"

    'Every passing moment adds to the list of departed souls
    The wind has seen all my oil lamps"

    मेहदी हसन साहेब अल्लाह आपको जन्नत में जगह दे. आपकी आवाज़ क़यामत तक हमारे कानो मे गूँजती रहेगी और दिलों को चैन और सुकून पहुँचाती रहेगी.

    [प्रत्यक्षा आप बहुत खूब लिखती हैं. अल्लाह आपके क़लम के जादू को क़ायम रखे.]

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  7. प्रत्यक्षा, तुम्हे पढना मेहदी हसन को सुनने के जादू से कम नहीं है. ऐसा लगा मानो ग़ज़ल सी बह रही हो तुम्हारी कलम में. बहुत खूब.

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  8. मेहंदी साहब की क्लासिकल गज़ल वाकई ऎसा शमां बाधती है जो और कही मुझे नही मिली आपके लिखने की गहरी कशिश का उन्वान का मौजूं सही है शुक्रिया प्रत्यक्षा जी ।

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  9. Rizvanul Haque17/6/12, 3:43 pm

    Pratyaksha aap ki writing skill aur prose itni achi hai ki Mehdi Hasan ko bhool kar aap ke prose mein kho gaya, had to ye hai ki us khoobsurat nasr mein kho kar aap bhi kuch lamhon ke liye Mehdi Hasan ko bhool gayee, bahut bahut mubarak

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