मेघ - दूत : फ्रांज़ फेनन : सुबोध शुक्ल

Posted by arun dev on दिसंबर 23, 2011









मनोचिकित्सक और क्रान्तिकारी दार्शनिक फ्रांज़ फेनन की  १९६१ में फ्रेंच में प्रकाशित The Wretched of the Earth की  भूमिका जॉन पॉल सार्त्र ने लिखी थी. इसे  अलजीरिया के फेंच उपनिवेश से स्वाधीनता संघर्ष के दरम्यान लिखा गया था. फेनन आज भी राष्ट्रवाद और उपनिवेशवाद के सबसे अहम मीमांसक हैं.
उनके एक महत्वपूर्ण सम्बोधन का अनुवाद युवा अध्येता और अनुवादक सुबोध शुक्ल ने किया है. हिंदी के अपने मुहावरे और प्रकृति में यह अनुवाद जितना अलजीरिया का सच बयाँ करता है उतना ही खुद भारत की अपनी बदनसीबी का भी.  


(अनुवाद एक संस्कृति-कर्म है ज़ाहिर है कि इसीलिये उसके अपने कुछ जोखिम भी हैं. यह जोखिम भाषा से ज़्यादा सभ्यताओं के हैं. इसीलिये अनुवाद, मात्र व्याकरण का सवाल  नहीं है वह देश-काल की तयशुदा सीमा का भाषा में अतिक्रमण है. रचना का अपनी केन्द्रीय सभ्यता से नाता, इस अतिक्रमण की मात्रा और अनुपात को सुनिश्चित करता है.
इस अनुवाद में भाषा के तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल कम से कम करने की चेष्टा रही है. बहुतेरे ऐसे  स्थानों पर  भावानुवाद का प्रयोग किया है जहां लगा कि ज्यों का त्यों अनुवाद हिन्दी की प्रकृति से मेल नहीं खायेगा. पर कुल चेष्टा यही है कि पाठ का जीवन, अपनी सहजता और सरलता के साथ रूपांतरित हो. शेष आप पर...........)
फ्रांज़ फेनन, औपनिवेशिक अध्ययन में एक जाना-पहचाना नाम है. यह अनुवाद उनके तीसरे  ब्लैक अफ्रीकन रायटर्स कॉंग्रेस १९५९ में दिए गए भाषण का पाठ है. बाद में इस संबोधन को उनकी विख्यात और विवादास्पद किताब, ‘Wretched Of The Earth’ में संकलित किया गया.

राष्ट्रीय संस्कृति और स्वतन्त्रता संघर्ष के पारस्परिक आधार                     
फ्रांज़ फेनन

पनिवेशिक प्रभुत्व, अपने व्यापक सरलीकरण के कारण, बहुत आसानी और सुविधा से, पराजित जाति के सांस्कृतिक जीवन को एक चमत्कारपूर्ण जीवन-शैली में अस्त-व्यस्त कर देता है. ऐसा सांस्कृतिक ध्वंस, राष्ट्रीय वास्तविकता के निषेध, वर्चस्ववादी शक्ति के नए कानूनी संबंधों, मूल निवासियों और उनके रिवाजों के निर्वासन, मालिकाना हक से वंचित करने   और आदमी-औरतों को सुचारुबद्ध योजना से गुलाम बनाने की प्रक्रिया द्वारा संभव होता है.

तीन साल पूर्व, अपने पहले सम्मलेन में मैंने यह बतलाया था कि औपनिवेशिक अवस्था में, नैसर्गिक गतिशीलता को  व्यापारी ताकतों के पदार्थवादी तौर तरीकों द्वारा, बड़ी आसानी और तेज़ी से बदल दिया जाता है. फिर संस्कृति का वह  इलाका चहारदीवारियों और संकेतों से चिन्हित किया  जाता है. निश्चित रूप से ये सब बड़े आरंभिक स्तर के बचाव के तरीके हैं जो संरक्षण की सामान्य प्रवृत्ति के चलते, अनेक कारणों से संस्कृतियों के बीच तुलनाधर्मी परिवेश पैदा करते हैं. यह समय हमारे लिए महत्व का इसलिए भी है कि शोषक, शोषित राष्ट्र और संस्कृति के वस्तुनिष्ठ अप्रत्यक्ष को समझने में नाकाम रहते हैं. उनका  हर प्रयास, उपनिवेशित जाति को उसकी संस्कृति के हीनताबोध से ग्रस्त करता है जोकि आगे चलकर आचार -व्यवहार के स्वतःस्फूर्त ढाँचे में रूपांतरित होने लग जाता है, अपने राष्ट्र को एक अवास्तविकता के रूप में पहचानने को प्रेरित करता है और आत्यंतिक रूप से खुद की जैविकता के प्रति, भ्रम और कुंठा के एहसास से भरता रहता है.

यदि घटनाक्रमों की परिस्थितियों के सिलसिले में तुलना की जाय तो पता चलेगा कि मूल निवासियों  का कार्य-व्यवहार भी एक जैसा नहीं होता. एक बहुसंख्यक जन वर्ग, औपनिवेशिक परिस्थितियों के प्रभाव से बिलकुल विलग, अपनी परम्पराओं से बखूबी जुडा  रहता है. दस्त-शिल्पकार ऐसे वक्त अपनी औपचारिक नियम-निष्ठा को और अधिक मजबूत करते हैं इसीलिये वह अधिक से अधिक रूढ़िबद्ध और अलग-थलग पड़ती जाती है. बौद्धिक वर्ग, स्वयं को कब्ज़ा जमाने वाली संस्कृतियों के चमक-दमक से भरे फैशन के सुपुर्द करने लगता है और अपनी ही राष्ट्रीय संस्कृति का, नकारात्मक रूप से विरोध करने का कोई मौक़ा नहीं गंवाता या फिर दूसरी ओर अपनी ही संस्कृति के उन दावों को प्रमाणित अथवा प्रदर्शित करने के  कुहासे में खोने लग जाता है जो उग्र रूप से भावुक तो होते हैं किन्तु जल्दी ही निष्फल हो जाते हैं.

ऐसी दो प्रतिक्रियाओं की सामान्य प्रकृति दोनों (उपनिवेशवादी और उपनिवेशित) को ही असंभव अंतर्विरोधों की ओर बढ़ा रही होती है. ऐसी स्थिति में चाहे  विश्वासघाती हो या राष्ट्रभक्त, मूल जनता पर स्पष्ट प्रभाव डालने में नाकाम सिद्ध होते हैं. औपनिवेशिक परिवेश की व्याख्या किसी भी तरह से लौह प्रणाली के आधार पर नहीं हो सकती क्योंकि यह परिवेश, राष्ट्रीय संस्कृति के लगभग प्रत्येक क्षेत्र को बाधित करता है. ऐसे में  औपनिवेशिक वर्चस्व की रूपरेखा के अंतर्गत, किसी भी ऐसी संभावना की उम्मीद नहीं होती कि जिसमें नए सांस्कृतिक झुकावों और संस्कृति में सुधार अथवा परिवर्तन की बात हो. कहीं-कहीं फूट पड़ने वाले दिलेर और वीरतापूर्ण प्रयास कभी-कभी सांस्कृतिक ऊर्जा को चमत्कृत ज़रूर कर देते हैं और उसके शिल्प, रूप और रंग को ताज़े स्पंदन के आवेग भी दे जाते हैं. ऐसे तरीकों के क्षण आवेगी,स्नायविक और त्वरित प्राप्त होने वाले लाभ आगे चलकर ठोस स्तर पर  व्यर्थ ही सिद्ध होते लगते हैं. किन्तु यदि हम साध्य परिणामों का अध्ययन करें  तो पायेंगे कि ये सारे प्रयास राष्ट्रीय चेतना पर लगे जालों को हटाने,नियंत्रणवादी  शक्तियों को चुनौती देने और आज़ादी के संघर्ष का रास्ता खोलने के लिए तैयारी की तरह थे.

एक राष्ट्र-संस्कृति, औपनिवेशिक वर्चस्व के अंतर्गत एक प्रतिद्वंद्वी संस्कृति की तरह होती है,जिसका विनाश एक तयशुदा फैशन में किया जाता है. इसे अत्यधिक शीघ्रता से एक गोपनीय संस्कृति में तब्दील किया जाने लगता है. संस्कृति को प्रच्छन्न करने की यह युक्ति नियंत्रणवादी ताकतों के आचरण में तुरंत दिखाई देने लगती है जोकि राष्ट्रीय चेतना के सिलसिले में परम्परा -प्रेम और हठधर्मिता को वफादारी के रूप में विवेचित करती है.संस्कृति के तमाम रूपों में हठधर्मिता को राष्ट्रीयता का प्रदर्शन मानना, विनाश और जड़ता के लिए अभिशप्त कर देने वाला है. यह न तो किसी किस्म की आक्रामकता है और न ही संबंधों की पुनर्व्याख्या. यह मात्र संस्कृति की कट्टरता को और घनीभूत करता हुआ उसे अधिक  से अधिक सुस्त, खाली और मुरझाया हुआ सा बना डालता है.

इस तरीके के शोषण की एक या दो शताब्दियाँ बीत जाने पर राष्ट्रीय संस्कृति, ठोस और अपनी वास्तविक कमजोरियों के साथ सामने आती है- जहाँ कुछ यांत्रिक आदतों, बनी-ठनी परम्पराओं  और कुछ धूल-धूसरित संस्थाओं का ढेर सा लगा रहता है.संस्कृति के ऐसे अवशेषीकरण की प्रक्रिया में कुछ छोटे-मोटे प्रतिरोध भी देखे सुने जा सकते हैं पर किसी भी तरह की बुनियादी सृजनक्षमता और जीवन के उत्साह से फीके ही रहते हैं. जन-दारिद्र्य, राष्ट्रीय नियंत्रण तथा संस्कृति का निरोध मिलकर एक समान  बात हो जाती है. एक शताब्दी के औपनिवेशिक वर्चस्व   के बाद हम अपनी पूरी अति में एक कठोर और रूखी संस्कृति को पाते हैं जो कूडे-करकट की तरह अपनी तल पर पड़ी रहती है. राष्ट्रीय यथार्थ का निर्जीव और राष्ट्रीय संस्कृति का दर्दनाक हो जाना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संघर्ष के दौरान ऐसे अंतर्संबंधों के विकास को केन्द्रीय महत्व के साथ देखना ज़रूरी है.


मूल  संस्कृति का निषेध, संस्कृति के कैसे भी प्रदर्शन को अवज्ञा ठहरा दिया जाना (भले ही वह सक्रिय हो या भावनात्मक), व्यवस्था के सभी मौलिक और देशीय अंगों को कुहासे में ढकेल देने का आग्रह; मूल निवासियों के मन में आक्रामकता का संचार करता है. किन्तु आचरण के ये तरीके पूर्वनियत प्रतिवर्ती क्रियाओं की तरह काम करते हैं- आसानी से चिन्हित किये जा सकने वाले, अराजक और अप्रभावशाली रूप में. उपनिवेशवादी शोषण, गरीबी और स्थानीय अकाल, मूल नागरिकों को ज़्यादा से ज़्यादा खोलने का तथा संगठित क्रांति का मार्ग सुझाता  है. प्रगतिशील और अप्रत्यक्ष तरीके से बनायी जाने वाली खुली और निर्णायक विभाजक-रेखा का, व्यापक जन-समूह द्वारा स्वागत किया जाता है. वह तनाव जो अब तक की प्रक्रिया में अनुपस्थित  था मौजूद होने लगता है और अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम, उपनिवेशवादी साम्राज्यों के समूचे हिस्सों का पतन और उपनिवेशवादी  तंत्र के अंदरूनी अंतर्विरोध, राष्ट्रीय चेतना को बढ़ावा देते हैं और मूल निवासियों के जुझारूपन को मजबूती से थामे रहते हैं.


उपनिवेशवाद की वास्तविक प्रकृति के इर्द-गिर्द नए तरीके से फैले ये तनाव, अपने सांस्कृतिक धरातल के प्रतिघात से पैदा होते हैं. उदाहरण के तौर पर, साहित्य  में सापेक्षिक स्तर पर अति-उत्पादकता देखने को मिलने लगती  है. वर्चस्ववादी ताकत को एक छोटे स्तर पर ही सही, जवाब देने वाला होने के कारण, मूल निवासियों द्वारा लिखा गया साहित्य, वर्गीय चेतना और सांगठनिक इच्छा-शक्ति के रूप में सामने आता है. प्रबुद्ध वर्ग जो दमन के दौर में, उपभोक्ता समाज के तौर पर पहचाना जाता  है, स्वयं को उत्पादक के रूप में प्रस्तुत करता है. ऐसा साहित्य जो शुरुआत में अपने को त्रासदियों और कविता के शिल्प तक सीमित रखता है वह आगे चलकर कहानियों,उपन्यासों और विचारोत्तेजक निबन्धों के क्षेत्र में प्रवेश करता है. इसकी मौजूदगी अभिव्यक्ति की ज़रूरत और आन्तरिकता की मुखरता के रूप में होती है. मुक्ति के संघर्ष के तरीकों और लक्ष्यों को साधने के अनुपात में चूंकि कवित्वपूर्ण अभिव्यक्ति, मंद और असहज होती है इसीलिये निर्विघ्न तथा स्पष्ट प्रस्तुति के लिए प्रसंग और वर्णित विषयों में परिवर्तन आवश्यक हो जाता है. कड़वाहट, निराशा और प्रत्यारोप के स्वर ढीले पड़ने लगते हैं साथ ही प्रतिहिंसात्मक,शोर-शराबेवाला, भडकीला लेखन भी सुस्त पड़ने लगता है जो अपने असलियत में कहीं न कहीं  नियंत्रणवादी  शक्तियों को ही मदद पहुंचानेवाला होता है. 

उपनिवेशवादी अपने शुरुआती दौर में अभिव्यक्ति के ऐसे माध्यमों को बढ़ावा देते हैं जिसके द्वारा  उनकी उपस्थिति और दखल संभव हो सके. भर्त्सना की दंश से भरी कटूक्तियां, स्थितियों और इच्छाओं के तकलीफशुदा खुलासों के बाजारूपन से से भरी अभिव्यक्तियाँ, नियंत्रणवादी शक्तियों द्वारा रेचक विधियों के साथ अनुकूलित की जाती हैं. कुछ निश्चित मायनों में इन प्रक्रियाओं की मदद के लिए नाटकीयता के माहौल से भी बचा जाता है जिससे कि वातावरण गंभीर और स्वाभाविक लगे. पर ऐसा परिवेश अस्थायी ही होता है. वस्तुतः जन-मानस के बीच राष्ट्रीय चेतना का विकास, मूल बुद्धिजीवियों की साहित्यिक जिम्मेदारी को मांजने और सुस्पष्ट करने के लिए किया जाता है. जन-मानस का लगातार जुड़ाव बुद्धिजीवियों को प्रतिवाद की मांग से अधिक कहीं और आगे जाने को आमंत्रित करता है. फ़रियाद, अपराध-बोध को जन्म देती है और अपराध-बोध आत्मसमर्पण को. ऐसे समय में सिर्फ आदेश सुने जाते हैं.राष्ट्रीय चेतना का क्रिस्टलीकरण साहित्यिक शिल्प और प्रारूप दोनों को ध्वस्त कर देता है लेकिन यहीं से नवोन्मेष का वह प्रस्थान-बिंदु भी तैयार होता है जो  एक नए जन-मानस को सृजित करता है. जहां उपनिवेश के प्रारंभिक दौर में मूल बुद्धिजीवियों का लेखन खास तौर पर नियंत्रणवादी ताकतों के द्वारा निरखा-परखा जाता है ( सम्मान देने या सज़ा देने के उद्देश्य से) वहीं सामूहिक और व्यक्तिवादी माध्यमों से, उस लेखन में जनता से रू-ब-रू होने की आदत का शुमार होना शुरू हो जाता है.

सृजन-बोध के इसी क्षण से, राष्ट्रीय साहित्य की अवधारणा प्रारम्भ होती है. यहीं पर साहित्यिक सृजन-बोध, विषय-वस्तु के चुनाव तथा विवेचना का वह स्तर प्रारम्भ होता है जिसे औसतन राष्ट्रीय कहा जा सकता है. इसको समवेत, संघर्ष का साहित्य भी कह सकते हैं जिसमें समूची जनता द्वारा एक राष्ट्र की भावना के साथ, प्रतिरोध की मंशा छिपी होती है. यह प्रतिरोध का साहित्य इसीलिये है क्योंकि यह राष्ट्रीय चेतना को निर्देशित करने में, उसकी रूपरेखा और स्वरुप को तय करने  में और नवीन तथी सीमाहीन क्षितिजों  के द्वार खोलने में सक्षम होता है. इसे प्रतिरोध का साहित्य इसलिए भी कहेंगे क्योंकि यह जिम्मेदारी उठाता है और देश-काल के सम्बन्ध में स्वतन्त्रता की इच्छा को संदर्शित करता है.

इसी सृजन का एक दूसरा पहलू भी है जो मौखिक परम्परा का अंग होता है- कथाएँ, गाथाएं, लोकगीत, जो पहले कुछ खास खांचों तक सीमित थे, परिवर्तन की चेतना से अपना विस्तार करते हैं. कथावाचक के गतिहीन और थके आख्यान जीवित हो सक्रिय हो उठते हैं और उन बदलाव की ज़रूरतों के साथ प्रस्तुत होते हैं जो मौलिक रूप से विकासधर्मी हैं. प्रतिरोध की चेतना के नवीनीकरण की प्रवृत्ति और संघर्ष के माध्यमों में आधुनिक चेतना के परिणामस्वरूप, कथाओं के नायक और हथियार बदलने लगते हैं. सूचनाओं और इशारों की विधि का प्रयोग अधिक से अधिक मात्रा में होने लगता है. यह मुहावरा कि यह सब बहुत पहले हुआ था की जगह जो हम आज कहने जा रहे हैं वह कहीं पहले घटित हो चुका है, यहाँ भी घटित होगा और  भविष्य में भी घटित होता रहेगा की धारणा पनपने लगती है. अल्जीरिया का उदाहरण इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है.

१९५२-५३ के बाद से उन कथावाचकों ने  जो पहले बड़े रूढ़िग्रस्त और शब्दाडम्बर फैलाने वाले के रूप में सुने जाते थे, अपनी कथावाचन की परम्परागत प्रक्रिया और कहनी को पूरा बदल डाला. उनको सुनाने वाली जनता जो पहले बेहद बिखरी थी वह संगठित होने लग गयी. महागाथायें अपने वर्गीय चरित्र में रूपांतरित होने लग गयीं. यह माध्यम मनोरंजन का विश्वसनीय रूप बन कर सामने आया जिसने कि सांस्कृतिक मूल्यों को, पुनः स्थापित करने का प्रयास किया.यह अचम्भे की बात नहीं थी कि क्यों औपनिवेशिक शक्तियों ने १९५५ के बाद से इन कथावाचकों को कैद में रखने का फरमान जारी कर दिया.

जन-मानस के संपर्क से जन्म लेने वाले आंदोलन, जीवन के संगीत से भरे होते हैं. कल्पना और स्वप्न का विकास, शारीरिक सीमाओं का अतिक्रमण कर देता है. हर बार जब कथावाचक किसी नए घटनाक्रम को जन-मानस के साथ जोड़ता है तो उस समय वह एक यथार्थ चेतना का आवाहन कर रहा होता है. एक नए किस्म के मनुष्य की उपस्थिति, जन-मानस के समक्ष प्रस्तुत होती है. ऐसे वक्त में वर्तमान अपने लिए आश्रय नहीं खोजता बल्कि हर ओर अपने को बिखेर देता है. कथावाचक अपनी कल्पना को एक मुक्त साम्राज्य देता है और नवप्रवर्तन से प्रेरित हो साहित्य की कला को मजबूत बनाता है. ऐसा भी कई बार देखने को मिलता है कि ऐसे पात्र जो नवोन्मेष में शामिल होने के लिए अपने बुनियादी ढाँचे में ही तैयार नहीं हैं  जैसे रहजन और अन्य  असामाजिक तत्व; चरित्र के रूप में चुने जाने लगते हैं और उन्हें अलग दृष्टिकोणों से देखा जाने लगता है.

उपनिवेशित देशों की महागाथाओं और लोकगीतों में स्वप्न का उभार सर्जनशील आवेश की  केन्द्रीय भूमिका में उपस्थित होता है. अपनी ओर आशा से देखते जन-मानस को कथावाचक, उत्तरोत्तर सादृश्य अनुमान से जगाता चलता है और अपने रास्ते पर अकेला बढ़ता हुआ भी जन-समूह को संगठित करता जाता है. नए ढाँचे और  नयी संरचना की   यही प्रतिबद्धता, राष्ट्रीय चरित्र कहलाती है. आमोद-विनोद से और  तिलिस्म से भरे किस्से धीरे-धीरे अपना आकर्षण खोते हुए लुप्त होने लगते  हैं. एक संकटग्रस्त बुद्धिजीवी और उसके क्षत-विक्षत चेतना के धरातल, प्रदर्शन के स्तर पर भी ऐसे वक्त बहुत समय तक टिके नहीं रह सकते. अपनी निंदा और निराशा के चरित्र को खोते हुए, उन्हें उस आम जनता का हिस्सा बनना ही होता है जो मुकाबले के लिए समूची ऊर्जा के साथ तैयार है.

यदि दस्त-शिल्पकारी के क्षेत्र को देखें तो उनमें अभिव्यक्ति का जो प्रतिरूप प्रारंभिक दौर में नगण्य और ठिठका हुआ मिलता है, स्वयं को गति के साथ संचालित करना शुरू करता है. उदाहरण के तौर पर काष्ठकर्म, जो शुरुआती औपनिवेशिक स्थितियों में, कुछ सीमित लोगों के ठाठ को बनाए रखने वाली कला के रूप में जाना जाता था अब वर्ग-विषय बनना शुरू होता है. अप्रभावशाली और बनावटी मुखौटों की जगह, शरीर से ऊपर की ओर उठते, मुट्ठी भींचे हाथ की मुद्रा मुख्य-धारा में आने लगते हैं.  संरचनाओं के बहुआयामी और बहुअर्थी रूप सामने आने लगते हैं. परम्परागत ज्ञान और शिक्षा के समूह भी, स्वतंत्र विचारकों और अव्यवसाइयों के बढते दबावों से रचनाधर्मी प्रयासों की ओर उन्मुख होते हैं. सांस्कृतिक जीवन के परिवृत्त में इस तरह के उत्साह कई बार अनदेखे गुज़र जाते हैं किन्तु फिर भी राष्ट्रीय उद्योग में उनका सहयोग केन्द्रीय महत्व का होता है. जीवन की ऊर्जा को नयी संरचना और सुगढ़ता देकर  और मजबूती से अपनी ज़मीन को संभाले रखकर, कलाकार एक संगठित आंदोलन में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करता है.


राष्ट्रीय-चेतना के जागरण की इन अंतःक्रियाओं को यदि भांडकर्म(मृदभांड) के परिक्षेत्र में देखें तो भी हमें ऐसे ही परिणाम देखने को मिलेंगे. शिल्पकारी की रीति-चेतना बाधित होने लगती है और तमाम उत्पादों को पुनःसृजित  किया जाने लगता है- पहले अप्रत्यक्षतः और फिर नैसर्गिक रूप से. समरसता और संयोजन के परम्परागत नियमों के अनुसार, जहां रंगों का प्रयोग उनके न्यूनतम स्तर पर होता रहा था वहीं अब क्रान्तिधर्मी चेतना के कारण उनका प्रयोग धडल्ले से प्रारम्भ होता है. गेरुआ और नीला रंग जो लगभग समान रूप से सभी संस्कृतियों में उपेक्षित रहे थे, बिना किसी विवाद के मुख्य रंगों के रूप में प्रयुक्त होने लगते हैं. इसी तरीके से इन शिल्पकारों द्वारा बनाए गए मानव-चेहरे जो विभिन्न समाजशास्त्रियों के आधार पर क्षेत्रीय स्थितियों के साथ बदलते रहते हैं, उनमें ज़बरदस्त एकरूपता देखने को मिलने लगती है.

 मानव-विज्ञानी और अपने जन्म-देश से आया कोई भी विशेषज्ञ इन परिवर्तनों को आसानी से चिन्हित कर सकते है. समग्रतया ऐसे परिवर्तनों को, जड़ कलावादी विचारों और उपनिवेशधर्मी  सांस्कृतिक चेतना के विरोध का सामना करना पड़ता है. उपनिवेशवादी विशेषज्ञ ऐसी नयी उद्भावनाओं को नकारते हैं और देशीय-स्थानीय समाज की आदिम परम्परा को सुरक्षित करने और बचाए रखने की तथाकथित सहयोगी भावना से दौड पड़ते हैं. यह उपनिवेशवादी ही होता है जो स्थानीय जंग लगी, निकम्मी परम्परा  को जीवित रखने के लिए प्रयासरत रहता है. हमें यह ठीक से याद है और यह उदाहरण उस वक्त से महत्व का है जब औपनिवेशिकता अपने मूल असली चरित्र में उभर कर सामने नहीं आयी थी : दूसरे महायुद्ध के बाद जन्म लेने वाले संगीत के नए स्वर बी- बॉप * का  जैज़** बजाने वाले गोरों ने बल भर विरोध किया. क्योंकि उनके लिए जैज़ टूटे,थके-हारे, निराशा से भरे, शराब में धुत, अपनी नस्ल पर अभिशाप और गोरों की नस्ली घृणा के पात्र नीग्रो-जाति   के स्मृतिगान  की तरह था. जैसे-जैसे नीग्रो-जाति  ने अपने हालात समझने शुरू किये और बकाया दुनिया को अलग से देखने की दृष्टि विकसित की; जब उसमें आशा का संचार हुआ और नस्ली दुनिया को परे धकेल देने का साहस, तो यह साफ़ होने लगा कि उसके बाजे की आवाज साफ़ हो गयी है और धुन परिपक्व.  जैज के नए रूपांतरण किसी आर्थिक प्रतियोगिता का परिणाम नहीं हैं.हम उनमें आसानी से बिना किसी संदेह के, अमरीकी दक्षिणी दुनिया की पराजय के परिणाम सुन सकते हैं; भले ही उनका स्वर धीमा हो पर वे वहाँ हैं ज़रूर. और यह कोई यूटोपिया नहीं है कि इन पचास सालों में जैज का विकास उस हब्शी चेतना की अभिव्यक्ति के रूप में हुआ है, जो बेचारगी,प्रताडना और गुलामी के इतिहास को कहीं न कहीं आज भी संजोये हुए है- अपनी शक्ति बनाकर.

हम सब इसी तरीके से उठते-गिरते प्रवाह, बदलाव और उत्तेजना की स्थितियों को  कमोवेश समाज के हर तबके, नृत्य,गायन,परम्परागत रिवाजों और  उत्सवों के आयोजन में देख सकते हैं. राष्ट्रीय आंदोलन के राजनीतिक और संघर्ष के दौर को सूझ-बूझ से देखने पर, नवोत्साह और परिपक्व जुझारूपन को महसूस किया जा सकता है. उसे अभिव्यक्ति और ढांचों के उन प्रतिरूपों और आकारों से चिन्हित किया जा सकता है जोकि पूरी शक्ति और ताजगी के साथ व्याप्त हैं और साथ ही जो किसी प्रार्थना  या स्तुति पर नहीं बल्कि जन-मानस की सामुदायिक चेतना पर आधारित है_निश्चित लक्ष्यों और परिणामों को ध्यान में रखते हुए. मूल निवासियों की संवेदना को जागृत करने वाले ये सामूहिक यत्न, अंतर्मुखी आदतें  पराजय मानसिकता  को स्वीकार करने वाली भावना को निष्क्रिय और अवांछनीय बनाते हैं. मूल निवासी अपने आग्रहों और धारणाओं को पुनः-सृजित करता है क्योंकि वह परम्परा के तमाम परिक्षेत्रों(दस्तकारी, नृत्य, गायन, साहित्य, मौखिक) को सोद्देश्यता और गतिशीलता के साथ देखता है. उसकी दुनिया अपनी शापित भूमिका से बाहर आती है-एक अनिवार्य संघर्ष के लिए आवश्यक शर्तों को बनाती हुई.

हमने आंदोलन के अस्तित्व पर उसके विभिन्न सांस्कृतिक रूप-रंगों  के बरक्स  चर्चा की और यह भी देखा कि यह आंदोलन राष्ट्रीय  भावना की प्रौढ़ चेतना से जुड़े रहते  हैं. अब इस बिंदु से यह आंदोलन,एक संगठनात्मक संस्था की तरह अधिक से अधिक वस्तुनिष्ठ ढंग से अपने को अभिव्यक्त करता है और इसी वजह से राष्ट्रीय अस्मिता की आवश्यकता उपस्थित होती है-चाहे उसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े.

उपनिवेशवादी वर्चस्व कि सीमा-रेखा के अंतर्गत मूल जन-मानस को नए मूल्य देने का प्रयास और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को खोजने की कोशिश, एक ऐसी लगातार जारी रहने वाली भूल है, जिसे न्यायोचित ठहराना अपराध की तरह है. किसी उपनिवेशित देश में बेहद सरलीकृत,बेढंगी, वर्गहीनता से भरी राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय संस्कृति को बचाए रखने के लिए उत्साह और कुशलता से भरे साधन की तरह प्रयुक्त की जाती  है.

और इसीलिये हम उस आनुपातिक दर्जे पर पहुँच जाते हैं जो देखने में विरोधाभासी प्रतीत होता है. असल में संस्कृति, राष्ट्र की भाषा, उसकी वरीयताओं और साथ ही वर्जनाओं के आकार-विन्यास को भी वाणी देती है. यह समाज के लगभग  हर उस हिस्से का अंग होती है जिसमें वर्जनाओं, मूल्यों एवं संरचनाओं का निर्माण होता है. एक राष्ट्रीय संस्कृति इन सभी मूल्यांकनों और समीक्षाओं का कुल जमा होती है. यह आतंरिक और बाहरी व्याप्ति के आधार पर अपनी समूची क्षमता के साथ, समाज और उसके हर तबके को पूरी शक्ति प्रदान करती है. उपनिवेशी परिवेश में, यही संस्कृति  राष्ट्र और राज्य दोनों स्तर पर अपदस्थ और उपेक्षित हो जाती है. इसीलिये राष्ट्रीय मुक्ति और राज्य की नवजागरण चेतना ही, उसकी उपस्थिति की शर्त को कायम रख सकती है.

राष्ट्र; केवल संस्कृति, उसकी उर्वर संभावनाओं, गतिशील नवीनीकरण और उसके अंदर तक धंसे रहने की शर्त मात्र भी नहीं है. ये सारे तत्व बेहद ज़रूरी हैं, इसमें कोई शक नहीं. यह प्रतिरोध उस राष्ट्रीय अस्तित्व को पाने का है जो संस्कृति को सृजनशील बनाने के लिए आगे बढाता है और उसे मुक्त करता है. क्योंकि बाद में यह राष्ट्र ही होगा जो उन सीमाओं और शर्तों का निर्माण करेगा जो संस्कृति के लिए आवश्यक है. राष्ट्र उन तमाम तत्वों को एकजुट करता है जो संस्कृति के निर्माण में आवश्यक होते हैं; वे सारे तत्व जो उसे विश्वसनीयता,प्रामाणिकता, जीवन और रचनाधर्मी शक्ति देते हैं. साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि यही वह राष्ट्रीय चरित्र है जो अपनी संस्कृति को अन्य  संस्कृतियों के लिए खोलता है- ताकि वह उनसे  प्रभावित भी हो सके और उनसे  मुकाबला भी कर सके. एक अनस्तित्वकारी  संस्कृति से, यथार्थ-संभावनाओं की और यथार्थ को प्रभावित करने की उम्मीद  नहीं की जा सकती. सबसे पहली आवश्यकता उस राष्ट्र की पुनर्स्थापना की है जो राष्ट्रीय संस्कृति को उसके सबसे जैविक सन्दर्भों में प्राणवान बनाता है.

इस प्रकार हमने संस्कृति की जीर्ण-शीर्ण परत के विच्छेद का कारण जाना जोकि अत्यंत विक्षुब्ध कर देने वाल अनुभव रहा और हमने राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संघर्ष की निर्णायक संध्या पर, अभिव्यक्ति के ऊर्जावान रूपों और स्वप्नशीलता के पुनर्जन्म को महसूस किया है. लेकिन एक महत्व का प्रश्न रह गया है  प्रतिरोध(राजनीतिक हो या सैन्य) और संस्कृति के सम्बन्ध क्या हैं? क्या संघर्ष के दौरान संस्कृति निलंबित रहती है? क्या राष्ट्र का प्रतिरोध संस्कृति की अभिव्यक्ति है और अंत में, आज़ादी कि लड़ाई, सांस्कृतिक सन्दर्भों में अनुभवजन्यरूप से कितनी कितनी भी उर्वर हो, अंततः संस्कृति का निषेध ही है? संक्षेप में कहें तो आज़ादी का संघर्ष सांस्कृतिक अवस्था है कि नहीं.

हमें विश्वास है कि उपनिवेशित जन-मानस का राष्ट्र की संप्रभुता को पुनर्स्थापित करने का सजग और संगठित उपक्रम, संस्कृति की उपस्थिति का सबसे प्रत्यक्ष और सम्पूर्ण प्रमाण है. यह अकेले संघर्ष की ही सफलता नहीं है जो संस्कृति को शौर्यवान और प्रामाणिक बनाता है क्योंकि संस्कृति को द्वंद्व के क्षणों में उपेक्षित नहीं रखा जा सकता. संघर्ष स्वयं ही अपनी प्रगति और विकास के ज़रिये संस्कृति को अलग-अलग रास्तों पर भेजता है साथ ही नए रास्तों को खोजने और बनाने का काम भी सौंपता है. किन्तु आज़ादी का संघर्ष, राष्ट्रीय संस्कृति को उसके पुराने मूल्य और बनावट वापस नहीं कर सकता. यह प्रतिरोध जो बुनियादी रूप से नितांत भिन्न लक्ष्यों को लेकर चलता है; मनुष्यों के आपसी संबंधों में, जन-मानस की संस्कृति के कथ्य और शिल्प को साबुत नहीं छोडता. संघर्ष के बाद उपनिवेशवाद के अवसान के साथ-साथ हम उपनिवेशित मनुष्य का अवसान भी देख रहे होते हैं.

यह नया मानव-बोध, खुद के लिए और दूसरों के लिए मानवता की नयी परिभाषा गढता है. यह संघर्ष के उद्देश्यों और तरीकों में पहले से ही सुनिश्चित कर दिया जाता है. एक प्रतिरोध जो जन-शक्ति के हर वर्ग को संगठित करता है, उनके आवेग और भावनाओं को प्रतिबिंबित करता है, जो जन-भावना के सहयोग से स्वयं को वर्गीय करने में हिचकिचाता नहीं है; निश्चित रूप से विजित होगा. इस किस्म के संघर्ष का मूल्य यह है कि संस्कृति के उद्देश्यों और प्रसार के लिए आवश्यक सभी कारकों की आपूर्ति शक्ति भर हो जाती है. इन शर्तों पर प्राप्त आज़ादी के बाद वैसी कोई सांस्कृतिक अनिश्चितता की स्थिति नहीं खड़ी हो सकती, जो कुछ नए स्वतंत्र हुए देशों में आज देखने को मिल रही है इन देशों में, राष्ट्र ने अपनी अस्मिता को प्राप्त करने के तरीके और उपस्थिति की शर्तों के द्वारा, राष्ट्र संस्कृति के ऊपर मौलिक प्रभाव जमा लिया है. वह राष्ट्र जो जन-चेतना के सम्मिलित प्रयासों से जन्म लेता है और जन-मानस की ठोस भावनाओं को साकार करने का प्रयास करता है, अपनी संस्कृति की  बेहद असाधारण अभिव्यक्ति में सुरक्षित रहता है.

वे मूल निवासी जो अपनी संस्कृति को लेकर चिंतित हैं और उसे एक वैश्विक आयाम देना चाह रहे हैं उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि प्रतिरोध के दौरान जिन लक्ष्यों की अपरिहार्यता और मजबूर ज़रूरतों को ध्यान में रखा गया था अब उन्हें समाप्त हो जाना चाहिए. राष्ट्र की आज़ादी एक अलग मुद्दा है और उसकी प्राप्ति के लिए तैयार किये गए उपकरण अलग. मुझे लगता है कि राष्ट्रीय संस्कृति का भविष्य और उसकी समृद्धता उन अविभाज्य मूल्यों को कायम रखेगी जो राष्ट्रीय संघर्ष में प्राप्त किये गए थे.

अब यह समय, कुछ दिखावटी नैतिक आचरणों को अपदस्थ करने का है. मानवता के पीछे छूट  चुके होने के  दावे खुद पीछे छूट  गए हैं. यह समय अधिक संगठित तौर पर काम करने का है. पिछड़े दिमागवाले राष्ट्रवादियों के लिए यह समय, बीती गलतियों से सबक लेने का है. हालांकि,हमको यह पता है कि चूकें, जिनका परिणाम अत्यंत गंभीर होता है राष्ट्रीय समय की मिथ्या एवं गलत पड़ताल से पैदा होती हैं. यदि संस्कृति, राष्ट्रीय  चरित्र की अभिव्यक्ति है तो मुझे यह कहने में ज़रा भी संकोच नहीं है कि हम जिस राष्ट्रीय चेतना के साथ आगे बढ़ रहे हैं वह संस्कृति का सबसे व्यापक और उन्नत स्वरुप है.

स्वत्व की चेतना का अर्थ संवादहीनता नहीं होता. जबकि इसके उलट, दार्शनिक विचार तो हमें यह बतलाते हैं कि स्वत्व की चेतना संवाद की गारंटी है. राष्ट्रीय चेतना, जोकि राष्ट्रवाद से अलग है, ही एकमात्र तत्व है जो हमें अंतर्राष्ट्रीय आयाम दे सकती है. राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रीय संस्कृति का यह सम्बन्ध अफ्रीका को एक विशेष परिप्रेक्ष्य देता है. असल में अफ्रीका में राष्ट्रीय चेतना का जन्म, अफ्रीकी चेतना के समकालिक संबंधों के साथ जुड़ा है. एक अफ्रीकी के लिए राष्ट्रीय संस्कृति के सम्मान की भावना अफ्रीकी-नीग्रो संस्कृति की सम्मान भावना के साथ भी जुड़ती है. यह सामूहिक उत्तरदायित्व किसी तत्वमीमांसीय सिद्धांत की पैदाइश नहीं है बल्कि उस सामान्य नियम का आग्रह है जो कहता है कि अफ्रीका का प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र जहां उपनिवेशवाद घुसपैठ कर रहा है वह एक घिरा हुआ राष्ट्र है और निरंतर खतरे में है.

यदि मनुष्य अपने आचरण से जाना जाता है तो हम कहेंगे कि एक बुद्धिजीवी के लिए सबसे आवश्यक काम यह है कि वह राष्ट्र के निर्माण में केन्द्रीय भूमिका अदा करे. यदि यह निर्माण वास्तविक होता है मतलब कि जन-भावनाओं को समझने और विवेचित करने में सक्षम और अफ्रीकी  जन-मानस की वास्तविकता को उभारने वाला तो इस आवश्यक परिणाम से पैदा हुए राष्ट्र का निर्माण, सर्वव्यापी मूल्यों को प्रोत्साहन देने वाला होगा. अन्य देशों से अलग-थलग न पड़कर  मिलने वाली यह आज़ादी, राष्ट्र को इतिहास के मंच पर अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करती है. यह राष्ट्रीय चेतना की भावना ही अंतर्राष्ट्रीय  चेतना को पालती-पोसती है. यह दोहरा दृष्टिकोण ही सभी संस्कृतियों  का मूल है.
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**बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में अमेरिका के दक्षिणी इलाको का अफ्रीकी संगीत जो आमतौर पर नस्ली दमन और गुलामी से जुड़ा था.
*दूसरे महायुद्ध के बाद जैज़ के परिवर्धित संस्करण के रूप में बी- बॉप अफ्रीकी मूल के अमरीकी नागरिकों में सर्वाधिक लोकप्रिय होने लगा. आज़ादी के ऊंचे  नोट्स और उत्साह की पल्प रिदम के साथ. ब्लैक फ्रीडम के रूप में  .
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सुबोध शुक्ल (03-06-1981,इलाहाबाद)
   
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आजादी के बाद की हिन्दी कविता पर शोध संपन्न. आधुनिक सामाजिक  और सांस्कृतिक विमर्शों में दिलचस्पी और इन्हीं विषयों से संबद्ध एक किताब शीघ्र प्रकाश्य
फुटकर आलोचनात्मक आलेख और अनुवाद- आलोचना,तद्भव,बहुवचन और पूर्वग्रह आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित 
फिलहाल बहुत सारे रोजगारों को एक साथ लेकर चला जा रहा हूँ.  
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