एकाग्र : मैनेजर पाण्डेय : भारत में जनतंत्र का सच

















प्रो. मैनेजर पाण्डेय ::

२३ सितम्बर,१९४१ . गोपालगंज (बिहार)
उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय, बनारस

वरिष्ठ मार्क्सवादी आलोचक, विचारक
कुछ अनुवाद भी
जे.एन.यू. नई दिल्ली के भारतीय भाषा केन्द्र से प्रोफेसर एवं अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त
जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष

आलोचना पुस्तकें :: 
शब्द और कर्म
साहित्य और इतिहास दृष्टि
साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका
भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य
अनभै साँचा
आलोचना की सामाजिकता
आलोचना में सहमति – असहमति
भारतीय समाज में प्रतिरोध की परम्परा
हिंदी कविता का अतीत और वर्तमान
संवाद – परिसंवाद

उपन्यास और लोकतंत्र

संपादन :: 
सीवान की कविता
कुमार विकल की प्रतिनिधि कविताएँ
मुक्ति की पुकार
देश की बात (देशेर कथा. सखाराम गणेशशंकर देउस्कर)
माधव राव सप्रे : प्रतिनिधि संकलन (संपादन)
संकट के बावजूद
मेरे साक्षात्कार
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ(साक्षात्कार) 
लोकगीत और गीतों में १८५७ (संकलन और संपादन) 

सम्मान :: 
हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान
राष्ट्रीय दिनकर सम्मान
रामचंद्र शुक्ल शोध संस्थान वाराणसी द्वारा गोकुलचन्द्र शुक्ल सम्मान
दक्षिण भारतीय सभा का सुब्रमण्यम सम्मान

अंग्रेजी, मराठी, बांग्ला, उड़िया, पंजाबी, उर्दू, तमिल आदि में अनूदित.



हिंदी का आलोचनात्मक साहित्य गंभीर और विस्तृत है. यह अपने समय और समाज से गहरे जुड़ा है. इसके परिसर में देसी–परदेशी बहस-मुबाहिसें चलते रहते हैं. यह जनतांत्रिक हुई है और इसमें अंतर-अनुशासनिकता के लिए भरपूर सम्मान है. इसमें हाशिए के लिए एक निरन्तर आमंत्रण है. इसमें सभ्यता समीक्षा का आत्मविश्वास है.

ऐसे आलोचकों में प्रो. मैनेजर पाण्डेय का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है. उनकी आलोचना का  बीच शब्द हैं – अनभै साँचा. निर्भय सच. सच कहने का साहस उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लिया है, आलोचना की व्यापक दृष्टि आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी से वही डॉ. रामविलास शर्मा से लोकतान्त्रिक भाषा और साम्राज्यवाद विरोधी समझ. वाग्मिता का ऐसा बेधक, दो दूक, सौंदर्य दुर्लभ है.

प्रो. पाण्डेय के ७० वर्ष पूरे होने पर आदर और शुभकामनाएं.   


  भारत में जनतंत्र का सच   

मैनेजर पांडेय


हिन्दी में डेमोक्रेसी के लिए तीन शब्द प्रचलित है- लोकतंत्र, प्रजातंत्र और जनतंत्र. ये तीनों शब्द विशेष ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़े हुए हैं. लोकतंत्र का लोक अत्यंत प्राचीन है, वह जनपदों के युग का है, परलोक का विरोधी और गाँवों में रहने वालों का सूचक. प्रजातंत्र सामंती युग से जुड़ा है, वह राजतंत्र का विरोधी है और राजा को छोड़कर बाकी पूरे समाज का द्योतक. जनतंत्र का जन वैसे तो बहुत पुराना है, लेकिन आधुनिक युग में वह शासित, शोषित और दमित जनता का सूचक है. जो शासन- व्यवस्था जनता की हो, जनता के लिए हो और जनता द्वारा संचालित हो वही जनतंत्र है. भारत में लोक अब एक सरकारी शब्द है. विश्वास न हो तो लोक सेवा आयोग और लोक निर्माण विभाग को याद कीजिए. अगर आप कोशिश करें तो लोक से जुड़े ऐसे और अनेक शब्द मिल जाएँगे, जिनमें लोक का सरकारीकरण दिखाई देगा. लोकतंत्र जनतंत्र से अधिक लोकप्रिय शब्द है. उसको लोकप्रिय बनाने में सरकार की बहुत बड़ी भूमिका है. जनतंत्र में जनता मूर्तरूप में मौजूद होती है जबकि लोकतंत्र में अमूर्तरूप में. यही नहीं, लोक में सभी वर्गों, स्तरों और स्थितियों के मनुष्यों का समावेश होता है जो शासन व्यवस्था में अपने वर्गों, स्तरों और स्थितियों के अनुकूल स्थान हासिल करते और पाते हैं.

दुनिया में जनतंत्र के तीन जाने-माने लक्षण हैं. वे हैं- स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा. जिस देश के समाज और शासन व्यवस्था में ये तीनों एक साथ न हों उसे जनतांत्रिक कहना जनतंत्र का मजाक उड़ाना है. इन तीनों में से सबसे महत्वपूर्ण और बाकी दो का पोषक है समानता. इसके अभाव में या कम होने की स्थिति में न स्वतंत्रता सार्थक हो सकती है और न भाईचारा संभव होता है. लेकिन विडम्बना यह है कि पूँजीवादी लोकतंत्र में समानता वास्तविकता के रूप में ही नहीं, भाव और विचार के रूप में भी न होती है और न हो सकती है. आजकल तो पूँजीवाद के कुछ ऐसे समर्थक सिद्धांतकार हैं जो असमानता की स्थिति को पूँजीवाद के विकास और विस्तार के लिए अनिवार्य मानते हैं. पूँजीवादी लोकतंत्र में झूठ और लूट की स्वतंत्रता होती है और लुटेरों के बीच भाईचारा भी होता है, लेकिन बहुसंख्यक जनता के लिए समानता के अभाव में न सच्ची स्वतंत्रता होती है न समाज में कहीं भाईचारा होता है. प्रमाण के लिए आप भारतीय समाज की वास्तविकता को देख सकते हैं.
     
आइए, हम भारतीय लोकतंत्र में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा के यथार्थ रूप  को देखें. इस देश के नागरिकों को कैसी स्वतंत्रता मिली हुई है और उसका कितना दमन होता है, यह जानना हो तो जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों की जनता से पूछिए; अपने जंगल, जमीन और जीवन के लिए संघर्ष करने वाले आदिवासियों से जानिए; दमन, हत्या और बालात्कार के शिकार दलितों की जीवन स्थितियों पर एक नजर डालिए; इस देश के अल्पसंख्यकों के दमन और उत्पीड़न को देखिए, बलात्कार, हत्या और आत्महत्या से गुजरने वाली भारतीय स्त्रियों के जीवन-मरण का जायजा लीजिए, जीवन से निराश और हताश होकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर किसानों से आजादी का अर्थ समझिए और बेकारी तथा भुखमरी का जीवन जीने वाले मजदूरों से लोकतंत्र की असलियत जानिए. यही नहीं, बड़ी संख्या में बाल मजदूरी तथा बेगारी करते, गलियों और सड़कों पर कूड़ा बीनते, भीख मांगते और अमीरों की कामुकता के शिकार होते बच्चों के जीवन को देखकर भारतीय लोकतंत्र के सच को पहचानिए.
     
आजकल भारतीय लोकतंत्र की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक नीतियों का निर्माण तथा निर्धारण केंद्र की सरकार और बड़े पूँजीपतियों के बीच सहयोग, सहमति और संतुलन के आधार पर होता है. सरकार पूँजी के विस्तार और विकास के पक्ष में सहायक और सहयोगी की भूमिका निभाती है, इसलिए अपनी जमीन, जंगल और जल की रक्षा के लिए संघर्ष करने वालों को विकास में बाधक मानते हुए उनका दमन करती है. सरकार के लिए देश के विकास का अर्थ है पूँजी, पूँजीवाद और पूँजीपतियों का विकास और उस विकास में बाधक किसानों, मजदूरों और आदिवासियों का दमन जिसे अमित भादुड़ी विकास का आतंकवाद कहते हैं. इससे जनता में वह डर पैदा होता है जो जनतंत्र का दुश्मन है. कार्ल मार्क्स  ने भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की रीति-नीति को देखते हुए 1853 में बुर्जुआ सभ्यता के दो लक्षणों की बात की थी. वे लक्षण हैं अथाह पाखंड और जन्मजात बरबर्ता. पिछले बीस वर्षों से जितनी तेजी से भारत में बुर्जुआ सभ्यता आ रही है उतनी ही तेजी से भारतीय लोकतंत्र में पाखंड और बर्बता का विस्तार हो रहा है.
     
आइए, अब यह देखें कि भारत के लोकतंत्र में समानता या असमानता की क्या वास्तविकता है. भारत में एक ओर आर्थिक विकास की धूम मची है, जिसे कभी चमकता भारत कहा जाता है तो कभी अतुल्य भारत. दूसरी ओर भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या बढ़ी है, पाँच वर्ष के कम आयु से 47 प्रतिशत बच्चे कुपोषण की गिरफ्त में हैं. देश के एक प्रतिशत पूँजीपतियों की आय में अपार वृद्धि हुई है तो 60 से 70 प्रतिशत लोगों की आय बहुत कम है. इस बीच गरीबों की आय में जो नाम मात्र की वृद्धि हुई है उसे मंहगाई खा गई है. देश में उत्पादन की दर में वृद्धि तो हुई है, लेकिन मजदूरों की मजदूरी जहाँ की तहाँ है. असंगठित मजदूरों की दशा संगठित मजदूरों से भी खराब है. भारत का योजना आयोग स्वीकार करता है कि समावेशी विकास नहीं हुआ है. इस बीच बाजार का जो विस्तार हुआ है उसके हाशिए पर करोड़ों लोग हैं. यही नहीं दो लाख से अधिक किसानों ने आत्म हत्या की है, जो भारत और दुनिया के इतिहास की अभूतपूर्व घटना है. इसे राष्ट्रीय शोक या राष्ट्रीय शर्म के रूप में याद किया जाना चाहिए. संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवीय विकास के सूचकांक के अनुसार दुनिया के विकास के नक्शे में 1994 में भारत 134वें स्थान पर था और 15 साल बाद 2009 में भी वहीं था. इसका अर्थ यह है कि देश में आर्थिक विकास तो हुआ है पर मानवीय विकास नहीं हुआ है. इस सब का परिणाम यह है कि असमानता के बढ़ने के साथ आम जनता में असंतोष बढ़ा है, जिसकी अभिव्यक्ति जहाँ तहाँ विद्रोह और संघर्ष में हो रही है. इस तरह भाईचारा के विकास की संभावनाएँ समाप्त हो रही हैं. सारांश यह है कि भारत में लोकतंत्र का कोई भी बुनियादी लक्षण विकसित नहीं हुआ.
     
जो लोग यह समझते हैं कि रूपवाद केवल कला और साहित्य में होता है, उन्हें यह भी जानना चाहिए कि वह राजनीति में भी होता है. भारत का लोकतंत्र राजनीति में रूपवाद का एक अच्छा उदाहरण हैं. यहाँ लोकतंत्र के नाम पर समय-समय पर चुनाव होते हैं; ग्रामपंचायत के, विधानसभाओं के और संसद के. ये चुनाव कैसे लड़े और जीते जाते हैं, यह सब लोग जानते हैं. सारे चुनाव धन बल, बाहुबल, जातिगत गठजोड़ और धर्म की मदद से लड़े और जीते जाते हैं, इसलिए भारत के लोकतंत्र की राजनीति में अपराधियों का बोलबाला दिखाई देता है. जनता के सामने साँपनाथ और नागनाथ में से किसी एक को चुनने की स्वतंत्रता होती है. यही कारण है कि धीरे-धीरे भारत की जनता वर्तमान लोकतंत्र और उसकी चुनावी राजनीति से ऊब रही है, चुनावी दंगल के पहलवानों की राजनीति में उसका विश्वास अंत के करीब है. इकोनाॅमिस्ट पत्रिका ने अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र की जो तालिका प्रकाशित की है उसमें भारत का स्थान 45वें पर है. यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया, खासतौर से चुनाव की प्रक्रिया में जनता की भागीदारी और दिलचस्पी की कमी का प्रमाण है.
     
इस स्थिति का आभास देश के राजनीतिक दलों को है, इसीलिए कभी-कभी यह मांग होती है कि मतदान को कानूनन अनिवार्य बनाना चाहिए. अगर ऐसा हुआ तो यह झूठे लोकतंत्र को जनता पर थोपना होगा. इसकी जगह होना यह चाहिए कि प्रत्येक मतपत्र के अंत में यह छपा रहे कि किसी को नहीं’, ताकि जनता अधिक बुरे और कम बुरे उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर न हो. जहाँ मजबूरी होगी वहाँ जनतंत्र नहीं होगा. इसके साथ ही जनता को यह अधिकार भी मिलना चाहिए कि वह मतदान के माध्यम से अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को वापस बुला सके, तभी विधानसभाओं और लोकसभा के सदस्य जनता की आकांक्षाओं और जरूरतों को ध्यान में रखकर काम करेंगे.
     
भारत में संसदीय लोकतंत्र है, जो राजनीतिक दलों पर आधारित है. भारत के अधिकांश राजनीतिक दलों के गठन, ढाँचे, चरित्र और व्यवहार पर ध्यान दीजिए तो मालूम होगा कि उनमें कहीं भी लोकतंत्र नहीं है. जिस राजनीतिक दल में आंतरिक लोकतंत्र न होगा वह देश और समाज में लोकतंत्र का पोषक कैसे होगा. भारत के अधिकांश राजनीतिक दलों में परिवारवाद है, इसीलिए भारत के लोकतंत्र में वंशवाद का वर्चस्व है. यहाँ के अधिकांश राजनीतिक दल विचारधारा के आधार पर न संगठित होते हैं न चुनाव लड़ते हैं और न चुनाव में जीतकर सरकार बनाने के बाद काम करते हैं. वे लोकतंत्र के बदले दलतंत्र की स्थापना करते हैं. वादा खिलाफी भारतीय राजनीतिक दलों की जानी पहचानी विशेषता है.
     
भारतीय लोकतंत्र का एक दुश्मन भ्रष्टाचार है जो सर्वव्यापी है. यह भारतीय लोकतंत्र को ब्रिटिशराज से सत्ता हस्तांतरित होने के समय विरासत में मिला था. भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना और विस्तार का काम क्लाईव और वारेन हेस्टिंग्स ने घूस और भ्रष्टाचार के सहारे किया था, जिनका उपयोग और प्रयोग उनके उत्तराधिकारियों ने भी किया. स्वतंत्र भारत के शासक वर्ग ने अंग्रेजी राज से शासन करने की जो शिक्षा पाई उसमें भ्रष्टाचार भी शामिल था. भारत में भ्रष्टाचार की परंपरा अन्य अनेक परंपराओं की तरह बहुत पुरानी है. टी.जे.एस. जार्ज के अनुसार कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में चालीस प्रकार के भ्रष्टाचारों का उल्लेख किया है. मुगलकाल में बक्शिश के रूप में भ्रष्टाचार था. जिस समाज में ईश्वर को चढ़ावा के नाम पर घूस देकर प्रसन्न करने की प्रवृत्ति हो वहाँ शासन-प्रशासन में भ्रष्टाचार का होना आश्चर्यजनक नहीं है.
     
1965 में नागार्जुन ने एक कविता लिखी थी- भरत-भूमि में प्रजातंत्र का बुरा हाल है. इस कविता में नागार्जुन ने जिस दाम-राज की बात की है वह धन-राज ही है, जो भ्रष्टाचार से जुड़ा है. हाल के दशकों में भारत में पूँजीवाद के बेरोकटोक विस्तार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने के साथ लोकतंत्र के नाम पर जो लूट-तंत्र स्थापित हुआ है उसमें भ्रष्टाचार सर्वव्यापी हो गया है. उच्च टेक्ननोलोजी के साथ उच्च किस्म का भ्रष्टाचार बढ़ा है. देशभर में खनन उद्योग भ्रष्टाचार की खान बन गया है. वी.पी. माथुर ने ठीक ही लिखा है कि भ्रष्टाचार का भारतीय समाज पर गंभीर विनाशकारी असर पड़ा है, इसने जनता के नैतिक स्वभाव का नाश किया है. भ्रष्टाचार केवल समाज की सार सत्ता को खाने वाला घुन ही नहीं है, वह लोकतंत्र को नष्ट भ्रष्ट करने वाला रोग भी है. संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक समझौते का दस्तावेज तैयार किया था जिसको स्वीकार करने के समय सम्मेलन को संबोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्कालीन महामंत्री कोफी अन्नान ने कहा था कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र और कानून के शासन को कमजोर बनाता है, बाजार को विकृत करता है, जीवन की गुणवत्ता का नाश करता है, और मानवीय सुरक्षा के लिए खतरनाक संगठित अपराध तथा आतंकवाद को बढ़ावा देता है. भ्रष्टाचार का प्रसार शासन प्रणाली की असफलता का प्रमाण है. 2009 में ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल (पारदर्शी अंतर्राष्ट्रीयता) ने भ्रष्टाचार में लिप्त 185 देशों की एक तालिका तैयार की थी जिसमें भारत को 85वें स्थान पर रखा था. इस तरह भारत अनेक असफल राष्ट्रों के बीच में था.
     
ऐसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध जब अन्ना हजारे ने व्यापक अभियान चलाया, जो विशाल जन आंदोलन बन गया तब भ्रष्टाचार की गंभीरता को समझने, उसे लोकतंत्र और सामाजिक संरचना के लिए खतरा मानने के बदले केंद्र की सत्ता पर काबिज सरकार, उसके मंत्री और कांग्रेस पार्टी के नेता आत्मरक्षा में तरह-तरह के बयान देने, अन्ना पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने और उनके सहयोगियों को चुनौती और धमकी देने की कोशिश करने लगे, जिसे जनता ने भ्रष्टाचार की रक्षा का प्रयत्न समझा. अनेक विरोधी दलों के भ्रष्टाचार में डूबे नेताओं ने भी संसद की सर्वोच्चता का दावा करते हुए नागरिक समाज और आम जनता के आंदोलन की निंदा का अभियान चलाया. इस पूरी प्रक्रिया से यह सवाल सामने आया कि जनतंत्र में जनता की आकांक्षा अधिक महत्वपूर्ण है या उसके चुने हुए प्रतिनिधियों की संसद. आखिर संसद कितनी स्वतंत्र है ? क्या ईश्वर जितनी, जिसके बारे में तुलसीदास ने लिखा है-
                       
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई.            
भावहि मनहि करहु तुम सोई..

जनता की आकांक्षा की उपेक्षा जनतंत्र की उपेक्षा है जिसकी रक्षा ही सरकार और संसद का दायित्व है. अन्ना के आंदोलन के दौरान कार्यपालिका, विधायिका, संचार माध्यम और जन आंदोलन के संबंधों पर जो बहस हुई उनके बारे में सोचते हुए मुझे अल सल्वाडोर के कवि रोक डाल्टन की एक कविता याद आई. कविता का शीर्षक है- चोर बाजार में जनता की संपत्ति का बंटवारा. कविता यह हैः
उन्होंने हमें बताया कि पहली शक्ति है

कार्यपालिका शक्ति,
और विधायी शक्ति दूसरी शक्ति है
जिसे ठगों के एक गिरोह ने
सत्ता पक्षऔर विपक्षमें बांट रखा है,
और चरित्र भ्रष्ट हो चुका
(फिर भी माननीय) सुप्रीम कोर्ट
तीसरी शक्ति है.
अखबारों, रेडियो और टी.वी. ने खुद को
चैथी शक्ति का दर्जा दे रखा है और वाकई
वे बाकी तीनों शक्तियों के हाथ में हाथ डाले चलते हैं.
अब वे हमें यह भी बता रहे हैं कि
नई लहर वाले युवा पांचवी शक्ति है.
और वे हमें यह भी भरोसा दिलाते हैं कि
सभी चीजों और शक्तियों के ऊपर
ईश्वर की महान शक्ति है.
और अब चूंकि सभी शक्तियों का बंटवारा हो चुका है
...वे निष्कर्ष रूप में हमें बातते हैं
किसी और के लिए कोई शक्ति नहीं बची है
और अगर कोई कुछ और सोचता है
तो उसके लिए फौज और नेशनल गार्ड है.
::::::

बी-डी/8 ए
डी.डी.ए. फ्लैट्स
मुनिरका
 नई दिल्ली-110067,मो॰9868511770  

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  1. नमस्कार!
    बधाई,आप शतायु हों.
    बहुत दिनों से प्रजातंत्र, लोकतंत्र और जनतंत्र में अंतर जानना चाह रहा था. कई लोगों से पूछा, फेसबुक मित्रों से पूछा, उत्तर नहीं मिल पा रहा था. आज उत्तर मिला है.
    शुभकामनाओं सहित-

    जय प्रकाश पाठक
    देवरिया उ.प्र.

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  2. आदरणीय मैनेजर पांडेय हम सबके लिए महत्त्वपूर्ण आलोचक हैं।उनके विचार हमारे लिये पाथेय हैं।उनके जन्मदिन के अवसर पर उनके ही विचार प्रस्तुत कर अच्छा किया।

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  3. बहुत सुंदर विचार। वैसे भी आद. मैनेजर पांडेय जी को हमसब पढकर बडे हुए हैं। उनके जन्मदिन पर भला इससे बेहतर उपहार हम सबके लिए क्या हो सकता है।
    बहुत बहुत आभार

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  4. पाण्डे जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ! और इसके साथ उनके चिंतन से अपेक्षा और बढ़ जाती है क्योंकि अब उनके खाते में अनुभव का एक साल बढ़ गया है !

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  5. ‎"अनभै साँचा. निर्भय सच. सच कहने का साहस उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लिया है, आलोचना की व्यापक दृष्टि आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी से वही डॉ. रामविलास शर्मा से लोकतान्त्रिक भाषा और साम्राज्यवाद विरोधी समझ. वाग्मिता का ऐसा बेधक, दो दूक, सौंदर्य दुर्लभ है."आभार अरुण दा !

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  6. hamare prerna strot hai pandey ji, meri bhi hardik shubhkaamnayen

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  7. सार्थक जीवन के सत्तर वर्ष पूरे कर लेने पर बधाई . सुदीर्घ रचना-सक्रिय जीवन की शुभकामनाएं

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  8. मेरे प्रिय आलोचक/अध्यापक को उनके सत्तर वर्ष पुरे करने पर उनके साथ साथ पुरे हिंदी जगत को बधाई व शुभकामनाएँ. अरुण भय्या, आप समालोचन के माध्यम से जो बहुमूल्य काम कर रहे हैं, उसके लिए आपको सलाम. पाण्डेय जी और समालोचन, दोनों शतायूं हो, दीर्घायू हों. आमीन.

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  9. asli loktantr ki sthapna to tabhi hogi jab voting ko anivary kar diya jaayega.. loktantr prjatantr aur jantantr par jaankari deta ye ek mahtvpoorn lekh hai. abhaar

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  10. सत्य को एकदम उधेड़ कर रख दिया है।

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  11. Aadarniya Sir Ko Janam Din Ki Hardik Shubh Kamanayen. Lekh Padha... Samkaleen Hindi Aalochakon Ko Prof. Manager Pandey Se Seekhna Chahiye Ki Aalochana Ki Chinta Kya Hai Aur Dharma Kya? Sahi Samajh Aur Uchit Saahas Ke Bina Aalochana Ek Thothi Behas Ban Jaati Hai.. Jyadar Jagah Aaj Aisi Hi Behasen Dekhane Ko Milati Hain.

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  12. जीवन में अनभै साँचा और निर्भय सच का निर्वाह करने वाले आलोचक/अध्यापक आदरणीय प्रो. मैनेजर पाण्डेय को उनके सत्तर वर्ष पूरे होने पर आदर और हार्दिक शुभकामनाएं।

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  13. मैनेजर पांडेय जी हिंदी के वरिष्ठ आलोचक है और आज वे अपने जीवन के 70 साल पूरे कर रहे है। बहुत बधाई और शुभकामनाएं। अभी उनसे हिंदी साहित्य बहुत अपेक्षाएं है...
    उनके आलोचनात्मक लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह आमजन से जुड़कर पूर्णता पाता है। आलोचकीय दायित्व के प्रति वे हमेशा सचेत रहे है। अपने भाषणों में भी वे इसके प्रति सजग रहते है। उनकी भाषण कला हिंदी की प्रकृति को समझने की दृष्टि से काफी उल्लेखनीय है। हास्य और व्यंग्य मंम भी आलोचनात्मक प्रखरता और गंभीरता को बनाए रखना निश्चय ही मायने रखता है। तिस पर लोकोक्तियों, मुहावरों और सुक्तियों का सटीक प्रयोग उनकी वक्तव्य कला की जान है जिसके आगे सभी पानी भरते नजर आते है।

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  14. मैनेजर पांडेय जी ने हमें साहित्य को देखने की नई नजर दी है। उनकी दृष्टि में कविता वह है जो संकट के समय लोगों के काम आए। जनता के लिए, जनता के बारे में और जनता की भाषा में बात करे। अपने लेखन में वे हमेशा लोकभाषा और लोकसंस्कृति के लिए संघर्षरत रहे है। साहित्य ही नहीं सिनेमा में भी उन्होंने कुछ गंभीर स्थापनाएं दी है। भोजपुरी सिनेमा को वे धोखाधड़ी की दुनिया कहते है। अपनी आलोचना में उन्होंने साहित्य को समाजविज्ञान के और समाजविज्ञान को साहित्य के करीब लाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।

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  15. आदरणीय पांडेय ने भारत की parliamentary democracy को सार-सार को गहि रहै अंदाज में पकड़ा है। यह एक वरिष्ठ बुद्धिजीवी द्वारा सत्ता के संदर्भ में राजव्यवस्था की पड़ताल तो है लेकिन इसे समझने के लिए जिस social pathology की जरूरत है वह इस विश्लेषण से गायब है। इसमें भ्रष्टाचार से भिड़ंत के अन्ना मॉडल का प्रच्छन्न समर्थन है जब कि उस पर पुनर्विचार किया जा सकता है। क्या एक जनतंत्र की संसद को स्वतंत्र होने के लिए उसका एक ईश्वरीय संस्था होना ही जरूरी है?

    संविधान पढ़ने वाले जानते हैं कि विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका में से कोई भी परम स्वतंत्र नहीं है। Montesquieu के सिद्धांतों के अनुसार उनमें एक संतुलित अंतरावलंबन है। वे एक Check-Balance Framework में बँधे हैं। व्यवहार में विचलन और अपवाद होते हैं जिनके आधार पर लोकतंत्र की आलोचना करना वैसे ही है जैसे सोवियत संघ के विघटन और कुछ पूर्वी यूरोपीय देशों में साम्यवादी शासनों के पतन का तर्क देकर पूरी मार्क्सवादी विचारधारा को अप्रासंगिक करार देना है।

    क्या यह अपेक्षित नहीं है कि भ्रष्टाचार पर बहस को और सघन, और broad-based बनाया जाए। पांडेय जी की पोलिटिकल पार्टियों को वंशवाद और परिवारवाद के चंगुल से छुड़ाने की बात ठीक है। संभव हो तो चुने हुए प्रतिनिधियों को रिकाल करने से भी किसी को कोई गुरेज नहीं है,लेकिन हर बार यह देखना जरूर होगा कि लोगों का जो mobilization है वह क्या सचमुच कोई mass-mobilization है या वह मार्क्सवादी शब्दावली में कहें तो अधिरचना संचालित-प्रेरित या media-hyped कोई कवायद तो नहीं। हर बार देखना होगा कि संविधान और संसद की सर्वोच्चता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने वाले लोग कौन हैं? उनके पास polity को ठीक करने से पहले society की मरम्मत करने वाला प्रथमदृष्टया कोई संवेदनशील सपना क्यों नहीं है?

    पांडेय जी का आज जन्मदिन है। वे शतायु हों। स्वस्थ रहें और ऐसे ही बौद्धिक स्तर पर जीवंत भी।

    अरुण जी आपको इसलिए बधाई कि आप “समालोचन” को साहित्य के साथ युग की वैचारिकी का वाहक बना रहे हैं...

    जवाब देंहटाएं
  16. भारत में जनतंत्र और पूंजीवादी संसदीय प्रजातंत्र की पड़ताल करता लेख .
    गौरतलब है कि जितना बड़ा प्रजातंत्र , उतने ही अधिक भ्रष्टाचार की सम्भावना ..
    २००५ में UN Convention against Corruption सामने आता है , पर बिना समाधान देते हुए .
    यदि हम सामाजिक और आर्थिक संरचना को देखते हुए विश्लेषण करें तो पायेंगे कि किसी भी प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में यदि resources कम हैं और मांग अधिक है तो एक असंतुलन पैदा होता है , जिससे असंतोष और बाद को भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है . भ्रष्टाचार न केवल आर्थिक और सामाजिक स्थितियों के रहते फैलता है वरन ये एक मनोवैज्ञानिक स्थिति भी है . स्वार्थ , लोलुपता , सुख और अस्त्तित्व का भय भी इसके मूल में है .

    प्रजातंत्र +पूंजीवाद = असमानता
    असमानता से विपर्यय पैदा होता है और have nots का संघर्ष, शोषण व घुटन दिखाई देती है .
    लेख भारत में जनतंत्र की अच्छी पड़ताल करता है और अंत में एक बहुत सटीक सवाल सामने रखते हुए : आखिर संसद कितनी स्वतंत्र है ? क्या ईश्वर जितनी....अपनी बात को निर्भीक होकर कहता ..

    जन्मदिन की शुभकामनाओं के साथ ..
    अरुण , समालोचन साहित्य के साथ आज की विचारधारा का भी वाहक बन रहा है . बधाई !

    जवाब देंहटाएं
  17. subicharit aalekh. pandey jee ne sukshma vishleshan ke sath padtal kiya hai. pandey jee ke shatayu hone ke sath sath aapko bhi badhaee aise suvicharit aalekh padhvane ke liye.

    जवाब देंहटाएं
  18. मैनेजर पांडे जी को जन्मदिन की बधाई। और जन्मदिन के बहाने एक महत्वपूर्ण आलोचक के जीवन और लेखन को लेकर बेहतर आयोजन-संयोजन के लिए आपको भी बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  19. एक बार पुनः पढ़वाने के लिए शुक्रिया ़

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  20. जनतंत्र को लेकर जनता की समझ परिपक्व हुई है। इसमें बौद्धिक अवदान है, कोई शक नहीं; किन्तु आम-जनमानस अकादमिक बौद्धिकों के भरोसे कतई नहीं है। (उत्तर)आधुनिक भारतीय अकादमिक संस्थानों के भीतर बौद्धिक आवेग, संवेग, विचार, दृष्टि में एकरूपीय रंगरोगन है, बेचेनमना हृदय कतई नहीं। वे जनता के बारे में जानते हैं लेकिन बिना जुड़े, उनसे बिना बोले-बतियाए। उनमें ‘प्रकाश-संश्लेषण’ माफ़िक कुदरती समग्रता नहीं है। बौद्धिक लेखनी में एक धार, प्रवाह, अर्थ, लिपि, वाक्य, पद, शब्द, वर्ण सबकुछ रहते हुए भी जन-सम्प्रेषण का भाव नदारद है। खुलापन के नाम पर ‘एग्जिट’ लिखे हाॅलनुमा दरवाजे हैं जिसके भीतर उखाड़-पछाड़ की तर्ज पर भौवें हिलती-डुलती हैं, भुजाएँ फड़कती हैं, तो भाषा के विभोरी दरजे तक गर्जन-तर्जन होता है।

    मैनेजर पाण्डेय, इस कार्रवाई में ‘मैनेज’ नहीं होते है....यह कहाँ लिखा है। यह करतब भी समर्थ आलोचक के स्तर से देखें, तो एक भ्रष्टाचार है जिनकी विचारों में जनतंत्र का पक्ष है लेकिन जरूरी पहलू अब भी गायब है।

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  21. आपके लेख और वाचन से मैं बहुत सहमत और प्रभावित हूँ ।मैं राजनीति का छात्र हूँ ।

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