सरमद और कृष्ण कल्पित की कविता : शंभु गुप्त


(Sarmad Shahid : painting by Sadequain)



‘मंसूर की ख़ता न थी साकी ने सब किया
इतनी कड़ी पिला दी कि दीवाना कर दिया.’

दीवाने चुनौती पेश करते रहते हैं, कभी मंसूर की शक्ल में तो कभी सरमद बन कर. कभी वे ‘अनल-हक़’ कहते हैं कभी ‘लाइलाहा’. उनका कत्ल किया गया पर वे मिटे नहीं. उन्हें गीतों में याद किया जाता है, कविताओं में रचा जाता है. कृष्ण कल्पित की सरमद पर लम्बी कविता है- ‘जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक नंगे-फ़क़ीर के क़त्ल की दास्तान’.
यह कविता और इस पर वरिष्ठ  आलोचक शम्भु गुप्त का आलेख- 'एक-दूसरे में समाती दो रूहें', यहाँ प्रस्तुत है.



स र म द                                                   
(जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक नंगे-फ़क़ीर के क़त्ल की दास्तान)

कृष्ण कल्पित




उम्रेस्त कि आवाज़-ए-मंसूर कुहन शुद
मन अज़ सरे नो जलवा देहम दारो रसनरा !

(मंसूर की प्रसिद्धि पुरानी हो गई. मैं सूली पर चढ़ने का दृश्य नये सिरे से पैदा करता हूँ.)
                           
(१)

आप इतने बड़े विद्वान हैं, फिर भी नंगे क्यों रहते हैं ?

दिल्ली के शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी के सवाल के जवाब में सरमद ने कहा :
शैतान बलवान (क़वी) है !

शहर क़ाज़ी को लगा कि सरमद उसे शैतान कह रहा है. मुल्ला की भृकुटियाँ तन ही रही थी कि सरमद ने फिर कहा :
एक अजीब चोर ने मुझे नंगा कर दिया है !

                     
(२)

शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी को आलमगीर औरंगज़ेब ने सरमद के पास भेजा था- उसकी नग्नता का रहस्य जानने के लिये. औरंगज़ेब शाहजहाँ के बाद दारा शिकोह को ठिकाने लगाकर बादशाह बना था. औरंगज़ेब जानता था कि दारा शिकोह सरमद की संगत में था और उसके बादशाह बनने की भविष्यवाणी सरमद ने की थी.

औरंगज़ेब के दिल में सरमद को लेकर गश था- वह उसे भी दारा शिकोह की तरह ठिकाने लगाना चाहता था लेकिन कोई उचित बहाना नहीं मिल रहा था. औरंगज़ेब जानता था कि बिना किसी वाजिब वजह के सरमद का क़त्ल करने से उसे चाहने वाले भड़क सकते थे- जिनकी सँख्या अनगिनत थी.

औरंगज़ेब क़ातिल होने के साथ धर्मपरायण भी था और बादशाह होने के बावजूद टोपियाँ सिलकर अपना जीवन-यापन करता था.

                           
(३)
क़ाज़ी मुल्ला क़वी ने दरबार में उपस्थित होकर सरमद का हाल सुनाया और सरमद की मौत का फ़तवा जारी करने के लिये क़लमदान का ढक्कन खोल ही रहा था कि औरंगज़ेब ने उसे इशारे से रोक दिया और कहा :
नग्नता किसी की मौत का कारण नहीं हो सकती.

औरंगज़ेब जितना अन्यायप्रिय था उतना ही न्यायप्रिय भी था !



(४)
तब आलमगीर ने अन्याय को न्याय साबित करने के लिये धर्माचार्यों की सभा आहूत की. सरमद को भी बुलवाया गया.

सर्वप्रथम औरंगज़ेब ने सरमद से पूछा :
सरमद, क्या यह सच है कि तुमने दारा शिकोह के बादशाह बनने की भविष्यवाणी की थी ?

सरमद ने स्वीकृति में सर हिलाया और कहा :
मेरी भविष्यवाणी सच साबित हुई. दारा शिकोह अब समूचे ब्रह्मांड का बादशाह है.

इसके बाद धर्मसभा के अध्यक्ष सिद्ध-सूफ़ी ख़लीफ़ा इब्राहिम बदख़्शानी ने सरमद से उसकी नग्नता का कारण पूछा. सरमद ख़ामोश रहा. फिर पूछा गया तो सरमद ने वही जवाब दिया जो उसने शहर क़ाज़ी को दिया था :
एक अजीब चोर है जिसने मुझे नंगा कर दिया !

तब ख़लीफ़ा ने सरमद को इस्लाम के मूल सूत्र कलमाये तैयब (लाइलाहा इल्लल्लाह अर्थात कोई नहीं अल्लाह के सिवा) पढ़ने के लिये कहा.

सरमद के विरुद्ध यह भी शिकायत थी कि वह जब भी कलमा पढ़ता है, अधूरा पढ़ता है. अपनी आदत के अनुसार सरमद ने पढ़ा :
लाइलाहा.

सरमद को जब आगे पढ़ने को कहा गया तो सरमद ने कहा कि मैं अभी यहीं तक पहुँचा हूँ कि कोई नहीं है. आगे पढूँगा तो वह झूठ होगा कयोंकि आगे के हर्फ़ अभी मेरे दिल में नहीं पहुँचे हैं. सरमद ने दृढ़ शब्दों में कहा कि मैं झूठ नहीं बोल सकता.

बादशाह औरंगज़ेब, धर्मसभा के अध्यक्ष ख़लीफ़ा बदख़्शानी, शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी के साथ समूची धर्मसभा और पूरा दरबार सरमद का जवाब सुनकर सकते में था. ख़लीफ़ा ने कहा :
यह सरासर इस्लाम की अवमानना है, कुफ़्र है. अगर सरमद तौबा न करे, क्षमा न मांगे तो इसे मृत्युदंड दिया जाये.


(Sarmad and Dara Shikoh in a 17th-century manuscript, courtesy The Walters Art Museum)


                            
(५)
जब सरमद ने तौबा नहीं की क्षमा माँगने से इंकार कर दिया तो धर्माचार्यों की सभा और बादशाह की सहमति से शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी ने क़लमदान का ढक्कन खोला, उसमें क़लम की नोक डुबोई और काग़ज़ पर सरमद के मृत्युदंड का फ़रमान लिख दिया.

अपनी मौत का फ़रमान सुनकर सरमद को लगा जैसे वह बारिश की फुहारों का संगीत सुन रहा है. वह भीतर से भीग रहा था जैसे उसकी फ़रियाद सुन ली गई है जैसे उसे अपनी मंज़िल प्राप्त हो गई है.

सरमद अब कुफ़्र और ईमान के परे चला गया था. सरमद ने सोचा :
कितने फटे-पुराने वस्त्रों वाले साधु-फ़क़ीर गुज़र गये- अब मेरी बारी है.



                             
(६)
सरमद, तू पूरी दुनिया में अपने नेक कामों के नाते जाना जाता है. तूने कुफ़्र को छोड़कर इस्लाम धारण किया. तुझे ख़ुदा के काम में क्या कमी नज़र आई जो अब तुम राम नाम की माला जपने लगा !

सरमद को अपनी ही रुबाई याद आई और अपना पूरा जीवन आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूमने लगा.

पहले अरमानी-यहूदी, फिर मुस्लिम और अब हिन्दू !

सरमद जब अरब से हिंदुस्तान की तरफ़ चला था तो वह एक धनी सौदागर था. उसे वह लड़का याद आया, जिससे सिंध के ठट्टा नामक क़स्बे में उसकी आँख लड़ गई थी. इस अलौकिक मोहब्बत में उसने अपनी सारी दौलत उड़ा दी. सरमद दीवानगी में चलते हुये जब दिल्ली की देहरी में घुसा तो एक नंगा फ़क़ीर था.

उसे वे धूल भरे रास्ते याद आये , जिस से चलकर वह यहाँ पहुँचा था.

और सरमद को उस हिन्दू ज्योतिषी की याद आई जिसने उसकी हस्त-रेखाएँ देखकर यह पहेलीनुमा भविष्यवाणी की थी :
तुम्हारे मज़हब के तीसरे घर में मृत्यु बैठी हुई है !



                            
(७)
अगले दिन सरमद को क़त्ल करने के लिये जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर ले जाया गया, जहाँ इतनी भीड़ थी कि पाँव धरने की जगह नहीं थी. कुछ तमाशा देखने तो अधिकतर अपने प्रिय सरमद की मौत पर आँसू बहाने आये थे.

जामा मस्जिद की सबसे ऊँची सीढ़ी पर खड़े होकर सरमद ने यह शे'र पढ़ा :
शोरे शुद व अज़ ख़्वाबे अदम चश्म कशुदेम
दी देम कि बाकीस्त शबे फ़ितना गुनूदेम !
(एक शोर उठा और हमने ख़्वाबे-अदम से आँखें खोलीं तो देखा- कुटिल-रात्रि अभी शेष है और हम चिर-निद्रा के प्रभाव में हैं.)

इसके बाद अपनी गर्दन को जल्लाद के सामने झुकाकर सरमद फुसफुसाया :
आओ, तुम जिस भी रास्ते से आओगे, मैं तुझे पहचान लूँगा !



                            
(८)
सरमद का कटा हुआ सर जामा मस्जिद की सीढ़ियों से नृत्य करता हुआ लुढ़कता रहा.

सरमद के कटे हुये सर को उसके पीर हरे भरे शाह ने अपने आगोश में ले लिया. पवन पवन में मिल गई- जैसे कोई विप्लव थम गया हो !


                             
(९)
मुस्लिम इतिहासकार वाला दागिस्तानी ने अपनी किताब में लिखा है कि वहाँ उपस्थित लोगों का कहना था कि जामा मस्जिद की सीढ़ियों से ज़मीन तक पहुँचते हुये सरमद के कटे हुये सर से यह आवाज़ निकलती रही :
ईल्लल्लाह   ईल्लल्लाह  ईल्लल्लाह

और यह भी प्रवाद है कि सरमद के कटे हुये सर से बहते हुये लहू ने जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर जो इबारत लिखी गई उसे इस तरह पढा जा सकता था :
लाइलाहा  लाइलाहा लाइलाहा !


(१०)
इतिहास की किताबों में सरमद शहीद का ज़िक़्र मुश्किल से मिलता है लेकिन जामा मस्जिद के सामने बने सरमद के मज़ार पर आज भी उसके चाहने वालों की भीड़ लगी रहती है. यह जुड़वाँ मज़ार है. हरे भरे शाह और शहीद सरमद के मज़ार.

हरे भरे शाह और सरमद. जैसे निज़ामुद्दीन औलिया और अमीर ख़ुसरो. पीरो-मुरीद. एक हरा. एक लाल.

इन के बीच नीम का एक घेर-घुमावदार, पुराना वृक्ष है जिससे सारे साल इन जुड़वाँ क़ब्रों पर नीम की निम्बोलियाँ टपकती रहती हैं.

और जब दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी से राष्ट्रपति-भवन के मुग़ल-गॉर्डन के फूल मुरझाने और घास पीली पड़ने लगती है तब भी सरमद के मज़ार के आसपास हरियाली कम नहीं होती. सरमद की क़ब्र के चारों तरफ़ फूल खिले रहते हैं और घास हरी-भरी रहती है !


                         
(११)
ख़ूने कि इश्क़ रेज़द हरगिज़ न बाशद
(इश्क़ में जो ख़ून बहता है वह कदापि व्यर्थ नहीं जाता !)

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(by Vinod Bharadwaj)



एक-दूसरे में समाती दो रूहें                         
(सन्दर्भ : सरमद : जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक नंगे-फ़क़ीर के क़त्ल की दास्तान)
                                                                                          
शंभु गुप्त



कृष्ण कल्पित की ग्यारह खण्डों की १०० पंक्तियों की यह लगभग लम्बी कविता आज के हिन्दी के आदाब बजा लाने वाले आपा-धापी भरे साहित्योत्सव-धर्मी माहौल में एक तनकर सीधे खड़े होने का अक्स मुहैया कराते हुए लगभग एक नज़ीर बनकर उभरती दिखाई देती है. कृष्ण कल्पित ने अपने काव्य-सृजन से पिछले दिनों लगातार चौंकाया है. धीरे-धीरे साफ़ हुआ कि इस कवि को लेकर चौंकने की नहीं, बल्कि इसके मार्फ़त इतिहास, संस्कृति, सामाजिक सम्बन्धों, सौन्दर्यशास्त्र इत्यादि का नए सिरे से पुनरवलोकन किए जाने की ज़रूरत है. फ़ेसबुक के खुले मैदान को दृष्टि-सम्पन्न बनाने वालों में वे अव्वल रहे हैं. यह कविता भी सबसे पहले वहीं आई और सबका ध्यान खींचा. ज़्यादातर वे सनसनी से शुरू करते हैं पर बात जब अपने ऊरूज़ पर पहुँचती है तो किसी अंतःस्रोत की तरह प्रतिरोध का झरना पग-पग से फूटता चलता दिखाई देने लगता है. यह सिर्फ़ इस कविता की नहीं, उनके इधर के ज़्यादातर लेखन की पहचान है. वे जैसे एक नई दुनिया हमारे सामने खोल देते हैं और ठसके से एक चुनौती फेंकते हैं कि लो, सँभल सको तो सँभलो! …एक बेचैन कवि की यह भी एक मूलभूत पहचान है ही तो सही!
     
यह कविता ‘सरमद : जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक नंगे-फ़क़ीर के क़त्ल की दास्तान’; एक कविता है या नहीं; इस पर बहस हो सकती है. लोग नाक-भौं सिकोड़ेंगे शायद इसीलिए कवि ने उसे अथवा लगाकर ‘काव्याख्यान’ भी कह दिया है. लेकिन विधाओं के भारी परस्परान्वय और अंतर्विलय के इस वैश्विक ज़माने में विधा की अस्पृश्यता की बात करना एक प्रकार का शुद्धतावाद ही कहा जाएगा, जो शातिर दुराग्रहों से भरा ही होता है. कृष्ण कल्पित एक नई तरह की विधागत संश्लिष्टता के प्रवाचक के तौर पर अरसे से सक्रिय हैं, यह बात ध्यान में रखे जाने योग्य है.

जहाँ तक इस कविता की बात है तो परम्पराप्रेमियों को यह बता देना काफी होगा कि अमूमन जिसे ‘कविता की आन्तरिक लय’ कहा जाता है, वह इस कथित काव्याख्यान की असली जान है, जो हर पाठक के दिल में बसती है. दस दरवाज़ों को पारकर ग्यारहवें की देहरी पर हमें जो यह लिखा मिलता है कि ‘ख़ूने कि इश्क़ रेज़द हरगिज़ न बाशद’ (इश्क़ में जो ख़ून बहता है वह कदापि व्यर्थ नहीं जाता!); वह इस सारे काव्य-श्रम का निचोड़ कहा जा सकता है, हालाँकि इश्क़ में ख़ून बहने की नौबत तभी आती है, जब सत्ताएँ उसके बीच रास्ते में आ जाती हैं और उसे अपने हिसाब से हाँकने की कोशिश करती हैं. ख़ून बहने की नौबत दरअसल तब आती है, जब प्रेम के दीवाने सत्ता के दखल की परवाह न करते हुए अपनी राह बदस्तूर चलते जाते हैं और न केवल चलते जाते हैं; सत्ता को ठेंगा भी दिखाते जाते हैं कि कर लो, जो करना है; हम तो ऐसे ही चलेंगे! यहाँ देखने वाली बात यह है कि प्रेम-दीवाने तो लगभग सब-कुछ से बेख़बर अपनी धुन में बिना आगा-पीछा देखे चलते जाते हैं, उन्हें सत्ता से ज़्यादा कोई वास्ता रहता भी नहीं है पर इन सत्ताओं का क्या किया जाए, जो इसे अपने लिए एक चुनौती समझती हैं और उन्हें लगता है कि उन्हें सेटा नहीं जा रहा है!
     
बात हालाँकि मात्र इतनी भी नहीं है. बात असल में यह है कि इन सत्ताओं को लगता है कि लोग उसके अनुसार; उसकी बनाई लीक, उसके बनाए नियमों, उसकी विचारधारा, उसके सोच, व्यवस्था, व्यवहार के अनुसार; नहीं चल रहे हैं, लोग अपने हिसाब से जीवन जी रहे हैं, हमारी अपेक्षानुसार उनकी जीवन-चर्या नहीं है; यह सरासर मनमानापन है, स्थापना की अवहेलना है, व्यवस्था का विरोध है. यह सह्य नहीं है! सत्ताओं का यह सर्वसत्तावाद असल मसला है. प्रेम जैसे मामले में ख़ून का क्या काम? लेकिन जब सत्ता इसी बात पर आमादा हो कि अगला जिए तो हमारे हिसाब से, वरना तो उसे जीने का हक़ ही नहीं; तो ख़ून बहना लाज़िमी हो जाता है. सत्ता इसका एक विकल्प भी देती है कि यदि आप ख़ून नहीं बहाना चाहते तो हमारे साथ समायोजन/समझौता कर लो और हमारी शर्तों के अधीन हो आओ! लेकिन सरमद जैसे कुछ सिरफिरे नंगे-फ़क़ीर होते हैं, जो फिर भी नहीं मानते और अपनी ज़िद पर अड़े रहते हैं!


(दो)
कृष्ण कल्पित ने लिखा है कि वे दो महीने से इस मुश्किल कविता में लगे थे. सामग्री इतनी ज़्यादा थी कि उसमें फँस के रह गए! दरअसल फँस के रहे नहीं; सकुशल और सशक्त होकर बाहर निकल आए और अकेले नहीं, झोली-भर हीरे-मोती, जवाहरातों के साथ कि समेटो, जो जितना समेट सके! ये हीरे-मोती, जवाहरात ही तो हैं, जो इस कविता को इतना क़ीमती बनाते हैं.
     
मित्रो! ये हीरे-मोती, जवाहरात हैं, प्रतिरोध और संघर्ष और निडरता और निर्लोभ और असमायोजन और सत्य-भाषण और बेबाक़ी और अपनी आज़ादी को हर हाल में बनाए-बचाए रखना और सचेतनता और अपने स्टैंड पर अडिग रहना और तार्किकता और साधारणता और आत्मसम्मान...., तो वे चीजें हैं, जो पाठक से ताल्लुक रखती हैं.
     
लेखक और उसकी रचना-प्रक्रिया से ताल्लुक रखने वाली चीजों की फ़ेहरिस्त तो बहुत ही बेमिसाल और दूरगामी है. इनकी सूची यह हो सकती है- एक आत्मसंघर्षपूर्ण और बेतरह ख़राद पर चढ़ाकर आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे सब तरफ़ से परखी और बरती गई बेलाग इतिहास-दृष्टि, अतीत और वर्तमान दोनों को एक-दूसरे को आईना दिखाना, इतिहास से सबक़ न सीखने वाले समाजों की स्थिति का अंतरीक्षण, शाहे-वक़्त की सही-सही पहचान, ऐतिहासिक घटनाओं/परिघटनाओं पर सामान्य लोकमत की तलाश, यथार्थ के प्रति झोली-फटकार अभावुक रवैया, इतिहास के बीहड़ की अंदरूनी खँगाल, तार्किक जीवन-दृष्टि और मूल्यबद्धता ....
     
पाठक और लेखक के इस द्वन्द्वात्मक सहमेल से जो तीसरी चीज निकली है, वह सबसे अनमोल है. वह चीज है, अपनी समकालीन राजनीति, राज्य का चरित्र, मौज़ूदा समय की दुशवारियाँ, सत्ताधारियों के सर्वसत्तावादी मंसूबे, समय की बौद्धिकता (इंटलेक्ट) पर छाए संकट के बादल, व्यक्ति की सोचने और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर मँड़राते भीषण ख़तरे, धर्म/धार्मिक कूढ़मगज़ी का भयावह पुनरुत्थान, हिंसा/हत्या का राजनीतिक इस्तेमाल, विकल्प या विमत का दमन, उसे नेस्तनाबूद करने के लिए राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, न्यायिक संस्थाओं का इस्तेमाल और उन संस्थाओं का सत्तावादी ध्रुवीकरण; इन सब जलते-उबलते समसामयिक मुद्दों पर गहन अन्तर्दृष्टिपूर्ण विचार और विमर्श और एक रचनाकार और एक व्यक्ति के बतौर न्याय का पक्ष-ग्रहण और उसके प्रति अटूट, अपनी ओर से आत्मसात की गई प्रतिबद्धता! एक व्यक्ति और कवि के बतौर कृष्ण कल्पित द्वारा अपने लिए की गई यह ‘कमाई’ अद्भुत है और आज के बेहद संक्रमित समय में बहुत दुर्लभ है. 


(सीरज सक्सेना की कृति)
     

आज का कोई कवि इतिहास को इतने मौजूँ तरीक़े से पुनराख्यायित/पुनरुत्पादित/पुनर्प्रासंगिक बना सकता है; कृष्ण कल्पित के रूप में यह सुखद आश्चर्य यहाँ हम देखते हैं. सत्रहवीं शताब्दी का सरमद का बेरहम दु:खान्त तो इस काव्याख्यान का मूल विषय है ही; कृष्ण कल्पित उससे भी सात सौ-आठ सौ साल पहले के ‘अन अल हक़’ की उद्घोषणा करने वाले मंसूर अल हल्लाज के बग़दाद में सरे-आम निर्मम यंत्रणाओं के बाद टिगरिस नदी के किनारे सर क़लम किए जाने के वाक़ये तक हमें ले जाते हैं और वह भी इतने संक्षेप में, इस कुशलता के साथ कि किसी काव्य-कौशल की ज़रूरत ही नहीं रह जाती-

“मंसूर की प्रसिद्धि पुरानी हो गई. मैं सूली पर चढ़ने का दृश्य नये सिरे से पैदा करता हूँ.”

किसी कवि के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि किसी के सूली पर चढ़ने का दृश्य उसे पुनर्रचित करना पड़े; लेकिन जब यथार्थ वास्तविकताएँ इतनी बेहूदा हों और लगातार योजनाबद्ध तरीक़े से अंज़ाम दी जा रही हों कि इतिहास ख़ुद को दुहराता है, यह तथ्य भी एक पैरोड़ी नज़र आने लगे तो कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही पड़ता है. इतिहास ख़ुद ब ख़ुद अपने को कभी नहीं दुहराता. इतिहास अपने को दुहराता है, यह इतिहास-दृष्टि उन आततायी शासकों, राष्ट्राध्यक्षों इत्यादि की कारस्तानियों को हल्का कर देती है, जो अपने से असहमत लोगों पर राज्य की संस्थाओं का सहारा लेकर ज़ुल्म ढाती हैं, उन्हें नेस्तनाबूद करने में कोई क़सर नहीं छोड़तीं. अपने-आप को इतिहास नहीं, राज्य दुहराता है, राज्य के सर्वसत्तावादी अहम्मन्य मुखिया दुहराते हैं, समयों के अंतरालों में वे पुनरुत्थित/पुनरवतरित होते हैं; कृष्ण कल्पित की इस लम्बी कविता का पहला बड़ा अभिप्राय यह है! ....मंसूर अल हल्लाज > सरमद> गोविन्द पानसरे, दाभोलकर, कालबुर्गी, गौरी लंकेश....! …हम सब जानते हैं, यह सिलसिला अभी जारी है और न जाने कब तक जारी रहेगा! इन कुछ नामों के अनुक्रम में वे कुछ नाम भी शामिल किए जा सकते हैं, जो क़त्ल किए जाने के प्रोसेस में हैं; जो झूठे और पूर्व-आकलित मुक़द्दमों में जेलों में डाल दिए गए हैं, जिन्हें डिजिटली और फिजिकली लगातार ट्रोल किया जा रहा है, जो लिंच किए जा चुके हैं या किए जा रहे हैं…!
     
इसलिए यह न समझा जाए कि कवि इतिहास पर केन्द्रित है, उसे दुहरा रहा है; कवि सोलहों आने अपने समकालीन राज्य और राजनीति पर केन्द्रित है; इतिहास से सिर्फ़ प्रमाण जुटा रहा है कि देखो, यह है, हमारे महान भारत देश की राज्य/राजनैतिक परम्परा; कि तुम उसकी शान में कोई ‘गुश्ताख़ी’ करके तो दिखाओ! राज्य/राजनीति की हमारी लम्बी परम्परा में बाक़ायदा इसके पुख्ता इन्तज़ामात हैं! यह कविता हमारी इस ‘समृद्ध’ राजनीतिक परम्परा की प्रामाणिक खोज करती है; यह इसकी दूसरी बड़ी उपलब्धि है.
     
इसकी तीसरी बड़ी उपलब्धि है, बिना किसी को कोई भला-बुरा कहे, बिना कोई उत्तेजना फैलाए, बिना कोई दार्शनिकता झाडे; लगभग उतने ही ठंढे और कूटनीतिक तरीक़े से जैसे शहर क़ाज़ी मुल्ला क़वी बादशाह की सहमति से क़लमदान का पहले ढक्कन खोलता है, फिर क़लम की नोक उसमें डुबोता है और फिर काग़ज़ पर सरमद के मृत्युदण्ड का फ़रमान लिखता है! कवि ने जिस स्लो-मोशन में यह दृश्य अंकित किया है, वह प्रविधि राज्य की उस ठंढी हिंस्र क्रूरता को मूर्तिमान कर देता है, जिसने उसे एक संस्था की जगह एक गिरोह में तब्दील कर दिया है.

कविता यह स्थापित और संप्रेषित करने में पर्याप्त सफल रही है कि एक संस्था की जगह एक गिरोह में बदल जाने की राज्य की यह फ़ितरत हमारे इतिहास की एक ऐसी भयावह सच्चाई है, जो, जैसे ही स्थितियाँ उसे अपने अनुकूल दिखाई देती हैं, अपनी क़ब्र से वह निकल आती है और एक नया रूप धर कर सक्रिय हो जाती है; लगभग उसी चरित्र और गुणों के साथ, जो अब तक इसके रहते आए हैं! केवल धज बदलती है, कलेजा वही रहता है! पहले राजशाही थी तो बादशाह की ‘सहमति’ सीधे-सीधे थी, उसमें किसी के ‘डिसेंट नोट’ की गुंजाइश नहीं थी; आज हमारी सत्तर-साला जनतान्त्रिक राज्य-प्रणाली में असहमति की ढेरों प्रविधियाँ हैं लेकिन देखने में आ रहा है कि सर्वसत्तावादी राजनीतिक प्रबन्धन ने लगभग सब की सब हज़म कर ली हैं. मौज़ूदा सर्वसत्तावादी राजनीतिक ऑपरेशन किसी मायावी क्रिएचर की सांघातिक लीलाओं की तरह जारी है, जहाँ सारी राजनीति जैसे एक ‘ब्लैक होल’ में समाती जा रही है. मैंने कहा कि कवि एकदम ठंढे और अनलाउड तरीक़े से अपनी बात कहता है. लेकिन आप कवि की एक ऐसी मुद्रा की कल्पना करें जो अपने ऊपरी ‘निष्कंप’ में भी भीतर धधकते अनगिनत ज्वालामुखियों का आभास करती चलती है! सरमद जैसे चरित्र को उठाना और उसे नितांत मौजूँ बना देना और इस तरह से कि सब-कुछ आईने की तरह साफ़ होता चले और हम अपने समय की विकरालता को मूर्तिमान रूप में खड़ा देख पाएँ; यह कोई हँसी-ठट्ठा नहीं! इसके लिए ज्ञान के साथ-साथ गहरी जनप्रतिबद्धता भी चाहिए!



(तीन)
सरमद के आख्यान सम्बन्धी जो सामग्री मिलती है, उसमें अन्य के अलावा मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का लिखा लेख (Votary of Freedom) सबसे काम का है. इस लेख में अपनी तेईस साल की उम्र में आज से कोई एक सौ आठ साल पहले मौलाना आज़ाद ने सरमद के बारे में जो कुछ लिखा, वह उस समय चाहे जितना ज़रूरी रहा हो, आज द्वन्द्वात्मक रूप से वह कई गुना प्रासंगिक हो गया है. उस समय औपनिवेशिक राज्य-सत्ता थी, उसकी अपनी धर्म/सम्प्रदाय-आधारित गृह-नीति थी, उसे अपना वर्चस्व बनाए रखना था, कथित प्रगतिशीलता के आवरण में उसने दक़ियानूसी, परंपरावाद को ख़ूब बढ़ावा दिया, लोगों को बाँटा और एक-दूसरे से लड़ाकर ख़ुद मुड्ड बन उनकी कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाया; क्या दक्षिणपंथी सरकार के राज्य तले आज फिर वही परिदृश्य आ खड़ा हुआ है? अबुल कलाम आज़ाद को उस समय अपने समय के सवालों के जवाब के रूप में सरमद शहीद याद आया और आज हिन्दी के एक वरिष्ठ हरफ़नमौला कवि को भी वही ज़रूरी महसूस हुआ!
     
अबुल कलाम आज़ाद का सरमद को याद करने का जो आधार उस समय था, आज एक शताब्दी बाद हमारे कवि के लिए भी वही बना हुआ है; क्या इसके कुछ निहितार्थ नहीं हैं? मेरा ख़याल है कि इन्हीं निहितार्थों को समझने की प्रक्रिया में यह कविता लिखी गई है.
     
अबुल कलाम आज़ाद ने अपने लेख में जो सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया था, वह था- व्यक्ति की सोचने और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता. 

    
दूसरा मुद्दा उठाया था- धर्म तथा अन्य समस्त प्रकार की एकता और अभेद. सरमद जन्म से यहूदी था, फिर मुसलमान हुआ, फिर हिन्दू. इसका अर्थ यह हुआ कि धर्मों के बीच जो फ़र्क है, वह बनावटी है और सारे धर्म एक ही हैं. इससे एक तरफ़ धार्मिक सौहार्द का सन्देश मिलता है तो दूसरी तरफ़ धर्मनिरपेक्षता का. सरमद के बारे में यह भी कहा जाता है कि धीरे-धीरे वह सभी धर्मों के प्रति क्रिटिकल होता चला गया था. अपनी ख़ुद की एक रुबाई में उसने बाक़ायदा यह कहा था कि ‘न तो वह यहूदी है, न मुस्लिम है न हिन्दू है.’ वह प्रचलित धार्मिक मत-मतांतरों से ऊपर हो गया था और सूफ़ी परंपरानुसार ज़्यादा से ज़्यादा आध्यात्मिक हो चला था. सरमद एक तरह से निरीश्वरवादी और ग़ैर-दक़ियानूसी धर्माचरण का हिमायती हो गया था.
     
सरमद का व्यक्तित्व बहुत ही समाहारी तथा संश्लिस्ट था. धर्म के, समाज के, या और किसी भी तरह के विभेद को सरमद एक विभ्रम समझता था. उसका कहना था कि हम यानी पूरी की पूरी मनुष्य-जाति एक है, हम अनेक, अलग और परस्पर भिन्न हैं; यह एक विभ्रम है. Issac A.Ezekiel ने 2005 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘Sarmad...Martyr to Love Divine (Mystics of the East Series)’ के आमुख में लिखा है कि


He was not bound by the illusion that there is more than the one- the illusion that we are many, separate and different from each other. He left behind all concepts about God and religion, and even himself.”
     
उक्त के अलावा और जो सबसे महत्व की बातें सरमद के व्यक्तित्व और कल्पित की इस कविता से उपलब्ध होती हैं, वे ये हैं-

• मनुष्यता के प्रति बहुलतावादी रवैया. अनेक संस्कृतियों के बीच पुल का काम.
• सहिष्णुता तथा सह-अस्तित्व.
• अन्धधर्मवाद/धार्मिक दोगलेपन का निषेध.

कल्पित की यह कविता जैसे सरमद की रूह में समाकर उसे हमारे सामने दुबारा ज़िन्दा कर देती है. कहा जाता है कि रूहों को दुबारा ज़िन्दा करने की कोशिश कर परेशान नहीं करना चाहिए. वे दुबारा ज़िन्दा होती भी नहीं हैं. लेकिन यह दो कवियों और झोली-फटकार शख़्सियतों का मुआमला है! वे एक-दूसरे की रूह में समाना ही चाहते हैं तो कोई क्या कर सकता है भला! इन रूहों की कुछ ख़ताएँ तो अल्लाह भी मुआफ़ कर देगा!
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शंभु गुप्त
21 सुभाष नगर, एन ई बी, अग्रसेन सर्किल के पास, अलवर-301001 (राजस्थान)
मोब.9414789779
shambhugupt@gmail.com 

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  1. सरमद एक बेमिसाल शाहकार है ,जिसे अंतरतम तक रेशे रेशे समझा है शंभु गुप्त जी ने । बधाई कल्पित जी, बधाई शंभु गुप्त जी, बधाई समालोचन ।

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  2. शम्भु गुप्त22 जून 2020, 11:12:00 am

    धन्यवाद और आभार अरुण देव जी!
    समालोचन पर आना महत्वपूर्ण है।

    कृष्ण कल्पित की यह कविता इतनी विचारोत्तेजक थी कि इस पर बिना लिखे मेरी मुक्ति नहीं थी!

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  3. अरुण देव समालोचन और आलोचक शम्भु गुप्त का धन्यवाद । सरमद को प्रकाशित और विवेचित करने के लिए ।

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  4. स्वप्निल श्रीवास्तव22 जून 2020, 2:25:00 pm

    कल्पित प्रयोगधर्मी कवि है । वह किसी कथ्य में कैद नही रहते हैं । कोई नई दास्तान खोजते रहते है । इस बार सरमद पर यह लम्बी कविता और शंभु गुप्त की टिप्पणी
    खूब पसंद आयी ।

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  5. मधुमती के ताजा अंक जून 2020 में प्रकाशित वरिष्ठ कवि आदरणीय श्री कृष्ण कल्पितजी की कविता सरमद और उस पर आलोचक श्री शंभु गुप्तजी का आलोचकीय पाठ समालोचन जैसी प्रतिष्टित वेब पत्रिका पर देखकर सुखद प्रतीति हुई।मित्रवर श्री अरुणदेव और रचनाकारद्वय को बधाई। इन विशेष रचनाओं से सम्पन्न मधुमती का पूरा अंक आप इस लिंक के माध्यम से देख ,पढ़ सकते हैं https://rsaudr.org/show_artical.php?id=1400

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  6. वरिष्ठ आलोचक शम्भु गुप्त के आलेख के साथ कृष्ण कल्पित की यह प्रसिद्ध कविता भी प्रकाशित हुई है। मधुमति जैसी विशिष्ट पत्रिका ने भी यह कविता प्रकाशित की यह और ख़ुशी की बात है।

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  7. विनय कुमार22 जून 2020, 8:37:00 pm

    कविता तो पहले ही पढ़ी थी ..
    एक बेहद ख़ास आख्यान को रेखांकित किया जाना अच्छा लगा !

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  8. कल्पित जी की कविता और शम्भू गुप्त जी की टिपण्णी ; सोने पे सुहागा . बहुत मार्मिक और महत्वपूर्ण .

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  9. कल्पित जी का लेखन अद्भुत है. कलम के धनी और विचारों से ऊर्वर. शत शत प्रणाम.

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  10. कविता मेरी पढ़ी हुई थी। टीका से कुछ विशिष्टता उद्घाटित नहीं हुई। कल्पित की कविताओं का आकर्षण इस बात में होता है कि वे कविता के वाच्य को एक विशिष्ट बिन्दु पर खड़े होकर देखते हैं ।वह खड़े होने की जगह इस कविता से नदारद है। केवल कल्पना करने के वास्ते कहता हूँ - मान लें कि फकीर का सर कलम करने की सच्ची दास्तान के साथ जुड़े झूठे किस्से (कि उसके कबंध ने सिर हाथ में ले लिया और कलमे का बाकी हिस्सा उसके मुंह से निकलने लगा) के बाजू में खड़े होकर आप पूरे आख्यान को देख रहे है। आपको शायद लगे कि मजहब ने अनास्था पर एक झूठ उढ़ाकर उसे घर बैठा लिया। सरमद की कहानी की सबसे बड़ी ट्रेजेडी उसके अनुयायियों द्वारा गढ़ा एक निर्दोष झूठ साबित हुआ। यह उस चीज़ का उदाहरण है जिसे मैं कवि के खड़े होने की जगह कह रहा हूँ ।खड़े होने की यह जगह आख्यान में कहीं हो सकती है। मैंने एक उदाहरण दिया।
    इस कविता में कवि कहीं नहीं खड़ा है। यह सादा इतिवृत्त और अंधविश्वास का मिश्रण है जिसे कविता कहना भी कठिन है।
    आपने टैग किया है तो आपके विश्वास की रक्षा के लिए लिखना पड़ा।

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  11. रवि रंजन23 जून 2020, 9:11:00 am

    Ravi Ranjan कृष्ण कल्पित की यह कविता इतिहास और साहित्येतिहास के तहखाने में से खोजकर लाए हुए हीरे की तरह अनमोल है।यह इस बात का भी प्रमाण है कि समय के इतने बड़े अंतराल के बावजूद रचनाकर अपने पुराने समानधर्मा को अपनी सर्जनात्मकता के बल पर प्रासंगिकता प्रदान करते हुए कविता के माध्यम से अपने समय और समाज का सांस्कृतिक इतिहास रच देता है।
    इस महनीय सांस्कृतिक सृजन के लिए कृष्ण कल्पित को साधुवाद और उसके महत्त्व के आकलन के लिए शम्भू गुप्त को धन्यवाद।
    समालोचन के सम्पादक अरुण जी को इतनी अच्छी कविता और उसकी धारदार समीक्षा के प्रकाशन के लिए बधाई।
    "तुमने दहशत का रास्ता चुना,औरंगज़ेब।अगर ख़ल्क़ की खिदमत का रास्ता चुनते तो तुम्हें कामयाबी मिलती। सच्ची फतह का रास्ता दूसरों को तबाह करने का रास्ता नहीं है।"
    (भीष्म साहनी : 'आलमगीर' नाटक में औरंगज़ेब के हितैषी,पर उसे आईना दिखाने वाले शेख बुरहानुद्दीन की हिदायत)

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  12. सरमद" एकदम भिन्न काव्य अनुभव हुआ. बहुत व्यापक और गहरा. कविता में इतिहास की घटना,तथ्य ,समयऔर उसका पाठ कितनी मानवीय सच्चाई के साथ व्यंजित हो सकता है उसका अद्वितीय आख्यान है यह कविता. हिंदी कविता को दुहराव से मुक्त करता हुआ. मनुष्य की पक्षधरता में दलगत राजनीति से परे सत्ता से मुक्त करती बड़ी राजनीति करती है कविता .आज कीसार्थक सुबह के लिए बहुत-बहुत आभार!

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  13. वाह क्या सुंदर लिखावट है सुंदर मैं अभी इस ब्लॉग को Bookmark कर रहा हूँ ,ताकि आगे भी आपकी कविता पढता रहूँ ,धन्यवाद आपका !!
    Appsguruji (आप सभी के लिए बेहतरीन आर्टिकल संग्रह) Navin Bhardwaj

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