कौन हैं भारत माता ? (पुरुषोत्तम अग्रवाल) : आनंद पाण्डेय



 हम हिन्दुस्तानियों को सुदूर और प्राचीन की तलाश में देश के बाहर नहीं जाना हैउसकी हमारे पास बहुतायत है. अगर हमें विदेशों में जाना है तो वह सिर्फ वर्तमान की तलाश मेंयह तलाश जरूरी हैक्योंकि उससे अल्हदा रहने के मायने हैं कि पिछड़ापन और क्षय.’’
(हिंदुस्तान की कहानी: नेहरू)

 

किसी स्वाधीन हुए देश के भविष्य के लिए इससे बेहतर प्रस्तावना और क्या हो सकती है? आधुनिक भारत के स्वप्नदर्शी प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू ने जो किया और जो कर सकते थे हमारे सामने है. 

और उनके साथ जो हम कर रहें हैं वह भी सामने है. 

आलोचक-विचारक पुरुषोत्तम अग्रवाल की संपादित कृति‘कौन हैं भारत माता?’ नेहरू को आज के इसी समय में देखती है, विवेचित करती है और उनका पक्ष रखती है.

इस क़िताब की चर्चा कर रहें हैं आनंद पाण्डेय.



 

भारतीय सभ्यता के सत्व नेहरू की खोज                                                
आनंद पांडेय

 


 

पने विराट अध्ययन, चिंतन-मनन और आधुनिक दृष्टिकोण से विविध देशी-विदेशी और नवीन-प्राचीन सभ्यताओं, वैचारिक सरणियों और व्यवस्थाओं के गुण-दोषों, पूर्णता-अपूर्णताओं से जो गहन और भावनात्मक साक्षात्कार जवाहरलाल नेहरू ने किया था, वह विस्मयकारी है. उनका जीवन विश्व मानवता की सुदीर्घ यात्रा के अमृत-कलश की खोज के प्रति समर्पित रहा था. वे भौतिक और मानसिक दोनों स्तरों पर विश्व-इतिहास के यात्री थे.

उनकी जीवन यात्रा मानवता की नियति से साक्षात्कार के लिए कृत संकल्पित रही थी. अली सरदार जाफरी ने ठीक ही कहा है, वे ‘मानवता के सागर में तैरना पसंद करते थे.’ इतिहास की वैज्ञानिक समझ, भविष्य की स्वप्नप्रवणता और वर्तमान की यथार्थवादी व्यावहारिकता के वे व्यक्तिरूप थे.

नेहरू मानवता की तमाम दार्शनिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों के अग्र-दूत थे. नये-नये विचारों, अवधारणाओं और स्वप्नों को वे जमीन पर जमानेवाले थे. इसके लिए वे गहरे जमे विचारों, व्यवस्थाओं और संस्थाओं से बिना समझौता किये जूझते रहे थे. उन्होंने उपनिवेशवाद, धर्मतंत्र, सामंतवाद-राजतंत्र, पूँजीवाद, फासीवाद-नाजीवाद, नस्लवाद, सांप्रदायिकता, वर्ण-व्यवस्था और पितृसत्ता जैसी दुनियाभर में जड़ जमा चुकी व्यवस्थाओं और विचारधाराओँ के तहत मानव द्वारा मानव के शोषण व उत्पीड़न को एक साथ चुनौती दी थी. इनके विरूद्ध नेहरू एक वैश्विक स्वर थे.

एक बेहतर भविष्य के लिए लोकतंत्र, समाजवाद, समता, भाईचारा, धर्मनिरपेक्षता, विश्वमानवता, वैज्ञानिक भावबोध (यह अवधारणा स्वयं नेहरू की दी हुई है) और मानवाधिकार के अग्रगामी संस्थापक और शिल्पी थे. विध्वंस और सृजन तथा उन्मूलन और स्थापना के दोहरे मोर्चे पर संघर्ष के वे, सरदार पटेल के शब्दों में, ‘हमारे सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं के नायक’ थे. देश-दुनिया की प्रगति और विकास के लिए यह बहुस्तरीय संघर्ष अपरिहार्य था.

ब्रिटिश उपनिवेशवाद के साथ-साथ अपने निहित स्वार्थ की रक्षा के लिए कटिबद्ध देशी शक्तियों से भी नेहरू को लड़ना पड़ा था. बहुदलीय लोकतंत्र की संस्कृति विकसित होने से प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ भी स्वयं को राजनीतिक दलों के रूप में संगठित कर रही थीं. ये शक्तियाँ हिन्दुओं और मुसलमानों को सांप्रदायिक आधार पर गोलबंद करके प्रगति के चक्र को रोककर यथास्थिति को बनाये रखना चाहती थीं. इन्हें अंग्रेजी उपनिवेश को बनाये रखने के लिए और आजादी की लड़ाई को रोकने के लिए भी इस्तेमाल में लाया जाता था. ये शक्तियाँ मानव सभ्यता की उपलब्धियों का लाभ भारतीय जनता को नहीं लेने देना चाहती थीं. लेकिन, जनता ने स्वाधीनता संघर्ष के नेताओं के संदेश को समझा और उनका साथ दिया.

नेहरू गाँधी के बाद देश के सबसे बड़े नेता थे. गाँधी की हत्या के बाद देश को मानव की श्रेष्ठ उपलब्धियों के अनुरूप ढालने के सबसे बड़े शिल्पी वे ही थे. प्रतिक्रियावादी शक्तियों ने इसीलिए सदैव नेहरू को अपने दुष्प्रचार, चरित्र हनन और घृणा का सबसे अधिक निशाना बनाया. इसमें हिन्दू महासभा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसी प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ तो अग्रगामी थी हीं, राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में कुछ समाजवादी भी थे जिन्होंने नेहरू के विरूद्ध दुष्प्रचार, असत्य और अर्धसत्य का प्रचार करने में संघ के साथ श्रम विभाजन किया.

आजादी के बाद धीरे-धीरे राजनीति सत्ता और अस्मिता केन्द्रित होती चली गयी. धर्म, जाति और क्षेत्र, ये तीन प्रमुख आधार बने जिनके इर्दगिर्द जनमत को संगठित करने के प्रयास हुए. इसका नतीजा यह हुआ कि नेहरू जैसे नेता और कांग्रेस-वाम जैसे राजनीतिक दल अप्रासंगिक होते चले गये. नेहरू हमारी सामूहिक स्मृति से बहिष्कृत कर दिये गये. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने नेहरू के प्रति समाज की स्मृति-लोप के उदाहरणों और कारणों पर विस्तार से विचार किया है. वे पाते हैं कि नेहरू न केवल नयी पीढ़ी के बीच अनुपस्थित हैं बल्कि अकादमिक दुनिया में भी वे अपने समकालीनों के बीच से गायब कर दिये गये हैं. सबसे बड़ी विडम्बना, जिसे अग्रवाल अपने अनुभव से पुष्ट करते हैं, कि नेहरू की पार्टी काँग्रेस ने भी उन्हें हाशिये पर डाल दिया है.

नेहरू के महत्व को उन तबकों ने भुला दिया जिन्हें नेहरू के संघर्ष से सबसे ज्यादा फायदा हुआ था. लेकिन, उन लोगों ने उन्हें बिल्कुल याद रखा जो नेहरू के वैचारिक प्रतिपंथी थे. 2014 में भाजपा की सरकार बनने के बाद तो ऐसी स्थिति बना दी गयी मानो नेहरू ही आज के प्रतिपक्ष हैं. बिना किसी तर्क के नेहरू को देश की समस्याओं के लिए जिम्मेदार बता दिया जाता है. सत्ता पक्ष के नेता उनके चरित्र हनन में मिथ्याभाषण और निर्लज्जता की सारी सीमाएँ पार करते रहते हैं. मीडिया और इंटरनेट जैसे सर्वव्यापी माध्यम नेहरू के विरूद्ध झूठ फैलाने के सबसे बड़े मंच बन गये. एक विशाल उद्योग खड़ा कर दिया गया नेहरू की हस्ती मिटाने के लिए. चुनावी सभाओं में नेहरू की जीवनी और इतिहास लिखा जाने लगा, जिसमें न ईमानदारी थी और न ही तथ्य बल्कि शुद्ध गप्प और दुर्भावना के सिवा कुछ नहीं होता. जनता का बहुत बड़ा हिस्सा इससे गुमराह हुआ. यह अनवरत जारी है.

वास्तविकता तो यह है कि नेहरू के विरूद्ध दक्षिणपंथी दुष्प्रचार कभी थमा ही नहीं था लेकिन सत्ता में आने का बाद पूरे सरकारी अमले, अकादमिक संस्थाओं और संचार माध्यमों को इस काम में लगा दिया गया. ऐसी स्थिति देख शुरू-शुरु में शिक्षित और जागरूक तबके में क्षोभ, आक्रोश, असहायता और किंकर्तव्यविमूढ़ता का बोध था. पर जल्द ही इस मिथ्या प्रचार अभियान का प्रतिकार करने के लिए इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों और चिंतनशील व्यक्तियों ने नेहरू की ओर रूख किया. झूठ का जवाब सत्य से, प्रौपेगेंडा का जवाब इतिहास से और मतिभ्रम का जवाब सुमति से देने का मानों स्वत:स्फूर्त आंदोलन चल पड़ा. वर्षों के दुष्प्रचार और स्मृतिलोप के कारण नेहरू के बारे में जो अनैतिहासिक बातें ऐतिहासिक रूप से सत्य मान ली गयी थीं उनका भी सत्य सामने आया. फलत: नेहरू अभूतपूर्व चमक और तेज के साथ सामने आये. उनका एक ऐसा व्यक्तित्व सामने आया है जो काल की गति में ओझल हो गया था. नेहरू फिर से प्रासंगिक हो चले हैं. जो नेहरू के आलोचक और विरोधी हैं, उनमें से भी बहुत-से लोग उनके कायल हो गये हैं.



ध्यान देने की बात यह है कि जैसे नेहरू-द्वेषी प्रचार अभियान संगठित, पूंजी-सत्ता-पोषित रहा है वैसे यह प्रतिकार न किसी संस्था द्वारा पोषित था और न ही संगठित था बल्कि प्रबुद्ध समाज ने इसे एक नैतिक और बौद्धिक दायित्व के रूप में लिया और अक्सर व्यक्तिगत रूप से संपन्न किया. देखते-देखते हजारों लेख, सैकड़ों किताबें सामने आयीं और अलगोरिदम के बावजूद सोशल मीडिया के माध्यम से जनता के एक बड़े हिस्से के बीच नेहरू का सच्चा इतिहास रखा जाने लगा. पुनर्नवा नेहरू सतेज उपस्थित हुए. नेहरू सभी अग्निपरीक्षाओं और जाँचों के बाद खरे-से-खरे रूप में फिर से आ बैठे. इतिहास की कठोर-से-कठोर कसौटी पर कसने के बावजूद भी नेहरू खरे उतरते हैं. ‘भारतमाता कौन हैं?’ इस बात की साक्षी है, क्योंकि इसने नेहरू की अग्निपरीक्षा के एक-एक विवरण को संजोया है. 

इतिहास में ऐसे कम महापुरुष हुए हैं जिन्होंने ‘ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया’ का गौरव प्राप्त है. नेहरू के बड़े-से-बड़े निंदक को भी नेहरू की असफलताओं को गिनाते तो पा सकते हैं लेकिन उनकी नीयत पर शक करते नहीं.

प्रख्यात बुद्धिजीवी और लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक ‘कौन हैं भारतमाता ?’ इसी राजनीतिक और बौद्धिक वातावरण की एक विशिष्ट उपज है. पिछले साल यह किताब ‘हू इज भारतमाता?’ नाम से अंग्रेजी में आयी थी. नेहरू की राजनीति, विचारधारा और लेखन में अग्रवाल जी की दिलचस्पी पुरानी है. समय-समय पर लिखे गये उनके लेख और दिये गये भाषण इस बात के प्रमाण हैं. लेकिन, यह किताब निःसंदेह नेहरू के विरूद्ध चलाए जा रहे नये-पुराने दुष्प्रचारों का माकूल जवाब देने के लिए ही तैयार की गयी है. नेहरू के विरूद्ध अब तक चलाए गये कुत्सित और अश्लील चरित्र-हनन अभियानों का मुँहतोड़ जवाब देने में यह किताब अकेले सक्षम है. इस किताब ने इतिहास के विरूद्ध झूठ और असत्य के प्रचार के बीच अपनी परंपरा और इतिहास की रक्षा के लिए भारतीय जनता को उठ खड़े होने के लिए न केवल प्रेरित किया है बल्कि रास्ता भी दिखाया है.

किताब की विस्तृत और विद्वतापूर्ण भूमिका में पुरुषोत्तम अग्रवाल भले ही विनम्रतावश कहते हैं कि ‘यह पुस्तक नेहरू का समग्र तो क्या आंशिक आकलन करने का भी दावा नहीं करती’ लेकिन वास्तविकता यह है कि यह किताब नेहरू का समग्र चित्र बनाती है. नेहरू के लेखों, भाषणों और उनको याद करते हुए लिखे गये प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरणों, श्रद्धांजलियों और विद्वतापूर्ण पाठों का चुनाव जिस कल्पनाशीलता और सुचिंतित दृष्टि से किया गया है वे नेहरू को संपूर्णता में प्रस्तुत करके ही सार्थक हो सकती थीं.

नेहरू के एकांगी और अधूरे पाठ से झूठ और दुष्टतापूर्ण प्रचार को निरुत्तर नहीं किया जा सकता था. रही-सही कसर पूरी करती है- विशद और विलक्षण भूमिका. करीब सौ पृष्ठों में फैली भूमिका नेहरू का समग्र अध्ययन और मूल्यांकन करती है. यह नेहरू का विरल सामयिक पाठ है जिसे इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने ठीक ही ‘पिछले अनेक वर्षों में नेहरू पर लिखा गया सर्वश्रेष्ठ निबंध’ कहा है. सोशल मीडिया पर किताब वायरल हुई और कुछ ही दिनों में दूसरा संस्करण निकालना पड़ा. किताब की इस लोकप्रियता में इसकी भूमिका का बहुत बड़ा हाथ है, यह किसी से छुपा नहीं है.

जाहिर है, ‘कौन हैं भारतमाता?’ नेहरू के विरूद्ध झूठ की संस्कृति का प्रतिकार करने के लिए लिखी गयी है. इस उद्देश्य में यह किताब सफल तो हुई ही है लेकिन मेरी नजर में किताब का दीर्घकालिक महत्व नेहरू-अध्ययन की अद्यतन दृष्टि और नये वातायन खोलने में है. इसके अतिरिक्त नये संदर्भों में नेहरू-दर्शन की प्रासंगिकता को परखने के प्रतिमानों को खोजने की दिशा में भी यह किताब बहुत कारगर साबित होती है.

दुष्प्रचारों और तथ्यों के कुप्रस्तुतीकरण के कलुष से प्रभावित व्यक्ति में यह किताब नेहरू के प्रति मोह और प्रेम भरने की क्षमता रखती है. नेहरू के इर्दगिर्द फैलायी गयी मलिनता और गर्दो-गुबार को हटाकर यह किताब नेहरू की एक निर्मल और इतिहास-सम्मत छवि पेश करती है लेकिन यह किताब नेहरू-अभिनंदन-ग्रंथ नहीं है. इसलिए, इसमें नेहरू की सीमाओं और नीतिगत असफलताओं को भी रेखांकित किया गया है. यह किताब नेहरू के प्रति एक स्वस्थ और रचनात्मक आलोचना का विवेक भी पैदा करती है. नेहरू को क्यों और कैसे याद करें-समझें, उनकी कमियों और सीमाओं को कैसे पकड़ें और कैसे उनकी आलोचना करें, यह जानना हो तो इस किताब की ओर आना सार्थक होगा. 

राजनीतिक हिंदुत्व के नेहरू विरोधी अभियान के पीछे दो मुख्य उद्देश्य रहे हैं. पहला धर्मप्राण हिंदू जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता खत्म करना और दूसरी कॉरपोरेट जगत को अपनी ओर से निश्चिंत कराना कि संघ-भाजपा नेहरू के समाजवादी और कल्याणकारी राज्य को नहीं, बल्कि बाजारवादी पूँजीवाद को पसंद करता है. इस तरह एक ओर वह नेहरू विरोध के माध्यम से हिंदूओं में अपने ‘हिंदुत्व’, जिसे सावरकर ने हिंदू धर्म से भिन्न कहा था, को स्वीकृति दिलाना चाहता रहा है तो वहीं दूसरी ओर कॉरपोरेट जगत का विश्वास भी हासिल करना चाहता रहा है. इन्हीं दोनों आधारों पर वह दशकों से नेहरू विरोधी आख्यान रचता रहा है. पुरुषोत्तम अग्रवाल की सूक्ष्म और मर्मभेदी दृष्टि ने संघ के नेहरू-विरोध के पीछे छिपे इन दोनों उद्देश्यों को पहचाना है और विशेषरूप से इन्हीं दोनों आधारों पर नेहरू का पुनराविष्कार किया है. भूमिका में अग्रवाल रेखांकित करते हैं, ‘ध्यान देना चाहिए कि नेहरू की भारत-संकल्पना केवल सांस्कृतिक या भावनात्मक संकल्पना नहीं`, उसमें सामाजिक-आर्थिक पहलू भी महत्वपूर्ण है.’

नेहरू के हिन्दू साम्प्रदायिक विरोधियों में उनको अकेला करके उनका वध करने की प्रवृत्ति और पैटर्न दिखता है. नेहरू के खिलाफ उनके ही सहयोगियों, साथियों और कामरेडों को खड़ा करके उनके कंधे पर अपनी बंदूक रखकर नेहरू की हत्या की कोशिश की जाती रही है. जिन बातों के लिए नेहरू को दोषी सिद्ध किया जाता है उन्हीं बातों के लिए उनके सहयोगियों पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता है. मानो नेहरू कोई तानाशाह हों जिसने मोहरे की तरह अपने समकालीन नेताओं का इस्तेमाल किया हो. काँटे से काँटा निकालने की इस कुटिल पद्धति में इतिहास के सत्य को कचरे के डब्बे में डाल दिया जाता है. नेहरू को कभी महात्मा गाँधी, सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह और सरदार पटेल से लड़ाकर मारा जाता है तो कभी उस जमाने के मिलिट्री जनरलों से.

नेहरू पर सबसे बड़ा आरोप यह लगाया जाता रहा है कि उन्होंने इन नेताओं का अपमान किया उनकी या तो बातें नहीं मानीं या फिर उनको उनके हाल पर छोड़ दिया. प्रकारांतर से नेहरू विरोधी उन्हें सुपरमैन साबित कर देते हैं जो अपने समकालीन नेताओं के साथ जैसा चाहते थे, सुलूक करते थे और वे नेता इतने असहाय और बुद्ध थे कि नेहरू की मनमानी झेलने के सिवा उनके पास कोई चारा न था.

पुरुषोत्तम अग्रवाल ने स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं के साथ नेहरू के संबंध, उनके प्रति नेहरू के बर्ताव की खोजबीन करके यह दिखाया है कि नेहरू को उनके सहधर्मियों से लड़ाना इतिहास-सम्मत नहीं है. इनके आपस में सहयोग, प्रेम और सद्भाव के संबंध थे. पुरुषोत्तम अग्रवाल आजादी के नेताओं के आपसी संबंधों पर लिखते हैं,

“आखिर अपने सारे आपसी मतभेदों के बावजूद वे एक दूसरे के न केवल प्रशंसक थे बल्कि एक-दूसरे को प्यार भी करते थे. जितने उनके मतभेद वास्तविक थे उतने ही सच्चे उनके विस्तृत आम सहमति बनाने के प्रयास भी थे. इस प्रयास में वे सब लोग एक-दूसरे के साथ किसी-न-किसी स्तर पर एक वृहत सामंजस्य और सम्मान मूलक रिश्ते भी कायम रखते थे. मूलभूत अधिकारों और आर्थिक कार्यक्रमों पर कराची कांग्रेस (1931) में पारित प्रस्ताव इस तरह के प्रयासों का मार्मिक रूपक है. यह प्रस्ताव स्वतंत्रता आंदोलन की मूल आत्मा को धारण किये हुए है और भारतीय संविधान की ‘न्याय’ और ‘समानता’ के लिए प्रतिबद्धता का पूर्वाभास भी देता है. प्रस्ताव तैयार किया था नेहरू और बोस ने मिलकर, पेश किया था गाँधी जी ने, और सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे सरदार पटेल!”

गांधी-नेहरू के मध्य खाई खोदने का काम लोहिया और उनके अनुयायियों ने सबसे ज्यादा, संघियों से भी ज्यादा, जोर-शोर से चलाया था. नोआखाली में सांप्रदायिक दंगों से जूझ रहे गाँधी और दिल्ली में प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी निभाते नेहरू के रूप में दो आत्यंतिक ध्रुव खींचे गये. यह गाँधी की विरासत पर कब्जा जमाने के सिवा और कुछ नहीं था. यह महज संयोग नहीं था कि लोहिया ने बाद में गाँधी की विरासत को गोड्से की विरासत के श्रीचरणों में अर्पित कर दिया था. लोहियावाद के रास्ते गाँधीवादी बने लोगों ने गाँधी की विरासत को सबसे अधिक संदिग्ध बनाया. उन्होंने गाँधी-नेहरू को वैसे ही एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया और गाँधी को उत्पीड़ित बताया जैसे बाद में संघियों ने नेहरू-पटेल के बीच किया. जबकि स्वयं गाँधी ने अपनी विरासत ‘स्फटिक के समान निर्मल हृदयवाले’ नेहरू के हाथों में आजादी से बहुत पहले ही सौंप दी थी-

‘मेरे जाने के बाद जवाहर मेरी ही जबान बोलेगा.’

पुरुषोत्तम अग्रवाल ने तथ्यों और व्याख्याओं के आलोक में यह साबित किया है कि गाँधी और नेहरू वैचारिक सहमति-असहमति के बावजूद घुमा-फिराकर एक ही जबान बोलते थे. उन्होंने नेहरू को प्रधानमंत्री बनाये जाने के गाँधी के फैसले को भी बहुत उचित और सौभाग्यपूर्ण पाया है.

भूमिका के वे अंश बहुत मूल्यवान हैं जहाँ नेहरू की भारतीय संस्कृति के इतिहास और परंपरा की समझ का विश्लेषण किया गया है. नेहरू की भारतीय संस्कृति की समझ को समझने के लिए उनके द्वारा भारतीय संस्कृति के लिए प्रयुक्त एक अद्भुत और विलक्षण प्रतीक और पुरुषोत्तम अग्रवाल की उसकी व्याख्या का जिक्र किये बिना इस प्रसंग को समाप्त करने का लोभ संवरण नहीं किया जा सकता है. नेहरू भारतीय संस्कृति को एक ऐसी प्राचीन पांडुलिपि के रूप में देखते हैं जिस पर पुरानी इबारतों को मिटाए बिना निरंतर नयी-नयी इबारतें लिखी जाती रहीं और इनमें से सभी को एक साथ पढ़ा जा सकता है. भारतीय संस्कृति की जटिलता, विविधता और निरंतरता को शायद ही इससे अधिक बेहतर प्रतीक का माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सकता है. पुरुषोत्तम अग्रवाल ठीक ही लिखते हैं,

“निस्संदेह यह उस समाज का सटीक वर्णन है, जहाँ आपको आज भी न केवल सिंधु घाटी सभ्यता की बैलगाड़ी, बल्कि सूक्ष्मतर निशान मिल जाएंगे और बाद की विकास-यात्रा के चिह्न भी. साथ ही जहाँ आप लगभग हर नस्ल के मनुष्यों की छाप भी देख सकते हैं.”

जाहिर है, नेहरू की भारतीयता के विवेक सम्मत और वैज्ञानिक समझ से संघ को बहुत दिक्कत रही है. इसीलिए हिंदू सांप्रदायिक दशकों से नेहरू को अभारतीय, अहिंदू और पश्चिमपरस्त सिद्ध करते रहे हैं. वे यह असत्य फैलाते रहे हैं कि नेहरू ने कभी कहा था कि ‘आई एम इंग्लिश बाय एजुकेशन, मुस्लिम बाय कल्चर एंड हिंदू बाय एक्सीडेंट.’ संघ के प्रौपेगैंडा प्रकाशनों में ‘एक्सीडेंट’ का अनुवाद ‘दुर्भाग्य’ कर दिया जाता है. हिन्दू महासभा के नेता एनबी खरे द्वारा नेहरू पर लगाये गये आरोप को नमक-मिर्च लगाकर नेहरू का कथन कहकर प्रचारित किया जाता रहा है ताकि धर्मप्राण हिंदू जनता के बीच नेहरू को साखहीन साबित किया जा सके और उनकी विरासत पर चलनेवाली काँग्रेस को चुनावों में हराया जा सके.

(पुरुषोत्तम अग्रवाल)


‘कौन हैं भारतमाता?’ की मूल प्रेरणा इस तरह के झूठे आरोपों का खंडन करने से अधिक भारतीय संस्कृति, चिंतन और धार्मिक-आध्यात्मिक परंपरा से नेहरू के अभेद्य जुड़ाव और लगाव का व्यवस्थित अध्ययन है. पुरुषोत्तम अग्रवाल का प्रमुख उद्देश्य था- नेहरू के भारतीय ‘इतिहास, संस्कृति और भारत संकल्पना’ संबंधी चिंतन और दृष्टि को प्रकाश में लाना. नेहरू-अध्ययन में नेहरू के ठेठ भारतीय और देशी रूप के आयाम को जोड़ना इस किताब की गर्व करने लायक उपलब्धि है. भारतीय-दर्शन, धर्म-परंपरा, इतिहास और संस्कृति की पांडियत्पूर्ण खोज और विवेचना करनेवाली जगत-प्रसिद्ध पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑव इंडिया’ के लेखक नेहरू को पुरुषोत्तम अग्रवाल ने बिल्कुल उचित ही भारतीय सभ्यता के सत्त्व के रूप में आविष्कृत एवं परिभाषित किया है. वे दिखाते हैं कि नेहरू का संपूर्ण जीवन, दर्शन-चिंतन और राजनीतिक यात्रा प्राचीन से लेकर आधुनिक काल तक के भारत की मनीषा के सार ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ और बौद्ध-दर्शन के ‘मध्यमा प्रतिपदा के प्रबुद्ध मध्यमार्ग’ के पथिक की रही है.

‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ के सिद्धांत को पुरुषोत्तम अग्रवाल ‘भारतीय जनता के हजारों साल पुराने, समृद्ध सांस्कृतिक अनुभव का सार’ कहते हैं और नेहरू को इसी सार-तत्व के प्रतीक-पुरुष के रूप में देखते हैं. नेहरू की भारतीयता को शायद इससे अधिक बेहतर ढंग से नहीं रेखांकित किया जा सकता है. नेहरू को भारतीय संस्कृति के सार-तत्व के प्रतीक-पुरुष के रूप में देखकर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने नेहरू-अध्ययन में एक मौलिक योगदान दिया है, जो निश्चय ही किसी सीमा तक, नेहरू की पश्चिमी सभ्यता में बद्ध मूल छवि का प्रत्याख्यान भी है.

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आनंद पाण्डेय
(अम्बेडकर नगर, 15 जनवरी 1983) 
'पुरुषोत्तम अग्रवाल संचयिता' का ओम थानवी के साथ सह-संपादन तथा ‘सोशल मीडिया की राजनीति' नामक पुस्तक का संपादन. 'लिंगदोह समिति की सिफारिशें और छात्र राजनीति' नाम से एक पुस्तिका प्रकाशित.
सम्पर्क
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  1. देवेंद्र मोहन20/3/21, 10:52 am

    बहुत ही बेहतरीन लेख। पुरुषोत्तम अग्रवाल जी बधाई के पात्र हैं। लेख पढ़ते समय मैं गद्गद हो रहा था। मैं ने अपने दिल्ली के बचपन में पंडित नेहरू को नामालूम कितनी बार देखा है जिसका कोई हिसाब ही नहीं । उनकी अंतिम यात्रा के समय पिता जी और माता जी के अलावा दोस्त अहबाब के साथ वह यात्रा तय की है जिसका वो मंज़र ताज़िंदगी याद रहेगा। बाद में उन की लिखी सारी चीजें पढ़ डालीं और यह सोचता रहा: कौन था यह संत और कैसी चीजें लिखता रहा? एक बार अवकाश के दिनों में एक सांसद मुझे लोक सभा के भीतर ले गए और वह सीट दिखाई जिस पर नेहरू विराजमान होते थे। उन्होंने शायद मज़ाक़ में कहा: “इस सीट पर बैठना चाहेंगे? बैठ कर देखिए, कैसा महसूस होता है?” बड़ा दिल चाहा, पर हिम्मत नहीं पड़ी। यह घटना १९८४ की है जब इंदिरा जी हयात थीं । उस समय ख़याल आया इस सीट पर कुछ और भी लोग बैठे हैं । सब के सब बौने ही निकले - शायद शास्त्री जी को छोड़कर। वक़्त का सितम देखिए आज उसी सीट पर या उस की साथ वाली सीट पर बैठकर कुछ ‘दुअन्नी चवन्नी’ छाप नेता उनकी भर्त्सना करते हैं, उन्हें भद्दे शब्दों से पुकारते हैं । यह साबित करने की कोशिश करते हैं जैसे वे किसी मदारी की बात कर रहे हों। हर रोज़ एक नयी कोशिश होती है नेहरू को ‘विलेन’ बनाने की। इन लोगों को शायद यह नहीं मालूम कि आने वाली नस्लें इतिहास को धूलि धूसरित करने वालों को कभी माफ़ नहीं करेंगी । अग्रवाल जी का यह लेख और आनंद जी की समीक्षा उसी दिशा की ओर एक कदम है। सही बात कहने वालों की इस देश में कमी नहीं । आग़ाज़ हो चुका है और देखने वालों को पूरा पूरा एहसास हो चला है कि दूध का दूध और पानी का पानी क्या होता है। वह वक़्त जल्द ही आए इसी का इंतज़ार रहेगा....इसे छापने के लिए आप को भी ढेर सारी बधाइयाँ, अरुण देव जी!

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  2. नरेश गोस्वामी20/3/21, 10:54 am

    साफ़-सुथरी और सुचिंतित समीक्षा। कहीं कोई झोल या अनावश्यक गरिष्ठता नहीं। आनंद जी ने किताब को पढ़ा भर नहीं, उसे सिचुऐट भी किया है। ऐसी समीक्षा समृद्ध करती है।

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  3. समीक्षा एक नज़र में दिलचस्प है ,

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